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26 साल की असिस्टेंट ने जब पुराने प्रेमी को फोन पर कहा “मैं तुम्हारी नहीं हूं”, तो उसी रात उसके खतरनाक बॉस ने ऐसी चाल चली कि अगली सुबह पूरा कारोबार कांप उठा

भाग 1

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आर्या मेहरा ने 42वीं मंज़िल के खाली दफ्तर में अपने पूर्व प्रेमी की आवाज़ सुनी और उसी पल उसे समझ आ गया कि कुछ लोग प्यार के नाम पर भी कैद बनना चाहते हैं।

रात के 7:12 बज रहे थे। मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स की चमकती इमारतों के बीच राठौड़ ग्लोबल का मुख्यालय अब लगभग खाली हो चुका था। बाहर बारिश कांच की दीवारों पर ऐसे फिसल रही थी जैसे शहर अपने पाप धोना चाहता हो। अंदर सिर्फ आर्या थी, उसका लैपटॉप था, और सिंगापुर बंदरगाह सौदे की 18 फाइलें थीं, जिनमें गलतियां ढूंढना किसी अदालत में सच खोजने जैसा था।

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आर्या 3 साल से कबीर राठौड़ की एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट थी। कबीर सिर्फ व्यापारी नहीं था। लोग उसे लॉजिस्टिक्स किंग कहते थे, पर बंद कमरों में उसका नाम धीरे बोला जाता था। शिपिंग, रियल एस्टेट, राजनीतिक रिश्ते, विदेशी निवेश—हर जगह उसका हाथ था। आर्या ने बहुत कुछ देखा था, पर सवाल पूछना उसने बहुत पहले छोड़ दिया था। उसका काम था रास्ते साफ रखना, तारीखें संभालना, झूठ को कागजों में सच जैसा दिखाना और सच को सही समय तक छुपाकर रखना।

तभी उसका निजी फोन बजा।

—आर्या, आखिर उठा लिया तुमने।

विक्रम।

2 साल पहले खत्म हुआ रिश्ता, जो उसके लिए अतीत था और विक्रम के लिए अधूरी मिल्कियत।

—मैं काम पर हूं, विक्रम। बात क्या है?

—तुम हमेशा काम पर रहती हो। उस आदमी ने तुम्हें बदल दिया है। पहले तुम इतनी ठंडी नहीं थीं।

आर्या ने स्क्रीन से नजर नहीं हटाई।

—मैं बदली नहीं हूं। बस अब मुझे ऐसे लोगों को खुश करने की आदत नहीं रही जो मेरी उड़ान से डरते हैं।

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फोन के उस पार कुछ पल चुप्पी रही।

—देखो बेबी, मैं सिर्फ बात करना चाहता हूं।

आर्या की उंगलियां कीबोर्ड पर रुक गईं।

—किसे बेबी बोल रहे हो?

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, मगर धारदार।

—तुम मेरी थी, आर्या।

—मैं कभी तुम्हारी नहीं थी। मैं 26 साल की औरत हूं, नौकरी करती हूं, फैसला लेती हूं, और तुम्हारे जैसे आदमी की दया या अनुमति पर नहीं जीती।

पीछे से हल्की आहट हुई।

आर्या ने मुड़कर देखा।

कबीर राठौड़ अपने निजी केबिन के दरवाजे पर खड़ा था। सफेद शर्ट की आस्तीनें मुड़ी हुई थीं, टाई खुली थी, आंखें सीधी आर्या पर जमी थीं। वह कब लौटा, उसे पता ही नहीं चला।

आर्या ने फोन काट दिया।

—सर, मुझे पता नहीं था कि आप वापस आ गए हैं। सिंगापुर वाली फाइलें तैयार हैं।

कबीर ने जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे उसके डेस्क तक आया।

—कौन था?

—निजी कॉल थी। माफ कीजिए, दोबारा नहीं होगा।

—मैंने माफी नहीं मांगी। नाम पूछा।

आर्या ने उसकी आंखों में देखा।

—विक्रम। मेरा पूर्व प्रेमी।

कबीर की आवाज़ और ठंडी हो गई।

—जो तुम्हें बेबी कह रहा था?

—जिसे समझ नहीं आता कि रिश्ता खत्म हो चुका है।

कबीर कुछ देर उसे देखता रहा। फिर बोला—

—ऐसे आदमी कमजोर नहीं होते, आर्या। खतरनाक होते हैं। क्योंकि वे प्यार नहीं मांगते, हक जताते हैं।

आर्या ने फाइल खोल दी।

—मैं संभाल लूंगी।

—अगर वह आगे बढ़ा, तो मुझे बताना।

—क्यों?

कबीर की नजरें कांच के पार चमकते शहर पर चली गईं।

—क्योंकि तुम मेरी जिम्मेदारी हो।

भाग 2

अगली सुबह से दफ्तर की हवा बदल गई। कबीर पहले भी देर तक काम करता था, मगर अब वह आर्या के डेस्क के पास ज्यादा रुकने लगा। कभी फाइल के बहाने, कभी किसी रिपोर्ट के बहाने, और कभी सिर्फ यह पूछने कि उसने खाना खाया या नहीं। आर्या को यह अच्छा भी लगता था और खतरनाक भी। उसकी दोस्त नैना, जो हाई कोर्ट में वकील थी, ने साफ कहा—कबीर राठौड़ जैसे आदमी मदद नहीं करते, वे घेरा बनाते हैं।

तीसरे दिन आर्या के फोन पर अनजान नंबर से कॉल आया।

—मैडम, मैं विक्रम मल्होत्रा की तरफ से बोल रहा हूं। वह आपसे आखिरी बार मिलकर बात करना चाहते हैं।

आर्या ने कॉल काट दिया, लेकिन संदेश तुरंत आया—“मुलाकात तो होगी। कबीर हमेशा तुम्हारे साथ नहीं रहेगा।”

उसने स्क्रीनशॉट कबीर को भेज दिया।

5 सेकंड में इंटरकॉम बजा।

—मेरे केबिन में आओ।

कबीर खिड़की के पास खड़ा था। उसके चेहरे पर वह शांति थी जो तूफान से पहले आती है।

—वह अब तुम्हें डराने के लिए तीसरे लोगों का इस्तेमाल कर रहा है।

—मैं पुलिस शिकायत कर सकती हूं।

—करोगी। लेकिन उससे पहले उसे समझना होगा कि तुम अकेली नहीं हो।

—आप क्या चाहते हैं?

कबीर ने पहली बार सीधे कहा—

—कल रात राजीव सेठी के साथ डिनर है। वह मेरे पश्चिमी तट बंदरगाह सौदे का सबसे बड़ा निवेशक है। तुम मेरे साथ चलोगी। असिस्टेंट की तरह नहीं। मेरी मेहमान बनकर।

आर्या ने ठंडी सांस भरी।

—मतलब दुनिया को दिखाना है कि मैं आपकी सुरक्षा में हूं?

—दुनिया को नहीं। उसे।

—यह पुराना और अधिकार जताने वाला तरीका है।

—और असरदार भी।

आर्या चुप रही। फिर बोली—

—मैं सजावट बनकर नहीं जाऊंगी। अगर बातचीत में गलती दिखी तो बोलूंगी।

कबीर के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

—इसीलिए तो तुम्हें ले जा रहा हूं।

अगली रात राजीव सेठी ने उसी डिनर में आर्या से पूछा—

—आप कबीर जी की असिस्टेंट हैं? तो बस उनका शेड्यूल संभालती होंगी?

आर्या मुस्कुराई।

—नहीं। मैं उन्हें महंगी गलतियों से बचाती हूं।

और फिर उसने 11 मिनट में बंदरगाह शुल्क, बीमा जोखिम और नकली साझेदार कंपनी की पूरी परत खोल दी। राजीव सेठी का चेहरा उतर गया। कबीर पहली बार सबके सामने गर्व से उसे देख रहा था।

डिनर खत्म होते ही राजीव ने हाथ मिलाया।

—राठौड़ साहब, सौदा पक्का। लेकिन सच कहूं, आज सौदा आपने नहीं, आर्या जी ने बचाया है।

उसी समय आर्या के फोन पर विक्रम का संदेश आया—

“तो अब तुम उसकी औरत हो?”

कबीर ने संदेश पढ़ा। उसकी आंखों में कुछ ऐसा चमका कि आर्या के दिल की धड़कन रुक गई।

—अब यह मेरे तरीके से खत्म होगा।

भाग 3

अगले 24 घंटों में विक्रम मल्होत्रा को पहली बार समझ आया कि किसी औरत को कमजोर समझने की कीमत क्या होती है। कबीर ने कोई फिल्मी धमकी नहीं दी, कोई गुंडा नहीं भेजा, कोई तमाशा नहीं किया। उसने बस वही किया जिसमें वह माहिर था—सिस्टम को इतना कस दिया कि आदमी खुद अपनी सांस सुनने लगे।

सुबह 9 बजे विक्रम के ऑफिस में लीगल नोटिस पहुंचा। दोपहर 12 बजे उसके पिता को पता चला कि जिस फर्म में विक्रम जूनियर पार्टनर बनना चाहता था, वहां उसके खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज हो चुकी है। शाम 4 बजे नैना ने महिला आयोग में आवेदन जमा कर दिया। रात 8 बजे विक्रम के सारे संदेश, कॉल रिकॉर्ड और भेजे गए धमकी भरे स्क्रीनशॉट सुरक्षित सर्वर पर अपलोड हो चुके थे।

लेकिन आर्या ने सबसे जरूरी फैसला खुद लिया।

वह पुलिस स्टेशन गई। कबीर बाहर कार में बैठा रहा।

—अंदर नहीं आएंगे? —नैना ने पूछा।

कबीर ने आर्या की ओर देखा।

—यह उसकी लड़ाई है। मैं उसके पीछे खड़ा हूं, उसके आगे नहीं।

आर्या ने पहली बार महसूस किया कि सुरक्षा और कब्जे में फर्क होता है। एक हाथ तुम्हारा रास्ता रोकता है। दूसरा सिर्फ तब पकड़ता है जब तुम गिरने लगो।

शिकायत दर्ज हुई। विक्रम को चेतावनी मिली। फिर भी उसने 1 गलती की—वह आर्या के पुराने किराये वाले घर के बाहर पहुंच गया। बारिश हो रही थी। हाथ में फूल थे, चेहरे पर वही नकली दुख।

—आर्या, मैं पागल हो गया था। बस 1 मौका दे दो।

आर्या गेट के भीतर खड़ी रही। सुरक्षा कैमरा चालू था।

—तुमने मुझे प्यार नहीं किया, विक्रम। तुम मुझे छोटा करना चाहते थे। तुम्हें वह लड़की चाहिए थी जो तुम्हारी असुरक्षा को प्यार समझे। मैं वह लड़की नहीं हूं।

—वह आदमी तुम्हें इस्तेमाल करेगा।

—कम से कम उसने मुझे कभी छोटा होने को नहीं कहा।

विक्रम ने गेट पकड़ लिया।

—तुम पछताओगी।

पीछे से कबीर की कार रुकी। कबीर बाहर आया, लेकिन आर्या ने हाथ उठाकर उसे वहीं रोक दिया।

फिर उसने विक्रम से कहा—

—मैंने तुम्हारी वजह से डरना बंद कर दिया है। अब तुम्हारी हर कोशिश रिकॉर्ड होगी, रिपोर्ट होगी और अदालत में जाएगी। मुझे बचाने के लिए किसी आदमी की जरूरत नहीं। लेकिन हां, अब मेरे पास ऐसे लोग हैं जो मुझे अकेला नहीं छोड़ेंगे।

उस रात विक्रम गिरफ्तार नहीं हुआ, पर उसके खिलाफ मामला इतना मजबूत हो गया कि वह शहर छोड़कर दिल्ली चला गया। उसके बाद कोई कॉल नहीं आया।

कबीर ने उसी रात आर्या को अपने पेंटहाउस में बुलाया। यह पहली बार था जब वह दफ्तर से ऊपर उसके निजी घर में आई। बाहर मुंबई रोशनी में डूबी थी। अंदर दीवारों पर महंगे चित्रों से ज्यादा किताबें थीं। आर्या ने हैरानी से पूछा—

—आप सच में पढ़ते हैं?

कबीर हंसा।

—तुम्हें लगता था मैं सिर्फ कंपनियां खरीदता हूं और लोगों को डराता हूं?

—कभी-कभी।

वह मुस्कुराया, फिर गंभीर हो गया।

—तुम्हारे शनिवार वाले क्लास के बारे में जानता हूं।

आर्या की आंखें सिकुड़ गईं।

—कौन से क्लास?

—जहां तुम घरेलू कामगारों और छोटे दुकानदारों को ब्याज, कर्ज और कागजी शर्तें समझाती हो। जहां तुम उन्हें बताती हो कि अंगूठा लगाने से पहले पढ़ना जरूरी है।

—आपने मेरी जासूसी की?

—मैंने तुम्हारे बारे में सब जाना था जब तुम्हें नौकरी पर रखा। लेकिन बाद में देखा कि तुम वीकेंड में भी लोगों को उसी जाल से बचाती हो जिससे मेरे जैसे लोग पैसा कमाते हैं।

कमरे में चुप्पी भर गई।

कबीर ने धीमे से कहा—

—मैं उस काम को बड़ा करना चाहता हूं। 1 सेंटर नहीं, 10 सेंटर। स्टाफ, वकील, ट्रेनर, फंडिंग सब। तुम चलाओगी। फैसला तुम्हारा होगा। पैसा मेरा।

आर्या ने उसे बहुत देर तक देखा।

—क्यों?

—क्योंकि तुमने मुझे दिखाया कि ताकत सिर्फ लेने में नहीं होती। कभी-कभी लौटाने में भी होती है।

—या आपको लगता है कि पैसे देकर आप अपने पाप हल्के कर लेंगे?

कबीर ने नजर नहीं चुराई।

—शायद शुरुआत में। लेकिन अब नहीं। अब मैं चाहता हूं कि तुम कुछ ऐसा बनाओ जो मुझसे बेहतर हो।

आर्या के भीतर कुछ कांपा। 3 साल से वह कबीर को एक खतरनाक, तेज, अडिग आदमी के रूप में जानती थी। उस रात उसने पहली बार उसमें पछतावा देखा। और एक अजीब सी ईमानदारी भी।

—मैं फंडिंग स्वीकार करूंगी, 2 शर्तों पर।

—बोलो।

—पहली, उस संस्था पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होगा। दूसरी, दुनिया चाहे जो बोले, आप कभी मुझे अपनी छाया में छिपाने की कोशिश नहीं करेंगे।

कबीर उसके पास आया।

—मैं तुम्हें छिपाना नहीं चाहता, आर्या। मैं चाहता हूं कि लोग तुम्हें देखें और समझें कि मेरे साम्राज्य में सबसे तेज दिमाग मेरा नहीं है।

उस रात उनके बीच जो दूरी थी, वह पूरी तरह खत्म नहीं हुई, मगर बदल गई। वह दफ्तर की दूरी नहीं रही। वह सावधानी थी। सम्मान था। वह जगह थी जहां 2 जिद्दी लोग बिना झुके एक-दूसरे के करीब आना सीखते हैं।

3 महीने बाद “सक्षम” नाम से पहला वित्तीय साक्षरता केंद्र धारावी के पास खुला। फिर अंधेरी, ठाणे, नवी मुंबई और पुणे में शाखाएं शुरू हुईं। अखबारों ने लिखा कि कबीर राठौड़ अपनी छवि सुधारने के लिए दान कर रहा है। कुछ ने आर्या को उसकी प्रेमिका कहा, कुछ ने लालची, कुछ ने चालाक। आर्या ने सब पढ़ा, फिर अगले दिन क्लास में जाकर 52 महिलाओं को कर्ज के कागज पढ़ना सिखाया।

कबीर ने कभी मंच पर उसका भाषण नहीं छीना। वह पीछे खड़ा रहता। कभी सुरक्षा देखता, कभी चुपचाप चाय के कप बांट देता। जिन लोगों ने उसे डरावना उद्योगपति समझा था, वे उसे बच्चे को गोद में उठाए हुए, बूढ़ी अम्मा की कुर्सी खिसकाते हुए देखकर हैरान रह जाते।

लेकिन कबीर की दुनिया इतनी आसान नहीं थी।

1 शाम आर्या ने सेंटर से बाहर निकलते हुए काली कार देखी। वही कार सुबह पेंटहाउस के पास भी थी। उसने फोटो खींचकर सुरक्षा प्रमुख समीर को भेजा। 3 मिनट में जवाब आया—

“सीधे मुख्यालय आइए। रास्ता मत बदलिए।”

आर्या का दिल तेज धड़कने लगा।

मुख्यालय पहुंचते ही कबीर ने उसे अपने पास खींच लिया।

—किसी ने छुआ तो नहीं?

—नहीं। लेकिन कौन है?

—आदित्य भसीन। बंदरगाह वाला पुराना दुश्मन। वह समझना चाहता है कि तुम मेरी कमजोरी हो या ताकत।

आर्या ने खुद को उसके हाथों से अलग किया।

—मैं किसी की कमजोरी नहीं हूं।

—मुझे पता है। लेकिन वे लोग ऐसे नहीं सोचते।

—तो उन्हें सही सोचना सिखाइए। लेकिन मुझे अंधेरे में मत रखिए।

कबीर ने सिर हिलाया।

—कभी नहीं।

अगले 7 दिन तनाव में बीते। आर्या के आसपास सुरक्षा रही, मगर उसे कैद की तरह महसूस न हो, इसका ध्यान रखा गया। कबीर ने उसे हर बातचीत बताई। किससे बात हुई, कौन सा दबाव डाला गया, कौन सा सौदा छोड़ा गया। अंत में आदित्य पीछे हटा, क्योंकि कबीर ने साफ कर दिया कि आर्या को छूना व्यापारिक विवाद नहीं, निजी युद्ध माना जाएगा।

उस रात आर्या ने पहली बार कबीर से कहा—

—मुझे डर लगा था।

कबीर ने उसका हाथ थामा।

—मुझे भी।

—आपको?

—तुम्हें खोने का डर किसी भी दुश्मन से बड़ा है।

आर्या ने धीमे से कहा—

—फिर मुझे अपने पास रखिए, लेकिन अपने नीचे नहीं। बराबर।

कबीर ने जवाब दिया—

—हमेशा बराबर।

समय के साथ दोनों ने एक-दूसरे को बदलना नहीं, समझना सीखा। कबीर ने काम बांटना शुरू किया। आर्या ने मदद स्वीकार करना सीखा। दोनों लड़ते भी थे—कॉफी के कप, देर रात की मीटिंग, सुरक्षा नियम, संस्था के बजट, हर बात पर। मगर हर झगड़े के बाद वे लौटकर उसी सवाल पर आते—क्या हम एक-दूसरे को छोटा कर रहे हैं या मजबूत?

6 महीने बाद आर्या राठौड़ ग्लोबल की बोर्ड मीटिंग में खड़ी थी। अब वह सिर्फ असिस्टेंट नहीं थी। वह “सक्षम” की निदेशक थी, और 14 नए केंद्र खोलने का प्रस्ताव रख रही थी।

एक डायरेक्टर ने पूछा—

—इसका लाभ क्या है? पैसे वापस कैसे आएंगे?

आर्या ने बिना हिचके कहा—

—लाभ उन घरों में आएगा जो सूदखोरों से बचेंगे। उन लड़कियों में आएगा जो कागज पढ़े बिना शादी या कर्ज पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। उन परिवारों में आएगा जो पहली बार समझेंगे कि गरीबी उनकी गलती नहीं, लेकिन जानकारी उनकी ताकत हो सकती है। अगर आपकी दुनिया में हर चीज का हिसाब रुपये में ही होता है, तो यह प्रस्ताव आपके लिए नहीं है।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कबीर मेज के सिरहाने बैठा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आंखों में वैसा गर्व था जिसे छुपाना उसके बस में नहीं था।

प्रस्ताव पास हो गया।

मीटिंग के बाद कबीर ने पूछा—

—कुछ कहना चाहती हो?

आर्या ने पर्स से छोटा सा सफेद बॉक्स निकाला। उसके हाथ कांप रहे थे।

—8 हफ्ते।

कबीर ने पहले बॉक्स देखा, फिर आर्या को।

—तुम…?

—हां।

उसके चेहरे पर वह भाव आया जो आर्या ने कभी नहीं देखा था—डर, खुशी, अविश्वास और प्रेम एक साथ। वह धीरे से उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसके पेट पर हाथ रखा।

—हमारा बच्चा।

—हमने यह योजना नहीं बनाई थी।

—मेरी जिंदगी की सबसे अच्छी चीजें कभी योजना से नहीं आईं।

आर्या रो पड़ी।

—मैं मां बनूंगी, लेकिन अपना काम नहीं छोड़ूंगी।

—मैं पिता बनूंगा, और अपना साम्राज्य थोड़ा छोड़ना सीखूंगा।

—हम दोनों बहुत जिद्दी हैं।

—तो बच्चा भी होगा।

—बेचारा बच्चा।

कबीर हंसा। उस हंसी में कोई डरावना व्यापारी नहीं था। सिर्फ एक आदमी था, जो पहली बार किसी आने वाले कल से डर भी रहा था और उसे गले भी लगाना चाहता था।

बेटी 3 हफ्ते पहले पैदा हुई। छोटी, स्वस्थ, तेज आवाज़ वाली। अस्पताल के कमरे में जब डॉक्टर ने उसे आर्या की बाहों में रखा, तो कबीर बिल्कुल चुप हो गया। वह आदमी, जिसने अरबों के सौदे बिना पलक झपकाए किए थे, अपनी बेटी की उंगली पकड़कर रो पड़ा।

—नाम? —आर्या ने पूछा।

कबीर ने बहुत धीरे कहा—

—मीरा। क्योंकि इसे दुनिया को देखने से पहले खुद को देखना सीखना चाहिए।

—मीरा मेहरा राठौड़।

कबीर ने तुरंत सिर हिलाया।

—हाँ। तुम्हारा नाम पहले रहेगा। उसे पता होना चाहिए कि वह किस आग से आई है।

1 साल बाद “सक्षम” का नया मुख्य केंद्र खुला। मंच पर आर्या थी। सामने सैकड़ों महिलाएं, छोटे व्यापारी, छात्राएं और मजदूर बैठे थे। पीछे कबीर खड़ा था, मीरा को गोद में लिए। बच्ची उसकी टाई खींच रही थी और वह बिना नाराज हुए मुस्कुरा रहा था।

आर्या ने माइक पकड़ा।

—कभी किसी ने मुझे कहा था कि महत्वाकांक्षी औरतें घर नहीं बना सकतीं। फिर किसी ने मुझे छोटा करने की कोशिश की। फिर किसी ने मुझे बचाना चाहा। और फिर हमने सीखा कि किसी औरत को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उसे बंद करना नहीं, उसके लिए दरवाजे खोलना है।

तालियां बज उठीं।

आर्या ने पीछे देखा। कबीर की आंखें नम थीं।

कार्यक्रम खत्म होने के बाद तीनों खाली हॉल में रह गए। मीरा सो चुकी थी। दीवार पर लिखा था—“ज्ञान ही सुरक्षा है।”

कबीर ने कहा—

—तुमने यह सब बनाया।

आर्या ने उसकी तरफ देखा।

—हमने। लेकिन रास्ता मैंने चुना।

—और मैं खुश हूं कि तुमने मुझे उस रास्ते पर साथ चलने दिया।

आर्या ने मीरा के माथे को चूमा।

बाहर मुंबई फिर शोर कर रही थी। वही शहर, वही बारिश, वही लाल-पीली रोशनी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब आर्या किसी की असिस्टेंट बनकर नहीं, अपने नाम की रोशनी में खड़ी थी।

और कबीर, जो कभी साम्राज्य जीतता था, अब अपनी बेटी की नींद बचाने के लिए धीरे बोलना सीख चुका था।

यही उनकी जीत थी—कब्जा नहीं, बराबरी। डर नहीं, भरोसा। और ऐसा प्रेम, जिसने किसी औरत को छोटा नहीं किया, बल्कि उसे इतना ऊंचा खड़ा कर दिया कि पूरी दुनिया को ऊपर देखकर बात करनी पड़ी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.