
PART 1
—तुम्हारा बेटा अब कमरे में नहीं सोता, निशा। वह वहीं सोता है जहाँ बदतमीज़ जानवर सोते हैं।
5 साल बाद जब निशा राजपूत ने दिल्ली के सिविल लाइंस वाली उस हवेली का दरवाज़ा खोला, जो उसके माता-पिता ने मरने से पहले उसके नाम छोड़ी थी, तो यही पहला वाक्य उसके कानों में पड़ा।
उसने इस लौटने का सपना 5 साल तक देखा था। उसे लगा था कि लोहे का पुराना फाटक खुलेगा, बरामदे में लगे चमेली के गमलों की खुशबू आएगी, और उसका बेटा आरव दौड़ता हुआ आकर उसकी कमर से लिपट जाएगा। शायद वह रोएगा, शायद गुस्सा करेगा, शायद कहेगा कि माँ ने उसे छोड़ दिया। निशा ने हर सवाल का जवाब अपने सीने में बचाकर रखा था।
लेकिन उसने इस घर की कल्पना नहीं की थी।
घर में अब उसकी माँ की अगरबत्ती की खुशबू नहीं थी। वहाँ महंगे परफ्यूम, ठंडे पकवान, नए पर्दों और किसी दूसरी औरत की बेझिझक मौजूदगी की गंध थी।
बैठक में विक्रम मल्होत्रा उसके पिता की कुर्सी पर बैठा था, जैसे वही इस खानदान का असली वारिस हो। उसके हाथ में सोने की घड़ी चमक रही थी। निशा को देखकर उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
सोफे पर उसकी माँ, सावित्री मल्होत्रा, गोद में नीले कंबल में लिपटा एक बच्चा झुला रही थी।
उसके पास खड़ी जवान औरत ने हल्की मुस्कान के साथ निशा को ऊपर से नीचे तक देखा।
—तो यही है गायब हो चुकी पत्नी?
निशा ने उसे अनदेखा कर दिया।
—आरव कहाँ है?
कमरे में जैसे हवा रुक गई।
तभी पीछे के आँगन से लोहे के घिसटने की आवाज़ आई। फिर एक हल्की, टूटी हुई सिसकी।
निशा का शरीर खुद चल पड़ा। वह गलियारे से होती हुई पिछवाड़े के दरवाज़े तक पहुँची। विक्रम पीछे से बोला—
—निशा, रुक जाओ।
वह नहीं रुकी।
दरवाज़ा खुला।
और 5 साल की सारी मजबूरी 1 ही पल में राख हो गई।
नीम के पुराने पेड़ के नीचे, गंदी सी कुत्ते की झोपड़ी के पास, एक दुबला-पतला बच्चा सिकुड़कर बैठा था। उसकी हड्डियाँ स्वेटर के भीतर से भी दिख रही थीं। बाल उलझे थे, घुटनों पर पुराने घाव थे, और आँखों में वह डर था जो किसी बच्चे में तब आता है जब उसे बार-बार बताया गया हो कि वह इंसान नहीं, बोझ है।
उसकी गर्दन में कुत्ते की चेन बंधी थी।
उसके सामने एक सूखी रोटी पड़ी थी, और बगल में एक बूढ़ा काला लैब्राडोर बैठा था, जो रोटी को नहीं, बच्चे को देख रहा था।
निशा के हाथ से सूटकेस गिर गया।
—आरव…
बच्चे ने सिर उठाया।
उसने निशा को देखा।
लेकिन पहचाना नहीं।
वह भागकर गले नहीं लगा। उसने माँ नहीं कहा। वह बस डरकर और पीछे खिसक गया, जैसे कोई नाम भी सज़ा बन सकता हो।
सावित्री बच्चे को गोद में लिए आँगन में आई।
—बहुत पास मत जाना। दौरा पड़ता है तो काट लेता है।
निशा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
—आप लोगों ने मेरे बेटे के साथ क्या किया?
सावित्री ने ठंडे गर्व से कहा—
—तेरा बेटा शुरू से ही टेढ़ा था। चोरी करता था, रात को चिल्लाता था, घर में डर फैलाता था। उसे उसकी औकात सिखानी पड़ी।
उसने प्लेट से बचा हुआ खाना उठाकर आरव के पास फेंक दिया।
—ले, खा। इसी लायक है तू।
निशा की आँखों में आँसू नहीं आए। उसके भीतर कुछ बहुत ठंडा और खतरनाक जम गया।
5 साल पहले उसे अचानक सरकारी गवाह सुरक्षा में भेजा गया था। वह एक बड़े हवाला और ज़मीन घोटाले की चार्टर्ड अकाउंटेंट गवाह थी। अदालत, सीबीआई और सुरक्षा एजेंसियों ने उसे बिना संपर्क, बिना पहचान, एक सुरक्षित जगह पर भेज दिया था। विक्रम सब जानता था। उसने कागज़ों पर साइन किए थे। उसे हर महीने आरव की पढ़ाई, इलाज, घर और खर्च के पैसे मिलते रहे थे। उसने वादा किया था कि वह बच्चे की रक्षा करेगा।
निशा ने उसे माना था।
यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।
वह घुटनों के बल बैठ गई।
—आरव, मैं हूँ। माँ।
बच्चा काँप उठा और झोपड़ी में घुस गया। बूढ़ा कुत्ता उसके आगे आकर खड़ा हो गया, जैसे 5 साल में वही उसका पहरेदार बन गया हो।
तभी विक्रम फाइल लेकर आया।
कंबल नहीं। चाबी नहीं। माफ़ी नहीं।
फाइल।
उसने कागज़ निशा के सामने फेंक दिए।
—अच्छा हुआ तू आ गई। तलाक़ पर साइन कर दे।
निशा ने कागज़ देखे।
घर। कंपनी। आरव की कस्टडी। संपत्ति का हस्तांतरण।
सब कुछ साफ़-सुथरी कानूनी भाषा में लिखा था, जैसे क्रूरता को पैराग्राफ में छुपाया जा सकता हो।
विक्रम बोला—
—तू 5 साल तक गायब रही। अब नाटक मत कर।
निशा ने पहली बार उसके चेहरे में आँखें डालकर कहा—
—तू जानता था मैं क्यों गई थी।
वह चुप रहा।
सावित्री ने गोद में बच्चे को कसते हुए कहा—
—अब इस घर में असली वारिस है। यह पागल लड़का नहीं।
निशा की नज़र बच्चे पर गई।
फिर विक्रम पर।
फिर उस औरत पर।
—यह बच्चा विक्रम का है?
औरत का चेहरा उतर गया।
निशा की आवाज़ और धीमी हो गई।
—6 साल पहले गुरुग्राम के अस्पताल में डॉक्टर ने तुम्हें बताया था कि तुमसे प्राकृतिक रूप से बच्चा होना लगभग नामुमकिन है। याद है, विक्रम?
पूरा आँगन पत्थर हो गया।
विक्रम फुसफुसाया—
—चुप रहो।
निशा उठी।
—अब मैं चुप नहीं रहूँगी।
PART 2
निशा ने हाथ आगे बढ़ाया।
—चेन की चाबी दो।
कोई नहीं हिला।
उसने इतनी तेज़ आवाज़ में कहा कि पड़ोस की छतों पर लोग आ गए—
—चाबी!
वह औरत, जिसका नाम रिया था, काँपते हुए अंदर भागी और पूजा की छोटी अलमारी के पास रखी चाबी लाकर फेंक दी।
निशा बहुत धीरे-धीरे झोपड़ी के पास पहुँची।
—मैं तुझे चोट नहीं पहुँचाऊँगी, बेटा। भरोसा मत कर, पर बस यह खोलने दे।
ताला खुला।
चेन पत्थर पर गिर पड़ी।
आरव अचानक भागा, काँच के टूटे टुकड़ों पर फिसला, मगर निशा ने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। वह छटपटाया, काटा, हाथ मारा, जैसे हर स्पर्श हमला हो।
निशा ने उसे और कस लिया।
—लड़ना है तो लड़। पर अब मैं तुझे नहीं छोड़ूँगी।
विक्रम दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
—उसे कहीं नहीं ले जा सकती। वह मेरा बेटा है।
निशा ने कहा—
—जिस दिन तूने उसकी गर्दन में चेन डाली, उस दिन यह अधिकार मर गया।
सावित्री चिल्लाई—
—ले जा अपना जानवर, पर घर का 1 ईंट नहीं मिलेगा!
निशा ने आरव को सीने से लगाया।
—तुम्हें अभी भी समझ नहीं आया। मैं खाली हाथ नहीं लौटी हूँ।
विक्रम की आँखों में पहली बार डर उतरा।
PART 3
निशा ने आरव को पुराने शॉल में लपेटा और फाटक की तरफ बढ़ी। बूढ़ा लैब्राडोर लड़खड़ाता हुआ उनके पीछे चल पड़ा। उसका नाम शेरू था, वही कुत्ता जिसे निशा के पिता आरव के जन्मदिन पर लाए थे। शायद घर में वही आखिरी जीव था जिसने बच्चे को पूरी तरह छोड़ने से इनकार किया था।
गली में पड़ोसी खड़े थे। किसी के हाथ में फोन था, किसी के चेहरे पर शर्म। सामने वाली कोठी से बुज़ुर्ग मिसेज़ दत्ता भागती हुई आईं।
—बेटी, मेरी गाड़ी में बैठो। अभी।
निशा बोल नहीं पाई। उसने बस सिर हिलाया।
गाड़ी में बैठते ही सीट बेल्ट आरव की गर्दन से छुई तो वह चीख उठा।
निशा ने तुरंत बेल्ट हटा दी।
—नहीं, ऐसे नहीं। कोई तुझे बाँधेगा नहीं।
वह उसे अपनी गोद में लेकर बैठ गई। आरव की आँखें खुली रहीं। वह रो नहीं रहा था। वह हर मोड़ पर ऐसे काँप रहा था जैसे गाड़ी फिर उसी घर लौट जाएगी।
—मैं तुझे वहाँ वापस नहीं ले जाऊँगी, उसने धीरे से कहा। तू मुझसे डर सकता है। मुझसे नफरत कर सकता है। पर मैं तुझे वहाँ वापस नहीं दूँगी।
दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में डॉक्टरों ने आरव को देखते ही पुलिस को सूचना दी। उसकी गर्दन पर गहरा निशान था। शरीर में कमजोरी थी। कई पुराने घाव थे। जब नर्स ने उसे बिस्किट दिए, उसने 2 बिस्किट अपनी जेब में छुपा लिए। डॉक्टर ने उसे डाँटा नहीं। बस दूसरे पैकेट खोलकर सामने रख दिए।
—यहाँ खाना छुपाना नहीं पड़ता, बच्चे, डॉक्टर ने कहा।
आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
रात 3:20 पर निशा ने अपनी वकील आयशा खान को फोन किया।
आयशा ने पहली घंटी पर उठाया।
—तुम्हारी सुरक्षा फाइल आज ही खुली है। मैं तुम्हारे कॉल का इंतज़ार कर रही थी।
निशा की आवाज़ टूट गई।
—उन्होंने मेरे बेटे को कुत्ते के साथ बाँध रखा था।
कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर आयशा की आवाज़ बेहद शांत हो गई।
—तुम अस्पताल में ही रहो। विक्रम को जवाब मत देना। सुबह तक सब शुरू हो जाएगा।
सुबह 9:00 बजे संरक्षण याचिका दायर हुई। 11:00 बजे राजपूत हेरिटेज रेनोवेशन कंपनी के खाते फ्रीज़ कर दिए गए। दोपहर तक विक्रम को समझ आ गया कि निशा टूटी हुई पत्नी बनकर नहीं लौटी थी। वह मालिक बनकर लौटी थी। माँ बनकर लौटी थी। और गवाह बनकर भी।
पहली सुनवाई 2 दिन बाद हुई।
विक्रम नीले सूट में आया, चेहरा दुखी पति जैसा बनाकर। सावित्री सफेद रेशमी साड़ी में, मोतियों की माला पहनकर आई। रिया गोद में बच्चे को लेकर बैठी, जैसे उसकी मौजूदगी ही विक्रम को निर्दोष साबित कर देगी।
विक्रम के वकील ने कहा कि निशा ने परिवार छोड़ दिया था। कि आरव हिंसक था। कि उसे संभालने के लिए “कठोर अनुशासन” ज़रूरी था। कि विक्रम ने अकेले घर, माँ और बच्चे को संभाला।
फिर आयशा खड़ी हुई।
उसने चिल्लाया नहीं।
उसने सिर्फ तस्वीरें रखीं।
नीम का पेड़।
कुत्ते की झोपड़ी।
गर्दन की चेन।
मेडिकल रिपोर्ट।
तलाक़ के कागज़।
निशा के नाम की संपत्ति।
5 साल तक भेजे गए बैंक ट्रांसफर।
फिर खर्चों की लिस्ट सामने आई।
महंगी घड़ियाँ।
जयपुर रिसॉर्ट।
रिया के कपड़े।
नर्सरी का नया फर्नीचर।
सावित्री के गहने।
घर की मरम्मत के नाम पर नकली बिल।
सब उसी खाते से, जो आरव और घर के खर्च के लिए था।
जज ने विक्रम से पूछा—
—आप कहते हैं आपकी पत्नी गायब थी, फिर भी आपने उनसे हर महीने पैसा लिया?
विक्रम ने होंठ भींचे।
—मैं घर चला रहा था।
आयशा ने अगला दस्तावेज़ उठाया।
—और नकली हस्ताक्षर भी घर चलाने के लिए किए? कंपनी के शेयर बेचने की तैयारी भी बच्चे के हित में थी?
सावित्री अचानक फट पड़ी।
—मेरा बेटा जो कर रहा था, सही कर रहा था! वह लड़का घर बर्बाद कर रहा था। उसे काबू करना ज़रूरी था।
अदालत में इतना सन्नाटा छा गया कि पेन गिरने की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दी।
जज ने पूछा—
—आप मान रही हैं कि बच्चे के साथ हिंसा हुई?
सावित्री बोली—
—मैंने परिवार बचाया।
आयशा ने मिसेज़ दत्ता की रिकॉर्डिंग चलवाई।
—मैंने उस बच्चे को बारिश में बाहर सोते देखा। मैंने उसे कुत्ते के साथ खाना खाते देखा। मैंने सावित्री जी को उसे जानवर कहते सुना। मैं शर्मिंदा हूँ कि मैंने पहले पुलिस नहीं बुलाई।
रिया रोने लगी। मगर उसकी रुलाई आरव के लिए नहीं थी। वह अपने लिए डर रही थी।
जज ने निशा को आरव की अस्थायी पूरी कस्टडी दी। विक्रम और सावित्री को बच्चे से दूर रहने का आदेश मिला। फिर आयशा ने आखिरी बात रखी।
—जिस बच्चे को विक्रम मल्होत्रा अपनी संपत्ति के कागज़ों में जैविक पुत्र बता रहा है, उसका डीएनए परीक्षण भी कराया जाए।
रिया ने सिर उठाया।
—नहीं।
विक्रम ने उसे देखा।
और अदालत ने उनकी आँखों में छुपी हुई घबराहट पढ़ ली।
3 दिन बाद निशा पुलिस, आयशा, ताला खोलने वाले और कोर्ट अधिकारी के साथ अपनी हवेली में लौटी। सावित्री बैठक में चाय लेकर बैठी थी, जैसे अदालत के आदेश अमीर घरों में लागू नहीं होते।
—बुज़ुर्ग औरत को उसके घर से नहीं निकाला जाता, उसने कहा।
निशा ने शांत स्वर में जवाब दिया—
—यह आपका घर कभी था ही नहीं।
विक्रम का स्टडी रूम कोड से बंद था। ताला खोलने वाले को 5 मिनट लगे। अंदर नकली मुहरें, निशा के हस्ताक्षर की प्रैक्टिस से भरी शीटें, फर्जी बिल, एक पेन ड्राइव और भुगतान की डायरी मिली।
एक नाम बार-बार लिखा था।
मनीष अरोड़ा।
विक्रम का दोस्त।
वित्तीय सलाहकार।
और रिया के फोन रिकॉर्ड में सबसे ज़्यादा आने वाला नंबर।
डीएनए रिपोर्ट आई तो झूठ की आखिरी दीवार भी गिर गई।
रिया का बच्चा विक्रम का नहीं था।
उसका पिता मनीष था।
विक्रम को यह शक पहले से था, फिर भी वह उस बच्चे को “अपना वारिस” बताकर अदालत में दया और स्थिर परिवार की तस्वीर बनाना चाहता था। सावित्री को बस एक “सामान्य” पोता चाहिए था, चाहे वह किसका भी हो। आरव को रास्ते से हटाना था। उसे किसी दूर के विशेष केंद्र में भेजने की तैयारी थी, जहाँ से उसकी आवाज़ कभी घर तक न लौटे।
विक्रम तलाक़ नहीं चाहता था।
वह चोरी पर अंतिम मुहर चाहता था।
मनीष मुंबई भागने की कोशिश में एयरपोर्ट से पकड़ा गया। उसके बैग में 14 लाख नकद और कंपनी के कागज़ों की कॉपी मिली। पूछताछ में उसने सब बता दिया। नकली बिल किसने बनवाए। कौन सा क्लर्क खरीदा गया। कंपनी के किस कर्मचारी को डराया गया। संपत्ति बेचने का ड्राफ्ट कहाँ तैयार हुआ। निशा की वापसी के ठीक उसी दिन विक्रम उसे साइन करवाना चाहता था, ताकि 5 साल की लूट कानूनी दिखने लगे।
उधर आरव धीरे-धीरे फिर इंसान की तरह जीना सीख रहा था।
वह निशा को माँ नहीं कहता था।
वह गले नहीं लगता था।
रात में चौंककर उठ जाता था।
दरवाज़ा बंद होते ही काँपने लगता था।
पर अब वह हर बार भागता नहीं था।
निशा ने इसे जीत माना।
वे कुछ महीनों के लिए करोल बाग के एक छोटे अपार्टमेंट में रहे। हवेली की सफाई, मरम्मत और कानूनी कब्ज़े की प्रक्रिया चलती रही। शेरू हमेशा आरव के पास सोता। बच्चे की साँस तब ही सामान्य होती जब उसकी उंगलियाँ कुत्ते के फर में अटक जातीं।
पहले महीने आरव खाना छुपाता रहा।
तकिए के नीचे।
स्कूल बैग में।
किताबों के पीछे।
एक रात निशा ने उसे रसोई के फर्श पर बैठा देखा। उसके हाथ में सूखी रोटी थी और आँखों में अपराध-बोध।
निशा धीरे से नीचे बैठ गई।
—तू जब चाहे खा सकता है।
आरव ने पहली बार सीधे पूछा—
—शेरू भी?
निशा की आँखें भर आईं।
—शेरू भी। लेकिन पहले तू।
उसने 1 रोटी प्लेट में आरव के सामने रखी और 1 टुकड़ा शेरू के कटोरे में।
—देख, तुम दोनों के लिए काफी है।
आरव ने बहुत देर तक दोनों टुकड़ों को देखा। फिर धीरे से खाने लगा।
उस रात उसने फुसफुसाकर कहा—
—तुम आ गईं।
यह सवाल नहीं था। यह शिकायत थी। 5 साल की चोट थी।
निशा ने कहा—
—हाँ।
—क्यों?
निशा के भीतर हज़ार जवाब टूट पड़े। क्योंकि मैं तुझसे प्यार करती हूँ। क्योंकि मैंने गलत आदमी पर भरोसा किया। क्योंकि मैं हर दिन मरती रही। क्योंकि कोई केस, कोई सुरक्षा, कोई अदालत तेरे डर से बड़ी नहीं थी।
लेकिन उसने बच्चे के लिए छोटे शब्द चुने।
—क्योंकि तू मेरा बेटा है। मुझे लगा था तू सुरक्षित है। मैं गलत थी। अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तुझे यह साबित करूँगी कि तू फिर कभी अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
आरव ने रोटी सीने से लगा ली।
—दादी कहती थीं तुम मुझे नहीं चाहतीं।
—उन्होंने झूठ बोला।
—पापा कहते थे मैं सब खराब कर देता हूँ।
निशा का चेहरा दर्द से सख्त हो गया।
—उनकी बातों से तेरी कीमत तय नहीं होती।
आरव ने पूछा—
—शेरू हमेशा अंदर सो सकता है?
निशा रोते हुए मुस्कुराई।
—हमेशा।
—बदबू आए तो भी?
—तब भी।
—सोफे पर चढ़े तो भी?
—तो हम दूसरा सोफा ले लेंगे।
आरव के होंठों पर बहुत छोटा, बहुत डरा हुआ, पर सच्चा मुस्कान आया।
निशा ने उसी मुस्कान के सहारे कई रातें काटीं।
अंतिम सुनवाई 9 महीने बाद हुई।
कोर्टरूम भरा था। विक्रम अब भी महंगा सूट पहने था, मगर उसमें वह मालिक नहीं, आरोपी लग रहा था। सावित्री की गर्दन अब भी तनी थी, पर उसकी आवाज़ में पहले वाला साम्राज्य नहीं था। रिया ने गवाही दी कि विक्रम और सावित्री ने आरव को “समस्या” बताकर उसे हटाने की योजना बनाई थी। मनीष ने वित्तीय धोखाधड़ी की बात कबूल की।
आयशा ने एक-एक सबूत रखा।
फोटो।
मेडिकल रिपोर्ट।
ऑडियो।
फर्जी हस्ताक्षर।
बैंक ट्रांसफर।
डीएनए रिपोर्ट।
पुरानी नौकरानियों की गवाही।
एक नौकरानी रो पड़ी।
—मैंने उसे आंधी में बाहर बैठे देखा था। नौकरी जाने के डर से चुप रही। आज तक सो नहीं पाती।
सावित्री बड़बड़ाई—
—सब बढ़ा-चढ़ाकर बोल रहे हैं।
जज ने कहा—
—आप कुछ कहना चाहती हैं?
सावित्री ने गलती कर दी।
—उस लड़के ने मेरे बेटे की जिंदगी जन्म से खराब की। विक्रम को शांत घर, अच्छी पत्नी और सही वारिस मिलना चाहिए था। आरव को उसकी जगह सिखानी थी।
जज ने बहुत धीमे पूछा—
—और आपके हिसाब से बच्चे की जगह कुत्ते की झोपड़ी थी?
सावित्री चुप हो गई।
निशा ने विक्रम को देखा। उसे लगा शायद वह एक बार अपनी माँ का विरोध करेगा। शायद कहेगा कि इतना गलत नहीं होना चाहिए था। शायद उसे शर्म आएगी।
पर विक्रम चुप रहा।
उसी पल निशा ने उससे नफरत करना छोड़ दिया। इसलिए नहीं कि वह माफ़ी के लायक था। इसलिए कि नफरत भी उसे जगह देती थी, और अब वह उसे अपने जीवन में कोई जगह नहीं देना चाहती थी।
फैसला सुनाया गया।
हवेली और कंपनी पर निशा का पूर्ण अधिकार बहाल हुआ। तलाक़ विक्रम की गलती पर मंजूर हुआ। वित्तीय वसूली का आदेश हुआ। आपराधिक मुकदमा अलग चला। विक्रम का आरव से संपर्क स्वतंत्र मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तक रोक दिया गया। सावित्री पर बच्चे के पास आने की पूर्ण पाबंदी लगी।
सावित्री चीखी—
—वह मेरा पोता है!
निशा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
आरव कोई खून की रेखा नहीं था।
कोई वारिस नहीं था।
कोई बोझ नहीं था।
वह बच्चा था।
और पहली बार व्यवस्था ने उसे बच्चा माना था।
कोर्ट के गलियारे में विक्रम खड़ा मिला। आयशा बीच में आ गई, मगर उसने हाथ उठा दिए।
—सिर्फ 1 मिनट।
निशा रुक गई। कुछ अंत साफ़ सुनना ज़रूरी होता है, ताकि वे भीतर भटकते न रहें।
विक्रम बोला—
—मैंने नहीं सोचा था बात इतनी दूर चली जाएगी।
बस इतना।
ना यह कि मैंने उसे चोट पहुँचाई।
ना यह कि मैंने तुम्हें धोखा दिया।
ना यह कि मैं राक्षस बन गया था।
निशा ने कहा—
—बात पहली रात ही बहुत दूर चली गई थी, जब तूने उसे बाहर सोने दिया। उसके बाद तो तू बस आदत डालता गया।
—निशा…
—मेरा नाम ऐसे मत ले, जैसे तुझे अभी भी कोई हक़ हो।
वह चली गई।
इस बार विक्रम ने पुकारा नहीं।
आरव की हवेली में वापसी किसी उत्सव की तरह नहीं हुई। मनोवैज्ञानिक ने कहा था—शोर नहीं, सरप्राइज़ नहीं, बंद दरवाज़े नहीं। बस दिनचर्या, रोशनी, खुली जगह और भरोसा।
निशा ने उसका कमरा हल्के नीले रंग से रंगवाया। बिस्तर नीचा रखा। अलमारी में ताला नहीं लगाया। रसोई में एक टोकरी रखी जिस पर लिखा था—आरव के नाश्ते। खाना अब कभी सज़ा या इनाम नहीं होगा। वह सुरक्षा होगा।
पहले दिन आरव ने शेरू की पट्टा पकड़ी। शेरू पहले अंदर गया। बच्चा उसके पीछे-पीछे।
बैठक, गलियारा, रसोई—सब देखते हुए उसकी साँस सामान्य रही। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र पिछवाड़े के दरवाज़े पर गई, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
निशा उसके पास बैठ गई।
—आज बाहर जाना ज़रूरी नहीं।
आरव ने सिर हिलाया।
फिर उसने दीवार पर लगी लकड़ी की पुरानी पट्टी देखी। उस पर पेंसिल से रेखाएँ थीं।
आरव 1 साल।
आरव 2 साल।
आरव 3 साल।
ये निशा के पिता ने बनाई थीं।
आरव ने सबसे नीची रेखा छुई।
—यह मैं हूँ?
—हाँ, बेटा। यह तू है।
—किसने लिखा?
—तेरे नानाजी ने।
दरवाज़े के पास खड़े निशा के मामा, जो अब घर देखने आए थे, आँसू छुपाने लगे। आरव ने पूछा—
—वह शेरू को जानते थे?
निशा की आवाज़ काँप गई।
—नहीं। पर उन्हें वह बहुत पसंद आता।
उस रात आरव बिस्तर पर नहीं सोया। उसने गद्दा जमीन पर बिछाया, शेरू से चिपककर लेट गया। निशा दरवाज़े के पास कुर्सी पर बैठी रही। दरवाज़ा खुला था।
रात 12:00 बजे आरव जागा।
—तुम हो?
—मैं हूँ।
2:00 बजे फिर।
—तुम हो?
—मैं हूँ।
4:15 पर उसकी आवाज़ और धीमी थी।
—माँ?
निशा की साँस रुक गई।
—हाँ, मेरे बच्चे।
—दरवाज़ा बंद मत करना।
उसने मुँह पर हाथ रख लिया, ताकि सिसकी बाहर न निकले।
—नहीं करूँगी।
आरव सो गया।
वह पहली बार था जब उसने उसे माँ कहा।
किसी फिल्मी संगीत में नहीं।
किसी चमकदार सुबह में नहीं।
बल्कि डर के बीच, आधी रात में, खुले दरवाज़े के पास।
क्योंकि उसने डर के साथ आँख खोली थी, और माँ अब भी वहीं थी।
सालों बाद लोग विक्रम के जेल जाने, कंपनी लौटने, सावित्री के दूर रहने, रिया के गायब हो जाने और मनीष की सज़ा की बातें करते रहे। लेकिन निशा जानती थी कि असली जीत अदालत में नहीं हुई थी।
वह एक शनिवार सुबह आई।
आरव 7 साल का था। उसके 2 दाँत टूट चुके थे और पराठों में आलू कम होने पर उसकी राय बहुत मजबूत थी। शेरू बूढ़ा, सफेद और जिद्दी हो चुका था। वह अब भी सोफे को अपनी निजी संपत्ति मानता था।
निशा रसोई में नाश्ता बना रही थी, तभी आरव कंबल घसीटते हुए आया।
—माँ।
हर बार यह शब्द सुनकर निशा का दिल अब भी भर आता था।
—हाँ?
—मिसेज़ दत्ता को नाश्ते पर बुला सकते हैं?
—बिल्कुल।
—और नानू को भी?
—उन्हें भी।
आरव ने पिछवाड़े की तरफ देखा।
—शेरू आज बाहर जा सकता है?
निशा ने गला साफ़ किया।
—अगर वह जाना चाहे।
आरव ने दरवाज़ा खोला।
शेरू धीमे-धीमे बाहर निकला। उसने उस जगह को सूँघा जहाँ कभी झोपड़ी थी। अब वहाँ निशा ने गेंदा, चमेली और तुलसी लगा दी थी। शेरू नीम के पेड़ के नीचे 3 चक्कर लगाकर धूप में लेट गया।
आरव बहुत देर तक उसे देखता रहा।
—अब उसे डर नहीं लगता, उसने कहा।
निशा उसके पास खड़ी हो गई।
—नहीं। अब नहीं।
आरव ने अपना सिर उसकी बाँह से टिका दिया।
—मुझे भी नहीं।
यह वाक्य किसी भी फैसले, किसी भी संपत्ति, किसी भी बदले से बड़ा था।
निशा ने उस मिट्टी को देखा जहाँ कभी चेन पड़ी थी और अब फूल उग रहे थे।
उनसे 5 साल छीने गए थे।
यह घाव कभी पूरी तरह मिटने वाला नहीं था।
लेकिन उनसे बाकी जिंदगी नहीं छीनी गई थी।
न सुबहें।
न नाश्ते।
न नीम की छाँव।
न खुला दरवाज़ा।
न माँ शब्द।
न वह शांति, जो धीरे-धीरे बनी थी—भरपूर खाने, जलती रात की लाइटों, बिना ताले की अलमारी, खुले कमरों और एक बूढ़े कुत्ते के साथ, जिसने टूटे हुए बच्चे को सिखाया था कि वफादारी भी कोमल हो सकती है।
विक्रम ने सोचा था कि निशा तलाक़ पर साइन करने लौटी है।
वह गलत था।
निशा अपने बेटे को बचाने लौटी थी।
और इस बार, किसी ने उन्हें बाहर नहीं सुलाया।