
PART 1
सुबह 5:48 बजे, बेंगलुरु के एक बिज़नेस होटल के कमरे में बैठे अरविंद मल्होत्रा को दिल्ली पुलिस का फोन आया कि उसकी 17 साल की बेटी अनन्या को आधी रात की अवैध पार्टी से नशे की हालत में थाने लाया गया है।
अरविंद कुछ सेकंड तक बिस्तर के किनारे जड़ हो गया। उसकी शर्ट के बटन खुले थे, लैपटॉप अभी भी मेज़ पर चालू था, और फोन के दूसरी तरफ इंस्पेक्टर की आवाज़ इतनी सपाट थी जैसे वह मौसम का हाल बता रहा हो।
—आपकी बेटी को शराब पीकर हंगामा करने, पुलिस कार्रवाई में बाधा डालने और नाबालिगों को शराब उपलब्ध कराने की आशंका के तहत रोका गया है। पार्टी आपके वसंत कुंज वाले घर में चल रही थी।
पहले उसे लगा कोई धोखा है। पर पुलिस वाले ने अनन्या का पूरा नाम, उम्र, स्कूल, पता और उसकी पत्नी मीरा का नाम तक बता दिया।
अनन्या ऐसी लड़की नहीं थी। वह 12वीं में थी, बोर्ड की तैयारी कर रही थी, रात को कमरे में बैठकर इकॉनॉमिक्स के नोट्स बनाती थी। हाँ, वह चिड़चिड़ी हो जाती थी, पिता से कहती थी कि वह पुराने खयालों वाले हैं, कभी-कभी दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर देती थी। मगर वह समय पर घर आती थी, ड्राइवर को लोकेशन भेजती थी, स्कूल में अच्छे नंबर लाती थी।
अरविंद की आवाज़ सूख गई।
—कौन-सी पार्टी?
—लगभग 30 बच्चे। कई नाबालिग। शराब, तेज़ संगीत, टूटे हुए गिलास, पड़ोसियों की शिकायत। 2 लड़के गेट के पास लड़ रहे थे। आपकी बेटी ने रोकने आए कॉन्स्टेबल को धक्का दिया।
अरविंद का सिर घूम गया।
—मेरी पत्नी कहाँ है?
दूसरी तरफ हल्की चुप्पी हुई।
—मैडम बाद में आई थीं। उन्हें रोका नहीं गया है।
19 साल की शादी में अरविंद ने मीरा की चुप्पियाँ पढ़ना सीख लिया था। दोनों के बीच अब प्यार से ज़्यादा दिनचर्या बची थी—किसे बिजली का बिल भरना है, किसे ड्राइवर को छुट्टी देनी है, किसे अनन्या की पीटीएम में जाना है। लेकिन उसे लगता था कि बेटी के मामले में दोनों एक ही तरफ खड़े हैं।
उस सुबह उसे समझ आया कि वह अकेला खड़ा था।
उसने मीरा को फोन किया। 1 बार। 2 बार। 5 बार। कोई जवाब नहीं। मैसेज भेजे, फिर अनन्या को फोन लगाया। बंद।
करीब 2 घंटे बाद मीरा का फोन आया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर उस डर से नहीं जो मां को तब होता है जब बच्चा खाई के किनारे खड़ा हो। वह ऐसे रो रही थी जैसे दुनिया ने उसके साथ अन्याय कर दिया हो।
—अरविंद, बात को इतना बड़ा बना दिया गया है। बस छोटी-सी गेट-टुगेदर थी।
—अनन्या कहाँ है?
—ठीक है। बस थोड़ी शॉक्ड है।
—घर में शराब क्यों थी?
मीरा चुप हो गई।
वह चुप्पी किसी चीख से ज़्यादा डरावनी थी।
अरविंद ने मीटिंग रद्द की, नाश्ता छोड़ा और पहली फ्लाइट से दिल्ली लौट आया। रास्ते में उसने वकील को फोन किया, स्कूल की प्रिंसिपल को मेल किया, और अपनी बड़ी बहन नीलिमा को बस इतना कह पाया कि घर में कुछ बहुत खराब हो गया है।
दिल्ली उतरते-उतरते सच के टुकड़े जुड़ने लगे। मीरा ने अनन्या को कुछ दोस्तों को बुलाने की इजाज़त दी थी—बोर्ड से पहले थोड़ा रिलैक्स करने के नाम पर। उसने खुद वोदका, बीयर, कोल्ड ड्रिंक, चिप्स, कप, बर्फ और पिज़्ज़ा मंगवाया। फिर वह अपनी किटी वाली सहेली के घर डिनर पर चली गई, ताकि “बच्चों को लगे नहीं कि मां सिर पर खड़ी है।”
रात 12 बजे संगीत इतना तेज़ हुआ कि पड़ोसियों ने सोचा घर में घुसपैठ हो गई है। बच्चे लॉन में चिल्ला रहे थे। गेट के बाहर बोतल टूटी। 1 लड़की बेहोश जैसी पड़ी थी। पुलिस आई तो कुछ बच्चे भागे। अनन्या नशे में थी, डर गई, और उसने एक कॉन्स्टेबल का हाथ झटक दिया।
जब मीरा पहुँची, उसने कहा कि उसे नहीं पता शराब कहाँ से आई।
उसने झूठ बोला।
थाने में अरविंद ने अनन्या को देखा। बाल उलझे हुए, काजल फैला हुआ, हुडी पर कोल्ड ड्रिंक का दाग, और आँखों में एक अजीब-सी सख्ती। मीरा उसे सीने से लगाए बैठी थी, जैसे दोनों किसी साज़िश की शिकार हों।
अनन्या ने पिता को देखकर नजरें नहीं झुकाईं।
—मम्मी बस चाहती थीं कि मैं थोड़ा जी लूं।
अरविंद के भीतर कुछ टूट गया।
—तुम्हारी मां ने नाबालिग बच्चों के लिए शराब खरीदी और तुम्हें अकेला छोड़ दिया।
—आप कभी नहीं समझेंगे, पापा। कम से कम मम्मी मुझ पर भरोसा करती हैं।
यह वाक्य उसके सीने में धीरे-धीरे उतरती हुई छुरी बन गया।
उसी शाम घर लौटकर, बीयर और टूटे गिलासों की बदबू के बीच, अरविंद को दरवाज़े के पास पड़े ग्रोसरी बैग में बिल मिला। ₹23,860। वोदका, रम, बीयर के पैक, सोडा, बर्फ, प्लास्टिक कप, नमकीन। भुगतान मीरा मल्होत्रा के कार्ड से। पार्टी शुरू होने से 2 घंटे पहले।
उसने बिल मीरा के सामने डाइनिंग टेबल पर रख दिया।
—यह गलती नहीं है, मीरा। यह फैसला है।
मीरा ने धीमे से कहा।
—मैं उसकी दुश्मन मां नहीं बनना चाहती थी। मैं वो मां बनना चाहती थी जिस पर वह यकीन करे।
अरविंद ने पहली बार महसूस किया कि घर की असली आग अभी शुरू हुई है।
PART 2
उस रात अरविंद सो नहीं पाया। सुबह 3 बजे वह नीचे आया और गेट के सीसीटीवी कैमरे की रिकॉर्डिंग खोल दी। वह सिर्फ उस रात की एंट्री देखना चाहता था, मगर उंगलियाँ अपने आप पुरानी तारीखों पर चली गईं।
पहले 3 लड़कियाँ बैग लेकर आती दिखीं। फिर 4 लड़के। फिर कोई जैकेट के अंदर बीयर का पैक छुपाए। फिर अनन्या, हँसती हुई, हाथ में बोतल लिए।
तारीखें बदलती गईं।
दिसंबर की शुक्रवार रात। जनवरी की दोपहर। फरवरी की वह शाम जब मीरा ने कहा था अनन्या ग्रुप स्टडी कर रही है।
हर बार वही घर, वही गेट, वही बच्चे, वही कप, वही बर्फ। और कभी-कभी मीरा दरवाज़े पर मुस्कुराती दिखती, जैसे मेहमानों का स्वागत कर रही हो। फिर कार लेकर निकल जाती।
सुबह अरविंद ने बैंक स्टेटमेंट खोला। 4 और बिल। वही दुकान। वही सामान। वही कार्ड।
यह एक खराब हुई पार्टी नहीं थी।
यह महीनों से चल रहा झूठ था।
जब उसने मीरा से पूछा, वह फटी आँखों से बोली।
—मैं बस चाहती थी अनन्या मेरे करीब रहे।
तभी सीढ़ियों पर खड़ी अनन्या ने सब सुन लिया। उसके चेहरे से गुस्सा उतर गया। पहली बार उसकी आँखों में शक था।
और उसी शाम, अरविंद को गैरेज की लोहे की पेटी में मीरा की डायरी मिली।
पहले पन्ने पर लिखा था—“अरविंद को पता नहीं चलना चाहिए। वह प्यार को जेल समझता है।”
PART 3
अरविंद ने डायरी हाथ में ली तो उसकी उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं। गैरेज में धूल, पुराने सूटकेस और दिवाली की बची झालरों के बीच वह छोटी-सी डायरी ऐसे पड़ी थी जैसे किसी ने घर की नींव में बारूद छुपा रखा हो।
उसने पन्ने पलटे।
“अनन्या अब मुझसे बातें नहीं करती। अगर मैं सख्त बनूंगी तो वह पूरी तरह अरविंद की तरफ चली जाएगी।”
अगला पन्ना।
“बच्चे वैसे भी पीते हैं। घर पर रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे। मैं पास रहूंगी, बस सामने नहीं दिखूंगी।”
फिर सूचियाँ थीं—बर्फ, डिस्पोज़ेबल कप, चीज़ पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक, नमकीन, प्लेलिस्ट, ड्राइवर को छुट्टी देना, अरविंद की फ्लाइट का समय, किन दिनों वह देर से लौटता है।
एक पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था—“शनिवार खाली, मूड अच्छा रखना है।”
अरविंद की आँखों के सामने अनन्या का चेहरा घूम गया। वह बच्ची जो कभी स्कूल बस छूट जाने पर रोती थी, अब अपनी मां के डर और अकेलेपन का औजार बन चुकी थी।
उसने डायरी की तस्वीरें खींचीं। बदले के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी को बचाने के लिए।
अगले 2 दिन घर में खामोशी किसी श्राद्ध जैसी रही। अनन्या अपने कमरे में बंद रहती। मीरा गेस्ट रूम में चली गई और हर रिश्तेदार को यही कहती रही कि अरविंद पागलपन की हद तक कंट्रोलिंग हो गया है। मीरा की बहन शालिनी ने अरविंद को लंबे-लंबे मैसेज भेजे।
“एक गलती के लिए घर मत तोड़ो।”
“आजकल बच्चे ऐसे ही हैं।”
“तुम्हारी सख्ती ने ही मीरा को यह करने पर मजबूर किया।”
अरविंद उन मैसेजों को पढ़ता और फोन बंद कर देता। क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था कि लोग सच से नहीं, कहानी से प्रभावित होते हैं। और मीरा अपनी कहानी पहले ही फैला चुकी थी।
तीसरे दिन स्कूल से कॉल आया। दिल्ली के उस महंगे प्राइवेट स्कूल की प्रिंसिपल ने मीटिंग में अरविंद और मीरा को सामने बैठाया। उनका चेहरा शांत था, पर आवाज़ बर्फ जैसी ठंडी।
—इस घटना ने स्कूल की प्रतिष्ठा, छात्रों की सुरक्षा और कई परिवारों के भरोसे को चोट पहुँचाई है। हमें अनुशासन समिति बैठानी पड़ेगी। कुछ माता-पिता ने वीडियो भेजे हैं।
स्क्रीन पर वीडियो चला। अनन्या के लिविंग रूम में बच्चे बोतलें हाथ में लेकर नाच रहे थे। 1 लड़का सोफे पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था कि “आंटी बहुत कूल हैं।” 1 लड़की, जो मुश्किल से 15 की लग रही थी, मेज़ के सहारे लड़खड़ा रही थी।
मीरा ने चेहरा ढक लिया, लेकिन माफी नहीं मांगी।
—बच्चे बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं, मैम। मैंने किसी को मजबूर नहीं किया।
प्रिंसिपल ने सीधे कहा।
—मजबूर करना ज़रूरी नहीं होता। उपलब्ध कराना ही काफी है।
घर लौटते समय कार में अनन्या पीछे बैठी थी। वह पूरी राह चुप रही। मीरा ने कई बार उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, मगर अनन्या ने हाथ खींच लिया।
रात को अरविंद ने वकील से बात की। वकील ने कहा कि मामला सिर्फ स्कूल या पुलिस तक सीमित नहीं है। अगर बाकी माता-पिता शिकायत करते हैं तो मीरा पर नाबालिगों को शराब उपलब्ध कराने, लापरवाही और बच्चों की सुरक्षा खतरे में डालने का मामला बन सकता है। अनन्या पर भी असर पड़ सकता है, लेकिन उसे सुधारात्मक प्रक्रिया में बचाया जा सकता है, अगर पिता सहयोग करे और पूरा सच रखे।
मीरा ने यह सुना तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
—तुम कोर्ट जाओगे? अपनी पत्नी के खिलाफ?
—मैं अपनी बेटी के लिए जाऊंगा।
—तुम मुझे बर्बाद कर दोगे।
अरविंद की आवाज़ पहली बार कड़वी हुई।
—तुमने खुद को बचाने के लिए अनन्या को ढाल बना लिया। बर्बादी वहीं से शुरू हो गई थी।
उस रात करीब 12:30 बजे दरवाज़े की हल्की आवाज़ आई। अरविंद ने नीचे आकर देखा तो अनन्या स्पोर्ट्स बैग लिए खड़ी थी। आँखें लाल थीं, होंठ काँप रहे थे।
—कहाँ जा रही हो?
—मौसी के घर।
—इस समय? नहीं।
—मम्मी ने कहा है। उन्होंने कहा आप मुझे कोर्ट में घसीटेंगे।
अरविंद ने ऊपर जाकर मीरा को जगाया।
—तुमने उसे भेजने को कहा?
मीरा ने तकिए से आधा चेहरा उठाया।
—उसे तुम्हारी नेगेटिविटी से दूर रहना है।
अरविंद कुछ सेकंड उसे देखता रहा। शराब, पुलिस, स्कूल, वीडियो, झूठ—इनमें से कोई समस्या नहीं थी। समस्या उसकी “नेगेटिविटी” थी।
अगले दिन उसने परिवार अदालत में तत्काल आवेदन दिया। नाबालिग बेटी की सुरक्षा, अस्थायी संरक्षकता, स्कूल और चिकित्सा फैसलों का अधिकार, और मीरा की मुलाकातों पर निगरानी की मांग।
4 घंटे बाद पुलिस घर आई।
किसी ने सूचना दी थी कि पिता गुस्सैल, अस्थिर और बेटी के लिए खतरा हो सकता है।
अरविंद ने दरवाज़ा खोला। मीरा पीछे खड़ी थी, आँखें नीची, मगर चेहरे पर वैसी ही ठंडी दृढ़ता थी जैसी कोई अपनी गलती को आखिरी सांस तक गलती मानने से इनकार करते हुए रखता है।
अरविंद ने पुलिस को बिल, वीडियो, डायरी की तस्वीरें, स्कूल के मेल, वकील का आवेदन सब दिखाया। दोनों अधिकारी शांत रहे। जाते-जाते 1 ने धीमे से कहा।
—साहब, सब सबूत संभालकर रखिए। आगे अकेले बात मत कीजिए। वकील के जरिए चलिए।
दरवाज़ा बंद हुआ तो अरविंद के हाथ काँप रहे थे।
मीरा फुसफुसाई।
—देखा? तुम हमें कहाँ ले आए।
अरविंद ने उसकी तरफ देखा।
—नहीं, मीरा। मैं देख रहा हूँ कि तुम सच से बचने के लिए हमें कहाँ तक धकेल सकती हो।
सुनवाई 10 दिन बाद हुई। साकेत की परिवार अदालत की इमारत के बाहर भीड़ थी—वकील, फाइलें, रोते लोग, थके बच्चे, टूटते घर। मीरा काले सूट में आई थी, बड़ी बिंदी लगाए, चेहरा सूजा हुआ, जैसे वह शोकसभा में आई हो। शालिनी उसके साथ थी। अनन्या उनके बीच बैठी थी, हाथ बाँधे, नजरें नीचे।
अरविंद ने बेटी को देखते ही महसूस किया कि वह जीतने नहीं आया है। कोई पिता अदालत में अपनी बेटी को देख कर जीत नहीं सकता। वह बस उसे गिरने से बचाने आया था।
पहले मीरा के वकील ने कहा कि अरविंद अत्यधिक कठोर पिता है। वह बेटी पर दबाव डालता है। वह मां-बेटी के रिश्ते से जलता है। घर की छोटी-सी गलती को उसने कानूनी युद्ध बना दिया है।
फिर मीरा खड़ी हुई। उसकी आवाज़ धीमी और टूटी हुई थी।
—मैंने कभी अपनी बेटी को नुकसान पहुँचाने की इच्छा नहीं रखी। मैं बस उससे जुड़ना चाहती थी। मेरे पति हर चीज़ को कंट्रोल करते हैं। मुझे नहीं पता था बच्चे शराब लाएंगे।
अरविंद की सांस अटक गई। वही झूठ। वही चेहरा। वही मासूमियत।
उसके वकील ने धीरे से फाइल खोली।
पहले बिल रखे गए। फिर बैंक स्टेटमेंट। फिर सीसीटीवी फुटेज के स्क्रीनशॉट। फिर स्कूल के वीडियो। फिर शालिनी के मैसेज, जिनमें वह अनन्या को रात में अपने घर आने को कह रही थी। अंत में डायरी।
जज ने डायरी के पन्ने पढ़े। कमरा इतना शांत हो गया कि पंखे की आवाज़ भी भारी लगने लगी।
जज ने सिर उठाया।
—यह लिखावट आपकी है?
मीरा के होंठ सूख गए।
—यह मेरी निजी डायरी है।
—सवाल यह नहीं है।
मीरा चुप रही।
जज ने पन्ना पढ़ा।
—“अरविंद को पता नहीं चलना चाहिए। वह सब रोक देगा। अनन्या को महसूस होना चाहिए कि मैं उसकी तरफ हूँ।” आप अब भी कह रही हैं कि आपको कुछ नहीं पता था?
मीरा ने पहली बार रोना बंद कर दिया। क्योंकि अब आँसू भी उसकी मदद नहीं कर सकते थे।
अनन्या ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखें डायरी पर टिक गईं। जैसे पहली बार उसने अपनी मां को मां नहीं, एक डरी हुई औरत के रूप में देखा हो—जो बेटी का भरोसा जीतने के लिए उसका भविष्य दांव पर लगा चुकी थी।
जज ने अनन्या से पूछा।
—तुम कुछ कहना चाहती हो?
अनन्या ने पहले मीरा को देखा। फिर शालिनी को। फिर अपने पिता को।
—मुझे लगा मम्मी मुझे समझती हैं। मुझे लगा पापा ही हमेशा गलत हैं। मम्मी कहती थीं कि घर सुरक्षित है। कि बाहर पीने से अच्छा है घर में। लेकिन अगर उन्हें पता था पापा रोकेंगे, तो उन्होंने मुझसे क्यों कहा कि पापा मुझे बंद करना चाहते हैं?
उसकी आवाज़ टूट गई।
—मुझे नहीं पता था मैं उनके डर का हिस्सा बन गई हूँ।
अरविंद ने आँखें बंद कर लीं। वह अपनी बेटी को गले लगाना चाहता था, लेकिन अदालत में पिता का प्यार भी सबूतों के बीच खड़ा रह जाता है।
आदेश आया। अनन्या की प्राथमिक देखभाल और स्कूल-मेडिकल फैसलों का अधिकार अस्थायी रूप से अरविंद को मिला। मीरा की मुलाकातें निगरानी में होंगी। शालिनी को कड़ी चेतावनी दी गई कि किसी नाबालिग को कानूनी विवाद के बीच रात में अपने घर बुलाना गंभीर बात है। अनन्या को काउंसलिंग, अल्कोहल अवेयरनेस प्रोग्राम और सामुदायिक सेवा करनी होगी ताकि उसका रिकॉर्ड स्थायी दाग न बने।
बाहर आते हुए अनन्या अरविंद के साथ चली। न मीरा ने उसे पुकारा, न वह रुकी। कार में आधे रास्ते उसने धीमे से कहा।
—मैंने आपको इतना बुरा क्यों समझा?
अरविंद ने गाड़ी रोकने का मन किया। उसे कहना था कि उसने भी बहुत चोट खाई है, कि उसने भी 19 साल का घर टूटते देखा है, कि वह भी इंसान है। मगर वह सिर्फ बोला।
—क्योंकि वह तुम्हारी मां है।
अनन्या खिड़की की तरफ मुड़ी और चुपचाप रोने लगी।
आने वाले महीने आसान नहीं थे। स्कूल ने उसे सामान्य क्लास में लौटने नहीं दिया। वह फेयरवेल मिस कर गई, ग्रुप फोटो मिस कर गई, आखिरी दिन की हँसी, सफेद शर्ट पर दोस्तों के मैसेज, सब छूट गया। जो दोस्त कभी रात भर चैट करते थे, धीरे-धीरे गायब हो गए। कुछ ने उसे ब्लॉक कर दिया। कुछ ने स्क्रीनशॉट बचा रखे थे।
अनन्या घर में अरविंद से नफरत करती रही। उसे नियमों से घुटन होती। फोन टाइम लिमिट, काउंसलिंग, शाम 7 के बाद बाहर नहीं, हर जगह लोकेशन ऑन। डाइनिंग टेबल पर हर खाना पूछताछ जैसा लगता। हर दरवाज़ा बंद होने पर अरविंद का दिल धड़कता।
फिर धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।
एक शाम अनन्या रसोई में आई। अरविंद सिंक में प्लेट धो रहा था।
—मुझे लगता था आज़ादी मतलब जो मन करे वो करना।
अरविंद ने नल बंद किया।
—नहीं। आज़ादी मतलब यह समझना कि जो मन करे, उसकी कीमत कौन चुकाएगा।
अनन्या की आँखें भर आईं।
—मम्मी के साथ मैं कूल लगती थी।
अरविंद चुप रहा।
—आपके साथ मैं बच गई।
वह प्लेट पकड़े खड़ा रह गया। उसने चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया ताकि बेटी उसकी आँखों में पानी न देख सके।
मीरा को भी जवाब देना पड़ा। पुलिस जांच चली। बाकी माता-पिता ने बयान दिए। 1 लड़की की मां ने बताया कि उसकी 15 साल की बेटी उस पार्टी के बाद पूरी रात उल्टियाँ करती रही। स्कूल की प्रतिष्ठा, समाज की बातें, रिश्तेदारों के ताने—सब मीरा के चारों तरफ दीवार बनकर खड़े हो गए।
उसे जेल नहीं हुई, मगर जुर्माना लगा, सामुदायिक सेवा करनी पड़ी, काउंसलिंग के आदेश हुए, और स्कूल-सर्कल में उसकी “मॉडर्न, फ्रेंडली मां” वाली छवि फटकर गिर गई। जिन महिलाओं के साथ वह ब्रंच पर जाती थी, वे अब उसके आते ही बातचीत बदल देतीं। जिसने बेटी की दोस्त बनने के लिए मां होना छोड़ा था, वह दोनों रिश्ते खो चुकी थी।
7 महीने बाद तलाक हो गया।
अरविंद ने घर रखा। अनन्या उसके साथ रही। मीरा साकेत के एक छोटे अपार्टमेंट में चली गई, शालिनी की मदद से। शुरू में अनन्या उससे मिलने जाती थी, पर निगरानी वाले कमरे में बैठकर दोनों के बीच शब्द कम और पछतावा ज़्यादा होता। मीरा कई बार रोती, कहती कि उसने सब प्यार में किया। अनन्या हर बार धीरे से पूछती।
—अगर प्यार था, तो आपने सच क्यों छुपाया?
मीरा के पास कोई जवाब नहीं होता।
अरविंद को जीत जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न्याय कभी-कभी ताली नहीं बजाता। वह बस डाइनिंग टेबल पर तीसरी खाली कुर्सी छोड़ जाता है। घर की दीवारों से तस्वीरें उतरती हैं। त्योहारों पर मिठाइयों के डिब्बे छोटे हो जाते हैं। करवा चौथ की पुरानी छलनी अलमारी के पीछे धूल खाती रह जाती है। और पिता-बेटी सीखते हैं कि टूटे घर में भी सुबह की चाय बन सकती है।
एक रविवार, गैरेज साफ करते हुए अरविंद को अनन्या के बचपन की ड्रॉइंग मिली। शायद वह 5 साल की थी। कागज़ पर 3 टेढ़े-मेढ़े लोग बने थे—पापा, मम्मी, अनन्या। ऊपर गुलाबी क्रेयॉन से लिखा था, “मेरी जादू वाली मम्मी।”
अरविंद ठंडे फर्श पर बैठ गया।
सबसे दर्दनाक बात यह नहीं थी कि मीरा राक्षस निकली। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि वह कभी सचमुच अच्छी मां थी। वह मां जो बुखार में पूरी रात जागती थी। जो स्कूल के पहले दिन गेट के बाहर रोई थी। जो अनन्या के टूटे दांत को छोटे डिब्बे में संभालकर रखती थी। कहीं रास्ते में बेटी के दूर होने का डर इतना बड़ा हो गया कि उसने मां होने का साहस ही खो दिया।
अगले साल अनन्या ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वह कॉलेज नहीं मिला जिसका सपना उसने देखा था, पर अच्छा कोर्स मिल गया। उसने शनिवार को एक बुकस्टोर में काम शुरू किया, काउंसलिंग जारी रखी, और धीरे-धीरे ऐसे दोस्त चुने जो उसे गिरने पर धक्का नहीं, हाथ दें।
जिस दिन वह 2 सूटकेस और एक स्टडी लैंप लेकर हॉस्टल जाने निकली, उसने रसोई की मेज़ पर एक लिफाफा छोड़ा।
अरविंद ने उसके जाने के बाद खोला।
“पापा, शुक्रिया कि जब मुझे पिता की ज़रूरत थी, आपने मेरे लिए खलनायक बनने की हिम्मत की।”
उसने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी।
फिर वह रोया। उतना रोया जितना वह उस सुबह पुलिस के फोन के बाद भी नहीं रो पाया था।
शाम को घर बड़ा लगा, लेकिन खाली नहीं। गेट हवा से हल्का-सा हिला, वही गेट जिससे इतने झूठ अंदर आए थे। अरविंद ने उसे बंद किया और चाबी घुमा दी।
उसे उस दिन समझ आया कि बच्चे से प्यार करना हमेशा उसका दोस्त बन जाना नहीं होता। कभी-कभी प्यार का मतलब है उसकी नफरत सहना, उसकी चुप्पी झेलना, उसके लगाए आरोप सुनना, क्योंकि आप वह खाई देख रहे होते हैं जो वह अभी नहीं देख पा रहा।
कभी-कभी एक पिता को कहानी का खलनायक बनना पड़ता है, ताकि उसकी बेटी उस कहानी की शिकार न बन जाए।
और जब वही बेटी एक दिन मुड़कर समझ ले कि उस खलनायक ने उसे बचाया था, तब सारी रातें, सारी बेइज्जती, सारी टूटी हुई सांसें एक अर्थ पा लेती हैं।
Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.