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शादी से 6 दिन पहले मंगेतर बेटी को छोड़कर भाग गया, फिर पूर्व पत्नी के साथ लिफाफा लेकर लौटा: “जो चाहो ले लो”, पर उसे नहीं पता था कि बच्ची ने अपनी असली गोद चुन ली थी, कई रातों के आँसुओं के बाद

PART 1

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शादी से सिर्फ 6 दिन पहले आरव ने अपनी अलमारी खाली की, नंबर बंद किया, मंडप का एडवांस रद्द किया और अपनी 6 साल की विकलांग बेटी तारा को अदिति के घर में ऐसे छोड़ गया, जैसे कोई भारी सामान उठाने से थक गया हो।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर की उस छोटी-सी किराए की फ्लैट में रात के 2 बजे पीली नाइट लाइट जल रही थी। तारा अपने छोटे बिस्तर पर सो रही थी, उसके पैरों की कैलिपर दीवार से टिके थे, और उसके हाथों में वही पुराना गुलाबी हाथी दबा था जिसे वह डर लगने पर सीने से लगा लेती थी। उसकी साँसें धीमी थीं, पर अदिति की साँसें टूट रही थीं।

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वह 3 घंटे से आरव को कॉल कर रही थी।

आरव का फोन बंद था।

उसकी माँ का फोन बंद था।

उसके बड़े भाई ने नंबर ब्लॉक कर दिया था।

सुबह तक अदिति को पता चला कि शादी का हलवाई, बैंक्वेट हॉल, सजावट, सबका भुगतान आरव ने एक दिन पहले ही वापस ले लिया था। वह तो कहकर गया था कि मुंबई में 3 दिन की ऑफिस ट्रेनिंग है।

—बस लौटकर आते ही सब ठीक कर दूँगा, अदिति। तुम तारा का ध्यान रखना। शादी के बाद हम सच में परिवार बन जाएँगे।

अदिति ने उस दिन मुस्कुराकर सिर हिलाया था। पिछले 4 साल से वह इसी झूठ पर भरोसा करती रही थी।

आरव से उसकी मुलाकात कनॉट प्लेस की एक किताबों की दुकान में हुई थी। तारा तब व्हीलचेयर में थी, बाल बिखरे हुए, आँखों में अजीब-सी चुप्पी। आरव ने बताया था कि तारा की माँ काव्या उसे 3 साल की उम्र में छोड़कर चली गई थी, क्योंकि वह अपनी बेटी की बीमारी, थेरेपी, स्कूल और रातों की बेचैनी नहीं सह पाई।

अदिति को तारा पर दया नहीं आई थी। उसे उससे प्यार हो गया था।

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धीरे-धीरे अदिति ने तारा की दवाइयाँ याद कीं, फिजियोथेरेपी के अभ्यास सीखे, उसके टूटे शब्दों को पूरा सुना, उसके डर को समझा। जब भी दरवाज़ा ज़ोर से बंद होता, तारा काँप जाती। जब भी कोई बैग पैक करता, वह रोने लगती।

आरव उसे कहता था—

—तुम मेरी जिंदगी का चमत्कार हो।

अदिति ने उस वाक्य को प्रेम समझ लिया था।

उस रात, जब वह काँपते हाथों से आरव के कपड़ों वाली खाली अलमारी बंद कर रही थी, नीचे रखे गद्दे के कोने से एक सफेद लिफाफा गिरा। उस पर मोटे काले पेन से लिखा था—अदिति।

उसने फर्श पर बैठकर चिट्ठी पढ़ी।

आरव ने लिखा था कि वह कभी सच में काव्या से अलग नहीं हुआ। वे महीनों से मिल रहे थे। दोनों ने तय किया था कि वे बेंगलुरु जाकर नई जिंदगी शुरू करेंगे, बिना बीमारी, बिना बोझ, बिना उस जिम्मेदारी के जिसने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था।

फिर वह पंक्ति आई जिसने अदिति का खून जमा दिया।

“तारा हमेशा हम दोनों पर बोझ रही है। तुम उसे हमसे ज्यादा चाहती हो। जो सही लगे, कर देना।”

अदिति ने चीखा नहीं। उसने कुछ तोड़ा नहीं। वह बस तारा के कमरे के बाहर जाकर खड़ी हो गई।

तारा नींद में बुदबुदाई—

—पापा… आएँगे?

अदिति के होंठ खुल नहीं पाए।

क्योंकि उसी पल उसे समझ आ गया था कि एक पिता ने अपनी ही बेटी को छोड़ने की पूरी योजना बनाई थी।

PART 2

सुबह अदिति ने बाल कल्याण समिति, पुलिस और तारा की स्पेशल स्कूल काउंसलर को फोन किया। हर कॉल पर उसकी आवाज़ टूटती रही।

—मैं उससे प्यार करती हूँ, लेकिन मैं उसकी माँ नहीं हूँ। कानून में मेरा कोई हक नहीं है। कोई उसे फिर से चोट न पहुँचा दे।

2 दिन बाद काव्या के माता-पिता, नीलिमा और हरिश मल्होत्रा, जयपुर से दिल्ली पहुँचे। उन्होंने तारा को 3 साल से नहीं देखा था। काव्या ने उनसे झूठ बोला था कि बच्ची किसी अच्छे होस्टल में है, आरव ने मिलने से रोका था, और शर्म ने सच को दफना दिया था।

जब तारा ने धुंधली आवाज़ में कहा—

—नानी…

नीलिमा उसके व्हीलचेयर के पास घुटनों पर गिर पड़ीं।

हरिश ने अदिति से हाथ जोड़कर कहा—

—हमें सच में कुछ नहीं पता था।

लेकिन असली तूफान तब उठा, जब सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि अगर जैविक माता-पिता लौट आए, तो वे अदालत में दावा कर सकते हैं।

और उसी रात अदिति को अनजान नंबर से संदेश आया—

“तारा हमारी बेटी है। पता बता दो। पैसा जितना चाहिए मिलेगा।”

PART 3

उस संदेश को पढ़कर अदिति की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं। फोन की स्क्रीन पर शब्द जल रहे थे, जैसे किसी ने फिर से वही चिट्ठी उसके सामने रख दी हो। पैसा। कीमत। बेटी के बदले रकम। तारा अब भी उनके लिए बच्ची नहीं थी, अपराधबोध की रसीद थी जिसे वे नकद चुकाना चाहते थे।

अदिति ने तुरंत स्क्रीनशॉट लिया। उसने नीलिमा को भेजा, हरिश को भेजा, और बाल कल्याण समिति की अधिकारी सुषमा जी को भेजा। पहली बार उसे समझ आया कि बचाना सिर्फ गले लगाने से नहीं होता, कई बार सबूत संभालकर रखने से भी होता है।

अगले कई हफ्ते थकाने वाले थे। दिल्ली की सरकारी इमारतों के चक्कर, अस्पताल के कागज, स्कूल की रिपोर्ट, फिजियोथेरेपिस्ट के नोट्स, पुलिस स्टेशन की सूखी दीवारें, वकीलों की तेज बातें। हर जगह तारा का नाम लिया जाता था, मगर तारा को सिर्फ इतना पता था कि सब बड़े लोग बहुत धीमे-धीमे बोल रहे हैं और अदिति बार-बार उसका हाथ दबा रही है।

अदिति हर बैठक में गई। उसने बताया कि तारा रात में चीखकर उठती है। उसने बताया कि बच्ची सूटकेस देखते ही काँपती है। उसने बताया कि आरव ने दवाइयों की पूरी सूची तक नहीं छोड़ी थी। उसने बताया कि जब तारा को तेज बुखार आया था, आरव का फोन बंद था। उसने वह चिट्ठी दी, जिसमें पिता ने बेटी को बोझ लिखा था।

नीलिमा और हरिश ने जयपुर के अपने पुराने घर का एक कमरा तारा के लिए बदल दिया। दरवाजे पर रैंप बनवाया, बाथरूम में रेलिंग लगवाई, पास के स्पेशल स्कूल में पूछताछ की, और तारा की दवाइयों के लिए दीवार पर चार्ट चिपकाया। वे अमीर नहीं थे, लेकिन पहली बार किसी ने तारा की जरूरतों को परेशानी नहीं, घर का हिस्सा माना।

अदिति चाहती तो पीछे हट सकती थी। उसकी अपनी माँ ने भी कहा—

—बेटी, तूने बहुत कर लिया। दुनिया क्या कहेगी? शादी टूटी, ऊपर से पराए बच्चे के पीछे भाग रही है।

अदिति ने शांत होकर कहा—

—माँ, बच्चा पराया तब होता है जब हम उसे पराया मान लें।

माँ चुप हो गईं, लेकिन वह चुप्पी सहमति की नहीं थी।

अदालत ने पहले नीलिमा और हरिश को तारा की देखभाल का अधिकार दिया। बाद में लंबी प्रक्रिया के बाद, उनकी अभिभावकता मजबूत की गई। आरव और काव्या महीनों तक सामने नहीं आए। शायद उन्हें लगा होगा कि सब धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। शायद उन्हें भरोसा था कि भारतीय परिवारों में अंत में खून के रिश्ते की दुहाई हर पाप धो देती है।

लेकिन तारा धीरे-धीरे ठीक होने लगी।

जयपुर के उस पुराने घर में सुबह की धूप आँगन में गिरती थी। नीलिमा तुलसी में पानी डालतीं, हरिश अखबार पढ़ते हुए तारा की छोटी-छोटी आवाज़ों पर मुस्कुराते। फिजियोथेरेपिस्ट आता। तारा कदम रखने की कोशिश करती। गिरती, रोती, फिर अदिति का वीडियो कॉल देखते ही हँस देती।

—अदि… देखो… पैर।

अदिति हर रविवार जयपुर जाती। रात की ट्रेन पकड़ती, सुबह पहुँचती, तारा के लिए रंगीन क्लिप, छोटी किताबें, कभी रिबन, कभी मुलायम कुशन ले जाती। वह न माँ थी, न मासी, न कोई कानूनी रिश्ता। फिर भी तारा जब उसे देखती, उसकी आँखों में वही भरोसा लौट आता जो छोड़ दिए गए बच्चों में बहुत मुश्किल से पैदा होता है।

2 साल गुजर गए।

अदिति ने शादी का लाल लहंगा बेचने के बजाय काट दिया। उसने उससे स्पेशल स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम के लिए बच्चों की पोशाकें बनाईं। जिस कपड़े में वह दुल्हन बनने वाली थी, उसी कपड़े में 12 बच्चों ने मंच पर नाचते हुए तालियाँ पाईं। उस दिन अदिति पहली बार बिना टूटे मुस्कुराई।

फिर एक बरसाती शाम, जब वह अपने नए बुटीक में ब्लाउज की फिटिंग कर रही थी, बाहर गाड़ी रुकी। काँच के दरवाजे पर दस्तक हुई।

आरव खड़ा था।

उसके साथ काव्या थी।

काव्या महँगा सूट पहने हुए थी, सिर पर हल्का दुपट्टा, आँखों के नीचे गहरी थकान। आरव की दाढ़ी बढ़ी हुई थी। दोनों ऐसे लग रहे थे जैसे पछतावा भी उन्हें सुंदर दिखाना चाहता हो, लेकिन भीतर की सड़न छिप नहीं पा रही थी।

—अदिति, बात करनी है, आरव बोला।

—नहीं।

काव्या आगे आई।

—हम तारा के लिए आए हैं।

अदिति की रीढ़ में बर्फ उतर गई।

—तारा के लिए? या अपनी आत्मा के इलाज के लिए?

काव्या का चेहरा सिकुड़ गया।

—मैं उसकी माँ हूँ।

अदिति हँसी नहीं। उसका चेहरा पत्थर हो गया।

—माँ वह शब्द है जिसे बोलने से पहले निभाना पड़ता है।

आरव ने जेब से मोटा लिफाफा निकाला। उसमें नोटों की गंध थी। वही गंध, जो अक्सर गरीब की मजबूरी और अमीर की बेशर्मी के बीच पुल बनाकर खड़ी होती है।

—जो खर्च हुआ, हम दे देंगे। तेरे नुकसान का पैसा, तेरी बदनामी का पैसा, शादी टूटने का पैसा। बस पता दे दे।

अदिति ने लिफाफे को देखा, फिर उनके चेहरे देखे।

—तुम दोनों अभी भी नहीं समझे। तारा कोई बिल नहीं है।

काव्या की आँखों में आँसू आ गए।

—मैं बीमार हूँ, अदिति। मुझे पता नहीं कितना समय है। मैं मरने से पहले अपनी बेटी को देखना चाहती हूँ।

एक पल के लिए अदिति का दिल काँपा। बीमारी सच भी हो सकती थी। दर्द सच भी हो सकता था। लेकिन हर सच को अधिकार नहीं मिल जाता।

—तारा तुम्हारी दवा नहीं है, काव्या। तुम्हारा पछतावा उसकी शांति से बड़ा नहीं है।

उसने दरवाजा बंद कर दिया।

उसी रात उसने नीलिमा और हरिश को सब बताया। हरिश की आवाज़ भारी हो गई।

—उन्हें पता नहीं चलना चाहिए कि तारा कहाँ है।

अदिति बोली—

—मैं कभी नहीं बताऊँगी।

हरिश ने धीमे कहा—

—मुझे तुमसे डर नहीं है, बेटी। मुझे उन लोगों से डर है जो तुम्हें समझदार बनकर समझाएँगे।

उसकी बात अगले ही दिन सच हो गई।

अदिति के पिता ने फोन किया।

—आरव हमसे मिला था।

अदिति का दिल धँस गया।

—क्या?

माँ ने फोन लिया।

—काव्या सच में बीमार लग रही थी। बहुत रो रही थी। बेटा, हर किसी से गलती होती है। बच्ची आखिर उनकी है।

—आप लोगों ने क्या किया?

कुछ सेकंड की चुप्पी ने जवाब दे दिया।

—हमने बस इतना बताया कि वह जयपुर में ननिहाल में है। पूरा पता तो उन्हें वैसे भी मिल जाता।

अदिति को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर का पुराना घाव नाखून से खोल दिया हो। वही परिवार, जिसने उसे हमेशा कहा था कि औरत को बड़ा दिल रखना चाहिए, अब एक बच्ची की सुरक्षा को किसी पुरुष के आँसू से हल्का तौल रहा था।

—आपने तारा को खतरे में डाल दिया।

माँ बोलीं—

—हमने इंसानियत की।

अदिति की आवाज़ काँपी नहीं।

—नहीं। आपने एक विकलांग बच्ची की शांति बेच दी, ताकि आपको लगे कि आप दयालु हैं।

उसने फोन काट दिया।

2 दिन बाद काव्या जयपुर पहुँच गई। नीलिमा घर में तारा को दोपहर की नींद सुला रही थीं। बाहर गेट पर घंटी बार-बार बजी। फिर काव्या की आवाज़ आई—

—माँ! दरवाजा खोलो! मुझे पता है तारा अंदर है!

नीलिमा खिड़की के पीछे खड़ी रहीं। उनके हाथ काँप रहे थे, मगर उन्होंने कुंडी नहीं खोली।

काव्या ने लोहे के गेट पर हाथ मारा।

—तुम मेरी बेटी चुरा नहीं सकतीं!

हरिश बाजार से लौटे तो गली में लोग जमा हो चुके थे। उन्होंने काव्या को देखा। वह उनकी वही बेटी थी जिसे उन्होंने कभी गोद में खिलाया था, वही बेटी जिसने अब अपनी बच्ची को ऐसे छोड़ा था जैसे बीमारी चरित्र की छूट बन सकती है।

—चली जा, हरिश ने कहा।

—पापा, मैं मर सकती हूँ।

हरिश की आँखें भर आईं। लेकिन उसी समय अंदर से तारा की घबराई हुई आवाज़ आई—

—नानी… दरवाजा… नहीं…

हरिश का चेहरा बदल गया।

—अगर सच में समय कम है, तो आखिरी समय में एक काम अच्छा कर। उसे फिर से मत तोड़।

काव्या चिल्लाई। आरव थोड़ी देर बाद आया। उसने गेट हिलाया, धमकी दी, कहा कि वह पिता है। पड़ोस की शर्मा आंटी ने पुलिस बुला ली। तारा जाग गई। वह बिस्तर पर बैठी दोनों कान बंद किए दोहराती रही—

—नहीं जाना… नहीं पापा… नहीं बैग…

उस रात हरिश ने वकील को फोन किया।

—अब बस। अदालत से रोक लगवानी है।

मुकदमा शुरू हुआ।

आरव और काव्या ने दावा किया कि उनसे भावनात्मक कमजोरी में गलती हुई थी। उन्होंने कहा कि अदिति ने बदले की भावना से बच्ची को उनसे दूर किया। उन्होंने नीलिमा और हरिश पर बच्ची को भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने बीमारी, खून का रिश्ता, माँ का अधिकार, पिता का पश्चाताप—सबका इस्तेमाल किया।

अदिति को गवाही के लिए बुलाया गया।

जयपुर परिवार न्यायालय के बाहर उस दिन धूप तेज थी, लेकिन अदिति के हाथ ठंडे थे। उसके बैग में वही पुरानी चिट्ठी थी, प्लास्टिक फाइल में संभालकर रखी हुई। वह चिट्ठी अब कागज नहीं थी, तारा की नींद का पहरेदार थी।

अदालत में आरव ने उसकी तरफ देखने से बचा। काव्या सफेद दुपट्टे में बैठी थी, चेहरे पर थकान और आँखों में गुस्सा साथ-साथ थे। शायद वह सच में बीमार थी। शायद वह सच में दुखी थी। अदिति ने उस दिन सीखा कि कोई इंसान दुखी होकर भी खतरनाक हो सकता है।

वकील ने अदिति से पूछा—

—क्या यह सच नहीं कि आपकी शादी टूटने के कारण आप आरव से बदला लेना चाहती थीं?

अदिति ने आरव की तरफ देखा।

—बदला लेना होता तो मैं उसका सामान सड़क पर फेंक देती। मैंने बाल कल्याण समिति को फोन किया, क्योंकि बच्ची अपने पिता को पुकार रही थी और पिता गायब था।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर चिट्ठी पढ़ी गई। पूरी नहीं, बस जरूरी पंक्तियाँ। जब “बोझ” शब्द अदालत में गूँजा, नीलिमा रो पड़ीं। हरिश ने सिर झुका लिया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। काव्या की पलकें काँपीं, जैसे पहली बार उस शब्द का वजन उसके अपने सीने पर गिरा हो।

तारा की काउंसलर ने भी गवाही दी।

—यह बच्ची त्यागे जाने के डर से जूझ रही है। अब उसने भरोसा बनाना शुरू किया है। जैविक माता-पिता का पछतावा उसकी नई स्थिरता से बड़ा नहीं हो सकता। उसे प्रयोग की तरह फिर से उनके सामने नहीं रखा जा सकता।

जज ने लंबा आदेश सुनाया। आरव और काव्या की तत्काल अभिरक्षा की मांग खारिज हुई। नीलिमा और हरिश की अभिभावकता कायम रही। बिना विशेषज्ञ निगरानी के कोई मुलाकात नहीं होगी। आरव को बकाया देखभाल खर्च और मासिक सहायता देनी होगी। काव्या को भी अपनी आय के अनुसार योगदान देना होगा। पुरानी लापरवाही और परित्याग की अलग जांच का आदेश हुआ।

बाहर आते ही आरव ने अदिति को रोका।

—खुश हो? जीत गई?

अदिति ने उसकी आँखों में सीधा देखा।

—नहीं। तारा जीत गई। उसे आज रात सोने का हक मिला।

आरव कुछ नहीं बोल पाया।

काव्या धीरे से बोली—

—मैं बस उसे देखना चाहती थी।

अदिति की आवाज़ नरम थी, लेकिन उसमें कोई कमजोरी नहीं थी।

—जब वह तुम्हें देखती थी, तब तुमने आँखें फेर ली थीं।

महीनों बाद जिंदगी फिर सामान्य लगने लगी, पर वह पुरानी सामान्यता नहीं थी। अब तारा के घर में कोई दरवाजा बिना बताए बंद नहीं करता था। कोई बैग अचानक नहीं पैक करता था। कोई उसे बोझ नहीं कहता था। उसकी व्हीलचेयर को रास्ते से हटाया नहीं जाता था, उसके लिए रास्ता बनाया जाता था।

अदिति के माता-पिता ने कई बार संपर्क किया। माँ ने संदेश भेजे—

“हमने भलाई में किया।”

“इतनी कठोर मत बन।”

“काव्या माँ है।”

अदिति ने जवाब नहीं दिया।

एक रात पिता का फोन आया। उनकी आवाज़ धीमी थी।

—हमने तुझे उस दिन नहीं समझा।

अदिति ने पूछा—

—आपने मुझे माना, या अदालत को?

बहुत देर तक चुप्पी रही।

—शायद अदालत को पहले। अब तुझे।

अदिति की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने उन्हें छिपाया नहीं।

—पापा, माफी का मतलब यह नहीं कि बच्चे की सुरक्षा किसी बड़े के पछतावे पर चढ़ा दी जाए।

पिता रो पड़े। पहली बार अदिति ने उन्हें रोने दिया, उन्हें सांत्वना देने की जल्दी नहीं की।

वसंत में तारा का 8वाँ जन्मदिन मनाया गया। जयपुर के घर का आँगन गेंदे के फूलों और रंगीन कागजों से सजाया गया। चॉकलेट केक पर 8 मोमबत्तियाँ थीं। तारा ने बैंगनी रिबन से सजा वॉकर पकड़ा और धीरे-धीरे अदिति की तरफ चली। हर कदम पर सबकी साँस रुकती। हर कदम एक मुकदमे से बड़ी जीत था।

वह अदिति तक पहुँची और हँसी।

—अदि… मैं… बड़ी।

अदिति घुटनों पर बैठ गई।

—हाँ, मेरी जान। बहुत बड़ी।

तारा ने अपनी फ्रॉक की जेब से मुड़ा हुआ कागज निकाला। उस पर टेढ़े-मेढ़े रंगों से एक घर बना था। एक खुला गेट, आँगन में नीलिमा, कुर्सी पर हरिश, और गेट के पास अदिति। ऊपर काँपते अक्षरों में लिखा था—

“यहाँ लोग वापस आते हैं।”

अदिति ने चेहरा मोड़ लिया, ताकि तारा उसके आँसू न देख सके।

नीलिमा ने धीरे से कहा—

—वह कभी-कभी पूछती है, कुछ लोग जाते क्यों हैं और कुछ लौटकर क्यों आते हैं।

हरिश ने दूर खड़े होकर जवाब दिया—

—क्योंकि जन्म देने वाले हमेशा घर नहीं बनाते। घर वे बनाते हैं जो लौटना सीखते हैं।

अदिति ने तारा को आँगन में हँसते देखा। उसका वॉकर टेढ़ा था, उसकी चाल धीमी थी, उसकी आवाज़ अधूरी थी, पर उसकी आँखों में अब वह डर नहीं था जो 2 साल पहले पीली नाइट लाइट के नीचे सोता था।

आरव और काव्या दूसरी मौका माँगते रहे।

तारा ने कभी दूसरी जिंदगी नहीं माँगी थी।

उसे बस पहली बार एक ऐसी जिंदगी चाहिए थी जहाँ कोई उसे छोड़कर न जाए।

और जब तारा ने मोमबत्तियाँ बुझाने से पहले अदिति का हाथ पकड़ा, तो अदिति समझ गई कि कुछ दरवाजे हमेशा के लिए बंद रखना ही किसी बच्चे के लिए सबसे बड़ा प्रेम होता है।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.