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शराबखाने में एक औरत को 20 रुपये और 3 सिक्कों में बेच दिया गया, लेकिन उसे खरीदने वाला खामोश पहाड़ी आदमी तब टूट गया जब उसने कहा, “मुझे नहीं, मेरे 5 साल के बेटे को बचाओ…”

भाग 1

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कीचड़ से भरे पहाड़ी शराबखाने में उस रात एक औरत की कीमत सिर्फ 20 रुपये और 3 सिक्कों में लगाई जा रही थी।

बाहर बादल फट रहे थे। हिमाचल की उस छोटी-सी खनन बस्ती, धनगढ़, में बारिश मिट्टी, गोबर और शराब की बदबू को मिलाकर ऐसी गंध बना रही थी, जिससे सभ्य आदमी का दम घुट जाए। मगर वहाँ सभ्यता बची ही कहाँ थी। टूटे हुए सपनों वाले मजदूर, ताश में हारे हुए आदमी, साहूकारों के दलाल और दारू में डूबे शिकारी—सब उसी तंग शराबखाने में जमा थे।

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कमरे के सबसे अँधेरे कोने में भैरव ठाकुर बैठा था। वह 38 साल का था, लंबा, चौड़ा कंधा, चेहरे पर पुराने घाव का निशान, आँखों में पहाड़ों जैसी ठंडी चुप्पी। वह ऊपरी घाटी में अकेला रहता था, देवदार की लकड़ी काटता, घोड़ों और खच्चरों के साथ सामान ढोता, कभी-कभी जड़ी-बूटियाँ बेचकर महीनों तक इंसानों से दूर रहता। उस रात वह बस आटा, नमक और तेल खरीदकर वापस अपने पहाड़ी घर जाना चाहता था।

तभी बीच कमरे में हंगामा हुआ।

एक दुबला-पतला आदमी, रघु, एक औरत की कलाई पकड़कर उसे घसीटता हुआ काउंटर तक ले आया। उसकी आँखें नशे और डर से लाल थीं। औरत ने चीखने की कोशिश नहीं की। वह बस चुप रही। उसके गाल पर नीला निशान था, भीगे बाल चेहरे से चिपके हुए थे, सूती सलवार-कमीज़ कीचड़ और बारिश से भारी हो चुकी थी।

रघु ने काउंटर पर मुट्ठी मारी।

“मेरा 40 का हिसाब काट दे। पैसे नहीं हैं, पर ये है। काम करेगी। खाना बनाएगी। झाड़ू लगाएगी। जिसे देना हो दे दे।”

कमरे में गंदी हँसी गूँज गई।

मोटे पेट वाला एक खनिक आगे आया। उसने औरत के चेहरे को छूने के लिए हाथ बढ़ाया। औरत ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखों में डर नहीं था। वहाँ एक खालीपन था, जैसे कोई इंसान बहुत पहले भीतर से मर चुका हो और अब सिर्फ शरीर बचा हो।

भैरव का हाथ धीरे से अपनी लोहे की कटोरी से हट गया।

वह नायक नहीं था। उसे दूसरों के झगड़े में पड़ना पसंद नहीं था। पहाड़ ने उसे सिखाया था कि चुप रहना ही बचना है। मगर उस रात उस औरत की आँखों ने उसकी चुप्पी को तोड़ दिया।

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वह उठा।

कमरा अचानक शांत हो गया।

भैरव काउंटर तक गया, अपनी जेब से मुड़ा हुआ 20 का नोट और 3 सिक्के निकाले, लकड़ी पर फेंके और बोला, “हिसाब खत्म। अब यह औरत तेरे साथ नहीं जाएगी।”

रघु ने पैसे ऐसे उठाए जैसे साँप ने दूध देखा हो। “ले जा इसे,” वह बुदबुदाया। “अब तेरी हुई।”

औरत ने धीरे से भैरव की तरफ देखा। उसकी आँखों में शुक्रिया नहीं था, भरोसा भी नहीं। वहाँ सिर्फ एक सवाल था—एक आदमी किसी औरत को खरीदकर बचाता है या एक और कैद में ले जाता है?

भैरव ने बस इतना कहा, “चलो।”

बारिश और तेज हो चुकी थी। पहाड़ी रास्ते अँधेरे में निगल रहे थे। वह उसे अपनी खच्चर-घोड़ी पर बैठाकर बर्फीले रास्ते की तरफ बढ़ा। औरत ने पहली बार धीमी आवाज़ में कहा, “मेरा नाम गौरी है।”

भैरव ने जवाब दिया, “नाम याद रखूँगा।”

लेकिन कुछ ही देर बाद, जब रास्ता चट्टानों के बीच सँकरा हुआ, गौरी ने अपनी भीगी ओढ़नी के भीतर से एक छोटी लकड़ी की टूटी कार निकाली और काँपती आवाज़ में कहा, “मुझे नहीं बचाना था… मेरे 5 साल के बेटे को बचाना था।”

भैरव वहीं रुक गया।

क्योंकि उस रात पहली बार उसे समझ आया कि उसने एक औरत नहीं, एक टूटी हुई माँ की आखिरी उम्मीद खरीद ली थी।

भाग 2

गौरी ने आग के सामने बैठकर सारी बात बताई।

धनगढ़ से नीचे एक कस्बा था, लालकुआँ। वहीं रघु ने जुए में सब कुछ हारा था—घर, गहने, गौरी की मजदूरी और आखिर में उसका बच्चा। उसका बेटा आरव सिर्फ 5 साल का था। छोटे हाथ, गोल आँखें, और हमेशा लकड़ी की एक टूटी कार जेब में रखने की आदत। रघु ने उसे एक लोहार के हाथ दे दिया था, यह कहकर कि बच्चा काम सीखेगा और कर्ज़ कट जाएगा।

भैरव चुपचाप सुनता रहा। उसके पहाड़ी घर में सिर्फ एक खाट, एक चूल्हा, सूखी लकड़ियाँ और दीवारों पर लटके औज़ार थे। वहाँ किसी और की साँस भी अजनबी लगती थी। मगर गौरी की आवाज़ में जो टूटन थी, उसने उस घर की ठंड बदल दी।

गौरी ने हाथ जोड़ दिए। “मैं यहाँ रहूँगी। काम करूँगी। जिंदगी भर तेरे घर की देहरी नहीं छोड़ूँगी। बस मेरे बच्चे को लौटा ला।”

भैरव ने उसकी तरफ देखा। “मैंने तुझे नौकरानी बनाकर नहीं लाया।”

“तो फिर क्यों लाया?” गौरी की आँखों से आँसू गिर पड़े।

भैरव ने टूटी कार उठाई। “क्योंकि उस रात अगर मैं चुप रहता, तो मैं खुद को जिंदगी भर माफ नहीं कर पाता।”

सुबह वे दोनों लालकुआँ पहुँचे। लोहार की भट्ठी धुएँ और आग से भरी थी। लोहार हरनाम सिंह ने गौरी को देखते ही हँसकर कहा, “बच्चा यहाँ नहीं है। रोता बहुत था। औज़ार गिराता था। उसे ऊपर कालीधार खदान में दे दिया।”

गौरी के होंठ सफेद पड़ गए।

कालीधार खदान का नाम सुनते ही भैरव की आँखें पत्थर बन गईं। वहाँ छोटे बच्चों से पत्थर की सुरंगों में हाथ डलवाए जाते थे, जहाँ बड़े आदमी नहीं घुस सकते थे। एक गलती में हाथ कुचल जाता था, दूसरी में बच्चा ही गायब।

भैरव ने हरनाम की गर्दन पकड़कर उसे जलती भट्ठी के पास धकेल दिया।

“अगर उस बच्चे की एक उंगली भी टूटी,” उसने धीमे स्वर में कहा, “तो तेरी पूरी दुकान राख कर दूँगा।”

और उसी पल गौरी ने देखा—जिस आदमी को वह मालिक समझ रही थी, वह शायद उसके बच्चे के लिए मौत से लड़ने जा रहा था।

भाग 3

कालीधार खदान पहाड़ की छाती पर काले जख्म की तरह फैली हुई थी। ऊपर से देखने पर वह सिर्फ टूटी चट्टानों, लोहे की पटरियों और धुएँ का ढेर लगती थी, मगर उसके भीतर मजदूरों की खाँसी, बच्चों की चीखें और मालिकों की बेरहम सीटी दबकर रह जाती थीं।

दोपहर ढल रही थी जब भैरव और गौरी वहाँ पहुँचे। रास्ते भर गौरी ने कुछ नहीं कहा। वह भैरव की पुरानी ऊनी चादर में लिपटी बैठी रही, लेकिन उसके हाथ लगातार काँपते रहे। कभी वह टूटी लकड़ी की कार को छूती, कभी आसमान की तरफ देखती, जैसे भगवान से सौदा कर रही हो—बच्चा लौटा दो, बाकी जिंदगी ले लो।

खदान के बाहर 2 बंदूकधारी चौकीदार खड़े थे। अंदर पत्थर तोड़ने की आवाजें पहाड़ों से टकराकर गूँज रही थीं। धूल इतनी थी कि सूरज भी राख के पीछे छिपा लगता था। एक मोटा मुंशी, जिसकी तोंद कमरबंद से बाहर निकली हुई थी, लकड़ी की मेज पर रजिस्टर खोलकर बैठा था। उसने भैरव को ऊपर से नीचे तक देखा।

“कहाँ घुसे जा रहे हो?”

भैरव ने शांत स्वर में कहा, “एक बच्चा चाहिए। नाम आरव। उम्र 5 साल। उसे हरनाम लोहार ने यहाँ भेजा था।”

मुंशी हँसा। “यहाँ बच्चे नाम से नहीं, हिसाब से पहचाने जाते हैं। जिसके कागज हैं, वही मालिक है।”

गौरी आगे बढ़ी। “वो मेरा बेटा है।”

मुंशी ने उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे कोई कीड़े को देखता है। “माँ होने से कर्ज़ नहीं कटता।”

भैरव ने एक कदम आगे रखा। चौकीदारों ने बंदूकें थोड़ी ऊपर उठाईं। हवा में अचानक तनाव जम गया। भैरव ने न आवाज ऊँची की, न हथियार निकाला। बस मुंशी की आँखों में देखकर बोला, “कागज बाद में देखेंगे। पहले बच्चा देखेंगे।”

मुंशी ने मेज से डंडा उठाया। “यहाँ तेरे पहाड़ी रौब से काम नहीं चलेगा।”

उसने डंडा घुमाया, पर भैरव पहले ही बढ़ चुका था। उसने मुंशी की कलाई पकड़ी, डंडा नीचे गिराया और उसे मेज पर इस तरह पटका कि रजिस्टर धूल में बिखर गया। चौकीदारों ने बंदूक तानी, मगर भैरव की चाल बिजली जैसी थी। उसने पास पड़ी लोहे की जंजीर झटके से उठाई और एक बंदूक की नली नीचे फँसा दी। दूसरी बंदूक पर उसने पैर मारकर उसे कीचड़ में गिरा दिया।

“जिसे घर जाना है, पीछे हट जाए,” भैरव ने कहा।

दोनों चौकीदार एक-दूसरे को देखने लगे। वे मजदूरों को डराने के लिए रखे गए थे, मरने के लिए नहीं। वे धीरे-धीरे पीछे हट गए।

गौरी खदान के मुँह की तरफ भागी।

अंदर अँधेरा और धूल थी। छोटी-छोटी लालटेनें टँगी थीं, जिनकी रोशनी पत्थर की दीवारों पर काँप रही थी। कई बच्चे फटे कपड़ों में बैठकर छोटे पत्थर छाँट रहे थे। कुछ के हाथ पट्टी से बँधे थे, कुछ की आँखें धूल से सूजी हुई थीं। गौरी एक-एक चेहरे को देखती चली गई।

“आरव!” उसकी आवाज सुरंग में फट पड़ी। “आरव बेटा!”

किसी बच्चे ने सिर उठाया। कोई नहीं बोला। एक बूढ़ा मजदूर पास आया और फुसफुसाया, “आज सुबह एक छोटा बच्चा ऊपर वाली सँकरी सुरंग में भेजा था। चट्टान अटक गई थी।”

गौरी का शरीर जैसे पत्थर हो गया।

भैरव ने बूढ़े से पूछा, “किधर?”

बूढ़े ने काँपते हाथ से ऊपर की तरफ इशारा किया। “वहाँ जाना मौत है। रास्ता बहुत तंग है। अभी थोड़ी देर पहले भीतर से आवाज भी बंद हो गई।”

गौरी ने सुनते ही दौड़ लगा दी। भैरव ने उसे पकड़कर रोका। “तू अंदर नहीं जाएगी।”

“वो मेरा बच्चा है!” गौरी चीखी। “मेरे बिना डर जाएगा।”

भैरव ने पहली बार उसका कंधा मजबूती से पकड़ा, मगर उसमें हिंसा नहीं थी, सिर्फ सुरक्षा थी। “वह अब डरने के लिए अकेला नहीं है। मैं जा रहा हूँ।”

सुरंग सचमुच आदमी के लिए नहीं बनी थी। भैरव जैसा लंबा आदमी उसमें मुश्किल से घुस सकता था। घुटनों और कोहनियों पर रेंगते हुए वह भीतर बढ़ा। ऊपर से धूल गिर रही थी। कहीं-कहीं पत्थर खिसकते, तो पूरी सुरंग काँप उठती। बाहर गौरी रोते-रोते भगवान शिव का नाम जप रही थी।

“आरव!” भैरव ने अँधेरे में पुकारा। “बेटा, आवाज दे।”

काफी देर तक कोई उत्तर नहीं आया। फिर बहुत अंदर से धीमी-सी सिसकी सुनाई दी।

“माँ…”

भैरव की साँस अटक गई। उसने और तेज रेंगना शुरू किया। उसकी हथेलियाँ छिल गईं, कोहनियों से खून निकल आया, मगर वह रुका नहीं। कुछ दूर जाकर उसने लालटेन की कम रोशनी में एक नन्हा शरीर देखा। आरव एक टूटे लकड़ी के पटरे के नीचे फँसा था। उसके गाल धूल से काले थे, आँखों के नीचे आँसू की सफेद रेखाएँ बनी थीं, और छोटी उंगलियाँ पत्थरों के बीच बुरी तरह छिली हुई थीं।

“तू आरव है?” भैरव ने धीमे से पूछा।

बच्चे ने डरकर सिर हिलाया। “माँ आई है?”

“हाँ,” भैरव ने कहा। “तुम्हारी माँ बाहर खड़ी है। बहुत गुस्सा है कि तुमने इतनी धूल खा ली।”

आरव की आँखों में पहली बार हल्की चमक आई। “सच?”

“पहाड़ कभी झूठ नहीं बोलता।”

भैरव ने पटरा हटाने की कोशिश की। वह अटका हुआ था। ऊपर की चट्टान दबाव बना रही थी। अगर जोर गलत लगा, तो पूरी सुरंग गिर सकती थी। उसने गहरी साँस ली, अपना कंधा पटरे के नीचे लगाया और पूरी ताकत से धक्का दिया। लकड़ी चरमराई। पत्थर गिरे। एक बड़ा टुकड़ा उसकी पीठ पर आ लगा, मगर उसने दाँत भींच लिए।

“अब निकल,” उसने बच्चे से कहा।

आरव हिला नहीं। “डर लग रहा है।”

भैरव ने हाथ बढ़ाया। “मेरा हाथ पकड़। तेरी माँ ने मुझे भेजा है।”

बच्चे ने काँपते हुए उसका हाथ पकड़ लिया।

जब भैरव आरव को सीने से लगाए सुरंग से बाहर निकला, गौरी ने ऐसी चीख मारी जैसे उसकी आत्मा शरीर में लौट आई हो। वह कीचड़ और पत्थरों पर गिरती-पड़ती बच्चे तक पहुँची। उसने आरव को बाँहों में भर लिया, उसके बालों, गालों, आँखों, हाथों को चूमती रही।

“मेरे लाल… मेरी जान… माँ आ गई… देख, माँ आ गई…”

आरव उसके गले से चिपक गया। “माँ, मैंने रोया नहीं।”

गौरी टूटकर रो पड़ी। “तू जितना चाहे रो सकता है बेटा। अब कोई तुझे चुप कराने नहीं मारेगा।”

खदान के मजदूर चुप खड़े थे। उन चुप चेहरों पर पहली बार डर से ज्यादा उम्मीद दिखाई दे रही थी। मुंशी बाहर से भागने की कोशिश कर रहा था, मगर हरनाम लोहार भीड़ में पकड़ा गया था। खबर फैल चुकी थी कि बच्चों को कर्ज़ में बेचकर खदान में झोंका जा रहा है। उसी शाम तहसील से पुलिस पहुँची। रजिस्टरों में कई झूठे ठेके मिले। कई बच्चों के नामों के सामने सिर्फ रकम लिखी थी—2 रुपये, 5 रुपये, 12 रुपये।

भैरव ने कोई भाषण नहीं दिया। उसने बस इतना किया कि गौरी और आरव को अपनी घोड़ी पर बैठाया और वापस पहाड़ की तरफ चल पड़ा।

रास्ते भर आरव गौरी की गोद में सोता-जागता रहा। बीच-बीच में वह भैरव को देखता, फिर माँ के कान में पूछता, “ये कौन हैं?”

गौरी हर बार कहती, “जिसने तेरी माँ को रास्ता दिखाया।”

भैरव सुनता रहा, मगर कुछ नहीं बोला।

पहाड़ी घर पहुँचते-पहुँचते रात गहरा चुकी थी। चूल्हे की राख ठंडी थी, लकड़ियाँ भीगी हुई थीं, और घर वैसा ही खाली था जैसा हमेशा रहा था। मगर उस रात पहली बार वह खाली नहीं लगा। गौरी ने आरव को खाट पर लिटाया। बच्चा नींद में भी उसकी साड़ी का पल्लू पकड़े रहा। भैरव ने चुपचाप पानी गरम किया, पट्टी निकाली और बच्चे के हाथ साफ किए।

आरव दर्द से सिहरता, तो भैरव कहता, “बहादुर लोग आवाज नहीं दबाते। दर्द हो तो बता।”

बच्चे ने धीरे से पूछा, “आप डाँटोगे नहीं?”

भैरव का गला भर आया। “नहीं।”

गौरी दरवाजे के पास खड़ी यह सब देखती रही। उसके मन में सालों से जमा हुआ डर धीरे-धीरे पिघल रहा था। वह समझ रही थी कि दुनिया में हर मर्द रघु जैसा नहीं होता। कुछ आदमी तूफान की तरह आते हैं, मगर घर बचाने के लिए।

दिन बीतने लगे।

सर्दी कठोर थी। पहाड़ पर बर्फ जमी रहती, रास्ते बंद हो गए। गौरी ने घर सँभालना शुरू किया। वह भैरव की बात मानकर आराम करना चाहती थी, मगर उसके हाथ काम के बिना रुकते नहीं थे। वह सुबह चूल्हा जलाती, दाल पकाती, सूखी मक्की की रोटी बनाती, आरव को नहलाती, उसके बालों में तेल लगाती। धीरे-धीरे बच्चे के गालों पर रंग लौटने लगा।

आरव पहले भैरव से डरता था। वह उसके भारी कदमों की आवाज सुनकर माँ के पीछे छिप जाता। मगर एक दिन जब बाहर लकड़ी काटते हुए भैरव ने उसे छोटी-सी लकड़ी की बैलगाड़ी बनाकर दी, बच्चा देर तक उसे घूरता रहा।

“मेरी पुरानी कार टूट गई थी,” आरव ने कहा।

भैरव ने गंभीरता से सिर हिलाया। “यह वाली पहाड़ चढ़ सकती है।”

उस दिन से आरव शाम को भैरव के पास बैठने लगा। वह उससे पूछता, “बर्फ क्यों गिरती है?” “तेंदुआ रात में देख सकता है?” “अगर आदमी रास्ता भूल जाए तो पहाड़ उसे खा जाता है?”

भैरव हर सवाल का जवाब देता। कभी छोटे में, कभी कहानी बनाकर। गौरी यह सब दूर से देखती और उसके चेहरे पर ऐसी शांति उतरती, जो उसने शायद बचपन के बाद महसूस नहीं की थी।

मगर भीतर एक बात दोनों को परेशान करती रही।

वसंत आने पर रास्ते खुलने वाले थे। भैरव ने गौरी से वादा किया था कि वह उसे और आरव को नीचे शहर तक छोड़ देगा। वहाँ से वे कहीं भी जा सकते थे—कांगड़ा, दिल्ली, वाराणसी, जहाँ कोई उन्हें रघु की परछाईं से न पहचाने।

जब बर्फ पिघलनी शुरू हुई, नाले गरजने लगे और देवदार की शाखों से पानी टपकने लगा। एक सुबह भैरव ने आँगन में खच्चर तैयार किया। उस पर राशन, कंबल और एक छोटी थैली बाँधी। गौरी ने देखा तो समझ गई।

भैरव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “नीचे की सड़क खुल गई है। डाकगाड़ी आज दोपहर गुज़रेगी। मैंने पैसे रख दिए हैं। तू और आरव शहर जा सकते हो। नया जीवन शुरू कर।”

गौरी ने कुछ देर तक उसे देखा। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न आश्चर्य। बस एक गहरी थकान और उससे भी गहरी स्पष्टता।

“तुझे लगता है हम बोझ हैं?” उसने पूछा।

भैरव ने तुरंत सिर उठाया। “नहीं।”

“तो हमें भेज क्यों रहा है?”

“क्योंकि मैंने वादा किया था। तुझे आजाद करना था।”

गौरी ने अपनी पोटली खोली। उसमें वही टूटी लकड़ी की कार थी, जो कभी आरव की थी। उसने उसे आँगन के पत्थर पर रख दिया।

“उस रात मैंने कहा था कि बच्चा लौटा दे, तो जिंदगी भर तेरे लिए काम करूँगी,” गौरी ने कहा। “लेकिन आज मैं वह बात वापस लेती हूँ।”

भैरव की आँखों में दर्द उतर आया। “अच्छा है। तुझे किसी का कर्ज़ नहीं चुकाना।”

गौरी उसके करीब आई। “मैं कर्ज़ चुकाने नहीं रुकना चाहती।”

भैरव स्थिर खड़ा रहा।

गौरी ने पहली बार अपने हाथ से उसके चेहरे का पुराना निशान छुआ। वह स्पर्श इतना हल्का था कि भैरव जैसे पहाड़ का आदमी भी भीतर से काँप गया।

“मैं इसलिए रुकना चाहती हूँ,” गौरी ने धीमे से कहा, “क्योंकि मेरे बेटे ने पहली बार किसी आदमी को देखकर भागना छोड़ा है। क्योंकि इस घर में पहली बार मुझे नींद आई है। क्योंकि तूने मुझे खरीदा नहीं, मुझे इंसान माना। और क्योंकि आरव को ऐसा आदमी चाहिए जो उसे डर से नहीं, सहारे से बड़ा करे।”

उसी समय आरव बाहर भागता हुआ आया। उसके हाथ में भैरव की बनाई लकड़ी की बैलगाड़ी थी। वह दोनों को देखकर रुक गया।

“हम जा रहे हैं?” उसने पूछा।

भैरव ने जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें गौरी पर थीं।

गौरी घुटनों के बल बैठी। “अगर तू जाना चाहे तो जाएंगे बेटा।”

आरव ने भैरव की तरफ देखा। “बाबा भी चलेंगे?”

आँगन में गहरी चुप्पी उतर आई।

भैरव ने जैसे बहुत सालों बाद साँस लेना सीखा। “अगर तुम्हारी माँ चाहे,” उसने भारी आवाज़ में कहा।

आरव दौड़कर उससे लिपट गया। “मैं यहीं रहूँगा।”

गौरी की आँखों से आँसू बह निकले, मगर इस बार उनमें टूटन नहीं थी। यह राहत थी। यह घर मिल जाने का रोना था।

भैरव ने बच्चे को उठाया। फिर उसने गौरी की तरफ हाथ बढ़ाया। गौरी ने वह हाथ थाम लिया। पहाड़ के ऊपर सुबह की धूप फैल रही थी। नीचे की दुनिया अब भी वैसी ही बेरहम होगी—साहूकार, कर्ज़, झूठे ठेके, शराबखाने और भूखे आदमी। मगर उस छोटे-से घर में 3 लोग खड़े थे, जिनके पास अब एक-दूसरे का नाम था।

कुछ महीने बाद धनगढ़ के लोग कहते थे कि ऊपर पहाड़ी पर रहने वाला खामोश भैरव अब बाजार आता है तो उसके साथ एक औरत चलती है, सिर ऊँचा करके। और एक बच्चा होता है जो हर किसी से कहता है, “मेरे बाबा पहाड़ से भी मजबूत हैं।”

रघु कभी वापस नहीं आया। हरनाम की भट्ठी सील हो गई। कालीधार खदान से कई बच्चे छुड़ाए गए। मगर गौरी के लिए सबसे बड़ा न्याय अदालत की मुहर नहीं था।

सबसे बड़ा न्याय वह शाम थी, जब आरव बर्फ में खेलते-खेलते गिरा, रोते हुए भैरव की तरफ भागा और बिना सोचे उसकी छाती से चिपक गया।

भैरव ने उसे उठाकर कहा, “कुछ नहीं हुआ। पहाड़ के बच्चे ऐसे ही मजबूत होते हैं।”

गौरी ने दरवाजे से यह दृश्य देखा। चूल्हे पर दाल उबल रही थी, हवा में देवदार की खुशबू थी, और उसके भीतर बरसों से जमा डर आखिरकार शांत हो चुका था।

उसने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा—जिस दिन दुनिया ने उसकी कीमत 20 रुपये लगाई थी, उसी दिन किस्मत ने उसे वह घर दे दिया था जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.