
PART 1
कमांडर की आवाज़ उसी पल रुक गई, जब एक माँ की साड़ी का पल्लू सरककर उसकी बाँह पर बना पुराना टैटू दिखा, और कोच्चि के नौसैनिक मैदान में बैठे 300 लोगों को समझ आ गया कि यह अब सिर्फ मरीन कमांडो की सम्मान-समारोह नहीं रह गया था।
तालियाँ अचानक थम गईं। सफेद कुर्सियों पर बैठे परिवारों ने गर्दनें मोड़ लीं। सामने कतार में खड़े जवान अपनी जगह जमे रहे, मगर कई लोगों की साँसें अटक गईं। मंच पर खड़े कमांडर अर्जुन मेनन ने उस औरत को ऐसे देखा, जैसे 20 साल पुराना घाव अचानक भीड़ के बीच खुल गया हो।
उसका नाम नंदिता राव था। 49 साल की, हल्की नीली कॉटन साड़ी, सस्ते मोतियों की चूड़ियाँ, बाल कसकर बंधे हुए, और गोद में गेंदे के फूलों का छोटा-सा गुलदस्ता। वह सिर्फ अपने बेटे आरव को उसकी हरी टोपी मिलते देखने आई थी। वह भीड़ में गुम रहना चाहती थी, बाकी माताओं की तरह चुपचाप रो लेना चाहती थी।
पर उसकी साड़ी का पल्लू खिसक गया था।
उसकी बाँह पर एक छोटा-सा लंगर, उसके चारों ओर लिपटा मेडिकल चिन्ह, बीच में खंजर जैसी पतली रेखा, और नीचे धुंधले होते 3 अंक बने थे। आम लोगों के लिए वह बस पुराना निशान था। लेकिन कमांडर मेनन ने उसे पहचान लिया।
कतार में खड़ा आरव राव, 24 साल का, अभी-अभी अपनी हरी टोपी पा चुका था। वह अपने जीवन के सबसे बड़े गर्व में डूबा था। 112 उम्मीदवारों में से सिर्फ 18 बचे थे। उसने समुद्र की ठंडी रातें झेली थीं, भूख, थकान, अपमान, दर्द और डर को चुपचाप निगला था। आज उसे लगा था कि उसकी माँ की सारी मेहनत रंग लाई।
नंदिता ने 18 साल तक जयपुर के एक निजी अस्पताल में रात की ड्यूटी की थी। कभी नर्स, कभी वार्ड सुपरवाइजर, कभी बीमार बुजुर्गों की देखभाल करने वाली औरत। उसने आरव की फीस भरी, उसके जूते खरीदे, ट्रेन टिकट काटे, और कभी अपने लिए नया फोन तक नहीं लिया।
पर आरव के पिता राघव राव ने हमेशा अलग कहानी सुनाई थी।
राघव, जो अब एक चमकदार सूट पहनकर अपनी दूसरी पत्नी कविता और 10 साल के बेटे के साथ 2 कतार पीछे बैठा था, सुबह से लोगों को बता रहा था कि आरव की बहादुरी उसके खून में है।
— राव परिवार के लड़के बचपन से ही मजबूत होते हैं।
नंदिता ने कुछ नहीं कहा था। वह बोलना बहुत पहले छोड़ चुकी थी।
राघव ने सालों तक आरव से कहा था कि उसकी माँ कमजोर है, भावुक है, कभी सेना में 2 महीने रही और डरकर भाग आई। जब भी आरव उसकी अलमारी में रखी बंद लोहे की डिब्बी के बारे में पूछता, नंदिता कहती—
— पुराने कागज हैं बेटा, तुम्हारे बड़े होने में काम नहीं आएँगे।
कमांडर मेनन ने माइक पकड़ा। आवाज़ टूट गई। फिर वह मंच से नीचे उतर आए। हर कदम मैदान की खामोशी में गूंजा। नंदिता ने जल्दी से पल्लू खींचकर बाँह ढँकनी चाही, मगर अब सब देख चुके थे।
कमांडर उसके सामने आकर रुके।
— मैडम, क्या आप खड़ी होंगी?
भीड़ में फुसफुसाहट दौड़ गई। राघव का चेहरा झुंझला उठा। कविता ने मोबाइल उठा लिया, जैसे कोई शर्मनाक तमाशा रिकॉर्ड होने वाला हो।
नंदिता 2 सेकंड बैठी रही। फिर उसने फूल बगल में रखे, गहरी साँस ली और उठ गई।
कमांडर मेनन ने अपनी कैप उतार दी।
पूरा मैदान जम गया।
— मैंने सोचा था, यह निशान फिर कभी नहीं देखूँगा।
नंदिता की आँखें बंद हो गईं।
— कमांडर साहब, आज नहीं।
माइक ने उसकी धीमी आवाज़ भी पकड़ ली।
मेनन की आँखें भर आईं।
— नंदिता राव, आपसे सही वक्त 20 साल से छीना गया है।
राघव हँस पड़ा।
— यह फिर क्या कहानी बना रही है?
आरव ने पहली बार पिता की तरफ ऐसे देखा कि राघव की हँसी वहीं मर गई।
कमांडर ने भीड़ की ओर मुड़कर कहा—
— जो मैं कहने जा रहा हूँ, वह कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है। लेकिन कुछ चुप्पियाँ इतनी लंबी हो जाती हैं कि वे अन्याय बन जाती हैं।
एक अधिकारी आगे बढ़ा।
— सर, समारोह—
— समारोह रुकेगा।
नंदिता की उँगलियाँ काँप रही थीं। आरव की छाती में कुछ टूटने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी चुप रहने वाली माँ को नौसेना का सबसे सख्त कमांडर इस तरह क्यों देख रहा था।
मेनन ने उसकी बाँह की ओर इशारा किया।
— यह निशान एक मेडिकल सपोर्ट यूनिट का था, जिसका नाम कभी सार्वजनिक रिकॉर्ड में ठीक से नहीं आया। वे लोग गोलीबारी के बाद नहीं, कई बार गोलीबारी के बीच घुसते थे। उनका काम था उन घायल जवानों को निकालना, जिन्हें बाकी दुनिया खोया हुआ मान चुकी होती थी।
राघव फिर बोला—
— नंदिता? युद्ध-क्षेत्र में? वह तो इंजेक्शन देखकर चक्कर खा जाती है।
इस बार नंदिता ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में डर नहीं था।
मेनन ने कहा—
— 2004 में, कश्मीर घाटी के एक ऑपरेशन में मेरी टीम घात लगाकर किए गए हमले में फँस गई थी। 7 लोग घायल थे। रेडियो बंद। रास्ता बंद। हमें मृत मान लिया गया था।
नंदिता ने फुसफुसाकर कहा—
— कृपया मत कहिए।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
PART 2
कमांडर मेनन की आवाज़ भारी हो गई।
— तब एक सैन्य नर्स खुले रास्ते से रेंगती हुई आई। उसके कंधे में चोट थी, सिर से खून नहीं, काली मिट्टी और दवा लगी थी, फिर भी उसने 3 जवानों की जान वहीं बचाई। उसने मेरा जबड़ा पकड़कर कहा था, “साँस लो, अभी तुम्हें मरने की इजाजत नहीं है।”
भीड़ में एक बुजुर्ग सैनिक अचानक खड़ा हो गया।
— मैडम डॉक्टर…
यह नाम सुनते ही नंदिता का चेहरा सफेद पड़ गया। 20 साल से किसी ने उसे इस नाम से नहीं पुकारा था।
मेनन ने आरव की ओर देखा।
— जवान, तुम्हारी माँ ने मेरी जान बचाई थी।
आरव की आँखें फैल गईं। बचपन की सारी यादें एक साथ लौट आईं—माँ का पटाखों से डरना, गर्मियों में भी लंबी बाँह पहनना, रात में बाथरूम में रोना, और पिता का कहना, “ड्रामा करती है।”
राघव खड़ा हो गया।
— झूठ! अगर यह इतनी महान थी, तो मेडल कहाँ है?
मेनन ने अपने सहायक को इशारा किया। एक पुरानी सीलबंद फाइल निकली। उसमें से एक धुंधली फोटो बाहर आई।
फोटो में 29 साल की नंदिता थी—धूल से भरा चेहरा, बाँह पर वही टैटू, और उसकी गोद में घायल जवान का सिर।
मेनन ने दस्तावेज पढ़ा—
— “सिस्टर नंदिता राव ने सीधी गोलीबारी में 5 सैनिकों को जीवित रखा, स्वयं घायल होने के बाद भी अंतिम व्यक्ति तक क्षेत्र नहीं छोड़ा।”
आरव टूटती आवाज़ में बोला—
— माँ… तुमने यह मुझसे क्यों छिपाया?
PART 3
यह सवाल मैदान में नहीं, नंदिता के सीने में गिरा। वह वही सवाल था, जिससे वह 20 साल भागती रही थी। उसने हजारों बार सोचा था कि एक दिन आरव बड़ा होगा, उसकी अलमारी खोलेगा, पुरानी फाइल देखेगा, और पूछेगा कि माँ, तुम कौन थीं? लेकिन उसने कभी सोचा नहीं था कि वह सवाल इतने लोगों के सामने आएगा, उस दिन आएगा, जब उसके बेटे की अपनी वीरता का सम्मान होना था।
नंदिता ने आरव की ओर देखा। वह अब सिर्फ हरी टोपी पहना जवान नहीं था। वह वही बच्चा भी था, जो 8 साल की उम्र में स्कूल की परेड हारकर उसकी गोद में रोया था। वही लड़का, जिसे राघव ने सिखाया था कि रोना कमजोरी है। वही बेटा, जिसके सामने नंदिता ने कभी अपना दर्द खुलकर नहीं रखा, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसका बचपन युद्ध की राख से भर जाए।
— मैंने सोचा था, तुम्हें बचा रही हूँ, उसने धीमे से कहा।
आरव के चेहरे पर पीड़ा फैल गई।
— किससे? सच से?
नंदिता ने जवाब देने की कोशिश की, पर शब्द टूट गए।
राघव ने मौका देखकर फिर आवाज़ ऊँची की।
— आरव, भावुक मत बनो। तुम्हारी माँ हमेशा से ऐसी है। खुद को पीड़ित दिखाती है। याद है, जब तुम छोटे थे और यह रात-रात भर रोती थी? जब परिवार के फंक्शन में नहीं आती थी? जब दशहरा के पटाखों से कमरे में बंद हो जाती थी? यही अस्थिरता है।
आरव धीरे से पिता की ओर मुड़ा।
— अस्थिरता नहीं, चोट थी।
राघव चुप रह गया।
— और तुमने हर चोट को मजाक बना दिया, आरव ने कहा।
भीड़ में सन्नाटा और गहरा हो गया। कविता ने मोबाइल नीचे कर लिया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि यह कोई पारिवारिक ड्रामा नहीं, किसी औरत की मिटाई गई जिंदगी का हिसाब था।
कमांडर मेनन ने फाइल से दूसरा कागज निकाला।
— नंदिता राव को उस ऑपरेशन के बाद वीरता सम्मान के लिए प्रस्तावित किया गया था। लेकिन ऑपरेशन को आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं किया गया। कई नाम दबा दिए गए। कुछ फाइलें बंद कर दी गईं। कुछ लोगों ने चुप्पी को सुविधा समझ लिया।
नंदिता ने उनकी ओर देखा।
— बस कीजिए।
— नहीं, मैडम, मेनन बोले। इस देश को यह जानना चाहिए कि हर बहादुर चेहरा पोस्टर पर नहीं छपता। कुछ अस्पतालों की रात की ड्यूटी में लौट जाते हैं। कुछ अपने बेटे की फीस भरते हुए बूढ़े हो जाते हैं। कुछ अपने ही घर में कमजोर कहलाते हैं।
नंदिता की आँखों से आँसू गिरने लगे। वह रो रही थी, मगर शर्म से नहीं। वह उस बोझ से रो रही थी, जिसे उसने इतने सालों तक अकेले ढोया था।
आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी कतार टूट गई। प्रशिक्षक ने उसे रोकना चाहा, फिर हाथ नीचे कर लिया। उस पल कोई नियम इतने बड़े सच से बड़ा नहीं था।
वह अपनी माँ के सामने पहुँचा।
— तुमने मुझे क्यों विश्वास करने दिया कि पापा सही थे?
नंदिता काँप गई। यह आरोप नहीं था। यह उस बच्चे का घाव था, जिसने अपनी माँ को कम समझना सीख लिया था और अब अपनी ही यादों से शर्मिंदा था।
— क्योंकि कभी-कभी, बेटा, जब लोग बार-बार कहते हैं कि तुम्हारा दर्द झूठ है, तो तुम अपनी सच्चाई को भी ताले में बंद कर देते हो। मैंने सोचा, अगर मैं चुप रहूँगी तो तुम्हारा जीवन हल्का रहेगा।
— लेकिन मेरा जीवन झूठा हो गया, माँ।
नंदिता ने सिर झुका लिया।
राघव ने तेज आवाज़ में कहा—
— आरव, तुम अपने पिता से इस तरह बात नहीं कर सकते।
आरव ने उसकी तरफ देखा।
— पिता होना सिर्फ नाम से नहीं होता। आपने मुझे माँ से शर्माना सिखाया। आपने उनके डर पर हँसना सिखाया। आपने कहा वह कमजोर हैं। आज पता चला, कमजोर कौन था।
राघव का चेहरा लाल हो गया।
— मैं तुम्हारे लिए सब करता रहा!
— आपने मेरे लिए सच नहीं किया।
ये शब्द ऐसे गिरे जैसे किसी ने पूरे मैदान के सामने वर्षों पुरानी दीवार तोड़ दी हो।
कमांडर मेनन ने फोटो आरव को सौंप दी। आरव ने काँपते हाथों से उसे लिया। उसने अपनी माँ का जवान चेहरा देखा—धूल, चोट, थकान, फिर भी आँखों में आग। वही आँखें उसने कितनी बार रात को अपने बिस्तर के पास देखी थीं, जब उसे बुखार होता था। वही हाथ, जो कभी घायल सैनिकों की साँसें बचाते थे, बाद में अस्पताल के बुजुर्ग मरीजों को चादर ओढ़ाते रहे। वही बाँह, जिसे वह हमेशा साड़ी के पल्लू से ढँकती रही।
आरव ने अपनी हरी टोपी उतारी।
नंदिता घबरा गई।
— नहीं बेटा, ऐसा मत करो। आज तुम्हारा दिन है।
आरव ने टोपी अपने सीने से लगाई और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
पूरा मैदान साँस रोककर देखता रहा।
— आज भी मेरा दिन है, माँ, उसने कहा। क्योंकि आज मुझे पता चला कि मैं किसकी औलाद हूँ।
नंदिता ने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए।
— उठ जाओ, लोग देख रहे हैं।
— देखने दो।
उसकी आवाज़ में अब सैनिक का अनुशासन नहीं, बेटे का प्रेम था।
— आपने मुझे खड़ा होना सिखाया, इससे पहले कि नौसेना ने मुझे खड़ा होना सिखाया। आपने मुझे सिखाया कि किसी को पीछे नहीं छोड़ना। आपने मुझे भूख में खिलाया, थकान में धक्का दिया, हार में पकड़ा। यह टोपी मैंने अपने पैरों से जीती है, लेकिन रीढ़ आपने दी है।
नंदिता की रुलाई टूट गई। वह झुककर उसके सिर को छूना चाहती थी, पर हाथ हवा में अटक गए। जैसे उसे डर हो कि इतने सम्मान को छूते ही वह सपना टूट जाएगा।
कमांडर मेनन ने सलामी दी।
फिर एक-एक करके बाकी अधिकारी खड़े हुए। 17 जवानों ने सलामी दी। पीछे बैठे पूर्व सैनिक उठे। कुछ माताएँ रो पड़ीं। कुछ पिता अपनी आँखें छिपाने लगे। मैदान में सलामी की एक धीमी लहर फैल गई। एक साधारण कॉटन साड़ी पहने, रात की ड्यूटी करने वाली, तलाकशुदा, वर्षों तक कमजोर कही गई माँ को वह सम्मान मिला, जो सरकारी फाइलों ने उससे छीन लिया था।
राघव अकेला खड़ा रह गया। उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन अब उसमें ताकत नहीं थी। वह कुछ कहना चाहता था, मगर हर शब्द पहले ही झूठ साबित हो चुका था।
समारोह पूरा हुआ, लेकिन उसका स्वर बदल चुका था। जब बाकी जवानों को परिवारों ने गले लगाया, लोग नंदिता के पास आने लगे। कोई उसके पैर छूने लगा, कोई हाथ जोड़कर धन्यवाद कहने लगा। एक बुजुर्ग सैनिक ने अपनी गर्दन पर पुराना निशान दिखाया और बोला—
— हम आपको नहीं जानते थे, पर अब लगता है देश आपको जानता था, बस नाम भूल गया था।
नंदिता बहुत कम बोली। इतने वर्षों की अदृश्यता के बाद अचानक आई रोशनी आँखों में चुभ रही थी। आरव पूरे समय उसके पास रहा। उसने एक बार भी उसे अकेला नहीं छोड़ा। जैसे उसे डर हो कि अगर उसने नज़र हटाई, तो उसकी माँ फिर किसी लंबी बाँह, किसी बंद डिब्बे, किसी चुप्पी के पीछे गायब हो जाएगी।
शाम को पार्किंग में राघव उनकी गाड़ी के पास खड़ा मिला।
— आरव, हमें बात करनी होगी।
— आज नहीं।
— मैं तुम्हारा पिता हूँ।
— तब आपको मेरी माँ का अपमान नहीं करना चाहिए था।
राघव ने नंदिता की ओर देखा। शायद वह उम्मीद कर रहा था कि पुरानी आदत के कारण नंदिता बीच में बोलेगी, बात संभालेगी, माफी माँगेगी, माहौल शांत करेगी।
लेकिन नंदिता ने कोई माफी नहीं माँगी।
उसने बस कहा—
— इतने साल मैं सोचती रही कि मैं टूट गई थी। आज समझ आया, शर्म मेरी नहीं थी।
राघव के पास पहली बार कोई तैयार वाक्य नहीं था।
कविता दूर खड़ी सब देख रही थी। उसके हाथ में मोबाइल था, लेकिन स्क्रीन बंद थी। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि जिस आदमी की कहानियों पर उसने भरोसा किया, वे किसी दूसरी औरत की चुप्पी पर बने महल थे।
उस रात आरव अपनी माँ को कोच्चि के बंदरगाह के पास एक छोटे से रेस्तराँ में ले गया। मेज पर हरी टोपी रखी रही, जैसे वह भी उनकी बात सुन रही हो। नंदिता ने बहुत धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। पहले मिशन के नाम नहीं बताए। फिर स्थान नहीं बताए। फिर कुछ चेहरे बताए। राजीव, जो 21 साल का था और अंतिम साँस में अपनी बहन का नाम ले रहा था। इमरान, जिसे उसने 40 मिनट तक जागते रहने को मजबूर किया। कमांडर मेनन, जो उस समय युवा अधिकारी थे और बार-बार कह रहे थे कि उनका हाथ नहीं हिल रहा।
— मैं वापस आई, तो लोग कह रहे थे सब सामान्य हो जाएगा, उसने कहा। लेकिन भीतर कुछ सामान्य नहीं रहा।
आरव ने पूछा—
— फिर आपने शादी क्यों बचाने की कोशिश की?
नंदिता हल्का-सा मुस्कुराई। वह मुस्कान दुख से भरी थी।
— क्योंकि तुम्हें पिता चाहिए था। और मुझे लगा, अगर घर बच गया तो शायद मैं भी बच जाऊँगी।
— पर आपने खुद को खो दिया।
— हाँ। थोड़ा-थोड़ा करके।
आरव की आँखें भर आईं।
— मैं भी दोषी हूँ। मैंने कई बार सोचा आप कमजोर हैं।
नंदिता ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
— नहीं। बच्चे वही मानते हैं जो बड़े बार-बार कहते हैं। दोष तुम्हारा नहीं था।
— अब मैं किसी को यह कहने नहीं दूँगा।
नंदिता ने उसकी तरफ देखा। पहली बार उसके चेहरे पर भय से ज्यादा शांति थी।
— मुझे लड़ाई नहीं चाहिए, बेटा। बस अब चुप्पी नहीं चाहिए।
कुछ दिनों बाद समारोह की वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गई। दूर से ली गई धुंधली क्लिप में बस इतना दिखता था—एक माँ खड़ी है, कमांडर कैप उतार रहा है, बेटा घुटनों पर बैठा है। टिप्पणियों में लोग लड़ने लगे। कुछ ने कहा, यह दिखावा है। कुछ ने अपनी माँओं की कहानियाँ लिखीं। कुछ पूर्व सैनिकों ने उन मिशनों का जिक्र किया, जिनके नाम कभी अखबारों में नहीं आए। कई महिलाओं ने लिखा कि उन्हें भी घर लौटकर “ज्यादा मत बोलो” सुनना पड़ा था।
नंदिता ने बहुत कम पढ़ा। वह जयपुर वापस लौटी और सोमवार रात फिर अस्पताल की ड्यूटी पर चली गई। कमरा 308 में दादी माँ दवा नहीं लेना चाहती थीं। कमरा 214 में एक बुजुर्ग हर 15 मिनट में अपनी मृत पत्नी को बुला रहे थे। नर्स स्टेशन पर चाय ठंडी थी। जीवन फिर वही हो गया।
लेकिन नंदिता वही नहीं रही।
उसने पहली बार गर्मी में आधी बाँह का कुर्ता पहना। टैटू दिखा। एक युवा नर्स ने पूछा—
— मैडम, यह निशान बहुत पुराना है?
नंदिता ने कुछ पल सोचा, फिर कहा—
— हाँ। और यह अब छिपाने लायक नहीं है।
अगले महीने आरव छुट्टी लेकर बिना बताए घर आया। वह रात दीवाली की थी। जयपुर की गलियों में पटाखे गूंज रहे थे। बचपन में हर दीवाली नंदिता बाथरूम में बंद हो जाती थी, नल खोल देती थी, ताकि धमाकों की आवाज़ कम लगे। राघव तब हँसता था—“देखो, तुम्हारी बहादुर माँ।”
पर उस रात आरव ने उसे छत पर पाया।
वह रेलिंग पकड़कर खड़ी थी। चेहरा पीला था। हाथ काँप रहे थे। नीचे बच्चे हँस रहे थे। आसमान में रोशनी फूट रही थी। हर धमाके पर उसकी उँगलियाँ कस जातीं, मगर वह भाग नहीं रही थी।
आरव धीरे से उसके पास गया और उसके कंधे पर शॉल रख दी।
— ज्यादा तेज है?
नंदिता ने लंबी साँस ली।
— हाँ।
— अंदर चलें?
उसने आसमान की ओर देखा। रोशनी उठती, टूटती, बिखरती और अँधेरे में खो जाती। कुछ आवाज़ें आज भी उसके भीतर पुराने मैदान खोल देती थीं। कुछ चमकें आज भी उन चेहरों को वापस ले आती थीं, जिन्हें वह बचा नहीं पाई। लेकिन इस बार उसका बेटा उसके बगल में था। इस बार उसे अपने डर को झूठ साबित नहीं करना था।
उसने आरव का हाथ थाम लिया।
— नहीं। इस बार मैं यहीं रहूँगी।
आरव उसके साथ खड़ा रहा। दोनों देर तक कुछ नहीं बोले। नीचे शहर अपनी सामान्य खुशियों में व्यस्त था—मिठाइयाँ, दीये, हँसी, छतों पर परिवार, दूर मंदिर की घंटी, पास के घर से आती आरती। भारत की वही रोजमर्रा की जिंदगी, जिसके पीछे न जाने कितनी अनकही कहानियाँ छिपी रहती हैं।
नंदिता की बाँह पर पुराना टैटू दीयों की रोशनी में साफ दिख रहा था।
आरव ने उसे देखा और समझ गया कि कुछ नायक युद्ध से लौट तो आते हैं, पर पूरी तरह कभी नहीं लौटते। उन्हें वापस लाने के लिए पदक नहीं, बेटे का हाथ, सच की जगह, और एक घर चाहिए जहाँ उनके डर का मजाक न उड़ाया जाए।
उस रात पटाखे बहुत तेज थे।
लेकिन पहली बार नंदिता अकेली नहीं थी।