
PART 1
दीवाली की सुबह 72 साल की शांता मेहरा को अपने ही बेटे के घर में 1 कटोरी जमी हुई खिचड़ी और फ्रिज पर चिपका 1 ऐसा नोट मिला, जिसने 5 साल की माँग, ममता और अपमान को एक साथ जला दिया।
नोट पर प्रिया की साफ, नुकीली लिखावट थी—
“मम्मीजी, हम सबने इस बार दीवाली मालदीव में मनाने का सोचा है। आपकी उम्र में इतना सफर थका देगा, इसलिए आप आराम कीजिए। फ्रीजर में खिचड़ी रखी है। 1 हफ्ते में लौट आएँगे।”
शांता ने वह कागज 3 बार पढ़ा। गुरुग्राम की उस चमचमाती रसोई में बाहर पटाखों की हल्की आवाज आ रही थी, लेकिन घर के भीतर ऐसा सन्नाटा था जैसे किसी ने रिश्तों की साँस बंद कर दी हो। कल रात तक इसी रसोई में वह 4 किलो आलू छील रही थी, काजू कतली जमाने के लिए चाशनी देख रही थी, आरव के कुर्ते पर बटन लगा रही थी और छोटी मायरा के लिए लाल चुन्नी प्रेस कर रही थी। प्रिया ने जाते-जाते कहा था, “मम्मीजी, मेरे पास 4 हाथ नहीं हैं।”
लेकिन सुबह न आरव था, न मायरा, न उनका स्कूल बैग, न खिलौने। विशाल के जूते भी गायब थे। ड्रॉइंग रूम का महंगा सूटकेस सेट नहीं था। पूजा की थाली तक अलमारी में बंद पड़ी थी।
“आरव?” शांता ने पुकारा।
आवाज दीवारों से टकराकर लौट आई।
वह धीरे-धीरे ऊपर गई। बच्चों के कमरे बहुत साफ थे, इतने साफ कि उनमें बच्चों की खुशबू भी नहीं बची थी। विशाल और प्रिया के कमरे में अलमारी खुली थी, हैंगर हिल रहे थे। बेडसाइड टेबल पर एयरपोर्ट टैक्सी की पर्ची पड़ी थी, रात 11:40 की।
शांता की आँखें सूखी रहीं। दुख इतना बड़ा था कि आँसू उसके सामने छोटे लग रहे थे।
5 साल पहले पति की मौत के बाद विशाल ने लखनऊ के पुराने घर में उसकी हथेलियाँ पकड़कर कहा था, “माँ, मेरे साथ चलो। अकेली कैसे रहोगी? बच्चे तुम्हें जान से ज्यादा चाहते हैं। यह घर तुम्हारा ही होगा।”
“तुम्हारा घर।” शांता ने उन 2 शब्दों पर भरोसा कर लिया था। उसने अपना छोटा मकान बेच दिया। पैसे से विशाल का कर्ज चुकाया, प्रिया की पसंद की मॉड्यूलर रसोई बनवाई, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, सोफा, डाइनिंग टेबल, परदे, बच्चों के बेड, पूजा का संगमरमर मंदिर और वह महंगी कॉफी मशीन तक खरीदी, जिसे प्रिया अपनी सहेलियों को दिखाकर कहती थी, “हमारा घर अब कितना क्लासी लग रहा है।”
धीरे-धीरे “माँ” घर की “सुविधा” बन गई।
अगर शांता मंदिर में सत्संग जाना चाहती, प्रिया कहती, “तो आरव को ट्यूशन से कौन लाएगा?”
अगर घुटने का दर्द बताती, विशाल कहता, “बस 10 मिनट बच्चों को देख लो माँ, हम लोग बहुत थके हैं।”
अगर अपने लिए नई साड़ी खरीदती, प्रिया मुस्कुराकर बोलती, “अच्छा है मम्मीजी, आप तो अपनी पेंशन आराम से खर्च कर लेती हैं। हमें तो ईएमआई मार देती है।”
6 महीने पहले शांता ने बालकनी के बाहर प्रिया को फोन पर कहते सुना था, “उन्हें अभी जाने को नहीं कह सकते। बच्चे संभालती हैं, राशन भरती हैं, बिजली-पानी में मदद करती हैं। सच बोलूँ तो उनकी मौजूदगी नहीं, उनका काम हमारे लिए जरूरी है।”
उस दिन शांता के सीने में कुछ टूटकर चुप हो गया था। पर दीवाली की इस सुबह फ्रिज पर लगा नोट उस चुप्पी को राख से बाहर खींच लाया।
वह अपने छोटे कमरे में गई, नीचे वाली दराज से नीली फाइल निकाली और कांपती उंगलियों से पहला पन्ना खोला। उसमें 5 साल की रसीदें थीं।
फ्रिज। सोफा। वॉशिंग मशीन। डाइनिंग टेबल। परदे। टीवी। बर्तन। मंदिर। गद्दे। कॉफी मशीन। बच्चों की स्टडी टेबल। सब उसके नाम पर।
शांता ने मोबाइल उठाया और 1 मूवर्स कंपनी को फोन लगाया।
“मैडम, आज दीवाली है, चार्ज डबल लगेगा,” उधर से आदमी बोला।
शांता ने फ्रिज पर चिपका नोट देखा।
“मुझे मंजूर है।”
“कब आना है?”
शांता की आवाज पहली बार ठंडी और साफ हुई।
“कल सुबह 8 बजे। सब ले जाना है… जो मेरा है।”
PART 2
उस रात शांता ने पूजा नहीं की, पर दिया जलाया। उसने भगवान से कुछ माँगा नहीं, बस अपने भीतर बची हुई हिम्मत को देखा।
उसने 2 सूटकेस भरे। पति महेश की फोटो को तौलिये में लपेटा। बच्चों के कमरे में गई, मायरा की गुड़िया को छुआ, आरव की कॉपी सीधी की, पर कुछ उठाया नहीं। वह चोरी नहीं कर रही थी। वह अपनी उम्र, अपनी कमाई और अपना अपमान वापस ले रही थी।
सुबह 8:12 पर 3 मजदूर आए। उनका मुखिया इमरान था। उसने सूची देखी, फिर शांता को देखा।
“आंटीजी, पक्का?”
शांता ने नीली फाइल उसके हाथ में रख दी।
“हर चीज की रसीद है। जो मेरा नहीं, उस पर हाथ मत लगाना।”
दोपहर तक घर खाली होने लगा। सोफा निकला, फिर टीवी, फिर फ्रिज, फिर डाइनिंग टेबल, फिर परदे। चमकदार घर अचानक सफेद, ठंडा और नंगा दिखने लगा।
जाते-जाते शांता ने फ्रिज वाले नोट के नीचे काली स्याही से लिखा—
“तुमने मेरी जगह दिखा दी। अब मैं अपनी जगह वापस ले रही हूँ।”
5 दिन बाद जब विशाल लौटा, उसे पहली बार समझ आया कि माँ घर में नहीं, घर माँ में था।
PART 3
मालदीव से लौटते वक्त विशाल ने विमान में बच्चों को हँसाते हुए कहा था, “घर पहुँचते ही दादी के हाथ की गरम कचौरी खाएँगे।” प्रिया ने धूप से तपे चेहरे पर चश्मा चढ़ाते हुए कहा, “पहले मम्मीजी को थोड़ा समझाना पड़ेगा। नाराज तो होंगी, पर 2 मीठी बातें सुनकर ठीक हो जाएँगी।”
उन्हें क्या पता था कि इस बार शांता ने मीठी बातों की थाली ही उठा ली थी।
गुरुग्राम की सोसाइटी में कार रुकी। आरव नींद में था, मायरा थकी हुई थी। प्रिया ने दरवाजा खोला और हँसते हुए बोली, “घर आ गए!”
अगले ही पल उसकी आवाज गले में अटक गई।
ड्रॉइंग रूम खाली था। जहाँ सोफा था, वहाँ धूल की चौकोर छाप थी। टीवी की जगह दीवार पर तार लटक रहा था। परदे गायब थे। डाइनिंग टेबल नहीं थी। रसोई में फ्रिज की जगह खाली सफेद दीवार थी। प्रिया भागकर अंदर गई।
“विशाल! फ्रिज भी नहीं है!”
आरव रोने लगा, “पापा, टीवी कहाँ गया?”
मायरा ने धीरे से पूछा, “दादी कहाँ हैं?”
विशाल ने दीवार पर चिपका वही नोट देखा, जिसके नीचे उसकी माँ की लिखावट थी। उसकी उंगलियाँ काँप गईं।
प्रिया चीखी, “उन्होंने हमें लूट लिया! अपनी औकात दिखा दी उन्होंने!”
विशाल ने पहली बार कुछ नहीं कहा। वह बस खाली घर को देखता रहा। हर खाली जगह पर उसे माँ का झुका हुआ चेहरा दिख रहा था। वही माँ, जो रात को बच्चों का दूध गरम करती थी। वही माँ, जो उसके ऑफिस के तनाव को बिना पूछे समझ लेती थी। वही माँ, जिसे वह “आराम करो” कहकर काम में लगा देता था।
फोन पर 23 मिस्ड कॉल गए। शांता ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह अब जयपुर की 1 शांत वरिष्ठ आवास सोसायटी में थी, जहाँ उसने 3 हफ्ते पहले गुपचुप 1 छोटा फ्लैट देख लिया था। वहाँ खिड़की से गुलमोहर का पेड़ दिखता था। दीवार पर महेश की फोटो थी। उसी सोफे पर वह बैठी थी, जो कभी विशाल के घर में सबका था, पर असल में कभी उसका सम्मान नहीं बन पाया।
पड़ोस की सुधा माथुर 1 प्लेट गरम पूड़ी और आलू की सब्जी लेकर आईं।
“पहला दिन है न? यहाँ कोई अकेले खाना नहीं खाता।”
शांता ने बहुत दिनों बाद किसी अजनबी की आवाज में अपनापन सुना। उसने पूड़ी का टुकड़ा तोड़ा और अचानक आँखें भर आईं। सुधा ने कुछ नहीं पूछा। बस पानी का गिलास आगे कर दिया। कभी-कभी सम्मान सवाल नहीं पूछता, सिर्फ पास बैठता है।
अगले दिन 2 पुलिसकर्मी उसके दरवाजे पर आए।
“शांता मेहरा जी?”
“जी।”
“आपके बेटे और बहू ने शिकायत की है कि आपने उनके घर से सामान चोरी किया है।”
शांता ने उन्हें अंदर बुलाया। चाय बनाई। फिर नीली फाइल मेज पर रख दी।
“यह सब रसीदें हैं। जो सामान मैं लाई हूँ, वह मेरे पैसे से खरीदा गया था। बाकी कुछ नहीं छुआ।”
पुलिसकर्मी ने पन्ने पलटे। फ्रिज, वॉशिंग मशीन, सोफा, टीवी, कॉफी मशीन, डाइनिंग टेबल, परदे, बच्चों की स्टडी टेबल। हर बिल पर नाम था—शांता मेहरा।
बड़े पुलिसकर्मी ने चश्मा उतारा।
“सब आपके नाम पर है।”
“हाँ।”
“लेकिन आपके बेटे का कहना है कि घर उनका था।”
शांता ने शांत स्वर में कहा, “घर उनका था। अपमान भी उनका था। सामान मेरा था।”
उसी समय बाहर तेज कदमों की आवाज आई।
“माँ! दरवाजा खोलो!”
विशाल था। उसके पीछे प्रिया खड़ी थी। चेहरे पर गुस्सा, आँखों में हार की जलन।
शांता ने दरवाजा खोला।
“आपने हमारे बच्चों से उनका घर छीन लिया!” प्रिया फट पड़ी।
शांता ने उसे सीधा देखा।
“मैंने बच्चों से कुछ नहीं छीना। मैंने बस वह वापस लिया, जो बच्चों के नाम पर मुझसे लिया गया था।”
विशाल ने भारी आवाज में कहा, “माँ, आप बताकर जातीं तो…”
शांता ने हल्का-सा हँसा, पर वह हँसी दुख से बनी थी।
“जैसे तुम लोग मुझे बताकर गए थे?”
विशाल चुप हो गया।
पुलिसकर्मी ने प्रिया से कहा, “मैडम, जिन चीजों की रसीद इनके नाम पर है, उन्हें ले जाना चोरी नहीं कहलाता।”
प्रिया की गर्दन तन गई।
“तो क्या बुजुर्ग लोग अपनी मर्जी से घर उजाड़ सकते हैं?”
शांता ने धीमे से कहा, “बुजुर्ग लोग भी इंसान होते हैं, प्रिया। अलमारी में रखी पुरानी चादर नहीं, जिसे जरूरत पर निकाल लिया और बाकी समय धकेल दिया।”
विशाल ने पहली बार प्रिया की ओर देखा। उसकी आँखों में असहज सच उतरने लगा था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 3 हफ्ते बाद शांता को कानूनी समझौते की नोटिस मिली। विशाल और प्रिया ने “मानसिक कष्ट”, “बच्चों की असुविधा” और “परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान” के नाम पर मुआवजे की माँग की थी।
शांता ने नोटिस पढ़ा। पहले उसकी छाती में पुराना डर उठा। वही डर, जिसमें वह हमेशा बेटे की नाराजगी से काँप जाती थी। फिर उसने नीली फाइल खोली और नोटिस को सबसे पीछे रख दिया। अब डर भी दस्तावेज बन चुका था।
समझौते के दिन जयपुर में हल्की बारिश हो रही थी। शांता ने महेश की पसंद की नीली साड़ी पहनी। सुधा ने उसके माथे पर छोटी बिंदी ठीक की।
“डर लग रहा है?” सुधा ने पूछा।
शांता ने सिर हिलाया।
“हाँ। पर अब डर के कहने पर नहीं जिऊँगी।”
कमरे में विशाल और प्रिया पहले से बैठे थे। प्रिया ने हल्के रंग का सूट पहना था और चेहरा ऐसा बना रखा था जैसे वह बहुत पीड़ित हो। विशाल नीचे देख रहा था। वह 3 हफ्तों में बूढ़ा लगने लगा था।
समझौता अधिकारी ने बात शुरू करने को कहा।
प्रिया बोली, “मेरी सास ने हमारी गैरमौजूदगी में घर खाली कर दिया। बच्चों को झटका लगा। हमने उन्हें 5 साल अपने घर में रखा, कभी किराया नहीं लिया। परिवार में हिसाब-किताब नहीं होता।”
शांता के भीतर कुछ चुभा। परिवार। यही शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं, जब किसी से बिना पैसे, बिना सम्मान, बिना धन्यवाद काम लेना हो।
अधिकारी ने विशाल से पूछा, “आप कुछ कहना चाहेंगे?”
विशाल ने होंठ खोले, फिर बंद कर लिए।
प्रिया ने तुरंत कहा, “सामान घर के इस्तेमाल में था। नैतिक रूप से वह हमारा था।”
शांता ने पहली बार सीधा पूछा, “नैतिक रूप से मैं भी परिवार थी, जब तुम लोग दीवाली पर मुझे 1 कटोरी खिचड़ी छोड़कर चले गए थे?”
कमरे में चुप्पी फैल गई।
शांता ने नोट मेज पर रखा। अधिकारी ने पढ़ा। उसके चेहरे पर कठोरता नहीं आई, पर आँखें गंभीर हो गईं।
शांता ने एक-एक बिल निकाला।
“पति की मौत के बाद बेटे ने मुझे साथ रहने को कहा। मैंने अपना घर बेचा। इनकी रसोई बनवाई, कर्ज चुकाया, सामान खरीदा, बच्चों को पाला, स्कूल छोड़ा, डॉक्टर के पास ले गई। मैंने कभी मजदूरी नहीं माँगी। बस यह चाहा कि मुझे बोझ न कहा जाए।”
प्रिया ने बीच में कहा, “हमने बोझ कब कहा?”
शांता ने उसकी ओर देखा।
“तुमने फोन पर कहा था—मेरी मौजूदगी नहीं, मेरा काम जरूरी है।”
प्रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। विशाल ने जैसे किसी ने कानों में गरम तेल डाल दिया हो, वैसा चेहरा बना लिया। उसे पहली बार समझ आया कि माँ कब से सुन रही थी, सह रही थी, टूट रही थी।
अधिकारी ने सारे कागज देखे।
“कानूनी रूप से सामान शांता जी का है। मुआवजे की माँग का कोई ठोस आधार नहीं दिखता। उल्टा परिस्थितियाँ यह बताती हैं कि इनके साथ भावनात्मक उपेक्षा हुई है। मैं सलाह दूँगी कि आप लोग इस मामले को आगे बढ़ाने के बजाय पारिवारिक स्तर पर अपनी गलती समझें।”
प्रिया तिलमिला गई।
“तो इन्हें कोई सजा नहीं?”
शांता ने थके हुए स्वर में कहा, “मैं सजा देने नहीं आई थी। मैं बस अपने जीवन से तुम्हारा अधिकार हटाने आई थी।”
बाहर निकलते समय विशाल ने बारिश में माँ को पुकारा।
“माँ, 1 मिनट।”
शांता रुक गई। प्रिया दूर खड़ी रही, बाँहें मोड़े।
विशाल के होंठ काँप रहे थे।
“मुझे माफ कर दो।”
शांता ने पूछा, “किस बात के लिए?”
वह टूट गया।
“इस बात के लिए कि मैंने तुम्हें माँ से सुविधा बना दिया। आया, रसोइया, बैंक, चौकीदार… सब कुछ। मैं अपने आप से झूठ बोलता रहा कि तुम्हें बच्चों के साथ रहकर खुशी मिलती है।”
शांता की आँखों में नमी आई, पर आवाज स्थिर रही।
“मुझे बच्चों से खुशी मिलती थी, विशाल। अपमान से नहीं।”
विशाल रो पड़ा।
“मैं तुमसे प्यार करता हूँ माँ।”
“मुझे पता है। पर तुमने अपने आराम से ज्यादा प्यार किया।”
यह वाक्य उसके सीने पर पत्थर की तरह गिरा।
प्रिया ने धीमे से कहा, “आप हमें राक्षस बना रही हैं।”
शांता ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “नहीं। राक्षस बदलते नहीं। तुम लोगों के पास अभी भी बदलने का मौका है। बस अब मेरी कीमत पर नहीं।”
फिर उसने विशाल से कहा, “बच्चों को लेकर आ सकते हो। मुझसे मिलने। कपड़े धुलवाने नहीं, खाना बनवाने नहीं, पैसे माँगने नहीं। सिर्फ मिलने। अगर तुम यह फर्क समझ सको।”
विशाल ने सिर झुका दिया। वह माँ को गले लगाना चाहता था, लेकिन शांता ने कदम पीछे नहीं बढ़ाया। पहली बार विशाल ने दूरी को भी सम्मान की तरह स्वीकार किया।
अगले कुछ महीने आसान नहीं थे। आरव और मायरा जब पहली बार जयपुर आए, तो वे दरवाजे पर खड़े-खड़े झिझक रहे थे।
“दादी, आप हमारे घर क्यों नहीं आतीं?” मायरा ने पूछा।
शांता ने उसके बाल सहलाए।
“क्योंकि कभी-कभी दादी को भी अपना घर चाहिए होता है, जहाँ उन्हें कोई भूल न जाए।”
आरव ने सोफे को देखा।
“यह तो हमारे घर वाला है।”
शांता मुस्कुराई।
“हाँ, बेटा। यह मेरे पैसे से आया था, इसलिए मेरे साथ आ गया।”
मायरा ने तुरंत विशाल की तरफ देखा।
“तो मम्मी ने क्यों कहा कि दादी ने चोरी की?”
विशाल ने आँखें बंद कर लीं। वह अपनी बेटी से झूठ बोल सकता था, पर उस दिन उसने नहीं बोला।
“मम्मी-पापा गलत थे,” उसने धीमे से कहा।
शांता ने उस उत्तर को अपने भीतर चुपचाप रख लिया। यह माफी नहीं थी, पर सच की शुरुआत थी।
प्रिया कई महीनों तक नहीं आई। बच्चों के साथ कभी-कभी भारी बैग भेज देती, जैसे अब भी देखना चाहती हो कि शांता पुराने ढर्रे पर लौटेगी या नहीं। शांता बैग वैसे ही वापस कर देती। वह बच्चों को प्यार करती, होमवर्क कराती, कहानी सुनाती, लेकिन कपड़े नहीं धोती, टिफिन नहीं भरती, पैसे नहीं देती। विशाल ने धीरे-धीरे समझ लिया कि माँ का प्यार मुफ्त है, पर उसका श्रम अब मुफ्त नहीं होगा।
शांता की अपनी दुनिया बनने लगी। सोमवार को वह सुधा के साथ बाजार जाती। बुधवार को सोसायटी की 4 महिलाओं को वीडियो कॉल करना सिखाती। शुक्रवार को भजन मंडली में बैठती, लेकिन वहाँ भी अब किसी की मजबूरी नहीं बनती। शनिवार को वह अपने लिए फूल खरीदती। बिना हिसाब दिए। बिना अपराधबोध के।
एक शाम विशाल ने फोन किया।
“माँ, आज बच्चों को 2 घंटे रख लोगी? अचानक मीटिंग है।”
शांता ने खिड़की से बाहर देखा। उसी शाम उसने फिल्म देखने का टिकट लिया था।
पहले उसके भीतर पुरानी माँ उठी—सब छोड़ दे, बेटा मुश्किल में है। फिर उसने खुद से पूछा, मुश्किल किसकी है और समाधान हमेशा वही क्यों बने?
“नहीं बेटा, आज मेरा कार्यक्रम है।”
दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही।
फिर विशाल बोला, “ठीक है माँ। फिल्म अच्छी हो तो बताना।”
शांता की आँखें भर आईं। क्योंकि यह कोई बड़ा प्रेम नहीं था। बस सामान्य सम्मान था। और उसे यह सामान्य चीज पाने में 72 साल लग गए थे।
अगली दीवाली आई। शांता ने अपने छोटे फ्लैट में 11 दीये जलाए। महेश की फोटो के पास गेंदे की माला रखी। सुधा, 1 रिटायर्ड अध्यापक, नीचे वाली नसीम आंटी, विशाल और बच्चों को बुलाया। प्रिया को निमंत्रण नहीं भेजा, पर दरवाजा बंद भी नहीं किया। उसने विशाल से केवल इतना कहा था, “अगर आए, तो सम्मान के साथ आए।”
शाम 7:15 पर घंटी बजी। विशाल अंदर आया। आरव और मायरा ने दादी को गले लगा लिया। उनके पीछे प्रिया खड़ी थी, हाथ में सफेद फूलों का छोटा गुलदस्ता।
“नमस्ते… शांता जी,” उसने धीमे से कहा।
यह पहली बार था जब उसने “मम्मीजी” शब्द के पीछे छिपने के बजाय उनका नाम सम्मान से लिया।
शांता ने फूल ले लिए।
“अंदर आओ, प्रिया।”
रात का खाना शांत था। बच्चों ने दीये सजाए। सुधा ने बेसन के लड्डू की तारीफ की। नसीम आंटी ने पुराने लखनऊ की कहानियाँ सुनाईं। प्रिया ने चुपचाप प्लेटें उठाईं, बिना यह जताए कि वह कितनी मददगार है। रसोई में जब दोनों अकेली हुईं, प्रिया ने धीरे से कहा—
“मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं 1 साल में बहुत अच्छी इंसान बन गई हूँ।”
शांता ने थाली धोते हुए कहा, “अच्छा है। झूठ से शुरुआत मत करो।”
प्रिया ने गहरी साँस ली।
“मैंने आपका इस्तेमाल किया। बच्चों के नाम पर, घर के नाम पर, अपनी सुविधा के लिए। और जब आप चली गईं, मुझे गुस्सा इसलिए आया क्योंकि घर खाली हो गया था… दिल खाली हुआ, यह समझने में देर लगी।”
शांता ने नल बंद किया।
“बच्चों ने मुझसे पूछा कि दादी को सम्मान पाने के लिए घर क्यों छोड़ना पड़ा। मैं जवाब नहीं दे पाई।”
शांता ने कहा, “सच बता देना। बच्चे सच से टूटते नहीं, झूठ से बिगड़ते हैं।”
प्रिया ने सिर हिलाया। कोई गले लगना नहीं हुआ। कोई फिल्मी माफी नहीं। सिर्फ 2 औरतें 1 छोटी रसोई में खड़ी थीं—बीच में 1 साल का नुकसान, और शायद आगे का 1 पतला रास्ता।
रात को जाते समय विशाल दरवाजे पर ठहरा।
“धन्यवाद माँ।”
“खाने के लिए?”
उसने सिर हिलाया।
“दरवाजा हमेशा के लिए बंद न करने के लिए।”
शांता ने उसे देखा। यह वही बच्चा था जिसे उसने बुखार में रात भर सीने से लगाया था। वही आदमी, जिसने उसे सबसे गहरा दुख दिया था। अब वह समझ चुकी थी कि माँ होना अपनी चोटों को नकारना नहीं होता।
“मैंने दरवाजा उतने समय के लिए बंद किया था, जितना जरूरी था,” उसने कहा।
विशाल ने धीरे से उसके पैर छुए। इस बार शांता ने उसे रोका नहीं, पर सिर पर हाथ भी तुरंत नहीं रखा। फिर कुछ क्षण बाद उसकी हथेली उसके बालों पर ठहर गई। दोनों ने समझ लिया—माफी लौट सकती है, पर पुराने नियम नहीं।
दरवाजा बंद हुआ तो फ्लैट में सन्नाटा था। पर यह वह सन्नाटा नहीं था जो गुरुग्राम के खाली घर में फ्रिज पर चिपके नोट के साथ मिला था। यह चुना हुआ सन्नाटा था। अपने घर का, अपनी चाबी का, अपनी साँस का।
शांता ने फूल महेश की फोटो के पास रखे और धीमे से बोली, “देखा, मैंने रसीदें संभालकर रखीं… और आखिरकार शर्म फेंक दी।”
खिड़की के बाहर जयपुर की रात दीयों से चमक रही थी। कमरे में वही सोफा था, वही परदे, वही कॉफी मशीन, वही मेज। लेकिन अब वे सामान नहीं थे। वे गवाह थे कि 1 औरत अपनी उम्र से छोटी नहीं हो जाती, सिर्फ इसलिए कि लोग उसे बूढ़ा कह दें।
उन्होंने सोचा था माँ को घर पर छोड़ देना आसान है, क्योंकि माँ तो हमेशा इंतजार करती है।
वे भूल गए थे कि माँ भी 1 औरत होती है।
और जब 1 औरत को 1 कटोरी खिचड़ी और 1 अपमानजनक नोट के साथ छोड़ दिया जाता है, तो वह रो भी सकती है, टूट भी सकती है… या फिर 5 साल की रसीदें निकालकर अपनी जिंदगी सामान-दर-सामान वापस ले सकती है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.