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बेटी की अस्थियां बहाए 5 दिन ही हुए थे कि रात 2:07 पर स्कूल की सहायिका ने फोन कर कहा, “आपके पति ने झूठ बोला है।” मैं चीखी नहीं, बस 43 सेकंड का वीडियो खोला और समझ गई कि वह कैमरे क्यों मिटवाना चाहता था।

PART 1

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बेटी की अस्थियां गंगा में बहाए अभी 5 दिन भी पूरे नहीं हुए थे कि रात 2:07 पर नंदिता शर्मा के फोन पर आई एक आवाज़ ने उसके पति का पूरा मातम झूठ में बदल दिया।

“मैडम… आपने तारा को नहीं मारा। आपके पति ने झूठ बोला है। वह जागने से पहले वीडियो देख लीजिए।”

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नंदिता दिल्ली के लाजपत नगर वाले अपने फ्लैट के बेड के किनारे पत्थर की तरह बैठी रह गई। फोन पर कांपती हुई आवाज़ मीरा की थी, वही सहायिका जो तारा की प्ले-स्कूल क्लास में बच्चों को खाना खिलाती, जूते पहनाती और दोपहर में लोरी गुनगुनाती थी।

पास ही राघव शर्मा पेट के बल सो रहा था। वही राघव, जो निगमबोध घाट पर तारा की छोटी गुलाबी पानी की बोतल सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोया था। वही राघव, जो 5 दिनों से नंदिता के कान में धीरे-धीरे जहर घोल रहा था—“कभी-कभी मां से भी गलती हो जाती है।”

ड्राइंग रूम में तारा की छोटी सफेद कलश पीतल की थाली में रखी थी। उसके पास गेंदे की माला, कपूर की हल्की गंध और फ्रेम में लगी एक तस्वीर थी—4 साल की तारा, इंडिया गेट के लॉन में लाल बर्फ का गोला पकड़े, हंसती हुई। नंदिता ने वह तस्वीर इसलिए चुनी थी क्योंकि उसमें उसकी बच्ची अभी भी पूरी दुनिया से बेखबर जिंदा लग रही थी।

उस सुबह तारा ने आलू पराठे के 2 छोटे टुकड़े खाए थे, बिना मक्खन के। उसकी प्लेट अलग थी, चम्मच अलग, पानी की बोतल अलग। तारा को दूध और दूध से बनी हर चीज़ से जानलेवा एलर्जी थी। दूध, दही, पनीर, घी, क्रीम, मिल्क चॉकलेट—सब मौत जैसे शब्द थे। नंदिता हर पैकेट का लेबल ऐसे पढ़ती थी जैसे कोई मां मंत्र पढ़ रही हो। उसके पर्स में हमेशा 2 एड्रेनालिन पेन रहते थे, लाल पाउच में।

उस दिन नंदिता को साकेत कोर्ट में जरूरी सुनवाई के लिए जाना था। राघव ने मुस्कुराकर कहा था, “मैं छोड़ दूंगा उसे। तुम देर कर दोगी।”

नंदिता ने 3 बार कहा था, “मीरा को पाउच देना मत भूलना।”

राघव ने हंसकर जवाब दिया था, “मैं उसका बाप हूं, चौकीदार नहीं।”

दोपहर 11:26 पर स्कूल से फोन आया। तारा को सांस नहीं आ रही थी। उसे एम्स ले जाया गया। जब नंदिता पहुंची, राघव अस्पताल के कॉरिडोर में रो रहा था। डॉक्टरों ने कहा—भयानक एलर्जिक रिएक्शन। उसके शरीर में दूध वाली कोई चीज़ गई थी।

फिर सब कुछ राख बन गया। राघव ने पोस्टमार्टम से मना किया। उसने कहा, “बच्ची को और मत काटो।” उसने जल्दी अंतिम संस्कार करवाया। उसने परिवार के सामने नंदिता को संभाला और रात को अकेले में पूछा, “सुबह तुमने कहीं गलती से मक्खन तो नहीं लगा दिया था?”

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अब नंदिता के फोन पर 43 सेकंड का वीडियो था।

उसने बिना आवाज़ किए कमरे से बाहर आकर वीडियो खोला।

स्कूल के गेट के बाहर राघव तारा का हाथ पकड़े खड़ा था। तभी एक काली कार रुकी। उसमें से एक खूबसूरत औरत उतरी—काव्या मल्होत्रा, राघव की कंपनी की नई क्लाइंट हेड। राघव ने कई बार उसका नाम यूं लिया था जैसे कोई बात मामूली हो, मगर छिपानी जरूरी हो।

काव्या ने झुककर तारा को गुलाबी रंग का गाढ़ा पेय दिया। तारा मुस्कुराई। राघव ने बोतल नहीं छीनी। उसने पूछा भी नहीं। उसने सिर्फ चारों तरफ देखा, काव्या की कमर पर हाथ रखा और उसके होंठों को जल्दी से चूम लिया।

फिर तारा वही पेय पीते हुए स्कूल के अंदर चली गई।

नंदिता की सांस रुक गई।

PART 2

नंदिता ने दीवार पकड़ ली, वरना वह वहीं गिर पड़ती। उसकी बच्ची ने ज़हर नहीं चुना था। उसने अपने पिता पर भरोसा किया था।

उसने मीरा को दोबारा फोन किया।

मीरा रो रही थी। “मैडम, असली रिकॉर्डिंग मिटा दी गई। मैंने स्क्रीन का वीडियो चुपके से बना लिया। राघव सर उसी दोपहर स्कूल आए थे, एक वकील के साथ। उन्होंने कहा मामला बाहर गया तो स्कूल बंद हो जाएगा। फिर ट्रस्ट को बड़ा दान देने की बात की।”

नंदिता की उंगलियां सुन्न हो गईं।

“तारा ने कुछ कहा था?” उसने पूछा।

मीरा की आवाज़ टूट गई। “जब मैंने पूछा यह क्या है, वह गला खुजाते हुए बोली—‘पापा ने कहा है, मैं पी सकती हूं।’”

यह वाक्य नंदिता के सीने में ऐसे धंसा जैसे राख के नीचे बची आखिरी चिंगारी भी किसी ने कुचल दी हो।

उसने उस रात राघव को नहीं जगाया।

सुबह उसने उसकी चाय बनाई। उसकी आंखों में देखा। उसके झूठ को सांस लेते देखा। और उसी शाम उसने काव्या को एक झूठे कारोबारी मेल से खान मार्केट के कैफे में बुलाया।

काव्या आई। नंदिता पहले से बैठी थी।

“बैठिए,” नंदिता ने कहा, “अब तारा की मौत की असली कहानी शुरू होती है।”

PART 3

काव्या का चेहरा नंदिता को देखते ही सफेद पड़ गया। महंगे बेज रंग के कुर्ते, हीरे की छोटी बालियां और सलीके से बंधे बालों के पीछे जो आत्मविश्वास छिपा था, वह एक ही पल में टूट गया।

“मुझे नहीं पता था कि आप होंगी,” काव्या बमुश्किल बोली।

“मुझे बहुत अच्छी तरह पता था कि आप कौन हैं,” नंदिता ने कहा। “लेकिन मैं आपके और मेरे पति के रिश्ते पर बात करने नहीं आई।”

काव्या ने नज़रें झुका लीं।

“फिर?”

“तारा को दिया गया गुलाबी पेय।”

काव्या की उंगलियां कप के किनारे पर रुक गईं। “मैंने… मैं उसे कुछ अच्छा देना चाहती थी। राघव ने कहा था वह बहुत प्यारी है। मैंने सोचा पहली बार मिलूंगी तो बच्ची खुश हो जाएगी।”

“उसमें दूध था?”

“शायद दही था। या क्रीम। मुझे ठीक से याद नहीं। मैंने राघव से पूछा था।”

नंदिता की आंखें स्थिर हो गईं। “क्या पूछा था?”

काव्या ने कांपते हाथों से फोन निकाला। स्क्रीन खोली। एक बातचीत सामने थी। समय 7:52 सुबह।

काव्या का संदेश था: “मैं कॉफी ले रही हूं। तारा के लिए भी कुछ ले लूं? उसे दूध से एलर्जी तो नहीं?”

राघव का जवाब था: “नहीं, वह पी सकती है। कुछ भी ले लो। जल्दी आओ, मीटिंग से पहले तुम्हें देखना है।”

नंदिता ने वह वाक्य 1 बार पढ़ा। फिर 2 बार। फिर 10 बार। हर बार शब्द वही रहे। “वह पी सकती है।”

उसी समय कैफे का दरवाजा तेजी से खुला। राघव अंदर आया। भीगा हुआ, घबराया हुआ, आंखों में वह डर लिए जिसे वह 5 दिनों से छिपा रहा था। नंदिता ने उसे जानबूझकर संदेश भेजा था—“काव्या बोलने वाली है। बचना है तो आ जाओ।”

राघव ने दोनों को साथ देखा और रुक गया।

“नंदिता, तुम यहां क्या कर रही हो?”

काव्या खड़ी हो गई। “तुमने इसे क्या बताया?”

राघव ने दांत भींचे। “काव्या, चुप रहो। तुमने पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।”

“मैंने?” काव्या चीखी नहीं, पर उसकी आवाज़ पूरे कैफे में फैल गई। “तुमने मुझे कहा था कि बच्ची दूध पी सकती है!”

राघव ने हाथ बढ़ाकर उसका फोन छीनना चाहा। नंदिता ने फोन पीछे कर लिया।

“सोचो भी मत,” उसने कहा।

राघव ने धीमी आवाज़ में कहा, “यहां तमाशा मत करो। घर चलकर बात करते हैं।”

नंदिता हल्का सा हंसी। वह हंसी इतनी खाली थी कि राघव की गर्दन झुक गई।

“तारा एम्स के इमरजेंसी वार्ड में सबके सामने मर गई। तुम्हारी शर्म 1 कैफे नहीं झेल सकती?”

“मैंने उसे मारना नहीं चाहा था,” राघव बोला। उसकी आंखों में पानी आ गया।

“नहीं,” नंदिता ने कहा, “तुम सिर्फ अपनी प्रेमिका से मिलने की जल्दी में थे। तुम्हें बस 4 साल की बच्ची की बीमारी एक बाधा लगी।”

“गलती हो गई।”

“गलती?” नंदिता की आवाज़ पहली बार तेज हुई। “गलती चाबी भूलना होती है। गलत मिठाई खरीदना होती है। तुमने 4 साल तक मुझे पैकेट पढ़ते देखा, डॉक्टरों से बात करते देखा, स्कूल में मेडिकल फॉर्म भरते देखा, एड्रेनालिन पेन संभालते देखा। तुम जानते थे कि 1 चम्मच दही भी तारा को मार सकता है। फिर भी तुमने लिखा—‘वह पी सकती है।’”

काव्या रो रही थी। “मैंने जानबूझकर नहीं किया। मैं कसम खाती हूं। राघव कहता था आप तारा को लेकर बहुत ओवरप्रोटेक्टिव हैं। वह कहता था आप हर चीज़ को बीमारी बना देती हैं। मुझे लगा वह पिता है, उसे पता होगा।”

नंदिता ने उसे देखा। उस नज़र में न माफी थी, न पूरी नफरत। बस एक थकान थी, जो शब्दों से बड़ी थी।

“आपने मेरा घर तोड़ा,” नंदिता ने कहा, “लेकिन मेरी बच्ची की जान उसने ली।”

काव्या चुप हो गई।

नंदिता ने उसी पल स्क्रीनशॉट अपनी बहन प्रिया, अपने वकील अजय माथुर और खुद के दूसरे ईमेल पर भेज दिए। फिर उसने मीरा को फोन लगाया।

“मीरा, क्या तुम गवाही दोगी?”

दूसरी तरफ लंबी चुप्पी रही।

“मुझे डर लग रहा है, मैडम।”

“मुझे भी,” नंदिता ने कहा। “लेकिन तारा अब बोल नहीं सकती।”

मीरा की सांस कांपी। “मैं बोलूंगी।”

राघव कुर्सी पर बैठ गया, जैसे किसी ने उसके घुटनों से हड्डियां निकाल ली हों।

“नंदिता, सोचो तुम क्या कर रही हो। हमारा सब कुछ खत्म हो जाएगा।”

वह उसके पास झुकी। “हमारा कुछ बचा ही नहीं। सिर्फ एक बच्ची है, जिसे तुमने मारा नहीं सही, लेकिन बचाया भी नहीं। और फिर उसकी मां को अपराधी बनाते रहे।”

अगले कुछ हफ्ते नंदिता के लिए शोक से भी कठिन थे। पहले वह रोते-रोते सो जाती थी, अब उसे थानों, वकीलों, बयान और दस्तावेजों के बीच जीना पड़ रहा था। उसने दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। उसने वीडियो दिया, काव्या के संदेश दिए, स्कूल के ट्रस्ट को हुए दान का बैंक रिकॉर्ड दिया, राघव के वे संदेश दिए जिनमें वह बार-बार एलर्जी को “नंदिता का डर” कहकर हल्का साबित कर रहा था।

स्कूल की प्रिंसिपल ने पहले सब नकार दिया। उसने कहा कैमरे खराब थे। फिर कहा रिकॉर्डिंग अपने आप मिट गई। फिर जब मीरा ने फोन का वीडियो दिखाया और काव्या ने लिखित बयान दिया, तो वह टूट गई। उसने माना कि राघव उसी दिन वकील के साथ आया था। उसने कहा था—“अगर फुटेज बाहर गया तो स्कूल की साख खत्म हो जाएगी।” उसने दान का लालच भी दिया था। प्रिंसिपल रोते हुए बोली, “मैं स्कूल बचाना चाहती थी।”

नंदिता ने उसकी ओर देखा और मन ही मन कहा—सब कुछ बचाना चाहते थे, बस तारा को नहीं।

मामला मीडिया में आया। पहले स्थानीय चैनल ने खबर चलाई। फिर सोशल मीडिया पर तारा की तस्वीर फैल गई—लाल बर्फ का गोला पकड़े मुस्कुराती 4 साल की बच्ची। लोग बहस करने लगे। कोई कहता, “बाप से गलती हुई।” कोई लिखता, “ऐसी गलती बच्चा मार देती है।” एलर्जी वाले बच्चों की माओं ने नंदिता को संदेश भेजे। किसी ने लिखा, “मेरी सास आज भी कहती हैं, थोड़ा सा दूध कुछ नहीं करेगा।” किसी ने लिखा, “आपकी बच्ची ने मेरी आंखें खोल दीं।” सबसे ज्यादा एक ही वाक्य फैलता गया—“उसे पता था।”

राघव की कंपनी ने पहले उसे छुट्टी पर भेजा, फिर निकाल दिया। उसके दोस्त चुप हो गए। रिश्तेदारों ने पहले नंदिता को समझाया—“घर की बात बाहर मत ले जाओ।” फिर जब संदेश सामने आए, वही लोग कहने लगे—“भगवान ऐसी औलाद किसी को न दे।”

नंदिता को ऐसे वाक्यों से कोई संतोष नहीं मिला। उसे भगवान से भी शिकायत थी, इंसाफ से भी, खुद से भी, उस सुबह से भी। लेकिन अब अपराधबोध उसके शरीर से उतरने लगा था। जैसे किसी ने उसकी छाती पर रखी भारी चट्टान उठाई हो और उसके नीचे एक गहरा घाव दिखा हो। घाव था, मगर वह उसका अपना था। झूठ का नहीं।

जांच में एक और बात सामने आई। राघव ने तारा का लाल मेडिकल पाउच स्कूल स्टाफ को दिया ही नहीं था। वह पाउच कार की पिछली सीट पर मिला। जब मीरा ने तारा की गर्दन पर लाल चकत्ते देखे और पाउच ढूंढा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नंदिता ने यह सुना तो उसे लगा उसके भीतर बची हुई कोई नस भी जल गई।

उस रात उसने तारा की अलमारी खोली। गुलाबी फ्रॉक अभी भी टंगी थी। सफेद मोजे दराज में रखे थे। छोटी चूड़ियां डिब्बे में खनक रही थीं। नंदिता फर्श पर बैठ गई। उसने फ्रॉक को सीने से लगाया और पहली बार तारा से माफी नहीं मांगी। सिर्फ कहा, “मैं अब तेरे लिए लड़ूंगी।”

कई महीने बाद अदालत में पहली सुनवाई हुई। नंदिता सफेद सूती साड़ी पहनकर पहुंची। उसके पर्स में तारा का छोटा खिलौना हाथी था। उसे किसी को दिखाना नहीं था। बस उंगलियों को पकड़ने के लिए कुछ चाहिए था।

राघव कोर्ट के कॉरिडोर में खड़ा था। दुबला, थका हुआ, बिना शेव किए। उसने नंदिता को देखते ही कहा, “नंदिता…”

वह रुक गई। उसकी आंखें शांत थीं।

“मेरा नाम ऐसे मत लो जैसे तुम्हें अभी भी मेरे जीवन में आने का अधिकार है।”

राघव ने सिर झुका लिया। “मैं रोज तारा को याद करता हूं।”

“तो चुपचाप याद करो,” नंदिता ने कहा।

अंदर मीरा ने बयान दिया। उसकी आवाज़ कांप रही थी, मगर शब्द साफ थे। उसने बताया कैसे तारा गेट से अंदर आई थी, हाथ में गुलाबी पेय था। कैसे उसने गला खुजलाना शुरू किया। कैसे उसके होंठ सूजने लगे। कैसे वह बार-बार कह रही थी, “पापा ने कहा है।” कैसे लाल पाउच नहीं मिला। कैसे अस्पताल फोन किया गया।

जब मीरा ने फिर कहा—“तारा ने कहा था, पापा ने कहा है, मैं पी सकती हूं”—तो नंदिता ने पहली बार सिर नहीं झुकाया। वह चाहती थी कि यह वाक्य कमरे की दीवारों से टकराए, फाइलों में दर्ज हो, जज के कानों में रुके और राघव की हर नींद में लौटे।

राघव पर लापरवाही से मृत्यु, सबूत मिटाने, झूठा आरोप गढ़ने और गवाहों को प्रभावित करने के आरोप तय हुए। उसके वकीलों ने कहा वह दुखी पिता था, सदमे में था, गलती से चूक गया। नंदिता सुनती रही। उसे अब शब्दों की चालाकी समझ आने लगी थी।

गलती सच खोजती है।

झूठ सच को जलाकर राख बनाना चाहता है।

घर लौटकर उसने ड्राइंग रूम में रखी तारा की तस्वीर के सामने दीया जलाया। पहले वह हर रात उसी तस्वीर के सामने बैठकर खुद को दोष देती थी। अब वह धीरे से दिन की बातें बताती। “आज मीरा ने हिम्मत दिखाई।” “आज प्रिया ने तेरी पसंद की सूजी का हलवा बनाया, बिना दूध वाला।” “आज तेरे नींबू के पौधे में 3 फूल आए।”

एक शाम राघव की चिट्ठी आई। उसने लिखा था कि वह कायर था, वह डर गया था, उसने सब खो दिया, वह तारा का पिता रहेगा, उसे माफ कर दिया जाए। उसने 12 बार “माफ कर दो” लिखा था।

नंदिता ने चिट्ठी पढ़ी। फिर उसे तारा की तस्वीर के पास रख दिया। पूरी रात वह नहीं सोई। सुबह उसने 3 पंक्तियां लिखीं।

“तुमने मुझे अस्पताल में नहीं खोया। तुमने मुझे 7:52 पर खो दिया था, जब तुमने अपनी इच्छा को हमारी बेटी की सांसों से बड़ा समझा। तारा को तुम्हारी माफी नहीं, तुम्हारी रक्षा चाहिए थी।”

उसने नीचे अपना नाम नहीं लिखा।

उसने लिखा—“उसकी मां।”

कुछ दिनों बाद नंदिता अकेली इंडिया गेट गई। वही लॉन। वही जगह जहां तारा ने लाल बर्फ का गोला पकड़ा था। दिसंबर की ठंडी हवा थी। उसने एक छोटा लाल बर्फ का गोला खरीदा, वैसा ही जैसा तस्वीर में था। वह घास पर बैठ गई और उसे अपने पास रख दिया।

लोग आ-जा रहे थे। बच्चे हंस रहे थे। कोई चाट खा रहा था। कोई फोटो खिंचवा रहा था। दुनिया चलती रही, जैसे उसे एक 4 साल की बच्ची की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ा। नंदिता ने पहली बार दुनिया से नाराज़ होना छोड़ दिया। दुनिया निर्दयी नहीं थी, बस बहुत बड़ी थी। उसका दुख उसमें समा नहीं सकता था।

बर्फ का गोला धीरे-धीरे पिघलने लगा। लाल रंग सफेद कागज़ में फैल गया। नंदिता ने तारा का खिलौना हाथी निकाला और फुसफुसाई, “अब मैं उस गलती की माफी नहीं मांगूंगी जो मैंने की ही नहीं।”

हवा ने उसकी आवाज़ उड़ा दी।

नंदिता ठीक नहीं हुई थी। कोई मां सच में ठीक नहीं होती जब उसकी गोद से बच्चा उठकर एक कलश में बदल जाए। लेकिन अब उसका दुख झूठ से गंदा नहीं था। वह साफ था, भारी था, और उसका अपना था।

रात को घर लौटकर उसने दीया जलाया। तस्वीर में तारा अभी भी लाल बर्फ का गोला पकड़े हंस रही थी—गाल गोल, आंखें चमकती हुईं, जैसे उस 1 पल में कोई उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता था।

नंदिता ने फ्रेम छुआ।

2:07 की वह कॉल, 43 सेकंड की वह वीडियो, एक डरी हुई सहायिका की हिम्मत, एक प्रेमिका की टूटी हुई गवाही और राख से उठी हुई मां की आवाज़—इन सबने तारा का नाम झूठ के नीचे दबने से बचा लिया था।

तारा वापस नहीं आने वाली थी।

लेकिन अब वह किसी के झूठ में दोबारा नहीं मरेगी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.