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बरसती रात में बहन ने 4 बच्चों को दहलीज़ पर छोड़ दिया, 10 साल बाद वकील लेकर लौटी और बोली “तुमने मेरी ज़िंदगी चुरा ली”, मगर अदालत में चला वीडियो पूरे मातृत्व की सच्चाई खोल गया जिससे बच्चे हमेशा के लिए काँप उठे

PART 1

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बरसती रात में जब काव्या ने दरवाज़ा खोला, तो उसकी छोटी बहन रितु अपने 4 काँपते बच्चों को कूड़े के काले थैले और गीले स्कूल बैग के साथ छोड़कर बोली, “बस 1 घंटे में लौटती हूँ,” और फिर 10 साल तक वापस नहीं आई।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर की वह नवंबर की रात इतनी ठंडी थी कि गलियों में चाय वाले की भाप भी काँप रही थी। काव्या लोक नायक अस्पताल में 14 घंटे की ड्यूटी करके लौटी थी। उसकी नर्स की सफेद ड्रेस पर दवाइयों की गंध चिपकी थी, बाल बिखरे थे, और आँखों में सिर्फ नींद थी। उसे लगा था कि वह दरवाज़ा बंद करेगी, गैस पर दाल गरम करेगी और सुबह तक किसी की पुकार नहीं सुनेगी।

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लेकिन दरवाज़े पर धक्का पड़ा।

बाहर रितु खड़ी थी। महँगे परफ्यूम की जगह उसके कपड़ों से बारिश, शराब और घबराहट की मिली-जुली गंध आ रही थी। उसके पीछे 4 बच्चे खड़े थे।

आरव 8 साल का था, दोनों हाथों से बिस्कुट का डिब्बा पकड़े। मीरा 6 साल की थी, अपनी गुड़िया को ऐसे छिपाए जैसे कोई उससे उसे भी छीन लेगा। कबीर 4 साल का था, बिना आवाज़ रो रहा था। सबसे छोटा विवान 2 साल का, सस्ते स्ट्रोलर में आधा सोया था, उसके ऊपर पतली चादर थी जो बारिश से गीली हो चुकी थी।

काव्या का दिल धक से रह गया।

—रितु, ये क्या है?

—दीदी, बस 1 घंटा। एक ज़रूरी काम है। बच्चों को अंदर ले लो।

—रात के 11 बजे? बच्चों को बुखार लग रहा है। कहाँ जा रही हो?

रितु ने काला थैला दहलीज़ पर धकेल दिया।

—कपड़े हैं। विवान के डायपर हैं। कागज़ भी हैं। तुम तो सब संभाल ही लेती हो।

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काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—आरव को काजू से एलर्जी है। मीरा कल स्कूल जाएगी। विवान की दवा कहाँ है? रितु, जवाब दो।

रितु ने हाथ झटका।

—माँ बनना इतना आसान लगता है न तुझे? तो 1 घंटा बन जा।

वह सीढ़ियों से उतर गई। काव्या पीछे भागी, मगर नीचे गली में पहले ही एक ऑटो के पीले-हरे पीछे वाले लैंप बारिश में धुँधले होकर गायब हो चुके थे।

वह 1 घंटा पहले रात बना। फिर 1 हफ्ता। फिर 10 साल।

काव्या ने फोन किए। रितु का मोबाइल बंद। उसके पुराने ब्यूटी पार्लर में पूछा। सहेलियों को फोन किया। पहाड़गंज के उस किराये के कमरे पर गई जहाँ वह कुछ महीनों पहले रहती थी। पुलिस स्टेशन गई। बाल कल्याण समिति के चक्कर काटे। हर जगह सवाल वही था।

—माँ कहाँ है?

—गायब है।

—बाप?

—4 बच्चों के 3 अलग-अलग पिता हैं। कोई सामने नहीं आता।

लोगों की आँखों में दया कम, शक ज़्यादा था। जैसे कोई जवान औरत 4 बच्चों को लेकर आई हो तो उसके पास सच नहीं, बहाना होगा।

उस रात के थैले में छोटे कपड़े, जन्म प्रमाणपत्र, आधी फटी दवा की पर्ची, 2 जोड़ी मोज़े और एक कागज़ मिला जिस पर नीली कलम से लिखा था, “जल्दी आऊँगी, दीदी।”

जल्दी।

काव्या ने उस शब्द को 10 साल तक अपने सीने में काँटे की तरह रखा।

वह 25 साल की थी। उसका सपना था कि वह बच्चों की विशेषज्ञ नर्सिंग की पढ़ाई करेगी, किराये के इस छोटे मकान से निकलेगी, कभी ऋषिकेश जाएगी, कभी अपनी पसंद की चूड़ियाँ बिना हिसाब लगाए खरीदेगी। लेकिन उसने अपनी ज़िंदगी की जगह 4 बच्चों की साँसों को रख लिया।

वह रात को अस्पताल में ड्यूटी करती, सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ती, दोपहर में सरकारी दफ्तरों की लाइन में लगती। उसने अपने बिस्तर की जगह बच्चों को दे दी। खुद ड्रॉइंग रूम में पुराने गद्दे पर सोती। त्योहारों पर अपने लिए नई साड़ी नहीं खरीदी, पर बच्चों के लिए दीवाली पर मिट्टी के दीये, होली पर पिचकारी और राखी पर मीरा के लिए चूड़ियाँ ज़रूर लाई।

धीरे-धीरे बच्चों ने माँ के बारे में पूछना कम कर दिया। भूलकर नहीं, बल्कि इसलिए कि हर सवाल काव्या की आँखों को तोड़ देता था।

आरव उम्र से पहले बड़ा हो गया। वह रात में दरवाज़े की कुंडी जाँचता। मीरा डरती तो धीरे-धीरे भजन गुनगुनाती। कबीर गुस्से में पेंसिल तोड़ देता। विवान ने एक सुबह दूध पीते हुए काव्या को “मम्मा” कहा, और काव्या के हाथ से स्टील का गिलास गिर पड़ा।

3 साल बाद काव्या और रितु की माँ चली गईं। 8 महीने बाद पिता भी। पुरानी पुश्तैनी मकान की फाइल अदालत और नगर निगम के बीच धूल खाती रही। रितु न अंतिम संस्कार में आई, न तेरहवीं में, न कागज़ पर हस्ताक्षर करने। काव्या ने कर्ज़ चुकाए, बिजली के बिल भरे, टपकती छत ठीक करवाई, मकान का टैक्स दिया।

वर्षों की दौड़भाग, आवेदन और गवाहियों के बाद वह मकान काव्या के नाम नियमित हुआ, क्योंकि वही वहाँ बच्चों के साथ रह रही थी, वही बुज़ुर्ग माता-पिता की अंतिम देखभाल करने वाली निकली, वही हर कागज़ में मौजूद थी।

फिर ठीक 10 साल बाद, सावन की एक भारी शाम घंटी बजी।

काव्या ने दरवाज़ा खोला।

रितु सामने खड़ी थी। क्रीम रंग का सूट, चमकते नाखून, महँगा बैग, सीधी की हुई लटें। उसके साथ एक अधिवक्ता था, हाथ में चमड़े की फाइल।

पीछे से आरव, अब 18 साल का, आगे आया। मीरा 16 की होकर सीढ़ियों पर ठिठक गई। कबीर 14 का दरवाज़े के पास जम गया। विवान 12 का, काव्या के दुपट्टे का किनारा पकड़कर खड़ा हो गया।

अधिवक्ता ने शांत आवाज़ में कहा—

—मेरी मुवक्किल अपने बच्चों को वापस लेने आई हैं।

रितु ने घर की दीवारों, नए पेंट और सुधरे हुए आँगन को देखा।

फिर मुस्कराकर बोली—

—और अपना हिस्सा भी।

PART 2

अधिवक्ता ने रसोई की मेज़ पर फाइल ऐसे रखी जैसे किसी घर पर फैसला रख दिया हो।

काव्या ने शब्द पढ़े—“बच्चों को माँ से अलग रखना”, “संपत्ति पर अवैध कब्ज़ा”, “मातृत्व अधिकारों का हनन।”

रितु फ्रिज पर लगे बच्चों के पुराने चित्रों को देख रही थी।

—तूने मेरी गैरहाज़िरी का फायदा उठाया, दीदी। मेरे बच्चे चुरा लिए। मेरी जगह ले ली।

आरव आगे बढ़ा।

—तुम्हारी जगह खाली थी। तुम छोड़कर गई थीं।

—तू छोटा था। तुझे कुछ याद नहीं।

—याद है। मुझे याद है किसने मेरी एलर्जी में रातभर अस्पताल में बैठकर मेरा हाथ पकड़ा था।

मीरा की आँखें भर आईं। कबीर ने मुट्ठियाँ भींच लीं। विवान काव्या से चिपक गया।

—मम्मा, ये हमें ले जाएगी क्या?

“मम्मा” सुनते ही रितु का चेहरा बदल गया।

—देखा? दिमाग धो दिया इनका।

अधिवक्ता ने अदालत की तारीख बताई। बच्चों की अभिरक्षा, पुश्तैनी मकान, और 10 साल की पूरी कहानी उलट देने का दावा।

दरवाज़ा बंद होते ही काव्या ने अलमारी से लोहे का पुराना डिब्बा निकाला। उसमें हर सबूत था—रितु का नोट, लौटे हुए रजिस्टर्ड खत, स्कूल की फीस, अस्पताल की पर्चियाँ, सरकारी आदेश।

अगले दिन पड़ोस की शर्मा आंटी ने पहली बार सच बोला।

—3 साल पहले रितु आई थी। उसने बच्चों के बारे में नहीं पूछा। उसने पूछा था, “ये मकान अब कितने का होगा?”

उसी रात एक ममेरे भाई ने वीडियो भेजा।

रितु किसी पार्टी में हँसते हुए कह रही थी—

—4 बच्चों को दीदी के पास छोड़ दिया। जब मकान महँगा होगा, वकील लेकर लौटूँगी।

काव्या ने लैपटॉप बंद कर दिया।

यह वीडियो बच्चों को बचा सकता था।

लेकिन उनकी आखिरी उम्मीद भी मार सकता था।

PART 3

साकेत परिवार न्यायालय के बाहर उस सुबह भीड़ थी, पर काव्या को सिर्फ अपने 4 बच्चों की साँसें सुनाई दे रही थीं। अदालत की दीवारों पर पड़ी धूप फीकी थी, जैसे सच भी यहाँ अंदर आने से पहले डरता हो।

काव्या ने हल्की सूती साड़ी पहनी थी। वह किसी लड़ाई की विजेता नहीं, बल्कि थकी हुई माँ लग रही थी, जिसे 10 साल बाद भी अपने ही घर को साबित करना था। उसके साथ अधिवक्ता अंजना मेहरा थीं, जिन्हें अस्पताल की वरिष्ठ डॉक्टर ने सुझाया था। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर आँखें बहुत सीधी।

पीछे आरव, मीरा, कबीर और विवान साथ खड़े थे। उम्र बदल चुकी थी, पर उनका खड़े होने का ढंग वही था—जैसे कोई बारिश भरी रात अब भी उनके कंधों पर पड़ी हो।

रितु पहले से अदालत में बैठी थी। आज उसने हल्की सफेद साड़ी पहनी थी, माथे पर छोटी बिंदी, आँखों में आँसू जैसा काजल। वह माँ की तरह दिखना चाहती थी। उसके अधिवक्ता बार-बार कागज़ पलट रहे थे।

जज के आते ही सब खड़े हुए।

रितु के अधिवक्ता ने शुरुआत की।

—मेरी मुवक्किल युवावस्था में मानसिक और आर्थिक कठिनाई से गुज़रीं। उनकी बड़ी बहन ने इसी कमजोरी का लाभ उठाया। बच्चों को उनसे दूर रखा गया, उनके मन में माँ के प्रति विष भरा गया, और बाद में पैतृक संपत्ति पर अधिकार कर लिया गया।

रितु ने सही समय पर आँचल आँखों से लगाया।

—मैं गलतियाँ मानती हूँ, माननीय न्यायालय। पर कोई माँ अपने बच्चों से मिटाई नहीं जा सकती। दीदी ने मेरा घर, मेरे बच्चे, मेरी ज़िंदगी ले ली।

काव्या के भीतर कुछ जल उठा। उसे वे रातें याद आईं जब विवान को तेज़ बुखार था और ऑटो वाला अस्पताल जाने से मना कर रहा था। उसे आरव की सूजी हुई साँसें याद आईं, मीरा की जेब में छिपी रोटी याद आई, कबीर का दीवार पर सिर मारना याद आया। उसे वे दिन याद आए जब उसने बस का किराया बचाने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चलकर दवा खरीदी थी।

अंजना मेहरा ने धीरे से कहा—

—भावना से नहीं, तथ्य से जवाब दीजिए।

काव्या खड़ी हुई।

उसकी आवाज़ पहले काँपी, फिर स्थिर हो गई।

—उस रात बारिश थी। रितु ने कहा था 1 घंटे में लौटेगी। 4 बच्चे गीले थे। सबसे छोटा बच्चा बुखार में था। मैं उसे रोक नहीं पाई। उसने ऑटो पकड़ा और चली गई।

जज ध्यान से सुनते रहे।

काव्या ने आगे कहा—

—मैंने उसे 37 बार पहले 2 दिनों में फोन किया। उसके पुराने पते खोजे। पुलिस में सूचना दी। बाल कल्याण समिति गई। स्कूल में नाम लिखवाए। अस्पताल में इलाज कराया। मैंने बच्चों को छिपाया नहीं। मैंने उन्हें बचाया।

रितु का अधिवक्ता मुस्कराया।

—बचाना और माँ बन जाना अलग बातें हैं। एक नोट से 10 साल का त्याग सिद्ध नहीं होता।

अंजना मेहरा ने लोहे का डिब्बा खोला।

पहले वही कागज़ निकला—“जल्दी आऊँगी, दीदी।”

फिर संदेशों की प्रतियाँ।

“रितु, आरव को साँस नहीं आ रही। जवाब दे।”

“मीरा पूरी रात रोई है।”

“कबीर स्कूल में किसी से बात नहीं कर रहा।”

“विवान चलना सीख गया है। क्या तुम देखना चाहोगी?”

हर संदेश के नीचे कोई उत्तर नहीं।

फिर रजिस्टर्ड खतों की रसीदें आईं, जो “पता बदल गया” लिखकर लौटे थे। सरकारी आवेदन आए। अस्थायी अभिभावक अधिकार का आदेश आया। स्कूल की आपातकालीन संपर्क सूची आई, जिसमें 10 साल तक सिर्फ काव्या का नाम था। डॉक्टर की फाइलें आईं। टीकाकरण, एलर्जी, चश्मे, दाँतों की तार, परीक्षा शुल्क, यूनिफॉर्म, बस पास, सबकी रसीदें।

अंजना मेहरा ने कहा—

—माननीय न्यायालय, यह बच्चों को माँ से छीनने की कहानी नहीं है। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे 4 बच्चे दहलीज़ पर छोड़ दिए गए, और जिसने कानून, समाज, गरीबी और अकेलेपन से लड़कर उन्हें जीवित रखा।

फिर गवाह आए।

अस्पताल की वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि काव्या कई बार 2 घंटे की नींद लेकर ड्यूटी पर आती थी। उसका टिफिन बच्चों के बचे पराठों से भरता था। स्कूल से फोन आता तो वह ऑपरेशन वार्ड के बाहर रोते हुए छुट्टी माँगती।

मीरा की स्कूल प्रिंसिपल ने कहा—

—10 साल में हमने रितु जी को कभी नहीं देखा। पैरेंट-टीचर मीटिंग में काव्या जी आती थीं। फीस देर से आती थी, मगर आती थी। बच्ची कभी बिना किताब के नहीं रही।

डॉक्टर ने कहा—

—आरव की एलर्जी खतरनाक थी। अगर काव्या समय पर न लातीं तो मामला गंभीर हो सकता था।

फिर शर्मा आंटी गवाही के लिए आईं। उनकी चाल धीमी थी, पर शब्द तेज़।

—मैंने रितु को 3 साल पहले गली में देखा था। उसने पूछा, “आंटी, ये मकान अब कितने का होगा?” मैंने कहा, “बच्चों से मिलेगी?” उसने कहा, “अभी नहीं। सही समय आने दो।”

रितु अचानक खड़ी हो गई।

—झूठ! ये सब दीदी ने मिलाया है!

जज की आवाज़ सख्त हुई।

—बैठ जाइए।

रितु बैठी, पर उसके चेहरे का सफेदपन अब पाउडर से भी छिप नहीं रहा था।

उसके अधिवक्ता ने जल्दी से कुछ बैंक हस्तांतरण दिखाए।

—मेरी मुवक्किल ने समय-समय पर आर्थिक सहायता भी भेजी।

रसीदों में 1000, 1500, 800 रुपये के छोटे भुगतान थे।

अंजना मेहरा ने एक और कागज़ उठाया।

—इन भुगतान से पहले भेजे गए संदेश भी रिकॉर्ड में हैं।

उन्होंने पढ़ा—

“दीदी, 5000 भेज दे, नहीं तो बच्चों को ले जाऊँगी और देखूँगी तू कैसे संभालती है।”

अदालत की हवा भारी हो गई।

अब बच्चों को सुना गया।

आरव पहले खड़ा हुआ। वह 18 का था, पर उसकी आँखों में वह 8 साल का लड़का अभी भी बैठा था जो बिस्कुट का डिब्बा पकड़े था।

—मैं किसी से बदला नहीं चाहता। बस इतना चाहता हूँ कि अदालत यह न माने कि हमें चुराया गया था। हमें छोड़ा गया था। अगर काव्या मम्मा हमें न रखतीं, तो हम अलग-अलग घरों में बँट जाते।

उसने रितु की ओर देखा।

—मैंने बहुत साल सोचा कि शायद मेरी गलती थी। शायद मैं अच्छा बेटा नहीं था। अब समझ आया, बच्चे अच्छे या बुरे नहीं होते। बड़े लोग भाग जाते हैं।

मीरा खड़ी हुई। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

—उस रात मेरे पास एक गुड़िया थी। मैं उसे पकड़कर सोती थी। जब वह गंदी हो जाती, मम्मा उसे रात में धोती थीं ताकि सुबह मुझे लगे कि सब ठीक है। जिसने हमें चुराया होता, वह हमें रोने नहीं देती। पर मम्मा ने हमें रोने दिया, माँ को याद करने दिया, फिर भी हमें पकड़े रखा।

कबीर ने सिर्फ कुछ वाक्य बोले।

—मैं आपको नहीं जानता। आपका चेहरा तस्वीरों में देखा है। परिवार वो लोग हैं जो तब रहते हैं जब आप टूट रहे हों। मेरा परिवार यहीं है।

विवान आखिरी में उठा। वह सबसे छोटा था, पर उसकी बात ने कमरे को सबसे ज़्यादा चीर दिया।

—मुझे वह रात याद नहीं। मुझे आप याद नहीं। मुझे सिर्फ ये याद है कि अँधेरे में डर लगता था तो काव्या मम्मा पीठ सहलाती थीं। मैं घर नहीं बदलना चाहता, माँ भी नहीं।

रितु की आँखों से अब सचमुच आँसू निकले। पर उन आँसुओं में पछतावा कितना था और हार कितनी, कोई नहीं जानता था।

उसका अधिवक्ता अब भी बोल रहा था—मातृत्व अधिकार, रक्त संबंध, संपर्क पुनर्स्थापना, भावनात्मक दूरी। बड़े साफ शब्द, एक बहुत गंदी अनुपस्थिति को ढकने की कोशिश कर रहे थे।

तभी अंजना मेहरा ने काव्या की ओर देखा।

काव्या समझ गई।

वीडियो।

वह पूरी रात इस निर्णय से लड़ती रही थी। उसने सोते हुए बच्चों को देखा था। आरव की किताब सीने पर पड़ी थी। मीरा तकिए में मुँह छिपाकर सोई थी। कबीर की भौंहें नींद में भी तनी थीं। विवान ने पुरानी गुड़िया जैसी अपनी बचपन की छोटी कार पकड़ रखी थी।

काव्या नहीं चाहती थी कि वे अपनी माँ का वह चेहरा देखें।

पर रितु ने झूठ को अधिकार बनाकर खड़ा कर दिया था।

अंजना मेहरा ने कहा—

—माननीय न्यायालय, हमें एक वीडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत करनी है, जो परिवार के एक सदस्य ने हाल ही में भेजी। इससे रितु जी की मंशा स्पष्ट होती है।

रितु का चेहरा पीला पड़ गया।

—नहीं। ये निजी है।

—अगर यह बच्चों से संबंधित है, तो अदालत देखेगी, जज ने कहा।

वीडियो चलाया गया।

स्क्रीन पर रितु कुछ साल छोटी दिख रही थी। किसी पार्टी की रोशनी थी। संगीत था। वह हाथ में गिलास लिए हँस रही थी।

—मेरे 4 बच्चे? छोड़ दिए दीदी के पास। वह तो देवी बनती फिरती है। मुझे अपनी ज़िंदगी जीनी थी। 4 बोझ लेकर क्या घूमती? और वैसे भी, मम्मी-पापा का मकान एक दिन अच्छा पैसा देगा। जब ज़रूरत पड़ेगी, वकील लेकर लौट आऊँगी। दीदी इतनी सीधी है कि लड़ भी नहीं पाएगी।

कमरा जड़ हो गया।

मीरा ने मुँह पर हाथ रख लिया। कबीर ने आँखें स्क्रीन से नहीं हटाईं। विवान की उँगलियाँ काव्या की साड़ी में धँस गईं। आरव ने सिर झुका लिया, जैसे किसी ने उसके बचपन की आखिरी खिड़की बंद कर दी हो।

रितु खड़ी होकर चिल्लाई—

—मैं नशे में थी! लोग मज़ाक करते हैं!

जज ने स्क्रीन बंद करवा दी।

—यह मज़ाक नहीं लगता। यह बयान आपके आचरण, गवाहियों और देर से की गई संपत्ति संबंधी कार्यवाही से मेल खाता है।

रितु चीखी—

—मैंने इन्हें जन्म दिया है!

आरव ने बहुत धीरे कहा—

—लेकिन थामा नहीं।

उस वाक्य के बाद अदालत में कोई आवाज़ नहीं उठी।

कार्यवाही स्थगित हुई। बाहर गलियारे में काव्या बेंच पर बैठ गई। मीरा ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। कबीर दूर खड़ा रहा, पर उसकी आँखें लाल थीं। विवान उसके पैरों के पास बैठ गया जैसे बचपन में बैठता था। आरव ने काव्या के सामने आकर कहा—

—तुम्हें वीडियो पहले से पता था?

काव्या ने सिर हिलाया।

—मैं नहीं चाहती थी तुम सब ये सुनो।

—10 साल तुमने हमें सच से नहीं, अपराध-बोध से बचाया। आज हमें समझ आया कि हम छोड़े गए थे क्योंकि हम बोझ नहीं थे, बल्कि वह कमज़ोर थी।

काव्या की आँखें भर आईं। उसने हमेशा डर रखा था कि बच्चे कभी उससे पूछेंगे—तुमने माँ को और क्यों नहीं ढूँढ़ा? तुमने हमें क्यों नहीं बताया? तुमने हमें क्यों बचाया जब हमें शायद उसकी ज़रूरत थी? पर उस दिन उनकी आँखों में आरोप नहीं था। वहाँ एक थकान थी, जो पहली बार किसी सुरक्षित जगह टिक रही थी।

फैसला उसी दिन अंतिम नहीं था, पर अंतरिम आदेश साफ था।

जज ने कहा कि मीरा, कबीर और विवान की निवास व्यवस्था काव्या के पास ही रहेगी। उनकी पढ़ाई, मानसिक स्थिति और स्थिर जीवन को देखते हुए उन्हें किसी भी प्रकार से जबरन रितु के पास नहीं भेजा जाएगा। आरव बालिग था, वह जहाँ रहना चाहे रह सकता था। अदालत ने बच्चों के लिए परामर्श की व्यवस्था की, पर उन्हें हटाने की नहीं।

रितु को बच्चों से संपर्क का अधिकार केवल बच्चों की इच्छा, परामर्शदाता की रिपोर्ट और निगरानी में मिलेगा। कोई अचानक मुलाकात नहीं। कोई धमकी नहीं। कोई दावा करके घर में घुसना नहीं।

संपत्ति पर अदालत ने कहा कि अलग दीवानी प्रक्रिया होगी, पर प्रस्तुत दस्तावेज़ दिखाते हैं कि रितु ने वर्षों तक न बच्चों की परवाह की, न माता-पिता की, न मकान के खर्च की। उसके दावे पर गंभीर प्रश्न हैं।

साफ मतलब था—वह उस दिन न बच्चों को ले जा सकी, न चाबियाँ।

रितु कुर्सी पर ढह गई। पहली बार उसने 4 बच्चों को ऐसे देखा जैसे वे हिस्से नहीं, इंसान हों। मगर बचपन कोई खाली कमरा नहीं होता, जहाँ 10 साल बाद लौटकर कोई अपना नाम लिख दे।

अदालत से बाहर निकले तो हल्की धूप थी। अस्पताल की डॉक्टर आंटी मिठाई का डिब्बा लेकर खड़ी थीं। शर्मा आंटी ने चुपचाप काव्या के सिर पर हाथ रख दिया।

विवान ने पूछा—

—मम्मा, घर चलें?

काव्या ने उसे देखा।

घर।

कितने महीनों से यही शब्द डर बन गया था। आज वही शब्द फिर छत बनकर लौट आया।

3 महीने बाद लक्ष्मी नगर वाले मकान में फिर पुराने शोर लौट आए। सुबह प्रेशर कुकर सीटी मारता। कबीर और विवान जूतों को लेकर लड़ते। मीरा कॉलेज की तैयारी करते हुए गुनगुनाती। आरव को कानून की पढ़ाई में दाखिला मिला। उसने कहा कि वह उन बच्चों के लिए वकील बनेगा जिन्हें पहले “केस” कहा जाता है, नाम बाद में पूछा जाता है।

एक शाम विवान ने अलमारी से लोहे का डिब्बा निकाल लिया।

—क्या इसे फेंक दें?

काव्या ने डिब्बे के खरोंच भरे ढक्कन पर हाथ फेरा। इसमें कागज़ नहीं थे। इसमें 10 साल की भूख, बुखार, डर, फीस, दवा, अदालत, और चुपचाप निभाया गया प्रेम था।

मीरा ने कहा—

—फेंकना नहीं। बस रसोई से हटा दो। अब हर सुबह हमें मुकदमे की तरह नहीं जीना।

आरव ने डिब्बा उठाया। सब मिलकर छत वाले छोटे कमरे में गए। उसने डिब्बा पुरानी सूटकेसों के पीछे रख दिया।

विवान थोड़ी देर उसे देखता रहा।

—वह अब हमें नहीं ले जा सकती न?

काव्या उसके सामने बैठ गई।

—नहीं।

—अगर वह कहे कि वही असली माँ है?

काव्या ने उसका चेहरा छुआ।

—सच सिर्फ जन्म से नहीं बनता। सच उससे बनता है कि किसने तुम्हें गिरते समय पकड़ा।

विवान ने उसे गले लगा लिया।

—तो तुम भी असली हो।

काव्या ने आँखें बंद कर लीं। 10 साल में उसने कभी यह शब्द माँगा नहीं था। उसने उसे रात के बुखारों में पाया था, स्कूल डायरी पर हस्ताक्षर करते हुए पाया था, टूटे खिलौने जोड़ते हुए पाया था, दीवाली की रात 4 बच्चों की हँसी में पाया था।

उसने उन्हें जन्म नहीं दिया था।

पर जब दुनिया ने उन्हें भीगी दहलीज़ पर रखकर दरवाज़ा बंद कर दिया था, तब उसने दरवाज़ा खोला था।

रितु ने सोचा था कि खून का रिश्ता लौटने का टिकट होता है।

काव्या ने जाना कि प्रेम टिकट नहीं, पहरा होता है।

वह थकता है, टूटता है, रोता है, पैसे गिनता है, रातों को जागता है, अदालतों में काँपता है।

फिर भी रहता है।

और जब 4 बच्चे बारिश में काँपते हुए दरवाज़े पर खड़े होते हैं, तो वह सिर्फ इतना कहता है—

—अंदर आओ। यह घर तुम्हारा है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.