
भाग 1
स्कूल के खेल दिवस पर 8 साल के आरव ने एक अनजान लड़की से कहा, “क्या मैं आज के लिए तुम्हारी मम्मी उधार ले सकता हूँ?” और पूरा मैदान जैसे एक पल के लिए रुक गया।
तारा ने पहले सोचा कि उसने गलत सुना है। सामने खड़ा लड़का साफ-सुथरी यूनिफॉर्म में था, जूते चमक रहे थे, बाल करीने से संवरे हुए थे, लेकिन उसकी आंखें बार-बार स्कूल के बड़े लोहे के गेट की तरफ जा रही थीं। वह किसी का इंतजार कर रहा था। बहुत देर से। शायद बहुत दिनों से।
तारा की मां मीरा उसके पीछे खड़ी थी। वह आज खास तैयारी करके आई थी। घर का बना आलू पराठा, आम का अचार, नींबू पानी और तारा के लिए गुड़ वाली छोटी मिठाई। वह अपनी बेटी के साथ दौड़ने, हंसने और फोटो खिंचवाने आई थी। लेकिन उसने नहीं सोचा था कि कोई बच्चा उसकी बेटी से उसकी मां मांग लेगा।
तारा ने धीरे से पूछा, “क्यों?”
आरव ने गेट की तरफ देखा, फिर बोला, “रेस के बाद बताऊंगा। पापा आने वाले हैं। उन्होंने वादा किया था।”
सीटी बज चुकी थी। बच्चे अपने माता-पिता के साथ 3 पैर वाली दौड़ के लिए लाइन में लग रहे थे। कोई पिता बच्चे के जूते बांध रहा था, कोई मां बच्चे का चेहरा पोंछ रही थी। मगर आरव अकेला खड़ा था, बैग की पट्टियां दोनों हाथों से पकड़े हुए।
मीरा का दिल कस गया। उसने झुककर पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”
“आरव मल्होत्रा।”
नाम सुनते ही पास खड़ी एक शिक्षिका के चेहरे पर हल्का सा बदलाव आया। मल्होत्रा नाम दिल्ली-गुरुग्राम के बड़े घरानों में जाना जाता था। मगर उस नाम का बोझ उस छोटे बच्चे के कंधों पर बहुत भारी लग रहा था।
मीरा ने उसका हाथ आगे बढ़ाकर कहा, “जब तक तुम्हारे पापा आते हैं, तुम हमारे साथ रह सकते हो।”
तारा ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “उधार मंजूर। लेकिन स्कूल बंद होने से पहले वापस करना पड़ेगा।”
आरव के होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आई। जैसे मुस्कुराना उसे याद तो था, पर आदत नहीं थी।
दौड़ शुरू हुई। पहले ही कदम पर तारा और आरव लड़खड़ा गए। मीरा ने पीछे से उन्हें संभाला। तारा हंस पड़ी। आरव चौंक गया, जैसे इतने खुले दिल की हंसी उसने बहुत दिनों से नहीं सुनी थी। फिर तारा ने उसका हाथ कसकर पकड़ा और बोली, “चलो, उधार वाले भाई!”
“मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ,” आरव ने धीमे से कहा।
“आज के लिए हो।”
वे रेस नहीं जीते। तारा ने रस्सी को दोष दिया, आरव ने तालमेल को। मीरा ने दोनों को डांटा कि बहस करते हुए कोई रेस नहीं जीतता। थोड़ी देर के लिए आरव गेट देखना भूल गया।
दौड़ के बाद तारा उसे अपने चादर वाले छोटे पिकनिक कोने में ले आई। मीरा ने प्लेट में पराठा, फल और नींबू पानी रखा। आरव ने तुरंत हाथ पीछे कर लिया।
“ये आपके परिवार के लिए है।”
मीरा ने प्लेट उसके सामने रख दी। “आज तुम भी इसी परिवार में हो।”
आरव ने पराठा उठाया, लेकिन खाया नहीं। मीरा ने पूछा, “कुछ हुआ?”
उसकी आवाज बहुत धीमी थी। “मेरे लिए कभी किसी ने टिफिन नहीं पैक किया।”
तारा चुप हो गई। मीरा की आंखें भर आईं, मगर उसने अपना चेहरा संभाल लिया।
तभी स्कूल गेट के पास एक काली महंगी कार तेज़ी से आकर रुकी। सारे माता-पिता उधर देखने लगे। कार से एक लंबा, गंभीर आदमी उतरा, गहरे रंग का सूट पहने हुए, हाथ में फोन, आंखों में बेचैनी।
आरव ने उसे देखा। पर वह भागा नहीं।
मीरा ने यही देखा, और उसके मन में एक डरावना सवाल उठा। जिस बच्चे ने पूरे दिन अपने पिता का इंतजार किया, वह पिता के आते ही उसकी तरफ दौड़ा क्यों नहीं?
भाग 2
राजवीर मल्होत्रा अपने बेटे के सामने घुटनों के बल बैठ गया। इतने बड़े आदमी को इतने छोटे होकर किसी बच्चे से माफी मांगते देख कई लोग रुक गए।
“सॉरी, आरव,” उसने सिर्फ इतना कहा।
आरव ने सिर हिलाया। न रोया, न शिकायत की। बस ऐसे मान गया जैसे उसे देर से आने की आदत हो चुकी थी। राजवीर के लिए वही सबसे बड़ा तमाचा था। बच्चा गुस्सा करे तो पिता उम्मीद कर सकता है कि अभी रिश्ता जिंदा है। बच्चा चुपचाप समझ जाए, तो समझना चाहिए कि वह बहुत पहले बड़ा हो चुका है।
जाने से पहले आरव ने मीरा और तारा की तरफ झुककर कहा, “मुझे आपका परिवार उधार देने के लिए धन्यवाद।”
तारा ने कहा, “कल फिर लेना हो तो पहले बताना।”
राजवीर ने मीरा को धन्यवाद दिया, लेकिन उसके चेहरे पर सिर्फ शिष्टाचार नहीं था। उसमें अपराधबोध था। वह अपने बेटे को लेकर चला गया, पर मीरा की एक बात उसके पीछे-पीछे कार तक आई।
“बच्चे महंगे दिन याद नहीं रखते, खुश दिन याद रखते हैं।”
मल्होत्रा हाउस लौटते ही सब कुछ फिर वैसा ही हो गया। बड़ा गेट, संगमरमर की सीढ़ियां, शांत कमरे, नौकरों की कतार, समय से दूध, समय से पियानो, समय से पढ़ाई। सब सुरक्षित था, सब व्यवस्थित था, पर कुछ भी घर जैसा नहीं था।
आरव ने अपने कमरे में जाकर तारा वाला नींबू पानी का छोटा डिब्बा मेज पर रखा। जैसे वह कोई खिलौना नहीं, सबूत हो कि किसी दिन वह अकेला नहीं था।
रात को राजवीर देर तक फाइलों के सामने बैठा रहा। उसके सहायक कबीर ने कहा, “सर, आज आरव हंसा था।”
राजवीर ने सिर उठाया। बहुत देर बाद बोला, “मैंने उसकी हंसी बहुत समय से नहीं सुनी।”
अगली सुबह नाश्ते की मेज पर आरव ने पहली बार कोई महंगा खिलौना नहीं मांगा। उसने धीरे से पूछा, “पापा, क्या मैं स्कूल के बाद तारा के घर जा सकता हूँ?”
पूरा कमरा शांत हो गया। आया, नौकर, मैनेजर, सबने राजवीर की तरफ देखा।
राजवीर ने बेटे की आंखों में देखा। उसमें जिद नहीं थी, भूख थी। अपनापन छू लेने की भूख।
उसने धीरे से कहा, “हां।”
आरव के चेहरे पर छोटी सी मुस्कान आई। उसी पल राजवीर को एहसास हुआ कि उसने सिर्फ एक मुलाकात की इजाजत नहीं दी थी। उसने अपने बंद पड़े घर की पहली खिड़की खोल दी थी।
भाग 3
उस दिन स्कूल की छुट्टी के बाद राजवीर खुद आरव को लेकर मीरा के घर गया। ड्राइवर नहीं, सुरक्षा नहीं, सिर्फ कबीर दूर खड़ा था। राजवीर ने जिंदगी में बहुत लोगों पर भरोसा किया था और एक धोखे ने उससे सब छीन लिया था। उसकी पूर्व पत्नी रिया ने शादी के दौरान घर के लोगों को खरीदकर हर बात पर नजर रखवाई थी। उसकी बातों, यात्राओं, बेटे की दिनचर्या, सब पर। जब सच निकला, रिश्ता टूट गया। आरव की कस्टडी राजवीर को मिल गई, मगर भरोसा उसी दिन मर गया।
तभी से मल्होत्रा हाउस में जवान आया या देखभाल करने वाली कोई महिला नहीं रखी गई। सिर्फ उम्रदराज, भरोसेमंद लोग। वे आरव को प्यार करते थे, संभालते थे, बचाते थे, लेकिन उसके साथ खेलते नहीं थे। उसे चोट न लगे, इसलिए उसे दौड़ने नहीं दिया जाता था। वह गिरे नहीं, इसलिए उसे खुलकर चढ़ने नहीं दिया जाता था। वह बिगड़े नहीं, इसलिए उसे ज़्यादा हंसने की जगह भी नहीं मिलती थी।
मीरा का घर छोटा था। दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में, जहां शाम को छतों से प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई देती थी और गली के कोने पर चायवाला हर आने-जाने वाले को नाम से पहचानता था। दरवाजे के पास तुलसी का गमला था, खिड़की पर तारा की रंगीन ड्रॉइंग चिपकी थी, और अंदर से घी, इलायची और सिकते बेसन चीले की खुशबू आ रही थी।
आरव ने घर में कदम रखते ही रुककर चारों तरफ देखा। वहां कोई संगमरमर नहीं था, कोई बड़ा झूमर नहीं था, कोई चुप्पी नहीं थी। तारा का बैग सोफे के पास उल्टा पड़ा था। रसोई से मीरा की आवाज आई, “हाथ धो लो दोनों, फिर खाना मिलेगा।”
तारा ने धीरे से कहा, “पहले नानू के चीले चुराते हैं।”
आरव घबरा गया। “बिना पूछे?”
तारा ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई बहुत अजीब बात कह दी हो। “पूछेंगे तो मना कर देंगे।”
उसने प्लेट से आधा चीला उठाकर उसके हाथ में दे दिया। आरव ने दरवाजे की तरफ देखा, फिर मीरा की तरफ, फिर अपने पिता की तरफ। राजवीर बस देख रहा था। आरव ने छोटा सा निवाला लिया। उसकी आंखें फैल गईं।
तभी अंदर से भारी कदमों की आवाज आई। सफेद बालों वाला एक लंबा, चौड़े कंधों वाला बुजुर्ग आदमी रसोई से निकला। उसके कुर्ते पर आटा लगा था, माथे पर भी थोड़ा बेसन चिपका था, और हाथ में बेलन था।
उसने प्लेट गिनी। फिर तारा को देखा। फिर आरव को। फिर आधे चीले को।
“मेरे चीले किसने चुराए?”
तारा ने तुरंत आरव की तरफ इशारा किया। “उधार वाला भाई।”
आरव हड़बड़ा गया। “लेकिन आपने दिया था!”
बुजुर्ग ने नाटकीय अंदाज़ में कहा, “वाह। चोर भी, गवाह भी, और बहाना भी।”
तारा हंसते हुए भागी। बुजुर्ग उसके पीछे दौड़ा। आरव दो पल खड़ा रहा, फिर वह भी भागा। बूढ़ा आदमी बेलन उठाए आंगन तक आया और बोला, “रुको, अदालत अभी लगी है!”
आरव हंस पड़ा। खुलकर। बिना सोचे। बिना किसी डर के।
राजवीर ने वह हंसी सुनी और उसका चेहरा बदल गया। कबीर ने धीरे से कहा, “सर, ये वही हंसी है।”
मीरा ने बताया, “ये मेरे पापा हैं। नाम गोपाल है, लेकिन मोहल्ले के बच्चे इन्हें नानू कहते हैं।”
गोपाल नानू ने राजवीर की तरफ आटे से भरा हाथ बढ़ाया। “हाथ मिलाओ, लेकिन डरना मत। मैं सिर्फ चोर बच्चों को पकड़ता हूँ, बड़ों को नहीं।”
राजवीर ने पहली बार असहज मुस्कान दी। गोपाल नानू ने तुरंत कहा, “इसे ठीक करना पड़ेगा। आदमी मुस्कुरा रहा है या बैंक से कर्ज मंजूर कर रहा है, समझ ही नहीं आ रहा।”
तारा जोर से हंसी। आरव भी। मीरा ने पिता को आंख दिखाई, मगर मुस्कुरा दी।
उस दिन के बाद आरव का तारा के घर आना धीरे-धीरे आदत बन गया। पहले सप्ताह में 1 दिन, फिर 2 दिन, फिर हर उस दिन जब उसका मन भारी होता। मल्होत्रा हाउस में सब नोटिस करने लगे कि आरव सीढ़ियां चढ़ते हुए गुनगुनाता है। वह पढ़ाई के बीच अचानक मुस्कुरा देता है। उसने अपने कमरे में एक पुरानी कॉपी रख ली, जिसमें वह छोटी-छोटी बातें लिखता था।
“आज नानू हार गए, पर बोले मैं जीतने देता हूँ।”
“तारा ने फिर मुझे दोष दिया।”
“मीरा आंटी ने बिना पूछे दूसरी रोटी रख दी।”
“पापा ने चाय पी। उन्होंने मना नहीं किया।”
राजवीर भी बदल रहा था। वह पहले आरव को छोड़कर चला जाता था, फिर दरवाजे तक रुकता, फिर बरामदे में चाय पीने लगा, फिर एक शाम गोपाल नानू के साथ गमलों में पानी देने लगा। मीरा ने एक दिन कहा, “आप हर चीज का समय बनाते हैं।”
राजवीर ने कहा, “ज़रूरी है।”
मीरा ने तारा और आरव को आंगन में मिट्टी से किला बनाते देखा। “बच्चे खुशी का समय नहीं बनाते। वे बस पहचान लेते हैं कि खुशी कहां मिल रही है।”
राजवीर ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उसने उसी शाम आरव की पियानो क्लास रद्द कर दी और कहा, “आज खेल लो।”
आरव ने ऐसे देखा जैसे उसे यकीन ही न हुआ हो कि उसके पिता ने यह कहा है।
गोपाल नानू के साथ घर और भी खुल गया। एक शनिवार को वे 3 रंगीन पानी वाली पिचकारियां ले आए, जबकि होली को अभी 2 महीने बाकी थे। तारा ने पूछा, “नियम क्या हैं?”
गोपाल नानू ने कहा, “जो पहले हार मानेगा, वह बर्तन मांजेगा।”
आरव ने उनकी बड़ी पिचकारी देखी। “आपकी बड़ी क्यों है?”
“अनुभव,” नानू ने गंभीरता से कहा।
“ये नियम नहीं है।”
“अब है।”
तारा ने आरव के कान में कहा, “3 पर हमला।”
“1… 2… 3…”
दोनों ने साथ में नानू पर पानी छोड़ा। नानू पीछे हटे, फिसले, दीवार पकड़ी, फिर पूरी शान से खड़े हो गए। “यह अध्याय 1 था।”
तारा ने चिल्लाकर कहा, “नानू, आपकी कहानी बहुत लंबी है!”
आरव इतना हंसा कि पेट पकड़ लिया। बरामदे में खड़े राजवीर के मुंह से भी हंसी निकल गई। नानू ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“लो, आखिर असली आदमी मिल गया। इतने दिन से तो सिर्फ सूट घूम रहा था।”
मीरा ने हंसी दबा ली। राजवीर के पास जवाब नहीं था।
लेकिन सड़क के उस पार खड़ी एक कार में कोई यह सब देख रहा था। रिया। राजवीर की पूर्व पत्नी। उसकी आंखें आरव पर थीं। बच्चा उसके बिना भी हंस रहा था। सिर्फ हंस नहीं रहा था, किसी और के घर में अपना लगता था। वह तारा के साथ झगड़ रहा था, मीरा से खाना ले रहा था, गोपाल नानू को सचमुच नानू कह रहा था।
रिया के हाथ स्टीयरिंग पर कस गए। उसे मीरा से डर नहीं लगा। उसे उस दृश्य से डर लगा जिसमें उसके बेटे को उसकी कमी नहीं दिख रही थी।
रिया ने हमेशा खुद को समझाया था कि राजवीर ने आरव को उससे दूर किया। लेकिन अब उसे लगा, आरव खुद दूर जा रहा है। धीरे-धीरे। बिना शोर के।
कुछ दिनों तक वह चुप रही। फिर उसने वही पुराना रास्ता चुना। पैसे, डर, और दूसरों के हाथों से गंदा काम करवाना।
एक शनिवार दोपहर मीरा के घर में सब कुछ आम दिनों जैसा था। मीरा रसोई में पराठे सेंक रही थी। तारा और आरव आंगन में टमाटर के पौधों को पानी दे रहे थे। गोपाल नानू लकड़ी की कुर्सी पर बैठे उन्हें आदेश दे रहे थे, जैसे वे किसी खेती मंत्रालय के मंत्री हों।
तभी गेट जोर से खुला।
2 आदमी अंदर घुस आए। एक ने गमला लात मारकर गिरा दिया। दूसरा सीधे बरामदे की तरफ बढ़ा।
गोपाल नानू खड़े हो गए। “किससे मिलना है?”
लंबे आदमी ने उन्हें नजरअंदाज किया। “मीरा कौन है?”
मीरा रसोई से बाहर आई। उसके हाथ में आटा लगा था। “मैं हूँ।”
आदमी ने उंगली उठाई। “इस बच्चे और उसके बाप से दूर रहो। बड़े लोगों के घर में घुसने का शौक महंगा पड़ेगा।”
तारा डरकर मीरा के पीछे छिप गई। आरव वहीं जम गया। उसकी उंगलियां नोटबुक पर कस गईं।
मीरा ने शांत आवाज में कहा, “घर से बाहर जाइए।”
दूसरा आदमी हंसा। “हम पूछने नहीं आए।”
लंबा आदमी मीरा की तरफ बढ़ा। गोपाल नानू बीच में आ गए। “बस। इससे आगे नहीं।”
उसने नानू को धक्का दे दिया।
गोपाल नानू पीछे लड़खड़ाए। उनका पैर पत्थर से टकराया और वे गिर पड़े। बेलन आंगन में लुढ़क गया।
एक पल के लिए सब रुक गया।
फिर आरव दौड़ा। वह न रोया, न छिपा। वह घुटनों के बल नानू के पास बैठा और बोला, “नानू, हाथ दीजिए। धीरे उठिए।”
गोपाल नानू ने उसकी आंखों में देखा। उस छोटे बच्चे में डर था, मगर उससे बड़ा अपनापन था। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और उठ गए।
मीरा ने रसोई के पास रखा बेलन उठा लिया। उसकी आंखें अब शांत नहीं थीं।
लंबा आदमी फिर बढ़ा। नानू ने पास की प्लास्टिक कुर्सी उठाई और पूरी ताकत से उसके कंधे पर मारी। आदमी फिसलकर गिरा। इससे पहले कि वह उठता, नानू उसके ऊपर बैठ गए।
तारा हकलाते हुए बोली, “नानू… आप उस पर बैठ गए?”
नानू ने सांस संभालते हुए कहा, “इसे समझौता कहते हैं।”
दूसरा आदमी भागने लगा। बाहर पड़ोसी जमा हो चुके थे। किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था। गली में शोर बढ़ रहा था।
उसी समय राजवीर की कार गेट पर आकर रुकी। वह लगभग दौड़ता हुआ अंदर आया। कबीर पीछे था। राजवीर ने सबसे पहले आरव को देखा।
आरव खड़ा था। कांप रहा था, पर छिपा नहीं था। उसके हाथ पर मिट्टी लगी थी और वह गोपाल नानू के बिल्कुल पास खड़ा था।
“मैं ठीक हूँ, पापा,” उसने कहा।
राजवीर की सांस लौटी। फिर उसने मीरा को देखा, तारा को देखा, नानू को देखा, और उस आदमी को देखा जिसके ऊपर नानू ऐसे बैठे थे जैसे चाय पीने का इंतजार कर रहे हों।
कबीर ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “सर, लगता है स्थिति नानू जी ने संभाल ली है।”
पुलिस आई। पकड़े गए आदमी का फोन खोला गया। संदेश, बैंक ट्रांसफर, आवाज की रिकॉर्डिंग, सब एक ही नाम तक जा रहे थे। रिया मल्होत्रा।
रिया पुलिस स्टेशन में भी उसी घमंड से आई, जैसे किसी बोर्ड मीटिंग में आई हो। लेकिन जब रिकॉर्डिंग चलाई गई, उसकी आवाज कमरे में गूंज गई।
“किसी को चोट मत पहुंचाना। बस उस औरत को इतना डरा देना कि वह मेरे बेटे के पास फिर न आए।”
उसका चेहरा पीला पड़ गया। उसने कहा, “मैं सिर्फ…”
जांच अधिकारी ने बैंक ट्रांसफर सामने रख दिए। फिर संदेश। फिर कॉल रिकॉर्ड।
राजवीर पूरे समय चुप रहा। उसने पहली बार रिया से लड़ने की कोशिश नहीं की। सबूत खुद बोल रहे थे।
रिया ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा। “वह मेरी जगह ले रही है।”
राजवीर ने शांत आवाज में कहा, “नहीं। वह कोई जगह नहीं ले रही। तुमने अपनी जगह खुद खोई है।”
रिया की आंखों में पहली बार डर नहीं, खालीपन दिखा। उसे समझ आ गया था कि वह किसी औरत से नहीं हारी। वह अपने बेटे की हंसी से हार गई।
उस शाम मीरा के घर का टूटा गेट दीवार के सहारे रखा था। गिरे गमले किनारे कर दिए गए थे। तारा चुप थी। आरव भी। गोपाल नानू के कंधे पर पट्टी थी, लेकिन वे बार-बार बोल रहे थे कि उन्हें इससे ज़्यादा चोट तो एक बार प्रेशर कुकर से लगी थी।
राजवीर गेट के पास बहुत देर खड़ा रहा। मीरा उसके पास आई।
“आपको वापस आने की जरूरत नहीं थी।”
राजवीर ने बच्चों की तरफ देखा। आरव तारा के पास बैठा था, उसी तरह जैसे कोई बच्चा वहीं बैठता है जहां उसे सुरक्षा महसूस होती है।
“थी,” राजवीर ने कहा। “क्योंकि यह पहला घर है जहां मेरा बेटा घर जैसा दिखता है।”
मीरा चुप रह गई। यह वाक्य किसी धन्यवाद से बड़ा था।
अगले दिन राजवीर ने घर की सुरक्षा ठीक करवाई। नया गेट, कैमरा, बाहर लाइट, और गली के चौकीदार से बात। मीरा ने कहा, “मैंने यह नहीं मांगा था।”
राजवीर ने जवाब दिया, “मैं घर की रक्षा नहीं कर रहा। मैं उन लोगों की रक्षा कर रहा हूँ जिनके बीच मेरा बेटा फिर से बच्चा बन पाया।”
कई सप्ताह बाद, एक शाम गोपाल नानू ने आरव को बरामदे की सीढ़ी पर बुलाया। सूरज ढल रहा था। आंगन में वही टमाटर के पौधे थे, वही पानी की पाइप, वही जगह जहां नानू ने 1 गुंडे पर बैठकर इतिहास रचा था।
नानू ने अपनी पुरानी डायरी उसके हाथ में रखी।
आरव ने घबराकर कहा, “मैं इसे नहीं ले सकता।”
नानू मुस्कुराए। “ले सकता है। मैंने भर दी है।”
आरव ने पहला पन्ना खोला। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था।
“जिस दिन 1 छोटे बच्चे ने 1 मां उधार मांगी।”
नीचे यादें लिखी थीं।
“तारा ने पहले ही दिन चोरी का दोष उस पर डाला।”
“आरव ने सीखा कि बूढ़े लोग दौड़ सकते हैं।”
“पहली असली हंसी।”
“साझा नींबू पानी।”
“पानी की लड़ाई में नानू की ऐतिहासिक हार।”
“जिस दिन उसने मुझे नानू कहा और छिपा नहीं।”
आरव पन्ने पलटता गया। उसकी आंखें भर आईं। आखिरी पन्ने पर लिखा था।
“उसने मुझसे कॉपी मांगी। उसने नहीं बताया कि पहले पन्ने पर क्या लिखेगा। शायद मुझे पता है।”
आरव ने डायरी बंद की और उसे सीने से लगा लिया। फिर बिना कुछ कहे गोपाल नानू के कंधे से टिक गया।
नानू ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटा, तारीखें भूल जाओगे। मौसम भूल जाओगे। कौन सा दिन था, वह भी भूल जाओगे। लेकिन यह मत भूलना कि उस दिन कैसा महसूस हुआ था।”
आरव ने सिर हिलाया। उसकी आवाज नहीं निकली।
अंदर रसोई में तारा चुपके से लड्डू खा रही थी। मीरा उसे पकड़ने ही वाली थी। राजवीर दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था।
मीरा उसके पास आई। “धन्यवाद।”
राजवीर ने सिर हिलाया। “नहीं। आपने उसे वह दिया जो मैं नहीं दे पाया।”
मीरा ने कहा, “आपने उसे यहां आने दिया। एक आदमी जिसने किसी पर भरोसा नहीं किया, उसने अपने बेटे को हमारे घर भेजा। यह छोटी बात नहीं थी।”
राजवीर ने पहली बार मीरा को सिर्फ आरव की मुस्कान का कारण नहीं, बल्कि अपने टूटे हुए भरोसे की दवा की तरह देखा। कुछ कहने ही वाला था कि अंदर से नानू की आवाज आई।
“मीरा! अगर तुम भावुक बातें खत्म कर चुकी हो तो घोषणा करनी है!”
सब बाहर आए। गोपाल नानू आंगन के बीच खड़े थे, चेहरे पर वही गंभीरता, जो अक्सर किसी शरारत से पहले आती थी।
उन्होंने आरव की तरफ देखा। “तुम यहां मां उधार लेने आए थे।”
आरव ने धीरे से सिर हिलाया।
“फिर तुमने बहन उधार ली।”
तारा मुस्कुराई।
“फिर नानू उधार लिया।”
तारा बोली, “नानू नहीं, गोपाल नानू।”
उन्होंने आंखें बंद कीं। “यही दुख है जीवन का।”
फिर उन्होंने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया। “अब उधार खत्म। इस घर में जो दिल से आ जाए, उसे रखा जाता है।”
आरव ने तारा को देखा। तारा ने तुरंत कहा, “मैं अपने उधार वाले भाई को रख रही हूँ।”
आरव की आंखें चमक उठीं। “और मैं आपका परिवार रख सकता हूँ?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा, बस आगे बढ़कर उसके बाल सहला दिए। राजवीर ने उसके कंधे पर हाथ रखा। गोपाल नानू ने घोषणा की, “फैसला हो गया। अब कोई किसी को उधार नहीं देगा। सब अपने हैं।”
उस रात आरव ने अपनी नई डायरी के पहले पन्ने पर सिर्फ 1 वाक्य लिखा।
“आज मुझे परिवार वापस नहीं करना पड़ा।”
और बहुत दूर मल्होत्रा हाउस की चमकदार खिड़कियों से अलग, उस छोटे से घर में, जहां पराठे कभी जल जाते थे, गेट कभी टूट जाते थे, और नानू कभी गुंडों पर बैठ जाते थे, 1 बच्चा पहली बार चैन से सोया। उसे अब सुबह किसी गेट की तरफ देखते हुए इंतजार नहीं करना था।
क्योंकि कुछ लोग देर से आते हैं, कुछ लोग बीच रास्ते में छूट जाते हैं, लेकिन कुछ घर ऐसे होते हैं, जो किसी बच्चे की 1 अजीब सी विनती से शुरू होकर जिंदगी भर का जवाब बन जाते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.