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ससुर की अर्थी के पास बहू को गिराकर सास ने फुसफुसाया “और जोर से रो”, मगर ताबूत में छिपे फोन ने अंतिम संस्कार को अदालत बना दिया और पूरे घर का खूनी राज सबके सामने खोल दिया हमेशा के लिए

PART 1

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कपूर हवेली के शोक-कक्ष में, ससुर की अर्थी के पास गिरते ही सबने समझा कि राधिका दुख से बेहोश हो गई है, लेकिन किसी ने नहीं देखा कि उसकी ननद ने उसकी कलाई पीठ के पीछे इतनी बेरहमी से मोड़ी थी कि भीतर कुछ टूटने की आवाज आई।

सफेद संगमरमर के फर्श पर उसका चेहरा लगा हुआ था। होंठ कट गया था। खून का स्वाद उसकी जीभ पर फैल रहा था। सामने चंदन की लकड़ियों, गेंदे की मालाओं और अगरबत्ती की गंध के बीच उसके ससुर जगदीश कपूर की देह कांच के ताबूत जैसे ढके मंच पर रखी थी। दिल्ली के लाजपत नगर की उस बड़ी कोठी में हर कोई सफेद कपड़ों में था, मगर किसी के चेहरे पर सच का रंग नहीं था।

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उसकी सास सावित्री कपूर झुककर उसके कान के पास आई। माथे पर चौड़ा सिंदूर अब नहीं था, लेकिन आवाज में वही पुराना ज़हर था।

—और जोर से रो, राधिका। नहीं तो लोग कैसे मानेंगे कि तू अच्छी बहू है?

इतना कहकर उसने अपनी उंगलियों के नाखून राधिका के हाथ पर दबा दिए, ठीक उन जलन के निशानों पर जो पिछली रात गरम चिमटे से उसने बनाए थे।

राधिका के शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। वह चीखना चाहती थी, पर शोक-सभा में बैठे लोग बस अपनी गर्दनें झुकाकर बैठे रहे। कोई बुजुर्ग राम नाम बुदबुदा रहा था। कोई रिश्तेदार मोबाइल में संदेश देख रहा था। पड़ोस की एक औरत दूसरी से फुसफुसा रही थी कि बहू शायद बहुत कमजोर दिल की है।

उसका पति विक्रम कपूर दरवाजे के पास खड़ा था। सफेद कुर्ता, आंखों पर काला चश्मा, चेहरे पर नकली थकान। वही आदमी जिसने 2 साल पहले शादी के बाद कहा था कि कपूर परिवार की बहू की आवाज घर की दीवारों से बाहर नहीं जानी चाहिए। वही आदमी जिसने उसकी नौकरी छुड़वाई, उसका बैंक खाता अपने नियंत्रण में लिया, उसकी मां को फोन कर कहा कि राधिका मानसिक रूप से अस्थिर है।

राधिका ने बहुत कुछ सहा था। उसने चुप्पी साधी थी जब सावित्री ने उसके मायके को गरीब कहा। उसने चुप्पी साधी थी जब ननद नेहा ने उसकी मां, जो जयपुर के सरकारी स्कूल में अध्यापिका रह चुकी थी, का मजाक उड़ाया। उसने चुप्पी साधी थी जब विक्रम ने रात में दरवाजा बंद कर उसके सामने वही मुलायम आवाज में धमकियां दीं, जिससे दिन में वह उसे सभ्य पति लगता था।

लेकिन उस सुबह राधिका रोने नहीं आई थी।

वह उस सच को पूरा करने आई थी जिसे जगदीश कपूर मरने से 3 रात पहले शुरू कर गए थे।

रात 1 बजे उसके पास अनजान नंबर से फोन आया था। दूसरी तरफ उसके ससुर की कांपती आवाज थी।

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—राधिका, मुझे माफ कर दो। मैंने तुझ पर देर से भरोसा किया।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे बताया था कि कपूर सेवा ट्रस्ट, जो गरीब लड़कियों की पढ़ाई और विधवा महिलाओं की मदद के नाम पर करोड़ों का दान लेता था, अंदर से खोखला हो चुका था। छात्रवृत्ति के पैसे नकली कंपनियों में जा रहे थे। कागजों पर झूठे हस्ताक्षर थे। बैंक खातों में अजीब लेन-देन थे। हर जगह 3 नाम लौटकर आ रहे थे।

विक्रम कपूर।

सावित्री कपूर।

नेहा कपूर।

फिर जगदीश कपूर ने और धीमे स्वर में कहा था।

—अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे घरवालों पर भरोसा मत करना। जो मैंने छोड़ा है, उसी पर भरोसा करना।

फोन कट गया था।

सुबह विक्रम ने घोषणा की कि उसके पिता को गुरुग्राम वाले फार्महाउस में दिल का दौरा पड़ा और वे नहीं रहे। उसी दिन से सबने राधिका को पागल, लालची और नाटकबाज कहना शुरू कर दिया।

सावित्री ने उसके बालों के पास झुककर कहा।

—तेरहवीं के बाद तू कागजों पर हस्ताक्षर करेगी। इस घर, इस नाम, इस संपत्ति और जो भी तूने सुना है, सब से दूर चली जाएगी। वरना तेरी मां भी चैन से नहीं रहेगी।

नेहा ने उसकी कलाई और कस दी।

—नीचे ही रह, बहू। तेरी जगह यही है।

राधिका ने कांपते हुए चेहरा उठाया।

और तभी कोठी के पिछले दरवाजे से एक महिला अंदर आई। सादी सलवार-कमीज, गले में पहचान-पत्र, आंखों में ठंडा विश्वास।

अपराध शाखा की अधिकारी मीरा चौहान।

विक्रम का चेहरा सफेद पड़ गया।

सावित्री के नाखून राधिका की त्वचा से हट गए।

मीरा चौहान अभी आगे बढ़ी ही थी कि अचानक अर्थी के पास रखा जगदीश कपूर का बंद ताबूत भीतर से बजने लगा।

एक मोबाइल फोन बज रहा था।

मृत आदमी का फोन उसके अंतिम संस्कार में बज रहा था।

PART 2

शोक-कक्ष में ऐसी चुप्पी छा गई जैसे किसी ने दीवारों की सांस रोक दी हो। कुछ औरतों ने अपने दुपट्टे सिर पर खींच लिए। एक बूढ़े चाचा ने कांपती आवाज में कहा कि यह अपशकुन है। नेहा ने राधिका को तुरंत छोड़ दिया, और राधिका की टूटी कलाई फर्श से टकराते ही उसके मुंह से दबा हुआ कराह निकल गया।

विक्रम तेजी से आगे बढ़ा।

—कोई ताबूत को हाथ नहीं लगाएगा।

मीरा चौहान ने उसी क्षण हाथ उठा दिया।

—बिलकुल। अब कोई कुछ नहीं छुएगा।

विक्रम ने संयमित गुस्से में कहा।

—मैडम, यह हमारे पिता का अंतिम संस्कार है।

मीरा ने सीधे उसकी आंखों में देखा।

—अब यह जांच का स्थान भी है।

सावित्री ने खुद को संभाला। सफेद साड़ी का पल्लू ठीक किया, मोतियों की माला सीधी की और बोली।

—मेरी बहू को दौरे पड़ते हैं। आज उसने मेरे पति की विदाई को तमाशा बना दिया।

राधिका उठने की कोशिश कर रही थी। तभी उसकी बांह से कपड़ा खिसक गया। ताजा जलन के निशान सबके सामने आ गए।

कमरे में एक साथ कई चेहरों ने नजरें फेर लीं।

मीरा ने पूछा।

—यह किसने किया?

सावित्री बोली।

—पुराने निशान हैं।

राधिका ने खून भरे होंठों से कहा।

—कल रात के हैं।

विक्रम उसके पास आया, वही मुलायम आवाज लेकर।

—राधिका, तुम परेशान हो। चलो, बैठते हैं।

राधिका ने पहली बार उसकी आंखों में देखकर कहा।

—मैं परेशान नहीं हूं, विक्रम। मैं थक चुकी हूं।

तभी फोन की घंटी बंद हुई।

और दीवारों पर लगे स्पीकरों से चरमराहट आई।

फिर जगदीश कपूर की आवाज गूंज उठी।

—अगर यह आवाज सुनाई दे रही है, तो समझ लेना कि सावित्री और मेरे बच्चों ने मुझे पुलिस तक पहुंचने नहीं दिया।

सावित्री का चेहरा पत्थर हो गया।

आवाज फिर आई।

—राधिका, माफ करना। मैंने तेरे जख्म देर से देखे। खून को सच मानता रहा, इंसान को नहीं।

विक्रम स्पीकर की तरफ दौड़ा, पर एक सिपाही ने उसे रोक लिया।

—कागज मेरी अलमारी में नहीं हैं। वे वहीं हैं, जहां सावित्री बिना सबके सामने बेनकाब हुए कभी खोज नहीं सकती।

नेहा हकलाते हुए बोली।

—मम्मी… आपने क्या किया?

जगदीश की आवाज ने आखिरी वाक्य कहा।

—सबूत मेरे साथ रखे गए हैं।

सभी की नजरें ताबूत पर टिक गईं।

सावित्री चीखी।

—इसे कोई नहीं खोलेगा! यह मेरे पति हैं!

मीरा चौहान आगे आई।

—पीछे हट जाइए, श्रीमती कपूर।

तभी राधिका समझ गई।

जगदीश कपूर ने अंतिम संस्कार नहीं, जाल बिछाया था।

PART 3

सावित्री कपूर चीखने के बाद तुरंत चुप हो गई, क्योंकि उसे हमेशा पता था कि चीख कमजोर लोगों का हथियार होती है। उसने अपना चेहरा फिर उसी विधवा की गरिमा में ढाल लिया, जिसके सहारे वह वर्षों तक समाज, रिश्तेदारों और दान-पुण्य की सभाओं में सम्मान खरीदती रही थी।

उसकी आंखें कमरे में घूमीं। वह देख रही थी कि कौन अब भी उसके साथ है।

पर लोग पीछे हट रहे थे।

जो रिश्तेदार अभी तक राधिका की चीखों को दुख समझकर बैठे थे, अब अपने चेहरों पर सफाई ढूंढ रहे थे। जिन लोगों ने सावित्री के हाथों से दान की थालियां ली थीं, वे दीवारों से चिपक गए। जिन्हें कपूर परिवार की दावतें और कृपा मिलती थी, वे अचानक बहुत धार्मिक, बहुत मौन और बहुत दूर हो गए।

विक्रम राधिका के पास झुका।

—अगर तूने यह सब जारी रखा, तो पछताएगी।

राधिका ने अपनी घायल कलाई को सीने से लगाकर कहा।

—मैं पछता चुकी हूं। चुप रहने पर।

मीरा चौहान ने अपने अधिकारी से फोन पर बात की। बाहर से 2 और पुलिसकर्मी आ गए। मुख्य दरवाजा बंद कर दिया गया। किसी को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।

सावित्री ने मौका देखा और सबकी तरफ मुड़ी।

—आप सब जानते हैं, जगदीश जी पिछले कुछ महीनों से ठीक नहीं थे। उन्हें बातें याद नहीं रहती थीं। यह लड़की उनके कान भरती थी। इसे पता था कि वसीयत बदल सकती है।

राधिका ने धीमे से कहा।

—झूठ।

सावित्री मुस्कुराई।

—तू मना करेगी कि तू उनसे पैसे मांगती थी? मना करेगी कि तेरे मायके की हालत कमजोर थी? विक्रम के बिना तू कुछ भी नहीं है, राधिका।

यह वही वाक्य था जो राधिका ने 2 साल में जाने कितनी बार सुना था। पहले यह वाक्य उसे छोटा कर देता था। आज वह उसके आर-पार निकल गया।

उसने अपने पर्स से एक मुड़ा हुआ लिफाफा निकाला। उस पर खून का हल्का धब्बा था। यह लिफाफा जगदीश कपूर ने मरने से 2 दिन पहले एक धार्मिक पत्रिका के अंदर छिपाकर उसके पास भिजवाया था।

—मैं खाली हाथ नहीं आई।

विक्रम के चेहरे से आखिरी रंग भी उतर गया।

राधिका ने कागज ऊपर उठाया।

—जगदीश जी ने 1 महीने पहले विक्रम को निजी ट्रस्ट से हटाने की प्रक्रिया शुरू की थी। उन्होंने कपूर सेवा ट्रस्ट की बाहरी जांच भी मंजूर कर दी थी।

विक्रम ने झपट्टा मारा, लेकिन सिपाही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—यह दे दो।

—यह तुम्हारा नहीं है, विक्रम। जैसे उन लड़कियों की छात्रवृत्ति तुम्हारी नहीं थी।

नेहा रोने लगी। वह रोना पश्चाताप से कम और डर से अधिक था।

—मैंने सिर्फ वही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जो मम्मी ने कहा था। मुझे लगा सब घर के काम हैं।

सावित्री ने उसे देखा।

—चुप रह।

नेहा कांप गई। पहली बार कमरे ने देखा कि इस घर में डर सिर्फ बहू के हिस्से में नहीं था। सावित्री ने हर रिश्ते को अपने नियंत्रण की रस्सी से बांध रखा था।

मीरा चौहान राधिका के पास आई।

—क्या आपके पास और सबूत हैं?

राधिका ने सिर हिलाया।

—आवाजें हैं। संदेश हैं। वे वीडियो हैं जो विक्रम ने मेरे फोन से मिटाए थे, लेकिन क्लाउड में रह गए। उस रात की रिकॉर्डिंग भी है जब सावित्री जी ने कहा था कि अगर मैं शिकायत करूंगी, तो मजिस्ट्रेट मल्होत्रा फाइल दबा देंगे।

कमरे में हवा बदल गई।

अब बात सिर्फ घरेलू हिंसा या पारिवारिक झगड़े की नहीं थी। अब इसमें रिश्वत, धोखाधड़ी, नकली कागज और एक ऐसे पिता की मौत का शक था जो सच बोलने जा रहा था।

विक्रम ने फिर वही पुराना मुखौटा पहनने की कोशिश की।

—मैडम, मेरी पत्नी भावनात्मक रूप से अस्थिर है। शादी के बाद से इसका व्यवहार ठीक नहीं रहा। यह मेरी मां को झूठे आरोपों में फंसाना चाहती है।

राधिका ने पहली बार हल्की हंसी हंसी। वह हंसी टूटी हुई थी, लेकिन डर से खाली थी।

—मुझे जलाकर भी तुम लोग यही चाहते थे कि मैं धन्यवाद कहूं।

कुछ औरतों ने नजरें नीची कर लीं। एक मामा ने गला साफ किया, लेकिन बोला कुछ नहीं।

इसी बीच एक बुजुर्ग आदमी अंदर आए। ग्रे बंदगला, हाथ में काला ब्रीफकेस, चेहरे पर थकान और आंखों में दृढ़ता। वे जगदीश कपूर के पुराने वकील दिनेश माथुर थे।

उन्होंने मीरा चौहान को एक दस्तावेज दिया।

—जगदीश जी ने हस्ताक्षरित निर्देश छोड़े थे। यदि उनके बयान से पहले उन्हें कुछ हो जाए, तो उनके अंतिम संस्कार से पहले ताबूत में रखी वस्तुएं जांच एजेंसी को सौंप दी जाएं।

सावित्री ने फुसफुसाया।

—दिनेश, हिम्मत मत करना।

वकील ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

—हिम्मत मुझे बहुत पहले करनी चाहिए थी।

मीरा चौहान ने सिर हिलाया। पुलिसकर्मी ताबूत के पास गए। कमरे में कोई आवाज नहीं थी। सिर्फ राधिका की सांसें थीं और उसके भीतर धड़कती टूटी कलाई।

जब ताबूत का पहला बंद खुला, विक्रम ने अपना संयम खो दिया।

—आप लोग नहीं जानते आप क्या कर रहे हैं!

मीरा ने शांत स्वर में कहा।

—शायद पहली बार सब जान रहे हैं।

दूसरा बंद खुला। सावित्री ने पल्लू मुट्ठी में दबा लिया। नेहा पीछे हट गई। विक्रम का चेहरा लाल था, जैसे गुस्सा और डर एक-दूसरे से लड़ रहे हों।

ताबूत के अंदर, सफेद कपड़े की तह के नीचे एक काली सीलबंद थैली थी। मीरा ने दस्ताने पहनकर उसे निकाला। उसमें एक पेन ड्राइव, बैंक लेन-देन की प्रतियां, कुछ मूल दस्तावेजों की फोटो प्रतियां और जगदीश कपूर का हाथ से लिखा पत्र था।

कई नाम लाल घेरे में थे।

विक्रम कपूर।

सावित्री कपूर।

नेहा कपूर।

और एक नाम ऐसा था जिसने कमरे में बैठी भीड़ की रीढ़ जमा दी।

न्यायिक अधिकारी आर. के. मल्होत्रा।

वही आदमी जिसने राधिका की सुरक्षा याचिका 6 महीने पहले यह कहकर खारिज कर दी थी कि यह घर का निजी मामला लगता है।

मीरा चौहान ने पत्र पढ़ा। हर पंक्ति के साथ उसका चेहरा कठोर होता गया।

वकील माथुर ने पेन ड्राइव अपनी मशीन में लगाई। एक वीडियो खुला। स्क्रीन पर गुरुग्राम का फार्महाउस था। रात का समय। जगदीश कपूर अध्ययन-कक्ष में एक फाइल लेकर प्रवेश कर रहे थे। कुछ मिनट बाद सावित्री अंदर गई। फिर विक्रम। नेहा दरवाजे के बाहर खड़ी थी, बार-बार गलियारे में झांकती हुई।

वीडियो में आवाज नहीं थी। लेकिन 14 मिनट बाद जब विक्रम बाहर आया, उसका चेहरा पीला था। सावित्री ने दरवाजा अंदर से बंद किया, फिर कुछ देर बाद बाहर आकर अपने बाल ठीक किए। नेहा ने कमरे में झांका और तुरंत मुंह पर हाथ रख लिया।

जगदीश कपूर बाहर चलकर कभी नहीं आए।

वकील ने स्क्रीन बंद कर दी, जैसे वह मौत को तमाशा बनने से बचाना चाहता हो।

नेहा टूट गई।

—मैंने पापा को नहीं मारा। मैं बस बाहर खड़ी थी। मम्मी ने कहा था पापा सब बर्बाद कर देंगे। भैया ने कहा था राधिका सब ले जाएगी।

सावित्री ने बेटी को ऐसे देखा जैसे वह जन्म से बोझ रही हो।

—तू हमेशा कमजोर रही है।

यही वह क्षण था जब सावित्री की आखिरी परत उतर गई। अब वह आदर्श पत्नी नहीं थी। न धर्म-कर्म करने वाली समाजसेविका। न प्रतिष्ठित परिवार की मुखिया। वह सिर्फ एक ऐसी औरत थी जिसने नियंत्रण को प्रेम समझ लिया था और भय को सम्मान।

मीरा चौहान ने कहा।

—विक्रम कपूर, आपको धोखाधड़ी, दस्तावेजों की जालसाजी, घरेलू हिंसा और जगदीश कपूर की संदिग्ध मृत्यु की जांच में हिरासत में लिया जा रहा है।

विक्रम चिल्लाया।

—आप मेरे पिता के अंतिम संस्कार में मुझे गिरफ्तार करेंगे?

राधिका ने उसे देखा।

—जगह तुम्हारे पिता ने चुनी थी।

सावित्री को जब हथकड़ी लगी, उसने हाथों को पल्लू से ढक लिया। जैसे समस्या अपराध नहीं, दृश्य था। जैसे इज्जत अब भी कपड़े की तह में बचाई जा सकती थी।

विक्रम ने जाते-जाते राधिका को देखा।

उसकी आंखों में वही पुरानी चालाक नर्मी लौट आई।

—राधिका, तुम जानती हो मैं तुमसे प्यार करता था।

राधिका एक कदम आगे बढ़ी।

—नहीं। तुम्हें मैं टूटी हुई चाहिए थी।

विक्रम के पास उत्तर नहीं था।

अस्पताल से आई महिला कर्मचारी ने राधिका की कलाई को सहारा दिया। उसके होंठ साफ किए गए। जलन के निशानों पर दवा लगी। उसने पूछा कि क्या राधिका के पास आज रात जाने की जगह है।

राधिका ने कमरे में चारों ओर देखा।

2 साल तक उसे लगता रहा था कि अकेलापन सबसे बड़ा डर है। उस सुबह उसे समझ आया कि सबसे बड़ा डर उन लोगों के बीच जीना है जो तुम्हारे घाव देखते हैं और उसे घर की शांति कहते हैं।

एक चाचा उसके पास आए।

—बहू, हमें पता नहीं था।

राधिका ने उनकी ओर देखा। शायद सच में उन्हें सब नहीं पता था। शायद वे जानते थे, पर जानना महंगा पड़ता। हर घर में कुछ लोग सच नहीं देखते, क्योंकि सच देखने से सुविधा छिन जाती है।

उसने कुछ नहीं कहा।

यह चुप्पी डर की नहीं थी।

यह सीमा थी।

अगले 3 हफ्तों में कपूर परिवार की चमक उतरने लगी। अखबारों में ट्रस्ट की जांच की खबर आई। नकली कंपनियों के खाते बंद हुए। दान के पैसे वापस लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। न्यायिक अधिकारी मल्होत्रा के खिलाफ विभागीय जांच बैठी। नेहा ने आधिकारिक बयान दिया। उसने अपनी भूमिका स्वीकार की, लेकिन यह भी बताया कि कैसे सावित्री और विक्रम ने हर दस्तावेज पर उसे इस्तेमाल किया।

राधिका अदालत में पहली बार कलाई पर प्लास्टर और बांह पर हल्की सूती चुन्नी डालकर गई। उसकी मां जयपुर से आई थीं। वर्षों की थकी आंखों में पछतावा था कि बेटी ने इतना कुछ अकेले सहा। पर राधिका ने उनके हाथ दबा दिए। वह किसी से माफी नहीं चाहती थी। उसे साथ चाहिए था।

दिनेश माथुर ने अदालत के बाहर उसे एक मोटी फाइल दी।

—जगदीश जी ने आपके लिए कुछ छोड़ा था। दक्षिण दिल्ली में छोटा फ्लैट, आपके नाम एक सुरक्षित निधि, और कपूर सेवा ट्रस्ट की अंतरिम देखरेख, जब तक स्वतंत्र समिति पूरी जांच न कर ले।

राधिका चुप रही।

—उन्होंने कहा था, राधिका समझ जाएगी इसका उपयोग क्या करना है।

और राधिका सच में समझ गई।

6 महीने बाद उसी ट्रस्ट का नया नाम रखा गया—खुला दरवाजा।

उसमें उन महिलाओं के लिए सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था की गई जो रात में घर छोड़ने पर मजबूर होती थीं। वहां वकीलों की सूची थी, अस्पतालों से संपर्क था, बिना ट्रैकिंग वाले फोन थे, बच्चों के लिए अस्थायी स्कूल सहायता थी, और एक छोटी-सी रसोई थी जहां चाय हमेशा गरम रहती थी।

पहली महिला जो वहां आई, उसकी गोद में 2 बच्चे थे। वह कह रही थी कि सीढ़ियों से गिर गई थी। राधिका ने उसकी आंखों में वही शर्म देखी, जो कभी उसके भीतर रहती थी।

राधिका ने उसे कुर्सी पर बैठाया, पानी दिया, और एक कार्ड उसके हाथ में रखा।

—तुम बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रही हो। तुम खतरे में हो। और जीने के लिए तुम्हें किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है।

वह औरत फूट-फूटकर रो पड़ी।

राधिका ने उससे यह नहीं कहा कि और जोर से रो।

कुछ समय बाद विक्रम ने अदालत में फिर कहा कि राधिका लालची थी, अस्थिर थी, बदला ले रही थी। पर जब फार्महाउस का पूरा वीडियो, बैंक रिकॉर्ड और जलन के मेडिकल प्रमाण पेश हुए, उसके वकीलों ने विशेषणों का उपयोग बंद कर दिया।

फैसले के दिन विक्रम ने पीछे मुड़कर राधिका को देखा। एक पल के लिए उसे वही आदमी दिखाई दिया जिसने उसे अपने ही स्मृति पर शक करना सिखाया था। वह जो धीमे बोलता था, ताकि उसका जहर शालीन लगे। वह जो चोट के बाद कहता था कि बात बढ़ाओ मत।

लेकिन वह राधिका अब नहीं थी।

वह उस संगमरमर के फर्श पर छूट गई थी, जहां एक ताबूत के भीतर से सच ने आवाज दी थी।

अदालत से बाहर निकलते समय दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी। सड़क किनारे चाय की दुकान से अदरक की खुशबू उठ रही थी। राधिका ने अपनी मां के लिए चाय ली, अपने लिए भी। उसकी कलाई अब ठीक हो चुकी थी, पर हल्का निशान रह गया था।

फोन बजा।

स्क्रीन पर मां का नाम था, जबकि मां सामने ही खड़ी थीं। दोनों हंस पड़ीं। फिर मां ने कहा।

—आदत है, बेटा। पहले फोन करके पूछती थी, तू खा पाई या नहीं।

राधिका की आंखें भर आईं।

कई वर्षों तक उसे लगता था कि ठीक होने का मतलब है चुप रहना, घर बचाना, रिश्ते निभाना, अपमान निगलना। अब उसे पता था कि ठीक होना कुछ और है।

एक चाबी होना, जिसे कोई छीन न सके।

एक आवाज होना, जिसे कोई दबा न सके।

एक दरवाजा होना, जो डर से बाहर खुलता हो।

जगदीश कपूर ने उसे बचाया नहीं था।

उन्होंने उसे सच दिया था।

राधिका ने खुद को बचाने के लिए उस सच के साथ खड़े होने का फैसला किया था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.