भाग 1:
श्मशान से लौटकर अभी मीरा ने अपनी काली साड़ी की पिन भी नहीं खोली थी कि उसने अपने ही ड्राइंग रूम में अपनी सास को 8 रिश्तेदारों के साथ उसके पति राघव की अलमारी खाली करते हुए देखा।
दिल्ली की ठंडी शाम में भी उसके माथे पर पसीना था। निगमबोध घाट की राख की गंध जैसे अब भी उसके बालों में अटकी हुई थी। सुबह उसने अपने पति राघव मेहरा को अग्नि दी थी। दोपहर तक लोग उसे “हिम्मत रखना” कहकर चले गए थे। शाम होते-होते उसे लगा था कि अब घर लौटकर बस एक लंबा सन्नाटा मिलेगा, वही सोफ़ा मिलेगा जहाँ राघव रात को किताब पढ़ते-पढ़ते सो जाता था, वही मग मिलेगा जिसमें वह बिना चीनी की चाय पीता था।
लेकिन गुरुग्राम के उस अपार्टमेंट का दरवाज़ा खुलते ही उसके सामने शोक नहीं, लूट खड़ी थी।
बीच हॉल में उसकी सास सरोज मेहरा खड़ी थी। सफेद सूती साड़ी, माथे पर बड़ी लाल बिंदी, आँखों में आँसू का नाम नहीं। उसके आसपास राघव के मामा, चाचा, 2 चचेरे भाई, 3 बुआएँ और उसकी ननद पायल सूटकेस भर रहे थे।
एक सूटकेस में राघव की कमीज़ें थीं। दूसरे में उसकी घड़ियाँ। तीसरे में लैपटॉप, हार्ड ड्राइव और फाइलें। पायल राघव की डायरी के पन्ने पलट रही थी। चाचा राजीव किचन से चांदी के गिलास निकाल रहे थे। मामा ने मंदिर की दराज़ तक खोल दी थी।
साइड टेबल पर राघव की अस्थियों का कलश रखा था। उसके पास मुरझाई हुई गेंदे की माला पड़ी थी। किसी ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
मीरा ने गला साफ किया।
—ये सब क्या हो रहा है?
सरोज ने धीरे से मुड़कर उसे देखा, जैसे घर की मालकिन किसी नौकरानी को पकड़ लेती है।
—अच्छा हुआ तू आ गई। कपड़े बदलने की जरूरत नहीं। इसी काली साड़ी में अपनी एक बैग उठा और निकल जा।
मीरा कुछ पल तक उसे देखती रही।
—ये मेरा घर है।
सरोज हँस पड़ी। उस हँसी में दुख नहीं, जीत थी।
—तेरा घर? बहू, ज्यादा नाटक मत कर। ये मेरे बेटे राघव का घर था। अब बेटा नहीं रहा, तो घर परिवार का है।
—मैं उसकी पत्नी हूँ।
—पत्नी थी। अब विधवा है। फर्क समझ।
पायल ने डायरी बंद की और होंठ टेढ़े किए।
—भाभी, हमने सब देख लिया। कोई वसीयत नहीं है। राघव भैया ने तुम्हारे नाम कुछ छोड़ा होता तो हमें पता चल जाता। अब इज्जत से चली जाओ, वरना सोसायटी में तमाशा होगा।
मीरा ने सूटकेस में रखी राघव की नीली शर्ट देखी। वही शर्ट जो उसने आखिरी बार अस्पताल जाते समय पहनी थी। उसके हाथ में अब भी हल्की सी दवा की गंध थी। मीरा का दिल फट जाना चाहिए था, लेकिन भीतर कुछ और जागा। कुछ ठंडा। कुछ तेज़।
—आप लोगों को चाबी किसने दी?
सरोज ने अपने पर्स से पुरानी चाबी निकाली और हवा में लहराई।
—मैं उसकी माँ हूँ। मेरे पास हमेशा चाबी रही है।
मीरा को अचानक राघव की आवाज़ याद आई। अस्पताल के कमरे में, ऑक्सीजन मास्क हटाकर उसने कहा था:
—मीरा, अगर कभी माँ पुरानी चाबी से घर में घुसे, तो घबराना मत। बस अदिति को फोन करना।
उस समय मीरा रो रही थी। उसने सोचा था राघव दवाइयों के असर में बातें कर रहा है। लेकिन अब, उस कमरे में खड़े 8 लालची चेहरों को देखकर, उसे समझ आया कि राघव मरते-मरते भी सच देख रहा था।
राजीव ने अलमारी से एक डिब्बा निकाला।
—ये घड़ी मेरे जीजा ने राघव को दी थी। परिवार की निशानी है।
मीरा ने एक कदम आगे बढ़कर कहा:
—इसे वापस रखिए।
राजीव ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
—अब आदेश देगी तू?
पायल बोली:
—भाभी, अगर इतना ही हक चाहिए था तो राघव भैया को बच्चे दे देतीं। 6 साल शादी में क्या किया तुमने?
कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया। राघव की बीमारी से पहले वे 2 बार माता-पिता बनने की कोशिश कर चुके थे। दोनों बार अस्पताल से खाली लौटे थे। यह दर्द घर की दीवारों तक को पता था। लेकिन आज पायल ने उसे हथियार बना दिया था।
सरोज ने तुरंत बात पकड़ी।
—बेटे को अकेला मार दिया इसने। न वारिस दिया, न सेवा की। बस बैंक अकाउंट देखती रही।
मीरा की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू गिरने नहीं दिए।
—सेवा? जब राघव की कीमो चल रही थी, आप 3 महीने वृंदावन में थीं। आपने कहा था बीमारी देखने से मन खराब होता है।
सरोज का चेहरा कस गया।
—बहुत जुबान चलने लगी है।
—और जब राघव ने आपको 12 लाख देने से मना किया था, तब आपने कहा था कि मरने के बाद सब हमारा ही होगा।
कमरे में हलचल हुई। चाचा राजीव ने पायल की तरफ देखा। पायल ने नजरें चुरा लीं।
सरोज ने आवाज़ ऊँची की।
—चुप! मर गया मेरा बेटा और तू हिसाब सुना रही है?
—हिसाब आप लोग सुना रहे हैं। वह भी उसके कलश के सामने।
मीरा ने कलश की तरफ देखा। उसके होंठ काँपे, पर आवाज़ स्थिर रही।
—राघव ने आप सबके बारे में गलत नहीं कहा था।
सरोज आगे बढ़ी।
—क्या कहा था उसने?
मीरा के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आई।
वह मुस्कान इतनी अप्रत्याशित थी कि सब लोग रुक गए।
पायल ने फुसफुसाया:
—पागल हो गई क्या?
मीरा ने अपनी चूड़ियाँ उतारीं, उन्हें साइड टेबल पर रखा और धीरे से बोली:
—नहीं। आज पहली बार समझदार हुई हूँ।
सरोज की आँखें सिकुड़ गईं।
—मतलब?
—मतलब आपने वही गलती की जो हमेशा की। आपने समझा राघव चुप है, इसलिए कमजोर है। आपने समझा वो दिखावा नहीं करता, इसलिए गरीब है। आपने समझा वो मर गया, इसलिए अब उसकी चीज़ें उठाना आसान है।
राजीव हँसा।
—अरे बहू, कहानी मत सुना। अगर राघव इतना बड़ा आदमी था तो अपनी माँ को 1 पैसा क्यों नहीं बताया?
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
—क्योंकि वह जानता था कि 1 पैसा भी दिखेगा तो आप लोग उसकी आत्मा तक बेच देंगे।
सरोज ने गुस्से में मेज पर हाथ मारा।
—बस! तू अभी घर छोड़ रही है। अभी। वरना मैं पुलिस बुलाऊँगी और कहूँगी तूने हमें घर से निकाला।
मीरा ने धीरे से अपना मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर संदेश चमक रहा था।
“हम नीचे हैं।”
उसका दिल एक बार जोर से धड़का। फिर उसने गहरी साँस ली।
—पुलिस बुलाने की जरूरत नहीं, माँजी।
सरोज ने तिरस्कार से पूछा:
—क्यों?
मीरा ने दरवाज़े की तरफ चलते हुए कहा:
—क्योंकि राघव ने पहले ही बुला रखी है।
उसी पल डोरबेल बजी।
कमरे में खड़े हर आदमी का चेहरा बदल गया।
मीरा ने दरवाज़ा खोला।
बाहर एक महिला काले कोट में खड़ी थी, उसके हाथ में फाइल थी। उसके पीछे सोसायटी मैनेजर, 2 सिक्योरिटी गार्ड और एक पुलिस इंस्पेक्टर खड़े थे।
महिला ने अंदर झाँककर सूटकेस, खुली अलमारियाँ और कलश देखा।
फिर उसने शांत आवाज़ में कहा:
—मैं अधिवक्ता अदिति राव हूँ। राघव मेहरा की संपत्ति, ट्रस्ट और अंतिम निर्देशों की कानूनी संरक्षक।
सरोज ने पहली बार पलक झपकना भूल गई।
मीरा ने राघव के कलश की तरफ देखा।
और उसे लगा, जैसे वह आदमी मरकर भी दरवाज़े पर खड़ा है।
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भाग 2:
अदिति राव ने कमरे में कदम रखा तो सरोज ने तुरंत अपना पल्लू सिर पर खींच लिया, जैसे अचानक दुख याद आ गया हो। —ये सब झूठ है। मेरा बेटा कोई राजा नहीं था। एक साधारण कंसल्टेंट था। अदिति ने सूटकेसों की तरफ देखा। —साधारण लोग भी अपनी मेहनत बचाने का हक रखते हैं। इंस्पेक्टर ने राजीव के हाथ में पकड़ी घड़ी देखी। —वह वस्तु वहीं रखिए। राजीव ने घड़ी मेज पर रख दी। अदिति ने फाइल खोली। —यह अपार्टमेंट राघव मेहरा के निजी नाम पर नहीं है। यह “आर एम लाइफ ट्रस्ट” के अधीन है। वैधानिक निवासी और प्राथमिक लाभार्थी मीरा मेहरा हैं। सरोज ने चीखकर कहा: —मेरे बेटे ने ऐसा कभी नहीं किया होगा! अदिति ने प्रमाणित कॉपी मेज पर रखी। —यह 11 महीने पहले रजिस्टर्ड हुआ था। पायल का चेहरा पीला पड़ गया। —लेकिन वसीयत तो नहीं है। अदिति बोली: —राघव ने जानबूझकर बहुत कम चीजें उत्तराधिकार में छोड़ीं। असली संपत्ति पहले ही संरक्षित कर दी गई थी। मीरा चुप खड़ी थी। उसे अस्पताल का वह दिन याद आया जब राघव ने कमजोर हाथों से उसका हाथ दबाया था। —वे लोग फूल सूखने से पहले आएँगे, मीरा। बहस मत करना। बस हँस देना। सरोज ने आरोप लगाया: —इस औरत ने मेरे बेटे को हमसे अलग किया। अदिति ने दूसरा कागज निकाला। —अलग नहीं किया। बचाया। राघव ने 2 साल से घर में कैमरे लगाए थे, क्योंकि पुराने दस्तावेज गायब हो रहे थे। कमरे में डर फैल गया। अदिति ने 4 तस्वीरें मेज पर रखीं। पहली में सरोज पुरानी चाबी से घर खोल रही थी। दूसरी में राजीव फाइलें निकाल रहा था। तीसरी में पायल दस्तावेजों की फोटो ले रही थी। चौथी में मामा बिस्तर के नीचे रखा लॉकर छू रहा था। इंस्पेक्टर की आवाज भारी हुई। —यह मामला अब पारिवारिक बहस नहीं रहा। सरोज काँपी, पर फिर भी बोली: —माँ हूँ मैं उसकी। मुझे हक है। अदिति ने अंतिम लिफाफा खोला। —राघव ने आप सबके लिए भी कुछ छोड़ा है। सरोज की आँखें चमकीं। —क्या? अदिति ने कहा: —आपको, पायल को, राजीव जी को और बाकी नामित रिश्तेदारों को 1-1 रुपये। साथ में नो-कॉन्टेस्ट क्लॉज। अगर आपने दावा किया तो धोखाधड़ी, फर्जी कर्ज और दस्तावेज चोरी की पूरी फाइल अदालत में जाएगी। पायल रोने लगी। राजीव ने गाली दी। लेकिन सरोज ने मीरा को घूरते हुए कहा: —वो अपनी माँ को बर्बाद नहीं करता। अदिति ने लैपटॉप खोला। —फिर उनका आखिरी वीडियो खुद सुन लीजिए।
भाग 3:
लैपटॉप की स्क्रीन जलते ही कमरे की हवा बदल गई।
अभी तक जो घर लालच, गुस्से और सूटकेसों की आवाज़ से भरा हुआ था, वहाँ अचानक ऐसा सन्नाटा उतर आया जैसे हर दीवार सांस रोककर खड़ी हो। मीरा के हाथ ठंडे पड़ गए। उसने चाहा कि वह स्क्रीन न देखे, पर आँखें अपने आप उठ गईं।
स्क्रीन पर राघव था।
सफेद अस्पताल के बिस्तर पर बैठा हुआ। चेहरा कमजोर, आँखों के नीचे गहरे घेरे, लेकिन वही शांत मुस्कान। उसके पीछे मशीन की हल्की आवाज़ थी। कमरे की खिड़की से आती फीकी धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
मीरा की साँस टूट गई।
राघव ने कैमरे में देखा।
—मीरा, अगर तुम यह वीडियो देख रही हो, तो इसका मतलब मैं घर वापस नहीं आ पाया।
मीरा ने अपने होंठों पर हाथ रख लिया। आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने आवाज़ नहीं निकाली।
राघव ने धीमे से मुस्कुराने की कोशिश की।
—मुझे माफ करना। मैं तुम्हें इस घर में शांति देकर जाना चाहता था, लेकिन मुझे पता था कि मेरी मौत के बाद सबसे पहले शोक नहीं आएगा, लालच आएगा।
सरोज ने चेहरा फेर लिया।
अदिति ने स्क्रीन को थोड़ा घुमाया ताकि सब देख सकें।
राघव की आवाज़ कमज़ोर थी, पर हर शब्द साफ था।
—माँ, अगर आप वहाँ हैं, तो सुन लीजिए। मैंने आपको कभी दुश्मन नहीं माना। मैं बच्चा था तो आपकी उंगली पकड़कर चलता था। जब पापा गए, मैंने सोचा आपको सहारा देना मेरा धर्म है। लेकिन धीरे-धीरे आपने मेरे धर्म को अपनी जेब समझ लिया।
सरोज की आँखें फैल गईं।
—झूठ बोल रहा है… दवाई के असर में था…
इंस्पेक्टर ने सख्त आवाज़ में कहा:
—चुपचाप सुनिए।
वीडियो में राघव ने गहरी साँस ली।
—मैंने पायल की फीस भरी, राजीव चाचा का बिजनेस बचाया, मामा के कर्ज चुकाए, बुआ के बेटे की शादी में पैसे दिए। हर बार कहा गया कि परिवार है। लेकिन जब मैंने कैंसर के इलाज के दौरान सिर्फ 1 बार कहा कि अब मैं थक गया हूँ, तब मुझे स्वार्थी कहा गया।
राजीव ने सिर झुका लिया। मामा दरवाज़े के पास खिसक गया।
राघव ने आगे कहा:
—मीरा ने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा। उसने मेरे बैंक बैलेंस नहीं पूछे। उसने मेरे इलाज के बिल देखकर डर जरूर छिपाया, पर कभी मुझे बोझ नहीं कहा। अस्पताल में रात 3 बजे जब मेरी उल्टी साफ करने वाला कोई नहीं था, वह थी। जब डॉक्टर ने कहा कि शायद 6 महीने हैं, उसने मेरे सामने रोना तक टाल दिया ताकि मैं टूट न जाऊँ।
मीरा फूटकर रो पड़ी। अदिति ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
वीडियो में राघव की आँखें भर आई थीं।
—माँ, आपने उस दिन अस्पताल में कहा था कि मीरा अशुभ है, क्योंकि उससे हमारा बच्चा नहीं हुआ। मुझे लगा था मैं आपको उसी दिन घर से निकाल दूँगा, लेकिन मैं कमजोर था। आज मैं कमजोर नहीं हूँ। यह वीडियो मेरा जवाब है।
सरोज का चेहरा राख जैसा हो गया।
पायल ने धीमे से कहा:
—माँ, आपने ऐसा कहा था?
सरोज चिल्लाई:
—तू चुप रह!
राघव की आवाज़ फिर गूँजी।
—मेरी संपत्ति, मेरा घर, मेरी बचत, मेरी इंश्योरेंस पॉलिसी और मेरे निवेश, सब कानूनी रूप से मीरा की सुरक्षा के लिए व्यवस्थित हैं। उसने यह माँगा नहीं। उसने इसे कमाया है, अपने प्रेम से, अपनी सेवा से, अपनी चुप्पी से, अपने त्याग से।
अदिति ने फाइल बंद कर दी। अब कागजों की जरूरत नहीं थी।
राघव ने कैमरे में और सीधा देखा।
—जो लोग मेरे घर में पुरानी चाबी से आएँगे, मेरी अलमारी खोलेंगे, मेरी पत्नी को डराएँगे, मेरे मरने के बाद मेरी चीज़ें बाँटेंगे, उन्हें परिवार नहीं माना जाएगा। उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होगी। चाहे वे मेरी माँ हों, मेरी बहन हों या मेरे रिश्तेदार।
इंस्पेक्टर ने सरोज की तरफ देखा।
—आप समझ रही हैं न?
सरोज ने कुछ नहीं कहा।
वीडियो में राघव ने हल्की खाँसी की। फिर वह थोड़ा रुका। उसकी आँखें नरम हो गईं।
—मीरा, अगर वे तुम्हें कहें कि तुम अकेली हो, तो यकीन मत करना। तुम अकेली नहीं हो। मैंने अदिति को सब बता दिया है। मैंने सोसायटी में लिखित निर्देश छोड़े हैं। बैंक, लॉकर, ट्रस्ट, बीमा, सब सुरक्षित है। बस एक बात याद रखना, किसी से भीख मत माँगना। यह घर तुम्हारा है। यहाँ तुम्हारी इज्जत मेरे नाम से नहीं, तुम्हारे अपने अधिकार से रहेगी।
मीरा ने पहली बार सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं, पर उनमें डर नहीं था।
राघव ने फिर कहा:
—और माँ, मैंने आपको 1 रुपया इसलिए छोड़ा है कि अदालत में कोई यह न कह सके कि मैं आपको भूल गया। मैं आपको भूलना चाहता था, पर नहीं भूल पाया। इसलिए 1 रुपया छोड़ा है। उतना ही जितनी जगह आपने मेरे आखिरी दिनों में मेरे दर्द को दी।
यह सुनते ही पायल का रोना तेज़ हो गया। राजीव ने दीवार की तरफ देखा। सरोज ने मेज पकड़ ली, जैसे जमीन हिल गई हो।
राघव की आवाज़ अब बहुत धीमी हो रही थी।
—मुझे दुख है कि मेरा अंतिम संस्कार खत्म होने से पहले यह सब होगा। लेकिन शायद यही आखिरी सच है। कुछ लोग चिता की आग ठंडी होने का इंतजार भी नहीं करते। मीरा, तुम उस आग की राख मत बनना। उससे दीपक बनाना।
वीडियो में वह रुका।
फिर उसने बहुत धीरे से कहा:
—खिड़कियाँ खोल देना। घर में फिर से चाय की खुशबू भरना। मेरी किताबें संभालना। और जब कभी अकेलापन बहुत भारी लगे, तो समझना कि मैंने आखिरी साँस तक तुम्हें बचाने की कोशिश की।
स्क्रीन अंधेरी हो गई।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर इंस्पेक्टर ने कदम आगे बढ़ाया।
—अब सब लोग सूटकेस खाली करेंगे। जो भी सामान इस घर का है, वापस रखा जाएगा। उसके बाद आप लोग बाहर जाएँगे।
राजीव ने धीमे से कहा:
—ये हमारा भी परिवार है।
इंस्पेक्टर ने कड़ककर कहा:
—परिवार सामान चोरी नहीं करता।
सोसायटी मैनेजर ने गार्ड्स को इशारा किया। एक-एक करके सूटकेस खुलने लगे। राघव की कमीज़ें वापस अलमारी में रखी गईं। घड़ियाँ लकड़ी की ट्रे में लौटीं। डायरी मेज पर रखी गई। लैपटॉप वापस स्टडी टेबल पर आया। मंदिर की दराज़ से निकले चांदी के गिलास फिर वहीं रखे गए।
पायल काँपते हाथों से राघव की डायरी रख रही थी। उसके आँसू असली थे या डर के, यह कोई नहीं जानता था।
मीरा ने पहली बार उससे कहा:
—पन्ने गिने जाएँगे।
पायल ने सिर झुका लिया।
मामा ने धीरे से बाहर निकलने की कोशिश की, पर इंस्पेक्टर ने रोक लिया।
—पहले जेबें खाली कीजिए।
मामा के कुर्ते की जेब से राघव की पेन ड्राइव निकली।
कमरे में फिर सनसनी फैल गई।
इंस्पेक्टर ने पेन ड्राइव अदिति को दी।
—यह भी सूची में जाएगा।
सरोज अचानक मीरा की तरफ बढ़ी।
—तू खुश है? मेरा बेटा गया और तूने मुझे चोर बना दिया?
मीरा ने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर दर्द था, पर अब वह दर्द झुकता नहीं था।
—नहीं माँजी। आपने खुद को चोर बनाया। मैंने सिर्फ दरवाज़ा खोला।
सरोज ने हाथ उठाया जैसे थप्पड़ मार देगी। लेकिन उससे पहले इंस्पेक्टर ने बीच में कदम रख दिया।
—हाथ नीचे।
सरोज का हाथ हवा में ही रुक गया। उसकी आँखों में पहली बार डर साफ दिखा।
अदिति ने कागज आगे किया।
—आपसे लिखित में लिया जाएगा कि आप भविष्य में बिना अनुमति इस घर में प्रवेश नहीं करेंगी। पुरानी चाबी अभी जमा कीजिए।
सरोज ने चाबी कसकर पकड़ी रही।
मीरा आगे आई। उसने बिना गुस्से के हाथ बढ़ाया।
—यह चाबी राघव ने आपको भरोसे में दी थी। आपने इसे हथियार बना दिया।
सरोज ने कुछ पल तक उसे घूरा। फिर चाबी मेज पर पटक दी।
—वो मेरा बेटा था।
मीरा की आवाज़ टूट गई, पर शब्द नहीं टूटे।
—हाँ। और आपको 38 साल मिले थे उसे माँ की तरह प्यार करने के लिए। आपने उसे एटीएम की तरह इस्तेमाल किया।
यह वाक्य कमरे में तीर की तरह लगा।
सरोज ने मुँह खोला, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। शायद पहली बार उसके पास आँसू थे, पर अब वे किसी को प्रभावित नहीं कर सकते थे।
कुछ देर बाद सभी रिश्तेदार बाहर खड़े थे। उनके हाथ खाली थे। जो लोग आधे घंटे पहले घर बाँट रहे थे, अब सिक्योरिटी गार्ड्स की निगरानी में लिफ्ट का इंतजार कर रहे थे।
दरवाज़ा बंद हुआ।
घर में पहली बार सन्नाटा उतरा।
लेकिन वह शांति नहीं थी। वह तूफान के बाद की चुप्पी थी, जिसमें टूटी चीज़ें अब भी दिखती हैं, पर कोई उन्हें और नहीं तोड़ रहा होता।
मीरा धीरे-धीरे कलश के पास बैठ गई। उसने मुरझाई माला को हाथ में लिया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। सुबह से उसने रोने की पूरी इजाजत खुद को नहीं दी थी। अब वह झुक गई और कलश से लगकर फूट पड़ी।
—तुमने इतना सब अकेले क्यों सहा, राघव?
अदिति कुछ देर चुप खड़ी रही। फिर उसने धीमे से कहा:
—क्योंकि वह आपको बचाना चाहता था। और शायद चाहता था कि आप उसके बाद भी सिर झुकाकर न जिएँ।
मीरा ने आँसू पोंछे।
—सब कानूनी रूप से सुरक्षित है?
—हाँ। घर, बीमा, निवेश, बैंक निर्देश, सब। वह बहुत व्यवस्थित आदमी था।
मीरा हल्का सा मुस्कुराई। दर्द भरी मुस्कान।
—हाँ। अपनी किताबें भी रंग के हिसाब से लगाता था।
अदिति की आँखें भी नम हो गईं।
उस रात सोसायटी ने ताला बदलवाया। पुरानी चाबी बेकार हो गई। इंस्पेक्टर ने बयान लिया। अदिति ने सामान की सूची बनवाई। मीरा ने कुछ नहीं खाया। बस रसोई में गई, 2 कप निकाले, फिर याद आया कि अब चाय 1 कप बनानी है।
उसने दूसरा कप वापस रखा।
यही सबसे कठिन था।
कानूनी लड़ाई कठिन नहीं थी। सरोज ने दावा नहीं किया। पायल ने कई दिनों तक फोन किया, पर मीरा ने नहीं उठाया। राजीव ने परिवार की पंचायत बुलाने की कोशिश की, लेकिन अदिति ने एक नोटिस भेजा और सब शांत हो गए। किसी को अदालत में जाना नहीं था, क्योंकि अदालत में जाते ही राघव की फाइल खुलती। और उस फाइल में सिर्फ संपत्ति नहीं थी, वर्षों का लालच था।
15 दिन बाद मीरा पहली बार अकेली बाजार गई। उसने काले कपड़े नहीं पहने। उसने हल्के पीले रंग का सूट पहना, जिसे राघव ने एक बार कहा था कि उस पर धूप जैसा लगता है।
फूलवाले ने पूछा:
—मैडम, मोगरा दूँ या गेंदा?
मीरा ने कुछ पल सोचा।
—सफेद लिली दे दीजिए। ताज़ी वाली।
वह फूल लेकर घर लौटी। दरवाज़े पर नया ताला चमक रहा था। उसने चाबी घुमाई। अंदर वही घर था, लेकिन अब उसमें डर की गंध कम थी। उसने खिड़कियाँ खोलीं। बाहर गुरुग्राम की ट्रैफिक की आवाज़, दूर मंदिर की घंटी और शाम की हवा अंदर आई।
उसने मुरझाई माला हटाई। कलश के पास ताज़े फूल रखे। फिर राघव की स्टडी में गई। उसकी डायरी मेज पर पड़ी थी। उसने आखिरी पन्ना खोला।
वहाँ राघव की लिखावट थी:
“मीरा को मत समझाना कि मजबूत बनो। वह मजबूत है। उसे बस यह याद दिलाना कि अब उसे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं।”
मीरा ने डायरी सीने से लगा ली।
उसने उस रात पहली बार पूरे घर की लाइटें जलाईं। रसोई में चाय बनाई। सिर्फ 1 कप। फिर दूसरा कप भी बनाया और राघव की खाली कुर्सी के सामने रख दिया।
यह पागलपन नहीं था।
यह विदाई थी।
कुछ महीनों बाद मीरा ने राघव के नाम से कैंसर मरीजों के परिवारों के लिए एक छोटा फंड शुरू किया। वह उन लोगों की मदद करती थी जिनके पास इलाज के पैसे थे, पर रात भर अस्पताल में साथ बैठने वाला कोई नहीं था। उसने ट्रस्ट का 1 हिस्सा उन बच्चों की पढ़ाई के लिए रखा जिनके पिता बीमारी में गुजर गए थे। जब अदिति ने पूछा कि वह इतना क्यों कर रही है, तो मीरा ने बस कहा:
—राघव ने मुझे घर दिया। मैं उसके नाम को दीवारों से आगे ले जाना चाहती हूँ।
सरोज कभी वापस नहीं आई।
एक बार दीवाली से पहले पायल ने संदेश भेजा:
“भाभी, माँ बीमार है। आप मिलना चाहें तो…”
मीरा ने लंबे समय तक फोन देखा। फिर जवाब लिखा:
“मैं दुआ करूँगी। लेकिन जिस घर से आपने राघव की राख के सामने सामान उठाया था, उस घर का दरवाज़ा अब सिर्फ सम्मान से खुलता है।”
उसने संदेश भेज दिया।
दीवाली की रात उसने बालकनी में 2 दीये जलाए। एक राघव के लिए। एक अपने लिए।
हवा हल्की थी। शहर दूर से चमक रहा था। कमरे में राघव की किताबें करीने से लगी थीं। सोफ़े पर उसकी पसंद की नीली शॉल रखी थी। चाय की खुशबू थी। फूल ताज़ा थे।
मीरा ने खिड़की से बाहर देखा और बहुत धीमे से कहा:
—तुम्हें वे लोग कभी समझ नहीं पाए, राघव। लेकिन मैंने समझा था।
फिर वह मुस्कुराई। आँसू भी थे, पर उस मुस्कान में हार नहीं थी।
उसने दरवाज़े की तरफ देखा। नया ताला शांत था। मजबूत था। जैसे राघव का आखिरी स्पर्श।
उस रात मीरा को पहली बार लगा कि मौत हमेशा अंत नहीं होती। कभी-कभी किसी का प्रेम उसके जाने के बाद भी पहरा देता रहता है। कभी-कभी एक आदमी चिता की राख से भी अपनी पत्नी के लिए घर की देहरी बचा लेता है।
और कभी-कभी, सबसे बड़ा बदला अदालत में नहीं होता।
सबसे बड़ा बदला यह होता है कि जिन्हें तुमने जिंदगी भर लूटा, वे मरकर भी तुम्हारे हाथ खाली छोड़ जाएँ।
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