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6 साल जेल काटकर लौटी पत्नी अपनी हवेली मांगने पहुंची, तो पति ने प्रेमिका के सामने कहा “एक सजायाफ्ता औरत को कौन मानेगा”, मगर अदालत में निकले एक लिफाफे ने उसका घर, नाम और पूरी जिंदगी हमेशा के लिए वापस पलट दी

PART 1

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जिस दिन 6 साल बाद रिहा होकर मीरा चौहान अपने मायके की हवेली मांगने लौटी, उसके पति ने दरवाजे पर ही कह दिया—“एक सजायाफ्ता औरत की बात कोई नहीं मानेगा, मीरा। मेरे लिए तू उसी दिन मर गई थी, जिस दिन पुलिस तुझे ले गई थी।”

जयपुर सेंट्रल जेल के भारी लोहे के फाटक से बाहर निकलते समय मीरा के पास बस एक प्लास्टिक का थैला था, जिसमें पुराने कागज, 420 रुपये, एक जोड़ी चप्पल और जेल की एक सहेली द्वारा दिया गया मुड़ा हुआ पता रखा था। न कोई पति आया, न कोई रिश्तेदार, न कोई पुराना कर्मचारी। 6 साल पहले जिस औरत को शहर की सबसे समझदार बिजनेसवुमन कहा जाता था, आज वही सड़क किनारे खड़ी थी जैसे दुनिया ने उसका नाम मिटा दिया हो।

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मीरा पर अपने पिता की निर्माण-सामग्री कंपनी से करोड़ों की धोखाधड़ी का आरोप लगा था। उसने बार-बार कहा था कि कागज नकली हैं, बैंक ट्रांसफर उसने नहीं किए, मगर अदालत में उसके पति राघव चौहान और उसकी सेक्रेटरी शालिनी माथुर ने ऐसे दस्तावेज पेश किए कि मीरा को 6 साल की सजा हो गई। उस दिन राघव ने अदालत के बाहर उसका हाथ पकड़कर कहा था—“हिम्मत रखना। हवेली और कंपनी मैं संभाल कर रखूंगा।”

अब मीरा उसी हवेली के बाहर खड़ी थी, जहां उसकी मां ने तुलसी लगाई थी, जहां पिता ने बरामदे में झूला लगाया था। लेकिन लोहे का पुराना नीला गेट गायब था। उसकी जगह काला ऑटोमैटिक गेट, कैमरा और संगमरमर की नई दीवारें थीं।

उसने घंटी दबाई।

अंदर से एक अजनबी आदमी निकला।

—जी?

—मैं मीरा चौहान हूं। यह मेरा घर है।

आदमी असहज हो गया।

—मैडम, हमने यह हवेली 3 साल पहले खरीदी है। सारे कागज सही हैं। आपके पति राघव चौहान ने आपकी पावर ऑफ अटॉर्नी से बिक्री की थी।

मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने दीवार पकड़ी, पर गिरी नहीं। गेट धीरे-धीरे बंद हो गया, जैसे उसके बचपन, उसके माता-पिता और उसकी आखिरी उम्मीद को फिर से कैद कर रहा हो।

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वह सीधे पुरानी कंपनी के गोदाम पहुंची। वहां अब एक महंगा मॉड्यूलर किचन शोरूम था। गार्ड ने उसे पहचानते ही धीमे स्वर में कहा कि कंपनी पहले बंद हुई, फिर बेच दी गई। राघव हर जगह शालिनी के साथ आता था। वही कागज संभालती, वही साइन करवाती, वही आदेश देती।

शाम को मीरा ने राघव को एक बड़े होटल में देखा। उसके साथ शालिनी बैठी थी, गले में मीरा की मां का हार पहने हुए।

मीरा उसके सामने जा खड़ी हुई।

राघव मुस्कुराया नहीं। वह उठा, उसे किनारे ले गया और दांत भींचकर बोला—

—तू जेल से आई है, मंदिर से नहीं। तूने सब साइन किया था।

—मैंने कुछ नहीं साइन किया।

—कौन मानेगा? एक धोखेबाज औरत? मेरे वकील बड़े लोगों के साथ बैठते हैं। शालिनी शहर के हर नोटरी को जानती है। तेरे पास क्या है? जेल का रिकॉर्ड और यह प्लास्टिक का थैला?

मीरा ने पहली बार समझा कि 6 साल की जेल उसकी सजा नहीं थी। असली सजा तो अब शुरू हुई थी। तभी शालिनी ने दूर से हंसते हुए अपनी चूड़ियां खनकाईं और राघव ने कहा—

—भाग जा, वरना इस बार वापस अंदर भेज दूंगा।

PART 2

उस रात मीरा जयपुर बस स्टैंड की बेंच पर बैठी रही। सुबह उसने वह मुड़ा हुआ पता निकाला, जो जेल की सहेली नादिया ने दिया था—“मेरी अम्मी के पास चली जाना, अगर दुनिया कहीं जगह न दे।”

पता अजमेर के पास एक छोटे कस्बे का था। जरीना बेगम की टूटी-सी कोठरी में मीरा को पहली बार बिना सवाल की रोटी मिली। बूढ़ी औरत ने बस इतना पूछा—

—मेरी नादिया जिंदा है?

मीरा रो पड़ी।

कुछ दिनों बाद मीरा ने सब बताया—राघव, शालिनी, नकली साइन, बिकी हुई हवेली, गायब कंपनी और कनाडा में बसे मामा की वह विरासत, जिसका पत्र जेल में आया था, फिर अचानक बंद हो गया था।

जरीना ने एक पुरानी डिबिया से एक वकील का कार्ड निकाला।

—अर्जुन त्रिपाठी। बड़ा आदमी नहीं है, पर गलत आदमी से डरता नहीं।

अर्जुन ने मीरा की बात सुनी, बिना उसे अपराधी की तरह देखे।

—आपके पति ने आपका इंतजार नहीं किया, मीरा जी। उसने आपकी अनुपस्थिति को हथियार बनाया है।

फिर उसने जेल रिकॉर्ड, नोटरी कागज, बैंक फाइलें और पुराने कर्मचारियों को खंगालना शुरू किया। कई पावर ऑफ अटॉर्नी उन तारीखों पर बनी थीं जब मीरा जेल अस्पताल में बेहोश पड़ी थी।

सुनवाई से 2 दिन पहले अर्जुन पर हमला हुआ। अदालत वाले दिन सबको लगा वह नहीं आएगा।

राघव मुस्कुराया।

तभी अदालत का दरवाजा खुला।

अर्जुन बैसाखी के सहारे अंदर आया—चेहरा सूजा हुआ, हाथ में एक भूरे रंग का लिफाफा।

PART 3

अदालत में एक पल के लिए ऐसी खामोशी छा गई जैसे किसी ने पूरे कमरे की सांस रोक दी हो। राघव की मुस्कान जम गई। शालिनी का चेहरा पीला पड़ गया। मीरा की आंखें अर्जुन पर टिक गईं। वह जानती थी, यह आदमी दर्द में है, पर वह टूटा नहीं है।

अर्जुन धीरे-धीरे अपनी मेज तक आया। उसने बैसाखी दीवार से टिकाई, फाइल खोली और जज की ओर देखकर बोला—

—महोदय, मेरी देरी के लिए क्षमा चाहता हूं। कुछ लोगों ने मुझे अदालत तक आने से रोकने की बहुत कोशिश की।

राघव के वकील ने तुरंत कहा—

—भावनात्मक नाटक से कानून नहीं चलता।

अर्जुन ने शांत स्वर में जवाब दिया—

—बिलकुल। इसलिए आज हम सिर्फ तथ्य रखेंगे।

सबसे पहले उसने जेल के मेडिकल रिकॉर्ड पेश किए। जिस दिन मीरा की मुख्य पावर ऑफ अटॉर्नी बनी बताई गई थी, उसी दिन वह जेल अस्पताल में भर्ती थी। उसके सिर पर चोट थी और डॉक्टर ने साफ लिखा था कि वह 48 घंटे तक कोई कानूनी दस्तावेज पढ़ने या समझने की स्थिति में नहीं थी।

फिर उसने हस्ताक्षर विशेषज्ञ की रिपोर्ट रखी। रिपोर्ट में साफ था कि मीरा के नाम से किए गए 11 साइन एक ही व्यक्ति द्वारा नकल करके बनाए गए थे, मगर वे मीरा की असली लिखावट नहीं थे।

राघव का वकील फिर खड़ा हुआ—

—एक सजायाफ्ता व्यक्ति अपने फायदे के लिए कुछ भी कह सकता है।

अर्जुन ने भूरे लिफाफे से प्रिंटआउट निकाले।

—यही सोचकर इन लोगों ने सब किया। उन्हें लगा जेल से निकली औरत की आवाज आधी दुनिया पहले ही खारिज कर देगी।

उसने ईमेल पढ़वाए। वे राघव और शालिनी के बीच थे। एक में राघव ने लिखा था—“सारे ट्रांसफर मीरा की रिहाई से पहले खत्म होने चाहिए। 6 साल बाद उसकी बात कौन मानेगा?”

मीरा की उंगलियां कांप उठीं। वही वाक्य। वही क्रूर आत्मविश्वास। वही आदमी जिसने उसे पत्नी नहीं, अवसर समझा था।

फिर पुराने अकाउंटेंट मनोज अग्रवाल का बयान पढ़ा गया। उसने कहा था कि शालिनी ने मीरा की पहचान-पत्र की कॉपी स्कैन की थी और हंसकर कहा था—“जेल में बैठी औरत कागजों से लड़ने नहीं आएगी।”

अदालत में बैठे लोग एक-दूसरे को देखने लगे। अभी तक जो फुसफुसाहट मीरा के खिलाफ थी, वह धीरे-धीरे राघव की ओर मुड़ने लगी।

अर्जुन ने आखिरी कागज निकाला—कनाडा वाले मामा की विरासत का बैंक रिकॉर्ड। मीरा के नाम आए 1.8 करोड़ रुपये पहले एक नए खाते में गए, फिर राघव की कंपनी और शालिनी के भाई के नाम वाली फर्मों में बांट दिए गए।

जज ने फाइलों को देर तक देखा। फिर कठोर स्वर में आदेश दिया कि सभी विवादित संपत्ति और खातों पर तत्काल रोक लगाई जाए, हवेली की बिक्री की जांच हो, कंपनी के शेयर फ्रीज किए जाएं और मामला आर्थिक अपराध शाखा को भेजा जाए। साथ ही मीरा की पुरानी सजा की पुनर्समीक्षा का आदेश भी हुआ, क्योंकि वही लोग उसके खिलाफ मुख्य कागजों के स्रोत थे।

राघव पहली बार सचमुच डरा। शालिनी ने उसके कान में कुछ कहा, मगर उसने उसकी ओर देखा भी नहीं। जिस आदमी ने 6 साल तक मीरा को अकेला छोड़ा था, वह अब अपने बचाव में अपनी प्रेमिका को भी अकेला छोड़ने को तैयार था।

अदालत से बाहर निकलते समय पत्रकारों ने मीरा को घेर लिया। कैमरे चमक रहे थे। किसी ने पूछा—

—आपको क्या कहना है?

मीरा ने बस अर्जुन की ओर देखा। उसका चेहरा दर्द से भरा था, मगर आंखों में शांति थी।

—आज मेरा घर नहीं लौटा, मेरा नाम लौटा है।

कुछ हफ्तों बाद हवेली की बिक्री धोखाधड़ी के आधार पर रद्द हुई। कंपनी की जमीन और बचे हुए खाते कानूनी नियंत्रण में आए। राघव और शालिनी गिरफ्तार हुए। मीरा की पुरानी सजा पर फिर से सुनवाई शुरू हुई। शहर, जिसने उसे कभी धोखेबाज कहा था, अब उसी के दरवाजे पर माफी की भाषा खोज रहा था।

लेकिन मीरा तुरंत हवेली में नहीं लौटी। उस घर की दीवारों पर अब भी राघव के चुने हुए रंग थे, संगमरमर पर अजनबियों के कदमों के निशान थे, और बरामदे में वह झूला नहीं था जिसमें पिता उसे बचपन में धक्का देते थे। उसने पहली रकम से हवेली की मरम्मत नहीं करवाई। उसने जरीना बेगम की छत ठीक करवाई।

फिर उनके घर की टूटी नाली बदली। फिर रसोई। फिर आंगन में नई चारपाई और नादिया के कमरे में साफ बिस्तर।

जरीना हर मजदूर को देखकर रो देतीं।

—तू खुद उजड़ी हुई आई थी, बेटी। फिर भी दूसरों की दीवारें उठा रही है।

मीरा कहती—

—आपकी बेटी ने मुझे पता दिया था, अम्मी। वह पता नहीं होता तो शायद मैं बचती ही नहीं।

मीरा ने अर्जुन से नादिया के लिए भी पैरोल और सजा में राहत की अर्जी लगवाई। नादिया का जेल रिकॉर्ड अच्छा था, उसकी मां बीमार थी और मीरा ने उसे अपनी नई कंपनी में नौकरी देने का पत्र दिया। अर्जुन ने बिना फीस की बात किए फाइल तैयार कर दी।

3 महीने बाद नादिया जेल से बाहर आई। उसके हाथ में छोटा सा बैग था और आंखों में डर। जरीना फोन पर रो रही थीं। मीरा ने उसे गले लगाया।

नादिया बुदबुदाई—

—मैंने तो बस एक पता दिया था।

—कभी-कभी एक पता पूरी जिंदगी बचा लेता है।

मीरा ने पुराने गोदाम की जगह नई कंपनी शुरू की। नाम रखा—“नई शुरुआत निर्माण सेवा।” वहां उसने उन औरतों को नौकरी दी जिनके पति उन्हें छोड़ गए थे, उन पुरुषों को जिन्हें हादसे के बाद कोई काम नहीं दे रहा था, और जेल से छूटे लोगों को जिन्हें समाज हमेशा शक की नजर से देखता था। दरवाजे पर उसने हिंदी में लिखवाया—“यहां दोबारा शुरू किया जाता है।”

नादिया दफ्तर के खातों में मदद करने लगी। शुरुआत में वह हर कागज को 3 बार जांचती, हर गलती पर डर जाती। मीरा उसे डांटती नहीं थी। वह जानती थी कि जेल से शरीर पहले निकलता है, आत्मा बहुत बाद में।

एक दिन नादिया गोदाम में बेहोश हो गई। अस्पताल में डॉक्टर ने मीरा को बाहर रुकने को कहा। कुछ देर बाद नादिया ने खुद उसका हाथ पकड़कर भीतर बुलाया।

उसकी आवाज बहुत धीमी थी—

—मैं गर्भवती हूं।

मीरा स्तब्ध रह गई।

नादिया की आंखों में शर्म, डर और अपमान एक साथ थे। पिता एक जेल प्रहरी था, जिसने उसे शादी का वादा किया था। उसने कहा था कि वह बाहर आकर उसे घर ले जाएगा। लेकिन जब उसे गर्भ का पता चला तो वह गायब हो गया, क्योंकि उसके ससुर पुलिस विभाग में थे और वह अपनी नौकरी व इज्जत नहीं खोना चाहता था।

—अम्मी मर जाएंगी शर्म से, नादिया ने कहा।

मीरा ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।

—तुम्हारी अम्मी नानी बनेंगी। शर्म उसे आनी चाहिए जिसने वादा तोड़ा।

जब पता चला कि जुड़वां बच्चे हैं, नादिया टूट गई। उसे डर था कि उसकी किस्मत बच्चों तक चली जाएगी। जरीना ने बिस्तर के पास दुआओं की ताबीज बांधी। मीरा हर जांच में साथ गई। उसने 2 पुराने पालने खरीदे, छोटे कपड़े धोए, कमरे की दीवारों पर हल्का सफेद रंग करवाया और पहली बार महसूस किया कि उजड़े हुए लोग भी किसी के आने की तैयारी कर सकते हैं।

अर्जुन अक्सर रात के खाने पर आता। उसका अपना वैवाहिक जीवन खत्म हो रहा था। उसकी पत्नी उसे छोड़ चुकी थी, क्योंकि वह “कम कमाने वाले मामलों” में न्याय ढूंढ़ता था। वह मीरा से कुछ मांगता नहीं था। बस कभी फाइल लेकर बैठता, कभी जरीना की दवा लाता, कभी नादिया के लिए फल। उसकी उपस्थिति में कोई दबाव नहीं था, सिर्फ भरोसा था।

फिर एक रात 3 बजकर 17 मिनट पर फोन आया।

नादिया को प्रसव के दौरान भारी रक्तस्राव हुआ था। बच्चे जीवित थे। नादिया नहीं बची।

मीरा के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। जरीना ने उसके चेहरे को देखकर सब समझ लिया। बूढ़ी औरत की चीख ने पूरी कोठरी हिला दी। उस रात मीरा ने जाना कि कुछ दर्द अदालत में जीतकर भी नहीं हारते, वे भीतर घर बना लेते हैं।

सुबह मीरा अस्पताल की नवजात इकाई के बाहर खड़ी थी। शीशे के पार 2 छोटे बच्चे सफेद कपड़े में लिपटे थे। एक ने मुट्ठी बंद कर रखी थी, जैसे दुनिया से पहले ही लड़ने को तैयार हो। दूसरा धीमे-धीमे सांस ले रहा था।

मीरा ने उसी क्षण फैसला कर लिया।

वे बच्चे अनाथालय नहीं जाएंगे। अलग नहीं किए जाएंगे। वे नादिया की आखिरी सांस की जिम्मेदारी थे। मीरा उन्हें पालेगी।

लेकिन राघव की आखिरी क्रूरता अभी बाकी थी।

नादिया के शव की औपचारिकता के लिए जब मीरा अस्पताल के शवगृह पहुंची, वहां राघव अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम कर रहा था। जो आदमी कभी महंगी गाड़ियों और बड़े लोगों के बीच घूमता था, अब सफेद दीवारों वाले ठंडे गलियारे में स्ट्रेचर धकेल रहा था। पर उसकी आंखों में वही जहर था।

—वाह, मीरा, उसने हंसकर कहा। अब जेल वाली औरतों के बच्चे भी जमा कर रही है?

मीरा ने आगे बढ़ना चाहा। उसने रास्ता रोक लिया।

—मैं बाल कल्याण समिति को बता दूंगा कि तू जेल की औरतों और बच्चों का धंधा कर रही है। तेरे जैसे रिकॉर्ड वाली औरत को 2 नवजात कौन देगा?

मीरा ने ठंडे स्वर में कहा—

—हट जाओ।

राघव झुककर फुसफुसाया—

—मैंने तेरे 6 साल ले लिए। 2 बच्चों को लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं।

थप्पड़ की आवाज पूरे गलियारे में गूंजी।

मीरा की हथेली जल रही थी, लेकिन उसकी आवाज स्थिर थी—

—अब तुम मुझसे कुछ नहीं लोगे। मेरी डर भी नहीं।

राघव ने शिकायत की। फिर बाल कल्याण विभाग में गुमनाम सूचना पहुंची कि मीरा नवजात बच्चों को गलत उद्देश्य से रखना चाहती है। मोहल्ले में अफवाह फैल गई। कुछ पड़ोसी फुसफुसाने लगे। दवा की दुकान वाली ने जरीना से पूछ लिया कि “ऐसे बच्चों” को संस्था में रखना बेहतर नहीं होता क्या।

मीरा लगभग टूट गई। अपने लिए नहीं। उन 2 बच्चों के लिए, जो दूध पीते समय उसकी उंगली पकड़ लेते थे। जरीना रातों को जागती रहतीं, डरतीं कि कहीं कोई सरकारी गाड़ी आकर बच्चों को ले न जाए।

अर्जुन उस रात आया तो उसके हाथ में फूल नहीं, फाइल थी। उसने राघव की शिकायत की कड़ी खोजी। अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि राघव ने पहले भी गरीब परिवारों से शव जल्दी दिलाने के नाम पर पैसे लिए थे। एक कॉल रिकॉर्डिंग मिली जिसमें वह मीरा के खिलाफ झूठी सूचना देने की बात कर रहा था। अर्जुन ने सबूत बाल कल्याण समिति और पुलिस को दिए।

5 हफ्तों बाद राघव फिर गिरफ्तार हुआ। इस बार उसके चेहरे पर कोई घमंड नहीं था। वह एक छोटे आदमी की तरह पकड़ा गया, जिसकी सारी बड़ी आवाजें झूठ से बनी थीं।

जब मीरा को बच्चों की स्थायी देखभाल की अनुमति मिली, वह अदालत के गलियारे में चुपचाप रो पड़ी। अर्जुन उसके पास खड़ा था। जरीना दोनों बच्चों को सीने से लगाए बैठी थीं। उनकी झुर्रियों में आंसू चमक रहे थे, पर चेहरा पहली बार शांत था।

शाम को घर लौटकर जरीना ने बच्चों को सुलाया। आंगन में नीम के नीचे अर्जुन ने मीरा से कहा—

—मैं तुम्हारा उद्धारकर्ता नहीं बनना चाहता। मैं बस वह आदमी बनना चाहता हूं जो तुम्हारे साथ रुके, अगर तुम जगह दो।

मीरा ने खिड़की के भीतर देखा। जरीना एक बच्चे की पीठ सहला रही थीं। दूसरे पालने में नींद से करवट बदल रहा था।

—मेरे जीवन में झूठ बहुत रहे हैं, अर्जुन।

—तो सच से घर बनाएंगे। धीरे-धीरे, ईंट-ईंट।

—और बच्चे?

अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

—मैं पिता नहीं बन सकता, यह बात मुझे बहुत पहले पता चल गई थी। लेकिन अगर तुम चाहो, तो इन 2 बच्चों को मेरे नाम की जरूरत कागज से पहले मेरे व्यवहार में मिलेगी।

मीरा रो पड़ी। यह रोना हार का नहीं था। यह उस औरत का रोना था जिसे पहली बार किसी नरमी से डर नहीं लगा।

—मुझसे एक वादा करो, उसने कहा।

—जो कहो।

—इस घर में किसी को इसलिए नहीं छोड़ा जाएगा कि वह बोझ लगता है।

अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।

—कभी नहीं।

6 महीने बाद मीरा और अर्जुन ने जरीना के आंगन में शादी की। कोई शाही मंडप नहीं था, बस सफेद कपड़े की छोटी-सी छांव, 34 लोग, 2 सोते हुए बच्चे और नीम की शाख पर टंगी नादिया की मुस्कुराती तस्वीर। जरीना ने कांपते हाथों से मीरा के माथे पर चुन्नी ठीक की और कहा—

—आज मेरी बेटी की औलाद को घर मिल गया।

हवेली बाद में मीरा को पूरी तरह वापस मिली। उसने वहां खुद रहने के बजाय अपनी कंपनी का मुख्य दफ्तर बनाया। पिता का पुराना झूला फिर लगवाया। मां की जगह तुलसी और चमेली फिर रोपी गई। बरामदे की दीवार पर उसने एक पंक्ति लिखवाई—“जिसे दुनिया गिरा दे, उसे यहां उठाया जाएगा।”

राघव और शालिनी को सजा हुई। चोरी किया पैसा लौटा, मगर वह 6 साल नहीं लौटा सका। न मीरा के माता-पिता लौटे, न नादिया। लेकिन उसी पैसे से वकीलों की फीस भरी गई, मजदूरों की तनख्वाह दी गई, बच्चों के पालने खरीदे गए और उन औरतों की मदद हुई जिनकी आवाज कभी किसी ने नहीं सुनी थी।

कभी-कभी रात में मीरा आंगन में बैठती। दोनों बच्चे उसकी गोद में सोते, एक उसकी साड़ी का किनारा पकड़ता, दूसरा उसकी उंगली। अंदर जरीना दुआ पढ़तीं। रसोई में अर्जुन दूध की बोतलें बनाते हुए बेसुरा गुनगुनाता।

मीरा को राघव की वह बात याद आती—“मेरे लिए तू मर गई थी।”

वह सच नहीं था।

उस दिन मीरा नहीं मरी थी। उस दिन सिर्फ वह औरत मर गई थी, जो प्रेम पाने के लिए अपमान सहती रही।

नई मीरा जानती थी कि कुचली हुई जमीन में भी पौधे उगते हैं। एक मुड़ा हुआ पता किसी की जान बचा सकता है। बूढ़ी औरत की रोटी चोरी हुए करोड़ों से बड़ी हो सकती है। बैसाखी वाला वकील झूठ के महलों से ज्यादा मजबूत खड़ा हो सकता है।

और जब दोनों बच्चे उसकी हथेली पकड़कर सो जाते, मीरा कभी-कभी धीमे से नादिया से कहती—

—तुमने मुझे शरण दी थी। मैं वादा करती हूं, तुम्हारे बच्चों को घर दूंगी।

आंगन में तुलसी और चमेली साथ-साथ बढ़ रहे थे। पहले जैसे नहीं। उससे अलग। शायद ज्यादा मजबूत, क्योंकि वे उखाड़े जाने के बाद फिर लगाए गए थे।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.