
PART 1
“पापा, मेरा पेट काट दीजिए… अंदर कुछ रेंग रहा है!”
दिल्ली के वसंत विहार की आलीशान कोठी में रात के 2:17 बजे यह चीख गूंजी तो अर्जुन मल्होत्रा के हाथ से खुली फाइल फर्श पर गिर गई। वह अपने अध्ययन-कक्ष के सोफे पर ही सो गया था, आधी खुली शर्ट, थकी आंखें और सामने मेज पर पत्नी स्वरा की पुरानी तस्वीर। स्वरा को गुज़रे 8 महीने हो चुके थे, पर घर की दीवारों में अब भी उसकी हंसी अटकी हुई थी।
अर्जुन नंगे पांव संगमरमर के गलियारे में दौड़ा। जैसे-जैसे वह बेटे विवान के कमरे के पास पहुंचा, चीखें और तेज होती गईं।
कमरे का दृश्य देखकर उसका खून जम गया।
11 साल का विवान बिस्तर के नीचे फर्श पर पड़ा था। उसका शरीर दर्द से ऐंठ रहा था। वह अपने पेट को दोनों हाथों से दबा रहा था, जैसे भीतर से कोई उसे नोच रहा हो। चेहरा पसीने से भीगा, होंठ नीले, आंखें डर से फटी हुईं।
“पापा, वह फिर जाग गया,” विवान रोया। “जब भी मैं वह चॉकलेट दूध पीता हूं, वह मेरे अंदर हिलने लगता है।”
अर्जुन उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।
“बेटा, सांस लो। कुछ नहीं है अंदर। तुम सुरक्षित हो।”
विवान ने सिर झटक दिया।
“नहीं पापा! उसने डाला है। उसने मेरे दूध में कुछ डाला है।”
दरवाजे पर रेशमी साड़ी की हल्की सरसराहट हुई।
नैना खड़ी थी।
अर्जुन की नई पत्नी। शादी को केवल 4 महीने हुए थे। चेहरे पर बनावटी चिंता, माथे पर छोटी बिंदी, आंखों में उतनी ही नमी जितनी किसी तस्वीर के लिए जरूरी होती है।
“फिर वही बात?” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “अर्जुन, अब यह डरने वाली बात हो गई है। वह हर रात मुझे दोष देता है।”
विवान उसे देखते ही पीछे खिसक गया।
“पापा, इसे यहां से हटाइए। प्लीज। यह मुझे मार देगी।”
नैना ने हाथ सीने पर रख लिया।
“देखा? अब वह साफ बोल रहा है कि मैं उसे नुकसान पहुंचाऊंगी। मैं इस घर में उसकी मां बनने आई थी, दुश्मन नहीं।”
अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।
यह पहली रात नहीं थी।
पिछले 3 महीनों से विवान रात में ऐसे ही चीखता था। कभी पेट में असहनीय दर्द, कभी उल्टियां, कभी हाथ-पैर कांपना, कभी यह कहना कि शरीर के अंदर कीड़े चल रहे हैं। उसे बड़े अस्पतालों में दिखाया गया। खून की जांच, पेट की जांच, दिमाग की जांच, बाल मनोचिकित्सक, परिवार सलाहकार—हर जगह एक ही जवाब मिला।
मां की मौत का सदमा।
नई सौतेली मां को स्वीकार न कर पाना।
ध्यान खींचने की कोशिश।
अर्जुन अपराधबोध में डूब गया था। शायद उसने बहुत जल्दी दूसरी शादी कर ली। शायद उसने सोचा था कि घर को फिर से एक मां मिल जाएगी, पर विवान हर दिन और दूर होता गया। वह नैना को उस तरह देखता था जैसे कोई बच्चा अंधेरे में छिपे सांप को देख ले।
“पापा,” विवान की आवाज़ टूट रही थी, “एक बार मुझ पर यकीन कर लीजिए।”
नैना की आंखें भर आईं।
“इसे तुरंत किसी अच्छे मानसिक केंद्र में भर्ती करना होगा। आज यह खुद को नोच रहा है, कल मुझे धक्का दे देगा। तब आप क्या करेंगे?”
विवान सिसक पड़ा।
“मैं झूठ नहीं बोल रहा।”
अर्जुन के भीतर कुछ फटा, पर वह समझ नहीं पा रहा था किस पर विश्वास करे।
तभी पीछे से एक कांपती हुई लेकिन साफ आवाज़ आई।
“साहब, बच्चे ने झूठ नहीं बोला।”
सबने मुड़कर देखा।
दरवाजे के बाहर मीरा खड़ी थी, नई आया। लखनऊ के पास के एक कस्बे से आई 23 साल की लड़की, जो केवल 12 दिन पहले इस घर में काम पर लगी थी। उसके हाथ में तौलियों की टोकरी थी, पर आंखें सीधी नैना पर टिकी थीं।
नैना का चेहरा एक पल में बदल गया।
“तुमने क्या कहा?”
मीरा ने गहरी सांस ली।
“मैंने मैडम को आज रात विवान बाबा के चॉकलेट दूध में छोटी शीशी से कुछ बूंदें मिलाते देखा।”
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा फैल गया।
अर्जुन ने धीरे से बिस्तर के पास रखी छोटी मेज की तरफ देखा।
वहां चांदी के किनारे वाला मग रखा था। उससे अभी भी भाप उठ रही थी।
विवान की आंखों से आंसू बह निकले।
“पापा… मैंने कहा था ना।”
नैना हंसी, पर वह हंसी गले में अटक गई।
“कमाल है। अब इस घर में नौकरानियां फैसला करेंगी? अर्जुन, तुम सच में इस लड़की की बात मानोगे?”
अर्जुन ने मग को रूमाल से उठाया। पहली बार उसकी आंखों में पति की उलझन नहीं, पिता का भय था।
नैना ने बहुत हल्की मुस्कान दी।
वह मुस्कान दुखी नहीं थी।
वह चेतावनी थी।
और अर्जुन को उसी पल समझ आया कि इस घर में असली बीमारी शायद उसके बेटे में नहीं थी।
PART 2
“मुख्य दरवाजा बंद करो। गैराज बंद करो। पिछला रास्ता भी बंद करो,” अर्जुन ने सुरक्षा-कर्मी से कहा। “और एम्बुलेंस बुलाओ।”
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तुम मुझे अपराधी की तरह रोक रहे हो?”
“मैं बस जानना चाहता हूं कि मेरा बेटा हर रात उसी दूध के बाद क्यों तड़पता है जो तुम बनाती हो।”
मीरा विवान के पास बैठ गई और उसके माथे पर गीला कपड़ा रखा।
“डरिए मत बाबा। अब कोई आपकी बात दबा नहीं पाएगा।”
विवान ने उसका हाथ पकड़ लिया, जैसे डूबता बच्चा किनारा पकड़ता है।
अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने विवान को आपात कक्ष में ले लिया। अर्जुन ने मग जांच के लिए सौंपा और गलियारे में पत्थर की तरह बैठ गया। उसके कानों में बेटे की पुरानी बातें गूंज रही थीं—“मुझे दूध मत दीजिए”, “मैडम के कमरे से अजीब गंध आती है”, “मुझे पागल मत कहिए।”
मीरा धीरे से बोली, “साहब, वह शीशी नई नहीं थी। मैंने उसे पहले भी मैडम के मेकअप बॉक्स में देखा था।”
3 घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए।
“आपके बेटे को भ्रम नहीं हो रहा था,” उन्होंने कहा। “उसके खून में बार-बार दी गई जहरीली दवा के संकेत हैं। ऐसी मात्रा पेट में तेज दर्द, घबराहट और शरीर के अंदर कुछ चलने जैसा अहसास करा सकती है।”
अर्जुन की सांस रुक गई।
“मतलब किसी ने मेरे बेटे को जहर दिया?”
डॉक्टर ने सिर झुका दिया।
“लगातार।”
सुबह 5 बजे पुलिस कोठी में थी। नैना के कमरे से बिना नाम वाली 3 शीशियां, नकली नामों पर खरीदी गई दवाओं की रसीदें और एक फाइल मिली—विवान को मानसिक रूप से अस्थिर साबित करने की योजना।
फाइल की पहली पंक्ति ने अर्जुन की आत्मा जला दी।
“बच्चा अयोग्य घोषित हो जाए तो अर्जुन वसीयत बदलने के लिए टूट जाएगा।”
तभी अस्पताल के दरवाजे पर नैना आई, आंखों पर काला चश्मा, आवाज़ में तैयार आंसू।
अर्जुन ने केवल इतना कहा, “रसोई के कैमरे ने सब रिकॉर्ड किया है।”
पहली बार नैना चुप हो गई।
PART 3
नैना के चुप होते ही 2 महिला पुलिसकर्मी आगे बढ़ीं। अस्पताल के सफेद गलियारे में उसकी चूड़ियों की खनक अचानक बहुत भयानक लगने लगी।
“नैना कपूर मल्होत्रा, जांच पूरी होने तक आपको हिरासत में लिया जा रहा है,” अधिकारी ने कहा।
नैना पीछे हटी।
“अर्जुन, तुम समझ नहीं रहे। वह बच्चा शुरू से मुझे नफरत करता था। उसने कभी मुझे इस घर में जगह नहीं दी।”
अर्जुन की आंखें लाल थीं।
“वह बच्चा था। तुम्हें जगह नहीं, भरोसा कमाना था।”
नैना की आंखों की नमी गायब हो गई। असली चेहरा बाहर आ चुका था।
“तुम्हें पता भी है, उस बच्चे की वजह से इस घर में कोई सांस नहीं ले सकता था? हर दीवार पर उसकी मां की तस्वीर, हर बात में स्वरा, हर फैसले में उसका नाम। मैं पत्नी थी या उस मरी हुई औरत की परछाई?”
अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“इसलिए तुमने मेरे बेटे को जहर दिया?”
नैना हंसी, इस बार खुलकर।
“धीरे-धीरे उसे कमजोर करना था। कोई मरता तो शक होता। पागल घोषित होता तो सब आसान था।”
अर्जुन की मुट्ठियां कांपीं। लेकिन उसने खुद को रोक लिया। अब उसे गुस्से से नहीं, सच से लड़ना था।
उसी समय विवान ने बिस्तर पर आंखें खोलीं। उसके हाथ में नली लगी थी, चेहरा पीला था, पर आवाज़ साफ निकली।
“पापा… क्या वह चली गई?”
अर्जुन उसके पास भागा और हाथ थाम लिया।
“हां बेटा। अब वह वापस नहीं आएगी।”
विवान ने उसे बहुत देर तक देखा। उस नजर में राहत कम थी, सवाल ज्यादा।
“अब आपको मुझ पर यकीन है?”
अर्जुन के होंठ खुले, पर शब्द नहीं निकले। अस्पताल के कमरे में लगी मशीन की धीमी आवाज़ उसके अपराधबोध से भी भारी लग रही थी।
उसने बेटे के माथे पर हाथ रखा।
“मुझे पहले दिन से यकीन करना चाहिए था।”
विवान ने आंखें बंद कर लीं। वह सो गया, मगर अर्जुन जाग गया—जैसे 3 महीनों की नींद उसी पल टूट गई हो।
अगले 2 दिनों में मामला और गहरा हो गया।
पुलिस ने कोठी की पूरी तलाशी ली। नैना के ड्रेसिंग टेबल का एक दराज ठीक से बंद नहीं हो रहा था। मीरा ने यह बात नोटिस की। फर्नीचर महंगा था, जयपुर के कारीगरों से बनवाया गया, उसमें ऐसी खामी अजीब थी।
जब पुलिस ने नीचे की लकड़ी हटाई, भीतर एक छिपा हुआ खांचा मिला।
उसमें नकद पैसे, एक छोटी डायरी, कई प्रिंटआउट और एक पेन ड्राइव थी।
डायरी में तारीखें लिखी थीं।
किस रात दूध में कितनी बूंदें मिलाई गईं।
किस दिन विवान ने उल्टी की।
किस दिन अर्जुन ने उसे डांटा।
किस डॉक्टर ने क्या कहा।
किस सलाहकार को कितना पैसा दिया गया।
अर्जुन ने हर पन्ना पढ़ा और हर पन्ने के साथ अपने भीतर एक पिता को मरते महसूस किया।
नैना ने केवल जहर नहीं दिया था। उसने पूरे घर को झूठ की अदालत बना दिया था, जहां विवान हर रात दोषी साबित किया जाता था और उसका अपराध सिर्फ यह था कि वह अपनी मां को याद करता था।
सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब पेन ड्राइव खोली गई। उसमें नैना और एक निजी मनोचिकित्सक की बातचीत थी। वही डॉक्टर जिसने अर्जुन को सलाह दी थी कि “बच्चे की सुरक्षा और परिवार की स्थिरता” के लिए विवान को कुछ महीनों के लिए एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भेजना बेहतर होगा।
बातचीत में साफ था कि डॉक्टर को हर महीने पैसे मिलते थे।
एक संदेश में नैना ने लिखा था, “अगर बच्चा घर से हट जाए तो अर्जुन पूरी तरह मेरे नियंत्रण में रहेगा।”
दूसरे जवाब में डॉक्टर ने लिखा था, “रिपोर्ट को चिंता, भ्रम और आत्म-क्षति के खतरे की दिशा में रखा जा सकता है।”
अर्जुन ने फोन दीवार पर मार दिया। कांच टूट गया। पर अंदर जो टूटा, उसका कोई टुकड़ा दिखाई नहीं देता था।
पुरानी आया कमला चाची भी मिल गईं। वह कई साल से मल्होत्रा परिवार के साथ थीं और स्वरा उन्हें बहन जैसा मानती थी। अचानक एक महीने पहले वह गांव चली गई थीं। अर्जुन को बताया गया था कि उनके बेटे ने उन्हें बुला लिया।
असल बात और थी।
कमला चाची ने पुलिस को बयान दिया कि उन्होंने नैना को एक रात रसोई में विवान के दूध के साथ छेड़छाड़ करते देखा था। जब उन्होंने सवाल किया तो नैना ने उन्हें 2 लाख रुपये देकर चुप रहने को कहा। कमला ने पैसे लेने से मना किया। अगले दिन नैना ने धमकी दी कि उनके बेटे पर चोरी का झूठा केस लगवा देगी। गरीब और अकेली औरत डर गई।
कमला चाची अस्पताल आईं तो विवान ने उन्हें देखते ही रोना शुरू कर दिया।
“आप चली क्यों गईं?”
वह उसके पैरों के पास बैठ गईं।
“बाबा, गलती हो गई। उस दिन बोल देती तो तुम इतना नहीं सहते।”
विवान ने चेहरा मोड़ लिया। वह बच्चा था, पर उसके भीतर विश्वास की उम्र बहुत जल्दी बूढ़ी हो गई थी।
मीरा थोड़ी दूर खड़ी सब देख रही थी। वह इस परिवार में नई थी, पर सच बोलने वाली सबसे पहली निकली। अर्जुन उसके पास गया।
“तुमने मेरी आंखें खोल दीं।”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“साहब, आंखें तो आपके बेटे ने बहुत पहले खोल दी थीं। किसी ने देखा ही नहीं।”
यह बात अर्जुन को तीर की तरह लगी, क्योंकि यह सच थी।
मामला मीडिया में फैल गया। दिल्ली के बड़े घर, दूसरी शादी, सौतेली मां, जहर, वसीयत—हर चैनल इसे मसाला बनाकर दिखा रहा था। कोठी के बाहर कैमरे, पड़ोसी, सोशल मीडिया पर बहस। कुछ लोग कह रहे थे कि अर्जुन भी दोषी है, क्योंकि उसने बेटे की पुकार पर भरोसा नहीं किया। कुछ लोग कह रहे थे कि दुख इंसान को अंधा कर देता है।
अर्जुन ने सफाई देने के लिए कोई प्रेस बयान नहीं दिया।
उसने केवल एक काम किया।
उसने अपनी कंपनी की सारी बैठकों से छुट्टी ली, वकीलों को मामला सौंपा और विवान के बिस्तर के पास बैठ गया।
विवान लगभग 18 दिन अस्पताल में रहा। शरीर धीरे-धीरे ठीक हुआ, पर मन हर रात उसी कमरे में लौट जाता जहां चॉकलेट दूध की भाप उठती थी। वह गर्म दूध देखकर कांपता था। किसी भी महिला नर्स के कदमों की आवाज़ पर चौंक जाता था। सोते-सोते पेट पकड़ लेता था।
एक रात उसने धीमे से पूछा, “अगर मीरा दीदी नहीं देखतीं तो क्या आप मुझे कहीं भेज देते?”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
सच उससे भाग नहीं सकता था।
“शायद,” उसने कहा।
विवान ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
अर्जुन ने उसके छोटे हाथ को पकड़ा।
“और यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी शर्म है। मैं अच्छा पिता बनना चाहता था, पर डर गया। मुझे लगा बड़े लोग सही होंगे, डॉक्टर सही होंगे, नैना सही होगी। मैंने यह नहीं सोचा कि मेरा बच्चा हर रात मौत जैसे डर से लड़ रहा था।”
विवान चुप रहा।
“मैं तुमसे यह नहीं कहूंगा कि मुझे तुरंत माफ कर दो,” अर्जुन ने कहा। “बस इतना वादा करता हूं कि अब तुम्हें अपनी बात साबित करने के लिए टूटना नहीं पड़ेगा।”
लंबे सन्नाटे के बाद विवान ने पूछा, “मम्मा होतीं तो क्या करतीं?”
स्वरा की याद ने अर्जुन की छाती जला दी।
“वह पहली रात तुम्हारे पास बैठ जातीं,” उसने फुसफुसाया। “और सुबह तक तुम्हारा हाथ नहीं छोड़तीं।”
विवान की आंखों से आंसू बह निकले।
“मुझे मम्मा चाहिए।”
अर्जुन ने उसे सीने से लगा लिया। पहली बार उसने बेटे को चुप कराने की कोशिश नहीं की। उसने रोने दिया। बच्चे का दुख कोई शोर नहीं था जिसे बंद करना हो। वह गवाही था, जिसे सुना जाना था।
जब विवान घर लौटा तो कोठी बदल चुकी थी।
नैना की तस्वीरें हटा दी गई थीं। उसका कमरा बंद कर दिया गया था। रसोई की पूरी जांच हुई। हर दवा, हर शीशी, हर बंद डिब्बा बाहर फेंक दिया गया। अर्जुन ने घर के नियम बदले—अब विवान से पूछे बिना उसके लिए कुछ नहीं बनाया जाएगा। उसके कमरे में ताला नहीं लगेगा। रात को डर लगे तो कोई उसे “नाटक” नहीं कहेगा।
पहले दिन विवान रसोई के दरवाजे पर रुक गया।
वही जगह।
वही काउंटर।
वही पीतल की छोटी पतीली।
उसकी सांस तेज होने लगी।
अर्जुन तुरंत उसके बराबर बैठ गया।
“आज कुछ पीना जरूरी नहीं।”
विवान ने पूछा, “आपने बनाया है?”
“हां। लेकिन तुम देखोगे तो ही बनेगा।”
अर्जुन ने गैस बंद की, दूध अलग रखा, कोको पाउडर अलग, चीनी अलग। उसने हर डिब्बा विवान को छूने दिया, सूंघने दिया, खोलने दिया।
मीरा ने दूर से देखा। कमला चाची पूजा के कमरे में चुपचाप दीया जला रही थीं।
विवान ने कांपते हाथ से मग उठाया, फिर वापस रख दिया।
“अगर फिर दर्द हुआ तो?”
अर्जुन ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया।
“तो इस बार सबसे पहले तुम्हारी बात मानी जाएगी। कोई तुम्हें पागल नहीं कहेगा।”
काफी देर बाद विवान ने एक छोटा घूंट लिया। फिर दूसरा।
उसके होंठ कांपे। आंखें भर आईं। वह रोया नहीं, जैसे रोने की ताकत खत्म हो गई हो। अर्जुन ने उसे बहुत हल्के से गले लगाया, जैसे किसी टूटे हुए खिलौने को नहीं, किसी जंग जीतकर लौटे बच्चे को पकड़ा जाता है।
मीरा को अर्जुन ने पढ़ाई के लिए मदद दी। वह नर्सिंग कोर्स करना चाहती थी। उसने मना किया, पर अर्जुन ने कहा, “जिसने मेरे बेटे की जान बचाई, उसे अपने सपनों से समझौता नहीं करना पड़ेगा।”
मीरा ने केवल इतना कहा, “मैंने वही किया जो किसी भी इंसान को करना चाहिए था।”
नैना के खिलाफ मुकदमा चला। नकली दवा खरीद, बच्चे को नुकसान पहुंचाने की साजिश, धोखाधड़ी, डॉक्टर को रिश्वत, वसीयत बदलवाने की योजना—एक-एक सबूत अदालत में रखा गया। वह हर सुनवाई में पहले की तरह सजकर आती, पर अदालत में उसकी सुंदरता किसी काम नहीं आई। कैमरे, आंसू, साड़ी, सिंदूर—सबूतों के सामने सब गिर गया।
जिस डॉक्टर ने झूठी रिपोर्ट बनाई थी, उसका लाइसेंस निलंबित हुआ और उसके खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ। पुराने कर्मचारियों को धमकाने वाले एजेंट पकड़े गए। नैना के मायके वालों ने पहले उसे बचाने की कोशिश की, फिर सबूत सामने आते ही दूरी बना ली। समाज में जिस सम्मान के लिए उसने यह सब किया था, उसी समाज ने उसका नाम डर और लालच की मिसाल बना दिया।
अर्जुन ने अपनी वसीयत फिर से बनवाई। इस बार उसने धन से पहले एक पत्र रखा।
विवान के नाम।
उस पत्र में लिखा था कि अगर कभी उसे पिता के फैसलों पर शक हो, तो उसे सवाल करने का पूरा अधिकार है। अगर कोई भी बड़ा व्यक्ति उसकी आवाज़ दबाए, तो घर का कोई दरवाजा उससे बड़ा नहीं होगा। उसकी मां स्वरा की याद मिटाई नहीं जाएगी, और कोई भी नया रिश्ता उसके दर्द को छोटा नहीं करेगा।
1 साल बाद, वही कोठी अब मकबरा नहीं लगती थी।
बगीचे में क्रिकेट की गेंद खिड़की से टकराती थी। रविवार को रसोई से पराठों की खुशबू आती थी। पूजा के कमरे में स्वरा की तस्वीर के सामने ताजे फूल रखे जाते थे। विवान ने एक बचाया हुआ पिल्ला अपनाया, जिसका नाम उसने मोती रखा। मोती हर रात उसके बिस्तर के पास सोता, और जब भी विवान नींद में डरकर उठता, उसकी ठंडी नाक उसके हाथ से लग जाती।
विवान के 12वें जन्मदिन पर घर में बड़ा आयोजन नहीं हुआ। केवल करीबी लोग, कमला चाची, मीरा, कुछ रिश्तेदार और अर्जुन। केक काटने से पहले विवान ने पानी का गिलास उठाया।
कमरे में सन्नाटा हो गया।
“पहले मुझे लगता था कि अगर बच्चा चिल्लाए और बड़े न सुनें, तो सच हार जाता है,” उसने धीमे से कहा। “अब पता चला कि सच देर से भी आए, तो उसे बोलना बंद नहीं करना चाहिए।”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
विवान ने आगे कहा, “और किसी बच्चे को पागल कहने से पहले, उसकी आंखों में डर देखना चाहिए।”
मीरा ने आंसू पोंछे। कमला चाची ने सिर झुका लिया। अर्जुन ने बेटे को गले लगा लिया।
“अब से पहली आवाज़ तुम्हारी सुनी जाएगी,” उसने उसके कान में कहा। “हर बार।”
रात को जब मेहमान चले गए, विवान बगीचे में मोती के साथ दौड़ रहा था। पीली रोशनियों के नीचे उसकी हंसी फिर से बच्ची जैसी लग रही थी—पूरी नहीं, पर लौटती हुई।
मीरा बरामदे में खड़ी थी।
“बच्चे बड़े घर नहीं याद रखते, साहब,” उसने कहा।
अर्जुन ने बेटे से नजर नहीं हटाई।
“फिर क्या याद रखते हैं?”
मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“जब डर लगे, तब किसने उनका हाथ पकड़ा।”
अर्जुन ने गहरी सांस ली।
उसे समझ आ गया कि वह अपने बेटे को जो सबसे बड़ी विरासत दे सकता है, वह कंपनी, कोठी या बैंक बैलेंस नहीं थी।
वह भरोसा था।
ऐसा भरोसा जिसमें विवान को फिर कभी अपना दर्द साबित करने के लिए चीखना न पड़े।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.