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“मैंने ही थप्पड़ मारा था” — पति ने पत्नी के जन्मदिन पर सबके सामने कहा, लेकिन पिता की उतारी हुई घड़ी ने रसोई में छिपे कर्ज, नकली दस्तखत और एक खतरनाक बीमा राज खोलना शुरू कर दिया।

भाग 1
—हाँ, मैंने ही मारा था। जन्मदिन की बधाई देने की जगह 1 थप्पड़ दे दिया, ताकि इसकी अक्ल ठिकाने आ जाए।

कुणाल मल्होत्रा ने यह बात इतनी आराम से कही कि गुरुग्राम के उस महंगे अपार्टमेंट की रसोई में खड़े लोग 2 सेकंड तक समझ ही नहीं पाए कि यह मजाक था या खुलेआम कबूलनामा।

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वेनिला केक पर चाकू ठहरा रह गया। सुनहरे गुब्बारों पर लिखा 32 हल्की हवा से हिल रहा था। काउंटर पर रखी चांदी की प्लेटें चमक रही थीं, मेहमानों के हाथों में गिलास थे, और मीरा अपने पीले अनारकली सूट में पत्थर की तरह खड़ी थी। उसकी दाईं गाल पर उंगलियों के नीले निशान साफ दिख रहे थे, जैसे किसी ने उसके चेहरे पर अपमान की मुहर लगा दी हो।

दरवाजे पर खड़े राजीव त्रिवेदी के हाथ में नीले कागज में लिपटा छोटा सा तोहफा था। वह लखनऊ से बिना बताए बेटी को सरप्राइज देने आए थे। 30 साल सरकारी वकील रहे थे, फिर महिला हिंसा से जुड़े कई मामलों में सलाहकार बने। अदालत में उन्होंने झूठे गवाह टूटते देखे थे, अपराधी कांपते देखे थे, पर अपनी बेटी के चेहरे पर पड़े ये निशान देखकर उनकी आंखों में जो ठंड उतर आई, वह किसी अदालत में कभी नहीं दिखी थी।

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—बेटी… तेरे चेहरे पर ये चोटें किसने कीं?

पूरी पार्टी पर खामोशी गिर गई।

मीरा ने होंठ खोले, पर आवाज नहीं निकली। पिछले 8 महीनों से वह झूठ बोलती आ रही थी। कभी कहती, अलमारी से टकरा गई। कभी कहती, बाथरूम में फिसल गई। कभी कहती, माइग्रेन में चेहरा सूज गया। हर बार वह अपने ही दर्द को छोटा बनाती रही, क्योंकि घर बचाने का बोझ उसी पर डाल दिया गया था।

कुणाल ने हंसते हुए गिलास मेज पर रखा।

—अरे पापा जी, इतना ड्रामा मत कीजिए। मैंने ही मारा है। सुबह से बहुत ऊंची आवाज में बात कर रही थी। शादीशुदा औरत को थोड़ा कंट्रोल में रहना चाहिए।

कुणाल के 3 दोस्त हंसे, मगर वह हंसी गले में अटक गई। किसी ने सीधे मीरा की तरफ नहीं देखा।

कुणाल की मां शोभा मल्होत्रा सोने के कड़े खनकाते हुए आगे आईं। उनकी रेशमी कांजीवरम साड़ी, हीरे की बिंदी और मीठी मुस्कान हमेशा पड़ोसियों को प्रभावित करती थी।

—कुणाल, ऐसी बातें मजाक में भी नहीं बोलते। लोग गलत समझेंगे। मीरा भी न, बात को बड़ा बना देती है। आजकल की लड़कियां छोटी सी बात पर मायके वालों को बुला लेती हैं।

राजीव ने शोभा को नहीं देखा। कुणाल को भी नहीं। उनकी नजर सिर्फ मीरा पर थी।

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मीरा ने 2 सेकंड के लिए पिता की आंखों में देखा। फिर बहुत हल्का सा सिर झुका दिया।

राजीव ने तोहफा साइड टेबल पर रखा। फिर अपनी कलाई से घड़ी उतारी और फूलदान के पास रख दी। आवाज छोटी थी, पर उस कमरे में किसी हथौड़े जैसी लगी।

—मीरा, बाहर बालकनी गार्डन में जाओ। अभी।

कुणाल का चेहरा सख्त हो गया।

—माफ कीजिए, वह कहीं नहीं जाएगी।

—मीरा, बाहर जाओ।

इस बार राजीव की आवाज और धीमी थी।

मीरा के पैर कांप रहे थे। जिस पीले सूट को उसने सुबह इसलिए पहना था कि शायद आज का दिन अच्छा निकल जाए, वही अब उसे किसी पिंजरे जैसा लग रहा था। वह धीरे-धीरे स्लाइडिंग डोर की तरफ बढ़ी।

—रुको, मीरा —शोभा ने फुसफुसाकर कहा— अपनी ही पार्टी में तमाशा मत कर। लोग क्या कहेंगे?

कुणाल ने उसका हाथ पकड़ने के लिए कदम बढ़ाया, पर राजीव ने बिना मुड़े कहा:

—तुमने 14 लोगों के सामने स्वीकार किया है कि तुमने मेरी बेटी को मारा। एक कदम और बढ़ाया तो बात सिर्फ घरेलू झगड़े की नहीं रहेगी।

कुणाल की मुस्कान पहली बार टूटी।

मीरा बालकनी गार्डन में आ गई। नीचे सोसायटी के लॉन में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। ऊपर रसोई शीशे के पार साफ दिख रही थी। केक अभी भी नहीं कटा था। शोभा अपने कड़े ठीक कर रही थीं। कुणाल की गर्दन की नस फूल रही थी। मेहमान अपने फोन जेब में डाल रहे थे, जैसे अचानक उन्हें अपनी मौजूदगी पर शर्म आने लगी हो।

तभी शोभा का चेहरा सफेद पड़ गया।

वह अचानक झुकीं, फिर घुटनों के बल फर्श पर गिर गईं और रसोई के सिंक के नीचे वाले कैबिनेट की तरफ रेंगने लगीं।

मीरा ने शीशे पर हाथ रख दिया।

शोभा डरकर भाग नहीं रही थीं।

वह कुछ छिपाने जा रही थीं।

और उसी पल मीरा ने पहली बार समझा कि उसके जन्मदिन की रात सिर्फ 1 थप्पड़ का हिसाब नहीं खुलने वाला था।

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भाग 2
दरवाजे की घंटी नहीं बजी, क्योंकि गार्ड पहले ही 2 महिला पुलिस अधिकारियों और 1 सादे कपड़ों वाले इंस्पेक्टर को ऊपर भेज चुका था। उनके साथ अधिवक्ता अनन्या राव थीं, वही महिला जो 3 दिन पहले साउथ दिल्ली के महिला सहायता केंद्र में मीरा से मिली थीं, जब मीरा काला चश्मा पहनकर, पूरी बांह का कुर्ता डालकर, अपने मेकअप पाउच में 1 पेन ड्राइव छिपाकर पहुंची थी। इंस्पेक्टर ने शोभा के पास झुककर कहा, “मैडम, हाथ पीछे कीजिए।” शोभा चीखीं कि यह उनके बेटे का घर है, लेकिन मीरा बालकनी से सुन रही थी और उसके भीतर कुछ टूटकर फिर सीधा हो गया, क्योंकि वह घर कुणाल का कभी था ही नहीं। शादी से 1 महीने पहले राजीव ने वह फ्लैट मीरा के नाम खरीदा था। कुणाल ने उसे अपनी कमाई बताकर दोस्तों में शेखी मारी, पार्टी दी, फोटो खिंचवाई, और हर बार जब मीरा सच बोलने की कोशिश करती, वह उसके बाजू दबाकर नीला कर देता। पहले थप्पड़ के बाद उसने माफी मांगी थी। दूसरे के बाद कहा था कि गुस्सा प्यार में होता है। तीसरे के बाद शोभा बोली थीं कि अच्छी बहू घर की बात बाहर नहीं ले जाती। फिर मीरा को पता चला कि उसके आधार और पैन कार्ड की कॉपी से 3 क्रेडिट कार्ड निकाले गए थे। 1 लोन आवेदन में उसकी नकली साइन थी। 18,00,000 रुपये का पर्सनल लोन प्रोसेस हो चुका था। कुणाल के ऑनलाइन सट्टे और फर्जी इंपोर्ट बिजनेस का कर्ज बढ़ रहा था। मीरा ने रोना बंद कर दिया और सबूत जमा करने शुरू किए। मेडिकल रिपोर्ट, फोटो, ऑडियो, बैंक स्टेटमेंट, पड़ोसी के सीसीटीवी फुटेज, कुणाल के धमकी भरे मैसेज। उसके लैपटॉप में फोल्डर का नाम था “पूजा की रेसिपी”, पर भीतर उसकी पूरी सच्चाई बंद थी। इंस्पेक्टर ने सिंक के नीचे से आधा फटा बैंक लिफाफा निकाला। उसमें मीरा के नाम पर नकली साइन वाला 18,00,000 रुपये का लोन फॉर्म था। शोभा चिल्लाईं कि बहू ने साजिश की है। अनन्या ने शांत आवाज में कहा कि बहू ने सिर्फ चुप रहना बंद किया है। तभी राजीव ने अपनी घड़ी उठाई, साइड बटन दबाया और लाल लाइट चमक उठी। कुणाल का कबूलनामा रिकॉर्ड हो चुका था। लेकिन असली झटका तब लगा, जब कूड़े के काले बैग से 1 और फाइल निकली, जिस पर इंश्योरेंस कंपनी की मोहर थी। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚

भाग 3
फाइल प्लास्टिक कवर में बंद थी, किनारे पर केक की सफेद क्रीम लगी हुई थी, जैसे किसी ने जल्दबाजी में उसे छिपाते हुए मिठास और मौत को एक ही जगह मिला दिया हो।

कुणाल ने फाइल को देखते ही कहा:

—यह मेरी नहीं है।

इंस्पेक्टर ने उसकी तरफ देखा।

—किसी ने अभी आपसे पूछा भी नहीं।

शोभा अब रो नहीं रही थीं, कांप रही थीं। वह कुर्सी के पैर को पकड़े बैठ गईं। उनकी आंखों में बहू के लिए नफरत नहीं थी, बेटे के लिए ममता भी नहीं थी। उसमें सिर्फ खुद के पकड़े जाने का डर था।

महिला पुलिस अधिकारी ने फाइल खोली। भीतर 2 दस्तावेज थे। 1 जीवन बीमा पॉलिसी। बीमित व्यक्ति: मीरा त्रिवेदी मल्होत्रा। मुख्य लाभार्थी: कुणाल मल्होत्रा। द्वितीय लाभार्थी: शोभा मल्होत्रा। बीमा राशि: 2,50,00,000 रुपये।

मीरा को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे बालकनी हिल गई।

उसे क्रेडिट कार्ड का पता था। लोन का पता था। मारपीट का पता था। धमकियों का पता था। पर यह नहीं।

राजीव धीरे से उसकी तरफ मुड़े। उनके चेहरे पर गुस्से से भी गहरी चीज थी—पछतावा।

—मीरा…

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसे पिछले 4 महीने याद आने लगे। शोभा का बार-बार काढ़ा बनाकर देना। कुणाल का कहना कि वह “नर्वस ब्रेकडाउन” की तरफ जा रही है। रात की गोलियां, जिन्हें वह नींद की दवा बताता था। परिवार वालों के सामने उसका बार-बार कहना कि मीरा मानसिक रूप से स्थिर नहीं है। वह मैसेज जो वह जानबूझकर भेजता था:

“तुम ठीक नहीं हो।”

“मुझे डर है तुम अपने साथ कुछ गलत कर दोगी।”

“मम्मी और मैं तुम्हें हर वक्त संभाल नहीं सकते।”

“अगर कुछ हो गया तो लोग हमें दोष देंगे।”

मीरा ने हमेशा महसूस किया था कि ये चिंता नहीं, तैयारी थी। आज उसे समझ आया कि तैयारी किस चीज की थी।

अनन्या बालकनी में आईं और उसके कंधे पर हाथ रखा।

—सांस लो, मीरा। तुम अब घर के बाहर हो। सुरक्षित हो।

अंदर कुणाल ने आवाज ऊंची कर दी।

—ये सब झूठ है! मेरी पत्नी बीमार है। वह खुद को नुकसान पहुंचाने की धमकी देती थी। हमने सिर्फ सुरक्षा के लिए बीमा कराया था।

राजीव पहली बार कुणाल के पास गए। उनके चेहरे पर कोई नाटकीय गुस्सा नहीं था। बस अदालतों में तपे हुए आदमी की ठंडी कठोरता थी।

—मेरी बेटी 8 महीनों में 6 बार अस्पताल गई। हर बार तुम उसके साथ थे, इसलिए उसने कहा कि वह गिर गई। 7वीं बार वह अकेली गई। डॉक्टरों ने फोटो लिए, रिपोर्ट बनाई और महिला सेल को सूचना दी। वहीं से सब शुरू हुआ।

कुणाल ने होंठ भींचे।

—आप लोगों को कोई हक नहीं है।

अनन्या ने फाइल बंद की।

—हक है। शिकायत दर्ज है। घरेलू हिंसा, धोखाधड़ी, पहचान चोरी, जाली हस्ताक्षर, आर्थिक शोषण, धमकी और अब संभावित आपराधिक साजिश की जांच होगी। यह बीमा पॉलिसी भी जांच में जाएगी।

शोभा अचानक चीख पड़ीं।

—मैंने साइन नहीं करवाए! सब कुणाल का आइडिया था! मैंने बस कहा था कि पैसे का रास्ता निकालो!

कमरे में ऐसा सन्नाटा छाया कि एसी की आवाज भी तेज लगने लगी।

कुणाल ने मां की तरफ देखा। उसकी आंखों में वह क्रूरता चमकी जो मीरा ने बंद दरवाजों के पीछे कई बार देखी थी।

—चुप रहो, मम्मी!

लेकिन देर हो चुकी थी।

कुणाल के दोस्त पीछे हट गए। जो लोग कुछ देर पहले थप्पड़ पर हंस रहे थे, अब दीवार से चिपककर खड़े थे। उनमें से 1 ने धीमे से कहा:

—मुझे कुछ नहीं पता था। मैं गवाह बनने को तैयार हूं।

दूसरी महिला मेहमान, जो शोभा की किटी पार्टी वाली दोस्त थी, रोने लगी। शायद उसे पहली बार समझ आया कि “घर की इज्जत” के नाम पर कितनी औरतों को चुप कराया जाता है।

फिर सोसायटी के बाहर पुलिस जीप की आवाज आई। वर्दी वाले अंदर आए। कुणाल ने तुरंत चेहरा बदला। पहले वह सभ्य पति बना।

—सर, मेरी पत्नी को मानसिक मदद की जरूरत है। ये लोग उसे भड़का रहे हैं।

फिर वह गुस्से में आया।

—मीरा, अंदर आओ! अभी!

फिर उसने अपमान किया।

—तुम जैसी औरतें मायके के पैसे पर अकड़ती हैं!

और जब हथकड़ी उसकी कलाई पर लगी, तब वह रो पड़ा।

—मीरा, प्लीज। कह दो कि बात बढ़ गई। कह दो कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। हमारी शादी बचा लो।

मीरा बालकनी से अंदर आई। उसके पैर नंगे थे। गाल सूजा हुआ था। पीला सूट शाम की रोशनी में चमक रहा था। राजीव ने उसे रोकना चाहा, पर उसने सिर हिलाकर मना कर दिया।

वह कुणाल के सामने खड़ी हुई।

आज पहली बार कुणाल उसे बड़ा नहीं लगा। वह छोटा लगा। बहुत छोटा। अपने झूठ, कर्ज और डर में फंसा हुआ।

—तुमने मुझसे प्यार नहीं किया, कुणाल। तुमने मेरी चुप्पी से प्यार किया। मेरे घर से, मेरे पैसों से, मेरे डर से, मेरी विरासत से। तुम्हें पत्नी नहीं चाहिए थी। तुम्हें एटीएम चाहिए था, जो रो भी ले, पिट भी जाए और साइन भी कर दे।

कुणाल की आंखों में आंसू थे, मगर पछतावा नहीं था। वह नियंत्रण खोने का शोक मना रहा था।

शोभा को भी उठाया गया। उन्होंने अपना पल्लू ठीक करते हुए चीखकर कहा:

—बहू होकर सास को जेल भेजेगी? घर की बातें घर में ही सुलझती हैं! अच्छी पत्नी सब सहती है!

मीरा ने दरवाजे के पास रुककर उनकी तरफ देखा।

—इसीलिए तो आप चाहती थीं कि सब घर में रहे। क्योंकि घर के भीतर मेरे घाव निजी थे, आपके झूठ निजी थे, मेरे नाम पर बने कर्ज निजी थे। पर मेरा डर निजी नहीं था, शोभा जी। मेरा चेहरा सबके सामने था।

नीचे सोसायटी में लोग जमा हो चुके थे। कुछ लोग मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। गार्ड, कामवाली बाइयां, पड़ोसी, बच्चे—सब देख रहे थे। वही अपार्टमेंट जहां कुणाल खुद को मालिक बताता था, अब पुलिस टेप और फुसफुसाहटों के बीच खड़ा था।

केक अब भी नहीं कटा था।

मोमबत्तियां क्रीम में धंसकर तिरछी हो गई थीं।

मीरा उस रात अपने कमरे में नहीं सोई। वह राजीव के साथ लखनऊ चली गई। उसी पुराने घर में, जहां बरामदे में तुलसी का पौधा था, दीवार पर उसकी मां की तस्वीर लगी थी और रसोई में अब भी हल्दी, चायपत्ती और नींबू की वही खुशबू थी।

जैसे ही उसने मां की तस्वीर देखी, वह टूट गई।

8 महीनों से उसने रोना बचाकर रखा था। आज वह पिता के सीने से लगकर बच्ची की तरह रोई।

राजीव ने उसे मजबूत बनने को नहीं कहा। उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया। बस उसके सिर पर हाथ रखा।

—मुझे माफ कर दे, बेटी। मैं देर से समझा।

मीरा ने सिसकते हुए कहा:

—मैं भी देर से समझी, पापा। मैं हर बार सोचती रही कि शायद अगली सुबह वह बदल जाएगा।

राजीव की आंखें भर आईं।

—जो आदमी तुम्हें डराकर रखे, वह पति नहीं होता। वह सिर्फ जेल से बाहर खड़ा अपराधी होता है।

मामला आसान नहीं था। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि मीरा ने घर तोड़ा। कुछ ने कहा कि अमीर लड़कियां कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं। कुणाल के रिश्तेदारों ने राजीव को फोन कर धमकाया। शोभा की बहन ने समाज में अफवाह फैलाई कि मीरा किसी और से प्यार करती थी। पर इस बार मीरा चुप नहीं हुई।

हर सुनवाई में वह गई।

उसने मेडिकल फोटो देखे, जिनसे उसका पेट मिचलाता था। उसने अपने ही ऑडियो सुने, जिनमें वह धीरे-धीरे कह रही थी कि कृपया आज मत मारो। उसने बैंक अधिकारी की गवाही सुनी, जिसने बताया कि उसके दस्तावेजों की कॉपी शोभा ने खुद जमा की थी। उसने पड़ोसी आंटी का बयान सुना, जिन्होंने सीसीटीवी फुटेज दिया था, जिसमें कुणाल उसे बाल पकड़कर अंदर खींच रहा था।

अनन्या हर बार उसके साथ बैठतीं।

—तुम्हें किसी को साबित नहीं करना कि तुम टूटी थीं। सबूत बोल रहे हैं।

और सबूत बोले।

राजीव की घड़ी का रिकॉर्ड। जन्मदिन की रसोई का वीडियो। सिंक के नीचे से मिला लोन फॉर्म। नकली हस्ताक्षर। क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट। बीमा पॉलिसी। शोभा की चीख में निकली आधी सच्चाई। डॉक्टर की रिपोर्ट। महिला सेल की डायरी एंट्री। पड़ोसी का फुटेज।

कुणाल को न्यायिक हिरासत मिली। उसकी कंपनी ने उसे पहले सस्पेंड किया, फिर निकाल दिया, क्योंकि जांच में पता चला कि उसने ऑफिस के क्लाइंट डेटा से भी वित्तीय धोखाधड़ी की थी। उसके सट्टे के कर्ज की फाइल अलग खुली।

शोभा, जो हमेशा कहती थीं कि उनकी बहू परिवार की इज्जत है, अब कोर्ट में चेहरा दुपट्टे से ढककर आती थीं। उनकी किटी पार्टी की सहेलियां धीरे-धीरे दूर हो गईं। जिस समाज के डर से वह मीरा को चुप कराती थीं, वही समाज अब उनके घर के बाहर फुसफुसाता था।

9 महीने बाद मीरा को तलाक मिला। अदालत ने घर पर उसका पूरा अधिकार मान्य किया। जाली कर्जों की जिम्मेदारी कुणाल और शोभा पर डाली गई। मीरा के नाम से खोले गए खातों को बंद कराया गया। संरक्षण आदेश स्थायी हुआ।

लेकिन उसकी सबसे बड़ी जीत किसी कागज पर नहीं लिखी थी।

सबसे बड़ी जीत वह सुबह थी, जब वह उठी और उसे कमरे के बाहर कदमों की आवाज से डर नहीं लगा।

अगले जन्मदिन पर उसने कोई बड़ी पार्टी नहीं रखी। उसने बस 5 लोगों को बुलाया—राजीव, अनन्या, 2 करीबी सहेलियां और वही पड़ोसी आंटी, जिन्होंने फुटेज देकर कहा था कि किसी बेटी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

मीरा ने केक खुद नहीं बनाया। लखनऊ की पुरानी बेकरी से नींबू वाला छोटा केक मंगाया। कोई सुनहरे गुब्बारे नहीं थे। कोई दिखावटी मेहमान नहीं थे। कोई नकली हंसी नहीं थी।

सिर्फ शांति थी।

जब मोमबत्ती जलाने का समय आया, राजीव ने वही नीले कागज वाला छोटा डिब्बा उसके सामने रखा, जो पिछले साल अपार्टमेंट की मेज पर छूट गया था।

मीरा ने धीरे से खोला।

अंदर वही घड़ी थी।

राजीव ने कहा:

—उस दिन मैंने यह इसलिए उतारी थी, ताकि सच रिकॉर्ड हो सके। आज मैं इसे इसलिए दे रहा हूं, ताकि तुम्हें याद रहे कि किसी दिन जाने का सही समय कोई और तय नहीं करता। अपनी जान बचाने का समय हमेशा अभी होता है।

मीरा ने घड़ी कलाई में पहनी। उसका वजन अजीब तरह से सुकून देने वाला था। जैसे कोई कह रहा हो कि वह अब समय की कैदी नहीं, मालिक है।

उसने अपने घर की रसोई को याद किया—वही जगह जहां उसे सबके सामने अपमानित किया गया था, वही जगह जहां उसकी मौत का कागज छिपा था, वही जगह जहां उसके पिता की घड़ी ने सच पकड़ लिया था।

फिर उसने अपनी नई रसोई देखी। गैस पर चाय चढ़ी थी। खिड़की से धूप आ रही थी। मां की तस्वीर पर ताजा गेंदा चढ़ा था। कहीं कोई चिल्लाहट नहीं थी।

अनन्या ने मुस्कुराकर पूछा:

—विश मांगोगी?

मीरा ने मोमबत्ती की लौ देखी।

—नहीं। इस बार मैं विश नहीं करूंगी। इस बार मैं वादा करूंगी।

सब शांत हो गए।

मीरा ने धीमे से कहा:

—मैं कभी अपनी चुप्पी को किसी की इज्जत नहीं समझूंगी।

फिर उसने मोमबत्ती बुझा दी।

उस रात सोने से पहले उसने दरवाजे का लॉक सिर्फ 1 बार देखा। फिर लाइट बंद कर दी।

कई सालों बाद पहली बार अंधेरा उसे डरावना नहीं लगा।

क्योंकि उस अंधेरे में अब कुणाल की परछाई नहीं थी।

सिर्फ मीरा की सांस थी—धीमी, स्थिर और आजाद।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.