भाग 1:
तेरहवीं की तैयारी के बीच हवेली की रसोई के पीछे खड़ी नैना ने रीना को हँसते हुए कहते सुना कि अगर लाश नहीं मिलेगी, तो जमीन का बँटवारा और भी साफ हो जाएगा।
तांबे के भगोने में चाय उबल रही थी, चूल्हे की लकड़ी आधी भीगी थी और बाहर शिवगढ़ फार्म पर सुबह की धुंध ऐसे पसरी थी जैसे पूरा गाँव किसी पाप को छुपाने में लगा हो। छतरपुर के बाहर फैला यह फार्म 300 बीघे से ज्यादा जमीन, 2 कुओं, 1 पुरानी हवेली, गायों के बड़े बाड़े और पहाड़ी वाले उत्तरी चरागाह के लिए जाना जाता था। लेकिन उस सुबह हर कोना अजीब खामोशी से भरा था, क्योंकि सब मान चुके थे कि ठाकुर प्रताप सिंह मर चुके हैं।
प्रताप सिंह 63 साल के थे। 7 साल पहले उनकी पत्नी शारदा देवी गुजर गई थीं। उसके बाद उन्होंने किसी को अपने दिल के पास नहीं आने दिया। वह कम बोलते थे, हिसाब साफ रखते थे और हर सुबह अँधेरा रहते अपनी काली घोड़ी काजल पर बैठकर फार्म की मेड़ें देखने निकल जाते थे। मज़दूर कहते थे कि इतनी उम्र में अकेले पहाड़ी रास्ते पर जाना ठीक नहीं, पर प्रताप सिंह हमेशा एक ही बात कहते थे।
—जिस जमीन को आँख से नहीं देखा जाए, उसे कागज वाले खा जाते हैं।
नैना यह बात सबसे ज्यादा समझती थी।
नैना 22 साल की थी और पिछले 5 साल से हवेली में काम कर रही थी। वह खाना बनाती, आँगन धोती, गायों के लिए चारा कटवाती, ठाकुर साहब की दवाई रखती और मेहमानों की चाय चुपचाप पहुँचा देती। वह बोल नहीं सकती थी। 15 साल की उम्र में उसके कच्चे घर में आग लगी थी। माँ-बाप उसी आग में चले गए, और धुएँ ने उसके गले से आवाज छीन ली। गाँव के कई लोग समझते थे कि जो बोल नहीं सकती, वह समझती भी नहीं होगी।
लेकिन नैना सब समझती थी।
वह समझती थी कि रीना, जो प्रताप सिंह के भतीजे अजय की पत्नी थी, हवेली में सेवा करने नहीं आई थी। वह भोपाल से बड़ी गाड़ी में आई थी, 4 सूटकेस, महँगे चश्मे और ऐसे सवालों के साथ, जिनमें रिश्तेदारी से ज्यादा लालच था।
—उत्तरी चरागाह का मार्केट रेट क्या चल रहा है?
—रजिस्ट्री की असली फाइल कहाँ रहती है?
—पुराना बैंक लोन बंद हो चुका है या अभी भी कागज में कुछ बचा है?
प्रताप सिंह उसे देखते रहते, जैसे कोई किसान खेत में घुस आई नीलगाय को देखता है—पहले शांत, फिर खतरनाक।
अजय वहाँ नहीं था। रीना कहती थी कि वह काम में फँसा है, बाद में आएगा। मगर 2 हफ्ते बीत गए, अजय नहीं आया। रीना ने हवेली के कमरों की चाबियाँ देखनी शुरू कर दीं। उसने पुराने मुनीम हरिराम से हिसाब माँगा, बाड़े के दाने घटवाए, और मजदूरों के घर भेजे जाने वाले गेहूँ पर सवाल उठाए।
हरिराम काका ने एक दिन धीमे से कहा था।
—बहूरानी, यह व्यवस्था ठाकुर साहब की है। गरीब मज़दूरों के घर का राशन बंद नहीं होता।
रीना मुस्कुराई थी।
—व्यवस्था बदलती रहती है, काका। बूढ़े लोग यादों में रहते हैं, घर चलाने वाले लोग हिसाब में।
नैना उस दिन खिड़की के पास बर्तन माँज रही थी। उसने सिर नहीं उठाया, मगर उसके हाथ ठंडे पड़ गए थे।
फिर वह रात आई, जब पहाड़ पर बादल ऐसे फटे जैसे किसी ने आसमान की सिलाई काट दी हो।
शाम के 6 बजे से पहले ही हवा तेज हो गई। आम के पेड़ झुकने लगे, गायें बेचैन होकर रंभाने लगीं, और काजल बार-बार तबेले की लकड़ी पर खुर मार रही थी। नैना रसोई में अदरक कूट रही थी, तभी उसने प्रताप सिंह को बरामदे से गुजरते देखा। उनके कंधे पर मोटा कंबल था, हाथ में टॉर्च और कमर में पुरानी चमड़े की थैली।
नैना दरवाजे के सामने आकर खड़ी हो गई।
प्रताप सिंह ने उसकी आँखों में चिंता देखी।
—रास्ता खराब है, यह मैं जानता हूँ।
नैना ने दोनों हाथ जोड़कर सिर हिलाया, जैसे कहना चाहती हो कि आज मत जाइए।
प्रताप सिंह ने दूर पहाड़ी की तरफ देखा।
—उत्तरी मेड़ पर पत्थर खिसके हैं। कल पटवारी आने वाला है। आज नहीं देखा तो कल कागज झूठ बोल देगा।
नैना ने फिर रास्ता रोकने की कोशिश की।
उन्होंने पहली बार उसके सिर पर हल्का हाथ रखा।
—डर मत। काजल रास्ता जानती है।
फिर वह बारिश में उतर गए।
रात 10 बजे काजल अकेली लौटी।
घोड़ी की साँस फूल रही थी। लगाम टूटी हुई थी। उसकी पीठ पर काठी तिरछी थी और चमड़े पर सूखा खून लगा था। तबेले का लड़का गोपाल चीख पड़ा। हरिराम काका लालटेन लेकर दौड़े। मजदूरों ने बाँस, रस्सी और टॉर्च उठाई। हवेली में अफरा-तफरी मच गई।
रीना ऊपर के कमरे से उतरी। उसने गहरे हरे रंग की शॉल ओढ़ रखी थी। उसका चेहरा पीला था, मगर उसमें डर नहीं था। वह सीढ़ियों पर खड़ी होकर काजल को देखती रही, जैसे किसी खबर के पूरे होने का इंतजार कर रही हो।
नैना ने वह चेहरा देखा।
उसमें दुख नहीं था।
उसमें हिसाब था।
पूरी रात लोग खोजते रहे। पहाड़ी नाले के पास प्रताप सिंह की पगड़ी मिली। उससे आगे कंटीली झाड़ियों में उनका फटा हुआ कंबल। पानी इतना तेज था कि किसी को नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हुई। तीसरे दिन तक कोई शरीर नहीं मिला।
चौथे दिन पंडित रामस्वरूप हवेली आए।
—जिसका शरीर जल में चला जाए, उसकी आत्मा के लिए पाठ करना ही धर्म है।
हरिराम काका रो पड़े।
गोपाल तबेले में बैठकर काजल की गर्दन सहलाता रहा।
नैना ने रसोई में रखी पीतल की थाली कसकर पकड़ ली।
रीना ने आँचल आँखों पर रखा, मगर उसकी उंगलियों के बीच से सूखी आँखें साफ दिख रही थीं।
उसी दोपहर, जब लोग तेरहवीं, जमीन और वारिस की बात कर रहे थे, नैना ने दफ्तर के पीछे वाले छोटे गलियारे से आवाज सुनी। रीना किसी आदमी से धीमे बोल रही थी। वह आदमी भैरव था, वही चौकीदार जिसे रीना अपने साथ शहर से लाई थी।
—लाश नहीं मिली तो मामला लंबा नहीं जाएगा।
—पुलिस ने अगर पहाड़ी फिर खंगाल ली तो?
—थाने में बात हो चुकी है। अजय का पावर ऑफ अटॉर्नी मेरे पास है। बूढ़े का नाम हटते ही उत्तरी चरागाह बिक जाएगा।
—और अगर कोई पूछे कि मेड़ के पत्थर किसने सरकाए?
रीना की आवाज और ठंडी हो गई।
—जो बोल नहीं सकते, वे गवाही नहीं देते। और जो बोल सकते हैं, उन्हें पैसे देकर चुप कराया जाता है।
नैना की उंगलियाँ दीवार में धँस गईं। उसे पहली बार लगा कि प्रताप सिंह शायद सिर्फ तूफान में नहीं गिरे थे। उन्हें गिराया गया था।
अगली सुबह उसने एक पुरानी टोकरी उठाई। उसमें सूखी रोटियाँ, गुड़, पानी की बोतल, हल्दी, साफ कपड़ा, पट्टियाँ और अपनी छोटी कॉपी रखी। सबको लगा वह पहाड़ी से जड़ी-बूटी लाने जा रही है।
वह अकेली चढ़ गई।
रास्ता कीचड़ से भरा था। जगह-जगह झाड़ियाँ टूटी थीं। पत्थर पर घोड़ी के खुर के निशान थे। फिर एक जगह मिट्टी ऐसी उलटी पड़ी थी जैसे कोई भारी शरीर वहाँ घसीटा गया हो। नाले से ऊपर, बिजली से टूटे बरगद के पास उसे खून की पतली सूखी लकीर दिखी।
नैना का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने झाड़ियों को हटाया।
नीचे गहरी खोह में प्रताप सिंह पड़े थे।
उनका सिर फटा था, बायाँ हाथ टेढ़ा था, होंठ सूखकर काले पड़ गए थे। साँस इतनी हल्की थी कि पहले नैना को लगा वह सचमुच देर कर चुकी है। फिर उनकी छाती बहुत धीरे उठी।
नैना घुटनों के बल गिर पड़ी। उसने पानी की बूंदें उनके होंठों पर रखीं। प्रताप सिंह की आँखें आधी खुलीं। वह पहचानने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने बोलना चाहा।
आवाज नहीं निकली।
नैना ने उनके हाथ को अपने माथे से लगा लिया, फिर पहाड़ी रास्ते की तरफ देखा। अगर वह हवेली में खबर देती, तो रीना जान जाती। अगर रीना जान जाती, तो जो तूफान नहीं कर पाया, वह भैरव कर देता।
उसी पल नैना ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला किया।
सबके लिए ठाकुर प्रताप सिंह मर चुके रहेंगे।
लेकिन उसके लिए वह जिंदा रहेंगे।
और शिवगढ़ फार्म में किसी को अंदाजा भी नहीं था कि एक गूंगी नौकरानी अब उस राज को खोदने जा रही थी, जिसे कागज, बारिश और लालच मिलकर दफनाना चाहते थे।
कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇
भाग 2:
नैना ने प्रताप सिंह को उस खोह से निकालने में लगभग 3 घंटे लगाए। वह उन्हें उठा नहीं सकती थी, इसलिए कभी कंधा देती, कभी घसीटती, कभी पत्थर पर बैठाकर पानी पिलाती। पहाड़ी के पीछे एक पुराना अनाजघर था, जिसे शारदा देवी के मरने के बाद बंद कर दिया गया था। वहीं उसने उन्हें छिपाया। उसने उबले पानी से घाव साफ किया, हल्दी लगाई, बाँस की पतली लकड़ी से उनका हाथ बाँधा और अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर पट्टी बनाई। कई रातों तक प्रताप सिंह बुखार में शारदा देवी का नाम लेते रहे, फिर एक रात उन्होंने अजय का नाम लिया और काँप गए। नैना रोज सुबह हवेली लौटती, चूल्हा जलाती, खाना परोसती, फिर दोपहर ढलते ही बची रोटियाँ, दाल, दवा और खबरें लेकर अनाजघर पहुँचती। उसने अपनी कॉपी में लिखा कि रीना ने मजदूरों का राशन आधा कर दिया, कुएँ का पानी सीमित कर दिया, और उत्तरी चरागाह बेचने के लिए तहसील से आदमी बुलाया। प्रताप सिंह हर कागज पढ़ते और उनकी आँखों में जली हुई राख जैसी आग भरती जाती। तीसरे हफ्ते नैना ने दफ्तर से छुपाकर एक कॉपी निकाली। उसमें अजय के हस्ताक्षर वाला पावर ऑफ अटॉर्नी था, तारीख तूफान से 12 दिन पहले की थी। उसी शाम रीना ने आँगन में सबके सामने घोषणा की कि फार्म पर कर्ज है और उत्तरी चरागाह बिकेगा। हरिराम काका ने विरोध किया, तो भैरव ने कमर से तमंचा दिखाकर कहा कि अब हवेली में नई मालकिन का हुक्म चलेगा। रात में भैरव 2 आदमियों के साथ पहाड़ी की तरफ गया, क्योंकि उसे पुराने अनाजघर में रोशनी दिखने की खबर मिली थी। नैना ने समय रहते दीया बुझा दिया और प्रताप सिंह को गेहूँ के खाली बोरों के पीछे छिपा दिया। भैरव लौट गया, मगर जाते-जाते उसने दीवार पर चाकू से निशान बना दिया। प्रताप सिंह ने वह निशान देखा, फिर नैना की कॉपी में सिर्फ 1 वाक्य लिखा: असली सबूत अभी हवेली के अंदर है, और वह साबित करेगा कि मेरी मौत की तैयारी तूफान से पहले शुरू हो चुकी थी।
भाग 3:
अगले 2 दिन नैना ने हवेली को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो। दालान, रसोई, दफ्तर, तबेला, पुरानी अलमारी, शारदा देवी का बंद कमरा—हर जगह कोई न कोई निशान छिपा हो सकता था। रीना दिन में रोने का अभिनय करती और रात में फोन पर जमीन की कीमत तय करती। भैरव दरवाजे पर बैठा रहता, जैसे हवेली किसी परिवार की नहीं, किसी गिरोह की हो।
नैना ने जल्दीबाजी नहीं की। उसे पता था कि अगर वह पकड़ी गई, तो उसकी चुप्पी भी उसे नहीं बचाएगी।
तीसरी रात, जब हवेली में सब सो चुके थे, नैना चाबी की पुरानी गुच्छी लेकर दफ्तर में घुसी। उसे यह चाबी शारदा देवी की अलमारी में सालों पहले मिली थी, पर उसने कभी इस्तेमाल नहीं की थी। दफ्तर में धूल, बंद खिड़की और पुराने कागजों की गंध भरी थी। दीवार पर प्रताप सिंह और शारदा देवी की तस्वीर टंगी थी। तस्वीर के नीचे वही लोहे की पेटी रखी थी, जिसमें जमीन के पुराने नक्शे रखे जाते थे।
नैना ने पेटी खोली।
ऊपर पुराने नक्शे थे। नीचे रसीदें। फिर एक नीली फाइल। उस फाइल पर लिखा था—उत्तरी चरागाह सर्वेक्षण।
उसका हाथ काँप गया।
फाइल के अंदर 3 कागज थे। पहला बैंक मूल्यांकन का आवेदन था, जिसकी तारीख तूफान से 3 दिन पहले की थी। दूसरा तहसील के एक बाबू को भेजा गया निजी पत्र था। तीसरा एक छोटी पर्ची थी, जिस पर रीना की लिखावट में लिखा था—
“मेड़ के पत्थर आज रात सरकवा दो। बूढ़ा देखने निकलेगा। बारिश बाकी काम कर देगी। एडवांस तैयार रखना।”
नैना की साँस अटक गई।
तभी पीछे से आवाज आई।
—तू यहाँ क्या कर रही है?
नैना पलटी।
दरवाजे पर रीना खड़ी थी। उसके पीछे भैरव था। उसके हाथ में वही तमंचा था।
रीना धीरे-धीरे भीतर आई। उसके चेहरे पर अब झूठी मुस्कान नहीं थी।
—मुझे शुरू से शक था कि तू जरूरत से ज्यादा सुनती है।
नैना ने फाइल अपनी छाती से चिपका ली।
भैरव आगे बढ़ा।
—कागज दे दे, नहीं तो तेरी आवाज तो पहले ही गई है, साँस भी चली जाएगी।
नैना पीछे हटती गई। उसकी पीठ दीवार से लग गई। उसी पल खिड़की के बाहर काजल ने जोर से हिनहिनाया। भैरव का ध्यान टूटा। नैना ने मेज पर रखा पीतल का भारी पेपरवेट उठाया और तेल के दीये पर दे मारा। कमरा अँधेरे में डूब गया। वह नीचे झुककर दरवाजे की तरफ भागी। भैरव ने उसे पकड़ने की कोशिश की, मगर हरिराम काका बाहर से लाठी लेकर आ गए।
—हाथ पीछे कर, हरामखोर!
भैरव ने तमंचा उठाया, पर तब तक गोपाल और 4 मजदूर भी पहुँच चुके थे। असली चाल यह थी कि नैना ने शाम को ही हरिराम काका की जेब में एक पर्ची डाल दी थी—“आज रात दफ्तर के बाहर रहना।”
भैरव को दबोच लिया गया।
रीना चीखी।
—तुम लोग भूल रहे हो कि इस घर की मालिक मैं हूँ!
तभी बरामदे के अँधेरे से एक आवाज आई।
—मालिक बनने के लिए पहले इंसान होना पड़ता है, रीना।
सब जम गए।
प्रताप सिंह दफ्तर के बाहर खड़े थे।
बदन कमजोर था, हाथ पट्टी में था, माथे पर चोट का निशान था, लेकिन आँखें वही थीं—सख्त, साफ और भीतर तक काट देने वाली।
गोपाल के हाथ से लालटेन गिरते-गिरते बची।
हरिराम काका रो पड़े।
रीना पीछे हट गई, जैसे मरे हुए आदमी ने सचमुच लौटकर उसका गला पकड़ लिया हो।
—चाचा जी… आप…
प्रताप सिंह ने काटते हुए कहा।
—जब तू मुझे मरवा रही थी, तब मैं तेरा चाचा नहीं था।
रीना ने खुद को सँभालने की कोशिश की।
—यह सब गलतफहमी है। मैं तो फार्म बचाने की कोशिश कर रही थी।
प्रताप सिंह धीरे-धीरे दफ्तर में आए। नैना ने नीली फाइल उन्हें दी। उन्होंने पन्ने पलटे, फिर रीना की तरफ देखा।
—तूने पावर ऑफ अटॉर्नी 12 दिन पहले बनवाया।
रीना चुप रही।
—तूने बैंक मूल्यांकन 3 दिन पहले करवाया।
रीना ने होंठ भींच लिए।
—तूने मेड़ के पत्थर सरकवाए, ताकि मैं तूफान में उत्तरी रास्ते पर जाऊँ।
भैरव जमीन पर दबा हुआ कराह रहा था।
प्रताप सिंह ने पर्ची सबके सामने उठाई।
—और तूने लिखा कि बारिश बाकी काम कर देगी।
रीना का चेहरा राख जैसा हो गया।
तभी बाहर से गाड़ी की आवाज आई। तहसील का लेखपाल, गाँव के सरपंच और थाने की जीप आँगन में आकर रुकी। यह भी नैना की योजना का हिस्सा था। उसने हरिराम काका से अगले दिन नहीं, उसी रात खबर भिजवाई थी।
लेखपाल ने कागज देखे। थानेदार ने भैरव से तमंचा लिया। सरपंच ने रीना की तरफ ऐसे देखा जैसे पूरे गाँव का भरोसा उसके पैरों में टूटकर पड़ा हो।
रीना आखिरी कोशिश में नैना पर टूट पड़ी।
—इस गूंगी नौकरानी की बात पर कोई भरोसा करेगा? यह कागज चुरा सकती है, कहानी बना सकती है, किसी ने इसे बोलते सुना है कभी?
हवेली में सन्नाटा छा गया।
नैना ने अपना आँचल ठीक किया। वह आगे आई। उसने अपनी कॉपी खोली और एक पन्ना प्रताप सिंह को दिया।
प्रताप सिंह ने वह पन्ना सबके सामने पढ़ा।
—मैंने रीना को कहते सुना था कि अगर लाश नहीं मिलेगी, तो जमीन का बँटवारा साफ हो जाएगा। मैंने भैरव को कहते सुना था कि मेड़ के पत्थर किसने सरकाए, यह कोई साबित नहीं करेगा। मैंने ठाकुर साहब को खोह में जिंदा पाया। मैंने उन्हें छिपाया, क्योंकि हवेली में मौत से बड़ा लालच घूम रहा था।
रीना हँसी, मगर उसकी हँसी काँप रही थी।
—कितनी बड़ी कहानी लिख ली इसने!
प्रताप सिंह ने कॉपी बंद कर दी।
—हाँ, लिखी है। क्योंकि बोलने का मौका तुम जैसे लोगों ने कभी दिया नहीं।
फिर उन्होंने नैना की तरफ देखा।
—आज से इस घर में इसकी लिखी हर बात गवाही मानी जाएगी, क्योंकि इस घर को बचाने की कीमत इसने अपनी जान पर चुकाई है।
भैरव ने पुलिस के सामने टूटकर सब कबूल कर लिया। उसने बताया कि रीना ने उसे पैसे दिए थे, मेड़ के पत्थर सरकवाए थे, और तूफान वाली रात पहाड़ी रास्ते पर घोड़ी को डराने के लिए पटाखे फेंके थे। प्रताप सिंह घोड़ी से गिर गए। रीना ने सोचा कि नाले का पानी उन्हें बहा ले गया होगा।
रीना ने अजय का नाम लिया।
—सब अजय ने कहा था! मैंने अकेले कुछ नहीं किया!
अजय अगले दिन सुबह पहुँचा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह गाड़ी से उतरा तो पूरे आँगन की नजर उस पर थी। उसने प्रताप सिंह को जिंदा देखा और वहीं रुक गया।
—चाचा जी… मुझे लगा…
—तुझे लगा कि कागज पर हस्ताक्षर करके जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
अजय की आँखें झुक गईं।
—रीना ने कहा था कि यह सिर्फ फार्म का हिसाब संभालने के लिए है। मैंने पढ़े बिना साइन कर दिए।
प्रताप सिंह की आवाज भारी हो गई।
—पढ़े बिना हस्ताक्षर करना भी धोखे का आधा दरवाजा खोलना है, अजय। तूने मुझे नहीं मारा, मगर तूने मुझे अकेला छोड़ दिया।
अजय के पास जवाब नहीं था।
रीना और भैरव पर धोखाधड़ी, जमीन हड़पने की साजिश, गैरकानूनी हथियार और हत्या की कोशिश के मामले दर्ज हुए। अदालत का रास्ता लंबा था, लेकिन हवेली से उसका राज उसी रात खत्म हो गया। वह जाते-जाते भी चीखती रही कि सब उसका हक था। मगर गाँव के लोग जानते थे कि हक और हवस में फर्क होता है।
कुछ हफ्तों में शिवगढ़ फार्म वापस साँस लेने लगा।
मजदूरों का राशन फिर पूरा होने लगा। कुएँ का पानी सबके लिए खुला। गायों के चारे पर कटौती बंद हुई। उत्तरी चरागाह की नई मेड़ लगाई गई, और वहाँ शारदा देवी के नाम का छोटा पत्थर रखा गया। काजल फिर हर सुबह तबेले से बाहर आती, मगर अब प्रताप सिंह अकेले नहीं जाते थे। उनके साथ हरिराम काका या गोपाल रहता।
नैना फिर भी रसोई में ही काम करती रही।
फर्क सिर्फ इतना था कि अब कोई उसे अदृश्य नहीं समझता था।
एक दिन दोपहर में, जब वह मिट्टी के चूल्हे पर दाल रख रही थी, प्रताप सिंह रसोई में आए। नैना तुरंत सीधी खड़ी हो गई, जैसे कोई आदेश मिलने वाला हो।
प्रताप सिंह ने सिर हिलाया।
—आज मैं आदेश देने नहीं आया।
नैना ने सवाल भरी आँखों से देखा।
उन्होंने मेज पर 2 कागज रखे।
—पहला कागज तेरे नए वेतन का है। अब तू नौकरानी नहीं, इस घर की गृह-व्यवस्था की मुखिया है।
नैना की आँखें फैल गईं।
—दूसरा कागज उत्तरी चरागाह के किनारे की 5 बीघा जमीन का है। वह तेरे नाम की जा रही है।
नैना पीछे हट गई। उसने सिर जोर से हिलाया। उसकी आँखों में डर था, जैसे इतना बड़ा सम्मान भी किसी जाल जैसा लग रहा हो।
प्रताप सिंह ने धीरे से कहा।
—जमीन दया में नहीं दे रहा। कर्ज चुका रहा हूँ। तूने मेरी जान बचाई, मेरी पत्नी की याद बचाई, इस फार्म की रोटी बचाई।
नैना की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसने अपनी कॉपी निकाली और लिखा—
“मैंने सिर्फ वही किया जो सही था।”
प्रताप सिंह ने पढ़ा और पहली बार हल्के से मुस्कुराए।
—सही काम वही लोग करते हैं, जिन्हें कोई देख नहीं रहा होता। इसलिए उनका हिसाब ऊपर भी अलग से लिखा जाता है।
अगले रविवार को प्रताप सिंह ने पूरे फार्म के लोगों को आँगन में बुलाया। मजदूर, औरतें, बच्चे, ग्वाले, रसोइए, तबेले वाले, सब आए। अजय भी आया, मगर भीड़ के पीछे खड़ा रहा। उसके चेहरे पर पछतावा था। शायद वह पहली बार समझ रहा था कि परिवार सिर्फ खून से नहीं बचता, जिम्मेदारी से बचता है।
प्रताप सिंह ने सबके सामने कहा।
—मैं जिंदा हूँ, यह मेरी किस्मत थी। लेकिन शिवगढ़ फार्म जिंदा है, यह नैना की हिम्मत है।
आँगन चुप रहा।
फिर हरिराम काका ने ताली बजाई। उसके बाद गोपाल। फिर मजदूरों की औरतें। फिर पूरा आँगन तालियों से भर गया।
नैना के हाथ में वही पुरानी कॉपी थी। वह भीड़ के सामने खड़ी थी, मगर इस बार छिप नहीं रही थी। उसकी आँखों से आँसू निकले, पर वह टूटी नहीं। उसने सिर्फ अपनी कॉपी खोली और एक पन्ना ऊपर उठाया।
उस पर लिखा था—
“जिसे कोई नहीं सुनता, वह भी सच देख सकता है।”
लोगों ने फिर ताली बजाई।
प्रताप सिंह ने वह पन्ना लिया और कहा।
—इसे हवेली की रसोई में लगवाया जाएगा।
कुछ महीनों बाद सचमुच रसोई की दीवार पर वह पन्ना शीशे में जड़ दिया गया। उसके नीचे शारदा देवी की तस्वीर थी, और पास में काजल की पुरानी टूटी लगाम, जिसे प्रताप सिंह ने सँभालकर रख लिया था। वह लगाम याद दिलाती थी कि एक रात लालच ने मौत बुलाने की कोशिश की थी, मगर एक लड़की की चुप्पी ने मौत को दरवाजे से लौटा दिया।
नैना की आवाज कभी पूरी तरह वापस नहीं आई। मगर अब हवेली में कोई उसे गूंगी नहीं कहता था। लोग कहते थे—नैना दीदी से पूछ लो। वह जानती हैं। वह देख लेती हैं। वह सच पकड़ लेती हैं।
एक शाम प्रताप सिंह उत्तरी चरागाह की नई मेड़ पर खड़े थे। सूरज ढल रहा था। हवा में गेहूँ की खुशबू थी। नैना थोड़ी दूर खड़ी थी, हाथ में कॉपी, कंधे पर हल्का दुपट्टा।
प्रताप सिंह ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।
—शारदा होती तो तुझ पर गर्व करती।
नैना की आँखें भर आईं। उसने कॉपी में कुछ लिखा और उन्हें दिखाया।
“क्या अब यह घर सचमुच मेरा भी है?”
प्रताप सिंह ने बहुत देर तक वह पंक्ति देखी।
फिर उन्होंने कहा।
—जिसने घर को बचाया, उससे कोई पूछता नहीं कि यह घर उसका है या नहीं। यह घर उसी का होता है।
उस दिन नैना ने पहली बार बहुत धीमी, टूटी हुई, लगभग हवा जैसी आवाज निकाली। शब्द पूरा साफ नहीं था, मगर प्रताप सिंह ने सुन लिया।
—बाबा…
प्रताप सिंह की आँखें भर आईं। उन्होंने कोई बड़ा जवाब नहीं दिया। बस अपनी छड़ी जमीन में गाड़कर खड़े रहे, जैसे अचानक बूढ़े नहीं, पिता हो गए हों।
सालों बाद भी जब शिवगढ़ फार्म में कोई नया आदमी काम माँगने आता, प्रताप सिंह उसे रसोई की दीवार पर लगा वह पन्ना दिखाते और कहते—
—इस घर में किसी को उसके काम की जगह से छोटा मत समझना। कभी-कभी वही हाथ परिवार बचाते हैं, जिन्हें लोग सिर्फ झाड़ू पकड़े देखते हैं।
क्योंकि सच हमेशा ऊँची आवाज में नहीं आता।
कभी-कभी वह चुपचाप रसोई में बर्तन माँजता है, बारिश में पहाड़ चढ़ता है, घायल आदमी को मौत से छुपा लेता है, और फिर सही समय पर पूरा घर आईने के सामने खड़ा कर देता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.