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वह बेटी गर्म हलवा लेकर मायके पहुँची, मगर माँ-बाप फर्श पर बेहोश मिले; 7 दिन बाद पुराने कैमरे ने दामाद का चेहरा दिखाया, “यह गलती नहीं थी”, और बंद दरवाज़े ने पूरे परिवार का भरोसा हमेशा के लिए तोड़ दिया

PART 1

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गरम गाजर का हलवा हाथ में लिए अनन्या अपने मायके में दाखिल हुई थी, और 3 कदम बाद उसने अपने माँ-बाप को डाइनिंग टेबल के पास फर्श पर बेहोश पड़े देखा।

लखनऊ के इंदिरा नगर की वह दोमंजिला पुरानी कोठी हमेशा आवाज़ों से भरी रहती थी। कभी रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी, कभी पापा की खाँसी, कभी माँ की डाँट, कभी मंदिर की घंटी। लेकिन उस शाम घर में ऐसी खामोशी पसरी थी जैसे किसी ने साँसों तक को ताला लगा दिया हो।

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अनन्या सक्सेना ने पहले दरवाजे की घंटी बजाई थी। फिर खिड़की के पास जाकर आवाज़ दी थी।

—माँ? पापा? मैं हूँ।

कोई जवाब नहीं आया।

उसने अपने पर्स से वह चाबी निकाली जो माँ ने शादी के बाद उसे दी थी।

—बेटी, चाबी रख ले। पर बिना आवाज़ दिए अंदर मत घुसना, घर है होटल नहीं।

यह बात याद आते ही उसके होंठ काँपे। ताला खुल गया। अंदर घुसते ही उसे चंदन की अगरबत्ती की हल्की महक मिली, मगर रसोई से कोई खुशबू नहीं आ रही थी। टीवी बंद था। पापा की ऐनक मेज पर पड़ी थी। माँ की चप्पल उलटी पड़ी थी।

फिर उसकी नज़र फर्श पर गई।

सरला देवी साड़ी के पल्लू में उलझी हुई पड़ी थीं, एक हाथ डाइनिंग टेबल के पाए को पकड़े हुए। रघुवीर प्रसाद सोफे से आधे नीचे लुढ़के थे, उनका सिर कंधे की तरफ झुका हुआ था। दोनों की आँखें बंद थीं। चेहरा पीला। साँस इतनी धीमी कि जैसे कोई धागा टूटते-टूटते बच रहा हो।

हलवे का डिब्बा अनन्या के हाथ से छूट गया। काजू और गरम हलवा सफेद टाइलों पर फैल गया।

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—माँ!

वह घुटनों के बल गिर पड़ी। उसने माँ का चेहरा थपथपाया, फिर पिता की कलाई पकड़कर नब्ज टटोलने लगी। उंगलियाँ काँप रही थीं। उसे लगा, दुनिया उसके कानों में फट रही है।

उसने 108 पर कॉल किया। आवाज़ निकल नहीं रही थी।

—मेरे मम्मी-पापा… फर्श पर… उठ नहीं रहे… जल्दी भेजिए…

एम्बुलेंस आई। पड़ोसी बाहर जमा हो गए। किसी ने कहा गैस लीक हुई होगी। किसी ने कहा बूढ़े लोग हैं, दवाई उलट-पुलट खा ली होगी। अनन्या सुन ही नहीं रही थी। उसके सामने बस माँ का चेहरा था, जो 2 दिन पहले तक उसे डाँट रहा था।

—इतनी दुबली हो गई है। ठीक से खाया कर।

अस्पताल में 4 घंटे बाद डॉक्टर ने उसे सफेद गलियारे में रोका।

—आपके माता-पिता सोए नहीं थे। उन्हें सुलाया गया है। बहुत भारी मात्रा में नींद की दवा उनके शरीर में मिली है।

अनन्या का शरीर सुन्न हो गया।

पीछे उसकी छोटी बहन मीरा रो रही थी। उसके साथ उसका पति निखिल खड़ा था, वही निखिल जिसे सरला देवी शादी के बाद अपना बेटा कहती थीं।

निखिल ने धीरे से कहा—

—शायद गलती से दवाई ज़्यादा ले ली होगी।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा। उसी पल निखिल ने नज़र झुका ली।

और पहली बार अनन्या के भीतर एक डर उठा—यह हादसा घर के बाहर से नहीं आया था।

PART 2

अगले 7 दिन अस्पताल, पुलिस और उस खाली घर के बीच कटे। सरला देवी बेहोश रहीं। रघुवीर प्रसाद कभी आँख खोलते, पर किसी को पहचान नहीं पाते। मीरा हर रात रोकर कहती—

—दीदी, मुझे पहले समझ जाना चाहिए था। माँ निखिल का नाम आते ही चुप हो जाती थीं।

निखिल हर जगह मौजूद था। चाय लाता, डॉक्टर से बात करता, मीरा को संभालता और हर बार कहता—

—परिवार टूटना नहीं चाहिए।

अनन्या को उसकी आवाज़ में दर्द नहीं, अभ्यास सुनाई देता था।

7वें दिन अनन्या का पति वरुण, मायके से कुछ कपड़े और कागज़ लेने गया। रात 9:12 पर उसका फोन आया।

—अनन्या, अभी आओ। अकेले गाड़ी मत चलाना। मैंने कुछ पाया है।

जब अनन्या पहुँची, मीरा रसोई में पत्थर जैसी बैठी थी। मेज पर लैपटॉप रखा था। बगल में धूल से ढकी छोटी सी कैमरा मशीन थी।

वरुण ने कहा—

—गेट वाला पुराना सीसीटीवी। सबको लगा बंद है, लेकिन मेमोरी कार्ड में रिकॉर्डिंग बची है।

वीडियो चला।

एक आदमी रात 8:43 पर आया। उसने घंटी नहीं बजाई। जेब से चाबी निकाली। अंदर गया।

36 मिनट बाद वह निकला, दरवाज़ा बंद किया, ताला लगाया।

पोर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।

मीरा चीख पड़ी।

वह निखिल था।

PART 3

घर की रसोई में उस रात कोई नहीं रोया। रोना जैसे बाद के लिए बचा लिया गया था। अनन्या की आँखें वीडियो पर जमी थीं। बार-बार वही दृश्य लौटता—निखिल की जेब से चाबी निकलना, दरवाज़ा खुलना, अंदर जाना, फिर लौटकर ताला लगाना।

ताला लगाना।

यही सबसे बड़ा वार था। अगर गलती हुई होती तो वह मदद बुलाता। अगर डर गया होता तो दरवाज़ा खुला छोड़ता। अगर उसका इरादा बुरा न होता तो वह कम से कम उन 2 बूढ़े लोगों को फर्श पर मरने के लिए बंद करके नहीं जाता।

मीरा दीवार से टिक गई। उसके होंठ हिल रहे थे।

—वह मेरे साथ था… उसने कहा था वह ऑफिस में देर तक रुका है… उसने मुझे वीडियो कॉल भी किया था…

वरुण ने धीमे स्वर में कहा—

—वीडियो कॉल कार से भी हो सकती है, मीरा।

मीरा ने चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।

अनन्या को अपनी बहन पर गुस्सा नहीं आया। उसे उस आदमी पर गुस्सा आया जिसने प्यार के नाम पर घर की हर दरार में झूठ भर दिया था।

उसी रात पुलिस को वीडियो दिया गया। इंस्पेक्टर आलोक त्रिपाठी, जो पहले इसे दवाइयों की गलती मानकर चल रहे थे, अचानक बहुत गंभीर हो गए। उन्होंने कैमरा, मेमोरी कार्ड, घर की चाबियों की सूची और पिछले महीनों के बैंक कागज़ माँगे।

तलाशी में रघुवीर प्रसाद की पुरानी अलमारी से एक नीली फाइल निकली। फाइल में बिजली के बिल, बीमा की रसीदें और एक बंद लिफाफा था। लिफाफे पर सरला देवी की लिखावट थी।

अनन्या के लिए। अगर हमारे साथ कुछ अनहोनी हो।

अनन्या का गला सूख गया।

उसने लिफाफा खोला। अंदर एक कागज़ था। सिर्फ 2 पंक्तियाँ।

अगर हम अचानक बीमार पड़ें या मर जाएँ, तो निखिल को पहले देखना। वह उतना सीधा नहीं है जितना मीरा समझती है।

मीरा ने कागज़ पढ़ते ही कुर्सी पकड़ ली।

—माँ को पता था…

अनन्या के भीतर कुछ टूट गया। माँ ने शक छिपाया था, डर छिपाया था, और शायद अपमान भी छिपाया था। सिर्फ इसलिए कि छोटी बेटी का घर न टूटे।

रघुवीर प्रसाद की डायरी में और सच्चाई छिपी थी। वह हर खर्च लिखते थे—दूध 62, सब्ज़ी 140, मंदिर दान 51, बिजली 2380। आखिरी पन्नों पर कई बार एक ही नाम लिखा था।

निखिल—25000
निखिल—40000
निखिल—75000

और नीचे एक पंक्ति।

अब और पैसे नहीं। वह झूठ बोल रहा है। मीरा को बचाना है।

मीरा काँपते हुए बोली—

—उसने कहा था पापा खुद मदद करना चाहते हैं। उसने कहा था बिजनेस में माल अटक गया है।

निखिल ने शादी के बाद घर में जगह धीरे-धीरे बनाई थी। वह हर त्योहार पर मिठाई लाता, सरला देवी के पैर छूता, रघुवीर प्रसाद को “बाबूजी” कहता, पड़ोसियों के सामने संस्कारी दामाद बनता। करवा चौथ पर मीरा की तस्वीरें खींचता, दिवाली पर बिजली की लड़ियाँ लगाता, होली पर सबको रंग लगाकर हँसाता। बाहर से वह वही आदमी था जिसे देखकर रिश्तेदार कहते—मीरा की किस्मत अच्छी है।

लेकिन भीतर वह कर्ज़, सट्टेबाज़ी और झूठ में डूबा था। उसने मीरा के नाम से उधार लिए थे। सोने की 2 चूड़ियाँ गिरवी रखी थीं। उसके फोन में ऑनलाइन सट्टे के ऐप थे। उसने कई लोगों से कहा था कि ससुर की जमीन बेचकर पैसा आने वाला है।

पुलिस ने उसके फोन से मिटाए हुए संदेश निकाले। रघुवीर प्रसाद को भेजा उसका एक संदेश था—

बस आखिरी बार मदद कर दीजिए। वरना मैं बर्बाद हो जाऊँगा।

रघुवीर प्रसाद का जवाब था—

तुमने यह बात 5 बार कही है। अब सच मीरा को बताओ। हम तुम्हारे झूठ का खर्च नहीं उठाएँगे।

सरला देवी का संदेश कुछ दिन बाद था—

मेरे घर अकेले मत आना। मीरा के साथ आना तो दरवाज़ा खुलेगा।

फिर भी वह आया था।

गेट की उसी चाबी से, जिसे माँ ने कभी भरोसे में दी थी।

दवा की दुकान से निकली रसीद भी मिली। निखिल ने नकली पर्ची दिखाकर नींद की गोलियाँ खरीदी थीं। उसकी गाड़ी में सीट के नीचे वही सफेद थैली मिली जो कैमरे में दिख रही थी। लैपटॉप के इतिहास में सवाल लिखे थे—

बुजुर्ग को नींद की गोली कितनी असर करती है।
दूध में दवा मिलाने से स्वाद बदलता है क्या।
बेहोश आदमी कितनी देर में उठता है।

अनन्या ने वह स्क्रीन देखी तो उसे उल्टी-सी आने लगी।

—उसने उन्हें मारने की कोशिश की? उसने इंस्पेक्टर से पूछा।

इंस्पेक्टर त्रिपाठी ने कुछ देर चुप रहकर कहा—

—अभी तक लगता है, वह उन्हें बेहोश करके कागज़, चेकबुक या एटीएम लेना चाहता था। लेकिन मात्रा इतनी थी कि दोनों मर भी सकते थे। और वह उन्हें उसी हालत में छोड़कर चला गया।

मीरा ने यह सुना और जमीन पर बैठ गई।

—मैंने किसके साथ 6 साल बिताए?

अनन्या ने उसे उठाया नहीं। पहले वह खुद खड़ी होना सीख रही थी।

निखिल को 2 दिन बाद गोमती नगर के एक मॉल की पार्किंग से पकड़ा गया। पहले उसने कहा उसे फँसाया जा रहा है। फिर कहा वह सिर्फ बात करने गया था। फिर कहा दवा सरला देवी ने खुद ली होगी। जब वीडियो, रसीद और संदेश सामने रखे गए, तो उसका चेहरा उतर गया।

आखिर में वह रोने लगा।

—मैं परेशान था। कर्ज़दार जान से मारने की धमकी दे रहे थे। मैं बस पैसे निकालना चाहता था। मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया।

इंस्पेक्टर ने ठंडे स्वर में पूछा—

—तो ताला क्यों लगाया?

निखिल चुप हो गया।

उस चुप्पी में पूरी कहानी थी।

मीरा ने उसे सिर्फ 1 बार देखा। पुलिस स्टेशन के एक कमरे में, वकील के सामने। अनन्या बाहर बैठी रही। जब मीरा बाहर आई, उसका चेहरा पीला था, मगर आँखों में पहली बार धुंध नहीं थी।

—उसने कहा, “मुझे माफ कर दो, मैं मजबूर था।”

—तूने क्या कहा? अनन्या ने पूछा।

मीरा ने सूखे होंठों से जवाब दिया—

—मैंने कहा, मम्मी-पापा भी मजबूर थे जब साँस लेने की कोशिश कर रहे थे। फिर भी तुमने दरवाज़ा बंद किया।

सरला देवी 4 दिन बाद होश में आईं। पहले वह बोल नहीं पाईं। उनके हाथ में सलाई लगी थी। चेहरा सूखा हुआ था। बाल बिखरे थे। अनन्या ने उनका हाथ पकड़ा, तो उसे लगा जैसे वह अपनी माँ नहीं, किसी टूटे हुए पत्ते को छू रही है।

—माँ, आप अस्पताल में हैं। पापा भी जिंदा हैं। निखिल पकड़ा गया है।

सरला देवी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने बोलने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली। नर्स ने कागज़ और पेन दिया।

सरला देवी ने काँपते हाथों से लिखा—

मीरा को मत तोड़ना।

अनन्या रो पड़ी।

जिस बेटी का पति उनके घर में ज़हर-सी नींद घोलकर गया था, उसी बेटी को माँ अभी भी बचाना चाहती थी।

—माँ, आपने हमें पहले क्यों नहीं बताया?

सरला देवी ने लंबी साँस ली। फिर लिखा—

सोचा, पहले पक्का कर लूँ। बेटी का घर बिना प्रमाण तोड़ना पाप लगता है।

रघुवीर प्रसाद 3 दिन बाद संभले। उन्हें याद टुकड़ों में था। उन्होंने बताया कि उस रात निखिल मिठाई लेकर आया था। बोला, मीरा की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह अकेला आया। उसने पैर छुए, बातें कीं, फिर रसोई में जाकर दूध गरम किया।

—मैंने सोचा, लड़का सुधर रहा है, रघुवीर प्रसाद ने धीमे से कहा। सरला ने दूध आधा ही पिया था। फिर उसे चक्कर आने लगे। मैं उठने लगा, तो मेरे पैरों ने जवाब दे दिया।

उनकी आँखें भर आईं।

—मैं उसे रोक नहीं पाया। वह अलमारी की तरफ गया। सरला ने उसका नाम पुकारा। उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

अनन्या ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

—पापा, आपने कोशिश की थी।

रघुवीर प्रसाद ने छत की तरफ देखा।

—कोशिश और बचा लेना, दोनों अलग बातें हैं बेटी।

यह वाक्य अनन्या के भीतर लंबे समय तक बजता रहा।

अस्पताल से घर लौटने के बाद घर बदल गया। वही दीवारें थीं, वही मंदिर, वही नीम का पेड़, वही नीली बाल्टी, वही रसोई, लेकिन अब हर आवाज़ में डर का एक महीन काँटा था। सरला देवी किसी और के हाथ का दूध नहीं पीती थीं। रघुवीर प्रसाद रात में 2 बार उठकर दरवाज़ा जाँचते। गेट की पुरानी चाबी बदल दी गई। खिड़की पर नई जाली लगी। सीसीटीवी ठीक करवाया गया।

अनन्या हर रविवार आने लगी।

पहले अपराधबोध से।

फिर आदत से।

फिर प्रेम से।

वह कभी फल लाती, कभी दालमोठ, कभी माँ की पसंद की इलायची वाली चाय। रसोई में बैठकर माँ की सब्ज़ी काटती, तो सरला देवी फिर भी डाँटतीं—

—आलू इतना बड़ा कौन काटता है? शादी के बाद हाथ और खराब हो गया तेरा।

अनन्या मुस्कुरा देती। उसे अब हर डाँट आशीर्वाद लगती थी।

मीरा का जीवन सबसे कठिन मोड़ से गुज़रा। उसने निखिल के खिलाफ बयान दिया। तलाक की प्रक्रिया शुरू की। ससुराल वालों ने उसे दोष दिया—

—पति की इज्ज़त रखनी चाहिए थी। घर की बात पुलिस तक ले गई।

मीरा ने पहली बार बिना काँपे जवाब दिया—

—जिसने मेरे माँ-बाप को दवा देकर फर्श पर छोड़ा, वह पति कहलाने लायक नहीं।

कुछ रिश्तेदारों ने फोन बंद कर दिए। कुछ पड़ोसी कानाफूसी करते रहे। पर अनन्या उसके साथ खड़ी रही। सरला देवी भी धीरे-धीरे मीरा से बात करने लगीं। शुरुआत सिर्फ 2 शब्दों से हुई—

—खा लिया?

फिर—

—ठीक है?

फिर एक दिन—

—आ जाना।

मीरा कई हफ्ते गेट पर खड़ी होकर लौट जाती थी। उसे लगता, उसकी वजह से घर में मौत आई थी। अनन्या समझाती—

—तेरी वजह से नहीं। उसके झूठ की वजह से।

लेकिन अपराधबोध कान से नहीं, हड्डियों से चिपकता है।

मुकदमा 8 महीने बाद शुरू हुआ। अदालत में निखिल दुबला, झुका हुआ, आँखें नीची किए बैठा था। उसने अपने कर्ज़, डर और मजबूरी की लंबी कहानी सुनाई। कहा, वह मारना नहीं चाहता था। कहा, वह शर्मिंदा था। कहा, उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए।

अनन्या ने माँ का बयान पढ़ा, क्योंकि सरला देवी अदालत नहीं आ सकीं। उस पत्र में लिखा था—

सबसे बड़ा दर्द बेहोश होना नहीं था। सबसे बड़ा दर्द यह था कि जिस लड़के को हमने दाल, चावल, मिठाई और भरोसा खिलाया, उसने हमें इंसान नहीं, अपनी मुसीबत के रास्ते की रुकावट समझा।

अदालत में कुछ पल के लिए ऐसी खामोशी छाई कि पंखे की आवाज़ भी भारी लगने लगी।

फैसला आया। निखिल को गंभीर अपराधों में सज़ा हुई। नकली पर्ची, जहरीली मात्रा की दवा, चोरी की कोशिश, और जानलेवा लापरवाही—हर सच उसके खिलाफ खड़ा था। मीरा ने फैसला सुनते समय आँखें बंद कर लीं। अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

घर लौटकर उस दिन कोई जश्न नहीं हुआ। न्याय भी कभी-कभी मरहम नहीं, सिर्फ पट्टी होता है। घाव फिर भी रहता है।

सर्दियों की एक रविवार दोपहर, महीनों बाद, मीरा पहली बार सचमुच घर के अंदर आई। हाथ में सूजी का हलवा था, जिसमें बादाम टेढ़े-मेढ़े कटे हुए थे। वह दरवाज़े पर खड़ी रही।

—माँ, मैं बस यह रखकर चली जाऊँगी।

रघुवीर प्रसाद कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने चश्मा उतारा। बहुत देर तक मीरा को देखते रहे।

मीरा की आँखें भर आईं।

—पापा, मुझे माफ मत कीजिए। बस मुझे एक बार आपके पैर छू लेने दीजिए।

रघुवीर प्रसाद धीरे-धीरे उठे। उनकी चाल अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही थी। वे दरवाज़े तक आए। अनन्या ने साँस रोक ली। सरला देवी रसोई से बाहर आईं, पल्लू कसकर पकड़े हुए।

रघुवीर प्रसाद ने मीरा के हाथ से हलवे का डिब्बा लिया और बोले—

—अंदर आ। तेरी माँ ने अरहर की दाल बनाई है।

मीरा वहीं फर्श पर बैठकर रो पड़ी।

यह पूरा माफ़ी नहीं थी। यह पुरानी तरह का परिवार भी नहीं था। यह सिर्फ एक दरवाज़ा था, जो थोड़ा-सा खुला था। मगर जिस घर में कभी भरोसा ताले में बंद कर दिया गया था, वहाँ इतनी जगह भी किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

धीरे-धीरे रविवार वापस आने लगे। सरला देवी फिर डिब्बों में खाना भरने लगीं। रघुवीर प्रसाद फिर हर बात में हिसाब लगाने लगे। मीरा कभी-कभी देर तक बैठती, कभी जल्दी चली जाती। अनन्या हर बार आती। चाहे बारिश हो, काम हो, थकान हो, कोई बहाना उसके रविवार से बड़ा नहीं रहा।

एक शाम सरला देवी ने वही पुराना स्टील का डब्बा निकाला, जिसका ढक्कन हमेशा टेढ़ा बंद होता था। उसमें आलू-मटर और 4 गरम पराठे रखे। ऊपर से अचार का छोटा डिब्बा दबाया और अनन्या को थमा दिया।

—ले जा। वरुण को भी खिला देना। और खुद भी खाना। चेहरा देख, आधी रह गई है।

अनन्या ने डिब्बा दोनों हाथों से लिया। उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा, यह सिर्फ खाना नहीं है। यह जीवन है, जो मौत के किनारे से लौटकर फिर उसके हाथ में रखा गया है।

उसने माँ को गले लगा लिया। डिब्बा उनके बीच दब गया, पर किसी ने परवाह नहीं की।

पहले वह कहती थी—

—जल्दी आऊँगी।

अब उसने माँ की आँखों में देखकर कहा—

—मैं अगले रविवार आऊँगी।

और वह आई।

अगले रविवार।

उसके बाद वाले रविवार।

फिर हर उस रविवार, जब तक घर में माँ की डाँट, पापा की खाँसी, चाय की भाप और दरवाज़े की घंटी साथ-साथ बजते रहे।

क्योंकि उस रात, जब गाजर का हलवा फर्श पर फैल गया था और 2 बूढ़ी साँसें अंधेरे से लड़ रही थीं, अनन्या ने एक बात समझ ली थी।

प्यार बड़े वादों से साबित नहीं होता।

प्यार दरवाज़े पर पहुँचने से साबित होता है।