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अपने ही 30वें जन्मदिन पर मंगेतर ने सबके सामने बचपन की दोस्त को चूमा, उसे पागल कहा—“तुम रोते हुए लौटोगी”, पर उसने अंगूठी कूड़ेदान में फेंककर ऐसी जिंदगी चुनी कि सबकी निगाहें शर्म से झुक गईं

PART 1

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अपने 30वें जन्मदिन की रात, अदिति ने अपने मंगेतर रोहन को सबके सामने निशा के होंठों पर हाथ रखकर चूमते देखा, और कमरे में बैठे 60 मेहमानों में से किसी ने संगीत बंद करने की हिम्मत नहीं की।

दक्षिण दिल्ली के वसंत कुंज वाले सामुदायिक हाल में गेंदे की मालाएँ, सुनहरी झालरें और केक की मेज अभी भी चमक रही थी। केक पर रोहन ने खुद लिखवाया था—“अदिति, 30, अब असली खुशियाँ शुरू।”

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अदिति ने माँ की चुनी हुई गहरे हरे रंग की साड़ी पहनी थी। माँ ने उसे 2 बार प्रेस किया था, क्योंकि उनकी इकलौती बेटी की सगाई के बाद पहला जन्मदिन था। सब रिश्तेदार, दफ्तर के लोग, पड़ोसी और रोहन के माता-पिता मौजूद थे। पर उस पल अदिति को लगा, जैसे पूरी भीड़ ने आँखें होते हुए भी अंधे होने का फैसला कर लिया हो।

खेल शुरू हुआ था मजाक में। “सच या हिम्मत।” बड़े लोग बच्चों की तरह हँस रहे थे। तभी रोहन के दोस्त ने कहा—

— रोहन, कमरे में जिस औरत से सबसे ज्यादा अपनापन हो, उसे चूमो।

अदिति ने सोचा, रोहन मजाक में उसकी तरफ आएगा। पर उससे पहले निशा उठी। वही निशा, जिसे रोहन हमेशा “बचपन की दोस्त”, “घर जैसी”, “बहन जैसी” कहता था। वही निशा, जो रात 11 बजे रोहन को रोते हुए बुलाती थी। वही निशा, जिसके लिए रोहन ने कई बार अदिति के साथ खाना रद्द किया था।

निशा धीरे से रोहन के पास गई। उसने अदिति के कंधे को ऐसे छुआ, जैसे रास्ते से पर्दा हटाती हो। फिर वह झुकी। रोहन पीछे नहीं हटा। उल्टा, उसने निशा की गर्दन पर हाथ रख दिया।

वह हाथ अदिति पहचानती थी। वही हाथ, जिससे वह उसे शांत करता था। वही हाथ, जिससे वह उसके सवालों को पागलपन कहकर दबा देता था।

चुंबन खत्म हुआ तो निशा हँसी।

— अरे अदिति, ऐसे मत देखो। खेल था। रोहन और मैं तो परिवार जैसे हैं।

कुछ लोगों ने सिर झुका लिया। अदिति की माँ की उँगलियाँ पर्स पर जम गईं। उसका छोटा भाई आरव कुर्सी से आधा उठ गया। लेकिन कोई नहीं बोला।

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रोहन मुस्कुराया।

— अदिति, ड्रामा मत शुरू करो। तुम जानती हो निशा ऐसी ही है।

अदिति ने धीरे से अपनी सगाई की अंगूठी उतारी। वह 6 महीने पहले इंडिया गेट के पास रोहन ने पहनाई थी, यह कहते हुए कि अब उनके बीच कोई तीसरा नहीं आएगा।

वह निशा के पास गई, उसका हाथ पकड़ा और अंगूठी उसकी उँगली में पहना दी।

अंगूठी बिल्कुल फिट आई।

— बधाई हो, अदिति ने शांत आवाज में कहा। शादी की तारीख बता देना, कपड़े समय से सिलवा लूँगी।

कमरे की हवा चटक गई।

रोहन चीखा—

— तुम पागल हो गई हो क्या?

अदिति ने पहली बार उसकी आँखों में बिना डर देख कर कहा—

— नहीं। बहुत दिनों बाद होश में आई हूँ।

निशा ने अंगूठी उतारी और अदिति की तरफ फेंक दी। अंगूठी उसके गाल से टकराकर फर्श पर गिर गई।

— अपनी चीज संभालो, निशा फुफकारी। हर बात में बेचारी मत बनो।

अदिति ने अंगूठी उठाई, रसोई के कोने में रखे कूड़ेदान का ढक्कन खोला और उसे तेल लगी प्लेटों, टूटे पापड़ और केक के टुकड़ों के बीच छोड़ दिया।

— अगर वह चुंबन कुछ नहीं था, उसने कहा, तो यह अंगूठी भी कुछ नहीं है।

रोहन उसके पीछे आया, चेहरा लाल।

— कल रोते हुए वापस आओगी। हमेशा की तरह।

यही वाक्य था जिसने प्यार की आखिरी साँस भी रोक दी।

अदिति ने पर्स उठाया, हाल से बाहर निकली और ठंडी रात में बिना पीछे देखे चल दी। कुछ देर बाद, इंडिया गेट के पास सुनसान बेंच पर बैठकर उसने वह पुराना संदेश खोला, जो 8 महीने से फोन में पड़ा था।

“बेंगलुरु शोध संस्थान वाली जगह हमेशा इंतजार नहीं करेगी। तुम्हें बस खुद को चुनने की अनुमति देनी है।”

उसने काँपते हाथों से नंबर मिलाया।

उधर से उसकी पुरानी मार्गदर्शक डॉ. मीरा की नींद भरी आवाज आई—

— अदिति? इतनी रात को? सब ठीक है?

अदिति ने काले आसमान की तरफ देखा।

— मैम… वह जगह अभी भी खाली है?

चुप्पी के बाद जवाब आया—

— हाँ। लेकिन फैसला जल्दी चाहिए।

अदिति की आँखों से पहली बार आँसू निकले।

— तो शायद मैं तैयार हूँ।

PART 2

अगली सुबह रोहन मिठाई का डिब्बा लेकर अदिति के किराए के फ्लैट पहुँचा, जैसे माफी भी किसी महंगे डिब्बे में बंद करके दी जा सकती हो।

— बस करो अब, उसने कहा। कल तुम भावुक थीं। जन्मदिन, शादी का दबाव, सबके सामने माहौल… मैं समझता हूँ।

अदिति ने पूछा—

— तुम क्या समझते हो?

— कि तुम्हें भरोसा चाहिए। मैं नई अंगूठी खरीद दूँगा। सबको बोल देंगे पिछली खो गई।

— वह खोई नहीं थी। मैंने फेंकी थी।

रोहन की आवाज कठोर हो गई।

— 5 साल की बात एक चुंबन पर खत्म करोगी?

— नहीं। 5 साल की बेइज्जती आज खत्म कर रही हूँ।

वह हँसा।

— तुम्हें मेरे अलावा कौन झेलेगा?

पहले यह बात अदिति को तोड़ देती। आज उसने सिर्फ इतना कहा—

— मुझे झेला नहीं जाना। मुझे सम्मान चाहिए।

रोहन का चेहरा बदल गया।

— ठीक है। स्वतंत्रता का नाटक कर लो। निशा कम से कम जानती है कि कौन उसके लिए खड़ा रहता है।

वह दरवाजा पटककर चला गया।

2 दिन बाद अदिति विश्वविद्यालय पहुँची तो निशा सबके बीच खड़ी थी। उसकी उँगली में नई, चमकदार अंगूठी थी।

— रोहन ने दी है, निशा बोली। उस रात की गलती के लिए। बस दोस्ती में।

अदिति ने उसका हाथ देखा और शांत स्वर में कहा—

— दोस्ती में अंगूठियाँ नहीं मिलतीं, निशा। वे बस नाम बदलकर रिश्ते छिपाए जाते हैं।

तभी पीछे काँच के दरवाजे पर रोहन खड़ा था। पहली बार शर्म अदिति पर नहीं, उन दोनों पर गिर रही थी।

PART 3

उस दिन के बाद विश्वविद्यालय के गलियारों में फुसफुसाहट की दिशा बदल गई। पहले लोग कहते थे अदिति बहुत शक करती है। अब लोग कहते थे, शायद अदिति ने जो देखा था, वह अकेली नहीं देख रही थी। कुछ लोग अब भी तमाशा चाहते थे, कुछ लोग चुपचाप उसके पास आकर कहते—“तुमने सही किया।” पर अदिति को किसी की जीत नहीं चाहिए थी। उसे बस अपनी आवाज वापस चाहिए थी।

डॉ. मीरा ने उसे अपने कमरे में बुलाया। लकड़ी की मेज पर फाइलें रखी थीं, खिड़की के बाहर अमलतास के पेड़ पीले फूल गिरा रहे थे।

— बेंगलुरु वाला प्रस्ताव अभी भी मजबूत है, उन्होंने कहा। परिवार न्याय और विस्थापन पर 2 साल का प्रोजेक्ट है। तुम्हारा नाम मैंने पहले ही सुझाया था, लेकिन तुमने मना कर दिया था।

अदिति ने आँखें नीची कर लीं।

— मैंने मना नहीं किया था, मैम। मैंने रोहन से पूछकर खुद को रोक लिया था।

डॉ. मीरा ने चश्मा उतारा।

— कभी-कभी हम अपने फैसले किसी और की सुविधा के नाम पर दफना देते हैं, और फिर उसे प्यार समझ लेते हैं।

अदिति के भीतर कुछ काँपा। वह रोना नहीं चाहती थी, पर आँखें भर आईं।

— अगर मैं चली गई तो सब कहेंगे मैं भाग गई।

— भागना वह होता है जब आदमी डर से जाता है। तुम देर से सही, अपने पास लौट रही हो।

उस शाम अदिति घर पहुँची तो माँ पहले से बैठी थीं। उनके हाथ में वही हरा पल्लू था, जिसे जन्मदिन की रात उन्होंने गर्व से उसके कंधे पर ठीक किया था।

— तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि बात इतनी खराब है? माँ ने धीरे से पूछा।

अदिति चुप रही। फिर बोली—

— क्योंकि मुझे डर था आप कहेंगी छोड़ दे, और मुझे पता था कि मेरे पास छोड़ने की ताकत नहीं होगी।

माँ की आँखों में आँसू आ गए।

— बेटी, हमने तुझे इसीलिए नहीं पाला कि तू किसी के घर की इज्जत बचाते-बचाते अपनी इज्जत भूल जाए।

अदिति माँ के घुटनों से लगकर रो पड़ी। वह रोना रोहन के लिए नहीं था। वह उन 5 सालों के लिए था, जिनमें उसने हर चोट को “गलतफहमी” कहकर निगल लिया था।

अगले हफ्ते उसे कई चीजें एक साथ करनी पड़ीं। शादी के कार्ड रद्द हुए। बैंक्वेट हाल की बुकिंग रद्द हुई। रिश्तेदारों के फोन आए। कुछ ने कहा लड़की को इतना अहंकार ठीक नहीं। कुछ ने पूछा सच क्या है, जैसे सच उन्हें मिलते ही वे न्याय करेंगे। रोहन की माँ ने फोन कर कहा—

— हमारी बिरादरी में ऐसी बातें बाहर नहीं जातीं। माफी माँग ले, घर बस जाएगा।

अदिति ने पहली बार बिना आवाज काँपे जवाब दिया—

— घर अपमान पर नहीं बसता, आंटी। बसता है तो जेल बन जाता है।

फोन कट गया।

आरव ने उसी शाम उसके सामने चाय रखी और कहा—

— दीदी, मैंने उस रात का वीडियो सेव कर लिया था।

अदिति चौंकी।

— कौन सा वीडियो?

— वही खेल वाला। जब रोहन भैया ने निशा को चूमा। जब सबने तुम्हें पागल कहा। जब उसने बोला तुम रोते हुए लौटोगी।

अदिति ने फोन हाथ में लिया। स्क्रीन पर वही रात जिंदा थी। हँसी, संगीत, चुंबन, निशा की बनावटी मासूमियत, रोहन का तिरस्कार। अदिति ने वीडियो बंद कर दिया।

— इसे कहीं मत डालना, उसने कहा।

आरव भड़क गया।

— क्यों? सबको पता चलना चाहिए।

— नहीं। मैं अपनी मुक्ति को उनकी बर्बादी का तमाशा नहीं बनाऊँगी। यह मेरे पास रहेगा, ताकि अगली बार कोई मुझे मेरे ही दर्द पर शक करवाने की कोशिश करे तो मैं खुद से झूठ न बोलूँ।

आरव चुप हो गया। फिर उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

— बस इतना वादा करो कि वापस नहीं जाओगी।

अदिति ने कहा—

— अब नहीं।

लेकिन रोहन इतनी आसानी से हार मानने वालों में नहीं था। वह उसके दफ्तर के बाहर खड़ा होने लगा। कभी फूल भेजता, कभी लंबे संदेश लिखता, कभी पुरानी तस्वीरें भेजता। एक दिन उसने लिखा—“निशा मेरे लिए कुछ नहीं है। तुम ही मेरी सब कुछ हो।”

अदिति ने उस संदेश को देर तक देखा। अगर वह सच था, तो चोट और गहरी थी। क्योंकि इसका मतलब था, उसने उसे किसी गैरजरूरी चीज के लिए तोड़ा था।

उसने सिर्फ 1 जवाब भेजा—

“तुमने जिसे कुछ नहीं कहा, उसी के लिए मुझे बार-बार छोटा किया। अब मैं तुम्हारे शब्द नहीं, तुम्हारे कर्म मानूँगी।”

उसके बाद उसने नंबर रोक दिया।

विश्वविद्यालय में निशा ने एक बार उसे सीढ़ियों पर रोका। उसके चेहरे पर अब पहले वाली विजयी चमक नहीं थी।

— अदिति, मैं चाहती हूँ हम बात करके ठीक से अलग हों। मैंने कभी तुम्हारी जगह लेना नहीं चाहा।

अदिति ने उसे ध्यान से देखा। उसे लगा, निशा सच नहीं बोल रही, पर अब वह उससे लड़ने लायक भी नहीं रही।

— तुम मेरी जगह लेना चाहती थीं, जब उस जगह से तुम्हें अहमियत मिलती थी। बस तुम उस चोरी का नाम दोस्ती रखना चाहती थीं।

निशा के पास जवाब नहीं था।

उसी सप्ताह अदिति के फ्लैट में नया किरायेदार आया। तीसरी मंजिल पर सामान चढ़ाते समय एक किताबों का बक्सा सीढ़ी पर फट गया। किताबें बिखर गईं। अदिति मदद करने झुकी तो सामने वाला आदमी हँस पड़ा।

— अदिति शर्मा?

वह ठिठक गई।

— कबीर?

कबीर मल्होत्रा। जयपुर के स्कूल का दोस्त। वही लड़का जिसके साथ अदिति ने 10वीं तक विज्ञान की कॉपियाँ बाँटी थीं, जिसके साथ वह स्कूल की छत पर खड़े होकर कहती थी कि वह एक दिन बड़े शहरों में शोध करेगी, दुनिया देखेगी, और किसी से इजाजत लेकर नहीं जिएगी। फिर उसके पिता का तबादला हो गया था और दोनों छूट गए थे।

— तू यहाँ? अदिति के मुँह से निकला।

— दिल्ली में नई नौकरी। शहरी योजनाकार हूँ। तीसरी मंजिल पर नया कैदी। और तू?

अदिति मुस्कुराई, पर मुस्कान में थकान थी।

— दूसरी मंजिल पर पुरानी कैदी। लेकिन ज्यादा दिन नहीं।

कबीर ने “क्यों” नहीं पूछा। यही बात उसे छू गई। इतने सालों बाद कोई उसके दुख का दरवाजा तोड़कर अंदर नहीं घुसा।

धीरे-धीरे उनकी बातें बढ़ीं। सीढ़ियों पर, चाय की दुकान पर, कभी किताब लौटाने के बहाने। कबीर उसे उसके पुराने नामों से बुलाता—“जिद्दी प्रोफेसर”, “छोटी क्रांतिकारी।” वह उसे याद दिलाता कि वह कभी कितनी जोर से हँसती थी। अदिति को अजीब लगता था कि कोई उसे उसके टूटे हुए रूप से पहले भी जानता था।

एक शनिवार शाम विश्वविद्यालय के साथियों ने हौज खास के एक घर में छोटा सा मिलना रखा। अदिति नहीं जाना चाहती थी। उसे डर था रोहन वहाँ होगा। फिर उसने खुद से कहा—क्यों हर कमरा वही छोड़े जहाँ दूसरों ने गलत किया हो?

कबीर ने कहा—

— चाहो तो मैं साथ चल सकता हूँ। पानी का गिलास पकड़ूँगा, मूर्ख सवालों पर भौंह चढ़ाऊँगा, और जरूरत पड़ी तो नकली खाँसी से माहौल तोड़ दूँगा।

अदिति हँस पड़ी।

वे पहुँचे तो रोहन सचमुच वहाँ था। निशा भी थी, उसके बिल्कुल पास। रोहन की नजर कबीर पर अटक गई।

— यह कौन है?

अदिति ने सहजता से कहा—

— पुराना दोस्त।

रोहन का चेहरा कस गया।

— जल्दी आगे बढ़ गई तुम।

— तुम्हें इससे परेशानी हो रही है, यह दिलचस्प है।

निशा ने धीरे से कहा—

— छोड़ो रोहन, वह बस तुम्हें जलाना चाहती है।

अदिति ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे अब हर झूठ का उत्तर देना जरूरी नहीं लगता था।

कुछ देर बाद फिर वही खेल शुरू हुआ—“सच या हिम्मत।” अदिति के भीतर पुरानी रात की ठंड उतर आई। वह उठना चाहती थी, पर कबीर ने धीरे से पूछा—

— चलें?

अदिति ने सिर हिला दिया।

— नहीं। मैं हर बार इसलिए नहीं जाऊँगी कि दूसरे लोग मर्यादा भूल जाते हैं।

खेल चलता रहा। फिर किसी ने कबीर से कहा—

— कमरे की सबसे खूबसूरत लड़की को चूमो।

सन्नाटा फैल गया। रोहन आगे झुका। निशा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, जैसे उसे फिर तमाशे की उम्मीद हो।

कबीर ने अदिति की तरफ देखा। वह तुरंत नहीं झुका। उसने उसकी आँखों में पूछा, बिना शब्दों के। वह इंतजार ही अदिति को भीतर तक हिला गया। उसके लिए अनुमति माँगी जा रही थी, तमाशा नहीं बनाया जा रहा था।

अदिति ने हल्का सा सिर हिलाया।

कबीर ने उसके माथे के पास, बहुत धीरे, लगभग हवा जितना हल्का चुंबन रखा। उसमें लालच नहीं था, दावा नहीं था, सिर्फ सम्मान था।

रोहन खड़ा हो गया।

— यह क्या बदतमीजी है? अदिति मेरी मंगेतर है!

अदिति भी खड़ी हुई। आवाज शांत थी।

— नहीं, रोहन। मैं उस रात तुम्हारी मंगेतर रहना बंद कर चुकी थी, जब तुमने निशा को चूमा और मुझे अपने दर्द के लिए शर्मिंदा किया।

— हमें बात करनी है।

— 5 साल थे तुम्हारे पास सच बोलने के लिए।

— तुम पछताओगी।

अदिति ने उसकी ओर देखा।

— शायद। लेकिन मैं अपनी चुनी हुई गलती पर पछताना पसंद करूँगी, बजाय उस जिंदगी में रहने के जहाँ मुझे रोज खुद से नफरत करनी पड़े।

वह कबीर के साथ बाहर आ गई। रात ठंडी थी। सड़क किनारे मोमोज़ वाले की भाप उठ रही थी, ऑटो वाले आवाज लगा रहे थे, दिल्ली अपनी शोर भरी बेरहमी में चलती रही।

तभी उसके फोन पर संदेश आया।

“बेंगलुरु संस्थान ने पुष्टि कर दी है। सोमवार शाम 6 बजे तक अंतिम जवाब चाहिए। तुम्हारा चयन प्राथमिक सूची में है।”

कबीर ने उसका चेहरा देखा।

— जरूरी है?

अदिति ने स्क्रीन बंद की।

— मेरी जिंदगी मुझे वापस बुला रही है।

कबीर ने जेब में हाथ डाले कहा—

— तो उसे इंतजार मत करवाओ।

सोमवार सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर अदिति ने जवाब भेज दिया। कोई बड़ा दृश्य नहीं हुआ। न आसमान फटा, न संगीत बजा। बस लैपटॉप की स्क्रीन पर “भेजा गया” दिखा और अदिति को लगा, जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की खुल गई हो।

उसी दोपहर रोहन विश्वविद्यालय के बाहर मिला।

— मुझे बेंगलुरु के बारे में पता है।

अदिति ने पूछा भी नहीं कैसे। रोहन हमेशा उसके आसपास खबरें बटोरने वाले लोग रखता था।

— मैं 3 हफ्ते में जा रही हूँ।

— तो यही है? 5 साल फेंक दिए क्योंकि तुम्हें साबित करना है कि तुम मजबूत हो?

— मैं कुछ साबित नहीं कर रही। मैं काम करने जा रही हूँ।

— तुम भाग रही हो।

— नहीं। मैं अपने पास लौट रही हूँ।

वह कुछ पल चुप रहा। फिर बोला—

— निशा मायने नहीं रखती। मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

अदिति के भीतर पुरानी पीड़ा उठी, फिर बुझ गई।

— तब तो और दुख की बात है। तुमने उस औरत को खो दिया जो मायने रखती थी, किसी ऐसी के लिए जो तुम्हारे हिसाब से मायने ही नहीं रखती।

रोहन की आँखें झुक गईं। पहली बार वह छोटा लगा। अदिति को उस आदमी पर दया आई, जिसे उसने कभी अपना भविष्य समझा था। लेकिन दया वापसी का कारण नहीं बन सकती थी।

अगले 3 हफ्ते थकाने वाले थे। अदिति ने फर्नीचर बेचा, किताबें बाँधी, किराए का नोटिस दिया, शादी की खरीदारी के कपड़े लौटाए। माँ शाम को आतीं और चुपचाप बर्तन समेटतीं। एक दिन उन्होंने अलमारी से लाल सगाई वाली साड़ी निकाली और पूछा—

— इसका क्या करें?

अदिति ने उसे देखा। कभी यह साड़ी उसे दुल्हन बनने के करीब लगती थी। अब यह किसी और लड़की की चीज लगती थी।

— किसी संस्था में दे दो। शायद किसी लड़की को सच में खुशी मिले इसे पहनकर।

माँ ने साड़ी मोड़ दी।

— तू खुश रहेगी न वहाँ?

अदिति ने सच कहा—

— शुरुआत में शायद नहीं। लेकिन वहाँ दुख मेरा होगा, किसी और के झूठ से बना हुआ नहीं।

जाने से 1 दिन पहले कबीर नीचे चाय और गरम जलेबी लेकर खड़ा था।

— विदाई में मिठास होनी चाहिए, उसने कहा।

— किसने कहा यह विदाई है?

कबीर मुस्कुराया।

— मैं उम्मीद कर रहा था तू सुधार देगी।

वे पास के पार्क तक चले। सुबह धुँधली थी। बुजुर्ग लोग टहल रहे थे, बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे, हवा में धूल और चाय की गंध थी।

— मुझे तुम पर गर्व है, कबीर ने कहा।

अदिति की आँखें भर आईं।

— मुझसे रुकने को मत कहना।

कबीर ने तुरंत कहा—

— कभी नहीं।

— क्यों?

— क्योंकि जो सच में प्यार करता है, वह तुम्हारी उड़ान को अपनी हार नहीं समझता।

इस बार अदिति रोई। पर यह रोना शर्म का नहीं था। यह उस राहत का था, जब कोई बिना सबूत माँगे दर्द को मान लेता है।

बेंगलुरु पहुँचना आसान नहीं था। नई भाषा के सुर, नई सड़कों की गंध, बारिश की अचानक बौछारें, अकेला कमरा, लंबा काम। कई रातें उसे दिल्ली की आवाजें याद आतीं—माँ की रसोई, आरव की हँसी, सड़क के गोलगप्पे। पर इस अकेलेपन में कोई उसे पागल नहीं कहता था। कोई उसकी सीमा को नाटक नहीं बोलता था।

वह काम में डूब गई। परिवार न्याय पर उसके शोध ने पहचान पाई। 1 लेख छपा, फिर 2। सम्मेलन में लोगों ने उसे सुना। डॉ. मीरा ने संदेश भेजा—

“देखा? तुम ज्यादा महत्वाकांक्षी नहीं थीं। तुम गलत जगह अटकी हुई थीं।”

अदिति ने वह संदेश छापकर अपनी डायरी में रख लिया।

कबीर से बातें जारी रहीं। कभी रोज, कभी 10 दिन बाद। वह दिल्ली की तस्वीरें भेजता, टूटी सड़कें, पुराने पेड़, मूर्खतापूर्ण बोर्ड, और लिखता—“प्रवासी जिद्दी प्रोफेसर, शहर अभी भी तुम्हें याद करता है।” उसने कभी शिकायत नहीं की कि वह दूर है। उसने कोई वादा नहीं माँगा। अदिति ने पहली बार जाना कि लगाव भी बिना रस्सी के हो सकता है।

रोहन के संदेश कुछ महीने आए। पहले पछतावा, फिर गुस्सा, फिर पुरानी तस्वीरें, फिर चुप्पी। एक सहकर्मी से पता चला कि निशा और रोहन में बड़ा झगड़ा हुआ था, क्योंकि निशा उस रिश्ते को नाम देना चाहती थी, जिसे रोहन अब भी “गलतफहमी” कहता था। अदिति को खुशी नहीं हुई। बस यह लगा कि वह आग लगने से पहले घर से बाहर आ गई थी।

1 साल बाद कबीर ने संदेश भेजा—

“3 दिन के लिए बेंगलुरु आ रहा हूँ। क्या बड़ी शोधकर्ता पुराने तीसरी मंजिल वाले आदमी के साथ चाय पीना स्वीकार करेगी?”

अदिति अपने कमरे में अकेली हँस पड़ी।

वे बारिश के बाद की शाम एक छोटे कैफे में मिले। कबीर भीगता हुआ अंदर आया, बालों से पानी झाड़ा और उसी पुराने संकोची मुस्कान से उसे देखा। जैसे 1 साल दूरी नहीं, बस एक लंबी साँस रहा हो।

कुछ देर बाद उसने पूछा—

— तुम खुश हो?

किसी ने यह सवाल इतने सीधे ढंग से लंबे समय से नहीं पूछा था।

अदिति ने उस जन्मदिन की रात को याद किया। केक, संगीत, अंगूठी, कूड़ेदान, रोहन की आवाज—“रोते हुए लौटोगी।” उसने उस बेंच को याद किया, जहाँ उसने अपनी जिंदगी को पहली बार फोन किया था।

फिर उसने कबीर की ओर देखा।

— हाँ। अब सच में।

कबीर ने मेज पर अपना हाथ खुला रखा। उसने उसका हाथ पकड़ा नहीं। बस इंतजार किया।

अदिति ने अपनी हथेली धीरे से उसके हाथ में रख दी।

उन्होंने उस दिन कोई बड़ी प्रतिज्ञा नहीं की। न शादी की बात, न भविष्य की शर्तें। उन्होंने बस यह तय किया कि वे धीरे चलेंगे, और शायद यही उनके बीच सबसे गंभीर वादा था।

कई साल बाद, जब अदिति बेंगलुरु के अपने छोटे घर में सुबह की बारिश सुनती और रसोई से कबीर की बनाई कड़क चाय की खुशबू आती, तो वह कभी-कभी उस जन्मदिन को याद करती। अब शर्म से नहीं। अब गुस्से से भी नहीं। एक अजीब, दर्द भरी कृतज्ञता से।

रोहन ने उसे सिखाया था कि चुप्पी की कीमत कितनी महंगी होती है। निशा ने सिखाया था कि कुछ लोग आपकी जगह तभी लेते हैं, जब आप खुद किनारे खड़े रहना स्वीकार कर लेते हैं। माँ ने सिखाया था कि घर लौटने में देर हो सकती है, पर दरवाजा बंद नहीं होता। कबीर ने सिखाया था कि प्रेम इंतजार कर सकता है, बिना कैद बनाए।

लेकिन उस रात कूड़ेदान का ढक्कन खोलने वाली अदिति खुद थी।

इसलिए जब कभी कोई पूछता कि क्या उसे सबके सामने सगाई की अंगूठी फेंकने का पछतावा है, अदिति हल्का सा मुस्कुराती।

क्योंकि चिकनी प्लेटों, टूटे पापड़ों और केक के टुकड़ों के बीच उसने शादी नहीं खोई थी।

वहीं उसने अपनी जिंदगी वापस पाई थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.