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बरसाती रात के सन्नाटे में गर्भवती डॉक्टर ने आपातकाल में उस आदमी की घायल बेटी बचाई, जिसने उसे 6 महीने पहले छोड़ दिया था, लेकिन बच्ची ने पेट की ओर इशारा कर पूछा, “क्या यह मेरी बहन है?”, और सच टूट पड़ा

PART 1

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घायल बच्ची को बाँहों में उठाए जब वही आदमी आपातकालीन कक्ष में घुसा जिसने 6 महीने पहले गर्भवती डॉक्टर का दिल तोड़कर उसे अकेला छोड़ दिया था, तो अस्पताल की सारी आवाज़ें जैसे एक पल के लिए थम गईं।

दिल्ली के साकेत स्थित सिटी चाइल्ड केयर हॉस्पिटल की रात पहले ही भारी थी। बाहर मानसून की बारिश शीशों पर लगातार थपेड़े मार रही थी। भीतर स्ट्रेचर खिसकने की आवाज़ें, मॉनिटर की बीप, नर्सों की तेज़ चाल और बच्चों के रोने की धुंधली आवाज़ों के बीच डॉक्टर अनन्या शर्मा अपने 12 घंटे लंबे ड्यूटी शिफ्ट के आखिरी केस की रिपोर्ट देख रही थी।

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उसके पैर सूज चुके थे। पीठ में जलन थी। सफेद कोट के नीचे उसका 7 महीने का गर्भ हल्का-हल्का भारीपन बनकर साँसों तक चढ़ आया था। वह हर कुछ मिनट बाद अनजाने में अपनी हथेली पेट पर रख लेती, जैसे दुनिया से पहले अपने बच्चे को आश्वासन देती हो कि सब ठीक है।

तभी इमरजेंसी का काँच का दरवाज़ा जोर से खुला।

—डॉक्टर, मेरी बेटी को बचा लीजिए, प्लीज़!

अनन्या ने सिर उठाया।

और उसका चेहरा पत्थर हो गया।

दरवाज़े पर आरव मल्होत्रा खड़ा था। बाल बारिश से भीगे हुए, शर्ट मिट्टी और खून से सनी, आँखों में ऐसा डर जैसे पूरी दुनिया उसकी बाँहों में पड़ी उस 6 साल की बच्ची की साँसों पर टिकी हो।

उस बच्ची के माथे पर गहरी चोट थी। चेहरा पीला था। पलकें आधी बंद। होंठ काँप रहे थे।

आरव।

वही आदमी जिसने अनन्या के साथ शादी के वादे किए थे। वही जिसने एक शाम उसके लाजपत नगर वाले छोटे फ्लैट में बैठकर कहा था कि वह किसी गंभीर रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। वही जिसने अगली सुबह से फोन उठाना बंद कर दिया था। मीटिंग, बिजनेस ट्रिप, पारिवारिक दबाव, समय नहीं—हर बहाने के पीछे असली बात बस इतनी थी कि वह भाग गया था।

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अनन्या के भीतर कुछ टूटा, लेकिन उसके चेहरे पर डॉक्टर की सख्ती उतर आई।

—बेड 3 तैयार करो। अभी।

नर्सें दौड़ीं। बच्ची को सावधानी से लिटाया गया।

—उम्र 6 साल। पार्क में झूले से गिरने की सूचना। सिर पर चोट, उल्टी, भ्रम की हालत, होश आता-जाता है, —नर्स ने जल्दी से बताया।

अनन्या ने टॉर्च उठाई। उसने बच्ची की पुतलियाँ देखीं, पल्स जाँची, साँसें सुनीं।

—बेटा, नाम क्या है तुम्हारा?

बच्ची ने मुश्किल से आँखें खोलीं।

—तारा।

अनन्या की आवाज़ अपने आप नरम हो गई।

—तारा, तुम बहुत बहादुर हो। याद है क्या हुआ था?

—मैं… फिसल गई थी। पापा बहुत जोर से चिल्लाए।

आरव बेड के पास खड़ा काँप रहा था।

—अनन्या, प्लीज़…

उसने पहली बार सीधे उसकी तरफ देखा, पर आँखों में कोई पुरानी नर्मी नहीं थी।

—यहाँ मैं डॉक्टर शर्मा हूँ। और आपकी बेटी का इलाज कर रही हूँ। कृपया पीछे हटिए।

आरव पीछे हो गया। फिर उसकी नज़र अनन्या के चेहरे से नीचे उतरी।

उसके पेट पर।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

—अनन्या…

—अभी नहीं, —उसने स्टेथोस्कोप लगाते हुए कहा।

तारा ने आधी खुली आँखों से अनन्या के पेट की तरफ देखा। उसका छोटा-सा हाथ काँपता हुआ उठा।

—डॉक्टर आंटी… आपके पेट में भी बच्चा है?

अनन्या ने गहरी साँस ली।

—हाँ, बेटा।

तारा की आँखों में मासूम चमक कौंधी।

—मुझे हमेशा एक छोटी बहन चाहिए थी। मैं उसे अपनी गुड़िया दूँगी।

कमरे में मौजूद हर आवाज़ भारी हो गई।

आरव जम गया।

उसे गिनती आती थी।

7 महीने का गर्भ।

6 महीने पहले उसका गायब हो जाना।

6 महीने पहले अनन्या का रोते-रोते आखिरी संदेश भेजना—“बस एक बार सच बोल दो।”

उसने सच नहीं बोला था। उसने चुप्पी चुनी थी।

तारा को तुरंत सीटी स्कैन के लिए भेजा गया। नर्सें उसे लेकर बाहर निकलीं। आरव ने रास्ता रोका नहीं, बस दीवार पकड़कर खड़ा रहा।

स्कैन रूम की तरफ जाते समय अनन्या फाइल लिख रही थी। आरव उसके सामने आकर रुका।

—क्या वह बच्चा मेरा है?

अनन्या की उँगलियाँ फाइल पर कस गईं।

—आज रात आपकी बेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण है। बाकी कुछ नहीं।

—अनन्या, प्लीज़, मुझे जानने का हक है।

उसने धीरे से सिर उठाया।

—हक? 6 महीने पहले जब मैं तुम्हारे दरवाज़े पर खड़ी थी, तब भी किसी रिश्ते का हक था। तब तुमने दरवाज़ा नहीं खोला था।

आरव के होंठ काँपे, पर शब्द नहीं निकले।

तभी लिफ्ट खुली। एक सजीली, घबराई हुई महिला बाहर आई। सलवार-कुर्ते पर भीगता दुपट्टा, आँखों में बेचैनी।

—आरव! तारा कहाँ है?

वह नंदिनी थी, तारा की माँ।

उसने पहले आरव को देखा, फिर अनन्या को, फिर उसके पेट को। उसके चेहरे पर समझ धीरे-धीरे नहीं, एक ही झटके में उतर आई।

—तो यह वही डॉक्टर है, जिसके नाम पर तुम कल रात टूट गए थे?

अनन्या के हाथ से पेन लगभग छूट गया।

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

नंदिनी की आवाज़ धीमी थी, लेकिन पूरे गलियारे को काट गई।

—और शायद यही वह सच है, जिससे तुम 6 महीने से भाग रहे थे।

PART 2

नंदिनी ने कोई हंगामा नहीं किया। यही बात सबसे ज्यादा चुभ रही थी।

वह तारा के बेड के पास गई, उसके बाल सहलाए, रिपोर्ट पूछी, नर्सों से शांति से बात की। सीटी स्कैन में चोट हल्की निकली, पर निगरानी जरूरी थी। तारा खतरे से बाहर थी, फिर भी आरव की आँखों में डर अब भी बैठा था।

रात के करीब 1 बजे अनन्या कॉरिडोर में पानी लेने निकली। आरव पीछे आ गया।

—एक बार सच बता दो।

अनन्या हँसी नहीं, बस थकी हुई मुस्कान आई।

—अब परिवार याद आ रहा है?

—मैं डर गया था।

—डरता वह है जो काँपते हुए भी रुकता है। तुम तो बस गायब हो गए थे।

आरव ने पहली बार सिर झुका दिया।

—मेरे पिता जब मैं 9 साल का था, माँ को छोड़कर चले गए। मुझे हमेशा लगा, किसी से जुड़ना कमजोरी है। तुम्हें सच में चाहने लगा, तो भाग गया।

अनन्या की आँखें भर आईं।

—तुम्हारा डर मेरे उल्टियों में साथ नहीं था। डॉक्टर की रिपोर्टों में साथ नहीं था। रातों की घबराहट में साथ नहीं था।

पीछे से नंदिनी की आवाज़ आई।

—हमारी शादी भी इसी वजह से टूटी थी। आरव कभी वहाँ नहीं टिकता, जहाँ उसकी जरूरत होती है।

तभी तारा ने अपने बैग से गुलाबी मोतियों वाला छोटा कंगन निकाला।

—डॉक्टर आंटी, यह आपके बेबी के लिए।

अनन्या झुकने ही वाली थी कि लिफ्ट से सावित्री मल्होत्रा उतरीं। महँगी साड़ी, तीखी नजर, आवाज़ में पुराना अधिकार।

—तो यह है वह औरत, जिसने हमारे खानदान को तमाशा बना दिया?

आरव आगे बढ़ा।

—माँ, बस।

—अच्छे घर की औरतें इस तरह बाप से बच्चा नहीं छुपातीं।

अनन्या का चेहरा तप गया।

—मैंने नहीं छुपाया। मैंने अकेले सहा।

सावित्री ने तारा की तरफ देखा।

—यह बच्चा तारा की जिंदगी बिगाड़ देगा।

तारा रो पड़ी।

—क्या बेबी मेरे पापा को मुझसे छीन लेगा?

अनन्या घुटनों के बल बैठी, दर्द दबाते हुए।

—नहीं, बेटा। प्यार रोटी का टुकड़ा नहीं, जो बाँटना पड़े।

उसी पल उसके पेट में तेज़ ऐंठन उठी।

उसने दीवार पकड़ ली।

फिर उसकी हथेली पर खून था।

PART 3

—स्ट्रेचर लाओ! गायनेकोलॉजी टीम को तुरंत बुलाओ!

जिस डॉक्टर ने पूरी रात दूसरों की धड़कनें बचाई थीं, वही अब सफेद चादर पर काँपती हुई मरीज बन गई थी। अनन्या को जब गलियारे से दौड़ाते हुए ले जाया जा रहा था, छत की रोशनियाँ उसकी आँखों में तेज़ सफेद धारियों की तरह कट रही थीं। पेट में दर्द लहर बनकर उठता और कमर तक टूट जाता।

आरव उसके साथ दौड़ रहा था। उसके चेहरे पर वही डर था, लेकिन इस बार डर के साथ भागने की जगह नहीं थी।

—अनन्या, मेरी तरफ देखो। मैं यहीं हूँ।

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

—यह मत कहना, अगर फिर चले जाना है।

आरव का चेहरा जैसे किसी ने थप्पड़ से नहीं, सच से जला दिया हो।

अंदर डॉक्टर मेहरा ने जल्दी-जल्दी जाँच की। ब्लड प्रेशर खतरनाक रूप से बढ़ा हुआ था। पेट में ऐंठन, रक्तस्राव और बच्चे की धड़कन तेज़ होकर कमजोर पड़ती जा रही थी। शब्द हवा में तैर रहे थे—गंभीर प्रीक्लेम्पसिया, निगरानी, समय से पहले प्रसव का खतरा, माँ और बच्चे दोनों पर जोखिम।

अनन्या ने पहली बार अपने चेहरे से वह मजबूत नकाब हटने दिया।

वह रोई।

डॉक्टर की तरह नहीं। उस औरत की तरह, जिसने 7 महीने अपनी तकलीफ को कोट के भीतर छुपाया था। जिसने मरीजों के बच्चों को बचाते हुए अपने बच्चे के लिए अकेले डर झेला था। जिसने हर सोनोग्राफी में एक खाली कुर्सी देखी थी, जहाँ आरव होना चाहिए था।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—बस एक बार सच कह दो। मैं भागूँगा नहीं।

अनन्या थक चुकी थी। दर्द से, गुस्से से, प्रेम से, अपमान से।

—हाँ, बच्चा तुम्हारा है।

आरव ने आँखें बंद कर लीं। उसके पास कोई सफाई नहीं थी। कोई बहाना नहीं था। कोई मीटिंग नहीं, कोई बिजनेस ट्रिप नहीं, कोई पारिवारिक दबाव नहीं। बस एक गर्भवती स्त्री थी, जिसने उसकी कायरता से ज्यादा साहस दिखाया था।

बाहर गलियारे में नंदिनी तारा को सीने से लगाए बैठी थी। तारा लगातार पूछ रही थी कि डॉक्टर आंटी ठीक होंगी या नहीं। नंदिनी उसके बाल सहला रही थी, पर उसकी खुद की आँखें भीगी थीं।

सावित्री दूर खड़ी थीं। पहली बार उनकी आवाज़ धीमी थी। शायद इसलिए नहीं कि उन्हें पछतावा था, बल्कि इसलिए कि अस्पताल की सफेद दीवारों ने उनकी इज्जत और खानदान वाली सारी बातें छोटी कर दी थीं।

कुछ घंटों बाद अनन्या को स्थिर किया गया। डॉक्टरों ने तुरंत प्रसव रोकने की कोशिश की। उसे सख्त आराम, दवाएँ और लगातार निगरानी में रखा गया। बच्ची की धड़कन कभी तेज़, कभी धीमी होती। हर बार मॉनिटर की आवाज़ बदलती, आरव का चेहरा पीला पड़ जाता।

सुबह तारा को डिस्चार्ज किया जा सकता था, लेकिन उसने जाने से मना कर दिया।

—जब तक डॉक्टर आंटी घर नहीं जाएँगी, मैं भी नहीं जाऊँगी।

नंदिनी ने उसे समझाया।

—तुम्हें आराम चाहिए, बेटा।

तारा ने गुलाबी कंगन अपनी मुट्ठी में कस लिया।

—बेबी को पता होना चाहिए कि उसकी बड़ी दीदी इंतजार कर रही है।

यह सुनकर अनन्या की आँखें फिर भर आईं।

उस दिन के बाद आरव बदलने की कोशिश नहीं, बदलने की सजा जीने लगा। उसने अपने दफ्तर के सभी बाहर के दौरे रद्द कर दिए। सुबह तारा को स्कूल छोड़ता, फिर अस्पताल आता। महँगे फूलों के बुके नहीं लाता, जिन्हें असिस्टेंट भेज देते। वह अस्पताल के बाहर बूढ़े फूलवाले से 20 रुपए की गेंदा और चमेली की छोटी माला ले आता, क्योंकि तारा कहती थी कि बेबी को खुशबू पसंद आएगी।

वह बैठना सीख रहा था।

चुप रहना सीख रहा था।

हर बात का बचाव न करना सीख रहा था।

अनन्या के कमरे में वह कभी-कभी बस कुर्सी पर बैठा रहता। पूछता—पानी चाहिए? तकिया ठीक है? रोशनी कम कर दूँ? डॉक्टर को बुलाऊँ? या बस चुप रहूँ?

कई बार अनन्या उसे देखती, फिर मुँह फेर लेती। माफ करना आसान नहीं था। गर्भ में पलता बच्चा सिर्फ शरीर में नहीं, स्मृति में भी जगह बनाता है। हर अधूरी रात, हर अकेली जाँच, हर उल्टी के बाद सिंक पकड़कर रोना—उन सबका हिसाब किसी एक माफी से खत्म नहीं हो सकता था।

नंदिनी भी आती रही। वह प्रतिद्वंद्वी बनकर नहीं, तारा की माँ बनकर आई। वह तारा का होमवर्क लाती, कहानी की किताबें लाती, रंगीन पेंसिलें लाती। तारा अस्पताल के कमरे में बैठकर बच्चे के लिए चित्र बनाती—एक घर, जिसमें 4 लोग थे। फिर कुछ सोचकर उसने 5 लोग बना दिए।

अनन्या ने पूछा।

—यह 5वाँ कौन है?

तारा ने मासूमियत से कहा।

—मम्मा। वह हमारे घर नहीं रहेंगी, पर हमारे परिवार में तो रहेंगी न?

नंदिनी ने चेहरा मोड़ लिया। आरव की आँखें लाल हो गईं।

उस क्षण अनन्या को समझ आया कि टूटे हुए रिश्ते हमेशा दुश्मनी में खत्म नहीं होते। कभी-कभी वे बच्चों की वजह से एक नए सम्मान में बदल सकते हैं।

लेकिन सावित्री को यह स्वीकार नहीं था।

तीसरे दिन वह कमरे में आईं। इस बार उनके साथ परिवार के 2 बड़े रिश्तेदार भी थे—एक चाचा और एक मौसी, जो हर बात में समाज की राय खोजते थे।

—आरव, बात करनी है, —सावित्री ने कहा।

आरव उठा।

—यहीं कहिए।

उन्होंने अनन्या की तरफ देखते हुए कहा—

—बच्चे का जन्म हो जाए, फिर डीएनए टेस्ट करवा लेना। संपत्ति, नाम, स्कूल, सब पर असर पड़ेगा। तारा को भी संभालना है। और यह बात मीडिया तक पहुँची तो मल्होत्रा परिवार की छवि खराब होगी।

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। वह जवाब देने की हालत में नहीं थी।

आरव ने धीरे से दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

—आप बाहर जाइए।

सावित्री चौंकीं।

—क्या कहा?

—मेरी बेटी तारा है। मेरी होने वाली बेटी भी है। अनन्या कोई बोझ नहीं, वह वह औरत है जिसे मैंने अकेला छोड़ा। अगर आपको खानदान बचाना है, तो पहले इंसानियत बचाइए। वरना इस कमरे में मत आइए।

कमरे में चुप्पी छा गई।

सावित्री के चेहरे पर अपमान और अविश्वास एक साथ आए। शायद जिंदगी में पहली बार उनके बेटे ने उनके सामने डरकर नहीं, खड़े होकर बात की थी।

—तुम अपनी माँ को बाहर निकालोगे?

आरव की आवाज़ काँपी, पर टूटी नहीं।

—नहीं। उस सोच को बाहर निकाल रहा हूँ, जिसने मुझे भी भागना सिखाया।

सावित्री चली गईं।

अनन्या ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस रात जब दर्द थोड़ा कम था, उसने पहली बार आरव को कुर्सी के बजाय खिड़की के पास खड़े देखा और पूछा—

—तुम थेरेपी लोगे?

आरव ने तुरंत कहा—

—हाँ।

—तारा के सामने कभी यह मत दिखाना कि प्यार का मतलब गायब हो जाना होता है।

—नहीं दिखाऊँगा।

—और अगर डर लगे?

आरव ने उसकी तरफ देखा।

—भागने से पहले बता दूँगा कि डर लग रहा है।

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। यह माफी नहीं थी। पर शायद यह पहली ईंट थी।

अगले 3 हफ्ते अस्पताल, दवाओं, डर और छोटी-छोटी उम्मीदों में बीते। अनन्या की हालत कभी सुधरती, कभी बिगड़ती। बच्ची का वजन कम था, लेकिन धड़कन लड़ रही थी। तारा हर दूसरे दिन वीडियो कॉल पर गाना गाती। कभी स्कूल की कविता, कभी अपनी बनाई कहानी, कभी बस यह दोहराती—

—बेबी, जल्दी आओ, मैंने तुम्हारे लिए जगह रखी है।

फिर एक बारिश भरी सुबह, जब दिल्ली की सड़कें धुली हुई लग रही थीं, अनन्या का दर्द अचानक बढ़ गया। ब्लड प्रेशर फिर ऊपर गया। बच्चे की धड़कन गिरने लगी।

इस बार डॉक्टरों ने इंतजार नहीं किया।

—आपातकालीन ऑपरेशन करना होगा, —डॉक्टर मेहरा ने कहा।

अनन्या ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

—पहले उसे बचाना।

—दोनों को बचाएँगे, —डॉक्टर ने दृढ़ता से कहा।

ऑपरेशन थिएटर के बाहर आरव ने पहली बार किसी मंदिर, किसी भगवान, किसी वचन का नाम नहीं लिया। उसने बस अपनी गलतियों को याद किया। हर वह फोन जिसे उसने नहीं उठाया। हर वह संदेश जिसे उसने पढ़कर छोड़ा। हर वह रात जब अनन्या अकेली रही। उसे लगा, पछतावा अगर शरीर बन सकता, तो वह उसी गलियारे में घुटनों के बल गिर पड़ा होता।

नंदिनी तारा को लेकर पहुँची। तारा के माथे की पट्टी अब छोटी हो गई थी। उसने आरव का हाथ पकड़ा।

—पापा, बेबी रोएगी न?

आरव ने काँपते हुए कहा—

—हाँ, बेटा। जरूर रोएगी।

दरवाज़े के भीतर समय लंबा हो गया।

फिर अचानक अंदर से एक बहुत हल्की, पर तेज़ आवाज़ आई।

एक नन्ही रोने की आवाज़।

आरव की आँखों से आँसू फूट पड़े। तारा उछलकर खड़ी हो गई।

—वह आ गई!

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आईं।

—बच्ची समय से पहले पैदा हुई है। वजन कम है, इसलिए उसे नवजात गहन देखभाल में रखना होगा। माँ स्थिर हैं, पर निगरानी जरूरी है।

आरव ने दीवार पकड़ ली। नंदिनी ने लंबी साँस छोड़ी। तारा ने अपना गुलाबी कंगन उठाकर कहा—

—यह उसको देना है।

बच्ची का नाम अनन्या ने रखा—आरोही।

—क्योंकि वह गिरावट से नहीं, ऊपर उठने से पैदा हुई है, —उसने धीमे से कहा।

आरोही छोटी थी, बहुत छोटी। काँच के बॉक्स में लेटी, नाक में पतली नली, हाथ में नन्ही सुई, छाती धीरे-धीरे उठती गिरती। तारा रोज़ शीशे के उस पार खड़ी होकर हाथ हिलाती।

—मैं तुम्हारी दीदी हूँ। जल्दी मजबूत हो जाओ। मेरे पास बहुत गुड़िया हैं।

एक दिन सावित्री आईं। इस बार न साड़ी का घमंड था, न आवाज़ की धार। आँखों के नीचे रातों की थकान थी। वह एनआईसीयू के बाहर खड़ी रहीं।

—क्या मैं उसे देख सकती हूँ?

अनन्या व्हीलचेयर पर बैठी थी। उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसके भीतर अब भी चोटें थीं। लेकिन उसने तारा को देखा, जो आरोही के लिए चित्र चिपका रही थी। उसने नंदिनी को देखा, जो चुपचाप उसके लिए चाय लेकर खड़ी थी। उसने आरव को देखा, जो अब किसी फैसले से भाग नहीं रहा था।

—देख सकती हैं, —अनन्या ने कहा। —लेकिन यह याद रखिए, इज्जत बच्चे की माँ को अपमानित करके नहीं बचती।

सावित्री की आँखें भर आईं। उन्होंने काँच के पार आरोही को देखा और पहली बार उनके होंठों पर आदेश नहीं, पश्चाताप आया।

—मुझसे गलती हुई।

अनन्या ने उन्हें माफ नहीं किया। अभी नहीं। शायद पूरी तरह कभी नहीं। लेकिन उसने दरवाज़ा बंद भी नहीं किया। कुछ रिश्तों को माफी नहीं, सीमाएँ बचाती हैं।

महीनों बाद अनन्या घर लौटी। उसका फ्लैट अब पहले जैसा शांत नहीं था। हर जगह डायपर, छोटी बोतलें, दवाइयों के टाइमटेबल, तारा की ड्रॉइंग, नंदिनी द्वारा भेजी गई कहानी की किताबें और आरव के थेरेपी अपॉइंटमेंट के नोट चिपके थे।

सब कुछ उलझा था। अधूरा था। लेकिन सच्चा था।

आरव ने अपने लिए अलग कमरा लिया था, उसी बिल्डिंग के पास। उसने ज़िद नहीं की कि सब तुरंत परिवार बन जाएँ। वह आया, मदद की, बच्ची को डॉक्टर के पास ले गया, तारा को स्कूल से लाया, और जब अनन्या थक जाती, बिना शिकायत चुपचाप बैठा रहा।

एक शाम तारा ने आरोही को झुनझुना दिखाते हुए कहा—

—देखो, यह मेरी बहन है। किसी ने किसी को छीना नहीं।

अनन्या ने उसे सीने से लगा लिया।

रात को आरव ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा—

—मैं तुमसे फिर से शादी की बात आज नहीं करूँगा। उसका हक मैंने खो दिया है। लेकिन मैं हर दिन कमाऊँगा। भरोसा, जगह, सम्मान। डर लगेगा तो भागूँगा नहीं। थेरेपी जारी रखूँगा। तारा और आरोही दोनों के लिए रहूँगा। और तुम्हारे लिए भी, अगर तुम कभी जगह दो।

अनन्या ने आरोही को गोद में कस लिया। उसकी आँखें थकी थीं, लेकिन उनमें पहले जैसी अकेली अंधेरी रात नहीं थी।

—रहना है तो ठीक से रहो, आरव। आधे दरवाज़े खुले रखकर नहीं।

आरव ने सिर झुका दिया।

—ठीक से रहूँगा।

उस रात बाहर फिर बारिश हो रही थी। वही दिल्ली, वही आवाज़, वही भीगी हवा। पर इस बार अनन्या अकेली नहीं थी। तारा फर्श पर सोते-सोते आरोही के लिए बनाई ड्रॉइंग पकड़े थी। नंदिनी ने संदेश भेजा था—“सुबह स्कूल बस से पहले आऊँगी।” और आरव दरवाज़े के बाहर नहीं, भीतर कुर्सी पर बैठा था।

अनन्या ने अपनी दोनों बेटियों को देखा।

एक खून से नहीं, दिल से जुड़ी थी।

दूसरी दर्द से जन्मी थी, मगर उम्मीद लेकर आई थी।

और उसे पहली बार लगा कि कभी-कभी टूटे हुए लोग भी घर बना सकते हैं, अगर वे सच में भागना बंद कर दें।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.