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तलाक के 2 महीने बाद अस्पताल के गलियारे में नंगे पाँव भटकती पूर्व पत्नी ने सिर्फ उसका नाम दोहराया, और जब उसने पूछा “तुमने सच क्यों छिपाया”, टूटे रिश्ते के पीछे बच्चा खोने, डर और बहन की साजिश का सच खुल गया

PART 1

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तलाक के 2 महीने बाद अर्जुन मल्होत्रा ने अपनी पूर्व पत्नी मीरा को अस्पताल के गलियारे में नंगे पाँव भटकते देखा, और वह बार-बार सिर्फ उसका नाम पुकार रही थी।

सुबह के 6 बजे थे। दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी। अर्जुन ग्रेटर कैलाश के अपने छोटे से फ्लैट में चाय चढ़ा रहा था, जैसे हर सुबह खुद को यह समझाता था कि अब जिंदगी पटरी पर लौट रही है। तभी फोन बजा।

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—क्या आप अर्जुन मल्होत्रा बोल रहे हैं? आपकी पूर्व पत्नी पिछले 2 घंटे से हमारे अस्पताल में इधर-उधर चल रही हैं। वह किसी को पहचान नहीं रहीं, लेकिन आपका नाम दोहरा रही हैं।

अर्जुन के हाथ से चम्मच गिर गया।

मीरा शर्मा अब उसकी पत्नी नहीं थी। 2 महीने पहले साकेत की फैमिली कोर्ट में दोनों ने कागजों पर हस्ताक्षर किए थे। 7 साल का रिश्ता एक नीली फाइल में बंद हो गया था। न कोई चीख, न कोई आखिरी आलिंगन, न कोई सफाई। बस मीरा की झुकी हुई नजरें और अर्जुन का टूटा हुआ अहंकार।

—उन्होंने आपको इमरजेंसी संपर्क में लिखा है —नर्स ने कहा— कृपया जल्दी आइए।

अर्जुन के भीतर कड़वाहट उठी। तलाक से पहले मीरा महीनों उससे दूर हो चुकी थी। घर में चुप्पी, परिवार से दूरी, रिश्तेदारों के सामने फीकी मुस्कान, हर सवाल का एक ही जवाब—थक गई हूँ। अर्जुन ने उसे ठंडी, स्वार्थी और रिश्ते से भागने वाली औरत समझ लिया था। उसकी माँ अक्सर कहती थी, “बहू में घमंड है, घर-परिवार निभाना नहीं आता।” और अर्जुन आधा विरोध करता, आधा चुप रह जाता।

मैक्स अस्पताल तक का रास्ता 35 मिनट का था, पर अर्जुन को लगा जैसे वह अपने ही अतीत से गुजर रहा हो। करोल बाग की वह दुकान जहाँ मीरा ने पहली बार उसके लिए कुर्ता चुना था। लोधी गार्डन की वह शाम, जब उसने बिना सुर के गाना गाया था और खुद ही हँस पड़ी थी। फिर वही मीरा धीरे-धीरे बुझती चली गई थी।

तीसरी मंजिल के गलियारे में वह सचमुच नंगे पाँव चल रही थी।

नीली अस्पताल वाली ड्रेस उसके पतले शरीर पर ढीली लटक रही थी। बाल उलझे हुए थे। आँखें खुली थीं, मगर उनमें पहचान नहीं थी। जैसे कोई अपने ही शरीर के अंदर कैद होकर रास्ता खोज रहा हो।

—मीरा —अर्जुन की आवाज काँपी।

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वह ठिठक गई।

चेहरा उसकी तरफ मुड़ा। पहले खालीपन, फिर पहचान, फिर आँसुओं की एक खामोश धार।

—तुम आ गए —उसने फुसफुसाया।

अर्जुन के भीतर जमा शिकायतें होंठों तक आईं, पर उसके काँपते हाथ देखकर सब रुक गया।

—क्या हुआ तुम्हें?

मीरा ने पीछे देखा, जैसे कोई अब भी उसका पीछा कर रहा हो।

—मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें ऐसे पता चले।

तभी डॉक्टर नंदिता राव आईं। चेहरा शांत था, पर आँखों में सावधानी थी।

—हमें आपसे अलग बात करनी होगी।

कमरे के बाहर डॉक्टर ने बताया कि मीरा अपने ऑफिस में बेहोश हो गई थी। दिल की धड़कन असामान्य थी। शरीर में कई दवाओं का असर मिला था, जो लंबे समय से बिना ठीक निगरानी के ली जा रही थीं।

—दवाएँ? —अर्जुन ने अविश्वास से पूछा— मीरा ने कभी नहीं बताया।

डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा:

—उन्हें कई सालों से गंभीर घबराहट और डर के दौरे आते थे। लगता है उन्होंने अलग-अलग डॉक्टरों से दवाएँ लीं, लेकिन किसी को पूरी जानकारी नहीं दी। यह बहुत खतरनाक हो गया।

कई साल।

यह शब्द अर्जुन के सीने में पत्थर की तरह गिरा। वह 7 साल उसके साथ रहा था। एक ही घर, एक ही बिस्तर, एक ही रसोई, एक ही त्योहार। फिर भी वह उसके भीतर की इस लड़ाई से अनजान था।

जब वह वापस मीरा के पास गया, वह खिड़की के पास बैठी थी। बाहर बारिश की बूंदें शीशे पर बह रही थीं। वह किसी डाँटी हुई बच्ची जैसी लग रही थी।

—तुमने मुझे क्यों नहीं बताया? —अर्जुन की आवाज जरूरत से ज्यादा कठोर निकली।

मीरा ने आँखें झुका लीं।

—क्योंकि तुम पहले ही मुझसे थक चुके थे।

अर्जुन का दर्द गुस्से में बदल गया।

—हाँ, मैं थक गया था। मैं घर आता था और तुम बात नहीं करती थीं। माँ के बुलाने पर नहीं जाती थीं। पूजा, शादी, दीवाली, हर जगह तुम बहाने बनाती थीं। सब कहते थे तुम परिवार को नीचा समझती हो। मैंने कई बार तुम्हारा पक्ष लिया।

—मुझे पता है।

—तो सच क्यों नहीं बोला?

मीरा जवाब देती, उससे पहले गलियारे के अंत से एक औरत तेज कदमों से आई। महँगा सूट, गाढ़ा मेकअप, आँखों पर काला चश्मा। वह काव्या थी, मीरा की बड़ी बहन, जिसे अर्जुन ने शादी के बाद भी बहुत कम देखा था।

—अर्जुन, तुम इसमें मत पड़ो —काव्या ने आते ही कहा— यह हमेशा यही करती है। पहले सबको परेशान करो, फिर खुद पीड़ित बन जाओ।

मीरा कुर्सी पर सिकुड़ गई।

—दीदी, अभी नहीं…

—क्यों नहीं? —काव्या की आवाज तेज हो गई— पहले शादी बर्बाद की, फिर ऑफिस में तमाशा किया, अब पूर्व पति को बुलाकर बेचारा बन रही हो?

अर्जुन की मुट्ठियाँ कस गईं।

—वह अस्पताल में है। इंसानियत से बात कर सकती हैं आप?

काव्या हँसी।

—इंसानियत? इंसानियत तो तब होती जब यह सालों पहले सच बोलती। इसने सबकी जिंदगी खराब कर दी।

मीरा ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखों में डर था, लेकिन भीतर कहीं दबा हुआ लावा भी था।

—मैंने सबकी जिंदगी खराब नहीं की, दीदी। मैंने सिर्फ वह बोझ अकेले उठाया, जिसे तुम लोगों ने मुझे चुप रहकर उठाने पर मजबूर किया था।

गलियारे की हवा जम गई।

अर्जुन ने काव्या की आँखों में एक पल की घबराहट देखी।

और उसी पल उसे समझ आ गया कि तलाक इस कहानी का सबसे बड़ा दर्द नहीं था।

सबसे बड़ा सच अभी बाहर आना बाकी था।

PART 2

अर्जुन उस रात अस्पताल से नहीं गया।

कानूनी रूप से मीरा अब उसकी पत्नी नहीं थी। वह चाहे तो नर्स को नंबर देकर लौट सकता था। लेकिन उसके चेहरे पर शर्म नहीं, डर था। ऐसा डर, जो किसी एक बीमारी से नहीं, कई सालों की चुप्पी से पैदा होता है।

सुबह मीरा ने उसे अंदर बुलाया। वह थकी हुई थी, पर इस बार उसकी आँखें भाग नहीं रही थीं।

—मेरे घर में मानसिक बीमारी को कमजोरी समझा जाता था —उसने कहा— पापा कहते थे, यह सब दिमाग की नखरेबाजी है। माँ चुप रहने को कहती थीं। उनके जाने के बाद दीदी ने वही बात कानून बना दी।

—कब से शुरू हुआ?

मीरा की साँस अटक गई।

—हमारी शादी से पहले। लेकिन सबसे बुरा तब हुआ… जब बच्चा चला गया।

अर्जुन कुर्सी से जैसे उछल पड़ा।

—कौन सा बच्चा?

मीरा की आँखों से आँसू गिरने लगे।

—हमारे दूसरे साल में। तुम 3 हफ्ते मुंबई में प्रोजेक्ट पर थे। मुझे खून आया। मैं अकेली अस्पताल गई। बच्चा नहीं बचा। मैं तुम्हें बताना चाहती थी, पर तुम्हारी माँ की बातें कानों में गूंजती रहीं—घर को वारिस चाहिए, बहू में ही कमी होगी।

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसे याद आया, मीरा हर ताने पर मुस्कुरा देती थी। वह समझता था उसे फर्क नहीं पड़ता। वह मुस्कान दरअसल पट्टी थी, घाव नहीं।

तभी काव्या लौटी। हाथ में कपड़ों का बैग और एक फाइल थी।

—इन्हें साइन कर दो —उसने मीरा से कहा— जब तक तुम ठीक नहीं होतीं, तुम्हारे खाते और जयपुर वाली हवेली मैं संभाल लूँगी।

मीरा सख्त हो गई।

—मैं कुछ साइन नहीं करूँगी।

अर्जुन बीच में खड़ा हो गया।

—उसने मना किया है।

फाइल जमीन पर गिरी। कागज फैल गए। बैंक स्टेटमेंट, इस्तीफे का पत्र, और जयपुर की पुश्तैनी हवेली बेचने के कागज।

काव्या का चेहरा एक पल को उतर गया।

मीरा रो पड़ी।

—दीदी महीनों से कह रही थी कि मैं पागल हूँ। अगर मैंने विरोध किया तो वह मुझे अयोग्य साबित कर देगी।

काव्या झुककर मीरा के कान के पास आई, पर उसकी फुसफुसाहट अर्जुन ने साफ सुन ली।

—सब बोलोगी तो अर्जुन को यह भी बताना पड़ेगा कि तलाक असल में क्यों लिया था।

मीरा पत्थर हो गई।

अर्जुन ने धीमे से पूछा:

—क्यों?

उसकी चुप्पी किसी चीख से ज्यादा डरावनी थी।

PART 3

मीरा ने वह सच अगले दिन बताया।

अस्पताल के छोटे से बगीचे में धूप हल्की थी। बारिश के बाद मिट्टी की गंध हवा में थी। दूर चाय वाले की केतली सीटी दे रही थी। मीरा के कंधों पर शॉल थी, कदम धीमे थे, पर इस बार वह अर्जुन से छिप नहीं रही थी।

—तलाक मैंने इसलिए माँगा क्योंकि काव्या ने मुझे यकीन दिला दिया था कि मैं तुम्हें बर्बाद कर रही हूँ —उसने कहा— वह कहती थी, तुम एक सामान्य पत्नी के हकदार हो। ऐसी पत्नी, जो मेहमानों के सामने काँपे नहीं। ऐसी बहू, जो हर पूजा में बैठे। ऐसी औरत, जो बच्चा दे सके।

अर्जुन की आँखें भर आईं। काव्या ने जो कहा था, उसका आधा हिस्सा घर में पहले ही बोया जा चुका था। उसकी माँ के ताने, रिश्तेदारों की फुसफुसाहट, उसका अपना अधूरा बचाव—इन सबने मीरा को धीरे-धीरे यह विश्वास दिला दिया था कि वह कमी है, बोझ है, अपशकुन है।

—मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहती थी —मीरा ने कहा— लेकिन मुझे लगा अगर मैं चली जाऊँगी तो तुम्हें शांति मिल जाएगी।

—शांति? —अर्जुन की आवाज टूट गई— मैंने सोचा तुम मुझसे प्यार ही नहीं करतीं।

मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में इतनी थकान थी कि अर्जुन को लगा, यह औरत सालों से सोई ही नहीं।

—मैं तुमसे इतना प्यार करती थी कि चाहती थी तुम मुझे नफरत से याद करो, दया से नहीं।

अर्जुन के भीतर कुछ टूटकर शांत हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था। इतने साल वह खुद को धोखा देता रहा कि उसने पूरा प्रयास किया था। पर प्रयास और उपस्थिति अलग चीजें थीं। वह मीरा के पास था, पर उसके भीतर नहीं पहुँच पाया था।

उसी दोपहर अस्पताल की सोशल वर्कर ने मीरा से लंबी बात की। डॉक्टर नंदिता ने उसके उपचार, दवाओं की गड़बड़ी और पारिवारिक दबाव की रिपोर्ट बनाई। अस्पताल के कानूनी सहायता केंद्र से एक वकील, एडवोकेट राघव मेहता, बुलाया गया। उसने काव्या की फाइल देखी और तुरंत समझ गया कि मामला सिर्फ बहन की चिंता का नहीं था।

जयपुर के पुराने शहर में मीरा के माता-पिता की एक हवेली थी। बाहर से टूटी हुई लगती थी, पर वह चौड़ा प्लॉट अब करोड़ों का हो चुका था। पिता ने वसीयत में दोनों बेटियों को बराबर हिस्सा दिया था। काव्या महीनों से उसे एक बिल्डर को बेचना चाहती थी। मीरा ने मना किया था, क्योंकि उस हवेली में उसकी माँ की रसोई की महक, पिता की किताबें और उसके बचपन की आखिरी सुरक्षित यादें थीं।

तभी से काव्या ने उसे अस्थिर साबित करने की शुरुआत की थी।

कभी रिश्तेदारों के सामने कहती, “मीरा का दिमाग ठीक नहीं रहता।” कभी बैंक वालों से कहती, “छोटी बहन को कागज समझ नहीं आते।” कभी अर्जुन को फोन कर मीरा की चुप्पी को घमंड बताती। धीरे-धीरे उसने मीरा को दुनिया से अलग कर दिया। और जब तलाक हुआ, काव्या के लिए रास्ता और आसान हो गया।

—वह तुम्हें बचा नहीं रही थी —राघव ने साफ कहा— वह तुम्हारी कमजोरी को दस्तावेज बनाना चाहती थी।

मीरा ने पहली बार बिना रोए सिर हिलाया।

अर्जुन ने उसी शाम अपनी माँ से बात की। फोन पर पहले वही पुरानी आवाज आई—कठोर, घरेलू प्रतिष्ठा से भरी हुई।

—अब क्यों पड़े हो उसके चक्कर में? तलाक हो चुका है। ऐसी औरतें घर तोड़ती हैं।

अर्जुन ने पहली बार उसे बीच में रोका।

—नहीं माँ, घर उसने नहीं तोड़ा। हमने उसकी चुप्पी को आराम समझा, उसके डर को नाटक समझा और उसके दर्द पर ताने रख दिए। आपने उसे बच्चा न होने का दोष दिया, जबकि हमारा बच्चा खो चुका था।

दूसरी तरफ लंबे समय तक सन्नाटा रहा।

—मुझे पता नहीं था —माँ की आवाज धीमी पड़ी।

—क्योंकि आपने कभी जानना चाहा ही नहीं।

यह कहकर अर्जुन ने फोन काट दिया। उसके हाथ काँप रहे थे, पर भीतर एक अजीब सी हल्कापन था। देर से सही, उसने पहली बार मीरा के लिए सचमुच खड़ा होना सीखा था।

अगले कुछ हफ्ते आसान नहीं थे। मीरा को अस्पताल से छुट्टी मिली, लेकिन उसे नियमित उपचार में जाना पड़ा। दवाएँ डॉक्टर की निगरानी में बदली गईं। घबराहट के दौरे अभी भी आते थे। कई रातों में उसे लगता कि दिल रुक जाएगा। कई सुबह वह बिस्तर से उठ नहीं पाती। लेकिन अब फर्क था—अब उसका डर किसी गुप्त कमरे में बंद नहीं था।

अर्जुन हर समय उसके पास नहीं रहता था। उसने यह भी समझा कि मदद का मतलब पुराने रिश्ते को जबरदस्ती वापस लाना नहीं होता। वह डॉक्टर की अपॉइंटमेंट में साथ जाता, फिर दूरी भी रखता। मीरा की सहेली सना, जो सालों पहले उससे दूर हो गई थी, वापस आई। पड़ोस की आंटी, जो कभी उसकी चुप्पी को अकड़ समझती थीं, अब उसके लिए खाना भेजने लगीं। धीरे-धीरे मीरा ने मदद स्वीकार करना सीखा।

काव्या ने हार नहीं मानी। उसने रिश्तेदारों को फोन कर कहा कि मीरा को अर्जुन भड़का रहा है। उसने बिल्डर से कहा कि कागज जल्दी हो जाएंगे। उसने वकील को धमकाया कि परिवार की बदनामी होगी। लेकिन अब हर बात रिकॉर्ड में थी। अस्पताल की रिपोर्ट, बैंक के मेल, बिल्डर से हुई बातचीत, बिना सहमति तैयार किए गए कागज—सब सामने आने लगा।

1 महीने बाद जयपुर की हवेली के मामले में मीरा और काव्या की कानूनी बैठक हुई। कमरे में वकील थे, एक मध्यस्थ था, और अर्जुन बाहर बैठा था। मीरा ने कहा था कि यह लड़ाई उसे खुद लड़नी है।

दरवाजा आधा खुला था। अर्जुन ने मीरा की आवाज सुनी। वह धीमी थी, लेकिन काँप नहीं रही थी।

—मैं कोई कागज साइन नहीं करूँगी। हवेली बेचनी है या नहीं, इसका फैसला कानून और मेरी सहमति से होगा। मेरी बीमारी तुम्हारा हथियार नहीं बनेगी। और अगर तुमने मुझे फिर पागल कहकर नियंत्रित करने की कोशिश की, तो मैं पुलिस शिकायत करूँगी।

काव्या हँसी।

—तुम करोगी? तुम?

मीरा ने जवाब दिया:

—हाँ। वही मीरा, जिसे तुमने सालों चुप रखा।

कमरे में बैठे लोग शांत रहे। इस बार किसी ने काव्या की हँसी पर भरोसा नहीं किया।

वह मीरा की पहली जीत थी।

न्याय फिल्मी तरीके से नहीं आया। कोई नाटकीय गिरफ्तारी नहीं हुई, कोई चिल्लाता हुआ दृश्य नहीं बना। लेकिन काव्या को हवेली की बिक्री रोकनी पड़ी। उसके खिलाफ धोखाधड़ी और मानसिक दबाव की शिकायत दर्ज हुई। परिवार में जो लोग पहले मीरा को कमजोर कहते थे, अब धीरे-धीरे उससे नजर मिलाने में संकोच करने लगे। कुछ ने माफी माँगी, कुछ चुप रहे। मीरा ने दोनों को स्वीकार किया, पर किसी को फिर अपने मन का मालिक नहीं बनने दिया।

अर्जुन और मीरा ने फिर शादी नहीं की।

यह फैसला लोगों को अजीब लगा। कुछ ने कहा, “इतना सब हुआ, अब मिल ही जाओ।” कुछ ने कहा, “पूर्व पति इतना साथ दे रहा है तो भाग्य है।” लेकिन मीरा और अर्जुन जानते थे कि टूटा हुआ रिश्ता सिर्फ सच जान लेने से नया नहीं हो जाता। उनके बीच प्रेम था, पर उसमें पछतावा, थकान और खोए हुए वर्षों की राख भी थी।

उन्होंने एक नया रिश्ता बनाया—ईमानदार, सीमित, पर गहरा। अर्जुन अब उसे बचाने वाला नायक नहीं बनना चाहता था। मीरा भी किसी की दया पर टिकना नहीं चाहती थी। वे एक-दूसरे को दोष से नहीं, समझ से देखना सीख रहे थे।

6 महीने बाद मीरा ने ऑफिस फिर शुरू किया, लेकिन इस बार उसने काम के घंटे बदले। उसने अपने मैनेजर को सच बताया। पहले डर लगा कि लोग उसे अयोग्य समझेंगे। पर एक वरिष्ठ महिला ने सिर्फ इतना कहा:

—हमें पहले बताना चाहिए था। मदद कमजोरी नहीं होती।

मीरा रो पड़ी थी। वह रोना हार का नहीं, राहत का था।

वह हर रविवार इंडिया गेट के पास एक सहायता समूह में जाने लगी। वहाँ औरतें थीं—कोई ससुराल के तानों से टूटी थी, कोई नौकरी और घर के बीच पिस रही थी, कोई बच्चे के जन्म के बाद डर में जी रही थी। मीरा पहली बार समझी कि उसका दर्द अकेला नहीं था। भारत के बड़े-बड़े शहरों में, चमकदार अपार्टमेंटों और संयुक्त परिवारों के बीच, कितनी औरतें मुस्कान पहनकर अंदर से बिखरती रहती हैं।

1 साल बाद उसी अस्पताल ने मानसिक स्वास्थ्य पर एक छोटा कार्यक्रम रखा। डॉक्टर नंदिता ने मीरा से बोलने को कहा। पहले उसने मना कर दिया। फिर कई रातों की सोच के बाद वह तैयार हुई।

अर्जुन सभागार के आखिरी कोने में बैठा था।

मीरा मंच पर आई। सफेद सूती कुर्ता, खुले बाल, चेहरे पर हल्का डर, पर आँखों में साफ उजाला। उसने किसी महान भाषण की तरह शुरुआत नहीं की। बस कुछ पल खड़ी रही, फिर बोली:

—मैंने सोचा था कि अपना दुख छिपाकर मैं अपने परिवार की इज्जत बचा रही हूँ। लेकिन चुप्पी इज्जत नहीं बचाती, चुप्पी घरों को अंदर से बीमार कर देती है।

पूरा हॉल शांत था।

—मुझे बीमारी से ज्यादा इस बात ने तोड़ा कि लोग क्या कहेंगे। मैं पत्नी थी, बहू थी, बहन थी, लेकिन मुझे इंसान बनने की इजाजत देर से मिली। अब मैं बस इतना चाहती हूँ कि कोई भी औरत अपनी साँस रोककर मजबूत दिखने की कोशिश न करे।

अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले। उसे याद आया वह सुबह, जब फोन आया था। वह नंगे पाँव गलियारे में भटकती मीरा। वह फुसफुसाहट—तुम आ गए। तब उसे लगा था कि वह एक टूट चुकी औरत को देखने जा रहा है। आज समझ आया कि वह दरअसल एक ऐसी औरत से मिला था, जो टूटकर भी सच तक पहुँचने की ताकत बचाए हुए थी।

कार्यक्रम के बाद मीरा नीचे आई। दोनों अस्पताल के बाहर बरगद के पेड़ के पास खड़े हुए। शाम ढल रही थी। सड़क पर ऑटो रिक्शा की आवाजें, चाय की भाप और शहर की बेचैन धड़कन थी।

—धन्यवाद —मीरा ने कहा।

—किसलिए?

—उस दिन आने के लिए।

अर्जुन ने बहुत देर बाद जवाब दिया।

—काश मैं बहुत पहले आ गया होता। सिर्फ अस्पताल नहीं… तुम्हारे भीतर।

मीरा ने हल्की मुस्कान दी। उसमें दुख था, क्षमा भी थी, और एक ऐसी दूरी भी जिसे दोनों ने सम्मान से स्वीकार कर लिया था।

—देर हुई —उसने कहा— लेकिन बेकार नहीं गई।

कभी-कभी जिंदगी सच तब दिखाती है जब खोई हुई चीज वापस नहीं मिल सकती। अर्जुन अपना विवाह नहीं बचा पाया। मीरा अपने खोए हुए बच्चे, अपने चुप्पी भरे साल और अपने टूटे भरोसे वापस नहीं ला पाई। लेकिन दोनों ने यह सीख लिया कि किसी के बदल जाने का मतलब हमेशा प्रेम खत्म होना नहीं होता। कभी-कभी कोई इंसान भीतर ऐसी लड़ाई लड़ रहा होता है, जिसका शोर बाहर तक पहुँच ही नहीं पाता।

उस सुबह अस्पताल में अर्जुन ने सिर्फ अपनी पूर्व पत्नी को नंगे पाँव गलियारे में भटकते नहीं देखा था।

उसने अपनी अंधी जगहें देखी थीं।

और मीरा ने सिर्फ बीमारी से बाहर आने की शुरुआत नहीं की थी।

उसने अपनी आवाज वापस ली थी।

उस दिन के बाद अर्जुन जब भी किसी चुप चेहरे को देखता, तुरंत फैसला नहीं करता। वह सोचता—शायद इस मुस्कान के पीछे भी कोई अधूरा शोक होगा, कोई अनकहा डर, कोई ऐसा सच जिसे कहने की जगह अभी तक नहीं मिली।

क्योंकि कुछ रिश्ते लौटकर फिर से घर नहीं बनाते।

कुछ रिश्ते लौटकर इंसान को इंसान देखना सिखाते हैं।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.