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बीमार पत्नी को वसीयत से पहले श्मशान ले जाकर पति बोला, “अपनी चिता चुन लो”, लेकिन एक पुराना लॉकेट, जिद्दी टैक्सी ड्राइवर और अनजान बुज़ुर्ग औरत ने उसी रात उसके घर की सबसे डरावनी साजिश खोल दी

PART 1

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“जल्दी से अपनी चिता की जगह चुन लो, नंदिता। मुझे पूरा दिन यहीं नहीं सड़ना।”

विक्रम मल्होत्रा की आवाज़ इतनी ठंडी थी कि जयपुर की उस बारिश भरी सुबह में भी नंदिता के शरीर में बर्फ उतर गई। काली एसयूवी श्मशान घाट के बाहर रुकी थी। सामने गीली लकड़ियों की गंध, धुएँ की पतली परत और दीवारों पर चिपके मृत्यु-सूचना के कागज़ थे। पीछे की सीट पर बैठी नंदिता ने काँपते हाथों से अपनी शॉल कस ली। उसका चेहरा पीला था, आँखों के नीचे नीले घेरे थे और होंठ इतने सूखे कि बोलने की कोशिश में भी दर्द हो रहा था।

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वह 3 साल पहले तक जयपुर के सबसे पसंदीदा हैंडमेड चाय-कैफ़े ब्रांड “मिट्टी की खुशबू” की मालकिन थी। 7 आउटलेट, 82 कर्मचारी, अपनी मेहनत से खड़ा किया कारोबार। लेकिन अब उसका पति उसे ज़िंदा रहते हुए उसकी अंतिम जगह दिखाने लाया था।

—विक्रम… मैं यह नहीं कर सकती, उसने धीमे से कहा।

विक्रम ने दरवाज़ा खोला, उसका हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए बाहर उतारा।

—ड्रामा मत करो। डॉक्टर बत्रा ने साफ कहा है, बीमारी तेज़ी से बढ़ रही है। वसीयत, दुकानें, घर, बैंक खाते… सब ठीक से लिखकर जाना होगा।

नंदिता की टाँगें काँप गईं। वह गीली ज़मीन पर घुटनों के बल गिरते-गिरते बची। विक्रम ने उसे सहारा नहीं दिया, बस झुंझलाकर बोला:

—इसीलिए कहता हूँ, समय कम है। तुम्हें अब फैसले टालने का हक़ नहीं।

श्मशान के मैनेजर ने दो जगहें दिखाईं। एक नीम के पेड़ के पास, दूसरी नदी की तरफ़ खुलती पतली दीवार के किनारे। विक्रम ने ऐसे देखा जैसे किसी फ्लैट का पार्किंग स्लॉट चुन रहा हो।

—यह ठीक है। घरवालों को अस्थियाँ लेने में सुविधा रहेगी।

नंदिता ने उसे देखा। उसकी आँखों में डर नहीं, अपमान था।

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—तुम मेरी मौत की व्यवस्था ऐसे कर रहे हो जैसे किसी पार्टी की बुकिंग हो।

विक्रम ने घड़ी देखी।

—भावुकता से कुछ नहीं बदलता। नोटरी के पास 12 बजे पहुँचना है।

कार में लौटते समय एक बूढ़ी औरत फाटक के पास खड़ी मिली। सफ़ेद बाल, भीगा हुआ सूती दुपट्टा, काँपते घुटने और हाथ में पुराना कपड़े का थैला।

—बेटा, मुख्य सड़क तक छोड़ दोगे? घुटनों में जान नहीं रही।

विक्रम का चेहरा कस गया, पर नंदिता ने तुरंत कहा:

—बैठ जाइए, अम्मा।

बूढ़ी औरत उसके पास बैठी। उसने नंदिता की कलाई छुई और अचानक उसकी आँखें बदल गईं।

—तू अभी जाने वाली नहीं है, बेटी।

नंदिता चौंक गई।

—क्या?

—जो तुझे धकेल रहे हैं, उनसे सावधान रह। बीमारी तेरे आसपास है, पर मौत तेरे भीतर से नहीं आ रही।

विक्रम हँस पड़ा।

—वाह, अब सड़क की साध्वी भी भविष्य बताएगी।

बूढ़ी औरत ने शीशे में उसकी तरफ देखा।

—कभी-कभी घर के लोग ही श्मशान से ज़्यादा खतरनाक होते हैं।

विक्रम ने अचानक गाड़ी सड़क किनारे रोक दी।

—यहीं उतर जाइए।

नंदिता ने विरोध किया, पर वह अम्मा को कीचड़ भरे गड्ढे के पास उतार चुका था। बूढ़ी औरत ने जाते-जाते नंदिता की हथेली में एक पुरानी चाँदी की छोटी सी माता रानी की लॉकेट रख दी।

—यह चमत्कार नहीं, याद है। याद रखना, तेरी सहमति के बिना कोई तेरी ज़िंदगी का कागज़ नहीं लिख सकता।

नंदिता ने लॉकेट मुट्ठी में दबा लिया।

गाड़ी आगे बढ़ी तो उसने पहली बार साफ आवाज़ में कहा:

—मैं आज वसीयत पर साइन नहीं करूँगी।

विक्रम ने ब्रेक मार दिया।

—क्या कहा तुमने?

—मुझे सोचने का समय चाहिए।

उसके चेहरे से नकली चिंता उतर गई। आँखों में पहली बार असली क्रोध दिखा।

—नंदिता, यह सब तुम्हारे भले के लिए है।

—मेरे भले के लिए कोई मुझे चिता चुनवाने नहीं लाता।

कुछ दूर जाकर एसयूवी अचानक झटके से बंद हो गई। विक्रम ने 5 बार स्टार्ट करने की कोशिश की। इंजन ने जवाब दे दिया। उसने गुस्से में स्टीयरिंग पीटा।

नंदिता ने जेब में रखा लॉकेट छुआ।

—मेरे लिए ऑटो या टैक्सी बुला दो। मैं घर जा रही हूँ।

विक्रम ने उसे ऐसे देखा जैसे वह कोई संपत्ति हो जो हाथ से निकल रही हो।

—यह बात यहीं खत्म नहीं होगी।

और उसी पल नंदिता को समझ आया कि शायद मौत श्मशान में उसका इंतज़ार नहीं कर रही थी। वह उसके अपने घर में बैठी थी।

PART 2

टैक्सी 20 मिनट बाद आई। ड्राइवर आरिफ़ खान ने जैसे ही नंदिता को देखा, उसकी आँखों में चिंता उतर आई।

—मैडम, अस्पताल चलें? आपकी हालत बहुत खराब है।

—नहीं… घर, उसने मुश्किल से कहा।

रास्ते भर जयपुर की सड़कें बारिश से चमक रही थीं। चाय की दुकानों पर लोग खड़े थे, ट्रैफिक चलता रहा, शहर को कोई फर्क नहीं पड़ा कि एक औरत अपनी ही ज़िंदगी से बाहर धकेली जा रही थी।

घर पहुँचते-पहुँचते नंदिता बेहोश होने लगी। आरिफ़ ने उसे गिरने से पहले पकड़ लिया और दरवाज़े की घंटी बजाई। दरवाज़ा उसकी सास शकुंतला देवी ने खोला।

—अब क्या नाटक है? सुबह से घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिला रही है।

आरिफ़ ने सख़्त आवाज़ में कहा:

—इनको तुरंत अस्पताल जाना होगा।

—तू ड्राइवर है, डॉक्टर मत बन।

—मैं इंसान हूँ। इतना काफी है।

उसने एम्बुलेंस बुला दी। शकुंतला देवी का चेहरा उड़ गया।

उसी रात विक्रम घर लौटा तो उसकी माँ ने दरवाज़ा बंद करते ही कहा:

—अगर सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों ने जाँच कर ली, सब खुल जाएगा।

—सब क्या?

वह जवाब जानता था।

शकुंतला ने फुसफुसाकर कहा:

—डॉक्टर बत्रा की रिपोर्टें। बदली हुई दवाइयाँ। और वह पैसा जो हमने उसे दिया।

विक्रम ने सिर पकड़ लिया।

महीनों से नंदिता को बताया जा रहा था कि उसकी बीमारी आख़िरी पड़ाव पर है। असली रिपोर्ट में इलाज की उम्मीद थी, पर झूठे कागज़ों ने उसे मौत का यक़ीन दिला दिया था। विक्रम ने उसकी असली दवाइयों की जगह मिलती-जुलती कमजोर गोलियाँ रख दी थीं। कारोबार उसके हाथ में था। वसीयत आख़िरी ताला थी।

शकुंतला की आँखों में डर नहीं, फैसला था।

—कल मैं अस्पताल जाऊँगी।

—क्यों?

—जो तुम श्मशान से पहले पूरा नहीं कर पाए।

उसी समय शहर के दूसरे छोर पर वही बूढ़ी औरत, सावित्री बाई, अपने भांजे कबीर से बात कर रही थी। कबीर उसी अस्पताल में पैरामेडिक था।

—मौसी, आज एक अजीब केस आया। सास एम्बुलेंस रोक रही थी। जैसे बहू बच गई तो उसका नुकसान हो जाएगा।

सावित्री बाई जम गई।

—नाम नंदिता था?

कबीर हैरान रह गया।

—आपको कैसे पता?

सावित्री बाई की आँखें सख्त हो गईं।

—क्योंकि सुबह उसका पति उसे श्मशान ले गया था।

PART 3

अगली सुबह अस्पताल के आईसीयू कॉरिडोर में सफ़ेद टाइलें चमक रही थीं। बाहर रिश्तेदारों की फुसफुसाहट, नर्सों की तेज़ चाल और मॉनिटर की बीप के बीच शकुंतला देवी ने अपना चेहरा मास्क से ढक रखा था। उसने पुरानी नर्स की यूनिफ़ॉर्म जैसा सफ़ेद कुर्ता पहना, हाथ में छोटा बैग पकड़ा और साइड एंट्री से अंदर घुस गई।

दरवाज़े के पास डॉक्टर राजीव बत्रा खड़ा था। वही डॉक्टर जिसने महीनों तक नंदिता की आँखों में मौत लिखी थी, जबकि उसकी फ़ाइल में इलाज की संभावना दर्ज थी। उसके माथे पर पसीना था।

—यह पागलपन है, शकुंतला जी, उसने धीमे से कहा। अब पीछे हट जाइए।

शकुंतला ने उसे घूरा।

—पागलपन तब नहीं लगा था जब 15 लाख लिए थे? अब डर लग रहा है?

—मैंने सिर्फ रिपोर्ट बदली थी। किसी को मारने की बात नहीं हुई थी।

—तुमने रास्ता बनाया। अब रास्ते से हटो।

बैग में एक सीरिंज थी। योजना साफ थी। नंदिता की हालत पहले से नाजुक थी। गलत दवा, अचानक रिएक्शन, फिर “प्राकृतिक जटिलता”। अमीर परिवारों की मौतों पर बहुत सवाल नहीं होते, अगर कागज़ महंगे डॉक्टरों के हों।

शकुंतला कमरे में घुसी। नंदिता बेहोश पड़ी थी। चेहरा दुबला, बाल बिखरे, हाथों में सलाइन। वही बहू जिसने शादी के बाद उसे सोने की चूड़ियाँ दी थीं, उसके लिए मालवीय नगर में ब्यूटी पार्लर खुलवाया था, हर करवा चौथ पर उसके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। शकुंतला ने एक पल उसे देखा, फिर दया की जगह लालच ने चेहरा भर लिया।

—बहुत बड़ा घर संभालना तुम्हारे बस का नहीं था, बहू, उसने बुदबुदाया।

उसने सीरिंज निकाली और सलाइन की नली की तरफ हाथ बढ़ाया।

तभी दरवाज़ा खुला।

सावित्री बाई दरवाज़े पर खड़ी थीं। सूती साड़ी, गीला दुपट्टा, मगर आँखों में ऐसी आग कि शकुंतला का हाथ हवा में रुक गया।

—एक कदम और बढ़ाया तो यह अस्पताल नहीं, गवाहों से भरी अदालत बन जाएगा।

शकुंतला ने पलटकर देखा।

—तुम? वही सड़क वाली बूढ़ी?

—हाँ। वही जिसे तुमने कीचड़ में उतारा था। और वही जिसने 38 साल सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी में ऐसे चेहरों को पढ़ना सीखा है।

कबीर उसके पीछे खड़ा था। उसने सीरिंज देखते ही अलार्म दबाया और नंदिता के बेड के पास आ गया।

—मैडम, हाथ पीछे कीजिए, उसने सख्ती से कहा।

शकुंतला पीछे हटी, मगर सीरिंज गिराने से पहले सुरक्षा गार्ड अंदर आ गए। नर्स ने उसे उठा लिया। डॉक्टर बत्रा भागने की कोशिश कर रहा था, पर कॉरिडोर में ही पकड़ा गया।

उसी अफरा-तफरी में नंदिता की पलकें काँपीं। उसने आधी खुली आँखों से सावित्री बाई को देखा, फिर अपनी सास के हाथ में पकड़े बैग को।

—यह… क्या हो रहा है? उसकी आवाज़ काँच जैसी टूटी हुई थी।

शकुंतला तुरंत रोने लगी।

—बहू, मैं तो तुम्हारे लिए आई थी। ये लोग गलत समझ रहे हैं।

सावित्री बाई आगे बढ़ीं।

—जो औरत बहू को बचाने आए, वह छिपकर सीरिंज लेकर नहीं आती।

अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को बुलाया। कुछ ही घंटों में तस्वीर बदल गई। विक्रम ने पहले फोन नहीं उठाया। फिर आया तो महंगे परफ्यूम, साफ शर्ट और नकली घबराहट के साथ।

—मेरी पत्नी कहाँ है? मैं उससे मिलना चाहता हूँ।

इंस्पेक्टर रेखा चौहान ने ठंडे स्वर में कहा:

—पहले आपसे कुछ सवाल होंगे।

विक्रम ने अभिनय किया। उसने कहा कि वह नंदिता से प्यार करता है। उसने कहा कि बीमारी ने उसे कठोर बना दिया था। उसने कहा कि वसीयत सिर्फ कानूनी सुरक्षा थी। उसने अपनी माँ को “भावुक औरत” बताया। मगर जब घर से नंदिता की दवाइयों की बोतलें मिलीं, जिनके अंदर असली दवा की जगह कमजोर सप्लीमेंट भरे थे, तब उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगी।

फिर बैंक रिकॉर्ड आए। डॉक्टर बत्रा के खाते में शकुंतला के पार्लर से भेजे गए पैसे। फिर फ़ाइलें मिलीं। असली रिपोर्ट, जिसमें लिखा था कि नंदिता की हालत गंभीर है लेकिन इलाज योग्य है। नकली रिपोर्ट, जिसमें अंतिम अवस्था का डर फैलाया गया था। फिर “मिट्टी की खुशबू” के खातों से निकाले गए 3 करोड़ की एंट्रियाँ मिलीं।

डॉक्टर बत्रा सबसे पहले टूटा।

—मैंने सोचा था बस रिपोर्ट बदलनी है। उन्होंने कहा कि बहू को मानसिक रूप से तैयार करना है। मुझे नहीं पता था कि दवाइयाँ भी बदली जा रही हैं।

विक्रम ने तुरंत कहा:

—सब माँ ने किया।

शकुंतला चीखी:

—झूठ! दवाइयाँ तूने बदली थीं। मैंने तो सिर्फ डॉक्टर का इंतज़ाम किया।

दोनों एक-दूसरे को बचाने नहीं, डुबाने लगे। और उसी पल पुलिस को समझ आ गया कि लालच की असली भाषा रिश्ते नहीं, डर होता है।

नंदिता को पूरी सच्चाई 4 दिन बाद बताई गई, जब वह आईसीयू से प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट हो चुकी थी। नया मेडिकल बोर्ड बना था। उन्होंने समझाया कि उसकी बीमारी आसान नहीं थी, लेकिन मौत की तत्काल सजा भी नहीं थी। सही इलाज, नियमित निगरानी और सुरक्षित माहौल में उसकी स्थिति सुधर सकती थी। जो गिरावट आई थी, उसका बड़ा कारण गलत दवाइयाँ, तनाव और जानबूझकर की गई लापरवाही थी।

नंदिता चुप रही।

उसने खिड़की के बाहर देखा। अस्पताल के बगीचे में अमलतास के पीले फूल झर रहे थे। वह याद करने लगी—विक्रम से पहली मुलाकात, जब वह उसके कैफ़े में इंटरव्यू देने आया था। वह एक असफल बिज़नेसमैन था, कर्ज में डूबा, आत्मसम्मान टूट चुका। नंदिता ने उसे नौकरी दी। फिर भरोसा दिया। फिर शादी की। उसने सोचा था कि किसी को मौका देना प्रेम होता है।

शकुंतला देवी ने शुरू से उसे पसंद नहीं किया। कहती थी, “बहू होकर बेटों से ज़्यादा कमाती है, घर में शांति कैसे रहेगी?” नंदिता हँसकर टाल देती। उसने सास के लिए पार्लर खुलवाया, हर त्योहार पर साड़ी दी, रिश्तेदारों के सामने हमेशा सम्मान रखा। पर अब समझ आया कि कुछ लोग सम्मान से नहीं पिघलते। वे बस सोचते हैं कि अगली बार क्या छीना जा सकता है।

उसकी आँखों से आँसू निकले। पर वह रोना कमजोरी का नहीं था। वह उस भरोसे का अंतिम संस्कार था, जिसे विक्रम चिता तक ले जाना चाहता था।

सावित्री बाई उसके पास बैठीं। उन्होंने वही पुराना लॉकेट उसकी हथेली पर रखा।

—बेटी, तूने उस दिन मना किया था, इसलिए बची। बहुत लोग डर के कारण अपनी ही मौत पर हस्ताक्षर कर देते हैं।

नंदिता ने धीमे से पूछा:

—आपको कैसे पता चला कि कुछ गलत है?

सावित्री बाई ने गहरी साँस ली।

—मैंने अस्पतालों में बहुत शरीर देखे हैं, पर उससे ज्यादा चेहरे देखे हैं। तेरे चेहरे पर बीमारी थी, पर तेरे पति के चेहरे पर इंतज़ार था। यह फर्क बहुत बड़ा होता है।

कबीर दरवाज़े के पास खड़ा था। वही पैरामेडिक जिसने केस पहचाना, वही जिसने सुरक्षा बुलवाई। आरिफ़ भी एक दिन फूल लेकर आया। वह झेंपा हुआ सा बोला:

—मैडम, मैं बस अपना काम कर रहा था।

नंदिता ने उसकी तरफ देखा।

—नहीं। आपने वह किया जो मेरे अपने नहीं कर पाए।

मामला अदालत पहुँचा। विक्रम और शकुंतला को हिरासत मिली। डॉक्टर बत्रा का लाइसेंस निलंबित हुआ और उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चला। कंपनी के खाते सील हुए, फिर अदालत के आदेश से नंदिता को नियंत्रण वापस मिला। उसने पाया कि कई सप्लायर बदल दिए गए थे, नकली बिल बने थे, कर्मचारियों को डराकर चुप कराया गया था। लेकिन इस बार वह टूटी नहीं। उसने हर कागज़ पढ़ा, हर गवाही सुनी, हर चोरी दर्ज कराई।

3 महीने बाद जब वह अस्पताल से पूरी तरह डिस्चार्ज होकर निकली, बाहर बारिश नहीं थी। जयपुर की सुबह साफ थी। सावित्री बाई ने उसके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाया। कबीर ने उसके लिए व्हीलचेयर धकेलनी चाही, पर नंदिता ने धीरे से कहा:

—मैं चलूँगी।

कदम धीमे थे, पर अपने थे।

“मिट्टी की खुशबू” का मुख्य कैफ़े फिर खुला। उस दिन कोई बड़ा उद्घाटन नहीं था, कोई महँगा पोस्टर नहीं, कोई मीडिया नहीं। बस पुराने कर्मचारी, कुछ ग्राहक, आरिफ़ अपनी टैक्सी बाहर खड़ी किए, कबीर अपनी मौसी के साथ और नंदिता काउंटर के पीछे खड़ी थी। उसने मेन्यू के पास एक छोटी पीतल की पट्टिका लगवाई:

“अकेले होना असहाय होना नहीं होता। कभी-कभी परिवार खून से नहीं, समय पर बढ़े हुए हाथों से बनता है।”

लोग उस पंक्ति को पढ़ते, फिर नंदिता को देखते। वह बस मुस्कुरा देती। सावित्री बाई कोने की मेज़ पर बैठकर अदरक वाली चाय पीतीं, जैसे वह हमेशा से उसी घर का हिस्सा रही हों।

एक दिन किसी ग्राहक ने पूछा:

—मैडम, यह लॉकेट हमेशा गले में क्यों रखती हैं?

नंदिता ने माता रानी की छोटी सी चाँदी की लॉकेट छुई। आँखों में न दर्द था, न डर। बस एक गहरी, शांत आग थी।

—क्योंकि इसने मुझे याद दिलाया था कि मेरी ज़िंदगी पर आख़िरी दस्तख़त मेरे ही होंगे।

श्मशान में जिस जगह विक्रम ने उसके लिए चिता सोची थी, वहाँ बाद में नगर निगम ने एक बरगद का पौधा लगाया। नंदिता कभी-कभी वहाँ जाती। मरने के लिए नहीं, याद रखने के लिए। वह मिट्टी को पानी देती और वापस लौट आती।

क्योंकि उसे अब समझ आ चुका था—किसी ने उसे समय से पहले दफनाने की कोशिश की थी, पर वह मिट्टी नहीं बनी।

वह जड़ बन गई।

और जड़ों को जितना दबाओ, वे उतनी गहराई से ज़मीन पकड़ लेती हैं।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.