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17 साल की बहन ने मां के प्रेमी को घर से निकाला जब उसने ऑटिस्टिक भाई को थप्पड़ मारा, पर असली जख्म तब लगा जब मां ने रोकर कहा, “तूने मेरा रिश्ता तोड़ दिया”, और बच्चा डर से कांपता रहा

PART 1

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आरव की गाल पर पड़ा थप्पड़ इतना तेज था कि रसोई में रखी स्टील की थाली कांपकर फर्श पर गिर गई।

17 साल की अनन्या श्रीवास्तव दरवाजे पर जम गई। उसके हाथ में गीला कपड़ा था, और सामने उसका 8 साल का छोटा भाई आरव कुर्सी पर सिकुड़ा बैठा था। उसकी दाईं गाल लाल हो चुकी थी, आंखें फैली हुई थीं, लेकिन उसके मुंह से चीख नहीं निकली। बस एक टूटी हुई सांस निकली, जैसे डर ने उसकी आवाज को अंदर ही बंद कर दिया हो।

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उसके सामने विक्रम खड़ा था, मां का नया साथी। बनियान के ऊपर खुली शर्ट, आंखों में घमंड और हाथ अब भी हवा में उठा हुआ।

—अगर बात समझ में नहीं आती, तो थप्पड़ से समझेगा।

अनन्या की आवाज धीमी थी।

—तुमने मेरे भाई को मारा?

विक्रम ने हंसकर कहा—

—मैं उसे सुधार रहा हूं। इस घर में कोई तो मर्द होना चाहिए।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर के उस 2 कमरों वाले फ्लैट में पिछले 7 महीनों से अनन्या बहुत कुछ निगलती आ रही थी। विक्रम की ऊंची आवाज, टीवी का शोर, मां प्रीति की चुप्पी, घर के खर्चे, आरव की दवाइयां, स्कूल की मीटिंग, अपनी 12वीं की पढ़ाई। आरव ऑटिज्म स्पेक्ट्रम और एडीएचडी से जूझता था। वह सवाल बार-बार पूछता था, तेज आवाज से कान ढक लेता था, और अपने खिलौना हाथियों को रंग के हिसाब से लाइन में लगाता था। वह बदतमीज नहीं था। उसे बस दुनिया थोड़ी अलग सुनाई देती थी।

उस दिन आरव को गणित में 10 में से 10 मिले थे। अनन्या ने वादा किया था कि वे दोनों साथ में रंगीन स्लाइम बनाएंगे। मां अस्पताल की नाइट ड्यूटी से लौटने वाली थी। मेज पर अखबार बिछे थे, नीला रंग फैला था, और आरव पहली बार कई दिनों बाद खुलकर हंस रहा था।

फिर स्लाइम की एक बूंद उसकी टी-शर्ट पर गिर गई।

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अनन्या बस 1 मिनट के लिए स्पंज लेने गई थी।

वापस लौटी तो उसके भाई की गाल पर विक्रम की उंगलियों की छाप थी।

—आरव, मेरे पास आओ।

आरव नहीं हिला। उसकी आंखें विक्रम के हाथ पर अटकी थीं।

—दीदी, गलती से हुआ, उसने कांपती आवाज में कहा। मैंने जानबूझकर नहीं किया।

अनन्या ने उसे कुर्सी से उठाया और अपने कमरे की ओर ले गई। विक्रम पीछे-पीछे आया।

—इतना ड्रामा मत कर। एक थप्पड़ से कोई मर नहीं जाता।

अनन्या पलटी।

—इस कमरे में मत आना।

—तू होती कौन है मुझे रोकने वाली?

—वही, जो इस बच्चे को संभालती है, जबकि तुम हमारे सोफे पर पड़े रहते हो।

विक्रम आगे बढ़ा। अनन्या ने अपने बैग से छोटी मिर्ची स्प्रे की बोतल निकाली, जो उसके पिता ने उसे देर रात कोचिंग से लौटने के लिए दी थी।

—एक कदम और बढ़ाया तो कसम से, दोबारा मेरे भाई को छू नहीं पाओगे।

विक्रम हंसा और सचमुच 1 कदम बढ़ा।

अनन्या ने स्प्रे दबा दिया।

विक्रम चीखा, आंखें पकड़कर पीछे हटा, गालियां देने लगा। अनन्या ने दरवाजा खोला, उसका जैकेट और बैग उठाया, और उसे बाहर धक्का दे दिया।

—निकल जाओ।

दरवाजा बंद करके उसने चेन लगा दी। फिर कांपते हाथों से आरव की गाल की फोटो ली, विक्रम के धमकी वाले मैसेज सेव किए और मां को फोन लगाया।

प्रीति ने 5वीं घंटी पर फोन उठाया।

—अनन्या, अब क्या कर दिया तुमने?

“अब” शब्द सीधा उसके सीने में धंस गया।

—विक्रम ने आरव को मारा है।

कुछ पल सन्नाटा रहा।

—ज्यादा जोर से मारा?

अनन्या का खून जम गया।

—मां, यही पूछोगी?

—मैं 14 घंटे की ड्यूटी करके आ रही हूं। विक्रम ने कहा तुमने उस पर हमला किया।

—उसने तुम्हारे बेटे को थप्पड़ मारा।

—उसे नहीं करना चाहिए था, ठीक है। लेकिन तुमने हद पार कर दी। तुम्हें पता है? तुमने मेरा रिश्ता तोड़ दिया।

अनन्या को लगा जैसे घर की सारी दीवारें उसके ऊपर गिर गई हों।

PART 2

उस रात अनन्या ने आरव का गद्दा अपने कमरे में खींच लिया। दरवाजे के पीछे कुर्सी फंसा दी। आरव सोते-सोते भी उसकी टी-शर्ट पकड़े रहा और बड़बड़ाता रहा—

—मैंने जानबूझकर नहीं किया।

सुबह 6:20 पर प्रीति लौटी। आंखें लाल, बाल बिखरे, लेकिन पहला सवाल था—

—विक्रम कहां है?

अनन्या ने मेज पर फोटो, मैसेज और मेडिकल फाइल रख दी।

—वह वापस नहीं आएगा।

प्रीति चीखी—

—तू मेरे घर का फैसला करेगी?

—अगर उसे अंदर लाई, तो मैं पुलिस बुलाऊंगी।

प्रीति का चेहरा डर और गुस्से से भर गया।

—आरव को नियम सीखने होंगे।

अनन्या ने मां की आंखों में देखा। वहां थकान नहीं, कोई और अंधेरा था। उसे बाथरूम में मिली जली हुई पन्नियां, कांपते हाथ, छुपी हुई गोलियां याद आ गईं।

—मां, तुमने फिर शुरू कर दिया है?

प्रीति ने मेज पर हाथ मारा।

—हां! हां, मैं फिर नशे में डूब गई हूं! खुश?

तभी विक्रम का मैसेज आया—

“उस पागल बच्चे को बोल, लौटकर उसे असली सबक सिखाऊंगा।”

अनन्या ने अपने पिता को फोन लगाया।

—पापा, अभी आ जाओ।

PART 3

राजीव श्रीवास्तव आरव के जैविक पिता नहीं थे। वह अनन्या के पिता थे, जो प्रीति से तब अलग हो गए थे जब अनन्या 5 साल की थी। वह कोई फिल्मी हीरो नहीं थे। कभी-कभी देर से आते थे, बातों में अटक जाते थे, अपनी जिंदगी में भी उलझे रहते थे। लेकिन उन्होंने अनन्या से एक बात हमेशा कही थी—

—जिस दिन लगे कि तुरंत निकलना है, मुझे फोन करना। सोचना बाद में, फोन पहले।

वह 22 मिनट में अपनी पुरानी सफेद स्विफ्ट लेकर नीचे खड़े थे।

जब वह चौथी मंजिल तक सीढ़ियां चढ़कर आए और उन्होंने आरव की गाल, अनन्या की सूजी आंखें और प्रीति का कांपता चेहरा देखा, तो उनकी आवाज ठंडी हो गई।

—बच्चों का बैग उठाओ। हम जा रहे हैं।

प्रीति दरवाजे के सामने खड़ी हो गई।

—आरव मेरा बेटा है। तुम्हारा उस पर कोई हक नहीं।

राजीव ने फोन निकाला।

—मेरा नहीं होगा। लेकिन बाल कल्याण समिति और पुलिस का होगा।

प्रीति की आवाज टूटने लगी।

—कोई तुम लोगों की बात नहीं मानेगा। अनन्या नाबालिग है। आरव को दिक्कत है। विक्रम कहेगा कि बच्चा खुद गिरा था।

तभी आरव, जो अब तक दरवाजे के पीछे खड़ा था, धीरे से बोला—

—मैं गिरा नहीं था।

सब चुप हो गए।

उसने अपनी उंगलियां मोड़ते हुए कहा—

—विक्रम अंकल ने मारा। और मां ने बहुत बार कहा कि चुप रहो, नहीं तो वो गुस्सा करेंगे।

प्रीति की आंखों में पानी आ गया, पर अनन्या को अब उन आंसुओं पर भरोसा नहीं था। वह आंसू आरव की सुरक्षा नहीं थे। वे सिर्फ डर थे कि सच घर से बाहर जा रहा था।

राजीव उन्हें सीधे महिला थाना और चाइल्ड हेल्प डेस्क ले गए। आरव पहले पुलिस स्टेशन में घुसते ही घबरा गया। उसने कान बंद कर लिए, फर्श पर बैठ गया और कहने लगा—

—वापस नहीं जाना। वापस नहीं जाना।

एक सामाजिक कार्यकर्ता, सीमा, आई। उसने वर्दी नहीं पहनी थी। वह आरव से दूर फर्श पर बैठ गई और कागज, रंगीन पेंसिल रख दी।

—बोलना नहीं है तो चित्र बना सकते हो।

आरव ने काली पेंसिल उठाई। उसने एक मेज बनाई, एक बड़ा आदमी, एक छोटा बच्चा, और प्लेट में कुछ काले धब्बे।

सीमा ने धीरे पूछा—

—ये क्या है?

आरव ने नजर झुकाई।

—खाने में राख।

अनन्या का शरीर सुन्न हो गया।

—कौन सी राख?

आरव ने बहुत धीरे कहा—

—जब मैं जल्दी नहीं खाता था, मां सिगरेट बुझा देती थी प्लेट के पास। विक्रम अंकल कहते थे, रोया तो पानी में थूक दूंगा।

अनन्या की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह कई दोपहर बेकरी में काम करती थी, घर का राशन खरीदने के लिए पैसे जोड़ती थी, अपनी पढ़ाई के लिए फॉर्म भरती थी। उसे लगता था मां थकी हुई है, लेकिन आरव के साथ है। उस बीच उसका भाई खाना खाते हुए डरना सीख रहा था।

उसने खुद को रोने नहीं दिया। अगर वह टूट जाती, तो आरव समझता कि बोलना गलती थी।

—तूने सही बताया, उसने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा। अब कोई तुझे वहां नहीं ले जाएगा।

सरकारी अस्पताल में मेडिकल जांच हुई। डॉक्टर ने गाल की सूजन, डर की प्रतिक्रिया, नींद की परेशानी और पुराने खरोंचों का रिकॉर्ड बनाया। पुलिस ने शिकायत दर्ज की। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को रिपोर्ट भेजी गई। राजीव ने एक वकील, अधिवक्ता मीरा सक्सेना, से संपर्क किया।

मीरा ने साफ कहा—

—लड़ाई आसान नहीं होगी। मां के पास कानूनी अधिकार हैं। राजीव जी, आप आरव के पिता नहीं हैं। लेकिन हमारे पास फोटो, मैसेज, बच्चे का बयान, मेडिकल रिपोर्ट और खतरे के प्रमाण हैं। अभी सबसे जरूरी है बच्चे को सुरक्षित रखना।

अगले 3 दिनों में प्रीति ने अनन्या को 36 बार फोन किया। फिर मैसेज आने लगे।

“मुझे माफ कर दे।”

“विक्रम वापस नहीं आएगा।”

“आरव को मां चाहिए।”

“तू मुझे मार देगी क्या?”

अनन्या ने जवाब नहीं दिया।

फिर विक्रम का ऑडियो आया।

—बहुत उड़ रही है तू। उस बच्चे को ज्यादा प्यार ने बिगाड़ा है। उसे सख्त हाथ चाहिए, नहीं तो जिंदगी भर बोझ रहेगा।

मीरा ने ऑडियो सुना और फाइल में सेव किया।

—यह आदमी हमें खुद सबूत दे रहा है।

राजीव का घर गाजियाबाद के वैशाली में था। 2 कमरे, छोटी रसोई, लोहे की बालकनी, और हर शाम नीचे से आती चाय वाले की आवाज। बड़ा घर नहीं था, लेकिन वहां कोई आदमी सोफे पर बैठकर बच्चे को “बोझ” नहीं कहता था।

पहली रात राजीव ने दाल-चावल बनाए।

उन्होंने आरव की प्लेट में थोड़ा खाना रखा और कहा—

—जितना खाना है उतना खाओ। जब पेट भर जाए, प्लेट छोड़ देना। कोई डांटेगा नहीं।

आरव चम्मच हाथ में लिए उन्हें देखता रहा, जैसे यह बात समझने में समय लग रहा हो। फिर उसने आधी प्लेट खाई और चम्मच रख दिया।

—बस।

राजीव ने सिर हिलाया।

—ठीक है।

सिर्फ “ठीक है” सुनकर आरव की ठुड्डी कांप गई। वह रोया नहीं, पर उसकी आंखों में वह पानी था जो बहुत दिनों से अटका हुआ था।

दिन आसान नहीं थे। आरव रात में उठकर कहता—

—मैंने नहीं गिराया।

वह बिस्कुट तकिए के नीचे छुपाता। बाथरूम जाने से पहले अनुमति मांगता। स्कूल की यूनिफॉर्म पहनते समय पूछता—

—अगर बटन गलत लगा तो?

अनन्या हर बार कहती—

—तो ठीक कर देंगे।

प्रीति ने पहले सब झूठ बताया। उसने कहा अनन्या जलन करती है, क्योंकि मां अपनी जिंदगी आगे बढ़ा रही थी। उसने कहा आरव कहानियां बनाता है, उसकी हालत ऐसी है कि वह समझता नहीं। यह सुनकर अनन्या को थप्पड़ से भी ज्यादा चोट लगी। एक मां अपने बच्चे की कमजोरी को उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रही थी।

लेकिन सच धीरे-धीरे बाहर आने लगा।

पड़ोस की आंटी, जो महीनों से चुप थीं, ने बयान दिया कि उन्होंने कई बार विक्रम को चिल्लाते सुना था—

—नाटक बंद कर, पागल कहीं का!

एक बार बिल्डिंग के गार्ड ने बताया कि आरव सर्दी की रात में सीढ़ियों पर बैठा मिला था, बिना चप्पल, क्योंकि विक्रम ने कहा था—

—शांत होना है तो बाहर बैठ।

प्रीति की मेडिकल जांच में नशे की पुष्टि हुई। विक्रम की भी रिपोर्ट खराब आई। उसके फोन से धमकी वाले मैसेज मिले। घर से दवाइयों की खाली पत्तियां, जली हुई पन्नियां और कुछ संदिग्ध सामान बरामद हुआ।

बाल कल्याण समिति ने अंतरिम आदेश दिया कि आरव कुछ समय के लिए राजीव की देखरेख में रहेगा, अनन्या के साथ। प्रीति को बिना निगरानी मिलने की अनुमति नहीं मिली।

उस दिन दफ्तर से बाहर निकलते हुए आरव ने अनन्या का हाथ कसकर पकड़ा।

—मुझे वापस वहां सोना पड़ेगा?

अनन्या झुकी।

—नहीं।

—मां रोएगी तो भी?

उस सवाल ने अनन्या के भीतर बहुत गहरा घाव खोल दिया।

—मां रोएगी तो भी।

आरव ने उसे पकड़ लिया। इतने जोर से कि उसकी कलाई दर्द करने लगी, लेकिन उसने हाथ नहीं छुड़ाया।

कुछ हफ्तों बाद प्रीति ने मिलने की मांग की। वकील ने कहा कि मुलाकात निगरानी में ही होगी। एक सरकारी केंद्र के छोटे कमरे में प्रीति बैठी थी। वह बहुत कमजोर लग रही थी। बाल बंधे थे, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, आंखों में पछतावा था या अकेलेपन का डर, अनन्या पहचान नहीं पाई।

प्रीति ने अनन्या को देखते ही कहा—

—बेटी…

अनन्या ने उसे रोक दिया।

—यह मत कहो, अगर कहना सिर्फ मुझे वापस लाने के लिए है।

प्रीति रो पड़ी।

—मुझे सब नहीं पता था।

अनन्या की आवाज कांपी, पर टूटी नहीं।

—तुम्हें इतना पता था कि वह आरव पर चिल्लाता है। इतना पता था कि वह उससे नफरत करता है। इतना पता था कि मैं हर दिन टूट रही हूं। तुमने फिर भी उसे चुना।

—मैं अकेली थी, अनन्या।

—आरव खाना खाते समय डरता था।

कमरे में भारी चुप्पी फैल गई। प्रीति ने चेहरा झुका लिया।

—मैं इलाज कराऊंगी।

—कराओ। लेकिन आरव को अपनी सुधरने की परीक्षा मत बनाओ।

यह पहली बार था जब प्रीति ने कोई बहाना नहीं दिया।

विक्रम पर नाबालिग के साथ हिंसा, धमकी और उत्पीड़न का केस चला। उसे जेल की सजा, संपर्क निषेध और नशा मुक्ति उपचार का आदेश मिला। प्रीति को लापरवाही, बच्चे की सुरक्षा में असफलता और नशे के कारण निगरानी में रखा गया। उसकी मुलाकातें सीमित कर दी गईं। कुछ लोगों ने कहा सजा कम है। अनन्या को भी कई रात ऐसा लगा। उसे लगता था न्याय को आरव की हर डरी हुई रात, हर गंदे गिलास, हर दबाई हुई चीख का हिसाब लेना चाहिए था।

लेकिन मीरा ने कहा—

—कभी-कभी न्याय जीत की तरह नहीं आता। कभी-कभी वह बस एक बंद दरवाजा होता है, जिसके बाहर गलत लोग रह जाते हैं।

अनन्या ने अपनी 12वीं की परीक्षा दी। उसने सामाजिक कार्य में कॉलेज का फॉर्म भरा। उसे छात्रवृत्ति मिली, लेकिन उसने हॉस्टल नहीं लिया। वह हर सुबह मेट्रो और बस से जाती, शाम को पार्ट टाइम काम करती, रात में आरव का होमवर्क देखती। लोग कहते—

—इतनी छोटी उम्र में इतना बोझ क्यों उठा रही हो?

वह मुस्करा देती।

उसे पता था, यह बोझ नहीं था। यह वह रिश्ता था जिसमें एक बच्चे को बचाने के लिए किसी को बड़ा होना ही पड़ता है।

आरव ने नया स्कूल शुरू किया। पहले दिन वह गेट पर रो पड़ा। दूसरे दिन उसने पेट दर्द का बहाना बनाया। तीसरे दिन उसकी क्लास टीचर ने उसे कैंटीन में नॉइज कैंसलिंग हेडफोन पहनने की अनुमति दी। 1 महीने बाद उसे कबीर नाम का दोस्त मिला, जिसे डायनासोर और अंतरिक्ष दोनों पसंद थे।

एक दिन आरव घर लौटा और उसने अनन्या को एक जन्मदिन का कार्ड दिया।

—मैं जा सकता हूं?

अनन्या मुस्कराई।

—हां, बिल्कुल।

वह तुरंत गंभीर हो गया।

—अगर मैंने जूस गिरा दिया तो?

रसोई से राजीव की आवाज आई—

—तो कोई कपड़ा लाकर साफ कर देगा।

आरव कुछ सेकंड तक दरवाजे को देखता रहा। फिर उसके होंठों पर छोटा-सा, डरता हुआ, लेकिन असली मुस्कान आई।

दिसंबर की एक शाम अनन्या कॉलेज से लौटी। बारिश ने उसके बाल भिगो दिए थे। वह सीढ़ियां चढ़ते हुए थक चुकी थी—क्लास, नौकरी, केस की तारीखें, आरव की थेरेपी, घर का खर्च, और वे यादें जो अचानक भीड़ में भी आ जाती थीं। उसने दरवाजा खोला तो अंदर से हंसी सुनाई दी।

आरव और राजीव फर्श पर बैठे 500 टुकड़ों वाला पजल बना रहे थे। चूल्हे पर खिचड़ी गरम हो रही थी। खिड़की पर छोटी-सी लाइटों की झालर झिलमिला रही थी। राजीव ने आसमान का टुकड़ा समुद्र में लगा दिया था और आरव इतनी जोर से हंस रहा था कि उसकी आंखें बंद हो गई थीं।

वह हंसी किसी को खुश करने के लिए नहीं थी। वह माफी मांगती हुई हंसी नहीं थी। वह आजाद हंसी थी।

अनन्या दरवाजे पर खड़ी रह गई। उसकी आंखों में आंसू आ गए।

राजीव ने पूछा—

—सब ठीक?

वह बोली—

—हां। बस… मैं भूल गई थी कि घर में ऐसी आवाज भी हो सकती है।

आरव भागकर आया और उसका हाथ पकड़ लिया।

—हमने तुम्हारे लिए खिचड़ी बचाई है। बिना राख वाली।

उसने यह बात साधारण ढंग से कही, जैसे मजाक हो। लेकिन अनन्या के भीतर कुछ टूटकर फिर से जुड़ गया। वह घुटनों पर बैठी और उसे गले लगा लिया।

उस रात उसने विक्रम का नंबर हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया। प्रीति का नंबर फोन में रहा, बिना फोटो, बिना रिंगटोन। न उम्मीद से, न नफरत से। बस इसलिए कि शायद किसी दिन प्रीति सचमुच ठीक हो। शायद किसी दिन वह समझे कि किसी आदमी का प्यार बच्चे की सुरक्षा से बड़ा नहीं होता। लेकिन आरव को उस दिन का इंतजार करके जीने की सजा नहीं मिलनी चाहिए थी।

कुछ महीनों बाद निगरानी वाली मुलाकात में प्रीति ने आरव को एक छोटा प्लास्टिक डायनासोर दिया। आरव ने उसे शांति से लिया, धन्यवाद कहा, फिर अनन्या के पास आकर बैठ गया। वह कांपा नहीं। उसने छुपने की कोशिश नहीं की।

बस धीरे से बोला—

—मुझे घर चलना है।

घर।

अनन्या ने कांच के पार राजीव को देखा। उनकी आंखें भीगी थीं।

उसे उस दिन समझ आया कि परिवार हमेशा वह नहीं होता जो जन्म प्रमाणपत्र पर लिखा हो। परिवार कभी-कभी वह होता है जो 22 मिनट में पहुंच जाता है। वह जो एक बच्चे की बात पर भरोसा करता है, जब पूरी दुनिया उसे “मुश्किल” कहती है। वह बहन भी परिवार होती है, जो 17 साल की उम्र में फॉर्म भरती है, बयान देती है, डरती है, फिर भी पीछे नहीं हटती।

उस रात आरव सोफे पर सो गया, सिर अनन्या की गोद में और नया डायनासोर हाथ में दबाए। बाहर गाड़ियों की रोशनी दीवार पर सरक रही थी। रसोई में राजीव बर्तन बहुत धीरे धो रहे थे, ताकि वह जागे नहीं।

अनन्या ने आरव की गाल देखी। अब वहां कोई लाल निशान नहीं था। पर उसे पता था कि कुछ निशान त्वचा से नहीं जाते। वे तब जाते हैं जब हर रात कोई नया सच साबित करता है—कि हाथ उठाने के लिए नहीं, बचाने के लिए भी होते हैं।

आरव ने नींद में बुदबुदाया—

—मैंने जानबूझकर नहीं किया।

अनन्या की आंखें भर आईं। उसने उसके बालों पर हाथ रखा और फुसफुसाई—

—अब तुझे यह कहने की जरूरत नहीं है।

उस छोटे से फ्लैट में उस रात कोई नहीं चिल्लाया। कोई दरवाजा नहीं पटक गया। कोई बच्चा डरकर नहीं उठा। सिर्फ एक बच्चे की शांत सांसें थीं, जो धीरे-धीरे सीख रहा था कि घर वह जगह नहीं होती जहां इंसान बचकर जीता है। घर वह जगह होती है जहां वह पहली बार सच में सो पाता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.