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4 छिपे कैमरों पर जब अमीर पिता ने नई नर्स को अपनी बीमार बेटी को मृत पत्नी की वही लोरी सुनाते देखा, तो वह बस बोला, “ये गाना इसे किसने सिखाया?” और 2 साल पुरानी मेडिकल फाइल खोलते ही घर की दीवारों में दबा ऐसा राज हिलने लगा कि पूरा परिवार बिखर सकता था।

PART 1

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4 छिपे कैमरों के सामने राजवीर चौहान ने देखा कि नई नर्स उसकी बीमार बेटी तारा को वही लोरी सुना रही थी, जिसे उसकी मरी हुई पत्नी नंदिनी आखिरी सांसों तक गुनगुनाती रही थी।

गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड पर बनी उस सफेद हवेली में उस रात सन्नाटा नहीं, डर चल रहा था। हर कोने में कैमरे थे, हर गेट पर गार्ड, हर दरवाजे के पीछे कोई न कोई आदमी खड़ा। बाहर से वह घर किसी बड़े उद्योगपति का महल लगता था, अंदर से वह एक ऐसे आदमी का किला था जिसने बहुत कुछ खोने के बाद दुनिया पर भरोसा करना बंद कर दिया था।

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राजवीर चौहान ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउस और सिक्योरिटी कंपनियों का मालिक था। दिल्ली से मुंबई तक उसके ट्रक चलते थे, जयपुर से कांडला पोर्ट तक उसके गोदाम थे, और पुलिस थानों से लेकर नगर निगम के दफ्तरों तक उसका नाम धीरे से लिया जाता था। लोग कहते थे, राजवीर किसी का रास्ता खोल भी सकता है और बंद भी कर सकता है। पर उसकी सारी ताकत, सारे पैसे, सारे आदमी मिलकर भी नंदिनी को नहीं बचा पाए थे।

नंदिनी को गुजरे 2 साल हो चुके थे। उसी दिन के बाद से उसकी 6 साल की बेटी तारा ने बोलना छोड़ दिया था। डॉक्टरों ने उसे आघात के बाद का मौन कहा। राजवीर उसे अपनी नाकामी कहता था। ऊपर से तारा को खून का कैंसर था। कीमोथेरेपी ने उसके बाल, उसकी हंसी और उसका बचपन लगभग छीन लिया था।

तीन नर्सें 1 महीने में नौकरी छोड़ चुकी थीं। कोई कहती, बच्ची दवा नहीं लेती। कोई कहती, वह आंखों से ऐसे देखती है जैसे सामने वाला भी मरने वाला हो। फिर 7 दिन पहले काव्या शर्मा आई थी।

काव्या के पास छोटे शहर की सादगी थी और आंखों में अजीब शांत आग। उसने तारा से पहली मुलाकात में हाथ पकड़ने की कोशिश नहीं की। बस बिस्तर के पास बैठकर बोली, “मैं तुमसे बोलने को नहीं कहूंगी। कुछ चुप्पियां पहले सम्मान मांगती हैं, इलाज बाद में।”

तारा ने जवाब नहीं दिया, पर उसने कंबल मरोड़ना बंद कर दिया।

राजवीर दरवाजे से देख रहा था। उसे वह नरमी खतरनाक लगी। नरमी लोगों को अंदर आने देती है, और अंदर आने वाले लोग अक्सर कुछ न कुछ छीनकर जाते हैं।

उस रात उसने काव्या को साफ कह दिया, “रात 8 से सुबह 8 तक ड्यूटी। दवा मिनट पर। कोई भावुक नाटक नहीं। मेरी बेटी पर प्रयोग किया तो इस देश का कोई अस्पताल तुम्हें मुझसे नहीं बचा पाएगा।”

काव्या ने नजर नहीं झुकाई। “अगर आपकी बेटी को मेरी वजह से तकलीफ हुई, तो सबसे पहले मैं खुद को माफ नहीं करूंगी। लेकिन अगर उसे बचाने का मौका मिला, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

7वीं रात तारा को तेज बुखार चढ़ा। काव्या ने पट्टियां बदलीं, डॉक्टर को फोन किया, दवा दी और उसके सिरहाने बैठी रही। जब तारा की कांपती सांस धीमी हुई, काव्या ने गाना शुरू किया।

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राजवीर ने अपने गुप्त कमरे में स्क्रीन का आवाज बढ़ाया।

वह नंदिनी की लोरी थी।

राजस्थान की पुरानी मीठी धुन, जो नंदिनी कहती थी कि उदयपुर वाली नानी ने उसे सिखाई थी। उसमें कुछ ऐसे शब्द थे जो राजवीर कभी ठीक से नहीं बोल पाया था। नंदिनी कहती थी, “ये गाना नींद के लिए नहीं, रक्षा के लिए है।”

काव्या वही लोरी अक्षर-अक्षर वैसे ही गा रही थी। फिर उसने तारा के माथे पर अंगूठे से छोटा-सा गोल निशान बनाया, ठीक वैसे जैसे नंदिनी बनाया करती थी जब उसे लगता था कोई देख नहीं रहा।

स्क्रीन पर तारा के सूखे होंठ हिले।

2 साल से चुप बच्ची गाने की कोशिश कर रही थी।

राजवीर की छाती में कुछ टूट गया। उसने तुरंत अपने सबसे भरोसेमंद आदमी समर को फोन किया।

“काव्या शर्मा की पूरी जिंदगी निकालो। परिवार, नौकरी, डिग्री, झूठ, कर्ज, दुश्मन, सब कुछ। और सुबह होने से पहले बताओ कि यह औरत मेरी पत्नी के बारे में इतना कैसे जानती है।”

फोन के उस पार समर चुप रहा। “साहब, कुछ हुआ है?”

राजवीर स्क्रीन को घूरता रहा। तारा सो चुकी थी, उसकी छोटी उंगलियां काव्या की हथेली में फंसी थीं।

“हाँ,” राजवीर ने धीमे कहा, “इस औरत को ऐसे राज मालूम हैं, जिन्हें मेरी पत्नी के साथ दफन हो जाना चाहिए था।”

PART 2

अगली सुबह तारा ने मोतियों का कंगन बनाया। काव्या लाल, सुनहरे, बैंगनी और नारंगी मोती लेकर आई थी। वह फर्श पर बैठी, जैसे अस्पताल का कमरा नहीं, रविवार की दोपहर हो।

“लाल हिम्मत,” काव्या बोली, “सुनहरा जीत, बैंगनी उम्मीद, नारंगी खुशी।”

तारा ने 1 लाल, 1 सुनहरा, 3 बैंगनी और बहुत देर बाद 1 नारंगी चुना।

राजवीर कैमरे से देख रहा था।

समर की रिपोर्ट उसी समय आई। काव्या सचमुच नर्स थी, बच्चों के कैंसर वार्ड में काम कर चुकी थी, लेकिन उसके 2 प्रमाणपत्र बदले गए थे। उसके जीवन के 4 साल गायब थे। और सबसे खतरनाक बात—राघव बंसल के लोग भी उसके बारे में पूछताछ कर रहे थे।

राघव बंसल राजवीर का पुराना दुश्मन था।

उसी रात तारा की हालत बिगड़ी। उसका शरीर ऐंठने लगा। काव्या ने लाल इमरजेंसी किट मांगी और इंजेक्शन तैयार किया। राजवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“ये क्या है?”

काव्या चीखी नहीं। “या तो मुझ पर भरोसा कीजिए, या अपनी बेटी को जाते देखिए।”

राजवीर ने हाथ छोड़ दिया।

दौरा थम गया।

अस्पताल में होश आते ही तारा ने पहली बार साफ कहा, “पापा… काव्या रुकी थी।”

और उसी पल पुरानी मेडिकल फाइल में से नंदिनी की लिखावट वाला बंद लिफाफा गिरा।

PART 3

नीलकंठ कैंसर अस्पताल के शांत गलियारे में राजवीर उस लिफाफे को हाथ में पकड़े बैठा था। तारा कमरे में सो रही थी। काव्या दूर खिड़की के पास खड़ी थी, जैसे वह भागने और सच बोलने के बीच फंसी हो।

राजवीर ने लिफाफा खोला नहीं। पहले उसने काव्या की तरफ देखा।

“अब एक भी झूठ नहीं,” उसकी आवाज भारी थी। “लोरी, माथे का निशान, खिचड़ी में वही देसी घी की खुशबू, नंदिनी की बोली के शब्द… तुम कौन हो?”

काव्या ने अपनी उंगलियां कस लीं। “मैं वही हूं जिसे आपकी पत्नी ने मरने से पहले नहीं, जीते-जी बचाया था।”

राजवीर की आंखें सिकुड़ गईं।

काव्या धीरे-धीरे बोली, “मैं अजमेर की अनाथ बस्ती में पली। पिता शराब में डूबे रहते थे, मां लोगों के घर बर्तन मांजती थी। 12 साल की थी जब मां मर गई। रिश्तेदारों ने मुझे बोझ कहा। कई रातें बस अड्डे पर सोई। एक सर्द रात मुझे निमोनिया हुआ। मैं दरगाह रोड के पास बेहोश पड़ी थी। नंदिनी मैडम ने मुझे देखा। वे किसी चैरिटी कैंप से लौट रही थीं। उन्होंने मुझे अस्पताल में भर्ती कराया, फीस भरी, फिर जयपुर के एक छात्रावास में मेरा दाखिला कराया।”

राजवीर का चेहरा सफेद पड़ने लगा।

“वे हर महीने आती थीं,” काव्या ने कहा। “किताबें लातीं, गजक लातीं, कभी गुलाबी चूड़ियां, कभी कॉपी। उन्होंने कहा था, पढ़ाई किसी गरीब बच्चे की किस्मत से बदला लेने का तरीका है। उन्होंने मुझे वही लोरी सिखाई। कहती थीं, जब कोई बच्चा बहुत डर जाए, तो यह गाना उसके चारों तरफ अदृश्य चादर बन जाता है।”

“नंदिनी ने मुझे कभी नहीं बताया,” राजवीर ने जैसे खुद से कहा।

“क्योंकि वे कहती थीं कि अच्छाई को आपके नाम की छाया से बचाना जरूरी है। लोग मदद को एहसान, एहसान को सौदा और सौदे को कमजोरी बना देते हैं।”

काव्या की आवाज टूट गई, पर वह रुकी नहीं। “जब मुझे पता चला कि तारा बीमार है, मैं आई। मेरी पढ़ाई सच्ची है, मेरा अनुभव सच्चा है। पर कुछ लाइसेंस की तारीखें अधूरी थीं। इस घर तक पहुंचने के लिए मैंने कागजों में झूठ लिखा। गलती थी। अपराध भी था। लेकिन मैं आपकी बेटी को धोखा देने नहीं आई थी।”

राजवीर ने लिफाफा खोला।

अंदर नंदिनी की लिखावट में छोटी चिट्ठी थी और एक पुराना मेडिकल नोट। नोट में लिखा था कि नंदिनी ने अपने इलाज के आखिरी दिनों में तारा के लिए देखभाल योजना बनवाई थी। उसी योजना में काव्या का नाम था—“यदि कभी तारा को ऐसी नर्स की जरूरत पड़े जो बीमारी से पहले बच्चे को देख सके, तो काव्या शर्मा को खोजा जाए।”

राजवीर की आंखें भर आईं।

चिट्ठी में लिखा था—

“राजवीर, अगर यह कागज तुम्हारे हाथ में है, तो शायद तुमने फिर दीवारें ऊंची कर दी हैं। मेरी मौत को किला मत बनाना। तारा को कैमरों से नहीं, लोगों से बचाना। कहीं एक लड़की है, काव्या, जिसे मैंने सिर्फ इसलिए मदद दी क्योंकि उसे मदद चाहिए थी। अगर वह कभी तारा के पास आए, तो उसके झूठ से पहले उसका दिल देखना। हर घायल इंसान चोर नहीं होता। कुछ लोग टूटकर भी रोशनी उठाए चलते हैं।”

राजवीर ने चिट्ठी सीने से लगा ली। इतने वर्षों में पहली बार उसके चेहरे पर वह आदमी दिखा जो डर से पहले पति और पिता था।

उसी शाम अस्पताल में फूलों का गुलदस्ता आया। नीले अपराजिता और सफेद चमेली। नंदिनी को ये फूल बहुत पसंद थे। समर ने गुलदस्ते को खोलते ही उसके बीच से एक फोटो निकाली—काव्या तारा की व्हीलचेयर धूप में ले जा रही थी। फोटो दूर से ली गई थी।

पीछे काले पेन से लिखा था—

“दो खजाने एक साथ नहीं बचा पाओगे।”

राजवीर का जबड़ा कस गया।

काव्या ने फोटो देखी और तुरंत समझ गई। “राघव बंसल।”

समर बोला, “साहब, सुरक्षा दोगुनी कर देता हूं।”

“तारा के आसपास,” राजवीर ने कहा, फिर पल भर रुका, “और काव्या के आसपास भी।”

काव्या ने थकी मुस्कान से कहा, “अगर आप इस घर को जेल बना देंगे, तो तारा बीमारी से बच भी गई तो डर में जीना सीख जाएगी। नंदिनी मैडम ने मुझे एक बात सिखाई थी—बचाना और बंद कर देना एक बात नहीं है।”

राजवीर ने कठोर स्वर में कहा, “मैं दुश्मन को निमंत्रण नहीं भेज सकता।”

“लेकिन आप उसे अपनी आत्मा भी नहीं दे सकते,” काव्या ने जवाब दिया।

दरवाजे से छोटी आवाज आई, “किसने आत्मा दे दी?”

तारा खड़ी थी। सिर पर हल्का दुपट्टा, हाथ में वही मोतियों का कंगन।

राजवीर तुरंत उसके पास गया। “एक बुरा आदमी हमें डराना चाहता है।”

“क्योंकि मैं बीमार हूं?”

“नहीं,” राजवीर ने उसका माथा चूमा, “क्योंकि वह कायर है। कायर लोग वहीं चोट करते हैं जहां किसी का प्यार छिपा हो।”

तारा ने कंगन उसके हाथ में पहना दिया। “लाल हिम्मत। सुनहरा जीत। बैंगनी उम्मीद। नारंगी खुशी। खुशी मत भूलना, पापा।”

राजवीर ने उसकी छोटी हथेली अपने चेहरे से लगा ली। “नहीं भूलूंगा।”

राघव ने 2 दिन बाद काव्या को उठवा लिया।

यह अस्पताल में हुआ। तारा की जांच चल रही थी। काव्या दवा की पर्ची लेने फार्मेसी की ओर गई। एक नकली वार्ड बॉय ने ट्रॉली आगे कर दी। दूसरी तरफ एक औरत ने फाइलें गिरा दीं। पीछे का सर्विस दरवाजा खुला। काव्या ने एक आदमी को कोहनी मारी, दूसरे की नाक तोड़ी, लेकिन तीसरे ने कपड़े में भीगी तेज दवा उसके मुंह पर दबा दी।

बेहोश होने से पहले उसने दूर मुड़ते राजवीर को देखा। उसके हाथ में नारंगी मोती चमक रहा था।

काव्या की आंख खुली तो वह मानेसर के एक पुराने गोदाम में लोहे की कुर्सी से बंधी थी। हाथ प्लास्टिक की पट्टियों से कट रहे थे। हवा में डीजल, सीलन और जंग की गंध थी।

राघव बंसल सामने बैठा था। महंगा सूट, साफ जूते, गंदी मुस्कान।

“काव्या शर्मा,” उसने धीमे ताली बजाई, “मरी हुई औरत की दया से बची हुई लड़की। कहानी अच्छी है। फेसबुक पर डालो तो लोग रो पड़ेंगे।”

काव्या चुप रही।

“राजवीर पहले आसान था। बस पैसा, गुस्सा और बदला। पत्नी की याद और बीमार बेटी में अटका हुआ आदमी। पर तुमने उसे कमजोर कर दिया।”

“वह आएगा,” काव्या ने कहा।

“मैं चाहता भी यही हूं।”

पर राजवीर वैसा नहीं आया जैसा राघव ने सोचा था।

पुराना राजवीर बंदूक लेकर अकेला घुसता, खून बहाता, शहर में आग लगाता। वही राजवीर जिसे नंदिनी डरती थी कि कहीं तारा विरासत में न पा ले। पर उस रात राजवीर ने बंदूक से पहले फोन उठाया।

उसने एक ईमानदार संयुक्त आयुक्त को कॉल किया, जिससे वह वर्षों से बचता आया था। उसने राघव के गोदामों, नकली बिलों, हवाला रास्तों, पुलिस में बैठे खरीदे हुए अफसरों और बंदरगाहों पर चल रहे गैरकानूनी माल के सबूत सौंप दिए। अपनी कंपनियों से जुड़े गंदे हिस्से भी छिपाए नहीं।

समर ने डरकर कहा, “साहब, इससे हम पर भी छींटे आएंगे।”

राजवीर ने पहली बार बिना गर्व के कहा, “तो आने दो। मेरी बेटी ऐसी दुनिया में नहीं बड़ी होगी जिसे मैंने अपने अहंकार से गंदा रखा।”

जब सायरन गोदाम के बाहर गूंजे, राघव का चेहरा बदल गया। उसने काव्या के बाल पकड़कर चाकू उसकी गर्दन पर रख दिया।

राजवीर बड़े दरवाजे से अंदर आया। उसके पीछे पुलिस थी।

राघव हंसा। “देखो, चौहान साहब एक और औरत खोने आए हैं। कितनी चिताएं चाहिए तुम्हें ये समझने के लिए कि प्यार आदमी को कमजोर बना देता है?”

राजवीर की आंखों में दर्द कौंधा। फिर उसने अपनी कलाई पर कंगन देखा।

नारंगी।

खुशी।

उसने बंदूक नीचे कर दी। “प्यार कमजोर नहीं बनाता, राघव। डर आदमी को जानवर बनाता है। और आज मैं डर की तरफ से नहीं आया।”

राघव चीखा, “पास आए तो इसे काट दूंगा।”

“मैं पास नहीं आऊंगा,” राजवीर ने शांत कहा।

उसी पल पीछे के दरवाजे से पुलिस घुसी। राघव पलटा। काव्या ने पूरी ताकत से अपना सिर पीछे मारा, उसका संतुलन बिगड़ा। राजवीर ने एक गोली चलाई—सीने पर नहीं, उस हाथ पर जिसमें चाकू था।

चाकू जमीन पर गिरा।

राघव की चीख गोदाम में गूंज गई। पुलिस ने उसे दबोच लिया।

राजवीर काव्या तक पहुंचा। उसने पट्टियां काटीं। उसके हाथ कांप रहे थे।

“तुम्हें चोट लगी?”

“मैं ठीक हूं।”

“झूठ मत बोलो।”

काव्या की आंखों से आंसू गिर पड़े। “डर गई थी।”

राजवीर ने उसे सीने से लगा लिया। “मैं भी।”

काव्या ने बहुत देर बाद कहा, “अगर मैं तारा के जीवन में रहूं, तो कैमरों के पीछे नहीं रहूंगी। सच चाहिए। खुली खिड़कियां चाहिए। हथियारों वाले गलियारों में बच्ची ठीक नहीं होती।”

राजवीर ने सिर हिलाया। “तुम्हें मिलेगा।”

“डर में वादा मत कीजिए।”

“डर में नहीं,” उसने कहा, “थककर। मैं डर से लड़ते-लड़ते थक गया हूं।”

3 महीने बाद डॉक्टर ने कहा, “रिमिशन।”

कमरे में कुछ पल कोई हिला नहीं। डॉक्टर अभी भी सावधानी, जांच, आगे के इलाज और खतरे की बातें कर रहा था, पर तारा ने बस एक शब्द सुना।

रिमिशन।

वह पहले रोई। फिर काव्या रोई। फिर राजवीर ने खिड़की की तरफ मुंह फेर लिया।

तारा ने कमजोर हंसी से कहा, “पापा, रो सकते हो। काव्या कहती है, कभी-कभी रोना भी जीत होता है।”

राजवीर हंसते-हंसते रो पड़ा।

हवेली धीरे-धीरे बदलने लगी। गेट पर गार्ड रहे, पर हर कदम पर बंदूकें नहीं रहीं। अंदर के कई कैमरे उतर गए। सबसे पहले तारा के कमरे वाला कैमरा राजवीर ने खुद हटाया। वह स्टूल पर चढ़ा, पेचकस घुमाया और कैमरा हाथ में लेकर नीचे उतरा।

तारा ने पूछा, “अब आप मुझे सोते हुए नहीं देखेंगे?”

राजवीर ने उसकी आंखों में देखा। “अब मैं तुम्हारे जागते समय तुम्हारे पास बैठूंगा।”

“और जब मैं सोऊंगी?”

“मैं घर में रहूंगा। स्क्रीन के पीछे नहीं।”

उस रात तारा ने दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ा, डर से नहीं, बल्कि इसलिए कि उसे रसोई से आती आवाजें, बर्तनों की खनक, काव्या की धीमी हंसी और पापा के कदम सुनाई दें।

काव्या ने अपने कागज ठीक करवाए। जो परीक्षा छूटी थी, वह दी। जो प्रमाणपत्र अधूरा था, उसे पूरा किया। राजवीर ने बड़े वकील लगाने की बात की तो उसने मना कर दिया।

“जो मैं मेहनत से पा सकती हूं, वह एहसान में नहीं चाहिए।”

राजवीर मुस्कुराया। “तुम्हारी यही बात मुझे सबसे ज्यादा डराती है।”

राजवीर ने भी अपने कारोबार के अंधेरे हिस्से काटने शुरू किए। वह एक दिन में संत नहीं बना। ऐसे आदमी एक चिट्ठी पढ़कर पूरी तरह बदल नहीं जाते। पर उसने कई संदिग्ध सौदे बंद किए, राघव के नेटवर्क पर गवाही दी, उन अफसरों के नाम दिए जो पैसे लेकर आंखें बंद करते थे। कुछ नुकसान हुआ, कुछ पुराने साथी दुश्मन बने, पर पहली बार उसे लगा कि उसकी बेटी की सांसें उसके झूठ से महंगी हैं।

तारा ने फ्रिज पर बैंगनी कागज चिपकाया।

“पापा के अच्छे फैसले।”

हर अच्छे फैसले पर वह सुनहरा तारा बनाती। जब राजवीर ने एक ड्राइवर से माफी मांगी जिसे उसने गुस्से में अपमानित किया था, 1 तारा। जब उसने पड़ोसी की पार्किंग पर दबाव बनाने वाले 2 आदमियों को निकाल दिया, 2 तारे। जब वह तारा के स्कूल में बिना हथियारबंद आदमी को क्लासरूम तक लाए गया, 3 तारे और पास में नारंगी फूल।

एक वसंत दोपहर काव्या ने राजवीर को नंदिनी के बगीचे में अकेले बैठे देखा। अमलतास के पेड़ पर पीले फूल झर रहे थे। हवेली अब पहले जैसी घूरती हुई नहीं लगती थी। वह सांस लेती लगती थी।

राजवीर बोला, “नंदिनी के जाने के बाद मैं यहां आता था और उससे माफी मांगता था।”

“किस बात की?” काव्या ने पूछा।

“उसे न बचा पाने की। तारा को न संभाल पाने की। जिंदा रहकर भी जीना भूल जाने की।”

काव्या ने धीरे से कहा, “दुख में टूटना हार नहीं है। हार तब है जब आदमी लौटने से इनकार कर दे।”

तभी तारा दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में सफेद लिफाफा था।

“पापा पूरी तरह नहीं लौटे,” उसने गंभीरता से कहा।

राजवीर चौंका। “क्या मतलब?”

“मम्मा की तितलियों वाली किताब में ये मिला। पुराने माली रामू काका ने कहा, शायद अब सही समय है।”

लिफाफे पर नंदिनी की लिखावट थी—

“मेरे 2 सितारों के लिए, जब घर फिर से रोशनी लेने लायक हो जाए।”

राजवीर ने कांपते हाथों से पत्र खोला। काव्या पीछे हटने लगी, पर तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम भी सितारा हो,” उसने कहा।

राजवीर ने पढ़ना शुरू किया।

“राजवीर,

अगर यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ में है, तो शायद मेरा दुख तुम्हारे घर में बहुत देर तक रुका रहा। मैं तुम्हें जानती हूं। तुम अपने प्यार को दीवार बना दोगे और उसे सुरक्षा कहोगे। मगर तारा को जिंदगी भर दीवारें नहीं चाहिए। उसे खिड़कियां चाहिए, धूप चाहिए, गाने चाहिए, नारंगी फूल चाहिए, और ऐसे लोग चाहिए जो उससे डरकर नहीं, प्यार करके जुड़ें।

कहीं एक लड़की है—काव्या। मैंने उसकी मदद की क्योंकि उसे मदद की जरूरत थी। इससे बड़ी वजह नहीं होती। अगर वह कभी तुम्हारे घर आए, तो उसके राज से पहले उसकी आंखें देखना। हर छिपा हुआ सच खतरा नहीं होता। कुछ सच घावों में रखी हुई रोशनी होते हैं।

मेरी याद को बंद कमरा मत बनाना। तारा को मुझे याद करने देना, पर उसे मेरे बिना जीने भी देना। और हाँ, मेरे जिद्दी राजवीर, नारंगी रंग सिर्फ त्योहार का नहीं होता। कभी-कभी वह खुशी का पहला साहस होता है।”

पत्र खत्म हुआ तो बगीचे में लंबी चुप्पी फैल गई।

फिर तारा ने काव्या की तरफ देखकर मुस्कुराया। “देखा? मम्मा ने भी नारंगी कहा।”

काव्या हंसते हुए रो पड़ी।

राजवीर ने तारा और काव्या दोनों को बांहों में भर लिया। एक हाथ में नंदिनी की चिट्ठी थी, दूसरे में मोतियों का कंगन।

जिस आदमी ने कभी अपनी बेटी को 4 कैमरों से देखा था, उसने आखिर उसके बिस्तर के पास बैठना सीख लिया। जिस बच्ची ने 2 साल तक आवाज खो दी थी, वह फिर से मां की लोरी गाने लगी। और काव्या शर्मा, जो झूठे कागज लेकर उस घर में आई थी, वहीं सच्चे दिल के साथ रह गई—न नंदिनी की जगह लेने, न किसी कर्ज की तरह, बल्कि इस बात की गवाही बनकर कि कभी-कभी रोशनी दरवाजे से नहीं आती।

वह घाव से भीतर उतरती है।

धीरे से।

और फिर घर बन जाती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.