
PART 1
“आपका बेटा चुपचाप नहीं गया था, आंटी… और किसी ने उसका बैग जानबूझकर छिपाया था।”
लखनऊ के गोमती नगर की उस सुबह, मदर्स डे पर, जब पूरा मोहल्ला व्हाट्सऐप पर फूल और दिल भेज रहा था, नंदिता के दरवाज़े पर 8 साल की एक दुबली-सी बच्ची खड़ी थी। उसकी दो चोटियाँ खुलकर कंधों पर बिखर गई थीं, आँखें सूजी हुई थीं, और सीने से वह लाल रंग का छोटा भीम वाला स्कूल बैग चिपकाए खड़ी थी।
वही बैग, जिसे आरव हर सुबह अपनी पीठ पर टेढ़ा लटकाकर कहता था, “मम्मा, मैं बड़ा होकर आपसे भी तेज़ भागूँगा।”
एक हफ्ते पहले आरव स्कूल में मर गया था।
वह 8 साल का था।
स्कूल की प्रिंसिपल मीरा मेहरा ने कहा था कि आरव क्लास में अचानक गिर पड़ा। क्लास टीचर रितु मैम रोते हुए बोली थीं कि बच्चों के सामने सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि किसी को समझने का मौका ही नहीं मिला। डॉक्टर ने एक अनजानी दिल की बीमारी का नाम लिया था, जिसे सुनकर नंदिता को लगा जैसे किसी ने उसके बच्चे की पूरी ज़िंदगी को एक मेडिकल रिपोर्ट में बंद कर दिया हो।
सब लोग एक ही बात कह रहे थे।
“नंदिता जी, किसी के हाथ में कुछ नहीं था।”
लेकिन एक बात नंदिता के गले से नीचे नहीं उतर रही थी।
आरव का बैग उसी दिन गायब हो गया था।
नंदिता ने स्कूल में पूछा। रिसेप्शन पर पूछा। प्रिंसिपल से पूछा। उस आया से पूछा जो बच्चों की बोतलें भरती थी। एंबुलेंस वाले से पूछा। यहाँ तक कि पुलिस चौकी में बैठे सिपाही से भी पूछा, जिसने बस धीमी आवाज़ में कहा, “मैडम, ऐसी अफरा-तफरी में चीज़ें इधर-उधर हो जाती हैं।”
नंदिता ने उसकी आँखों में देखकर कहा था, “मेरा बच्चा इधर-उधर नहीं हुआ, साहब। वह मेरी गोद से हमेशा के लिए चला गया। उसका बैग कोई पेंसिल बॉक्स नहीं था कि गुम हो जाए।”
सिपाही चुप हो गया।
चुप तो सब हो गए थे। और यही चुप्पी नंदिता को अंदर से खा रही थी।
उस मदर्स डे की सुबह वह ड्रॉइंग रूम के फर्श पर बैठी थी। सामने छोटी मेज़ पर आरव की स्टील की कटोरी रखी थी। हर साल वह उसी कटोरी में कॉर्नफ्लेक्स डालकर, आधा दूध मेज़ पर गिराकर, खुद को दुनिया का सबसे बड़ा शेफ समझता था। फिर बाहर गमले से कोई भी फूल तोड़कर लाता और कहता, “मम्मा, यह महंगा वाला गुलदस्ता है।”
इस बार मेज़ साफ थी।
कटोरी खाली थी।
घर में सिर्फ उसकी डायनासोर वाली रजाई की गंध बची थी।
तभी घंटी बजी।
नंदिता ने सोचा, फिर कोई पड़ोसन हलवा लेकर आई होगी। फिर कोई रिश्तेदार आएगा और कहेगा, “भगवान की मर्ज़ी थी।” फिर कोई उसे समझाएगा कि माँओं को मजबूत रहना पड़ता है।
वह नहीं उठी।
घंटी फिर बजी।
फिर दरवाज़ा ऐसे पीटा गया जैसे बाहर कोई बच्चा डर से काँप रहा हो।
नंदिता ने दरवाज़ा खोला।
बाहर वही बच्ची खड़ी थी।
“आप आरव की मम्मी हैं?” उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
नंदिता की साँस अटक गई।
“हाँ।”
बच्ची ने बैग और कसकर पकड़ लिया।
“आप इसे ढूँढ रही थीं ना?”
नंदिता ने हाथ बढ़ाया, पर बच्ची पीछे हट गई।
“पहले मुझे सच बोलना है,” उसने लगभग फुसफुसाकर कहा, “वरना मैं डर जाऊँगी और भाग जाऊँगी।”
नंदिता ने खुद को संभाला।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“काव्या।”
नंदिता ने उसे अंदर बुलाया। रसोई की कुर्सी पर बैठाया। पानी दिया। बच्ची ने गिलास पकड़ा, पर पिया नहीं। उसने बैग को मेज़ पर बहुत धीरे से रखा, जैसे वह कोई प्रसाद हो, कोई आखिरी निशानी।
“आरव ने मुझे कहा था कि इसे संभालकर रखना,” काव्या बोली। “वह मेरा दोस्त था।”
“कब कहा था उसने?”
काव्या ने सिर झुका लिया।
“जिस दिन वह गिरा था।”
नंदिता के हाथ काँपने लगे। उसने बैग की चेन खोली।
अंदर सफेद और बैंगनी ऊन थी, प्लास्टिक की छोटी बुनाई वाली सुइयाँ, मुड़ी हुई पन्नी में कोई अधूरा आकार, और एक कागज़, जिस पर बच्चों वाली टेढ़ी लिखावट थी।
नंदिता ने पन्नी हटाई।
अंदर ऊन से बना अधूरा यूनिकॉर्न था।
एक पैर अधूरा। एक कान दूसरे से बड़ा। सींग तिरछा। पूँछ इतनी उलझी हुई कि जैसे हवा में फँस गई हो।
“वह आपके लिए बना रहा था,” काव्या रो पड़ी। “रितु मैम ने कहा था कि हाथ से बना गिफ्ट सबसे अच्छा होता है, क्योंकि उसमें प्यार होता है।”
नंदिता ने यूनिकॉर्न को सीने से लगा लिया।
“लेकिन आरव को तो डायनासोर पसंद थे…”
“हाँ,” काव्या ने आँसू पोंछे, “पर उसने कहा था कि आपको यूनिकॉर्न पसंद हैं।”
नंदिता को अपनी पुरानी सफेद मग याद आई, जिस पर फीका पड़ा यूनिकॉर्न बना था। एक दिन उसने हँसते हुए आरव से कहा था कि यह मग बहुत बदसूरत है, फिर भी उसे प्यारा लगता है।
आरव ने वह बात याद रखी थी।
ऊन के नीचे एक कार्ड था।
मम्मा,
अभी पूरा नहीं हुआ है। हँसना मत। काव्या कहती है सींग बनाना सबसे मुश्किल है।
मैं आपसे कॉर्नफ्लेक्स वाले नाश्ते से भी ज़्यादा प्यार करता हूँ।
आरव।
नंदिता ने मुँह पर हाथ रख लिया, ताकि चीख बाहर न निकले।
तभी काव्या ने बैग के अंदर से एक और कागज़ निकाला।
वह 4 तह में मुड़ा हुआ था।
“यह भी है,” उसने कहा।
और जब नंदिता ने वह पन्ना खोला, तो उसके दुःख की जगह उसके भीतर आग जलने लगी।
क्योंकि उसके बेटे ने मरने से ठीक पहले जो लिखा था, वह किसी बीमारी की कहानी नहीं थी।
वह किसी बड़े झूठ की शुरुआत थी।
PART 2
कागज़ पर आरव की लिखावट काँप रही थी।
मम्मा,
माफ कर देना। मैंने मदर्स डे वाला बोर्ड खराब नहीं किया। मैं बुरा बच्चा नहीं हूँ। आप बीमार थीं, इसलिए मैंने आपको परेशान नहीं किया। मुझे सीने में दर्द होता है, पर मैं ठीक हो जाऊँगा। आप मत रोना।
आपका आरव।
नंदिता ने वह पन्ना 1 बार पढ़ा।
फिर 2 बार।
फिर उसकी आँखों के आगे सब धुँधला गया।
“यह किसने लिखवाया?” उसकी आवाज़ सूखी हुई थी।
काव्या ने दोनों हाथ घुटनों पर कस लिए।
“रितु मैम ने। उन्होंने कहा था, गलती मानो, नहीं तो तुम्हारी मम्मी को बुलाकर शर्मिंदा करूँगी।”
“गलती क्या थी?”
“मदर्स डे का बोर्ड खराब हो गया था। रंग गिर गया था। लेकिन आरव ने नहीं किया था।” काव्या सिसकने लगी। “रुद्र ने टेबल धक्का दिया था। वह ट्रस्टी सर का पोता है। सब उससे डरते हैं। उसने बोला कि आरव ने किया। बाकी बच्चों ने भी वही बोल दिया।”
नंदिता का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
“और रितु मैम?”
“उन्होंने आरव की बात नहीं सुनी। आरव कहता रहा, ‘मेरी मम्मी जानती हैं मैं झूठ नहीं बोलता।’ पर मैम ने कहा, ‘अच्छे बच्चे भी अपनी माँ का दिल तोड़ देते हैं।’”
यह सुनते ही नंदिता कुर्सी पकड़कर खड़ी रही, वरना गिर जाती।
“उसके बाद?”
“वह पीछे वाली डेस्क पर बैठकर रो रहा था। आवाज़ भी नहीं कर रहा था। फिर उसने मुझसे कहा कि सीने में बहुत दबाव है। मैंने पानी दिया। वह बोला, बैग संभाल लेना, गिफ्ट मम्मा को मदर्स डे पर देना। फिर वह खड़ा हुआ… और गिर गया।”
काव्या ने रोते हुए फुसफुसाया, “प्रिंसिपल मैम ने बैग उठाया था। मैंने उन्हें ऑफिस में रखते देखा। बाद में जब सब बाहर गए, मैंने बैग ले लिया। मुझे लगा, वे पत्र फेंक देंगी।”
नंदिता ने काव्या को बाँहों में भर लिया।
तभी काव्या ने आखिरी बात कही।
“आंटी… ऑफिस में कैमरा भी था। और रितु मैम ने प्रिंसिपल मैम से कहा था, ‘मैडम, अगर फुटेज बाहर गई तो रुद्र के दादा स्कूल की फंडिंग रोक देंगे।’”
नंदिता के आँसू रुक गए।
अब उसके चेहरे पर सिर्फ एक माँ की आग थी।
PART 3
अगली सुबह नंदिता ने आरव का लाल बैग अपनी गोद में रखा और स्कूल पहुँची। बैग में कार्ड था, अधूरा यूनिकॉर्न था, माफी वाला पन्ना था और वह सच था जिसे सबने दबाने की कोशिश की थी।
सिटी मॉन्टेसरी जूनियर विंग का गेट पहले जैसा ही चमक रहा था। बाहर गार्ड ने उसे देखते ही सिर झुका लिया। अंदर लॉबी में अब भी मदर्स डे की सजावट लटकी थी। गुलाबी कागज़ के दिल, चमकीली रिबन, बच्चों की हथेलियों के रंगीन निशान।
सब कुछ उत्सव जैसा था।
सिवाय उस खाली जगह के, जहाँ आरव का नाम होना चाहिए था।
काव्या अपने नाना हरिनारायण के साथ आई थी। हरिनारायण पुराने डाक विभाग से रिटायर हुए थे। सस्ती सफेद शर्ट, घिसी हुई चप्पलें, आँखों में संकोच और माथे पर बेचैनी। उन्होंने नंदिता को देखते ही हाथ जोड़ दिए।
“बिटिया डर रही है,” उन्होंने धीमे से कहा। “रात भर सोई नहीं। बोलती रही कि रितु मैम गुस्सा होंगी।”
नंदिता ने काव्या का हाथ थाम लिया।
“अब कोई बच्ची सच बोलने के लिए डराई नहीं जाएगी।”
वे सीधे क्लास 3-B के बाहर पहुँचे।
रितु मैम दरवाज़े पर ही मिल गईं। उनके हाथ में रजिस्टर था, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में वही घबराहट थी जो किसी अपराधबोध से नहीं, पकड़े जाने के डर से आती है।
उनकी नज़र बैग पर पड़ी।
रंग उनके चेहरे से उतर गया।
“काव्या,” उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा, “यह बैग तुम्हारे पास कैसे आया?”
काव्या नंदिता के पीछे छिप गई।
नंदिता ने आगे बढ़कर कहा, “यह सवाल मुझसे पूछिए। और जवाब देने से पहले याद रखिए, यह बैग मेरे बच्चे की आखिरी चीज़ है, कोई खोया-पाया सामान नहीं।”
रितु मैम ने आवाज़ धीमी की।
“नंदिता जी, आप दुख में हैं। हम समझते हैं। पर इस तरह बच्चों के सामने—”
“मेरे बच्चे को भी बच्चों के सामने शर्मिंदा किया गया था,” नंदिता ने बीच में काटा। “तो सच भी बच्चों के सामने ही शुरू होगा।”
आसपास कुछ बच्चे रुक गए थे। दो आया भी पास आ गईं। बात फैलते देर नहीं लगी। कुछ ही मिनटों में प्रिंसिपल मीरा मेहरा भी आ गईं। हमेशा की तरह साड़ी बिल्कुल करीने से, बाल जूड़े में, चेहरे पर वह मीठी मुस्कान जो दरवाज़े बंद करने के काम आती थी।
“मिसेज़ नंदिता,” उन्होंने कहा, “कृपया मेरे ऑफिस में चलिए। यह भावनात्मक मामला है।”
“नहीं,” नंदिता बोली। “यह भावनात्मक नहीं, नैतिक मामला है। और शायद कानूनी भी।”
मीरा मेहरा की मुस्कान हल्की-सी टूट गई।
नंदिता ने बैग खोला और वह पन्ना निकाला।
“क्या आपने मेरे बेटे से यह माफी लिखवाई थी?”
रितु मैम ने होंठ भींच लिए।
“मैंने उसे अनुशासन सिखाने के लिए—”
“उसने बोर्ड खराब किया था?”
कोई उत्तर नहीं आया।
“मैं पूछ रही हूँ, मेरे बेटे ने बोर्ड खराब किया था?”
रितु मैम ने नीचे देखा।
“मुझे उस समय लगा कि—”
“सच बोलिए।”
लंबी चुप्पी के बाद रितु मैम की आवाज़ निकली।
“नहीं। मैंने अपनी आँखों से उसे करते नहीं देखा था।”
काव्या ने नंदिता का हाथ कसकर पकड़ लिया।
नंदिता ने दूसरा पन्ना उठाया, आरव का कार्ड।
“वह अपनी माँ के लिए गिफ्ट बना रहा था। आप उसे झूठा बना रही थीं। वह सीने में दर्द बताने की कोशिश कर रहा था। आपने सुना?”
रितु मैम की आँखें भर आईं।
“क्लास में बहुत शोर था…”
“दर्द शोर में भी दर्द ही होता है, मैम।”
मीरा मेहरा ने तुरंत दखल दिया।
“हमें मेडिकल कारणों का सम्मान करना चाहिए। डॉक्टर ने साफ कहा था कि बच्चे को पहले से—”
“डॉक्टर ने यह नहीं कहा था कि बच्चे को मरने से पहले अपमानित करो,” नंदिता की आवाज़ काँप रही थी, पर वह टूटी नहीं। “डॉक्टर ने यह नहीं कहा था कि उसका बैग छिपाओ।”
मीरा मेहरा का चेहरा बदल गया।
“बैग छिपाया नहीं गया था। वह सुरक्षित रखा गया था।”
“फिर मुझे बताया क्यों नहीं गया?”
“हम उचित समय—”
“मेरे 8 साल के बेटे की माँ को उसकी आखिरी चीज़ देने का उचित समय कौन तय करेगा? आप?”
हरिनारायण आगे आए।
“मेरी नातिन ने बताया कि ऑफिस में कैमरा है। फुटेज देख लीजिए। सच सामने आ जाएगा।”
मीरा मेहरा ने आँखें तरेरीं।
“बच्चे कई बार कल्पना—”
“मेरी नातिन झूठ नहीं बोलती,” बूढ़े आदमी की आवाज़ धीमी थी, मगर इस बार उसमें काँपता हुआ साहस था।
उसी वक्त नंदिता ने अपना फोन निकाला।
“मैंने कल रात ही स्कूल मैनेजमेंट बोर्ड, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी और जिला शिक्षा अधिकारी को मेल भेज दिया है। आरव के पन्नों की तस्वीरें, काव्या का बयान, और बैग छिपाए जाने की जानकारी भी। आज मैं फुटेज माँगने आई हूँ। अगर आप सहयोग नहीं करेंगी, तो वे लोग खुद माँगेंगे।”
यह सुनते ही मीरा मेहरा का चेहरा पूरी तरह उतर गया।
रितु मैम रो पड़ीं।
“मैडम, फुटेज डिलीट नहीं हुई है,” उन्होंने धीमे से कहा।
मीरा मेहरा ने उन्हें घूरा।
“रितु!”
“मैं और झूठ नहीं बोल सकती,” रितु मैम की आवाज़ टूट गई। “आरव को मैंने माफी लिखवाई। गलती मेरी थी। लेकिन फुटेज ऑफिस में है। मैडम ने कहा था कि मामला शांत रखो, वरना रुद्र के दादा स्कूल की नई बिल्डिंग का पैसा रोक देंगे।”
गलियारे में खामोशी गिर गई।
बच्चों की धीमी फुसफुसाहट भी रुक गई।
नंदिता ने रितु मैम को देखा। उसके भीतर गुस्सा था, बहुत गुस्सा। पर उससे भी बड़ा था वह असहनीय दुःख कि अब सच बोलने से आरव वापस नहीं आएगा।
“आपको यह बात उस दिन बोलनी थी,” उसने कहा। “जब मेरा बच्चा जमीन पर पड़ा था। जब उसका बैग ऑफिस में रखवाया जा रहा था। जब मैं दर-दर पूछ रही थी।”
रितु मैम हाथ जोड़कर रोती रहीं।
“मुझसे गलती हो गई।”
“गलती वह होती है जब कॉपी घर रह जाए। जब एक बच्चा आखिरी साँसों में खुद को बुरा समझता रहे, वह गलती नहीं रहती।”
उस दिन बात स्कूल के गलियारे से बाहर निकल गई।
मैनेजमेंट बोर्ड ने तुरंत आपात बैठक बुलाई। कैमरा फुटेज देखा गया। उसमें साफ दिख रहा था कि रुद्र खेलते-खेलते टेबल को धक्का देता है, बैंगनी रंग गिरता है, आरव पीछे हटकर काव्या की फूल वाली शीट बचाने की कोशिश करता है। फिर क्लास में आरोप लगते हैं। रितु मैम आरव को पीछे बैठाती हैं। वह सीने पर हाथ रखता है। काव्या पानी देती है। आरव बैग की ओर इशारा करता है। फिर उसकी छोटी देह अचानक जमीन पर गिर जाती है।
फुटेज देखते समय नंदिता ने आवाज़ नहीं की।
क्योंकि कुछ दर्द चीख से बड़ा होता है।
मीरा मेहरा को जाँच पूरी होने तक पद से हटाया गया। रितु मैम को सस्पेंड कर दिया गया। रुद्र के परिवार ने पहले दबाव डालने की कोशिश की, फिर जब बात जिला शिक्षा अधिकारी तक पहुँची, तो उनका नाम भी रिपोर्ट में दर्ज हुआ। स्कूल को लिखित माफी जारी करनी पड़ी। हर क्लास में मेडिकल इमरजेंसी, शिकायत सुनवाई और बिना जाँच सजा न देने के नए नियम लगाए गए।
यह सब सुनकर लोग बोले, “न्याय मिल गया।”
पर नंदिता जानती थी, यह न्याय नहीं था।
न्याय तो तब होता, जब आरव शाम को घर आता, जूते उतारकर सोफे पर फेंकता और कहता, “मम्मा, आज मैंने सच बोला था।”
फिर भी एक चीज़ बदली।
आरव के नाम से झूठ हट गया।
1 हफ्ते बाद स्कूल ने मदर्स डे का रुका हुआ कार्यक्रम रखा। नंदिता जाना नहीं चाहती थी। उस स्कूल की दीवारें उसे काटती थीं। वह रंगीन चार्ट उसे जली हुई राख जैसे लगते थे। पर काव्या ने फोन पर धीरे से पूछा, “आंटी, आप आएँगी? आरव का नाम पढ़ा जाएगा।”
नंदिता गई।
वह हल्की सफेद सूती साड़ी पहनकर पहुँची, वही जो आरव को पसंद थी, क्योंकि वह कहता था कि इसमें मम्मा बादल जैसी लगती हैं। उसके हाथ में आरव का बैग था।
ऑडिटोरियम भरा हुआ था। माताएँ कुर्सियों पर बैठी थीं। बच्चे मंच के पीछे खड़े थे। कुछ पिता मोबाइल उठाए रिकॉर्डिंग कर रहे थे। हवा में अगरबत्ती और ताजे गेंदा फूलों की मिली-जुली गंध थी।
कार्यक्रम शुरू होने से पहले एक नई कार्यवाहक प्रिंसिपल मंच पर आईं।
“आज हम एक बच्चे से माफी माँगेंगे,” उन्होंने कहा, “जो अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन जिसकी सच्चाई हमसे जवाब माँगती रहेगी।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
रितु मैम मंच पर आईं। चेहरा सूजा हुआ था। हाथ में कागज़ काँप रहा था।
“आरव शर्मा को मदर्स डे बोर्ड खराब करने के लिए दोषी ठहराया गया था। यह आरोप झूठा था। मैंने बिना पूरी बात सुने उसे माफी लिखने को कहा। मैंने उसके दर्द को गंभीरता से नहीं लिया। मैं एक शिक्षक के रूप में असफल रही।”
कुछ माताएँ रोने लगीं।
नंदिता की आँखें मंच पर नहीं, अपने बैग पर थीं।
फिर काव्या उठी।
उसने हाथ में एक छोटी-सी कपड़े की थैली पकड़ी हुई थी। वह धीरे-धीरे नंदिता के पास आई। उसकी चाल में डर भी था और गर्व भी।
“आंटी,” उसने कहा, “मैंने उसे पूरा कर दिया।”
उसने थैली खोली।
वह वही यूनिकॉर्न था।
अब उसका चौथा पैर भी था। सींग अब भी तिरछा था। एक कान बहुत बड़ा था। बैंगनी अयाल उलझी हुई थी। पेट थोड़ा टेढ़ा था। लेकिन अब वह अधूरा नहीं था।
नंदिता की साँस भर आई।
“बहुत सुंदर है।”
काव्या ने होंठ काटे।
“आरव ने कहा था, आप बदसूरत चीज़ें भी नहीं फेंकतीं, अगर कोई प्यार से बनाए।”
नंदिता हँसते-हँसते रो पड़ी।
“वह सही कहता था।”
“मैंने आखिरी टांके लगाए हैं,” काव्या बोली। “इसलिए यह थोड़ा मेरा भी है।”
नंदिता ने यूनिकॉर्न को सीने से लगा लिया।
“तो यह तुम दोनों का है।”
कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह काव्या और हरिनारायण को अपने घर ले आई। उस दिन उसने राजमा-चावल बनाया, आलू के पराठे सेंके और मेज़ पर 3 प्लेटें रखीं।
फिर कुछ पल रुककर उसने चौथी प्लेट भी रखी।
उस प्लेट के सामने आरव की स्टील की कटोरी रखी। उसमें सूखे कॉर्नफ्लेक्स डाले। दूध का गिलास बगल में रखा, ठीक वैसे ही जैसे आरव हर साल गिरा-फैलाकर करता था।
काव्या ने कुछ नहीं पूछा।
वह बस यूनिकॉर्न उठाकर उस चौथी प्लेट के पास रख आई।
हरिनारायण ने चुपचाप आँखें पोंछीं।
नंदिता ने पहली बार अपने घर में आरव की खाली कुर्सी को देखकर भागने की कोशिश नहीं की। उसने उस कुर्सी को देखा, फिर उस तिरछे यूनिकॉर्न को, फिर काव्या को।
“तुम जब चाहो आ सकती हो,” उसने धीरे से कहा।
काव्या ने सिर उठाया।
“सच में?”
“हाँ। इस घर में एक बच्चे की दोस्ती बची है। उसे बंद नहीं किया जाएगा।”
उस शाम जब सूरज गोमती नदी के उस पार उतर रहा था, नंदिता ने आरव का बैग अलमारी में नहीं रखा। उसने उसे ड्रॉइंग रूम की दीवार पर एक छोटी लकड़ी की खूंटी पर टाँग दिया।
बैग के नीचे उसने कार्ड फ्रेम करवाकर रखा।
मम्मा,
अभी पूरा नहीं हुआ है। हँसना मत।
नंदिता ने उस लाइन को बार-बार पढ़ा।
आरव का गिफ्ट सचमुच पूरा नहीं हुआ था। उसका बचपन पूरा नहीं हुआ था। उसकी आवाज़ पूरी नहीं हुई थी। उसकी स्कूल डायरी में अभी कई खाली पन्ने थे।
लेकिन एक बच्ची ने डर से बड़ी दोस्ती चुनी।
एक माँ ने शोक से बड़ी सच्चाई चुनी।
और एक छोटे-से लाल बैग ने पूरे स्कूल को याद दिला दिया कि बच्चों की चुप्पी कभी हल्की चीज़ नहीं होती।
कभी-कभी वह चुप्पी एक आखिरी पुकार होती है।
और कभी-कभी, किसी मदर्स डे की सुबह, वह पुकार दरवाज़े पर खड़ी मिलती है—दो खुली चोटियों, काँपते हाथों और सीने से चिपकाए एक बैग के साथ।
Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.