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बेटी के जन्मदिन पर मेहमान ने उसका चेहरा केक में दबा दिया, माँ ने चुपचाप आँसू पोंछे, पर रात को जब पिता की हँसी दिखी तो सच निकला: “वह दर्द नहीं, ज़िंदगी सीख रही थी”, और दूसरी बच्ची का राज भी खुल गया

PART 1

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केक पर झुकते ही 6 साल की परी का चेहरा किसी ने पीछे से पकड़कर उसी के जन्मदिन के केक में धकेल दिया, और पूरे कमरे में फैली हँसी ने उसकी माँ नंदिता के सीने में जैसे आग भर दी।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर की 3री मंज़िल वाले छोटे से फ्लैट में वह दिन परी के लिए दुनिया का सबसे बड़ा दिन था। दीवारों पर गुलाबी गुब्बारे लगे थे, छत से कागज़ की रंगीन झालरें लटक रही थीं, और कोने में रखी छोटी मेज़ पर 3 लेयर वाला केक रखा था, जिसके लिए नंदिता ने 1 महीने तक अपनी सिलाई के ऑर्डर बढ़ा दिए थे। उसने अपनी बेटी के लिए नया फ्रॉक लिया था, सफेद कपड़े पर नीले फूल बने थे। परी सुबह से आईने के सामने घूम-घूमकर कह रही थी कि आज वह सचमुच राजकुमारी लग रही है।

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नंदिता अकेली माँ थी। उसका पति रोहित 5 साल पहले यह कहकर चला गया था कि वह परिवार की जिम्मेदारी के लिए बना ही नहीं है। वह कभी-कभी पैसे भेज देता था, पर परी के बुखार, स्कूल, डर, सपने या जन्मदिन के बारे में उसे कोई परवाह नहीं थी। परी के लिए पिता बस स्कूल के फॉर्म में लिखा एक नाम था।

फिर भी नंदिता ने उस दिन सब भूलकर मोहल्ले के बच्चों, स्कूल की 4 सहेलियों और कुछ पड़ोसियों को बुलाया था। परी की सबसे प्यारी सहेली रिया भी आई थी, अपनी माँ मीरा के साथ।

मीरा को देखते ही नंदिता का गला सूख गया। वही मीरा, जिसकी तस्वीरें रोहित के पुराने फोन में कभी छिपी मिली थीं। वही मुस्कान, वही नकली मिठास, वही आँखें जैसे हर घर में घुसकर मालिकाना हक जताती हों। नंदिता ने खुद को रोका। उसने सोचा, बच्चों की दोस्ती को बड़ों के पाप की सज़ा नहीं देनी चाहिए।

मोमबत्तियाँ जलीं। बच्चे तालियाँ बजाने लगे। परी कुर्सी पर खड़ी होकर धीरे से झुकी, आँखों में चमक, होंठों पर हिचकती मुस्कान। तभी मीरा ने मोबाइल उठाया, हँसते हुए आगे बढ़ी, और अचानक परी की गर्दन पर हाथ रखकर उसका चेहरा केक में दबा दिया।

कुछ बच्चों ने पहले इसे मज़ाक समझकर हँस दिया। लेकिन अगले ही पल परी ने जब सिर उठाया, उसकी पलकों पर क्रीम थी, फ्रॉक पर गुलाबी धब्बे थे, और चेहरा अपमान से काँप रहा था।

मीरा मोबाइल से रिकॉर्डिंग करती रही।

—अरे इतना भी क्या नाटक? बच्ची को अभी से महारानी मत बनाओ। दुनिया ऐसे ही चलती है।

नंदिता ने परी को तुरंत बाँहों में भर लिया। वह चिल्लाना चाहती थी, मीरा का फोन तोड़ देना चाहती थी, पर परी उसकी साड़ी का पल्लू पकड़कर काँप रही थी। बाथरूम में पहुँचते ही बच्ची फूट पड़ी।

—माँ, सब मुझ पर हँसे?

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नंदिता ने उसके चेहरे से क्रीम साफ की, पर अपने भीतर की आग नहीं बुझा पाई।

रात 11 बजकर 18 मिनट पर पड़ोसन सीमा का संदेश आया।

मीरा ने वह वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया था।

और वीडियो के नीचे हँसने वाली प्रतिक्रियाओं में एक नाम चमक रहा था—रोहित।

PART 2

नंदिता की उँगलियाँ मोबाइल पर जम गईं। रोहित ने सिर्फ वीडियो देखा नहीं था, उसने हँसी वाले 3 चेहरे भी लगाए थे। वही आदमी, जिसने अपनी बेटी की पहली चाल नहीं देखी, पहला स्कूल दिवस नहीं देखा, अब उसकी बेइज़्ज़ती पर हँस रहा था।

सुबह परी स्कूल के गेट पर सिर झुकाए खड़ी थी। कुछ माताएँ फुसफुसा रही थीं। किसी बच्चे ने धीरे से कहा, “केक वाली लड़की।” परी ने नंदिता का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

—माँ, मैं रोते हुए सच में मज़ेदार लगती हूँ?

नंदिता घुटनों के बल बैठ गई।

—नहीं, बेटा। जिन्हें किसी बच्चे का रोना मज़ेदार लगे, उनके दिल में कमी होती है।

2 दिन बाद खाने की मेज़ पर परी ने मासूमियत से कहा—

—रिया कहती है उसके 2 पापा हैं। घर वाले पापा विनय अंकल… और रविवार वाले पापा रोहित।

नंदिता की साँस रुक गई।

—तूने उसे देखा है?

—नहीं। पर रिया कहती है वो काली कार में आते हैं, च्यूइंग गम जैसी खुशबू वाली।

नंदिता उस खुशबू को जानती थी।

उस रात उसने पुराने खुले चित्र देखे। सिनेमा हॉल के शीशे में दिखती कलाई। वही घड़ी। वही चमड़े का कड़ा।

रोहित, जिसने परी को छोड़ दिया था, किसी और बच्ची का पिता बनकर जी रहा था।

PART 3

नंदिता ने उस रात रोई नहीं। कुछ दर्द आँसू नहीं बनते, वे सीधा रीढ़ में उतर जाते हैं और इंसान को खड़ा कर देते हैं। उसने पुरानी नीली डायरी निकाली, जिसमें वह घर का खर्च लिखती थी। उसी में उसने तारीखें लिखीं—जन्मदिन की शाम, वीडियो डालने का समय, मीरा की बात, रोहित की प्रतिक्रिया, स्कूल गेट की फुसफुसाहट, परी का सवाल, रिया का “रविवार वाला पापा।”

सुबह उसने स्कूल की प्रधानाचार्या से मिलने का समय माँगा। प्रधानाचार्या पहले असहज थीं, जैसे मामला स्कूल के बाहर का हो। लेकिन जब नंदिता ने वीडियो दिखाया, परी का चेहरा केक में दबा हुआ, और नीचे अजनबियों की हँसी, तो कमरे में चुप्पी फैल गई।

—यह बच्ची हमारी छात्रा है, मैडम। घर पर जो हुआ, उसका असर यहाँ हो रहा है। वह अब कक्षा में सिर उठाकर नहीं बैठती।

प्रधानाचार्या ने तुरंत नोट बनाया। रिया की माँ मीरा को स्कूल परिसर में बिना अनुमति आने से रोकने की बात हुई। बाल अधिकार से जुड़ी संस्था का नंबर नंदिता को दिया गया। वहाँ से सलाह मिली कि नाबालिग की अपमानजनक वीडियो बिना अनुमति फैलाना गंभीर मामला है। उसे स्क्रीनशॉट, लिंक, टिप्पणियाँ और गवाह सब सुरक्षित रखने को कहा गया।

नंदिता को कानून की भाषा नहीं आती थी। उसे अदालतों से डर लगता था। वह पुलिस थाने में जाने वाली औरत नहीं थी, वह तो रात में चुपचाप सिलाई करने वाली माँ थी, जो महीने के आखिरी 5 दिन दाल पतली कर देती थी ताकि बेटी का दूध बंद न हो। लेकिन अब बात उसकी इज़्ज़त की नहीं थी। बात परी की थी।

उसी शाम उसने रोहित को संदेश भेजा।

“तुम्हारी बेटी को उसकी जन्मदिन पार्टी में अपमानित किया गया। मीरा ने वीडियो डाला। तुमने उस पर हँसी लगाई। रिया ने कहा कि तुम उसके रविवार वाले पापा हो। बात करनी होगी।”

4 घंटे तक कोई जवाब नहीं आया। फिर फोन बजा।

—नंदिता, तुम फिर से ड्रामा शुरू कर रही हो?

नंदिता ने आँखें बंद कर लीं। उसे उम्मीद थी कि शायद वह पूछेगा, “परी कैसी है?” लेकिन रोहित ने वही पूछा जो हमेशा पूछता था—तुमने क्या कर दिया?

—मैंने कुछ शुरू नहीं किया, रोहित। मैंने सिर्फ अपनी बेटी की रक्षा शुरू की है।

—मीरा कह रही थी तुम उससे जलती हो। तुमने हमारी पुरानी बातों को कभी छोड़ा ही नहीं।

—मैंने तुम्हें बहुत पहले छोड़ दिया था। लेकिन तुमने परी को कभी पकड़ा ही नहीं, छोड़ते कैसे?

दूसरी तरफ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।

—रिया को बीच में मत लाओ।

नंदिता के भीतर कुछ टूटकर तेज हो गया।

—मेरी बेटी को बीच में लाना ठीक था? उसे इंटरनेट पर रोते हुए दिखाना ठीक था?

—वो बस वीडियो है। भूल जाएगी।

—वह 6 साल की है।

—तुम हर बात बड़ी कर देती हो।

नंदिता ने धीमे पर साफ पूछा—

—रिया तुम्हारी बेटी है?

रोहित ने लंबी साँस ली।

—हाँ।

यह शब्द छोटे थे, पर नंदिता के भीतर 6 साल की प्रतीक्षा का अंतिम दरवाज़ा बंद कर गए। उसे पहली बार साफ समझ आया कि रोहित पिता बनने से नहीं भागा था। वह परी का पिता बनने से भागा था।

—तो तुम्हें पिता बनना आता था।

—इतना सीधा नहीं है।

—बहुत सीधा है। तुमने एक बच्ची को रविवार दिए, खिलौने दिए, सिनेमा दिया। और अपनी बच्ची को जन्मदिन पर हँसी दी।

रोहित ने फोन काट दिया।

अगली सुबह स्कूल के बाहर एक आदमी नंदिता के पास आया। साधारण नीली शर्ट, थकी आँखें, हाथ में रिया की पानी की बोतल। वह विनय था—रिया का घर वाला पिता।

—आप नंदिता जी हैं?

नंदिता सतर्क हो गई।

—हाँ।

—मुझे समझना है कि मेरे घर में क्या चल रहा है। कल रात मीरा रिया को लेकर चली गई। फोन नहीं उठा रही। अलमारी में कुछ पुराने संदेश मिले हैं। कुछ पैसे के हिसाब भी। और… रोहित नाम बार-बार है।

नंदिता कुछ कहती, उससे पहले उसके फोन पर अज्ञात नंबर से संदेश आया।

“ज्यादा खोजोगी तो अगली बार तुम्हारी बेटी सच में रोएगी। इस बार केक था, अगली बार कुछ नरम नहीं होगा।”

नंदिता ने संदेश पढ़ा। उसका चेहरा पीला पड़ गया, लेकिन आवाज़ कठोर हो गई।

—हम पुलिस थाने चल रहे हैं।

उसने परी को सीमा के घर छोड़ा। परी ने पूछा—

—माँ, आप जल्दी आओगी?

नंदिता ने उसके माथे को चूमा।

—हाँ, और इस बार कोई तुम्हारी हँसी नहीं चुराएगा।

थाने में नंदिता के हाथ काँप रहे थे। उसे लगा जैसे सब लोग उसे ही देख रहे हैं, जैसे वह कमजोर माँ है जो अपनी बच्ची को बचा नहीं पाई। पर जब महिला अधिकारी ने कहा, “धीरे-धीरे बताइए, हम लिख रहे हैं,” तो नंदिता ने पहली बार महसूस किया कि शायद सच को आवाज़ देने से शर्म कम होती है।

उसने वीडियो दिखाया। मीरा की रिकॉर्डिंग, टिप्पणियाँ, रोहित की प्रतिक्रिया, धमकी वाला संदेश, स्कूल की स्थिति। विनय ने अपने हिस्से की बात कही। उसने बताया कि उसने रिया को तब से पाला जब वह 9 महीने की थी। मीरा ने कहा था कि बच्ची का असली पिता खतरनाक आदमी है और उससे दूर रहना ही बेहतर है। विनय ने रिया की फीस भरी, डॉक्टर के पास ले गया, बुखार में रातभर जागा, स्कूल की कविताएँ याद कराईं। उसने कभी कानूनी कागज़ पूरे नहीं किए क्योंकि मीरा हर बार कोई बहाना बना देती थी।

—कागज़ पर शायद मैं कुछ नहीं हूँ, मैडम, पर रिया डरती है तो मेरे सीने पर सिर रखती है। मेरे लिए वही मेरी बेटी है।

नंदिता ने उसकी तरफ देखा। यह वाक्य उसके भीतर कहीं बहुत गहराई तक गया। जिसे खून का रिश्ता नहीं था, वह पिता की तरह खड़ा था। और जिसे खून का रिश्ता था, वह हँसी वाला चेहरा भेज रहा था।

मामला धीरे-धीरे खुलने लगा। मीरा को नोटिस मिला। पहले उसने सबको झूठा कहा। फिर कहा कि वीडियो मज़ाक था। फिर कहा कि नंदिता ने उसे बदनाम करने की साजिश की। लेकिन स्कूल की 2 माताओं ने गवाही दी कि मीरा ने जानबूझकर परी की गर्दन पकड़ी थी। एक पड़ोसी बच्चे ने बताया कि मीरा ने कहा था, “आज इसे असली दुनिया दिखाती हूँ।” प्रधानाचार्या ने लिखकर दिया कि वीडियो के बाद परी स्कूल में चुप रहने लगी थी।

इंटरनेट वाला वीडियो हटवाने में 10 दिन लगे। उन 10 दिनों में नंदिता हर रात स्क्रीन देखती रही, मानो हर शेयर उसकी बच्ची के चेहरे पर एक और धक्का हो। फिर एक वकील की मदद से नोटिस भेजा गया। मीरा को लिखित माफ़ी देनी पड़ी और यह वचन देना पड़ा कि वह परी की कोई तस्वीर या वीडियो कभी प्रकाशित नहीं करेगी। उसे स्कूल में बिना अनुमति प्रवेश से भी रोका गया।

लेकिन असली विस्फोट अभी बाकी था।

रोहित ने अचानक रिया की पितृत्व जाँच की माँग कर दी। शायद उसे लगा कि मीरा से बदला लेना है। शायद वह अपनी चोट को सच का नाम देना चाहता था। मीरा घबरा गई। विनय टूट गया। नंदिता चुप रही, क्योंकि अब उसे समझ आ गया था कि कुछ लोग बच्चों को प्यार नहीं करते, उन्हें अपनी जीत और हार का प्रमाण बना लेते हैं।

3 हफ्ते बाद रिपोर्ट आई।

रिया रोहित की बेटी नहीं थी।

वह विनय की भी जैविक बेटी नहीं थी।

मीरा ने 3 पुरुषों से अलग-अलग झूठ बोले थे। रोहित से पैसे लिए थे, विनय से घर और नाम लिया था, और रिया से बचपन। रिया का जैविक पिता जयपुर के एक व्यापार मेले में मिला व्यक्ति निकला, जिसने साफ कह दिया कि उसे कुछ पता नहीं था और वह अभी “इस जिम्मेदारी के लिए तैयार” नहीं है।

नंदिता ने जब यह सुना, तो उसे रोहित की याद आई। अलग शहर, अलग आदमी, वही वाक्य। कुछ पुरुष शायद कायरता की भाषा एक ही जगह से सीखते हैं।

रोहित ने नंदिता को करोल बाग के एक छोटे कैफे में मिलने बुलाया। वह गया तो था पछतावे का चेहरा लेकर, लेकिन नंदिता अब पछतावे और प्रेम का फर्क जानती थी। वह उसके सामने बैठा, बिना चाय मँगाए बोला—

—मीरा ने मुझे धोखा दिया। इतने साल मैं समझता रहा रिया मेरी है। मैं पैसे भेजता रहा। मैं उसे घुमाने ले जाता था। उसने मुझे बेवकूफ बनाया।

नंदिता ने उसकी आँखों में देखा।

—तुम्हें दुख इसलिए है कि तुम्हें धोखा मिला। मुझे दुख इसलिए था कि मेरी बेटी को पिता नहीं मिला।

—मैं गलती सुधारना चाहता हूँ।

—गलती? परी कोई पुराना बिल नहीं है जिसे देर से जमा कर दो।

रोहित की आँखें भर आईं।

—मैं उससे मिलना चाहता हूँ।

—तुम अदालत के ज़रिए आवेदन करोगे। बाल मनोवैज्ञानिक के सामने मिलोगे। धीरे-धीरे। मेरी बेटी तुम्हारी टूटी हुई मर्दानगी की पट्टी नहीं बनेगी।

—तुम बहुत कठोर हो गई हो।

नंदिता ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

—नहीं। मैं पहली बार साफ हो गई हूँ।

परी की हालत धीरे-धीरे सुधरी, पर ज़ख्म जल्दी नहीं भरे। वह जन्मदिन का शब्द सुनते ही चुप हो जाती। केक देखकर पीछे हट जाती। स्कूल में अगर कोई मोबाइल उठाता, तो वह चेहरा छिपा लेती। नंदिता उसे बाल परामर्श केंद्र ले गई। शुरुआत में परी कुछ नहीं बोलती थी। वह कागज़ पर घर बनाती थी, जिसकी खिड़कियाँ बंद होती थीं। फिर फोन बनाती थी, जिनमें आँखें होती थीं। फिर एक दिन उसने एक छोटा चित्र बनाया—एक लड़की टूटी प्लेट के सामने खड़ी थी, और उसके पीछे एक बहुत बड़ी औरत थी, जिसके हाथ दीवार जैसे फैले थे।

परामर्शदाता ने नंदिता से धीरे कहा—

—बड़ी औरत आप हैं।

नंदिता बाहर आकर वॉशरूम में रोई। वह रोना हार का नहीं था। वह उस माँ का रोना था जिसने खुद को हमेशा छोटी समझा था, पर बेटी की नज़र में वह किला निकली।

रिया को अस्थायी रूप से विनय की देखरेख में रखा गया। अदालत और बाल कल्याण विभाग ने पाया कि रिया का स्थिर सहारा वही आदमी था जिसने उसे बिना खून के रिश्ता माने पाला था। मीरा के खिलाफ आर्थिक धोखाधड़ी, धमकी और बच्चे के हितों से खिलवाड़ की जाँच शुरू हुई। मोहल्ले में जो लोग पहले मीरा की चमकदार साड़ी और अंग्रेज़ी बोलने पर मोहित थे, अब उससे नज़र चुराने लगे।

एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद रिया भागते हुए विनय से लिपट गई।

—आप अभी भी मेरे पापा हो?

विनय सड़क किनारे बैठ गया, लोगों की परवाह किए बिना।

—जब तक तू चाहेगी, मैं तेरा पापा रहूँगा।

परी पास खड़ी थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। दोनों बच्चियाँ कुछ नहीं बोलीं। कभी-कभी बच्चे बड़ों से ज्यादा समझदार होते हैं। उन्हें पता था कि झूठ किसने बोला, चोट किसने दी, और दोस्ती किसकी बचानी है।

मीरा ने बाद में नंदिता को लिखित माफ़ी भेजी। शब्द साफ-सुथरे थे, पर उनमें पश्चाताप कम और मजबूरी ज्यादा थी। नंदिता ने पत्र 1 बार पढ़ा, फिर फाइल में रख दिया। उसे बदला नहीं चाहिए था। उसे बस इतना चाहिए था कि कोई कागज़ कहे—परी की पीड़ा मज़ाक नहीं थी।

रोहित को परी से नियंत्रित मुलाकात की अनुमति मिली। पहली मुलाकात में वह बहुत महँगी गुड़िया लाया। परी ने डिब्बा देखा, फिर उसे देखा।

—आप हँसे थे जब मैं रोई थी?

रोहित का चेहरा उतर गया।

—मुझे माफ़ कर दो।

—माँ नहीं हँसी थी।

यह वाक्य कमरे में सबसे भारी था। रोहित ने पहली बार शायद समझा कि पिता बनना खिलौना खरीदना नहीं, बच्चे की चोट के समय उसके साथ खड़ा होना है।

नंदिता ने परी को रोहित से मिलने से कभी रोका नहीं, पर मजबूर भी नहीं किया। वह सच छिपाती नहीं थी, ज़हर भी नहीं भरती थी। उसने अपनी बेटी को इतना अधिकार दिया कि वह तय करे किसे अपने पास आने देना है। रोहित ने पैसे समय पर भेजना शुरू किया, कभी-कभी कार्ड भी लिखता। परी कुछ कार्ड पढ़ती, कुछ दराज़ में रख देती। नंदिता ने उसे कोई जवाब देने के लिए मजबूर नहीं किया।

महीने बीत गए। नंदिता और विनय की बातचीत बढ़ी, लेकिन किसी फिल्मी प्रेम कहानी की तरह नहीं। पहले बच्चों के टिफिन की बात। फिर स्कूल बस की। फिर सर्दी की दवाई। फिर एक रविवार पार्क में 2 चाय। दोनों ने धोखा झेला था। दोनों जल्दबाज़ी से डरते थे। इसलिए वे धीरे-धीरे चले, जैसे टूटी जमीन पर पैर रखते हुए।

परी और रिया फिर साथ खेलने लगीं। वे बालों की क्लिप बदलतीं, कॉपी में छोटे फूल बनातीं, और कभी-कभी जन्मदिन के बारे में योजनाएँ बनातीं।

—इस बार कोई मोबाइल नहीं होगा, परी कहती।

—और कोई मम्मी बेवकूफी करेगी तो मैं उसे बाहर भेज दूँगी, रिया कहती।

नंदिता सुनकर मुस्कुरा देती, लेकिन भीतर कहीं दर्द की एक पुरानी नस हिलती रहती।

परी के 7वें जन्मदिन पर नंदिता ने बड़ा केक नहीं मँगाया। परी ने खुद कहा था—

—मुझे पूरी और हलवा चाहिए। और बस वही लोग जिन्हें मेरी हँसी अच्छी लगती है, मेरा रोना नहीं।

घर में इस बार कम लोग थे। सीमा आंटी, 2 स्कूल की सहेलियाँ, रिया, विनय और पड़ोस की बुज़ुर्ग कमला जी, जिन्होंने उस कठिन समय में परी के लिए चुपचाप स्वेटर बुना था। मेज़ पर फोन रखने की अनुमति नहीं थी। नंदिता ने साफ कह दिया था—आज यादें आँखों में रहेंगी, इंटरनेट पर नहीं।

जब छोटी सी मोमबत्ती जलाई गई, परी कुछ पल चुप रही। उसने माँ की तरफ देखा।

—इस बार कोई मेरा सिर नहीं पकड़ेगा ना?

नंदिता का दिल जैसे 1 सेकंड को रुक गया। उसने मुस्कुराकर परी के कंधे पर हाथ रखा।

—नहीं, बेटा। यह तेरी साँस है। इसे कोई नहीं छुएगा।

परी ने मोमबत्ती बुझाई। तालियाँ धीरे-धीरे बजीं, जैसे सब जानते हों कि यह सिर्फ जन्मदिन नहीं, एक बच्ची की वापसी है। रिया ने उसका हाथ पकड़ा। विनय ने आँखें झुका लीं। नंदिता ने उस बुझती लौ को देखा और सोचा, एक बच्चा 1 पल में कितना कुछ खो सकता है—केक, कपड़े, भरोसा, पिता की कल्पना, दुनिया की सुरक्षा।

लेकिन फिर उसने परी को हँसते देखा।

हँसी छोटी थी, सावधान थी, पर सच थी।

उस दिन कोई वीडियो नहीं बना। कोई ताली इंटरनेट के लिए नहीं बजी। कोई अपमान मज़ाक बनाकर नहीं बेचा गया।

फिर भी अगर दुनिया को सच में कुछ देखना चाहिए था, तो वही दृश्य था—दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में, पूरी और हलवे की खुशबू के बीच, एक बच्ची फिर से हँसना सीख रही थी, और उसकी माँ उसके पीछे दीवार की तरह खड़ी थी।