
PART 1
सास ने अपने 3 साल के पोते के सामने बहू की बाँह गरम लोहे से जला दी, और घर के आँगन में खड़ी पूरी बिरादरी कुछ पल तक साँस लेना भूल गई।
रिया माथुर ने चीखते हुए अपना हाथ पीछे खींचा। गरम सीख की नोक उसकी त्वचा को छूकर अलग हुई तो सफेद कुर्ते की आस्तीन से धुआँ-सा उठा। दिल्ली के राजौरी गार्डन वाले उस पुराने मकान के आँगन में रविवार की दोपहर अचानक किसी अदालत जैसी खामोशी उतर आई।
सावित्री मल्होत्रा, उसकी सास, हाथ में वही लोहे की सीख पकड़े खड़ी थी। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, गले में रुद्राक्ष की माला, चेहरे पर वैसी शांति जैसे अभी-अभी उसने पूजा की थाली रखी हो।
—जब दूसरों की चमड़ी पर सुई चलाने में मजा आता है न, तो अपनी चमड़ी की जलन भी जाननी चाहिए।
रिया 31 साल की थी। वह हौज खास के एक छोटे लेकिन मशहूर टैटू स्टूडियो में काम करती थी। उसके हाथों पर फूल, पंख, और एक पतली-सी नदी बनी थी। उसके लिए टैटू पाप नहीं थे, यादें थीं। किसी की माँ का नाम, किसी खोए बच्चे की तारीख, किसी जंग से लौटे आदमी की चुप्पी। लेकिन सावित्री के लिए रिया “घर की इज्जत पर धब्बा” थी।
अर्जुन से रिया की शादी को 5 साल हुए थे। उनका बेटा कबीर, 3 साल का, छोटे-छोटे खिलौना मेट्रो ट्रेन से खेलता था और अपनी दादी के आँगन में बनी लकड़ी की छोटी-सी झोपड़ी को अपना “स्टेशन” कहता था।
शुरुआत में सावित्री रिश्तेदारों के सामने मुस्कुराकर कहती थी—
—लड़की ठीक है, बस राह भटक गई है। शरीफ घर की औरत अपनी देह को पोस्टर नहीं बनाती।
फिर एक दिन अर्जुन ने रिया से अपने सीने पर अपने दिवंगत पिता की याद में एक छोटा-सा मोरपंख बनवाया। उसी दिन सावित्री का चेहरा बदल गया। उसे लगा रिया ने उसके बेटे को उससे छीनकर अपनी स्याही में बाँध दिया है।
—मैंने इसे 9 महीने पेट में रखा, संस्कार दिए, और तूने मेरे बेटे को दीवार समझकर लिख दिया।
अर्जुन हर बार सिर झुका लेता। कार में लौटते हुए वह रिया का हाथ पकड़कर कहता—
—माँ का दिल कमजोर है। जवाब मत दिया करो।
रिया ने यह वाक्य इतना सुना कि उसे उससे नफरत होने लगी। “माँ ऐसी ही हैं।” जैसे किसी की क्रूरता को आदत कह देने से वह अपराध नहीं रहती।
वे जिस घर में रहते थे, वह सावित्री के नाम था। किराया बहुत कम था, और यही सावित्री की सबसे मजबूत रस्सी थी। कबीर को मिठाई खिलानी हो, रात अपने पास सुलाना हो, स्कूल का फैसला हो—हर बात में वह दखल देती। रिया मना करती तो अर्जुन कहता—
—दादी है उसकी। हर बात पर युद्ध मत छेड़ा करो।
लेकिन रिया ने कबीर की कलाई पर नीला निशान भी देखा था। सावित्री ने कहा था, “गिर गया होगा।” कबीर चुप हो गया था। उस रात रिया उसके बिस्तर के पास बैठी रही थी, आँखों में नींद नहीं, दिल में डर।
उस रविवार को वह सिर्फ इसलिए ससुराल के लंच पर आई थी क्योंकि कबीर कई दिनों से “दादी वाले स्टेशन” में खेलने की जिद कर रहा था। आँगन में तंदूरी रोटी, पनीर टिक्का, रायता और स्टील की बड़ी थाली रखी थी। सावित्री असामान्य रूप से मीठी थी। इतनी मीठी कि रिया को बेचैनी हो रही थी।
अर्जुन के चाचा ने मजाक में पूछा—
—बहू, मेरे हाथ पर पुराना किला बना देगी? रिटायरमेंट की निशानी रहेगी।
रिया हल्के से मुस्कुराई।
—बना दूँगी, बस दर्द सहना पड़ेगा।
सावित्री हँसी। सूखी, तीखी।
—दर्द देने में तो इसे महारत है।
रिया थक चुकी थी। उसने पहली बार पलटकर कहा—
—दर्द मैं नहीं देती, आंटी। लोग अपनी यादें खुद लेकर आते हैं।
बस इतना ही।
सावित्री ने अंगीठी के पास रखी गरम सीख उठाई। रिया ने नोक देखी, फिर उसकी आँखें। अगले ही पल आग उसकी बाँह में उतर गई।
कबीर झोपड़ी से चीखा—
—मम्मा!
अर्जुन वहीं जम गया। उसके हाथ का गिलास काँप रहा था।
प्रकाश चाचा ने दौड़कर सावित्री के हाथ से सीख छीनी।
—भाभी, आप पागल हो गई हैं क्या?
सावित्री ने साड़ी का पल्लू ठीक किया।
—बस सबक दिया है। औरत को उसकी हद पता होनी चाहिए।
रिया ने अर्जुन की तरफ देखा। वह चाहती थी कि वह सिर्फ 1 बात कहे—“चलो, हम जा रहे हैं।” या “मैं पुलिस बुला रहा हूँ।” लेकिन अर्जुन अपनी माँ की तरफ देखते हुए बोला—
—माँ, अंदर चलो।
रात 11:40 बजे, रिया अपने कमरे में कबीर को सीने से लगाए बैठी थी। बाँह पर पट्टी थी, लेकिन जलन भीतर तक फैल चुकी थी। अर्जुन धीरे से आया। उसकी आँखें लाल थीं।
—माँ रो रही है। कह रही है हाथ से गलती हो गई।
रिया ने ठंडी आवाज में कहा—
—उसने मुझे हमारे बेटे के सामने जलाया है। मैं कल पुलिस में शिकायत करूँगी।
अर्जुन का चेहरा तुरंत बदल गया।
—अगर तुमने शिकायत की, तो यह घर टूट जाएगा।
—घर उसने तोड़ा है।
अर्जुन बिस्तर के पास झुका। उसकी आवाज धीमी थी, पर उसमें धमकी थी।
—अगर तुम पुलिस गई, तो मैं कबीर को लेकर माँ के पास चला जाऊँगा। फिर देखना, अदालत में कौन किसे साबित करता है।
रिया पत्थर हो गई। उसी पल उसे समझ आया कि उसकी बाँह पर जो निशान था, वह अंत नहीं था। वह उस जेल का पहला दरवाजा था, जिसे वह इतने साल परिवार समझती रही थी।
PART 2
निशा 18 मिनट में पहुँच गई। बाल बिखरे थे, दुपट्टा उल्टा था, लेकिन आँखें साफ थीं।
—कपड़े पैक कर। तू और कबीर अभी मेरे साथ चल रहे हो।
अर्जुन रोने लगा। वह परिवार, माफी, समाज और माँ की “इज्जत” की बात करता रहा। रिया ने फिर भी आखिरी बातचीत मान ली।
तभी सावित्री बिना दरवाजा खटखटाए अंदर आ गई। उसके पास घर की डुप्लीकेट चाबी थी।
—मेरा कबीर कहाँ है?
—मेरी बहन के पास।
सावित्री सोफे पर बैठ गई, जैसे घर की मालकिन अदालत लगा रही हो।
—अब नाटक खत्म हुआ?
रिया ने पूछा—
—आपने मुझे जलाया क्यों?
—जलाया नहीं। समझाया। तू लोगों की चमड़ी में सुई चुभाती है, मैंने बस तुझे तेरा आईना दिखाया।
अर्जुन पीला पड़ गया।
—माँ…
सावित्री ने उसे देखा। वही नजर, जिसने उसे बचपन से चुप रहना सिखाया था।
—तेरी बीवी को काबू में रखना जरूरी है। वरना कल तेरे बेटे को भी स्याही और बेशर्मी सिखाएगी।
फिर वह बिल्कुल शांत होकर बोली—
—अगर सच में चोट पहुँचानी होती, तो इसे अस्पताल में भर्ती कराती।
पहली बार अर्जुन ने जैसे उसकी बात सचमुच सुनी। उसने दरवाजा खोला।
—माँ, बाहर जाओ।
रिया को 1 सेकंड के लिए लगा, शायद वह जाग गया है।
रात 2:12 पर निशा के फ्लैट से अर्जुन का फोन आया।
—मैं घर में रहूँगा। माँ कह रही है, अगर तुम शिकायत वापस ले लो तो सब ठीक हो जाएगा।
रिया ने आँखें बंद कर लीं।
—मेरी चमड़ी की कीमत किराया है?
अगली सुबह वह पट्टी बँधी बाँह, तस्वीरें, पुराने मैसेज और सावित्री की आवाज की रिकॉर्डिंग लेकर थाने गई। उसी शाम, जब वह स्टूडियो से निकली, सावित्री बाहर खड़ी थी। हाथ में 2 कॉफी, होंठों पर मुस्कान, और आँखों में वह वादा जो किसी हादसे से भी ज्यादा डरावना था।
PART 3
—तेरी पसंद वाली कॉफी लाई हूँ, बहू, सावित्री ने कहा, जैसे पिछले दिन उसने किसी की त्वचा नहीं जलाई थी।
हौज खास की संकरी गली में बना रिया का टैटू स्टूडियो रोशनी से भरा था। दीवारों पर कमल, पक्षी, माँ-बेटी के हाथ, टूटे दिलों पर उगती बेलों के डिजाइन लगे थे। मशीनों की धीमी भनभनाहट रिया को हमेशा सुरक्षित लगती थी। लेकिन उस शाम दरवाजे पर सावित्री को देखकर उसकी जली हुई बाँह अचानक धड़कने लगी।
स्टूडियो के मालिक इमरान बाहर आए।
—मैडम, आप अंदर नहीं आ सकतीं।
सावित्री ने कॉफी काउंटर पर रख दी।
—मैं अपनी बहू से बात करने आई हूँ। इसे लोग भड़का रहे हैं। पुलिस परिवार नहीं जोड़ती।
रिया ने फोन उठाया।
—आप यहाँ से जाइए।
सावित्री का चेहरा तन गया।
—तू सोचती है तेरी स्याही तुझे आजाद बना देगी? तूने मेरे बेटे को गंदा किया, अब मेरे पोते को छीन रही है।
इमरान रिया के आगे खड़े हो गए।
—बाहर निकलिए।
सावित्री ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा।
—आप भी इसी गंदगी का हिस्सा हैं?
रिया ने पुलिस का नंबर मिलाया। सावित्री झुककर उसके कान के पास फुसफुसाई—
—कानून को खून का रिश्ता समझ नहीं आता। लेकिन मैं कबीर को याद दिला दूँगी कि उसका असली घर कहाँ है।
वह पुलिस आने से पहले चली गई, लेकिन अगले 1 घंटे में रिया को 23 संदेश मिले। कुछ में रोना था, कुछ में गाली, कुछ में धर्म और संस्कार की दुहाई। आखिरी संदेश था—
“अगर तू नहीं रुकी, तो मैं तुझे माँ कहलाने लायक भी नहीं छोड़ूँगी।”
रिया की वकील, मीरा सेठी, ने सारे संदेश पढ़े। वह तेज आवाज में बात नहीं करती थी, लेकिन उसके शब्द हथौड़े जैसे गिरते थे।
—सुरक्षा आदेश माँगेंगे। आपके लिए भी, बच्चे के लिए भी। और पारिवारिक अदालत में तुरंत आवेदन देंगे।
रिया निशा के फ्लैट से अपनी मौसी सरला के नोएडा वाले घर चली गई। सरला विधवा थीं, पर उनका दिल लोहे जैसा था। उन्होंने गेट पर नया ताला लगवाया, सीसीटीवी लगवाया, और कबीर के कमरे की खिड़की पर ग्रिल ठीक करवाई।
कबीर रात को अपनी नीली मेट्रो ट्रेन पकड़कर सोता और पूछता—
—पापा कब आएँगे?
रिया कभी अर्जुन को गंदा कहकर जवाब नहीं देती थी। वह बस उसके बाल सहलाती।
—पापा को अभी बड़े लोगों वाली बातें समझनी हैं। तू सुरक्षित है।
लेकिन हर बार जब कबीर दरवाजे की आवाज पर चौंकता, रिया के अंदर कुछ टूटता।
7 दिन बाद अर्जुन नोएडा पहुँच गया। उसने बेल नहीं बजाई। गेट धक्का देकर अंदर आया और बरामदे में खड़े होकर चिल्लाया—
—रिया, मेरा बेटा बाहर भेजो!
सरला ने दरवाजा बंद करना चाहा। अर्जुन ने उन्हें ऐसा धक्का दिया कि उनका कंधा दीवार से टकरा गया। ऊपर कमरे में कबीर रोने लगा।
—कबीर! दरवाजा खोलो, पापा आए हैं!
रिया ने उसे रोकना चाहा। अर्जुन पलटा और उसे सीढ़ियों की रेलिंग से धक्का दे दिया। वह गिरते-गिरते बची। यह कोई गलती नहीं थी। यह गुस्से का चुना हुआ हाथ था।
तभी रिया ने सावित्री को देखा।
वह अर्जुन के पीछे से अंदर आई थी। उसके हाथ में कबीर का छोटा जैकेट, जूते और स्कूल बैग था। वह ऐसे सामान समेट रही थी जैसे बच्चा कोई वस्तु हो, जो पहले से उसी की हो।
—यह सब रख दीजिए, रिया ने काँपती आवाज में कहा।
सावित्री ने बिना देखे जवाब दिया—
—गाड़ी में ठंड लगेगी उसे।
सरला ने पिछवाड़े से पुलिस को फोन कर दिया था। 12 मिनट बाद पुलिस आई। अर्जुन को घर में घुसने और मारपीट के आरोप में पकड़ा गया। सावित्री ने रोकर कहा—
—हम बच्चे को बचाने आए थे। उसकी माँ उसे गलत रास्ते पर ले जा रही है।
एक महिला कांस्टेबल ने कड़ी नजर से पूछा—
—बच्चा माँ के पास अदालत के आदेश तक सुरक्षित है। आप लोग उसे कहाँ ले जाने की तैयारी कर रहे थे?
सावित्री चुप हो गई।
सुरक्षा आदेश मिल गया। सावित्री को रिया और कबीर से दूर रहने का आदेश मिला। अर्जुन को सिर्फ निगरानी में मुलाकात की अनुमति मिली। वह 3 में से 2 मुलाकातें खुद रद्द कर देता। फिर सच्चाई धीरे-धीरे बाहर आई—अर्जुन महीनों से अपनी ऑफिस की एक सहकर्मी के साथ संबंध में था। जब रिया उससे अपने बेटे की सुरक्षा माँग रही थी, वह दूसरी जिंदगी की तैयारी कर रहा था।
उसके वकील के जरिए संदेश आया—
“मुलाकात कम होगी तो खर्च भी कम होना चाहिए।”
मीरा सेठी ने कागज टेबल पर रखा।
—बच्चा बिजली का बिल नहीं है, जिसे इस्तेमाल के हिसाब से बाँटा जाए।
रिया ने उस दिन रोया नहीं। उसे लगा था पति के धोखे से धरती फट जाएगी, पर भीतर सिर्फ थकान थी। वह किसी मजबूत आदमी को नहीं खो रही थी। वह उस आदमी का बोझ उतार रही थी जो हर संकट में अपनी माँ की छाया में छिप जाता था।
पर सावित्री रुकी नहीं।
दिसंबर की एक शाम रिया कबीर को नोएडा के एक बड़े मॉल में क्रिसमस की सजावट दिखाने ले गई। कबीर ट्रॉली में बैठा था, सिर पर लाल टोपी, हाथ में 2 चाँदी की गेंदें।
रिया ने बस 3 सेकंड के लिए पीछे मुड़कर रिबन देखा।
—कबीर!
आवाज सामने से आई।
सावित्री दौड़ती हुई आ रही थी। बाल खुले, शॉल कंधे से गिरा हुआ, आँखों में आँसू, पर चेहरे पर अजीब-सी जीत।
—मेरा बच्चा! दादी के पास आओ! मैंने तुम्हारा कमरा तैयार कर दिया है!
कबीर ने डर और आदत के बीच हाथ बढ़ाया।
—दादी?
रिया ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया।
—आपको यहाँ आने की अनुमति नहीं है।
सावित्री 2 कदम दूर रुक गई।
—खून को खून से अलग नहीं कर सकती तू।
—दूर हटिए।
तभी सावित्री ने मॉल के बीचोंबीच चिल्लाकर कहा—
—यह टैटू वाली औरत मेरे पोते को बिगाड़ रही है! इसे माँ कहने का हक नहीं!
लोग रुक गए। कुछ मोबाइल उठ गए। कबीर रिया की गर्दन में चेहरा छिपाकर काँपने लगा।
—मम्मा, घर चलो।
मॉल मैनेजर ने रिया को सुरक्षा घेरे में पार्किंग तक पहुँचाया। सीसीटीवी फुटेज अदालत में जमा हुई। आदेश उल्लंघन का नया मामला दर्ज हुआ।
फिर नकली ईमेल आया।
सावित्री ने निशा को लिखा कि “कोर्ट के निर्देश” के अनुसार हर सप्ताह कबीर की तारीख वाली फोटो भेजनी होगी, वरना “बच्चा छिपाने” का केस बनेगा। ईमेल में वकील का नाम, नंबर और केस आईडी लिखी थी। मीरा सेठी ने जाँच की। ऐसा कोई वकील नहीं था। पता फर्जी, नंबर बंद, आईडी झूठी।
जब पुलिस ने सावित्री को बुलाया, वह बेहोश होने का नाटक करती रही। उसी रात उसने प्रकाश चाचा को फोन कर रोते हुए कहा कि अगर कबीर नहीं मिला तो वह यमुना में कूद जाएगी। एम्बुलेंस आई। कुछ दिनों के लिए उसे मनोचिकित्सकीय निगरानी में रखा गया। बाहर आते ही आदेश और कड़ा कर दिया गया।
रिया ने सोचा, शायद अब तूफान थम जाएगा।
लेकिन 26 दिसंबर की सुबह सरला के दरवाजे पर 4 पैकेट रखे मिले। सभी पर कबीर का नाम था। अंदर खिलौना ट्रेन, स्वेटर, चॉकलेट और एक कार्ड था।
“तेरा असली कमरा तेरा इंतजार कर रहा है। दादी हमेशा तुझे बचाने आएगी।”
सीसीटीवी में सावित्री नहीं दिखी। उसकी एक दूर की रिश्तेदार पैकेट छोड़कर गई थी। पुलिस पूछताछ में उसने कहा—
—सावित्री दीदी ने कहा था, आदेश उन्हें रोकता है, उपहारों को नहीं।
यह अप्रत्यक्ष उल्लंघन था। मामला और गंभीर हो गया।
फिर एक रात रिया ने अपने पुराने कॉलेज दोस्त से कॉफी पी। बस 1 घंटा, जिसमें न केस था, न डर, न दरवाजे की जाँच। बाहर निकलते समय उसने रिया के गाल पर हल्का-सा विदा वाला चुंबन दिया। रिया कार में बैठी ही थी कि एक ग्रे वैन से सावित्री निकल पड़ी।
वह खिड़की पर मुक्के मारने लगी।
—मैंने देख लिया! तू शुरू से मेरे बेटे को धोखा दे रही थी! मैं जज को सब बताऊँगी!
रिया ने दरवाजा लॉक किया और पुलिस को फोन किया।
जब पुलिस ने सावित्री की वैन की तलाशी ली, तो एक काली डायरी मिली।
वह गुस्से में लिखी डायरी नहीं थी। वह योजना थी।
रिया के स्टूडियो के समय। कबीर की थेरेपी के दिन। स्कूल का नाम। लंच ब्रेक का समय। गेट नंबर 2 का स्केच। खेल के मैदान से पीछे वाली सड़क तक तीर बना हुआ। यहाँ तक कि सुरक्षा गार्ड के चाय पीने का समय भी।
महिला कांस्टेबल, जिसने पहले इसे “घरेलू विवाद” समझा था, डायरी पढ़ते-पढ़ते सख्त हो गई।
—यह दादी का प्यार नहीं है। यह बच्चे को उठाने की तैयारी है।
सावित्री चीखती रही—
—उसे स्याही, पाप और झूठ से दूर रखना होगा! अर्जुन कमजोर है, इसलिए मुझे माँ बनना पड़ेगा!
इस बार वह आसानी से बाहर नहीं आई।
अर्जुन को उसके वकील ने खबर दी। उसने सिर्फ 1 संदेश भेजा—
“मुझे इसमें मत घसीटो।”
रिया को उसी दिन समझ आ गया कि वह किससे लड़ रही थी और किसका इंतजार छोड़ना था।
वसंत में तलाक हो गया। अर्जुन ने निगरानी वाली मुलाकातें नाम भर के लिए रखीं। उसकी नई साथी अदालत के बाहर खड़ी थी, काले चश्मे और हल्के उभरे पेट के साथ। रिया ने उसे देखा। दिल में हल्की चुभन हुई, फिर शांति। जैसे पुराना जहर आखिरकार शरीर से निकल गया हो।
उस दिन रिया ने आधी बाँह का कुर्ता पहना था।
उसकी बाँह पर जलन का निशान छोटा, सफेद और टेढ़ा था। उसने उसके चारों तरफ खुद चमेली की पतली बेल का टैटू बनाया था। छिपाने के लिए नहीं। उसे घेरने के लिए। यह याद रखने के लिए कि कुछ फूल वहीं उगते हैं जहाँ त्वचा पर हमला हुआ था।
कबीर की थेरेपी शुरू हुई। शुरू में वह पूछता—
—दादी चिल्लाती क्यों थीं? पापा गुस्सा क्यों करते थे? मेरा स्टेशन वाला घर कहाँ गया?
रिया झूठ नहीं बोलती थी, पर जहर भी नहीं भरती थी।
—कुछ बड़े लोग प्यार को डर बना देते हैं। हमें डर वाले प्यार से दूर रहना चाहिए।
एक दिन मनोवैज्ञानिक ने कबीर से घर बनाने को कहा। उसने सरला मौसी को रसोई में बनाया, निशा को सब्जी के बैग के साथ, नानी को सोफे पर, रिया को अपने टैटू मशीन वाले बॉक्स के पास, और खुद को छोटे बगीचे में हरी मेट्रो ट्रेन के साथ।
मनोवैज्ञानिक ने पूछा—
—पापा कहाँ हैं?
कबीर ने पेंसिल रोकी।
—पापा दूर हैं, क्योंकि उन्हें बहुत गुस्सा आता है। लेकिन मम्मा रुकती है।
रिया बाहर कार में बैठकर रोई। कबीर पीछे सीट पर बेल्ट बाँधे धीरे-धीरे गाना गा रहा था।
कुछ महीनों बाद रिया ने अपना छोटा-सा स्टूडियो खोला। नाम रखा—“काली चमेली।” शुरुआती दिनों में दरवाजे पर तेज दस्तक होती तो उसके हाथ काँप जाते। फिर धीरे-धीरे हँसी लौट आई। ग्राहक लौट आए। ऐसी औरतें आने लगीं जो ऑपरेशन के निशान पर फूल चाहती थीं। ऐसे आदमी आए जो पिता की याद में नाम लिखवाना चाहते थे। ऐसी माँएँ आईं जो अपने बच्चों के नाम को वादा बनाकर त्वचा पर रखना चाहती थीं।
लोगों ने कहानी सुनी। कुछ बोले, “बहू ने बात बढ़ा दी।” कुछ बोले, “दादी के भी अधिकार होते हैं।” कुछ ने उसके टैटू पर टिप्पणी की, जैसे स्याही किसी और की हिंसा का कारण हो सकती थी।
लेकिन उनमें से किसी ने कबीर को मॉल में काँपते नहीं देखा था। किसी ने जली हुई बाँह पर चिपकी राख नहीं देखी थी। किसी ने पति को यह कहते नहीं सुना था कि वह बच्चे को उसी औरत के पास ले जाएगा जिसने उसकी माँ को जलाया था। किसी ने वह डायरी नहीं देखी थी जिसमें 3 साल के बच्चे की स्कूल टाइमिंग लिखी थी।
सावित्री कहती थी कि रिया ने अर्जुन पर हमेशा की छाप छोड़ दी।
एक बात में वह सही थी—निशान इंसान बदल देते हैं।
लेकिन रिया को बदलने वाला टैटू नहीं था।
वह जलन थी।
और उसी जलन की वजह से एक रात एक माँ ने आखिरकार किसी से अनुमति माँगना बंद कर दिया।
उसने अपने बच्चे को बचाया।
और इस बार, उसकी बाँह पर बना निशान हार की तरह नहीं, गवाही की तरह चमक रहा था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.