Posted in

शादी के मंडप से दूल्हे ने तलाकशुदा पत्नी को चिढ़ाया, “आज मुझे असली परिवार मिलेगा”, लेकिन अस्पताल में नवजात बेटी और नीली फाइल देखकर उसका सेहरा कांप उठा, क्योंकि जाली हस्ताक्षरों का सच बेइज्जती बनकर पूरे खानदान पर गिरने वाला था

PART 1

Advertisements

शादी के मंडप से दूल्हे ने अपनी तलाकशुदा पत्नी को सिर्फ यह सुनाने के लिए कॉल किया कि आज वह उस औरत से शादी कर रहा है जो उसे “असली परिवार” दे सकती थी।

नंदिनी कपूर ने मोबाइल की स्क्रीन को कुछ पल तक देखा। उसके सीने पर उसकी नवजात बेटी सो रही थी, गुलाबी कंबल में लिपटी हुई, छोटी-सी मुट्ठियां ऐसे बंद जैसे इस दुनिया में आते ही उसने लड़ना सीख लिया हो। दिल्ली के साकेत के एक निजी अस्पताल के कमरे में हल्की बरसात की आवाज खिड़की पर गिर रही थी। कमरे में दवा, गेंदा फूल और गरम दूध की मिली-जुली गंध थी।

Advertisements

मोबाइल पर नाम चमक रहा था—अर्जुन मल्होत्रा।

6 महीने पहले अदालत में यही आदमी उसके सामने खड़ा था और कह रहा था कि नंदिनी ठंडी, जिद्दी और अधूरी औरत है। यही आदमी अपने परिवार, अपने वकीलों और अपने झूठे मेडिकल कागजों के साथ उसे यह साबित करने पर तुला था कि वह मां बनने लायक नहीं थी।

नंदिनी ने कॉल उठाई।

दूसरी तरफ शहनाई बज रही थी। लोगों की हंसी, कांच के गिलासों की खनक और महंगे समारोह का शोर साफ सुनाई दे रहा था।

—नंदिनी, आज सोचा खबर तुम्हें खुद दे दी जाए, अर्जुन ने जहरीली खुशी से कहा। आज अर्जुन मल्होत्रा रीया से शादी कर रहा है।

रीया।

नंदिनी की पुरानी सहायक। वही लड़की जो हर सुबह उसके केबिन में चाय रखती थी, “मैम, आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं” कहती थी, और रात को उसी के पति के साथ गुरुग्राम के होटल में बैठकर उसके निजी ईमेल पढ़ती थी। वही रीया जिसने कंपनी की बैठकों में नंदिनी के भरोसे का फायदा उठाया और फिर उसी भरोसे को चाकू बना दिया।

—बधाई, नंदिनी ने धीमे स्वर में कहा।

अर्जुन हंसा।

Advertisements

—बस इतनी सूखी आवाज? इसलिए तो हमारा रिश्ता खत्म हुआ। रीया चाहती है कि सब पुराने गिले-शिकवे खत्म हो जाएं। आ जाओ। छतरपुर वाले फार्महाउस में शादी है। पूरा परिवार है। प्रेस वाले भी हैं।

नंदिनी ने अपनी बेटी के माथे पर हाथ रखा।

—नंदिनी कहीं नहीं जा सकती। अभी बच्ची पैदा हुई है।

उधर अचानक खामोशी छा गई।

शहनाई चलती रही, मगर अर्जुन की हंसी रुक गई।

—क्या कहा?

—अभी बच्ची पैदा हुई है।

—किसकी बच्ची?

यह सवाल कभी नंदिनी को तोड़ देता। कभी वह अदालत के बाहर रोती थी, जब अर्जुन की मां उसे बांझ कहकर रिश्तेदारों के सामने अपमानित करती थी। कभी वह रात भर मेडिकल रिपोर्टों को देखती थी और सोचती थी कि उसकी किस्मत में इतना अपमान क्यों लिखा गया।

पर वह नंदिनी अब नहीं थी।

—अपनी दुल्हन के पास लौट जाओ, अर्जुन।

—नंदिनी, साफ बोलो। बच्ची मेरी तो नहीं है?

नंदिनी की आंखें खिड़की के बाहर भीगी दिल्ली पर टिक गईं। सड़क की रोशनी बारिश में टूटकर फैल रही थी।

—तुमने तलाक के कागज बिना पढ़े साइन किए थे, अर्जुन। तुम्हें हमेशा बारीक बातें नापसंद थीं।

ठीक 30 मिनट बाद अस्पताल के कमरे का दरवाजा जोर से खुला।

अर्जुन भीतर आया। क्रीम रंग की शेरवानी पहने, माथे का सेहरा आधा टूटा हुआ, चेहरे पर पसीना और आंखों में ऐसा डर जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली हो। उसके पीछे रीया खड़ी थी, लाल लहंगे में, सोने का हार पहने, मगर चेहरा राख जैसा सफेद।

अर्जुन ने बच्ची को देखा।

फिर नंदिनी को।

—तुमने यह सब योजना बनाकर किया, उसने फुसफुसाया।

नंदिनी ने बेटी को और कसकर पकड़ा।

—नहीं, अर्जुन। यह सब तुमने खुद किया।

उसी पल कमरे के बाहर किसी भारी कदमों की आहट आई, और अर्जुन ने पहली बार महसूस किया कि यह सिर्फ एक बच्चे की खबर नहीं थी।

PART 2

रीया सबसे पहले संभली। वह कमरे में ऐसे दाखिल हुई जैसे अस्पताल नहीं, अभी भी शादी का मंच हो। उसके लहंगे की कढ़ाई सफेद फर्श पर चमक रही थी, मगर उसकी आवाज में जहर था।

—यह कितना घटिया खेल है, नंदिनी। शादी वाले दिन बच्चा दिखाकर बदला लेना चाहती हो?

नर्स, जो नंदिनी की दवा देख रही थी, डरकर पीछे हट गई।

नंदिनी ने रीया की मांग, गहनों और कांपती मुस्कान को देखा।

—बधाई हो, रीया। आखिर चुराया हुआ आदमी मिल ही गया।

रीया की आंखें जल उठीं।

—जो घर में बेकार हो चुका हो, उसे चुराया नहीं जाता।

नंदिनी के चेहरे पर थकान भरी मुस्कान आई।

—सही कहा। खराब सामान वापस करना ही ठीक था।

अर्जुन ने दरवाजा बंद कर दिया।

—साफ बोलो, यह बच्ची मेरी है या नहीं?

बच्ची ने हल्की-सी आवाज निकाली। अर्जुन पीछे हट गया, जैसे वह नवजात नहीं, अदालत का सबूत हो।

नंदिनी ने मेज से नीली फाइल उठाई।

—जन्म से पहले की पितृत्व जांच। कानूनी प्रक्रिया के साथ। प्रमाणित प्रयोगशाला की रिपोर्ट। नाम तुम्हारा है।

अर्जुन ने फाइल नहीं खोली। उसकी उंगलियां कांप रही थीं।

रीया ने झपटकर पन्ने देखे। पहले उसी का चेहरा बदला।

—नहीं… यह नहीं हो सकता।

अर्जुन ने तारीख देखी। फिर उसकी सांस अटक गई।

उसे वह आखिरी रात याद आई। तलाक से पहले की रात। जब वह नशे में नंदिनी के घर आया था। रो रहा था कि पिता का दबाव, निवेशकों का डर और परिवार की कंपनी उसे खा रही है। उसी रात उसने माफी मांगी थी। सुबह वह फिर रीया के पास चला गया था।

—तुम्हें पता था? अर्जुन ने दांत भींचे।

—तलाक के बाद पता चला।

—बताया क्यों नहीं?

—क्योंकि तुम दुनिया को यह बताने में व्यस्त थे कि नंदिनी बांझ है।

कमरे में सन्नाटा जम गया।

अर्जुन ने नई जिंदगी उसी झूठ पर बनाई थी। बेचारी नंदिनी, जो बच्चा नहीं दे सकी। महान अर्जुन, जिसने फिर भी उसे “इज्जत” से छोड़ा। भरोसेमंद रीया, जिसने टूटे आदमी को सहारा दिया।

पर अर्जुन भूल गया था कि नंदिनी शादी से पहले क्या थी।

वह सजावटी बहू नहीं थी।

वह फॉरेंसिक लेखा परीक्षक थी।

और मल्होत्रा इंफ्राटेक में ऐसा घोटाला छिपा था, जिसकी जड़ कपूर ट्रस्ट तक जाती थी—वही ट्रस्ट जो नंदिनी के पिता ने उसकी सुरक्षा के लिए बनाया था, और जिसे अर्जुन ने नकली हस्ताक्षरों से गिरवी रखा था।

तभी दरवाजे पर काले कोट में एक आदमी दिखा।

—अर्जुन मल्होत्रा?

अर्जुन जम गया।

—आपको कानूनी नोटिस दिया जाता है।

फिर उसने दूसरा लिफाफा निकाला।

—और रीया सक्सेना को भी।

नंदिनी ने बेटी का माथा चूमा।

—नंदिनी ने सिर्फ अपना हक बचाया है।

PART 3

असली अपमान अदालत में नहीं हुआ।

असली अपमान मंडप में हुआ।

छतरपुर का फार्महाउस उस रात रोशनी से जगमगा रहा था। मुख्य द्वार पर फूलों की सुरंग थी, पीतल के दीयों की कतारें थीं, और मेहमानों के लिए चांदी की थालियों में मिठाइयां रखी थीं। दिल्ली के बड़े कारोबारी, रिश्तेदार, पत्रकार और मल्होत्रा परिवार के पुराने साझेदार सब मौजूद थे।

शादी का सीधा प्रसारण लुधियाना और जयपुर बैठे रिश्तेदारों के लिए चल रहा था। किसी ने कैमरा बंद नहीं किया जब दूल्हा अचानक मंडप छोड़कर भागा था। किसी ने कैमरा बंद नहीं किया जब वह 40 मिनट बाद लौटा—बिखरा हुआ, सफेद चेहरा, मुड़ी हुई शेरवानी और आंखों में ऐसी घबराहट जो सेहरे से भी नहीं छिप रही थी।

रीया उसके पीछे आई। उसका लाल लहंगा अब भारी नहीं, बोझ लग रहा था। माथे की बिंदी टेढ़ी हो चुकी थी। हाथों की मेहंदी गाढ़ी थी, पर उंगलियां खाली-सी लग रही थीं।

पंडित जी ने संकोच से पूछा—

—फेरे शुरू करें?

पहली पंक्ति से अर्जुन की मां, सुनीता मल्होत्रा, उठ खड़ी हुईं। वही सुनीता, जिन्होंने नंदिनी को करवा चौथ की रात रिश्तेदारों के सामने कहा था, “घर की बहू वही कहलाती है जो वंश बढ़ाए।”

—अर्जुन, कहां गया था तू?

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसी क्षण उसके मोबाइल पर वकील का कॉल आया। घबराहट में उसने उसे बंद करने की बजाय स्पीकर पर कर दिया। मोबाइल मंडप के पास रखे ध्वनि यंत्र से जुड़ चुका था, क्योंकि शादी के मंत्रों के लिए वही व्यवस्था बनाई गई थी।

अगले ही पल पूरे फार्महाउस में वकील की आवाज गूंज उठी।

—श्री अर्जुन मल्होत्रा, आपको कपूर ट्रस्ट के दस्तावेजों में धोखाधड़ी, जाली हस्ताक्षर, वैवाहिक संपत्ति छिपाने और आपराधिक विश्वासघात के मामले में नोटिस मिल चुका है। संबंधित बैंक खातों को अस्थायी रूप से रोकने की अर्जी दाखिल की जा रही है।

मंडप में बैठे मेहमानों की फुसफुसाहट तूफान बन गई।

रीया ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

—मोबाइल बंद करो!

बहुत देर हो चुकी थी।

उसी संदेश के साथ भेजे गए दस्तावेज स्क्रीन पर खुल गए। बड़ी एलईडी पर, जहां अभी थोड़ी देर पहले अर्जुन और रीया की तस्वीरें चल रही थीं, अब बैंक लेनदेन, नकली हस्ताक्षर और ईमेल दिखाई देने लगे।

“नंदिनी टूट चुकी है, वह अदालत नहीं जाएगी।”

“तलाक के बाद ट्रस्ट पर उसका दावा कमजोर कर देंगे।”

“सबको बता दो कि वह मां नहीं बन सकती। लोग खुद उससे दूरी बना लेंगे।”

“शादी हो जाने के बाद कोई कुछ नहीं कर पाएगा।”

रीया का चेहरा उतर गया। उसके पिता, जो कुछ देर पहले गर्व से मेहमानों को बता रहे थे कि उनकी बेटी मल्होत्रा घराने में जा रही है, कुर्सी पकड़कर बैठ गए।

अर्जुन ने स्क्रीन बंद करने की कोशिश की, लेकिन उसके मामा ने रिमोट छीन लिया।

—पहले सब देखेंगे, फिर फेरे होंगे, उन्होंने कड़क आवाज में कहा।

स्क्रीन पर मेडिकल रिपोर्टें खुलीं। वही रिपोर्टें जिनके आधार पर अर्जुन ने नंदिनी को बांझ साबित करने की कोशिश की थी। रिपोर्टों के नीचे डॉक्टर की मुहर नकली निकली। फिर रीया और अर्जुन के संदेश खुले, जिनमें वे नंदिनी के नाम पर अफवाह फैलाने की योजना बना रहे थे।

“उसे समाज में इतना अकेला कर दो कि वह समझौता कर ले।”

“कपूर ट्रस्ट की असली फाइल उसके पास नहीं होगी।”

“उसे सिर्फ भावुक और कमजोर समझो।”

मगर वही उनकी सबसे बड़ी भूल थी।

नंदिनी ने सब कुछ चुपचाप देखा था। तलाक के दौरान वह रोई जरूर थी, मगर टूटी नहीं थी। जब अर्जुन ने घर छीना, उसने फाइलें बचाईं। जब ससुराल ने उसे अपमानित किया, उसने ईमेल सुरक्षित रखे। जब रीया ने उसे दफ्तर से बाहर करवाया, उसने सर्वर की प्रतियां कानूनी तरीके से निकलवाईं। जब उसे गर्भ का पता चला, उसने पहले बच्ची को सुरक्षित रखा, फिर सबूतों को।

मंडप में अब किसी को शहनाई सुनाई नहीं दे रही थी।

अर्जुन के पिता, राजीव मल्होत्रा, धीरे-धीरे उठे। उनके चेहरे पर गुस्सा कम और अपमान अधिक था। वह आदमी, जिसने जिंदगी भर नाम, प्रतिष्ठा और कारोबार पर गर्व किया था, अब अपने ही बेटे की करतूतों के सामने खड़ा था।

—तूने कपूर ट्रस्ट को गिरवी रखा? उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।

—पापा, बात वैसी नहीं है…

—तूने नंदिनी के पिता के दस्तावेजों पर नकली हस्ताक्षर किए?

अर्जुन चुप रहा।

राजीव मल्होत्रा ने रीया की तरफ देखा।

—और तुम? तुमने यह सब करवाया?

रीया रोने लगी।

—हम सिर्फ साथ रहना चाहते थे। नंदिनी तो जा चुकी थी। अर्जुन ने कहा था कि वह कुछ नहीं कर पाएगी।

सुनीता मल्होत्रा ने रीया के गले में पड़ा हार देखा। वह वही पुराना कुंदन हार था जो नंदिनी को विवाह के समय परिवार की बड़ी बहू के रूप में दिया गया था।

—यह हार उतारो, सुनीता ने ठंडी आवाज में कहा। यह उस औरत का था, जिसे तुमने अपमानित किया।

रीया ने हार पकड़ लिया।

—यह मुझे अर्जुन ने दिया है।

—चोरी की चीज उपहार नहीं होती।

दो महिला रिश्तेदार आगे बढ़ीं। रीया ने विरोध किया, मगर उसके हाथ कांप रहे थे। हार उतरते ही जैसे उसका दुल्हन वाला गर्व भी उतर गया।

अर्जुन ने गुस्से में कहा—

—सब लोग नाटक बंद करें। यह हमारी निजी बात है।

तभी पीछे से किसी ने कहा—

—निजी बात तब रहती जब तूने कंपनी के पैसे और ट्रस्ट के कागज इस्तेमाल नहीं किए होते।

यह मल्होत्रा इंफ्राटेक के स्वतंत्र निदेशक थे। उनके साथ 2 बैंक अधिकारी भी मौजूद थे, जिन्हें शादी में खास मेहमान के रूप में बुलाया गया था। कुछ मिनट पहले तक वे मुस्कुरा रहे थे। अब उनके चेहरों पर पेशेवर कठोरता थी।

—बोर्ड की आपात बैठक सोमवार सुबह होगी, निदेशक ने कहा। तब तक अर्जुन मल्होत्रा को प्रबंध निदेशक पद से अलग माना जाए।

अर्जुन की आंखें फैल गईं।

—आप ऐसा नहीं कर सकते।

—कंपनी को डूबने से बचाना है।

रीया चिल्लाई—

—अर्जुन, कुछ बोलो!

पर अर्जुन के पास अब शब्द नहीं बचे थे। वह आदमी जो दूसरों की चुप्पी को अपनी जीत समझता था, आज अपनी ही चुप्पी में डूब रहा था।

उस रात फेरे नहीं हुए।

मेहमान बिना खाना खाए लौटे। रिश्तेदारों ने गाड़ियों में बैठते ही कॉल करना शुरू किया। दिल्ली के कारोबारी हलकों में सुबह तक खबर फैल चुकी थी। सोशल मीडिया पर शादी की वीडियो घूम रही थी। किसी ने लिखा, “दूल्हे का सच मंडप में खुला।” किसी ने लिखा, “जिस पत्नी को बांझ कहा, उसी की बेटी ने सब बदल दिया।”

अस्पताल में नंदिनी ने वह वीडियो नहीं देखा।

वह अपनी बेटी को दूध पिला रही थी। उसकी मां, आशा कपूर, चुपचाप पास बैठी थीं। वही मां जो 6 महीने से हर रात बेटी का माथा सहलाकर कहती थीं, “इज्जत छीनने वाले बहुत मिलेंगे, मगर अपनी रीढ़ सीधी रखना।”

सुबह वकील अस्पताल आया। उसने बताया कि नोटिस स्वीकार हो चुका है, खातों पर रोक की प्रक्रिया शुरू है, और अदालत बच्ची के अधिकारों को गंभीरता से ले रही है।

—नाम तय हुआ? वकील ने बच्ची को देखते हुए पूछा।

नंदिनी ने पहली बार मुस्कुराकर कहा—

—अनाया।

आशा कपूर की आंखें भर आईं।

—जिसका कोई सहारा न हो, उसका सहारा भगवान बनता है।

नंदिनी ने बेटी को देखा।

—नहीं मां। इसका सहारा कानून भी बनेगा, मां भी बनेगी, और सच भी बनेगा।

अगले कुछ सप्ताह तूफान जैसे बीते।

अर्जुन ने पहले नंदिनी को मनाने की कोशिश की। उसने फूल भेजे। फिर माफी वाला संदेश भेजा। फिर बेटी को देखने की मांग की। जब नंदिनी ने सब कुछ वकील के माध्यम से करने को कहा, तो उसने गुस्से में अभिरक्षा की धमकी दी।

मगर अदालत में सब कुछ उसके खिलाफ गया।

न्यायाधीश ने मेडिकल झूठ, वित्तीय धोखाधड़ी और सार्वजनिक अपमान के रिकॉर्ड देखे। पितृत्व जांच मान्य हुई। बच्ची को अर्जुन की कानूनी संतान माना गया, मगर उसकी सुरक्षा सर्वोपरि रखी गई। अर्जुन को सिर्फ निगरानी में मिलने की अनुमति मिली। वह भी तब, जब वह आपराधिक जांच में सहयोग करे।

रीया ने बचने के लिए अर्जुन पर दोष डालना शुरू किया।

उसने बयान दिया कि अर्जुन ने ही फाइलें दी थीं। अर्जुन ने कहा कि रीया ने ही ईमेल निकाले थे। दोनों ने एक-दूसरे को बचाने की कोशिश नहीं की। उनके प्रेम की असलियत पहले नोटिस में ही उजागर हो गई।

मल्होत्रा परिवार ने चुपचाप शादी रद्द घोषित कर दी। सुनीता मल्होत्रा ने नंदिनी को संदेश भेजा—

“गलती हो गई। बच्ची को घर लाओ। वह हमारी पोती है।”

नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

कुछ रिश्ते खून से नहीं, व्यवहार से तय होते हैं। और कुछ दरवाजे एक बार बंद हो जाएं तो उनके पीछे लौटना कमजोरी नहीं, मूर्खता होती है।

3 महीने बाद कपूर ट्रस्ट की संपत्ति वापस सुरक्षित हो गई। बैंक ने जाली गिरवी दस्तावेज निरस्त किए। कंपनी के बोर्ड ने अर्जुन को पद से हटा दिया। जांच एजेंसियों ने रीया के खातों की भी पड़ताल शुरू कर दी। जिस हीरे के हार को वह अपनी जीत समझ रही थी, वह अदालत के आदेश से जब्त हुआ और बाद में महिला कानूनी सहायता कोष में जमा कराया गया।

नंदिनी ने मल्होत्रा घर की हवेली नहीं मांगी।

उसने सिर्फ अपने पिता का ट्रस्ट, अपनी बेटी का हक और अपनी प्रतिष्ठा वापस ली।

6 महीने बाद वह दिल्ली के लोधी रोड वाले अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी थी। सुबह की धूप हल्की थी। नीचे अमलतास के पेड़ों पर पीले फूल झर रहे थे। अनाया उसकी गोद में सो रही थी, शांत, सुरक्षित, जैसे दुनिया का सारा शोर उसके छोटे-से कंबल के बाहर रह गया हो।

मोबाइल बजा।

अर्जुन का संदेश था।

“क्या मुझे बर्बाद करके चैन मिला?”

नंदिनी ने स्क्रीन को देर तक देखा। उसके भीतर न नफरत उठी, न बदला। बस एक गहरी शांति थी, जो बहुत रोने, बहुत सहने और आखिरकार सच को थाम लेने के बाद आती है।

उसने अनाया के माथे को चूमा और जवाब लिखा—

“बर्बाद तुम अपने झूठ से हुए। नंदिनी ने सिर्फ सबूत संभालकर रखे थे।”

फिर उसने मोबाइल बंद कर दिया।

कमरे के भीतर आशा कपूर ने आरती की थाली रखी। अनाया नींद में मुस्कुराई। बाहर दिल्ली की सड़कें जाग रही थीं।

और नंदिनी ने पहली बार महसूस किया कि तलाक ने उसका घर नहीं छीना था।

तलाक ने सिर्फ उस आदमी को बाहर किया था, जो कभी उसका घर था ही नहीं।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.