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मेरे पति ने हमारी 6 महीने की बेटी की फोटो डालने से रोकते हुए कहा, “मेरी एक्स टूट जाएगी” 📸💔 मैं चुप रही, अगले दिन अकेले फोटोशूट करवाने चली गई, लेकिन पहली ही तस्वीर में उसकी कार, एक 4 साल का बच्चा और मेरी बेटी का जन्म प्रमाणपत्र वाला लिफाफा दिख गया…

भाग 1
जिस सुबह अर्जुन ने मीरा को अपनी 6 महीने की बेटी अनाया की तस्वीरें डालने से रोकते हुए कहा कि “काव्या उसे देखकर टूट जाती है”, उसी शाम एक कैमरे ने वह सच पकड़ लिया, जिसे वह 6 महीने नहीं, 4 साल से छिपा रहा था।

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मीरा अपने बेडरूम में बैठी थी। दूध से भीगा कुर्ता, उलझे बाल, आंखों के नीचे नींद की नीली परछाइयां और गोद में गुलाबी फ्रॉक पहने अनाया। छोटी-सी बच्ची हंस रही थी, जैसे इस घर में कोई झूठ, कोई थकान, कोई डर मौजूद ही न हो।

6 महीने।

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6 महीने की रातें, जब मीरा ने हर 10 मिनट में उठकर अनाया की सांस देखी थी।

6 महीने के पेट दर्द, बुखार, टीके, रोना, दूध पिलाते-पिलाते सो जाना।

6 महीने, जिनमें अर्जुन ने बहुत कम रातें जागकर काटी थीं, लेकिन हर रिश्तेदार के सामने पिता होने का गर्व जरूर दिखाया था।

उस दिन मीरा ने पहली बार खुद से कहा था कि वह सिर्फ टूटी हुई मां नहीं है, वह अभी भी जिंदा है। उसने अनाया की 12 तस्वीरें खींचीं। एक में बच्ची अपने पैर पकड़कर हंस रही थी। एक में उसकी आंखें बिल्कुल मीरा की मां जैसी लग रही थीं। एक में वह कैमरे की तरफ देख रही थी, जैसे कह रही हो कि दुनिया चाहे जैसी हो, मेरी मां मुझे देख रही है।

मीरा ने इंस्टाग्राम पर कैप्शन लिखा, “मेरे सबसे बड़े प्यार के 6 महीने।”

तभी दरवाजे पर अर्जुन खड़ा हो गया।

उसकी आवाज बहुत धीमी थी।

बहुत ज्यादा धीमी।

—ये तस्वीरें मत डालो।

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मीरा की उंगली स्क्रीन पर रुक गई।

—क्यों?

अर्जुन ने वही लंबी सांस भरी, जो वह हमेशा तब भरता था जब उसे कोई अन्याय बहुत सभ्य तरीके से करवाना होता था।

—काव्या की वजह से।

मीरा ने गर्दन उठाई।

—काव्या?

—मेरी एक्स। तुम्हें पता है न, वह मां नहीं बन पाई। वह अनाया की तस्वीरें देखकर बहुत रोती है।

कमरे में कुछ सेकंड के लिए सिर्फ अनाया की खिलखिलाहट रह गई।

मीरा ने अपनी बेटी को देखा, फिर अपने पति को।

—मेरी बेटी का इससे क्या लेना-देना है?

—इतनी कठोर मत बनो, मीरा। वह बहुत दर्द में है।

मीरा हंसी नहीं, लेकिन उसके होंठों पर एक ऐसी मुस्कान आई, जो हंसी से ज्यादा खतरनाक थी।

—दर्द में तो मैं भी थी, अर्जुन। जब टांके लगे थे। जब बुखार में भी दूध पिला रही थी। जब रात के 3 बजे रोते हुए बाथरूम में बैठी थी। तब तुम्हें मेरी इतनी चिंता नहीं हुई।

अर्जुन का चेहरा तन गया।

—हर बात को नाटक मत बनाओ। मैं बस थोड़ी इंसानियत मांग रहा हूं।

इंसानियत।

मीरा ने वह शब्द अंदर निगल लिया।

पुरुष अक्सर पत्नी से इंसानियत तब मांगते हैं, जब उन्हें किसी और औरत की सुविधा बचानी होती है।

उसने फोन बंद किया।

—ठीक है। मैं अनाया की तस्वीरें नहीं डालूंगी।

अर्जुन की आंखों में राहत चमकी।

—सच?

—हां।

वह मुस्कुराया। बेचारा। उसे लगा उसने जीत लिया।

अगले दिन मीरा बांद्रा के एक छोटे मगर महंगे फोटो स्टूडियो पहुंची। उसने अनाया को अपनी बहन नंदिनी के पास छोड़ा। वादा पूरा था। बच्ची की कोई तस्वीर नहीं। सिर्फ मीरा।

फोटोग्राफर का नाम राधिका था। करीब 42 साल की, छोटे बाल, हाथ पर कमल का टैटू, और आंखें ऐसी जो लोगों की बनावटी मुस्कान के पीछे की टूटन पहचान लेती थीं।

—किस मौके की शूट है? बर्थडे, एनिवर्सरी या कुछ और?

मीरा ने आईने में खुद को देखा। बहुत दिनों बाद उसके चेहरे पर काजल लगा था।

—वापस आने की।

राधिका ने कैमरा उठाते हुए कहा:

—तो फिर आज तस्वीरें बहुत अच्छी आएंगी।

मीरा ने लाल साड़ी पहनी। वही साड़ी जो शादी के बाद पहले करवा चौथ पर पहनी थी, जब अर्जुन उसे ऐसे देखता था जैसे सच में प्यार करता हो। फिर उसने सफेद सलवार-कुर्ता पहना, फिर हल्का पीला दुपट्टा, फिर बिना मेकअप के कुछ तस्वीरें। वह हंसी भी, रोने के करीब भी आई, खिड़की से बाहर बारिश देखती रही।

उस शाम उसने 5 तस्वीरें पोस्ट कीं।

“6 महीने बाद, आज मैं भी पैदा हुई।”

“मां होना मिट जाना नहीं है।”

“यह शरीर टूटा नहीं, इसने जीवन बनाया है।”

10 मिनट में फोन बजने लगा।

नंदिनी ने लिखा, “तू तो आग लग रही है।”

ऑफिस की पुरानी सहेली ने लिखा, “मीरा, तू चमक रही है।”

कॉलेज का एक पुराना दोस्त बोला, “क्लासिक ब्यूटी।”

फिर काव्या का कमेंट आया।

“तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो, मीरा। अर्जुन ने कभी नहीं बताया कि तुम अब भी इतनी सुंदर हो।”

मीरा ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी।

अर्जुन ने कभी नहीं बताया।

इसका मतलब वे बात करते थे।

अक्सर।

उसके बारे में।

लेकिन बेटी के बारे में नहीं।

उस रात अर्जुन 8 बजे घर आया। चाबी मेज पर पटकी।

—ये सब क्या है?

मीरा अनाया को दलिया खिला रही थी।

—सूजी का दलिया है। उसे पसंद नहीं आया।

—मजाक मत करो।

उसने फोन आगे किया। काव्या का कमेंट लाल घेरे में था।

—तुमने उसे जवाब क्यों नहीं दिया?

—क्यों दूं? वह तुम्हारी दोस्त है न?

—और तुम्हारे पुराने दोस्त तुम्हें क्यों कमेंट कर रहे हैं?

—क्योंकि मैंने अपनी तस्वीरें डाली हैं। अनाया की नहीं।

अर्जुन की आंखें सिकुड़ गईं।

—मैंने कहा था कुछ मत डालना।

—नहीं। तुमने कहा था अनाया की तस्वीरें मत डालना।

अनाया ने चम्मच मेज पर मारी। आवाज ने दोनों को चुप करा दिया।

फिर मीरा ने धीरे से कहा:

—रविवार को दूसरी शूट है। इस बार गार्डन में।

अर्जुन का रंग उड़ गया।

—तुम्हें इतनी अटेंशन की जरूरत कब से पड़ने लगी?

—काव्या को तुम्हारी अटेंशन की जरूरत कब से पड़ने लगी?

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। वह बाथरूम में चला गया, फोन कान पर लगाए।

दरवाजा ठीक से बंद नहीं हुआ।

मीरा ने अनाया को पालने में रखा और धीरे से बाहर आई।

अर्जुन की आवाज फुसफुसाहट में थी।

—रो मत, काव्या। मैंने उसे मना किया था… नहीं, उसे कुछ पता नहीं… हां, कल बच्चे से मिलने आऊंगा।

बच्चे से।

मीरा की पीठ में ठंड उतर गई।

उसने “तुमसे मिलने” नहीं कहा।

उसने “तुम्हारे घर” नहीं कहा।

उसने कहा, “बच्चे से।”

अगली सुबह मीरा राधिका के स्टूडियो गई। उसे लगा वह सिर्फ तस्वीरें लेने जा रही है। लेकिन राधिका ने उसे बैठने को कहा।

—मीरा, तुम्हें एक चीज दिखानी है। शायद मुझे इसमें नहीं पड़ना चाहिए, पर यह सामान्य नहीं है।

उसने कंप्यूटर खोला।

—कल जब तुम कपड़े बदल रही थीं, मैं खिड़की से बाहर लाइट टेस्ट कर रही थी। तुम्हारे पति बाहर आए थे।

मीरा का गला सूख गया।

—अर्जुन?

—हां। लेकिन वह अकेला नहीं था।

पहली फोटो में अर्जुन की काली कार थी। दूसरी में वह ड्राइवर सीट से उतर रहा था। तीसरी में पीछे का दरवाजा खुला। काव्या उतरी। महंगी साड़ी, चश्मा, चेहरे पर कोई दुख नहीं।

उसकी गोद में 4 साल का लड़का था। नीली टोपी, हाथ में प्लास्टिक का हाथी।

अर्जुन झुका।

उसने बच्चे को बांहों में लिया।

माथे पर चूमा।

वैसे, जैसे उसने अनाया को शायद ही कभी चूमा हो जब कोई कैमरा न हो।

राधिका ने फोटो जूम की।

लड़के की आंखें अर्जुन जैसी थीं।

होंठ भी।

और दाईं भौंह के पास छोटा-सा तिल।

वही तिल, जो अर्जुन के चेहरे पर था।

मीरा के कानों में आवाज बंद हो गई।

—एक और फोटो है —राधिका ने धीरे से कहा।

अगली तस्वीर में अर्जुन काव्या को पीला लिफाफा दे रहा था। लिफाफे पर मीरा का पूरा नाम लिखा था।

“मीरा शर्मा।”

नीचे मोटे मार्कर से लिखा था:

“अनाया का जन्म प्रमाणपत्र। सरनेम और अभिभावक विवरण सुधारने तक फोटो न डालें।”

मीरा की सांस रुक गई।

तभी उसका फोन बजा।

काव्या का संदेश था।

“थैंक यू कि तुमने बच्ची की तस्वीरें नहीं डालीं। अर्जुन ने वादा किया है कि जल्द सब ठीक हो जाएगा।”

फिर एक तस्वीर आई।

एक पालना।

उसमें अनाया जैसी गुलाबी फ्रॉक।

तकिए पर अस्पताल की छोटी पट्टी।

पट्टी पर नाम लिखा था: “अनाया अर्जुन शर्मा।”

नीचे काव्या ने लिखा था:

“जब वह मेरे नाम से जुड़ जाएगी, तब तुम्हें कुछ छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अर्जुन ने कहा है तुम लड़ोगी नहीं, क्योंकि तुम बहुत थक चुकी हो।”

मीरा ने फोन मेज पर रख दिया।

उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे थे।

राधिका ने कुर्सी खींच दी।

—मीरा, यह जलन नहीं है। यह खतरा है।

खतरा।

मीरा ने पहली बार समझा, उसका पति सिर्फ झूठ नहीं बोल रहा था।

वह उसकी बच्ची को उसकी जिंदगी से काटने की तैयारी कर रहा था।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇.

भाग 2

मीरा उस स्टूडियो से तस्वीरों का लिफाफा, पेन ड्राइव और टूटती हुई सांसें लेकर निकली, लेकिन घर नहीं गई। वह सीधे नंदिनी के फ्लैट पहुंची, अनाया को गोद में उठाया और उसे सीने से ऐसे चिपका लिया जैसे कोई उसे दरवाजे से छीनने आएगा। नंदिनी ने तस्वीरें देखीं तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसी ने अपने फोन से अर्जुन को कॉल मिलाया और मीरा ने पूरी बातचीत रिकॉर्ड की। अर्जुन पहले गुस्से में बोला कि वह बच्ची को लेकर क्यों गायब हुई, फिर जैसे ही मीरा ने स्टूडियो के बाहर की तस्वीरों, काव्या, 4 साल के लड़के और जन्म प्रमाणपत्र वाले लिफाफे का नाम लिया, उसकी आवाज फिर से वही मुलायम हो गई। उसने कहा मीरा गलत समझ रही है, काव्या भावनात्मक तकलीफ से गुजर रही है, बच्चा पुराना मामला है और अनाया पर किसी का बुरा इरादा नहीं। लेकिन जब मीरा ने पूछा कि काव्या के घर में अनाया जैसी फ्रॉक और अस्पताल की पट्टी क्यों है, अर्जुन का असली चेहरा बाहर आ गया। उसने कहा मीरा अकेली बच्ची नहीं संभाल सकती, वह प्रसव के बाद से कमजोर, चिड़चिड़ी और मानसिक रूप से अस्थिर है, और अदालत को यह दिखाना मुश्किल नहीं होगा। मीरा ने सिर्फ इतना कहा कि उसने यह सब रिकॉर्ड कर लिया है। अगली सुबह राधिका बिना पूछे एक वकील अदिति को लेकर आई। अदिति ने तस्वीरें, संदेश, ऑडियो, काव्या का कमेंट और लिफाफे की फोटो देखकर साफ कहा कि यह सिर्फ अवैध संबंध नहीं, बल्कि बच्ची की अभिभावकता और दस्तावेजों से छेड़छाड़ की कोशिश हो सकती है। वे मुंबई नगर निगम के जन्म-मृत्यु कार्यालय पहुंचे, जहां कंप्यूटर पर अनाया के प्रमाणपत्र से जुड़ा एक लंबित आवेदन निकला। उसमें मां की ओर से कथित सहमति लगी थी कि बच्चे के उपनाम और अभिभावक विवरण में संशोधन किया जाए। मीरा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, क्योंकि उसने ऐसी कोई सहमति कभी नहीं दी थी। अदिति ने तत्काल रोक, आवेदन की प्रति और हस्ताक्षर जांच की मांग की। फिर वे महिला थाने गए, जहां मीरा ने पहली बार लिखकर दिया कि उसे अपने पति से डर है। शाम को पुलिस और अदिति के साथ जब वह अपने घर सामान लेने पहुंची, तो दरवाजा अर्जुन ने खोला। अंदर सोफे पर काव्या बैठी थी, और उसके पीछे वही 4 साल का लड़का नीली टोपी पहने खड़ा था। अर्जुन ने गुस्से में कहा कि वह उसका बेटा है। अदिति ने पूछा, शादी से पहले का? काव्या रोते हुए बोली, शादी के दौरान का।

भाग 3

कमरे की हवा जैसे अचानक भारी धुएं में बदल गई। मीरा ने अनाया को सीने से और कस लिया। सामने खड़ा लड़का डर के मारे काव्या की साड़ी पकड़ रहा था। उसकी आंखों में वही मासूमियत थी जो अनाया की आंखों में थी। मीरा का गुस्सा एक पल को रुक गया, क्योंकि वह बच्चा दुश्मन नहीं था। वह भी उसी आदमी के झूठ का शिकार था।

अर्जुन ने पुलिसकर्मी की मौजूदगी में खुद को संभालने की कोशिश की।

—तुम लोग इसे गलत बना रहे हो। मैं बस चाहता था कि काव्या भी अनाया से जुड़ सके।

अदिति ने फाइल से फोटो निकाली और मेज पर रख दी।

—जुड़ सके या मां की नकली सहमति लगाकर जन्म प्रमाणपत्र में बदलाव करवा सके?

काव्या ने कांपते हाथों से फोटो उठाई।

—नकली सहमति?

उसकी आवाज में सच्चा डर था।

मीरा ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। यह वही औरत थी जिसने संदेश भेजकर लिखा था कि बच्ची उसके नाम से जुड़ जाएगी। लेकिन अब उसके चेहरे पर जीत नहीं, धोखे का डर था।

काव्या अर्जुन की तरफ मुड़ी।

—तुमने कहा था मीरा खुद तैयार है। तुमने कहा था वह बच्ची संभाल नहीं पा रही, वह उसे मेरे पास कुछ महीनों के लिए रखेगी। तुमने कहा था सब कागज कानूनी हैं।

अर्जुन ने दांत भींचे।

—काव्या, चुप रहो।

—नहीं, आज नहीं। तुमने मेरे बेटे को भी अपना नाम नहीं दिया, और अब उसकी बहन को कागजों में उलझा रहे हो?

मीरा का दिल धक से रह गया।

बहन।

यह शब्द कमरे में गिरा और चूर हो गया।

अर्जुन का चेहरा लाल पड़ गया।

—मैंने कहा न चुप रहो!

लड़का रोने लगा। अनाया भी उसकी आवाज सुनकर सिसकने लगी। 2 बच्चे एक साथ रो रहे थे, और कमरे में 3 औरतें खड़ी थीं जिन्हें एक आदमी ने अलग-अलग झूठ बेचकर एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया था।

मीरा ने धीरे से पूछा:

—इस बच्चे का नाम क्या है?

काव्या ने आंखें पोंछीं।

—विहान।

विहान अपनी मां के पीछे छिप गया। मीरा ने उसे बस देखा, बिना आरोप के।

—विहान को सच कब से पता है?

काव्या ने सिर हिलाया।

—उसे नहीं पता। वह अर्जुन को “अंकल” कहता है। अर्जुन ने कहा था अभी सही समय नहीं है।

मीरा ने अर्जुन को देखा।

—तुम्हें सही समय चाहिए था? अपनी पत्नी से झूठ बोलने का? अपने बेटे को छिपाने का? अपनी बेटी को दूसरी औरत की खाली गोद भरने का साधन बनाने का?

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।

—मीरा, तुम भावुक हो रही हो। यही तो मैं कहता हूं। तुम्हें मदद चाहिए।

पुलिसकर्मी ने हाथ आगे कर दिया।

—साहब, दूरी बनाइए।

अदिति ने अलमारी का दराज खोला, जहां मीरा के पुराने दस्तावेजों की कॉपियां, उसकी आधार कार्ड की फोटोकॉपी, अस्पताल की डिस्चार्ज शीट, और एक निजी मनोचिकित्सक के नाम लिखा अधूरा पत्र रखा था। पत्र में लिखा था कि “प्रसवोत्तर चिंता” का प्रमाणपत्र जल्द चाहिए।

अदिति ने सबकी तस्वीरें खींचीं।

—यह सब केस फाइल में जाएगा।

मीरा को उल्टी जैसा महसूस हुआ। वह सोचती रही कि जब वह रातों में अनाया को दूध पिला रही थी, अर्जुन शायद अदालत के लिए उसकी थकान को बीमारी साबित करने की तैयारी कर रहा था।

उसने बिना चिल्लाए अनाया के कपड़े, डायपर, टीकाकरण कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र की असली प्रति, छोटी चांदी की पायल, और वे सारी तस्वीरें समेटीं जिनमें वह और उसकी बेटी साथ थे। हर चीज उठाते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह घर नहीं, किसी जाल से बाहर निकल रही हो।

दरवाजे पर काव्या ने धीरे से कहा:

—मीरा, मैंने सोचा था तुम सच में बच्ची नहीं चाहतीं।

मीरा ने पलटकर देखा।

—जिस औरत ने 6 महीने अपनी नींद, अपना शरीर और अपना खून देकर बच्चे को बचाया हो, उसके बारे में ऐसा सुनकर भी तुमने भरोसा कर लिया?

काव्या ने सिर झुका लिया।

—मैं मां बनना चाहती थी।

—अनाया तुम्हारे दर्द की दवा नहीं है।

यह सुनकर काव्या रो पड़ी। मीरा ने उसे सांत्वना नहीं दी। वह उसका काम नहीं था। लेकिन उसने विहान की तरफ देखा और कहा:

—यह बच्चा भी छिपाए जाने के लिए पैदा नहीं हुआ था।

उस रात मीरा नंदिनी के घर लौटी। अनाया उसके बगल में सो रही थी, छोटी-सी मुट्ठी बंद किए। मीरा ने पूरी रात आंख नहीं झपकाई। हर 5 मिनट में उसने बच्ची की सांस देखी। लेकिन इस बार डर अलग था। यह डर बुखार या पेट दर्द का नहीं था। यह डर कागजों, झूठी रिपोर्टों और मुस्कुराते चेहरे वाले धोखे का था।

अगले कुछ दिनों में शहर की रफ्तार वही रही। लोकल ट्रेनें भरी रहीं, बारिश से सड़कें चमकती रहीं, मंदिरों में घंटियां बजती रहीं, लेकिन मीरा की दुनिया अदालत, थाने, जन्म कार्यालय और वकील की फाइलों में सिमट गई। अर्जुन पहले माफी मांगता रहा, फिर धमकाता रहा, फिर अपनी मां को भेजा।

अर्जुन की मां माथे पर बड़ी बिंदी, हाथ में पूजा की थाली और आवाज में झूठी करुणा लेकर नंदिनी के दरवाजे पर आई।

—बहू, घर की बात घर में रहे तो अच्छा होता है। बच्ची के लिए बाप जरूरी होता है।

नंदिनी ने दरवाजे की कुंडी पकड़ी।

—बच्ची के लिए सुरक्षित मां ज्यादा जरूरी है।

—तुम बहन होकर घर तोड़ रही हो।

नंदिनी ने दरवाजा बंद करते हुए कहा:

—घर अर्जुन ने तोड़ा है। मीरा सिर्फ मलबे से बच्ची निकाल रही है।

काव्या ने कुछ दिनों बाद बयान दिया। वह कोई देवी नहीं बन गई थी। वह डरी हुई थी, अपमानित थी, और अर्जुन से टूटी हुई थी। लेकिन उसने सच दिया। उसने अर्जुन के संदेश दिखाए, जहां वह लिखता था कि मीरा कमजोर है, प्रसव के बाद स्थिर नहीं है, और अनाया को “कुछ समय के लिए” काव्या के घर रखना ही सबसे अच्छा होगा। उसने वह पीला लिफाफा दिया। उसने अस्पताल की पट्टी भी दी, जो अर्जुन ने उसे “करीब महसूस करने” के लिए दी थी। उसने विहान का जन्म प्रमाणपत्र भी दिया, जिसमें पिता का नाम खाली था।

मीरा ने उस कागज को देखा और भीतर से जल गई। जो आदमी अपनी बेटी का उपनाम बदलवाना चाहता था, उसने अपने बेटे को अपना नाम तक नहीं दिया था।

परिवार अदालत की पहली सुनवाई गुरुवार को हुई। बाहर बरसात हो रही थी। मीरा काली साड़ी पहनकर गई। अनाया नंदिनी की गोद में थी। राधिका भी आई, कैमरा नहीं, लेकिन गवाही के लिए तैयार आंखें लेकर। अदिति ने फाइलें मेज पर रखीं।

अर्जुन साफ-सुथरा सूट पहनकर आया। उसके चेहरे पर वही दुखी पति वाला भाव था, जो समाज को जल्दी विश्वास दिला देता है।

—माननीय अदालत, मेरी पत्नी प्रसव के बाद से भावनात्मक रूप से अस्थिर है —उसने कहा।—वह मुझे मेरी बेटी से दूर कर रही है। काव्या सिर्फ परिवार की मित्र है।

मीरा का दिल जोर से धड़का, पर वह चुप रही।

अदिति खड़ी हुई।

उसने एक-एक करके फोटो रखीं।

स्टूडियो के बाहर अर्जुन और विहान।

काव्या को दिया गया पीला लिफाफा।

काव्या के घर का पालना।

अस्पताल की पट्टी।

जन्म प्रमाणपत्र में लंबित संशोधन आवेदन।

नकली सहमति पर हस्ताक्षर।

ऑडियो, जिसमें अर्जुन कह रहा था कि अदालत मीरा की अस्थिरता देख लेगी।

फिर निजी मनोचिकित्सक को भेजा गया संदेश।

“प्रसवोत्तर चिंता का प्रमाणपत्र तुरंत चाहिए।”

कमरे में खामोशी पसर गई।

न्यायाधीश ने अर्जुन को देखा।

—क्या आपने बच्ची के जन्म दस्तावेजों में बदलाव की प्रक्रिया मां की जानकारी के बिना शुरू की?

अर्जुन ने होंठ भींचे।

—गलती हो गई।

मीरा ने पहली बार अदालत में सिर उठाया।

गलती।

कितना आसान शब्द था।

झूठी सहमति गलती।

छिपा बेटा गलती।

पत्नी को अस्थिर साबित करने की तैयारी गलती।

बच्ची को दूसरी औरत की गोद में रखने की योजना गलती।

अदालत ने अंतरिम आदेश दिया। अर्जुन को अनाया से सिर्फ निगरानी में मिलने की अनुमति मिली। वह बच्ची को शहर से बाहर नहीं ले जा सकता था। वह मीरा से सीधे संपर्क नहीं कर सकता था। जन्म प्रमाणपत्र का आवेदन तुरंत रोक दिया गया और हस्ताक्षर जांच के लिए भेजे गए। विहान के मामले में भी पितृत्व और भरण-पोषण की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।

काव्या बाहर गलियारे में बैठकर रो रही थी। मीरा उसके पास से निकल गई, लेकिन काव्या ने पुकारा।

—मीरा।

मीरा रुकी।

—मैंने सच में सोचा था, अनाया के आने से मेरा खालीपन भर जाएगा।

मीरा ने थकी हुई आंखों से उसे देखा।

—किसी और की बेटी खालीपन भरने की चीज नहीं होती।

काव्या ने सिर हिलाया।

—अब समझ गई हूं।

—विहान को छिपाना बंद करो। उसे सच चाहिए, अर्जुन की दया नहीं।

काव्या ने विहान का हाथ पकड़ लिया। उस दिन पहली बार मीरा ने उसके चेहरे पर लालच से ज्यादा अपराधबोध देखा।

1 महीने बाद मीरा ने पहली फोटो डाली। अनाया का चेहरा नहीं। सिर्फ उसकी छोटी हथेली, मीरा की उंगली पकड़े हुए। गुलाबी कपड़े की कलाई पट्टी, खिड़की की सफेद रोशनी, पीछे धुंधला-सा गमला।

कैप्शन था:

“मेरी बेटी मौजूद है। मेरी मातृत्व भी।”

उसने अर्जुन को टैग नहीं किया।

किसी से अनुमति नहीं ली।

राधिका ने कमेंट किया:

“अब तुम फिर से फ्रेम में हो।”

मीरा वह पढ़कर रो पड़ी।

क्योंकि सच यही था। 6 महीने तक वह अपने ही घर में तस्वीर से बाहर खड़ी औरत थी। थकी हुई पत्नी। दूध से भीगा शरीर। अनसुनी मां। वह औरत जिसे छिपा दिया गया था ताकि किसी और की भावनाएं न टूटें।

लेकिन अब वह छिपने वाली नहीं थी।

1 साल बीत गया। केस धीमे चला, जैसे भारत में कागज चलते हैं—मेज से मेज, हस्ताक्षर से हस्ताक्षर, तारीख से तारीख। लेकिन हर तारीख मीरा के पक्ष में एक कदम बनती गई। अर्जुन को विहान को कानूनी रूप से स्वीकार करना पड़ा। उसके लिए भरण-पोषण देना पड़ा। अनाया के दस्तावेजों से छेड़छाड़ की जांच चलती रही। अनाया से उसकी मुलाकातें अब भी निगरानी में थीं।

मीरा ने काम फिर से शुरू किया। पहले 2 घंटे, फिर आधा दिन। नंदिनी ने संभाला। उसकी मां आईं, घर में हल्दी वाला दूध, मूंग की खिचड़ी और पुराने भजन लेकर। धीरे-धीरे मीरा ने अपना शरीर दुश्मन की तरह देखना बंद किया। उसके पेट की ढीली त्वचा अब हार नहीं लगती थी। वह सबूत थी कि उसने जीवन को अपने अंदर जगह दी थी।

एक दिन वह अनाया को लेकर बांद्रा की उसी गली से गुजरी। बारिश के बाद सड़कें गीली थीं। फूलों की दुकान पर गेंदा और चमेली बिक रहे थे। अनाया अब चलने लगी थी, लड़खड़ाते कदमों से, हर 3 कदम पर रुककर कुछ उठाने की कोशिश करती हुई।

स्टूडियो का दरवाजा खुला था। राधिका बाहर आई।

—नई शूट?

मीरा मुस्कुराई।

—इस बार उसके साथ।

राधिका ने कैमरा उठाया।

—जैसा शुरू से होना चाहिए था।

उन्होंने छोटे आंगन में तस्वीरें लीं। अनाया ने बिल्कुल सहयोग नहीं किया। उसने जूते उतार दिए। फूल फेंके। मीरा के बाल खींचे। एक बार कैमरे की तरफ जीभ निकाल दी। सबसे अच्छी तस्वीर में मीरा पीछे की ओर सिर झुकाकर हंस रही थी और अनाया दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ रही थी।

तस्वीर में मीरा परफेक्ट नहीं लग रही थी।

वह जीवित लग रही थी।

उस रात उसने वह फोटो पोस्ट की।

बिना डर।

बिना अनुमति।

बिना किसी काव्या, किसी अर्जुन, किसी समाज की उदासी के लिए अपनी बेटी को छिपाए।

कुछ देर बाद अर्जुन का संदेश आया।

“तुम यह सब अलग तरीके से संभाल सकती थीं।”

मीरा ने संदेश पढ़ा।

फिर मिटा दिया।

कभी-कभी जीतने के लिए जवाब देना जरूरी नहीं होता।

अनाया बगल में सो रही थी। उसका मुंह थोड़ा खुला था और 1 पैर कंबल से बाहर। मीरा ने उसका पैर ढका, माथे पर चुंबन दिया और देर तक उसे देखती रही।

उसे वह पहली सुबह याद आई, जब उसने अनाया की तस्वीर डालनी चाही थी।

अर्जुन की मुलायम आवाज।

काव्या का दर्द।

वह कैमरा।

वह फोटो।

वह पीला लिफाफा।

उसे लगा, अगर उस दिन उसने गुस्से में फोटोग्राफर न बुलाया होता, तो शायद उसकी बेटी की कहानी किसी और के नाम से लिखी जा रही होती।

कैमरे ने सिर्फ झूठ नहीं पकड़ा था।

उसने मीरा को उसकी अपनी आंखें लौटा दी थीं।

और उस दिन के बाद मीरा ने सीख लिया कि मां चाहे कितनी भी थकी हो, बिखरी हो, दूध से भीगी हो, रोते-रोते सोई हो, अगर कोई उसे उसकी बेटी की कहानी से मिटाने की कोशिश करे, तो वह फोकस करना सीख जाती है।

और जब मां फोकस करती है, तो सच धुंधला नहीं रहता।

वह पूरी तस्वीर बनकर सामने आ जाता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.