
भाग 1
आधी रात की मूसलाधार बारिश में जब करोड़ों की मालकिन अनाया मल्होत्रा अकेली अपनी पहियों वाली कुर्सी पर अर्जुन मेहता के टूटे बरामदे तक पहुँची, तो उसके होंठ काँप रहे थे और उसने सिर्फ 1 बात कही—
“मेरी आँखों में देखकर फिर से कहो।”
अर्जुन दरवाज़े पर क्रिकेट का बल्ला पकड़े खड़ा रह गया। सामने वही औरत थी, जिसका नाम मुंबई के बड़े कारोबारियों को डराने के लिए काफी था। वही औरत, जो बड़े-बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर करते समय कभी पलक तक नहीं झपकाती थी। लेकिन उस रात उसके बाल बारिश से भीगे थे, चेहरा सफेद पड़ा था, और उसकी आँखों में ऐसा डर था जैसे पूरी दुनिया जीतने के बाद भी वह किसी एक इंसान से हार गई हो।
मगर यह कहानी उस रात से शुरू नहीं हुई थी।
यह कहानी 3 साल पहले शुरू हुई थी, जब नैनीताल के पास एक छोटे कस्बे भीमताल में अर्जुन मेहता ने अपनी पत्नी मीरा को खो दिया था। मीरा सरकारी स्कूल में संगीत पढ़ाती थी। हँसती तो लगता था जैसे आँगन में तुलसी के पास रखी घंटी अपने आप बज उठी हो। उसके जाने के बाद घर में सिर्फ 2 चीजें बचीं—उसकी 6 साल की बेटी तारा और अर्जुन की चुप्पी।
तारा अब 9 साल की थी। अपनी माँ की तरह तेज, ज़िद्दी और सबकी आँखों में छिपी बात पढ़ लेने वाली। वह हर सुबह अर्जुन से पूछती—
“पापा, आपने नाश्ता किया या फिर वही झूठ बोलोगे कि दुकान पर खा लूँगा?”
अर्जुन मुस्कुराने की कोशिश करता, पर मुस्कान आधी ही रह जाती। वह कस्बे की सड़क के मोड़ पर “मेहता चाय घर” चलाता था। बड़ी जगह नहीं थी, बस 6 मेज़ें, पुरानी लकड़ी की कुर्सियाँ, दीवार पर मीरा की तस्वीर और काउंटर के पीछे अर्जुन का शांत चेहरा। लोग कहते थे, अर्जुन अच्छा आदमी है, पर पहले जैसा नहीं रहा। पहले वह सबकी बातों में हँसता था, अब सिर्फ सुनता था।
एक मंगलवार की दोपहर, जब बारिश के बाद पहाड़ों से ठंडी हवा उतर रही थी, दुकान का दरवाज़ा खुला। अर्जुन ने बिना देखे कहा—
“आ रहा हूँ।”
लेकिन सामने कोई साधारण ग्राहक नहीं थी।
काले रंग की साड़ी, महँगा शॉल, सधे हुए बाल, और पहियों वाली कुर्सी पर बैठी एक औरत। उसके साथ न कोई सहायक, न सुरक्षाकर्मी। उसने सीधे अर्जुन की ओर देखा और पूछा—
“यहाँ सबसे अच्छी चीज़ क्या मिलती है?”
अर्जुन ने कहा—
“अगर सच सुनना चाहें तो कड़क अदरक वाली चाय। अगर दिखावा चाहिए तो सामने वाली बड़ी दुकान।”
औरत ने पहली बार हल्का सा भौंह उठाया।
“मुझे सच पसंद है।”
उसने चाय पी। कप होंठों से हटाया और बहुत धीरे कहा—
“ठीक है… यह सच में अच्छी है।”
“मुझे पता है,” अर्जुन ने कहा।
“धन्यवाद नहीं कहोगे?”
“आपने तारीफ नहीं की। आपने सच माना।”
वह उसे देखती रह गई। जैसे किसी ने उसे पहली बार उसके नाम, पैसे या कुर्सी से अलग होकर देखा हो।
उस दिन उसने अपना नाम नहीं बताया। बस 1000 रुपये रखे और चली गई। अर्जुन ने पैसे वापस करने के लिए आवाज़ दी, पर वह मुड़ी नहीं। तारा ने शाम को नोट देखकर पूछा—
“कौन थी?”
अर्जुन ने कहा—
“पता नहीं।”
तारा ने तुरंत कहा—
“झूठ। आपको पता करना है।”
2 दिन बाद वह फिर आई। इस बार तारा दुकान में होमवर्क कर रही थी। उसने औरत को देखते ही पूछा—
“आप वही हो जिसने पापा को बड़ा नोट दिया था?”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“तारा…”
लेकिन अनाया ने पहली बार सचमुच मुस्कुराने की कोशिश की।
“तुम्हारे पापा ने रखा?”
“हाँ,” तारा बोली। “वो किसी का बड़ा नोट अपने लिए नहीं रखते। आपका रख लिया। शायद आप दिलचस्प हो।”
उस दिन अनाया मल्होत्रा ने अपना नाम बताया। वह मुंबई की एक बहुत बड़ी निर्माण और तकनीकी कंपनी की प्रमुख थी। 4 साल पहले एक सड़क दुर्घटना में उसके पैर जवाब दे गए थे। उसके बाद उसने अपनी कंपनी को और ऊँचा उठाया, पर अपने दिल के चारों तरफ लोहे की दीवार खड़ी कर ली।
फिर भी, वह भीमताल लौटती रही। हर मंगलवार। कभी व्यापार की थकान लेकर, कभी बोर्ड की लड़ाई, कभी सिर्फ एक कप चाय के लिए। अर्जुन उसकी बातें सुनता, पर दया नहीं करता। तारा उससे गणित पूछती, और अनाया उसे ऐसे समझाती जैसे किसी महँगे समझौते की सबसे कठिन धारा सुलझा रही हो।
धीरे-धीरे दुकान का एक कोना उसका हो गया। वह आती, फोन मेज़ पर उल्टा रखती, चाय पकड़ती और चुप हो जाती। अर्जुन जानने लगा कि वह कब नाराज़ है, कब थकी है, कब हँसना चाहती है पर खुद को रोक रही है।
दशहरा मेले के दिन अर्जुन ने उसे बुलाया नहीं था। बुलाना मानो स्वीकार करना था कि वह उसके जीवन में जगह रखती है। मगर वह आई। हरी साड़ी में, पहियों वाली कुर्सी पर, अकेली। तारा उसे देखकर भागी और बोली—
“आप आ गईं! अब आप जलेबी और रबड़ी पर फैसला करेंगी।”
उस शाम अनाया ने पहली बार खुलकर हँसी। अर्जुन ने उसे देखा और उसी क्षण समझ गया कि उसने खुद से जो वादा किया था—कि मीरा के बाद किसी को दिल में जगह नहीं देगा—वह टूट चुका है।
लेकिन उसी मेले में मीरा का बड़ा भाई विजय आ गया। उसने अनाया को ऊपर से नीचे तक देखा और अर्जुन से कहा—
“पहले बहन को खा गया, अब किसी अमीर अपाहिज औरत के सहारे बेटी पालने चला है?”
मेले की भीड़ जम गई। तारा रो पड़ी। अर्जुन का खून खौल उठा। अनाया का चेहरा पत्थर हो गया।
और अगले ही पल, एक अजनबी महिला अनाया के पास आई, कान में कुछ कहा, और अनाया बिना कुछ समझाए वहाँ से चली गई।
उस रात के बाद वह 14 दिन तक नहीं आई।
15वें दिन अर्जुन को पता चला कि अनाया सिंगापुर जा रही है।
और फिर, 8 दिन बाद, उसी रात बारिश के बीच उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई।
भाग 2
अनाया के गायब होने के बाद अर्जुन ने खुद को समझाया कि ऐसी औरतें छोटे कस्बों में ठहरने के लिए नहीं आतीं। वह बड़े शहरों, बड़े निर्णयों और बड़े अकेलेपन की दुनिया की थी। मगर हर मंगलवार 11 बजे वह अनजाने में वही कोना साफ कर देता, जहाँ वह बैठती थी। तारा ने 1 दिन पूछा—“पापा, आप उनकी कुर्सी क्यों ठीक कर रहे हो, जब वो आ ही नहीं रहीं?” अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया। उधर मुंबई में अनाया ने 14 दिनों में 3 बैठकें जीतीं, 2 समझौते बंद किए, पर हर कागज़ पर हस्ताक्षर करते समय उसे चाय की भाप और तारा का गणित याद आता रहा। उसकी सहायक राधिका ने आखिर कह ही दिया—“मैडम, आप किसी सौदे से नहीं, किसी इंसान से भाग रही हैं।” 15वें दिन अनाया मेहता चाय घर पहुँची। अर्जुन ने चाय रखी, पर आवाज़ में ठंडक थी—“2 हफ्ते।” अनाया ने कप पकड़ते हुए कहा—“मैं डर गई थी।” अर्जुन चुप रहा। वह बोली—“मुझे किसी की जरूरत महसूस होना नहीं आता। दुर्घटना के बाद मैंने खुद को ऐसा बना लिया कि कोई मुझे कमजोर न समझे। लेकिन तुम्हारे यहाँ मैं कमजोर नहीं, इंसान लगती हूँ।” तभी उसने धीरे से कहा—“मैं सिंगापुर जा रही हूँ। 6 महीने के लिए। 8 दिन बाद।” अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया। अनाया ने पहली बार उसका हाथ छूने की हिम्मत की और बोली—“मैं जाने से पहले भागना बंद करना चाहती थी।” उसी शाम अर्जुन की बहन निशा ने उसे बताया कि अनाया ने उसे फोन कर मीरा के बारे में पूछा था, ताकि वह अर्जुन को सच में समझ सके। अर्जुन देर रात दुकान में अकेला खड़ा रहा, फिर फोन उठाकर अनाया को कॉल किया और पहली बार वह बात कह दी जिससे वह 3 साल से भाग रहा था—“मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
भाग 3
फोन के उस तरफ इतनी लंबी चुप्पी छा गई कि अर्जुन को लगा कॉल कट गया है। बाहर बूंदें दुकान की टीन की छत पर पड़ने लगी थीं। भीमताल की रातों में बारिश का शोर कभी-कभी किसी पुराने रोने जैसा लगता था। उसने फोन कान से हटाकर देखा, कॉल अभी भी चल रही थी।
फिर अनाया की आवाज़ आई, टूटी हुई, बिना उस लोहे जैसी मजबूती के जिससे वह बोर्डरूम हिला देती थी।
“मुझे… मुझे यह तुम्हारी आँखों में देखकर सुनना है।”
अर्जुन ने कहा—
“तो आ जाओ।”
“बारिश हो रही है।”
“पता है।”
“रात हो गई है।”
“पता है।”
“मैं 8 दिन में सिंगापुर जा रही हूँ।”
“अनाया,” अर्जुन ने धीरे कहा, “अगर भागना है तो अभी फोन काट दो। अगर जीना है तो आ जाओ।”
कुछ पल बाद सिर्फ चाबियों की आवाज़ आई। फिर कॉल कट गया।
अर्जुन दुकान बंद करके घर पहुँचा। तारा ऊपर अपने कमरे में थी, पर उसकी लाइट बंद नहीं थी। उसने दरवाज़े से झाँककर पूछा—
“कुछ होने वाला है?”
अर्जुन ने कहा—
“सो जाओ।”
“क्या अनाया आंटी आ रही हैं?”
अर्जुन ने उसे देखा।
तारा ने कंबल खींचते हुए संतोष से कहा—
“मतलब हाँ। अच्छा है। मैंने पहले ही कहा था, वो दिलचस्प हैं।”
रात 11:57 पर घर के सामने कार की रोशनी रुकी। अर्जुन दरवाज़े तक गया। दस्तक होने से पहले ही उसने दरवाज़ा खोल दिया।
अनाया सामने थी। बारिश से भीगी हुई। महँगी साड़ी का पल्लू कीचड़ से छू गया था। बाल बिखरे थे। चेहरे पर वह बनाई हुई शांति नहीं थी। पहियों वाली कुर्सी पर बैठी वह औरत, जिसे दुनिया अजेय समझती थी, उस पल इतनी असुरक्षित लग रही थी कि अर्जुन का सीना भर आया।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“कहो। फिर से कहो। मेरी आँखों में देखकर।”
अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया, ताकि उसकी आँखें अनाया की आँखों के बराबर हों।
“मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
अनाया ने आँखें बंद कर लीं। उसने जैसे साँस रोक रखी थी। फिर उसके गालों पर बारिश से अलग आँसू बहने लगे।
“मैंने बहुत कोशिश की,” वह बोली। “मैंने सोचा, अगर नहीं आऊँगी तो सब शांत हो जाएगा। अगर काम में डूब जाऊँगी तो तुम्हारा चेहरा भूल जाऊँगी। मैंने करोड़ों का सौदा बंद किया और पहली बार लगा कि मुझे बोर्ड को नहीं, तुम्हें बताना है। यह मेरे साथ कभी नहीं हुआ, अर्जुन। कभी नहीं।”
अर्जुन ने दरवाज़ा पूरा खोला।
“अंदर आओ।”
“मैं पूरी भीग गई हूँ।”
“मैंने देखा। अंदर आओ।”
वह भीतर आई। अर्जुन ने तौलिया दिया। उसने लिया, पर दोनों ने उस मदद को कोई बड़ा दृश्य नहीं बनने दिया। यही बात उसे अर्जुन के पास खींचती थी। वह उसकी कुर्सी नहीं देखता था, दया नहीं करता था, पर जरूरत पड़ने पर हाथ बढ़ाता था, जैसे यह जीवन का सामान्य हिस्सा हो।
कमरे में मीरा की तस्वीर लगी थी। अनाया ने पहली बार उसे इतने पास से देखा। तस्वीर में मीरा हँस रही थी, माथे पर छोटी लाल बिंदी, हाथ में सितार। अनाया कुछ देर उसे देखती रही।
“मैंने निशा से उसके बारे में पूछा,” उसने धीमे कहा। “मुझे डर था कि तुम्हें बुरा लगेगा।”
“लगा,” अर्जुन ने सच कहा। “फिर समझ आया कि तुम जानना चाहती थीं, कब्ज़ा नहीं करना।”
अनाया ने उसकी ओर देखा।
“मैं मीरा की जगह नहीं लेना चाहती।”
“कोई नहीं ले सकता।”
“और तारा?”
“तारा अपने फैसले खुद करती है। वह 9 साल की है, मगर खुद को 40 समझती है।”
ऊपर से हल्की सी आवाज़ आई, जैसे कोई दरवाज़े के पीछे हिला हो।
अनाया की आँखों में पहली बार पूरी मुस्कान आई।
“वह जाग रही है।”
“बिलकुल,” अर्जुन बोला। “और सुबह कहेगी कि उसे सब पहले से पता था।”
वे दोनों सोफे पर बैठे। बाहर बारिश खिड़कियों से टकरा रही थी। कुछ देर कोई नहीं बोला। फिर अनाया ने अपने हाथ मेज़ पर रखे। उसकी उंगलियाँ कसकर बंद थीं।
“मुझे डर लगता है,” उसने कहा। “तुमसे नहीं। इससे। इस बात से कि मैं किसी की प्रतीक्षा करूँगी। किसी की आवाज़ सुनकर दिन बदल जाएगा। किसी घर में लौटने की इच्छा होगी। दुर्घटना के बाद मैंने अपने आपको ऐसा बनाया कि कोई मुझे देखकर यह न कह सके कि यह औरत अधूरी है। मैंने सबको हरा दिया, अर्जुन। लेकिन जीतते-जीतते मैं अकेली हो गई।”
अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं भी अकेला हो गया था। मीरा के जाने के बाद मैंने समझा कि अगर किसी को दिल में जगह दूँगा तो फिर खो दूँगा। इसलिए मैंने तारा, दुकान और जिम्मेदारी को जीवन बना लिया। पर जिम्मेदारी जीवन नहीं होती। सिर्फ दीवार होती है।”
अनाया ने उसकी हथेली कसकर पकड़ ली।
“सिंगापुर जाना पड़ेगा।”
“जाओ।”
वह चौंकी।
“तुम रोक नहीं रहे?”
“प्यार रोकना नहीं है। लौटने की जगह देना है।”
उसने सिर झुका लिया।
“6 महीने।”
“6 महीने।”
“और अगर लौटकर मैं यहाँ रहना चाहूँ?”
अर्जुन ने बिना देर किए कहा—
“तो यह घर तुम्हारा भी होगा।”
“इतना आसान नहीं होगा। मेरा काम है। मेरी दुनिया है। लोग बोलेंगे। तुम्हारे रिश्तेदार बोलेंगे। मीरा के लोग बोलेंगे। तुम्हारी दुकान, मेरी कंपनी, मेरी कुर्सी, तुम्हारी बेटी—सबको बहाना मिलेगा।”
“बोलने दो।”
“विजय जैसे लोग तारा के सामने फिर कुछ कह सकते हैं।”
अर्जुन की आँखों में कठोरता उतर आई।
“उस दिन मैं चुप रहा क्योंकि तारा रो रही थी। अगली बार कोई मीरा, तारा या तुम्हारे बारे में गंदी बात करेगा तो उसे समझ आ जाएगा कि शांत आदमी कमजोर नहीं होता।”
अनाया ने पहली बार पूरी तरह उसे देखा। यह वही अर्जुन था जो चाय बनाता था, जो टूटा हुआ टिफिन ठीक करता था, जो बेटी को स्कूल छोड़ता था। मगर यह वही आदमी भी था जो अपने प्यार के सामने अब दीवार नहीं बना रहा था।
सुबह हुई तो बारिश रुक चुकी थी। पहाड़ धुले हुए लग रहे थे। रसोई में अर्जुन ने पराठे बनाए। अनाया उसकी पुरानी ऊनी शॉल ओढ़े मेज़ पर बैठी थी। उसका फोन मेज़ पर उल्टा रखा था, जैसे दुनिया इंतज़ार कर सकती हो।
तारा सीढ़ियों से उतरी, दरवाज़े पर रुकी, पहले अनाया को देखा, फिर अर्जुन को।
“आप रुक गईं।”
अनाया ने गंभीरता से कहा—
“हाँ।”
“सिर्फ रात के लिए या सच में?”
अर्जुन ने कहा—
“तारा…”
तारा ने हाथ उठाया।
“मैं जरूरी सवाल पूछ रही हूँ।”
अनाया ने उसकी ओर मुड़कर कहा—
“मैं 8 दिन बाद काम से सिंगापुर जा रही हूँ। 6 महीने के लिए। लेकिन लौटकर मैं यहाँ आना चाहती हूँ, अगर तुम्हें ठीक लगे।”
तारा ने कुर्सी खींची, बैठी और बोली—
“ठीक है। मगर हर रविवार मुझे गणित पढ़ाना होगा। पापा अंश और हर में गड़बड़ करते हैं।”
“मैंने कभी गड़बड़ नहीं की,” अर्जुन ने विरोध किया।
“आपने कहा था 1/2 और 1/3 बराबर लगते हैं क्योंकि दोनों छोटे हैं।”
अनाया हँस पड़ी। इस बार हँसी छिपी नहीं, आधी नहीं, रोकी हुई नहीं। वह पूरे कमरे में भर गई। अर्जुन ने उस आवाज़ को सुना और उसे लगा जैसे घर में बहुत दिनों बाद कोई खिड़की खुली हो।
नाश्ते के बाद अनाया को मुंबई लौटना था। कार में बैठने से पहले वह मीरा की तस्वीर के सामने रुकी। उसने हाथ जोड़कर बहुत धीरे कहा—
“मैं आपकी जगह नहीं ले रही। बस जिन लोगों को आपने प्यार किया, उनसे प्यार करना चाहती हूँ।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें भर आईं।
अनाया चली गई। अगले 8 दिन फोन, संदेश, तारा के गणित, अर्जुन की चाय और सिंगापुर की तैयारी में बीते। जब वह रवाना हुई, तारा ने उसे एक कॉपी दी, जिसके पहले पन्ने पर लिखा था—
“रविवार गणित बैठक।”
अनाया ने उसे ऐसे संभाला जैसे कोई बड़ा समझौता हो।
6 महीने आसान नहीं थे। समय का फर्क था, काम का दबाव था, अफवाहें थीं। मीडिया ने लिखा कि अनाया मल्होत्रा किसी पहाड़ी चायवाले के घर जाती है। विजय ने कस्बे में ज़हर फैलाने की कोशिश की कि अर्जुन बेटी के भविष्य के लिए अमीर औरत पकड़ रहा है। मगर इस बार अर्जुन चुप नहीं रहा। उसने तारा के स्कूल के बाहर विजय से साफ कहा—
“मीरा मेरी पत्नी थी, तारा मेरी बेटी है, और अनाया मेरी इज़्ज़त है। इनमें से किसी पर जुबान उठाई तो तुम्हें रिश्तेदारी के पीछे छिपने नहीं दूँगा।”
तारा ने उस दिन पहली बार पापा का हाथ कसकर पकड़ा और कहा—
“माँ होतीं तो यही कहतीं।”
सिंगापुर में अनाया ने वह विस्तार सफल कर दिया, जिसके लिए लोग कह रहे थे कि पहियों वाली कुर्सी पर बैठी औरत अंतरराष्ट्रीय काम नहीं संभाल पाएगी। उसने बोर्ड बैठक में सिर्फ आंकड़े नहीं रखे, वह तस्वीर भी रखी जो तारा ने भेजी थी—मेहता चाय घर के बाहर नई नेमप्लेट की। उस पर लिखा था—
“मेहता चाय घर—घर जैसी चाय।”
किसी ने पूछा—
“यह क्या है?”
अनाया ने कहा—
“याद दिलाने के लिए कि मैं किस जगह लौटना चाहती हूँ।”
6 महीने और 4 दिन बाद, एक सफेद कार भीमताल की उसी सड़क पर रुकी। तारा खिड़की से देख रही थी। उसने इतनी जोर से चिल्लाया कि अर्जुन के हाथ से चाय छलक गई।
“वो आ गईं!”
दरवाज़ा खुला। अनाया बाहर आई। इस बार कोई भारी शॉल, कोई बोर्डरूम वाला चेहरा नहीं। बस 2 सूटकेस, आँखों में थकान और होंठों पर वह मुस्कान, जो अब आधी नहीं रहती थी।
तारा दौड़कर बाहर गई।
“आप देर से आईं। 4 दिन।”
अनाया ने कहा—
“सिंगापुर से पहाड़ तक रास्ता लंबा था।”
“बहाने मत बनाइए। आज गणित है।”
अर्जुन दरवाज़े पर खड़ा था। अनाया ने उसकी ओर देखा।
“मैं लौट आई।”
अर्जुन ने कहा—
“मुझे पता था।”
“इतना भरोसा था?”
“हाँ।”
“क्यों?”
अर्जुन ने धीरे से कहा—
“क्योंकि इस बार तुम भागकर नहीं गई थीं। लौटने के लिए गई थीं।”
उस शाम मीरा की तस्वीर के नीचे 3 कप चाय रखे गए—अर्जुन का, अनाया का, और तारा का दूध कम, चीनी ज्यादा वाला कप। बाहर पहाड़ों पर धुंध उतर रही थी। दुकान बंद थी, घर खुला था।
2 टूटे हुए लोग पूरे नहीं हुए। मीरा लौटकर नहीं आई। अनाया के पैर चमत्कार से ठीक नहीं हुए। अर्जुन का डर एक रात में खत्म नहीं हुआ। मगर उन्होंने यह सीख लिया कि प्यार किसी को पूरा करने नहीं आता, वह बस इतना कहता है—तुम अधूरे हो तो भी मैं यहीं हूँ।
और उस रात, जब तारा होमवर्क करते-करते सो गई, अर्जुन ने देखा कि अनाया मीरा की तस्वीर के सामने दीया जला रही है। उसने कोई वादा ऊँची आवाज़ में नहीं किया, कोई नाटक नहीं किया। बस धीरे से बोली—
“अब यह घर खाली नहीं रहेगा।”
अर्जुन ने दरवाज़े से उसे देखा और समझ गया—कुछ प्रेम कहानियाँ तूफान में दरवाज़ा खटखटाकर शुरू होती हैं, पर उनका असली चमत्कार उस सुबह होता है जब कोई सचमुच लौट आता है।
Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.