
भाग 1
अरमान राठौड़ की अंतिम विदाई में जब एक मामूली कैटरिंग लड़की ने उसके ताबूत पर झुककर चिल्लाया कि वह मरा नहीं है, तो पूरा मुंबई दरबार उसे पागल समझकर घूरने लगा।
सफेद संगमरमर से चमकते राठौड़ हाउस के विशाल हॉल में उस शाम मौत से ज्यादा डर फैला हुआ था। छत से लटकते झूमर, सफेद गुलाबों की कतारें, चंदन और अगरबत्ती की मिली-जुली गंध, काले कपड़ों में खड़े उद्योगपति, नेता, फिल्मी चेहरे और ऐसे आदमी जिनकी कमर के पास जैकेट थोड़ी भारी दिख रही थी।
नंदिनी मिश्रा वहाँ बस एक सर्विस गर्ल थी। 26 साल की, दिल्ली से भागकर मुंबई आई हुई, 3 नौकरियाँ करके बांद्रा के छोटे से कमरे का किराया भरने वाली लड़की। उसे सिखाया गया था कि अमीर लोगों की पार्टियों में आँखें नीचे रखो, ट्रे सीधी रखो और खुद को हवा बना दो।
लेकिन उस दिन हवा भी कांप रही थी।
अरमान राठौड़, 38 साल का, राठौड़ ग्रुप का मालिक, आधा वैध कारोबारी और आधा ऐसा नाम जिसे लोग धीरे बोलते थे, आज उसी हॉल के बीचोंबीच खुले ताबूत में लेटा था। अखबारों ने लिखा था, “दिल का दौरा।” शहर ने फुसफुसाकर कहा था, “किसी ने खेल किया है।”
नंदिनी शैम्पेन के ग्लास लिए भीड़ के बीच से गुजर रही थी, जब सफेद बालों वाले एक बूढ़े आदमी ने उसका रास्ता रोककर कहा—
—ताबूत के पास वाले फूल ठीक करो। कुछ गुलाब मुरझा रहे हैं।
—सर, मैं ड्रिंक्स सर्व कर रही हूँ।
उसकी ठंडी आँखें नंदिनी के चेहरे पर टिक गईं।
—अब फूल ठीक कर रही हो।
नंदिनी ने ट्रे रखी और काँपते कदमों से ताबूत की ओर बढ़ गई। उसे मृत देह देखने की आदत नहीं थी। उसके माता-पिता का अंतिम संस्कार जल्दी में हुआ था, बंद लकड़ी के बक्से में। उसने अरमान के चेहरे की ओर न देखने की कोशिश की, लेकिन आँखें खुद खिंच गईं।
वह मरकर भी खतरनाक सुंदर लग रहा था। गेहुँआ चेहरा, तीखी नाक, पीछे कंघी किए बाल, काले बंदगला सूट में जैसे कोई राजा अपनी ही हार देखकर सो गया हो।
नंदिनी ने एक मुरझाया गुलाब हटाया। तभी उसने देखा।
अरमान का गला हल्का सा हिला।
पहले उसे लगा रोशनी का धोखा है। फिर उसके सीने ने बहुत धीमे से उठकर गिरना शुरू किया।
उसका पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।
वह और झुकी। कांपती उँगलियाँ अरमान की गर्दन तक पहुँचीं। त्वचा गर्म थी। और वहाँ, बहुत धीमी, बहुत कमजोर, पर साफ धड़कन थी।
—ये जिंदा हैं, नंदिनी के मुँह से फुसफुसाहट निकली।
किसी ने नहीं सुना।
उसने फिर कहा—
—ये जिंदा हैं।
अब कुछ चेहरों ने उसकी ओर देखा। तिरस्कार, झुंझलाहट, शक।
—ये जिंदा हैं! इन्हें दफनाइए मत!
हॉल अचानक शांत हो गया।
किसी ने गरजकर कहा—
—इस लड़की को हटाओ!
दो आदमियों ने नंदिनी की बाँहें पकड़ लीं। वह छटपटाई।
—इनकी नब्ज चल रही है! प्लीज, कोई डॉक्टर बुलाइए!
तभी ताबूत के भीतर पड़े अरमान राठौड़ की आँखें खुल गईं।
गहरी शहद-सी आँखें सीधे नंदिनी पर टिक गईं। पूरे हॉल में चीखें गूँज उठीं। कुछ लोग पीछे हटे, कुछ ने भगवान का नाम लिया, कुछ के चेहरों पर डर ऐसा उभरा जैसे मुर्दा नहीं, उनका राज उठ बैठा हो।
अरमान ने गहरी साँस ली। फिर भारी आवाज में पूछा—
—तुम कौन हो?
नंदिनी की आवाज अटक गई।
—नंदिनी… नंदिनी मिश्रा। मैं बस कैटरिंग स्टाफ हूँ।
अरमान ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ कमजोर नहीं थी।
—तुमने कैसे जाना?
—आप साँस ले रहे थे। सब लोग देख रहे थे, पर किसी ने देखा ही नहीं।
अरमान धीरे-धीरे ताबूत में बैठ गया। फूल उसके कंधों से नीचे गिरने लगे। उसने भीड़ की ओर देखा, और एक पल में शोकसभा अदालत बन गई।
—दरवाजे बंद करो। कोई बाहर नहीं जाएगा। जिसने मुझे जिंदा दफनाने की कोशिश की है, वह इसी घर में है।
नंदिनी का दिल जैसे रुक गया।
वह पीछे हटना चाहती थी, भागना चाहती थी, लेकिन अरमान ने उसकी कलाई छोड़ी नहीं। उसकी आँखों में आभार नहीं था, शक था। और उस शक में एक अजीब सा खिंचाव भी।
—तुम भी यहीं रहोगी, उसने धीमे से कहा।
—क्यों?
अरमान ने उसके काँपते चेहरे को देखा।
—क्योंकि या तो तुमने मेरी जान बचाई है… या तुम उस साजिश का हिस्सा हो जिसने मुझे लगभग मार दिया।
भाग 2
डॉक्टर 20 मिनट में पहुँचे। हॉल खाली कराया जा चुका था, लेकिन बाहर बंद दरवाजों के पीछे शहर के सबसे ताकतवर लोग कैद मेहमानों की तरह खड़े थे। डॉक्टर ने अरमान की नब्ज, आँखें, साँस और खून की जाँच की। कुछ देर बाद उसका चेहरा पीला पड़ गया।
—इन्हें जहर दिया गया था। ऐसा जहर जो मौत जैसा असर दिखाता है। दिल की धड़कन इतनी धीमी हो जाती है कि आदमी मृत लगने लगता है। 2 घंटे और बीतते, तो ये सच में दम घुटने से मर जाते।
नंदिनी को उल्टी जैसा लगा। किसी ने पूरा इंतजाम किया था—दिल का दौरा, डॉक्टर की घोषणा, अंतिम दर्शन, फिर दफनाना।
अरमान ने अपने सुरक्षा प्रमुख कबीर को बुलाया।
—मेरे कमरे, मेरी शराब, मेरी दवाइयाँ, सबकी जाँच करो। और नंदिनी पर 24 घंटे पहरा लगाओ।
—नहीं, नंदिनी ने तुरंत कहा। मुझे कल काम पर जाना है। मैं इस सबमें नहीं पड़ सकती।
अरमान उसके सामने आ खड़ा हुआ।
—तुम पड़ चुकी हो। जिसने मुझे मारने की कोशिश की, अब तुम्हें भी रास्ते से हटाना चाहेगा।
रात में उसे राठौड़ हाउस के एक कमरे में रखा गया, जो उसके पूरे किराए के कमरे से 4 गुना बड़ा था। खिड़की के बाहर हथियारबंद गार्ड खड़े थे। अंदर रेशमी चादरें थीं, पर नंदिनी को वह कमरा सोने का पिंजरा लगा।
सुबह अरमान खुद कॉफी लेकर आया। वह अब ताबूत वाला आदमी नहीं, बल्कि काले कुर्ते में खड़ा जिंदा तूफान लग रहा था।
—तुमने कल डरकर भी आवाज उठाई, उसने कहा। क्यों?
—क्योंकि किसी को जिंदा दफनाना पाप है। चाहे वह अच्छा आदमी हो या बुरा।
अरमान पहली बार चुप हो गया।
तीसरे दिन उसे पता चला कि अरमान की मौसी की बेटी ईशा, उससे शादी करना चाहती थी। उसके पिता चाहते थे कि राठौड़ साम्राज्य उनके हाथ में आए। अरमान ने मना कर दिया था।
उसी शाम कबीर दौड़ता हुआ आया।
—सर, जहर आपकी निजी व्हिस्की में था। बोतल घर के अंदर से बदली गई थी।
अरमान की आँखें पत्थर हो गईं।
तभी नंदिनी के फोन पर अनजान नंबर से संदेश आया—
“जिसे बचाया है, उसी की वजह से मरेगी।”
भाग 3
उस संदेश को पढ़ते ही नंदिनी के हाथ से फोन गिर गया। कमरे की सफेद दीवारें अचानक बहुत दूर लगने लगीं। वह जिस दुनिया को बाहर से सिर्फ अफवाहों में जानती थी, अब उसी की दीवारों के भीतर फँस चुकी थी।
अरमान ने फोन उठाया। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, एक भयानक शांति उतर आई।
—कबीर, नंबर ट्रेस करो। अभी।
नंदिनी ने काँपती आवाज में कहा—
—मुझे घर जाना है।
—घर? अरमान ने उसकी ओर देखा। तुम्हारा वह कमरा जहाँ दरवाजे की कुंडी आधी टूटी है? जहाँ नीचे पानवाला भी जानता है कि तुम अकेली रहती हो?
नंदिनी ने हैरानी से उसे देखा।
—आपने मेरी जाँच करवाई?
—हाँ।
—मेरी जिंदगी कोई फाइल नहीं है।
—मेरी भी लाश कोई सजावट नहीं थी, नंदिनी।
दोनों कुछ देर एक-दूसरे को देखते रहे। उस पल उनके बीच डर भी था, गुस्सा भी, और कुछ ऐसा भी जो दोनों स्वीकार नहीं करना चाहते थे।
नंदिनी ने धीरे से कहा—
—मैं गरीब हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपकी मिल्कियत हूँ।
अरमान के चेहरे पर पहली बार चोट दिखाई दी।
—मैंने तुम्हें खरीदा नहीं। मैं तुम्हें बचा रहा हूँ।
—बचाने और कैद करने में फर्क होता है।
अरमान ने जवाब नहीं दिया। वह खिड़की के पास चला गया। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। मुंबई की बारिश, जो अमीरों की बालकनी पर सुंदर और गरीबों की छत पर मुसीबत लगती है।
कुछ देर बाद उसने कहा—
—जब मैं 16 साल का था, मेरे पिता को मेरे सामने गोली मारी गई थी। मेरी माँ उसी रात इस घर से चली गईं। रिश्तेदारों ने मुझे बेटा नहीं, कुर्सी समझा। मैंने सीखा कि जिस चीज को बचाना हो, उसे दीवारों के भीतर रखो।
नंदिनी का गुस्सा थोड़ा पिघला, पर पूरी तरह नहीं।
—मैं चीज नहीं हूँ।
अरमान पलटा।
—इसलिए डरता हूँ। चीजें खो जाएँ तो खरीदी जा सकती हैं। इंसान खो जाएँ तो आदमी भीतर से खाली हो जाता है।
नंदिनी ने पहली बार उसके चेहरे पर वह अकेलापन देखा जो महंगे सूट, सुरक्षा, गाड़ियों और शक्ति के पीछे दबा हुआ था। वह आदमी जिसने शहर को डराया, खुद हमेशा किसी के विश्वासघात से डरा हुआ जी रहा था।
उसी रात हॉल में फिर शोर उठा। नंदिनी कमरे से बाहर आई तो नीचे अरमान, कबीर, उसकी बहन सिया और परिवार के कुछ लोग खड़े थे। बीच में एक आदमी घुटनों पर था। उसका नाम महेंद्र मेहता था—ईशा का पिता और राठौड़ परिवार का पुराना कारोबारी साझेदार।
उसका चेहरा सूजा हुआ था, आँखों में हार थी।
—बोल, अरमान ने ठंडी आवाज में कहा। सबके सामने बोल।
महेंद्र रो पड़ा।
—मैंने नहीं चाहा था बात यहाँ तक पहुँचे। ईशा पागल हो गई थी। वह कहती थी अगर अरमान उसका नहीं हुआ तो किसी का नहीं होगा। हमने सोचा कुछ घंटों में दफना दिया जाएगा। फिर दोष वर्मा परिवार पर डाल देंगे। तुम्हारे लोग उनसे लड़ेंगे, दोनों तरफ नुकसान होगा, और हमारे लिए रास्ता खुल जाएगा।
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह सिर्फ प्रेम या अपमान नहीं था। यह सत्ता का खेल था, जिसमें एक आदमी को जिंदा दफनाकर साम्राज्य बाँटना था।
अरमान ने पूछा—
—ईशा कहाँ है?
महेंद्र चुप रहा।
कबीर ने उसकी गर्दन पकड़ी।
—बोल।
—अलीबाग वाले फार्महाउस में, महेंद्र चीख पड़ा। वह आज रात दुबई भागने वाली है।
सिया ने अरमान का हाथ पकड़ा।
—भैया, पुलिस को दो।
अरमान हँसा नहीं। उसकी आँखों में कोई नरमी नहीं थी।
—कानून उन लोगों के लिए है जो कानून से डरते हैं।
नंदिनी ने पहली बार उसकी दुनिया की असल सूरत साफ देखी। यह वह आदमी था जो कॉफी बनाकर उसके कमरे तक आया था। वही आदमी अब किसी की मौत का फैसला आँख झपकाए बिना कर सकता था।
अरमान जाने लगा तो नंदिनी ने उसका रास्ता रोक लिया।
—अगर तुमने उसे मार दिया, तो तुम्हारे दुश्मन कम होंगे, पर तुम भीतर से और काले हो जाओगे।
—तुम नहीं समझती।
—समझती हूँ। उसने तुम्हें मारने की कोशिश की। मुझे भी धमकाया। लेकिन अगर तुम्हारी नई जिंदगी वही पुरानी मौतों से शुरू हुई, तो उस ताबूत से बाहर आने का मतलब क्या था?
हॉल में सन्नाटा छा गया। कोई लड़की, वह भी कैटरिंग वाली, अरमान राठौड़ को इस तरह रोक रही थी। कुछ चेहरों पर तिरस्कार था, कुछ पर हैरानी।
अरमान बहुत देर तक उसे देखता रहा।
—अगर मैं उसे छोड़ दूँ, तो लोग समझेंगे मैं कमजोर हो गया।
—अगर तुम उसे कानून के हवाले कर दो, तो लोग समझेंगे तुम इतना ताकतवर हो कि बदला लेने के लिए भी हाथ गंदे करने की जरूरत नहीं।
सिया की आँखें भर आईं। कबीर ने पहली बार नंदिनी को सम्मान से देखा।
अरमान ने धीरे से फोन निकाला।
—कमिश्नर देशमुख को कॉल लगाओ।
उस रात ईशा अलीबाग फार्महाउस से पकड़ी गई। उसके बैग में नकली पासपोर्ट, विदेशी मुद्रा, जहर की बची हुई शीशी और नंदिनी की फोटो मिली। महेंद्र ने बयान दिया। डॉक्टर जिसने मौत का प्रमाणपत्र दिया था, उसने कबूल किया कि उसे 50 लाख और धमकी दोनों मिले थे। मीडिया ने अगले दिन इसे “राठौड़ हाउस का जिंदा शव कांड” कहा।
लेकिन उस रात जब अरमान वापस लौटा, वह जीतकर लौटे राजा जैसा नहीं लग रहा था। वह थका हुआ था। भीतर से हिला हुआ।
नंदिनी बरामदे में उसका इंतजार कर रही थी। बारिश थम चुकी थी। भीगे पेड़ों से पानी टपक रहा था।
—वह जेल जाएगी, अरमान ने कहा। लंबी सजा होगी।
—और तुम?
—मैं शायद पहली बार रात को बिना किसी की चीख सुने सो पाऊँगा।
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
—तुम बदल सकते हो।
अरमान ने फीकी मुस्कान दी।
—तुम्हें लगता है लोग बदलते हैं?
—लोग नहीं। लेकिन कभी-कभी कोई एक आदमी किसी एक आदमी के लिए बदलने की कोशिश करता है।
उस रात उनके बीच कोई फिल्मी इकरार नहीं हुआ। नंदिनी ने बस उसका हाथ पकड़ा। पहली बार अरमान ने किसी का हाथ ऐसे पकड़ा जैसे आदेश नहीं, सहारा माँग रहा हो।
अगले कुछ हफ्ते राठौड़ हाउस बदलने लगा। सुरक्षा कम नहीं हुई, मगर डर थोड़ा कम हुआ। अरमान ने अपने वैध कारोबार को अलग करना शुरू किया। रेस्टोरेंट चेन, होटल सप्लाई, इवेंट कंपनी—इन सबकी जिम्मेदारी नंदिनी और सिया को दी गई। नंदिनी ने कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़वाई, सर्विस स्टाफ के लिए मेडिकल फंड बनवाया, और सबसे पहले यह नियम लिखवाया कि कोई कर्मचारी किसी अमीर मेहमान की बेइज्जती चुपचाप सहने को मजबूर नहीं होगा।
राठौड़ परिवार के बुजुर्गों को यह पसंद नहीं आया।
एक रात चाचा देवेंद्र ने डिनर टेबल पर ताना मारा—
—कल तक जो लड़की ट्रे उठाती थी, आज हमें कारोबार सिखाएगी?
नंदिनी चुप रही। अरमान ने चाकू-छुरी रख दी।
—कल तक इसी लड़की ने मेरी नब्ज पकड़ी थी। तुम सब मेरे गहने गिन रहे थे।
चाचा का चेहरा उतर गया।
—तुम घर की इज्जत एक बाहरी लड़की के नाम कर रहे हो।
अरमान ने नंदिनी की ओर देखा।
—घर की इज्जत खून से नहीं, कर्म से तय होती है। और इस घर में सबसे सच्चा कर्म उसी ने किया था।
नंदिनी को पहली बार लगा कि वह सिर्फ बचाई जा रही लड़की नहीं रही। वह इस कहानी की गवाह भी थी, कारण भी, और अब बदलाव की शुरुआत भी।
मगर उसका अपना डर आसानी से नहीं गया। कई रातों को वह नींद से उठ बैठती, सपने में फिर वही ताबूत, वही फूल, वही धीमी धड़कन सुनाई देती। अरमान उसे बाँहों में भर लेता और कहता—
—मैं यहाँ हूँ।
एक रात नंदिनी ने पूछा—
—अगर उस दिन मैं आवाज नहीं उठाती तो?
अरमान ने उसकी पेशानी चूमी।
—तो मैं मिट्टी के नीचे होता। और तुम शायद आज भी सोच रही होती कि तुम्हारी आवाज का कोई मतलब नहीं है।
—मेरी आवाज काँप रही थी।
—पर निकली थी।
यही बात नंदिनी के भीतर गहराई तक उतर गई।
6 महीने बाद राठौड़ ग्रुप की पहली आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें अरमान ने अपने अवैध धंधों से दूरी बनाने, सभी रेस्टोरेंट और होटल कारोबार को पारदर्शी करने और कर्मचारियों के लिए ट्रस्ट बनाने की घोषणा की। लोग बोले यह छवि सुधारने का नाटक है। कुछ बोले अरमान डर गया। कुछ बोले वह प्यार में कमजोर हो गया।
पर नंदिनी जानती थी, यह कमजोरी नहीं थी। यह उस आदमी का पहला सच था जिसने मौत का स्वाद ताबूत में चख लिया था और दूसरी जिंदगी किसी की साहसी आवाज से पाई थी।
उसी शाम अरमान ने उसे छत पर बुलाया। नीचे मुंबई रोशनी से भरी थी। अरब सागर दूर अँधेरे में चमक रहा था।
सफेद फूलों से छोटी सी जगह सजाई गई थी। नंदिनी ठिठक गई।
—ये क्या है?
अरमान ने जेब से एक पुरानी-सी अंगूठी निकाली। बहुत भारी हीरे वाली नहीं, बल्कि सोने की पतली अंगूठी, जिसमें हल्का सा घिसाव था।
—मेरी माँ की थी। उन्होंने जाते वक्त बस यही छोड़ा था। तब मैं इतना गुस्से में था कि इसे कभी हाथ नहीं लगाया। आज लगा, इसे सही हाथ मिलना चाहिए।
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
—अरमान…
वह उसके सामने घुटने पर बैठ गया। वही आदमी जिसके सामने शहर झुकता था।
—नंदिनी मिश्रा, तुमने मुझे मौत से खींचकर निकाला। फिर मेरे अंदर के उस आदमी को भी बाहर निकाला जिसे मैं खुद दफना चुका था। मैं आसान आदमी नहीं हूँ। मेरा अतीत साफ नहीं है। मेरा भविष्य भी खतरे से खाली नहीं होगा। लेकिन अगर तुम मेरे साथ चलो, तो मैं हर सुबह यह साबित करने की कोशिश करूँगा कि तुमने उस दिन गलत आदमी को नहीं बचाया।
नंदिनी रोते हुए हँसी।
—तुम्हारी बातें हमेशा धमकी और वचन के बीच क्यों लगती हैं?
—क्योंकि मैं अभी सीख रहा हूँ।
—और अगर मैं ना कह दूँ?
अरमान ने गहरी साँस ली।
—तो मैं तुम्हें सुरक्षित छोड़ दूँगा। नौकरी, घर, पैसा, जो चाहो। लेकिन तुम्हें कभी मजबूर नहीं करूँगा।
नंदिनी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
—मैंने उस दिन तुम्हें इसलिए नहीं बचाया था कि तुम मेरे हो जाओ। मैंने इसलिए बचाया था क्योंकि तुम जिंदा थे। लेकिन अब… अब मैं रहना चाहती हूँ। डर के बावजूद।
अरमान की आँखें भर आईं।
—तो?
—हाँ।
उसने अंगूठी पहनाई। शहर के शोर के बीच दोनों चुप खड़े रहे। कोई शहनाई नहीं, कोई कैमरा नहीं, कोई भीड़ नहीं। बस 2 लोग, जिन्हें एक ताबूत ने मिलाया था।
शादी 3 हफ्ते बाद हुई। राठौड़ हाउस का वही हॉल, जहाँ अरमान की अंतिम विदाई रखी गई थी, अब सफेद और पीले फूलों से सजाया गया था। इस बार अगरबत्ती की गंध में मौत नहीं, नई शुरुआत थी। सिया ने नंदिनी का दुपट्टा ठीक किया। कबीर ने चुपचाप कहा—
—मैडम, उस दिन आपने सिर्फ सर को नहीं बचाया था। शायद इस घर को भी बचा लिया।
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—
—अभी बहुत काम बाकी है।
मंडप में अरमान क्रीम शेरवानी में खड़ा था। उसकी आँखें फिर वही थीं—गहरी, बेचैन, पर इस बार उनमें डर से ज्यादा उम्मीद थी। फेरों के समय उसने धीमे से कहा—
—अगर कभी मेरी पुरानी दुनिया तुम्हें चोट पहुँचाए, तो मुझे रोकना। जैसे उस रात रोका था।
नंदिनी ने जवाब दिया—
—अगर कभी मेरी आवाज काँपे, तो मुझे याद दिलाना कि वह फिर भी मायने रखती है।
शादी के बाद लोग उन्हें ताकते रहे। कोई प्रशंसा से, कोई शक से, कोई जलन से। मगर नंदिनी अब ट्रे पकड़े छाया नहीं थी। वह अरमान के साथ खड़ी थी, बराबर, सीधी, साफ।
1 साल बाद राठौड़ हाउस के पुराने हॉल में फिर फूल लगे। इस बार कोई ताबूत नहीं था। बीच में एक छोटी सी पूजा थी। नंदिनी 8 महीने की गर्भवती थी। अरमान उसके पास बैठा था, उसकी हथेली उसके पेट पर रखी हुई।
बच्चे ने अंदर से हल्की लात मारी। अरमान चौंक गया।
—फिर किया।
नंदिनी हँस पड़ी।
—हाँ, तुम्हारी तरह जिद्दी है।
अरमान ने उसकी आँखों में देखा।
—नहीं। तुम्हारी तरह जिंदा है।
कुछ महीने बाद उनकी बेटी हुई। उसका नाम रखा गया अनाया। जब अरमान ने उसे पहली बार गोद में लिया, वह आदमी जो मौत, कारोबार, दुश्मनी और सत्ता के बीच बड़ा हुआ था, एक नवजात की उँगली पकड़कर रो पड़ा।
सिया ने धीमे से कहा—
—भैया, आप रो रहे हैं।
अरमान ने आँसू पोंछे बिना कहा—
—हाँ। आज डर नहीं लग रहा, इसलिए।
नंदिनी ने अनाया को देखा, फिर अरमान को। उसे याद आया वह दिन, जब उसी आदमी की नब्ज इतनी धीमी थी कि दुनिया ने उसे मृत मान लिया था। अगर उसने उस दिन डरकर मुँह बंद रखा होता, तो यह बच्ची नहीं होती, यह घर नहीं बदलता, यह आदमी फिर से इंसान नहीं बनता।
सालों बाद भी लोग उस घटना को अलग-अलग नाम से याद करते रहे। किसी ने कहा यह साजिश थी। किसी ने कहा चमत्कार। किसी ने कहा एक कैटरिंग लड़की की किस्मत खुल गई।
लेकिन सच इससे बहुत गहरा था।
वह किस्मत नहीं थी। वह एक काँपती हुई आवाज थी, जिसने अमीरों से भरे हॉल में सच बोलने की हिम्मत की थी।
और कभी-कभी एक आवाज, चाहे जितनी छोटी क्यों न हो, किसी को मौत से, किसी घर को अंधेरे से, और किसी कहानी को अंत से वापस ला सकती है।
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