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व्यापार यात्रा पर गया पति अस्पताल की कॉल सुनकर टूट गया, क्योंकि जिस पत्नी को परिवार ने बांझ कहकर रुलाया था, वह अकेले 3 बच्चों को जन्म दे रही थी—और बिस्तर पर उसने कहा, “तुम कभी थे ही नहीं”

PART 1

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“आपकी पत्नी 3 बच्चों को जन्म देने वाली हैं… हालत गंभीर है, तुरंत अस्पताल पहुँचना होगा।”

मुंबई के एक पाँच सितारा होटल की बैठक में बैठे अर्जुन मेहरा के हाथ से फोन फिसलते-फिसलते बचा। कमरे में निवेशकों की आवाज़ें गूँज रही थीं, स्क्रीन पर करोड़ों के करार की स्लाइड खुली थी, लेकिन उसके कानों में सिर्फ एक ही वाक्य हथौड़े की तरह बज रहा था—काव्या 3 बच्चों को जन्म देने वाली थी।

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यह असंभव था।

5 साल पहले, शादी के कुछ महीनों बाद ही काव्या ने उसके सामने अस्पताल की रिपोर्ट रखी थी। आँखों में पानी, होंठ काँपते हुए, उसने कहा था कि चिकित्सकों के अनुसार उसके माँ बनने की संभावना लगभग न के बराबर है। दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद—कितने मंदिर, कितने अस्पताल, कितनी जाँचें, कितनी दवाइयाँ… सबके बाद वही फैसला आया था।

अर्जुन ने उस दिन काव्या का हाथ पकड़कर कहा था, “बच्चे हों या न हों, तुम ही मेरा परिवार हो।”

लेकिन वह वादा समय के साथ खोखला पड़ गया।

अर्जुन गुरुग्राम में लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा सेवाओं की बड़ी कंपनी चलाता था। उसके पिता के बाद मेहरा परिवार की इज़्ज़त, हवेली जैसी कोठी और कारोबार उसी के कंधों पर था। बाहर से सब चमकदार था, लेकिन घर के भीतर काव्या हर दिन टूटती थी।

अर्जुन की माँ, सरोज मेहरा, पूजा की थाली रखते हुए अक्सर कहतीं, “इतनी बड़ी कोठी में बच्चे की किलकारी न हो तो दीवारें भी सूनी लगती हैं।”

बुआजी ताने मारतीं, “वंश तो बेटे से चलता है, और बहू अगर घर को आगे न बढ़ा सके तो क्या फायदा?”

काव्या मुस्कुरा देती, चुपचाप पल्लू ठीक करती, और रसोई में चली जाती। अर्जुन सब सुनता था। कभी-कभी आँखें चुरा लेता। कभी कहता, “माँ, रहने दो,” लेकिन उतनी मजबूती से नहीं जितनी काव्या को चाहिए थी।

धीरे-धीरे वह घर से दूर रहने लगा। कभी पुणे की बैठक, कभी सूरत का गोदाम, कभी मुंबई का करार, कभी चेन्नई का निरीक्षण। सच यह था कि कारोबार बहाना बन चुका था। वह उस स्त्री की आँखों में अपना अपराध नहीं देखना चाहता था, जिसे उसने जीवन भर साथ देने का वादा किया था।

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काव्या ने पूछना बंद कर दिया था कि वह कब लौटेगा।

जिस सुबह वह मुंबई गया, उसने अपने अध्ययन कक्ष की मेज पर तलाक के कागज़ रख दिए। हस्ताक्षर किए हुए। उसने खुद को समझाया कि वह काव्या को आज़ाद कर रहा है। वह उसे उस आदमी से मुक्त कर रहा है, जो उससे प्यार तो करता था, पर उसके अधूरे मातृत्व पर चुपचाप नाराज़ भी था।

उसी शाम अस्पताल से फोन आया।

“श्रीमती काव्या मेहरा प्रसव पीड़ा में हैं। गर्भावस्था जोखिम भरी है। 3 बच्चे हैं।”

अर्जुन ने कुर्सी पकड़ ली। “आपको गलती हुई है। मेरी पत्नी माँ नहीं बन सकती।”

दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।

“यह गलती नहीं है, श्रीमान। वह महीनों से अकेली जाँच के लिए आती रही हैं। अब देर नहीं हो सकती।”

अर्जुन बैठक छोड़कर बाहर भागा। न किसी से हाथ मिलाया, न करार देखा। कंपनी का छोटा विमान उसी रात दिल्ली की ओर उड़ा। बादलों के ऊपर, अँधेरे आसमान में, उसके भीतर एक ही सवाल चुभ रहा था—काव्या ने यह सब अकेले कैसे सहा?

जब वह गुरुग्राम के निजी अस्पताल पहुँचा, तो गलियारे में उसकी माँ, बुआजी और कुछ रिश्तेदार पहले से मौजूद थे। सरोज देवी के चेहरे पर घबराहट कम और अपमान ज़्यादा था, जैसे किसी ने परिवार का राज़ छिपा लिया हो।

अर्जुन ने किसी को नमस्ते नहीं की।

“मेरी पत्नी कहाँ है?”

एक वरिष्ठ चिकित्सक आगे आए। “उन्हें शल्य प्रसव के लिए अंदर ले जाया गया है। रक्तचाप गिर रहा है। बच्चे समय से पहले हैं।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“उन्हें कब से पता था?”

चिकित्सक ने गंभीर नज़र से देखा। “कई महीनों से। वह हर बार अकेली आती थीं। कहती थीं, पति बहुत व्यस्त हैं, उन्हें परेशान नहीं करना चाहतीं।”

परेशान नहीं करना चाहतीं।

यह वाक्य अर्जुन के सीने में तीर बनकर धँस गया।

जिस दिन वह तलाक के कागज़ छोड़कर गया था, उसी दिन उसकी पत्नी 3 जिंदगियों के साथ मौत से लड़ रही थी। जिस स्त्री को उसने अकेला समझा, वह अकेली इसलिए थी क्योंकि उसने उसे अकेला छोड़ दिया था।

तभी ऑपरेशन कक्ष का दरवाज़ा खुला।

पहले एक नवजात की हल्की रोने की आवाज़ आई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी आवाज़ आने से पहले पूरा गलियारा जम गया।

एक परिचारिका भागती हुई भीतर गई। चिकित्सक के चेहरे की गंभीरता और गहरी हो गई।

अर्जुन ने काँच के दरवाज़े के उस पार लाल बत्ती जलते देखी और पहली बार उसे लगा कि शायद वह सिर्फ पिता बनने नहीं, सब कुछ खोने आया है।

PART 2

चिकित्सक बाहर आए तो अर्जुन के पैरों ने जैसे ज़मीन छोड़ दी।

“2 बेटे और 1 बेटी हुए हैं,” उन्होंने कहा। “तीनों जीवित हैं, लेकिन बहुत नाज़ुक। आपकी पत्नी होश में है, मगर बहुत कमजोर है।”

अर्जुन भीतर भागना चाहता था, पर उसे रोका गया। कुछ मिनट बाद वह काव्या के कमरे में पहुँचा। काव्या का चेहरा पीला था, बाल पसीने से चिपके हुए थे, होंठ सूखे थे। लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। वहाँ सिर्फ टूटा हुआ भरोसा था।

“तुम आ गए,” उसने धीमे से कहा।

अर्जुन उसके पास झुक गया। “काव्या, मुझे माफ कर दो। मुझे पता नहीं था…”

काव्या ने आँखें बंद कर लीं। “हाँ, तुम्हें पता नहीं था। क्योंकि तुम कभी थे ही नहीं।”

वह चुप रह गया।

“मैंने बताने की कोशिश की थी,” उसने फुसफुसाया। “पर तुम हमेशा बैठक में, हवाई अड्डे पर, कार में, थके हुए या नाराज़ रहते थे। फिर मैंने कोशिश छोड़ दी।”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तुमने फिर भी क्यों छिपाया?”

काव्या की पलकों पर आँसू आ गए। “क्योंकि आज सुबह मैंने कागज़ देख लिए।”

अर्जुन का दिल धक से रुक गया।

“तुम्हारे अध्ययन कक्ष में। तलाक के कागज़। तुम्हारे हस्ताक्षर के साथ।”

कमरे की मशीनों की आवाज़ और तेज़ लगने लगी।

“मैं बीमा की फाइल ढूँढ रही थी,” काव्या बोली। “और मुझे पता चला कि जिस दिन मेरे बच्चे जन्म लेने वाले हैं, उसी दिन मेरा पति मुझे छोड़ने की तैयारी कर चुका है।”

अर्जुन की आँखों में आँसू भर आए।

काव्या ने मुश्किल से चेहरा फेर लिया। “ये बच्चे तुम्हारे पश्चाताप का सहारा नहीं हैं। और मैं तुम्हारी माँ के वंश की मशीन नहीं हूँ।”

तभी नवजात गहन कक्ष से एक परिचारिका दौड़ती हुई आई।

“बच्ची की साँस फिर गिर रही है।”

PART 3

अर्जुन ने पहली बार अपनी बेटी को काँच के उस पार देखा—इतनी छोटी कि उसकी हथेली भी उसके पूरे शरीर को ढक सकती थी। नाक में नली, छाती पर तार, बंद पलकें, और पाँव पर बँधी पट्टी जिस पर लिखा था: शिशु सी।

उसके दोनों बेटे भी बगल में रखे थे। एक की मुट्ठी बंद थी, जैसे वह दुनिया से लड़ने की तैयारी लेकर आया हो। दूसरा हल्का-हल्का काँप रहा था। 3 बच्चों के बीच मशीनों की आवाज़ें थीं, सफेद रोशनी थी, और अर्जुन की आत्मा का नंगा सच था।

वह पिता बन चुका था, लेकिन पिता बनने लायक नहीं रहा था।

पीछे से सरोज देवी की आवाज़ आई, “काव्या को पहले बता देना चाहिए था। परिवार से इतनी बड़ी बात छिपाई जाती है क्या?”

अर्जुन धीरे से मुड़ा। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन आवाज़ ठंडी।

“उसे छिपाने की जरूरत हमने दी थी।”

सरोज देवी सन्न रह गईं।

“आज के बाद इस परिवार में कोई काव्या के शरीर, उसकी कोख, उसके माँ बनने या न बनने पर एक शब्द नहीं बोलेगा,” अर्जुन ने कहा। “जिसने भी उसे चोट पहुँचाई, वह मेरे बच्चों से दूर रहेगा। मेरे घर से दूर रहेगा। मेरी कंपनी से भी।”

बुआजी ने तुनककर कहा, “अरे, हम तो घर की चिंता में कहते थे।”

“नहीं,” अर्जुन ने काट दिया। “आप लोग उसे कमतर साबित करके अपनी चिंता दिखाते थे।”

गलियारे में खड़े रिश्तेदारों ने नज़रें झुका लीं। पहली बार मेहरा परिवार का बेटा अपनी पत्नी के आगे दीवार बनकर खड़ा था, लेकिन यह दीवार बहुत देर से बनी थी।

अगले कई दिन अर्जुन ने अस्पताल में बिताए। वह सुबह काव्या के कमरे में जाता, पानी रखता, दवाइयों का समय नोट करता, चिकित्सकों से सवाल पूछता। काव्या उससे कम बोलती थी। वह उसका चेहरा देखकर समझ जाता कि माफी माँगना आसान है, भरोसा लौटाना नहीं।

नवजात गहन कक्ष में वह हाथ धोना सीखता, बच्चों को दूर से देखना सीखता, मशीन की आवाज़ों में फर्क करना सीखता। उसने पहली बार जाना कि एक छोटी साँस भी चमत्कार हो सकती है।

उसने बेटों के नाम आदित्य और विहान रखे, पर काव्या ने बेटी का नाम चुनने से इनकार कर दिया।

“जब तक वह खुद ठीक से साँस नहीं लेने लगेगी, मैं नाम नहीं रखूँगी,” उसने कहा। “नाम रखने के लिए उम्मीद चाहिए।”

यह सुनकर अर्जुन रात भर रोया।

इसी बीच काव्या की बड़ी बहन नंदिनी जयपुर से पहुँची। उसने अर्जुन को अस्पताल के गलियारे में देखते ही जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सुरक्षा कर्मी भी मुड़ गए।

“यह तलाक के कागज़ों के लिए था,” नंदिनी बोली।

अर्जुन ने चेहरा नहीं छुआ। “मुझे इससे ज़्यादा मिलना चाहिए।”

“तुम्हें अंदाज़ा है उसने क्या सहा?” नंदिनी की आँखें जल रही थीं। “हर जाँच के बाद वह मुझे फोन करके रोती थी। उसने मेरे सामने कहा था कि अगर बच्चे न रहे तो तुम्हारी माँ कहेंगी—देखा, शरीर ही कमजोर था।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“और पैसे?” नंदिनी ने कहा। “तुम्हें मालूम है उसने अपनी नानी के कंगन गिरवी रख दिए थे? दवाइयों और विशेष जाँचों के लिए? क्योंकि वह तुम्हारे घरवालों से सुनना नहीं चाहती थी कि वह तुम्हारे पैसे बर्बाद कर रही है।”

अर्जुन ने दीवार पकड़ ली।

उसे कुछ नहीं पता था। सच में कुछ नहीं।

उस रात वह काव्या की अनुमति से उसका बैग देखने गया, बीमा के कागज़ निकालने के लिए। भीतर दवाइयों की पर्चियाँ थीं, छोटे-छोटे बिल थे, मंदिर की सूखी हुई मौली थी, और एक गिरवी की पर्ची—पुराने सोने के कंगन, जो काव्या की नानी की आखिरी निशानी थे।

अर्जुन अस्पताल की प्रार्थना कक्ष में बैठा रहा। बाहर सुबह की अज़ान और मंदिर की घंटी की आवाज़ें मिल रही थीं, पर उसके भीतर सिर्फ अपराध का शोर था।

अगले दिन उसने कंगन खोजने शुरू किए। वे चाँदनी चौक के एक पुराने व्यापारी के पास बिक चुके थे। उसने कई गुना कीमत देकर उन्हें वापस लिया। जब उसने काव्या के सामने मखमली डिब्बा रखा, तो उसने कोई मुस्कान नहीं दी।

“मेरे घाव पर गहना मत रखो,” काव्या ने कहा।

“यह गहना नहीं है,” अर्जुन ने धीमे से कहा। “यह वह चीज़ है जो तुम्हें कभी खोनी नहीं चाहिए थी।”

काव्या की उँगलियाँ डिब्बे पर ठहर गईं। उसकी आँखें भर आईं, पर आवाज़ सख्त रही।

“पैसे से माफी नहीं खरीदी जाती।”

“मैं जानता हूँ।”

“कुछ दिन अस्पताल में बैठने से 5 साल की अनुपस्थिति नहीं मिटती।”

“मैं जानता हूँ।”

काव्या ने उसे देखा। “अगर अस्पताल फोन न करता, तो क्या तुम लौटकर मुझे तलाक देते?”

अर्जुन के भीतर सब कुछ रुक गया।

वह झूठ बोल सकता था। कह सकता था कि वह डर गया था, कि कागज़ सिर्फ सोचने के लिए थे, कि वह सच में उसे छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन काव्या की आँखों में अब झूठ के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

“हाँ,” उसने कहा।

काव्या ने सिर झुका लिया। आँसू तुरंत नहीं गिरे। शायद वह उत्तर पहले से जानती थी।

“धन्यवाद,” उसने टूटे स्वर में कहा, “कम से कम इस बार झूठ नहीं बोला।”

अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया।

“मैं तुम्हें छोड़ने जा रहा था, क्योंकि मैं कायर था। मैंने अपने दुख को तुम्हारे शरीर पर दोष बना दिया। मैंने खुद को समझाया कि मैं तुम्हें आज़ाद कर रहा हूँ, जबकि सच में मैं अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा था।”

काव्या ने खिड़की की ओर देखा। बाहर बारिश शुरू हो गई थी।

“तुमने मुझे यकीन दिलाया कि कमी मुझमें है।”

“हाँ।”

“तुमने मुझे अपनी माँ के तानों के सामने अकेला छोड़ा।”

“हाँ।”

“तुमने मुझे उस बात के लिए शर्मिंदा होने दिया, जो मेरे बस में नहीं थी।”

अर्जुन रो पड़ा। “हाँ। और शायद मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।”

काव्या ने थकी हुई साँस ली।

“बच्चे हमारा विवाह बचाने नहीं आए हैं, अर्जुन। वे तुम्हारे पछतावे की रस्सी नहीं हैं। वे इस परिवार के वारिस साबित करने की मुहर नहीं हैं। वे बच्चे हैं। अगर तुम सच में पिता बनना चाहते हो, तो उन्हें कभी यह मत सिखाना कि प्यार कमाकर लेना पड़ता है।”

अर्जुन ने सिर झुका दिया। “मैं वादा करता हूँ।”

काव्या ने आँखें बंद कर लीं। “तुम पहले भी वादा कर चुके हो।”

इस बार अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

दिन हफ्तों में बदले। आदित्य सबसे पहले बिना मशीन के साँस लेने लगा। विहान ने पहली बार बोतल से दूध पीया। बच्ची सबसे कमजोर थी। एक रात उसकी हालत फिर बिगड़ी। काव्या बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थी, लेकिन उसने दूर से हाथ जोड़कर बस इतना कहा, “मेरी बच्ची को वापस भेज देना भगवान। इस बार मैं उसका नाम रखूँगी।”

सुबह जब बच्ची की साँस स्थिर हुई, काव्या ने उसे पहली बार छाती से लगाया।

“आर्या,” उसने फुसफुसाया।

अर्जुन ने उस क्षण समझा कि परिवार नाम, संपत्ति, हवेली या वंश नहीं होता। परिवार वह स्त्री थी जो खुद टूटकर भी 3 बच्चों को जीवन से बाँध रही थी।

काव्या अस्पताल से निकली तो उसने मेहरा हवेली लौटने से मना कर दिया।

अर्जुन ने बहस नहीं की।

उसने अस्पताल के पास एक छोटा-सा घर किराए पर लिया। सफेद दीवारें, सुबह की धूप वाला रसोईघर, छोटा आँगन और 3 पालने। उसने खुद उन्हें जोड़ने की कोशिश की। एक पालना टेढ़ा हो गया। काव्या ने पहली बार हल्का-सा हँस दिया।

“कारोबार संभाल सकते हो, पर पालना नहीं,” उसने कहा।

अर्जुन के लिए वह हँसी किसी आशीर्वाद से कम नहीं थी।

बच्चे एक-एक करके घर आए। पहले आदित्य, फिर विहान, और सबसे अंत में आर्या। पहली रात 3 बच्चों ने साथ रोना शुरू किया। काव्या के हाथ काँप गए। वह कमरे के बीच बैठ गई, आँखें भर आईं।

अर्जुन ने उसे “शांत हो जाओ” नहीं कहा। उसने यह भी नहीं कहा कि सब ठीक है।

उसने बस विहान को उठाया और पूछा, “बताओ, मुझे क्या करना है?”

काव्या ने उसे देखा। यही वह सवाल था जो उसे 5 साल पहले सुनना चाहिए था।

धीरे-धीरे उनकी नई जिंदगी शुरू हुई। अर्जुन ने कई बड़े करार छोड़ दिए। एक साझेदार ने फोन पर चिल्लाकर कहा कि करोड़ों का नुकसान हो सकता है।

अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा, “मेरी बेटी का वजन अभी 2 किलो भी नहीं है। पैसों की बात बाद में करना।”

कुछ महीनों बाद सरोज देवी ने परिवार को दोपहर के भोजन पर बुलाया। काव्या जाना नहीं चाहती थी, पर अर्जुन ने कहा, “फैसला तुम्हारा होगा। तुम कहोगी तो चलेंगे, तुम कहोगी तो नहीं।”

काव्या ने बहुत देर बाद कहा, “चलते हैं। देखती हूँ, इस बार तुम कहाँ खड़े होते हो।”

भोजन के दौरान बुआजी ने आर्या को गोद में देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, इतने नाटक के बाद बहू ने आखिर मेहरा परिवार को वह दे ही दिया जिसकी जरूरत थी।”

मेज पर सन्नाटा छा गया।

काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

अर्जुन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “फिर से कहिए।”

बुआजी हड़बड़ा गईं। “अरे, मैंने तो आशीर्वाद जैसा कहा।”

“नहीं,” अर्जुन की आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई। “आपने कहा कि मेरी पत्नी की कीमत बच्चों के बाद बनी। याद रखिए, काव्या मेरी पत्नी तब भी थी जब वह माँ नहीं बन सकती थी। वह मेरे घर की इज़्ज़त तब भी थी जब आप लोग उसे अधूरा कहते थे। और अगर किसी ने फिर उसे या मेरे बच्चों को वंश, खून, वारिस जैसे शब्दों में तोला, तो वह हमारे जीवन से बाहर होगा।”

सरोज देवी की आँखें झुक गईं।

अर्जुन ने काव्या की ओर देखा। “घर चलें?”

काव्या की आँखों में हैरानी थी। पहली बार फैसला सचमुच उसका था।

“हाँ,” उसने कहा।

वे मिठाई से पहले ही उठ गए।

कार में बहुत देर तक चुप्पी रही। फिर काव्या ने धीरे से अपना हाथ अर्जुन के हाथ पर रखा।

“सब माफ नहीं हुआ,” उसने कहा।

“मैं जानता हूँ।”

“लेकिन आज तुम सच में मेरे साथ थे।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। वह बोलता तो रो पड़ता।

आर्या के 1 साल के जन्मदिन पर उन्होंने बड़ी दावत नहीं रखी। न कोई समाज के लोग, न दिखावा, न कैमरे। छोटे आँगन में रंगोली बनी थी, गुब्बारे थे, नंदिनी थी, कुछ अस्पताल की परिचारिकाएँ थीं, और सरोज देवी भी आईं—बिना भारी गहनों के, बिना ऊँची आवाज़ के, अपने हाथ से बुनी 3 छोटी स्वेटर लेकर।

वह काव्या के सामने खड़ी हुईं।

“मैंने तुम्हारे दर्द को परीक्षा बना दिया था,” सरोज देवी बोलीं। “मैंने तुम्हें बहू नहीं, वंश बढ़ाने का साधन समझा। मैं गलत थी। बहुत गलत।”

काव्या ने तुरंत उन्हें गले नहीं लगाया।

“आपने यह कहा, उसके लिए धन्यवाद,” उसने शांत स्वर में कहा। “पर भरोसा लौटने में समय लगेगा।”

सरोज देवी ने सिर हिलाया। “मैं इंतज़ार करूँगी।”

रात को बच्चे सो गए। घर शांत था, वैसा शांत नहीं जैसा हवेली में था—वह सन्नाटा नहीं था, थकान से भरी गर्माहट थी। काव्या आँगन में बैठी थी। अर्जुन उसके पास आकर बैठ गया।

“1 साल पहले मैंने सोचा था कि मैं इन्हें अकेले पालूँगी,” काव्या ने कहा।

अर्जुन का गला भर आया। “मुझे पता है।”

“मैंने योजना बना ली थी। जयपुर में छोटा फ्लैट, नंदिनी की मदद, सिलाई और ऑनलाइन कक्षाएँ। मैं डर रही थी, पर तैयार थी।”

“यह बात मुझे जिंदगी भर चुभेगी।”

काव्या ने उसे देखा। “मैं नहीं चाहती कि तुम हर दिन सजा काटो। मैं चाहती हूँ कि तुम हर दिन मौजूद रहो।”

अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया। “मैं रहूँगा।”

“हम पुरानी जिंदगी में वापस नहीं जा सकते,” काव्या बोली। “वह टूट चुकी है।”

“तो नई बना लेते हैं,” अर्जुन ने धीमे से कहा। “तुम्हारे नियमों पर। तुम्हारी गति से।”

काव्या ने बहुत देर तक उसे देखा।

“आज मैं रुक रही हूँ,” उसने कहा। “कल का फैसला कल करेंगे। लेकिन शायद अब मेरे सामने वह आदमी नहीं है जिसने तलाक के कागज़ छोड़ दिए थे। शायद कोई नया बनने की कोशिश कर रहा है।”

अर्जुन की आँखें भर आईं।

“मैं तुमसे प्यार करता हूँ,” उसने कहा।

काव्या ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “इस बार प्यार शब्दों से नहीं, सच से बड़ा होगा।”

तभी कमरे से एक रोने की आवाज़ आई। फिर दूसरी। फिर तीसरी। 3 छोटे स्वर, एक साथ, जैसे घर की दीवारों में जीवन दौड़ गया हो।

काव्या उठी। “तैयार?”

अर्जुन ने उस छोटे घर को देखा—टेढ़ा पालना, दूध की बोतलें, आधे मुड़े कपड़े, थकी हुई पत्नी, और 3 चमत्कार, जिनके लायक बनने में उसे पूरी जिंदगी लगनी थी।

“हमेशा,” उसने कहा।

और उस रात अर्जुन किसी खाली हवेली में नहीं लौटा।

वह अपने घर के भीतर गया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.