
PART 1
अपने 8वें जन्मदिन की सुबह आयत डिसूजा को उसके पिता ने बांद्रा के पुराने कब्रिस्तान में उसकी माँ की कब्र के सामने घुटनों के बल बैठाकर कहा—
—तेरी माँ तेरे कारण मरी थी, आज यहीं बैठकर माफी माँग, जब तक तुझे समझ न आ जाए कि तूने इस घर से क्या छीना है।
उस दिन न मोमबत्ती थी, न मिठाई, न माथे पर प्यार भरा चुंबन। मुंबई के कुर्ला वाले उनके छोटे से घर में बस राहुल डिसूजा की भारी आवाज थी, दादी एल्सा की ठंडी निगाहें थीं और दादा विक्टर का वही पुराना ताना—
—बच्ची आई, बहू चली गई। इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए?
आयत ने कभी अपनी माँ मीरा को देखा नहीं था, बस कब्र पर लगी तस्वीर में उसका मुस्कुराता चेहरा था। मीरा 8 साल पहले प्रसव के कुछ घंटों बाद अस्पताल में चली गई थी। डॉक्टरों ने इसे जटिलता कहा था, पर इस घर में वह शब्द कभी नहीं बोला गया। यहाँ बस एक ही वाक्य बार-बार दोहराया जाता था—
—जिस दिन तू पैदा हुई, उसी दिन घर उजड़ गया।
राहुल पहले मीरा से पागलों की तरह प्यार करता था। अब वह दिन भर गैराज में तेल और ग्रीस से लथपथ काम करता, रात को चुपचाप खाना खाता और ऊपर वाले कमरे में ताला लगाकर घंटों बंद रहता। आयत को उस कमरे में जाने की मनाही थी।
उस सुबह आयत ने धीरे से पेट पकड़कर कहा—
—पापा, आज बहुत दर्द हो रहा है। क्या हम कल जा सकते हैं?
राहुल का चेहरा एक पल को बदला, फिर पत्थर हो गया।
—दर्द? तेरी माँ ने क्या झेला था, पता है तुझे?
आयत चुप हो गई। वह उन्हें कैसे बताती कि यह दर्द महीनों से लौट रहा था? कि स्कूल की नर्स ने उसके चेहरे का रंग देखकर उसे अस्पताल भेजने को कहा था? कि उसने दादी को फोन पर किसी से कहते सुना था—“गांठ है… जांच जल्दी करनी पड़ेगी…” पर उसके बाद सबने चुप्पी ओढ़ ली थी।
कब्रिस्तान में समुद्री हवा नुकीली लग रही थी। राहुल उसे मीरा की कब्र तक ले गया। सफेद पत्थर पर लिखा था—मीरा डिसूजा, 1992-2018। तस्वीर में मीरा हँस रही थी, जैसे उसे दुनिया से कोई शिकायत ही न हो।
—घुटनों पर बैठ, राहुल ने कहा।
आयत बैठ गई। पत्थर की ठंड उसके घुटनों में उतर गई।
—मैं वापस आऊँगा। तब तक माफी माँगती रहना।
—पापा…
—एक शब्द नहीं।
राहुल चला गया।
आयत ने कब्र को छुआ।
—मम्मा, माफ कर दो। मैं सच में नहीं जानती थी कि मुझे कैसे पैदा होना चाहिए था।
घंटे बीत गए। दोपहर आई, फिर उतर गई। पेट का दर्द बढ़ता गया। उसके हाथ नीले पड़ने लगे। जब वह और नहीं सह सकी, तो वह लड़खड़ाते हुए घर लौट आई। उसने बर्तन धोए, फर्श पोंछा, दाल चढ़ाई और अपनी छोटी डिब्बी से बचाए हुए सिक्कों से 1 छोटा स्ट्रॉबेरी वाला केक खरीद लाई।
वह अकेली बैठी, मोमबत्ती जलाई और आँखें बंद कीं। पहला वादा उसने माँ से किया कि वह बोझ नहीं बनेगी। दूसरा उसने पिता के लिए किया कि उनका दुख कम हो जाए। तीसरा उसने डरते-डरते अपने लिए माँगा—वह थोड़ी और जीना चाहती थी।
तभी दरवाजा जोर से खुला।
राहुल ने केक देखा, फिर आयत को।
—तेरी माँ मिट्टी में पड़ी है और तू यहाँ जश्न मना रही है?
—पापा, बस छोटा सा था… मैंने दाल भी बनाई है…
उसने केक उठाकर फर्श पर दे मारा। सफेद क्रीम टाइलों पर फैल गई, स्ट्रॉबेरी मेज के नीचे लुढ़क गई। आयत पेट पकड़कर उसी क्रीम में घुटनों के बल गिर पड़ी।
—मुझे बहुत दर्द हो रहा है, पापा…
राहुल का चेहरा हिला, पर आवाज फिर सख्त हो गई।
—वापस कब्रिस्तान जा।
शाम तक आयत फिर मीरा की कब्र के पास थी। बारिश की महीन बूंदें उसके बालों में अटक रही थीं। उसने फुसफुसाकर कहा—
—मम्मा, आज मैंने केक चखा। बस थोड़ा सा। अच्छा था।
फिर उसके गले से खाँसी निकली। पत्थर पर गहरा दाग गिरा, बारिश में फैलता हुआ। वह पिता को पुकारना चाहती थी, पर आवाज नहीं निकली। उसका शरीर कब्र के पास गिर गया।
और जब आयत ने आँखें खोलीं, उसने खुद को जमीन पर पड़े देखा।
PART 2
आयत चीखना चाहती थी, पर उसकी आवाज हवा जैसी हल्की हो चुकी थी। उसका छोटा शरीर कब्र के पास पड़ा था, आँखें बंद, कपड़े भीगे हुए। वह उसे छूने दौड़ी, लेकिन उंगलियाँ धुंध की तरह आर-पार निकल गईं।
फिर कोई अदृश्य खिंचाव उसे घर की ओर ले गया। वह गलियों, बस स्टॉप और बंद दुकानों से गुजरती हुई अपने घर पहुँची। ऊपर वाला ताला लगा कमरा खुला था।
अंदर अंधेरा नहीं, मीरा की यादों से भरा एक मंदिर जैसा कमरा था। दीवारों पर मीरा की तस्वीरें थीं—शादी में, समुद्र किनारे, गर्भवती, हँसती हुई। मेज पर ढेर सारी चिट्ठियाँ थीं, हर चिट्ठी राहुल ने मीरा के नाम लिखी थी।
एक चिट्ठी में लिखा था—
“मैं जानता हूँ, आयत दोषी नहीं है। पर जब उसे देखता हूँ, तेरी मौत का दिन फिर सामने खड़ा हो जाता है। मैंने अपनी कायरता का नाम उसकी गलती रख दिया है।”
आयत कांप गई।
आखिरी चिट्ठी 3 हफ्ते पुरानी थी—
“डॉक्टर ने कहा है, उसके पेट में गांठ है। इलाज जल्दी हो तो बच सकती है। मैं गैराज गिरवी रख दूँगा, पर उसे बचाऊँगा। मीरा, मैंने उसे 8 साल डराया। अब उसे कैसे बताऊँ कि मैं उससे प्यार करता हूँ?”
नीचे रसोई से राहुल की टूटी आवाज आई—
—आयत… मेरी बच्ची… मैंने क्या कर दिया?
PART 3
जब आयत ने फिर आँखें खोलीं, छत सफेद थी। न कब्र थी, न बारिश, न ठंडा पत्थर। उसकी नाक में दवा की गंध थी, हाथ में सुई लगी थी और बगल में मशीन धीमे-धीमे आवाज कर रही थी।
एक बुजुर्ग औरत उसकी उंगलियाँ थामे बैठी थी। सफेद बाल, दयालु आँखें, और चेहरे पर वैसी चिंता जो रिश्ते से नहीं, इंसानियत से जन्म लेती है।
—तुम वापस आ गईं, बच्ची, उसने कहा।
आयत ने फुसफुसाकर पूछा—
—मैं कहाँ हूँ?
—अस्पताल में। पहले तुम्हें नजदीकी अस्पताल लाया गया, फिर बच्चों के विभाग में भेजा गया। मैं रोजी आंटी हूँ। कब्रिस्तान के पीछे रहती हूँ। मैं अपने पति की कब्र पर फूल रखने गई थी, तभी तुम्हें देखा।
आयत ने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा।
—पापा आए?
रोजी आंटी की आँखें झुक गईं।
—उन्हें खबर दे दी गई है। अभी तक अंदर नहीं आए।
पहले यह सुनकर आयत टूट जाती। उस दिन कुछ अलग हुआ। अब उसके भीतर एक नया सवाल था—क्या वह नहीं आए क्योंकि उन्हें परवाह नहीं, या इसलिए कि उन्हें शर्म आ रही है?
रोजी आंटी ने उसके माथे पर हाथ रखा।
—मैं तुम्हारी माँ को जानती थी।
आयत की आँखें फैल गईं।
—आप मम्मा को जानती थीं?
—मीरा मेरे सामने वाली इमारत में रहती थी, शादी से पहले। बहुत हँसमुख लड़की थी। कपड़े सुखाते हुए बेसुरा गाती थी, मगर इतनी खुशी से कि कोई उसे रोक नहीं पाता था।
आयत के होंठ कांपे।
—क्या वह मुझे चाहती थीं?
रोजी आंटी लगभग नाराज हो गईं।
—चाहती थीं? वह तो तुम्हारे आने का इंतजार ऐसे कर रही थीं जैसे बरसात के बाद पहली धूप का। हर किसी से कहती थीं—मेरी बेटी आएगी तो घर में फिर शोर होगा।
आयत की आँखों से आँसू बह निकले।
—सब कहते हैं मैंने उन्हें मार दिया।
रोजी आंटी का चेहरा कठोर हो गया।
—झूठ। तुम्हारी माँ प्रसव की जटिलता से गई थीं। कोई बच्चा अपनी माँ को नहीं मारता। खासकर वह बच्ची नहीं, जिसे उसकी माँ ने जन्म से पहले ही इतना प्यार किया हो।
उस सच ने आयत के भीतर कुछ खोल दिया। 8 साल से जो पत्थर उसके सीने पर रखा गया था, वह पहली बार थोड़ा हल्का हुआ।
फिर रोजी आंटी ने धीरे से कहा—
—लेकिन तुम्हारे दादा-दादी ने बहुत बुरा किया।
—क्या?
—अस्पताल ने तुम्हारी जांच की सूचना उन्हें भी दी थी। वे जानते थे कि तुम्हारे पेट में गांठ है और इलाज जल्दी जरूरी है।
आयत ने पलकें झपकाईं।
—उन्होंने पापा को नहीं बताया?
रोजी आंटी का मौन ही जवाब था।
अगले कुछ दिन जांचों में बीते। डॉक्टरों ने कहा कि गांठ गंभीर है, लेकिन उम्मीद खत्म नहीं हुई। ऑपरेशन जल्दी करना होगा। आयत डरती थी, पर अब डर के साथ एक अजीब सी आग भी थी। उसे पहली बार लग रहा था कि शायद उसकी जिंदगी सच में उसकी अपनी है, किसी की सजा नहीं।
चौथे दिन रोजी आंटी एक पुराना डिब्बा लेकर आईं। उस पर गुलाबी फीता था और ऊपर गोल अक्षरों में लिखा था—
“मेरी आयत के लिए, अगर कभी दुनिया उसे सिर झुकाने पर मजबूर करे।”
—मीरा ने मुझे यह दिया था, रोजी आंटी ने कहा। बोली थी, अगर कभी मेरी बेटी को सच की जरूरत हो, तो दे देना। मैं सोचती थी, बड़ी होने पर दूँगी। लेकिन शायद आज ही सही दिन है।
डिब्बे में 1 छोटा सफेद टोपी था, मीरा की गर्भावस्था वाली तस्वीर थी और एक चिट्ठी थी। आयत ने कांपते हाथों से उसे खोला।
“मेरी प्यारी आयत, अगर कभी मैं तेरे पास न रहूँ और तू यह पढ़े, तो सबसे पहले यह जानना—तेरी जिंदगी कोई कर्ज नहीं है। तू किसी की जगह नहीं लेती। तू मेरी कमी नहीं, मेरा प्यार है। मैंने तुझे देखने से पहले चाहा, छूने से पहले प्यार किया। अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो किसी को भी अपनी पैदाइश को अपराध बनाने मत देना। तू मेरी मुसीबत नहीं, मेरी रौशनी है।”
आयत ने चिट्ठी सीने से लगा ली। वह बहुत देर तक रोई नहीं। पहले उसने बस साँस ली, जैसे 8 साल बाद पहली बार हवा उसके फेफड़ों तक पहुँची हो।
अगले दिन राहुल आया।
वह दरवाजे पर ऐसे खड़ा था जैसे अदालत में खड़ा अपराधी। दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें लाल, कपड़े मुरझाए हुए। उसके हाथ में वही गुलाबी मोमबत्ती थी, जो टूटे केक के पास फर्श पर पड़ी थी।
आयत ने उसे देखा, पर कुछ नहीं कहा।
राहुल धीरे-धीरे बिस्तर के पास आया।
—मैं कल भी आया था, उसने भारी आवाज में कहा। दरवाजे तक आया, अंदर नहीं आ पाया।
—क्यों?
उसने सिर झुका लिया।
—क्योंकि मुझे डर था तू पूछेगी कि मैंने तुझे वहाँ क्यों छोड़ दिया। और मेरे पास कोई जवाब नहीं है, सिवाय शर्म के।
आयत ने तकिए के नीचे से मीरा की चिट्ठी निकाली।
—मम्मा ने लिखा है कि मैं गलती नहीं हूँ।
राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया।
—किसने दी?
—रोजी आंटी ने। मम्मा ने उनके पास रखी थी।
राहुल ने चिट्ठी माँगने के लिए हाथ बढ़ाया, पर आयत ने तुरंत नहीं दी।
—अगर आप जानते थे कि मैं दोषी नहीं हूँ, तो आपने मुझे 8 साल क्यों सजा दी?
कमरे में मशीन की आवाज और भारी हो गई।
राहुल कुर्सी पर बैठ गया।
—क्योंकि मैं कमजोर था। मीरा के जाने के बाद मुझे किसी को दोष देना था। मेरे माँ-बाप ने तेरा नाम दे दिया। मैं जानता था यह झूठ है। लेकिन गम से लड़ने से आसान था गुस्से में छिप जाना। मैंने अपनी टूटन तुझ पर फेंक दी।
आयत ने आँखें मोड़ लीं।
—दादी-दादा को मेरी बीमारी पता थी।
राहुल ने सिर उठाया।
—क्या?
—अस्पताल ने उन्हें फोन किया था। उन्होंने आपको नहीं बताया।
राहुल का चेहरा बदल गया। उस पर पहली बार वह गुस्सा आया जो आयत की तरफ नहीं था।
वह उठने लगा। आयत ने तुरंत कहा—
—नहीं।
वह रुक गया।
—अगर आप अभी उनके पास गए, तो आप मुझे फिर छोड़ देंगे। मुझे अभी पापा चाहिए। बाद में चलेंगे। साथ में।
“साथ में” शब्द राहुल के भीतर जाकर टूट गया। वह फिर बैठ गया।
—ठीक है, उसने कहा। मैं यहीं हूँ।
और इस बार वह सचमुच रहा।
वह खून की जांच के समय रहा। डॉक्टर से बात करते समय रहा। रात को जब आयत दर्द से कराहकर उठी, वह घबराकर नर्स को बुलाने गया। उसे बच्ची की चोटी बनानी नहीं आती थी, दवा के समय गड़बड़ कर देता था, कंबल जरूरत से ज्यादा खींच देता था, पर वह भागा नहीं।
2 दिन बाद डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ता की अनुमति से आयत कुछ घंटों के लिए घर गई। रोजी आंटी भी साथ थीं। राहुल ने रास्ते भर कार में रेडियो नहीं चलाया। वह हर सिग्नल पर आयत को देखता, जैसे डरता हो कि वह फिर खो न जाए।
घर में दादा विक्टर और दादी एल्सा बैठे थे। उनके पास घर की चाबी हमेशा रहती थी। दादी ने आयत को देखकर होंठ सिकोड़ लिए।
—अच्छा, नाटक खत्म? हमें तो बताया गया था बहुत बड़ा हादसा हो गया।
आयत ने राहुल का हाथ कसकर पकड़ा।
दादा बोले—
—राहुल, इसे अस्पताल से सीधे यहाँ लाने की जरूरत नहीं थी। यह बच्ची तुझे फिर कमजोर कर देगी।
राहुल शांत रहा, पर उसकी पकड़ बदल गई। अब वह आयत को सहारा दे रहा था।
आयत ने अपनी जेब से मीरा की चिट्ठी निकाली।
—मुझे पता है कि आपको मेरी बीमारी के बारे में पहले से पता था।
दादी हँसी।
—अब यह झूठ भी बोलने लगी?
राहुल की आवाज बर्फ जैसी ठंडी थी।
—जवाब दो, माँ।
दादी चौंकी।
—तू अपनी माँ से ऐसे बात करेगा?
—जब बात मेरी बेटी की जान की हो, हाँ।
दादा ने गहरी साँस ली।
—फोन आया था। तो क्या? हम तुझे परेशान नहीं करना चाहते थे।
—मेरी बेटी के पेट में गांठ थी, और आप मुझे परेशान नहीं करना चाहते थे?
दादी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
—क्योंकि तू पहले ही मीरा के लिए आधा मर चुका था! अब अपना गैराज बेच देता, कर्ज में डूब जाता, खुद को खत्म कर लेता इस बच्ची के लिए, जिसने तेरी जिंदगी पहले ही बर्बाद कर दी!
कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा।
आयत पीछे हट गई।
पर इस बार राहुल चुप नहीं रहा।
—उसे फिर कभी ऐसा मत कहना।
दादी ठिठक गई।
—क्या?
—कभी नहीं।
—मैं तेरी माँ हूँ।
—और वह मेरी बेटी है।
आयत ने पिता की तरफ देखा। “मेरी बेटी।” यह 2 शब्द उसके भीतर गर्म रोशनी की तरह उतरे। इतने सालों में पहली बार उसने खुद को किसी की जिम्मेदारी नहीं, किसी की अपनी महसूस किया।
राहुल ने हाथ बढ़ाया।
—चिट्ठी दो।
आयत ने धीरे से चिट्ठी उसके हाथ में रख दी।
राहुल ने सबके सामने पढ़ा। हर पंक्ति के साथ उसका चेहरा टूटता गया। जब वह उस वाक्य तक पहुँचा—“तू मेरी मुसीबत नहीं, मेरी रौशनी है”—तो उसकी आवाज बंद हो गई। उसने चिट्ठी को ऐसे मोड़ा जैसे किसी पवित्र चीज को छू रहा हो।
—मीरा ने मुझसे इसे बचाने की उम्मीद की थी, उसने बमुश्किल कहा।
आयत ने बहुत धीरे से कहा—
—आपने नहीं बचाया।
राहुल ने कोई सफाई नहीं दी।
—नहीं। मैंने नहीं बचाया।
दादी ने तिरस्कार से कहा—
—मर चुकी औरत की चिट्ठी सच नहीं बदल देती।
राहुल सीधा उसकी तरफ मुड़ा।
—सच यह है कि मीरा अस्पताल की जटिलता से गई। सच यह है कि एक बच्ची बच गई। सच यह है कि आपने मेरे दुख को जहर बनाया और मेरी बेटी को पिलाते रहे। और सच यह भी है कि मैंने आपको रोका नहीं।
दादा खड़े हो गए।
—जुबान संभाल।
—नहीं। अब आप संभालिए। आपने एक बच्ची को उसकी जन्म तारीख से नफरत करना सिखाया। आपने उसकी बीमारी छिपाई। शायद आपके मन के किसी कोने में यही इच्छा थी कि यह भी चली जाए और आपकी कहानी पूरी हो जाए।
दादी का चेहरा सफेद पड़ गया।
—तू हमें घर से निकालेगा उसके लिए?
राहुल ने दरवाजा खोल दिया।
—उसके लिए नहीं। उस सच के लिए जिसे आपने 8 साल दबाया। और उस पिता के लिए, जो मैं अब बनना चाहता हूँ।
दादा ने गुस्से में कोट उठाया। दादी आयत के पास से गुजरी और फुसफुसाई—
—एक दिन पछताएगा, राहुल। खून को छोड़कर इस अपशकुन को चुना है।
राहुल की आवाज धीमी लेकिन साफ थी।
—मेरा खून यही है।
दरवाजा बंद हो गया।
आयत की टाँगें कांप रही थीं। राहुल उसके सामने घुटनों के बल बैठा। इस बार उसे झुकाने के लिए नहीं, उसकी ऊँचाई तक आने के लिए।
—मैं 8 साल वापस नहीं ला सकता, उसने कहा। मैं फर्श पर गिरा केक नहीं जोड़ सकता। मैं तेरे अकेले जन्मदिन, तेरी रातों के आँसू, तेरी हर माफी वापस नहीं ले सकता। पर मैं आज से शुरू कर सकता हूँ। तुझे मानूँगा। तुझे बचाऊँगा। तुझे सच बताऊँगा। चाहे तू मुझे कभी माफ न करे।
आयत ने लंबी साँस ली।
—मुझे अभी माफ करना नहीं आता। लेकिन मुझे जीना है।
राहुल ने सिर झुका लिया और रो पड़ा।
ऑपरेशन वाडिया बाल अस्पताल में हुआ। 6 घंटे तक राहुल गलियारे में बैठा रहा। रोजी आंटी उसके पास थीं। उसके हाथ में मीरा की चिट्ठी थी और जेब में गुलाबी मोमबत्ती।
जब डॉक्टर बाहर आए, राहुल दीवार से टिक गया।
—गांठ निकाल दी गई है, डॉक्टर ने कहा। आगे का इलाज लंबा होगा, पर उम्मीद मजबूत है।
—वह बचेगी? राहुल ने पूछा।
—हम पूरी कोशिश करेंगे, और अभी हमारे पास भरोसा करने की वजह है।
अगली सुबह आयत ने आँख खोली तो राहुल कुर्सी पर सोया था। उसका हाथ बिस्तर के पास था, पर उसने आयत को छूने की हिम्मत नहीं की थी। आयत ने अपनी उंगली हिलाई। वह तुरंत जाग गया।
—मैं यहीं हूँ, उसने कहा। अब नहीं जाऊँगा।
इस बार उसने वादा निभाया।
महीने आसान नहीं थे। दवाइयाँ थीं, उल्टियाँ थीं, रात के डर थे, बालों का झड़ना था, आयत का गुस्सा था, राहुल की शर्म थी। कई बार आयत उसे दूर धकेल देती। कई बार वह दरवाजे के बाहर बैठा रहता और बस कहता—
—जब बुलाएगी, आ जाऊँगा।
रोजी आंटी ने राहुल को मीरा की पसंद की दाल बनाना सिखाया। उसने दवाइयों की बोतलों पर रंगीन कागज चिपकाए। उसने स्कूल की कॉपियों के किनारे छोटे सूरज बनाए, क्योंकि आयत अब अस्पताल में पढ़ती थी। उसने मीरा की कब्र पर जाना बंद नहीं किया, लेकिन अब आयत को घुटनों पर नहीं बैठाता था। वह उसके साथ खड़ा होता और कहता—
—तेरी माँ रविवार की शाम से नफरत करती थी। इसलिए रसोई में गाने लगती थी।
—अच्छा गाती थीं?
—बहुत बुरा।
—फिर भी गाती थीं?
—पूरे आत्मविश्वास से।
आयत पहली बार कब्र के सामने हँसी। वह हँसी किसी की बेइज्जती नहीं थी। वह मीरा को वापस कहानी में लाने की शुरुआत थी।
ऊपर वाला कमरा फिर कभी बंद नहीं हुआ। राहुल ने आयत को वहाँ की हर तस्वीर दिखाई। मीरा का खाली इत्र, उसकी लाल चुनरी, शादी की तस्वीर, वह पुराना छोटा खिलौना जो उसने आयत के लिए खरीदा था। राहुल ने उसे बताया कि मीरा पेट पर हाथ रखकर कहती थी—
—मेरी बेटी आएगी तो इस घर में फिर शोर होगा।
आयत ने उस दिन समझा कि उसकी माँ सिर्फ कब्र नहीं थी। वह एक आवाज थी, एक हँसी थी, एक अधूरा सपना थी, जिसे झूठ ने उससे चुरा लिया था।
दादा-दादी ने कई बार लौटने की कोशिश की। राहुल ने शर्त रखी—जब तक वे आयत से माफी नहीं मांगेंगे और उसे दोष कहना बंद नहीं करेंगे, दरवाजा बंद रहेगा। दादी ने महीनों तक फोन नहीं किया। दादा ने मोहल्ले में बातें फैलाने की कोशिश की, पर अस्पताल की रिपोर्ट, रोजी आंटी की गवाही और सामाजिक कार्यकर्ता की चेतावनी के बाद उनकी आवाज कमजोर पड़ गई।
आयत धीरे-धीरे ठीक हुई। वह बिना निशान की बच्ची नहीं बनी। 8 साल की गिल्ट आत्मा से ऐसे नहीं धुलती जैसे हाथ से क्रीम धुल जाती है। कुछ जन्मदिनों की सुबह उसका पेट बिना वजह सख्त हो जाता। कभी कोई ऊँची आवाज उसे उसी कब्रिस्तान में लौटा देती। कभी वह आईने में खुद को देखकर सोचती—क्या सचमुच मेरा होना किसी की कमी नहीं?
तब राहुल दरवाजे पर रुककर पूछता—
—अंदर आ सकता हूँ?
अब वह बिना पूछे कमरे में नहीं घुसता था। आयत कभी हाँ कहती, कभी नहीं। दोनों जवाबों को वह स्वीकार करता।
उसके 9वें जन्मदिन पर राहुल ने 1 बड़ा स्ट्रॉबेरी केक खरीदा। आयत ने आधा ही खाया, पर फर्श पर कुछ नहीं गिरा। 10वें जन्मदिन पर रोजी आंटी आईं और 2 सहेलियाँ भी। 12वें जन्मदिन पर राहुल उसे जुहू समुद्र दिखाने ले गया, क्योंकि मीरा कहा करती थी कि बच्चे को पहली बार समुद्र दिखाना किसी त्योहार से कम नहीं।
और 16वें जन्मदिन की सुबह आयत रसोई में उतरी तो मेज पर वही छोटा गोल सफेद केक रखा था। ऊपर 1 स्ट्रॉबेरी थी और 16 गुलाबी मोमबत्तियाँ टेढ़ी-मेढ़ी लगी थीं।
राहुल काउंटर के पास खड़ा था, घबराया हुआ।
—मुझे नहीं पता यह ठीक है या नहीं, उसने कहा। पर मुझे लगा, उस केक को हम पूरी जिंदगी फर्श पर पड़ा नहीं छोड़ सकते।
आयत ने केक को देखा, फिर पिता को।
—यह ठीक है, पापा।
राहुल ने मोमबत्तियाँ जलाईं। उसके हाथ अब भी कांपते थे। उसने जन्मदिन का गीत बेसुरा गाया, बीच में शब्द भूल गया, फिर खुद पर हँस पड़ा। आखिरी पंक्ति पर उसकी आवाज भर्रा गई।
आयत ने आँखें बंद कीं।
इस बार उसने माँ से माफी नहीं मांगी। उसने यह भी नहीं माँगा कि वह गायब हो जाए ताकि किसी का दुख हल्का हो जाए।
उसने बस मन ही मन कहा—
मम्मा, हमने थोड़ा सा सुकून जीत लिया।
फिर उसने मोमबत्तियाँ बुझा दीं।
क्रीम का स्वाद मीठा था, हल्का था, वैसा ही जैसा 8 साल की उम्र में था। लेकिन इस बार उसमें डर नहीं था। अपराध नहीं था। विदाई नहीं थी।
इस बार उसमें जिंदगी थी।
बहुत साल बाद, जब आयत अकेले बांद्रा के उस कब्रिस्तान से गुजरती, तो मीरा की कब्र पर 1 स्ट्रॉबेरी रखती। तस्वीर की तरफ मुस्कुराकर कहती—
—मम्मा, मैं यहाँ हूँ। और मैंने किसी से कुछ नहीं छीना।
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