
भाग 1
जिस दिन देवेंद्र शर्मा ने हँसते हुए कहा, “अगर उम्र कुछ कम होती तो मैं तुमसे शादी कर लेता,” उसी शाम उसके अपने बच्चों ने उसे फोन पर ऐसी बात कह दी कि वह हिमाचल की एक सुनसान पहाड़ी पर बने पुराने होमस्टे के बरामदे में अकेला खड़ा काँप गया।
वह वाक्य उसके लिए मजाक था, लेकिन काव्या मल्होत्रा के लिए नहीं। काव्या ने बस मुस्कुराकर उसकी ओर देखा था और धीमे से कहा था, “देवेंद्र जी, उम्र दीवार नहीं है… डर दीवार है।”
देवेंद्र 58 साल का था। दिल्ली के पास गुरुग्राम में उसकी एक पुरानी किताबों की दुकान थी, जो उसकी पत्नी मीरा के जाने के बाद लगभग बंद ही पड़ी रहती थी। मीरा को गए 3 साल हो चुके थे, पर देवेंद्र अब भी उसी सफेद कप में चाय पीता था जिसमें कभी मीरा उसके लिए अदरक वाली चाय डालती थी। घर में उसकी बेटी रिया और बेटा कबीर आते-जाते रहते थे, लेकिन दोनों को हमेशा यही लगता था कि पिता अपनी उदासी को पूजा बना चुके हैं।
रिया ने ही उसे जबरदस्ती हिमाचल के चंबा के पास एक छोटे से गाँव में भेजा था। वहाँ सेब के बागों, देवदार के पेड़ों और धुंध से घिरे एक पुराने पहाड़ी मकान को काव्या ने होमस्टे में बदल दिया था। काव्या 42 साल की थी। माता-पिता के निधन के बाद उसने अपने छोटे भाई निखिल को पाला था, उसकी पढ़ाई करवाई थी, और उसी पुराने घर को लोगों के लिए शांति की जगह बना दिया था। वह सुबह मेहमानों को चाय देती, शाम को रसोई में राजमा, कढ़ी और गरम फुल्कों की खुशबू फैलाती, और हर किसी से ऐसे बात करती जैसे वह उसके अपने घर का हिस्सा हो।
शुरू में देवेंद्र उससे बस औपचारिक बातें करता था। फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच लंबी बातचीत शुरू हुई। काव्या उसे पहाड़ी रास्तों पर उगने वाले जंगली फूलों के नाम बताती, वह उसे मीरा की पसंदीदा कविताएँ सुनाता। काव्या अपने बीमार माता-पिता की आखिरी रातों की बात करती, देवेंद्र मीरा के अस्पताल के दिनों की। दोनों के बीच कोई जल्दबाजी नहीं थी, कोई दावा नहीं था, बस दो घायल लोग थे जो एक-दूसरे के सामने बिना अभिनय के बैठ सकते थे।
उस दोपहर काव्या ने दालचीनी और गुड़ से बने गरम मीठे पराठे लाकर बरामदे की मेज पर रखे थे। हवा में बारिश से पहले की मिट्टी की गंध थी। काव्या किसी बात पर खुलकर हँसी, और देवेंद्र के मुँह से वही वाक्य निकल गया। उसे लगा काव्या भी हँस देगी, लेकिन काव्या की आँखें अचानक गंभीर हो गईं।
“आप मीरा जी से प्यार करते थे, इसलिए अकेले नहीं हैं,” उसने कहा, “आप डरते हैं, इसलिए अकेले हैं।”
देवेंद्र चुप रह गया। इतने सीधे शब्द किसी ने उससे कभी नहीं कहे थे। वह उठकर बाहर खेतों की तरफ चला गया। शाम तक आसमान सुनहरा हो चुका था। तभी रिया का फोन आया। दूसरी तरफ कबीर भी था। दोनों ने कड़क आवाज में कहा कि उन्हें लोगों से पता चला है, पिता किसी “होमस्टे वाली औरत” के साथ जरूरत से ज्यादा समय बिता रहे हैं। कबीर बोला, “पापा, इस उम्र में यह सब आपको शोभा नहीं देता। लोग क्या कहेंगे? माँ की याद का भी कोई सम्मान है या नहीं?”
देवेंद्र के हाथ से फोन लगभग छूट गया। उसी क्षण बरामदे के अंधेरे कोने से उसे काव्या की धीमी सिसकी सुनाई दी। वह सब सुन चुकी थी।
और तभी घर के अंदर से निखिल की घबराई हुई आवाज आई, “दीदी! जल्दी आइए… नीचे वाले कमरे में कोई बेहोश पड़ा है!”
भाग 2
काव्या भागते हुए अंदर गई तो देवेंद्र भी उसके पीछे चला आया। नीचे के कमरे में एक बुजुर्ग यात्री, मेजर अरविंद राणा, फर्श पर गिरे थे। बाहर अचानक पहाड़ी तूफान शुरू हो चुका था। बिजली चली गई थी, मोबाइल नेटवर्क गायब था, और सड़क पर भूस्खलन की आवाज दूर से गूँज रही थी।
काव्या ने घबराने के बजाय तुरंत मोमबत्तियाँ जलवाईं, निखिल को फर्स्ट एड बॉक्स लाने भेजा और देवेंद्र से कहा, “इनका हाथ पकड़े रहिए, इन्हें होश में रहना जरूरी है।”
देवेंद्र वर्षों बाद किसी की जरूरत बनकर खड़ा था। उसने मेजर राणा की नब्ज संभाली, उनके काँपते हाथ पर अपना हाथ रखा और उन्हें बोलता रहा। काव्या ने पुराने इन्वर्टर से छोटा मेडिकल फ्रिज चलाया, जिसमें उनकी दवा रखी थी। एक परिवार के बच्चे रो रहे थे, तो उसने उन्हें रसोई में बैठाकर गुड़ और घी के साथ रोटी दी। एक नई दुल्हन रास्ता बंद होने से रो रही थी, तो काव्या ने अपनी माँ की पुरानी शॉल उसके कंधे पर डाल दी।
देवेंद्र उसे देखता रहा। वह समझ रहा था कि काव्या सिर्फ होमस्टे नहीं चलाती थी, वह टूटे हुए लोगों को संभालती थी।
तभी मुख्य दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई। दरवाजा खुला तो भीगे हुए कबीर और रिया खड़े थे। वे पिता को वापस ले जाने आए थे। कबीर ने अंदर कदम रखते ही काव्या पर गुस्से से कहा, “आपको शर्म नहीं आई? अकेले आदमी की कमजोरी का फायदा उठा रही हैं?”
कमरे में सन्नाटा फैल गया। काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया, पर उसने जवाब नहीं दिया। उसने बस मेजर राणा की दवा उठाई और देवेंद्र से कहा, “इनकी सांस अटक रही है।”
उसी पल देवेंद्र ने पहली बार अपने बच्चों के सामने ऊँची आवाज में कहा, “चुप रहो, कबीर।”
कबीर स्तब्ध रह गया। रिया रो पड़ी। बाहर बिजली कड़क रही थी। फिर मेजर राणा ने कमजोर आवाज में काव्या का हाथ पकड़कर कहा, “बेटी… अगर तू न होती, तो आज मैं मर जाता।”
और उसी क्षण निखिल दरवाजे से भीतर आया। उसके हाथ में वह पुरानी डायरी थी जो काव्या की माँ ने मरने से पहले छोड़ी थी। वह काँपती आवाज में बोला, “दीदी… इसमें देवेंद्र अंकल का नाम लिखा है।”
भाग 3
डायरी का नाम सुनते ही काव्या के हाथ से दवा की शीशी लगभग गिर गई। वह कुछ पल तक निखिल को देखती रही, जैसे उसे भरोसा ही न हो कि इतने वर्षों बाद माँ की डायरी फिर खुली है। देवेंद्र भी हैरान था। उसने काव्या की माँ को कभी नहीं जाना था, कम से कम उसे ऐसा ही लगता था।
कमरे में मोमबत्तियों की लौ काँप रही थी। बाहर बारिश इतनी तेज थी कि छत पर गिरती बूंदों की आवाज किसी बेचैन दिल की धड़कन जैसी लग रही थी। मेजर राणा को दवा देकर काव्या ने उन्हें कंबल ओढ़ाया, फिर निखिल से डायरी ली। उसके हाथ काँप रहे थे। रिया और कबीर भी अब चुप थे। कुछ देर पहले जो लोग आरोप लगा रहे थे, अब वे एक ऐसी कहानी के सामने खड़े थे जिसकी शुरुआत शायद उनसे भी पुरानी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर काव्या की माँ, सुषमा मल्होत्रा, की लिखावट थी। शब्द कुछ धुंधले हो चुके थे, पर नाम साफ दिखाई दे रहा था—देवेंद्र शर्मा, दिल्ली।
काव्या ने पढ़ना शुरू किया। पन्नों में लिखा था कि लगभग 26 साल पहले, जब काव्या के पिता हरीश मल्होत्रा सेब के कारोबार में बुरी तरह डूब गए थे, तब किसी पुराने कॉलेज मित्र ने गुप्त रूप से उन्हें बड़ी रकम भेजी थी। उस मदद से उनका घर नीलाम होने से बच गया था, काव्या की पढ़ाई रुकी नहीं थी, और निखिल के जन्म के बाद अस्पताल का खर्च भी निकल गया था। सुषमा ने लिखा था कि वह व्यक्ति कभी सामने नहीं आया, क्योंकि उसने कहा था, “मदद का शोर कर दिया जाए तो वह एहसान बन जाती है।”
काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने धीरे से पूछा, “देवेंद्र जी… क्या यह आप थे?”
देवेंद्र जैसे किसी पुराने बंद कमरे में लौट गया। उसे याद आया, दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों का दोस्त हरीश, जो बेहद ईमानदार पर कमजोर किस्मत वाला आदमी था। हरीश ने शादी के बाद पहाड़ लौटकर सेब का कारोबार शुरू किया था। फिर एक साल अचानक उसका पत्र आया था—कर्ज, बीमारी, बैंक का नोटिस। उस समय देवेंद्र और मीरा की शादी को 4 साल हुए थे। दुकान नई-नई थी। पैसे ज्यादा नहीं थे। लेकिन मीरा ने अपनी शादी की एक सोने की चूड़ी उतारकर देवेंद्र के हाथ में रख दी थी और कहा था, “किसी का घर बच जाए, तो गहने फिर बन जाएंगे।”
देवेंद्र ने वह पैसा भेजा था। उसने हरीश से वादा लिया था कि वह उसका नाम कभी परिवार में नहीं बताएगा। कुछ साल बाद पत्र आना बंद हो गए। फिर जीवन भागता गया, बच्चे हुए, दुकान बड़ी हुई, मीरा बीमार हुई, और वह पुराना प्रसंग यादों की धूल में दब गया।
देवेंद्र की आवाज भर्रा गई। “मुझे नहीं पता था कि यह वही घर है,” उसने कहा, “मुझे नहीं पता था कि तुम हरीश की बेटी हो।”
काव्या ने डायरी सीने से लगा ली। वह रो रही थी, लेकिन उसके आँसू दुख के नहीं थे। वर्षों से वह सोचती रही थी कि उनके पिता ने अंतिम दिनों में भी कोई अधूरा कर्ज दिल में छुपाकर रखा होगा। आज उसे पता चला कि उस घर की दीवारों में किसी अजनबी की दया नहीं, मीरा की चूड़ी की चमक भी बसी थी।
रिया ने पहली बार काव्या को गौर से देखा। वह कोई चालाक औरत नहीं थी। वह एक ऐसी स्त्री थी जिसने अपने माता-पिता खोए थे, छोटे भाई को पाला था, और उसी घर को संभाला था जिसे कभी रिया की माँ ने बचाने में मदद की थी। रिया का चेहरा शर्म से झुक गया।
कबीर अभी भी कठोर दिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी आँखों में बेचैनी थी। उसने धीरे से कहा, “पापा, आपने हमें कभी यह क्यों नहीं बताया?”
देवेंद्र ने उसकी ओर देखा। “क्योंकि हर अच्छा काम बच्चों को विरासत में बताने की चीज नहीं होता। कुछ काम बस इसलिए किए जाते हैं क्योंकि उस पल इंसान होना जरूरी होता है।”
कबीर के चेहरे पर चोट-सी लगी। वह हमेशा खुद को व्यावहारिक समझता था। उसके लिए पिता की उदासी एक समस्या थी, पिता का नया लगाव शर्मिंदगी था, और काव्या एक खतरा। लेकिन उस रात वह देख रहा था कि पिता का दिल उसकी कल्पना से कहीं बड़ा और कहीं ज्यादा घायल था।
तूफान पूरी रात चलता रहा। सड़क बंद थी। सभी मेहमान उसी घर में फँसे रहे। काव्या ने किसी को भूखा नहीं सोने दिया। निखिल ने बरामदे में रस्सी बाँधकर पानी रोकने की कोशिश की। देवेंद्र ने मेजर राणा के पास बैठकर पहरा दिया। रिया ने रसोई में पहली बार काव्या के साथ काम किया। कबीर चुपचाप टूटे हुए खिड़की के फ्रेम पर प्लास्टिक चढ़ाता रहा।
रात के अंतिम पहर, जब बाकी लोग थककर सो गए, देवेंद्र बाहर बरामदे में आया। बारिश धीमी हो चुकी थी। पहाड़ियों पर धुंध उतर आई थी। काव्या वहाँ पहले से बैठी थी। उसके हाथ में वही डायरी थी।
काव्या ने बिना उसकी ओर देखे कहा, “आज आपके बच्चों ने जो कहा, उससे मुझे दुख हुआ। लेकिन उससे ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि आपने खुद को इतना छोटा मान लिया है कि आपको लगता है आपके जीवन में खुशी आने की कोई जगह नहीं बची।”
देवेंद्र चुप रहा।
काव्या बोली, “मीरा जी ने मेरे घर को बचाया था। यह मैं आज जान रही हूँ। लेकिन शायद उन्होंने आपको भी कभी बचाया होगा… आपके भीतर की अच्छाई को। आप उस प्रेम को कैद बनाकर क्यों जी रहे हैं?”
देवेंद्र की आँखें भर आईं। “मुझे डर लगता है,” उसने पहली बार साफ कहा। “मुझे लगता है कि अगर मैं फिर मुस्कुराया, तो मीरा से बेवफाई होगी। अगर किसी और का हाथ थामा, तो लोग कहेंगे बूढ़ा आदमी सुध-बुध खो बैठा। बच्चे क्या सोचेंगे, समाज क्या कहेगा… और सबसे बड़ा डर यह है कि जिसे फिर चाहूँगा, कहीं उसे भी खो न दूँ।”
काव्या ने धीरे से कहा, “खोने के डर से जीना छोड़ देना भी तो खोना ही है।”
यह वाक्य देवेंद्र के भीतर उतर गया। उसने कई सालों से अपने दुख को निष्ठा समझ लिया था। उसे लगता था कि अकेले रहना मीरा की याद का सम्मान है। लेकिन अब उसे समझ आ रहा था कि मीरा ने कभी उसे अंधेरे में जीना नहीं सिखाया था। वह तो हमेशा कहती थी कि घर की खिड़कियाँ खुली रखो, हवा आती रहे तो घर जिंदा रहता है।
सुबह तक बारिश थम गई। सूरज बादलों के पीछे से निकला तो सेब के पेड़ों पर बूंदें चमक रही थीं। गाँव के लोग रास्ता साफ करने लगे। मेहमानों ने मिलकर सामान उठाया। मेजर राणा की हालत सुधर गई थी। उन्होंने जाते-जाते काव्या के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, तूने आज सेवा नहीं की, पूजा की है।”
रिया ने काव्या से अकेले में माफी माँगी। वह रोते हुए बोली, “मैंने आपको गलत समझा। मुझे लगा कोई पापा को माँ से दूर कर रहा है। पर शायद हम ही उन्हें जीवन से दूर रख रहे थे।”
काव्या ने उसे गले लगा लिया। “मीरा जी से कोई उन्हें दूर नहीं कर सकता,” उसने कहा, “क्योंकि वह उनके भीतर हैं।”
कबीर के लिए माफी माँगना आसान नहीं था। वह उसी दोपहर देवेंद्र के पास आया, जब पिता बरामदे की टूटी रेलिंग ठीक कर रहे थे। कबीर ने धीरे से हथौड़ा उठाया और उनके पास बैठ गया। कुछ देर दोनों बिना बोले काम करते रहे। फिर कबीर बोला, “मैं डर गया था, पापा।”
देवेंद्र ने पूछा, “किससे?”
“इससे कि अगर आप आगे बढ़ गए, तो माँ सचमुच चली जाएँगी।”
देवेंद्र ने काम रोक दिया। उसने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, तुम्हारी माँ गई नहीं है। वह तुम्हारी आवाज में है, रिया की जिद में है, मेरे हर अच्छे फैसले में है। अगर मैं जीवन से मुँह मोड़ता रहूँ, तो क्या वह खुश होती?”
कबीर की आँखों में पहली बार बच्चे जैसी नमी आ गई। उसने सिर हिलाया। “नहीं।”
उस दिन कोई फैसला नहीं हुआ। देवेंद्र ने काव्या से कोई वादा नहीं किया। काव्या ने भी उससे कोई अपेक्षा नहीं रखी। लेकिन जब देवेंद्र 2 दिन बाद वापस गुरुग्राम लौटने लगा, तो हवा पहले जैसी भारी नहीं थी। जाते समय उसने काव्या से बस इतना कहा, “आपने मेरी उम्र नहीं बदली, पर शायद मेरा डर बदल दिया।”
काव्या मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखें फिर भी भीग गईं। “डर बदलना ही उम्र बदलने से बड़ा काम है।”
गुरुग्राम लौटकर देवेंद्र ने पहली बार अपनी दुकान की धूल साफ की। मीरा की तस्वीर के सामने उसने पुरानी माला बदली। फिर वह बहुत देर तक तस्वीर से बात करता रहा। उसने बताया कि पहाड़ों में एक स्त्री है जो चाय में इलायची ज्यादा डालती है, जो मेहमानों के दुख चेहरे से पढ़ लेती है, जो सेवा को धर्म समझती है, और जिसने उसे आईना दिखा दिया है। वह बोला, “मीरा, अगर यह गलत है तो मुझे रोक दो। अगर सही है तो मुझे हिम्मत देना।”
उस रात उसे कई महीनों बाद सुकून की नींद आई।
इसके बाद फोन कॉल शुरू हुए। पहले सप्ताह में 2 बार, फिर हर शाम। कभी काव्या खेतों की बात करती, कभी देवेंद्र दुकान में आए किसी ग्राहक की। कभी दोनों मीरा की बातें करते, कभी काव्या के माता-पिता की। धीरे-धीरे उनके बीच ऐसा रिश्ता बना जिसमें अतीत से ईर्ष्या नहीं थी। काव्या मीरा का नाम सम्मान से लेती थी, और देवेंद्र काव्या के माता-पिता की डायरी संभालकर रखने को कहता था।
रिया अक्सर मुस्कुराकर पिता को फोन पर बात करते देखती। कबीर कभी-कभी चिढ़ाता, “पापा, हिमाचल वाली चाय कब पिलाएँगे?” लेकिन उसके स्वर में अब ताना नहीं, अपनापन था।
6 महीने बाद देवेंद्र फिर चंबा गया। इस बार वह मेहमान की तरह नहीं, घर के अपने आदमी की तरह पहुँचा। गाँव की औरतें उसे पहचानने लगी थीं। निखिल अब उसे “देव भैया” कहता था। काव्या पहले जैसी ही थी, पर उसके चेहरे पर देवेंद्र को देखकर छिपी हुई खुशी साफ दिखती थी।
एक शाम, उसी बरामदे में, जहाँ सब शुरू हुआ था, देवेंद्र ने काव्या से कहा, “उस दिन मैंने मजाक में कहा था कि उम्र कम होती तो शादी कर लेता। आज बिना मजाक के कह रहा हूँ… अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए जगह हो, तो मैं डर के बिना तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ।”
काव्या कुछ देर तक शांत रही। फिर उसने पूछा, “और मीरा जी?”
देवेंद्र ने आकाश की ओर देखा। सूरज पहाड़ियों के पीछे उतर रहा था। “वह हमारे साथ चलेंगी,” उसने कहा, “क्योंकि उन्होंने ही मुझे सिखाया था कि प्रेम बाँटने से घटता नहीं।”
काव्या की आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ आगे बढ़ाया। देवेंद्र ने वह हाथ थाम लिया। उस क्षण कोई शोर नहीं हुआ, कोई फिल्मी संगीत नहीं बजा, कोई बड़ा वादा नहीं किया गया। बस दो लोग थे, जिन्होंने जीवन से हार मानने से इंकार कर दिया था।
जब शादी की बात घर पहुँची, तो रिश्तेदारों में तूफान उठ गया। देवेंद्र की बड़ी बहन ने कहा, “58 साल की उम्र में शादी? लोग हँसेंगे।” कबीर की पत्नी ने पूछा, “बच्चों की जायदाद का क्या होगा?” कुछ लोगों ने काव्या पर फिर उँगली उठाई कि वह होमस्टे बचाने के लिए अमीर विधुर से शादी कर रही है। गाँव में भी फुसफुसाहट हुई कि 42 साल की स्त्री को अब शादी की क्या जरूरत।
लेकिन इस बार देवेंद्र चुप नहीं रहा। उसने परिवार की बैठक बुलाई। सबके सामने उसने संपत्ति के कागज रखे और साफ कहा कि गुरुग्राम का घर और दुकान उसके बच्चों के नाम सुरक्षित रहेंगे। वह काव्या से संपत्ति के लिए नहीं, जीवन के लिए विवाह कर रहा है। फिर उसने मीरा की पुरानी चूड़ी की रसीद और सुषमा की डायरी सबके सामने रखी। उसने कहा, “जिस स्त्री के घर को मेरी पत्नी की करुणा ने बचाया, उसी घर में मुझे फिर जीना सीखने को मिला। इसे चाल कहने वाले लोग प्रेम की भाषा नहीं समझते।”
कमरे में किसी के पास जवाब नहीं था।
शादी बहुत बड़ी नहीं थी। चंबा के उसी होमस्टे के आँगन में मंडप सजा। देवदार की खुशबू थी, सेब के फूल थे, हल्दी की महक थी, और पहाड़ी ढोल की धीमी थाप। रिया ने काव्या को लाल बनारसी साड़ी पहनाने में मदद की। कबीर ने पिता की शेरवानी का बटन लगाया। निखिल ने कन्यादान की रस्म निभाते हुए रो-रोकर कहा, “दीदी, आज माँ-पापा होते तो बहुत खुश होते।”
मंडप के एक कोने में मीरा की तस्वीर रखी गई थी, फूलों से सजी हुई। यह काव्या का आग्रह था। उसने कहा था, “जिस प्रेम ने आपको इतना अच्छा बनाया, वह हमारी शादी से बाहर कैसे रह सकता है?”
फेरे शुरू हुए तो देवेंद्र ने एक क्षण के लिए तस्वीर की ओर देखा। उसे लगा जैसे मीरा की वही शांत मुस्कान कह रही हो—अब जी लो।
विवाह के बाद बरामदे में छोटा-सा स्वागत हुआ। मेजर राणा भी आए थे, छड़ी के सहारे। गाँव की औरतों ने गीत गाए। मेहमानों ने कहा कि यह शादी उम्र की नहीं, हिम्मत की है। रिया ने भाषण में कहा, “हमें लगा था पापा माँ को भूल जाएँगे। आज समझ आया कि नए रिश्ते पुराने प्रेम को मिटाते नहीं, उसे और रोशन कर देते हैं।”
कबीर ने पिता को गले लगाकर धीमे से कहा, “मुझे गर्व है आप पर।”
देवेंद्र की आँखें भर आईं। वह बोल नहीं पाया।
रात को जब सब थककर सो गए, देवेंद्र और काव्या फिर उसी बरामदे में बैठे। सामने पहाड़ों पर चाँदनी बिखरी थी। हवा ठंडी थी, पर भीतर अजीब-सी गर्माहट थी। काव्या ने पूछा, “आपको अब भी डर लगता है?”
देवेंद्र ने कुछ सोचा, फिर मुस्कुराया। “हाँ, थोड़ा। लेकिन अब डर के बावजूद हाथ छोड़ने का मन नहीं करता।”
काव्या ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।
कई साल बाद भी जब लोग देवेंद्र से पूछते कि उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ कौन-सा था, तो वह शादी का दिन नहीं बताता। वह कहता कि सबसे बड़ा मोड़ वह दोपहर थी जब उसने एक हल्का-सा मजाक किया था और काव्या ने उसके भीतर छिपा सच पकड़ लिया था। वह कहता कि इंसान अक्सर उम्र, समाज, बच्चों, जिम्मेदारियों और यादों को दोष देता है, जबकि असली कैद उसके अपने डर में होती है।
देवेंद्र ने यह भी सीखा कि पहली प्रेम कहानी खत्म हो जाए तो जीवन खत्म नहीं होता। कुछ प्रेम स्मारक बनकर दिल में रहते हैं, और कुछ प्रेम दरवाजा बनकर भविष्य की ओर खुलते हैं। मीरा उसका स्मारक थी। काव्या उसका दरवाजा बनी।
और उस पुराने पहाड़ी होमस्टे के बरामदे में, जहाँ कभी एक वाक्य ने उसे तोड़ दिया था, वहीं उसने समझा कि दूसरा मौका जवान लोगों की मिल्कियत नहीं होता। दूसरा मौका उन्हें मिलता है जो अपने दर्द को सच मानकर भी उससे बाहर कदम रखने की हिम्मत रखते हैं।
उसने उम्र को बहाना बनाया था, पर रुकावट उम्र नहीं थी। रुकावट डर था। और जिस दिन उसने डर का हाथ छोड़ा, उसी दिन उसने जीवन का हाथ फिर से पकड़ लिया।
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