
PART 1
बाल चिकित्सा आपातकाल के दरवाज़े पर आरव मल्होत्रा उसी औरत के पैरों में लगभग गिर पड़ा, जिसे उसने 7 महीने पहले अकेला छोड़ दिया था, और चिल्लाया, “मेरी बेटी को बचा लो, चाहे तुम मुझसे नफ़रत ही क्यों न करती हो।”
दिल्ली के एम्स के बाल आपातकालीन वार्ड में बारिश की गंध, गीले जूतों की आवाज़, स्ट्रेचर के पहिए और मशीनों की तीखी बीप एक साथ गूंज रहे थे। आरव की महंगी सफेद शर्ट भीग चुकी थी, बाल माथे से चिपके थे, और उसकी 7 साल की बेटी तारा उसके सीने से लगी रो रही थी। उसका दाहिना हाथ अजीब तरह से मुड़ा हुआ था, माथे पर हल्की सूजन थी।
सामने खड़ी डॉक्टर काव्या मिश्रा पलटी।
1 पल के लिए पूरा वार्ड जैसे रुक गया।
आरव ने पहले उसके चेहरे को पहचाना, फिर उसकी सफेद कोट के नीचे उभरे 7 महीने के गर्भ को। उसका चेहरा राख जैसा सफेद पड़ गया।
“काव्या…”
काव्या की उंगलियां अपने पेट पर ठिठक गईं। वही आदमी, जिसने करोल बाग के छोटे फ्लैट में उसे यह कहकर छोड़ दिया था कि वह “दूसरी जिम्मेदारी” नहीं उठा सकता, आज अपनी बेटी के लिए उसी से भीख मांग रहा था।
वह चीख सकती थी। वह पूछ सकती थी कि जब उसने 3 बार कॉल किया, 2 बार उसके ऑफिस गई, और 1 चिट्ठी छोड़ी, तब वह कहां था।
लेकिन उसके सामने एक बच्ची दर्द में थी।
काव्या ने आरव की तरफ देखना बंद किया और तारा के पास झुक गई।
“नाम क्या है, बेटा?”
“तारा,” बच्ची ने सिसकते हुए कहा, “मैं स्कूल के मैदान में गिर गई।”
“हाथ में बहुत दर्द है?”
तारा ने सिर हिलाया।
“पापा डर गए थे।”
काव्या के गले में कोई कड़वा कांटा अटक गया। आरव एक टूटी कलाई से डर गया था। वह तब नहीं डरा था, जब काव्या अकेली, गर्भ की रिपोर्ट हाथ में लिए, पूरी रात बाथरूम की ठंडी फर्श पर बैठी रही थी।
“सब ठीक करेंगे,” काव्या ने कहा, “लेकिन तुम्हारे पापा अभी थोड़ा पीछे खड़े होंगे।”
फिर उसने बिना भाव बदले कहा, “मिस्टर मल्होत्रा, पीछे हटिए।”
“मिस्टर” शब्द आरव को थप्पड़ जैसा लगा। वह चुपचाप पीछे हो गया।
एक्स-रे में साधारण फ्रैक्चर निकला, लेकिन सिर पर चोट की वजह से तारा को कुछ घंटे निगरानी में रखना था। काव्या ने प्लास्टर लगवाया, दवा लिखी, नर्स को निर्देश दिए और तारा से वादा किया कि उसकी सहेलियां उस पर रंग-बिरंगे दिल बना सकेंगी।
आरव दरवाज़े के पास खड़ा उसे देखता रहा। वह हिसाब लगा रहा था। 7 महीने का गर्भ। 180 दिन की चुप्पी। वह रात। वे कॉल। वह चिट्ठी।
जब तारा निगरानी कक्ष में सुला दी गई, आरव काव्या के पीछे कॉरिडोर तक आया।
“ये… मेरा बच्चा है?”
काव्या वहीं रुक गई।
“आज तुम्हारी बेटी को तुम्हारी जरूरत है।”
“काव्या, प्लीज़…”
“तुम 180 दिन गायब रहने के बाद यह सवाल ऐसे नहीं पूछ सकते, जैसे बस कोई ट्रेन छूट गई हो।”
आरव ने आंखें झुका लीं।
“मुझे लगा तुमने रिश्ता खत्म कर दिया।”
“मैं चाहती थी तुम सच में चुनो। तुमने चुप्पी चुनी।”
रात गहरी होने लगी। तारा डर से सो नहीं पा रही थी। उसने उसी “सुंदर डॉक्टर आंटी” को बुलाया, जिसके पेट में बच्चा था। काव्या गई।
तारा ने काव्या के पेट को देखकर धीरे से पूछा, “ये बच्ची है?”
“हाँ,” काव्या ने हल्की मुस्कान से कहा।
तारा ने अचानक कहा, “दादी कहती हैं, तुम्हारे जैसी औरतें बड़े घरों का पैसा फंसाने आती हैं।”
काव्या जम गई।
आरव ने सिर उठा लिया।
तारा रोने लगी, “मैंने कुछ गलत नहीं किया पापा… दादी ने फोन पर चाचा से कहा था कि अगर पापा को इस बच्चे के बारे में पता चला, तो मल्होत्रा परिवार का नाम मिट्टी में मिल जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा टूटकर गिर पड़ा।
फिर तारा ने और धीमे कहा, “दादी ने यह भी कहा था… यह बच्ची हमारे घर में जन्म नहीं लेनी चाहिए।”
PART 2
आरव के चेहरे से जैसे सारी उम्र उतर गई।
“तारा, दादी ने सच में ऐसा कहा?”
बच्ची कांप गई। काव्या ने तुरंत उसका अच्छा हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, तुमने कोई गलती नहीं की। बड़ों की गंदी बातों का बोझ बच्चे नहीं उठाते।”
काव्या की आवाज़ मजबूत थी, लेकिन उसका पेट भीतर से पत्थर हो रहा था। सावित्री मल्होत्रा—दक्षिण दिल्ली की आलीशान कोठी, मंदिरों में दान, क्लब की मुस्कान, और दिल में खून जैसा ठंडा घमंड। उसने काव्या को कभी डॉक्टर नहीं माना था, सिर्फ एक नर्स की बेटी, जो मल्होत्रा खानदान के लायक नहीं थी।
अगली रात काव्या के फ्लैट के बाहर एक सफेद डिब्बा मिला। उसमें बच्चे की क्रीम रंग की बुनी हुई चादर, पुराना चांदी का झुनझुना और एक पेन ड्राइव थी।
कार्ड पर लिखा था, “सच देर से आए, तो भी उसे रोका नहीं जाना चाहिए।”
दरवाज़े की घंटी बजी।
काव्या ने खोला।
सामने आरव अपनी बेटी तारा के साथ खड़ा था, और उनके पीछे एक शांत चेहरे वाली औरत थी।
आरव फुसफुसाया, “ये मीरा है… मेरी पहली पत्नी।”
मीरा ने काव्या की आंखों में देखा।
“सावित्री जी ने मुझे भी इसी तरह तोड़ा था। इस पेन ड्राइव में सबूत हैं।”
उसी पल काव्या को तेज दर्द उठा।
PART 3
काव्या ने मेज़ का किनारा पकड़ लिया। उसकी सांस अचानक टूटने लगी। पेट लोहे की तरह कड़ा हो गया।
“काव्या!” आरव ने हाथ बढ़ाया।
“मत छुओ,” वह कहना चाहती थी, लेकिन आवाज़ निकली ही नहीं।
मीरा ने तुरंत मोबाइल निकाला। “एम्बुलेंस बुलाओ। अभी। यह सामान्य दर्द नहीं है।”
तारा रोते हुए दरवाज़े के पास खड़ी रह गई। आरव पहली बार सचमुच असहाय लग रहा था। जिस आदमी ने अदालतों में करोड़ों के सौदे पलट दिए थे, वह अपनी ही रसोई में खड़ा एक गर्भवती औरत की सांस बचाने का रास्ता नहीं समझ पा रहा था।
काव्या को उसी अस्पताल लाया गया, जहां वह दूसरों को बचाती थी। इस बार वह सफेद बेड पर थी, बांह में सलाइन, माथे पर पसीना, और दिल में केवल 1 सवाल।
“मेरी बच्ची?”
उसकी सहेली और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नंदिता ने झुककर कहा, “वह जिंदा है। लेकिन तुम्हें गंभीर प्रीक्लेम्प्सिया हुआ है। ब्लड प्रेशर बहुत ऊपर गया था। तुम्हें आराम, निगरानी और किसी भी तरह के तनाव से दूर रखना होगा।”
काव्या ने गर्दन मोड़ी। आरव कुर्सी पर बैठा था। आंखें लाल, चेहरा टूटा हुआ, हाथ जोड़कर नहीं, बल्कि अपने अपराध के वजन में झुका हुआ।
“मैं गया नहीं,” उसने धीरे से कहा, “अब नहीं जाऊंगा।”
काव्या के पास जवाब देने की ताकत नहीं थी। नफरत भी थक चुकी थी।
कुछ देर बाद मीरा अंदर आई। उसके हाथ में लैपटॉप था।
“अब आधा सच नहीं चलेगा,” उसने कहा।
उसने पेन ड्राइव लगाई। पहला ऑडियो चला।
सावित्री मल्होत्रा की आवाज़ कमरे में फैल गई—धीमी, साफ, जहरीली।
“काव्या मिश्रा गर्भवती है। अगर आरव को पता चला, तो वह गलती सुधारने के नाम पर उससे शादी कर बैठेगा। ऑफिस की रिसेप्शन वाली से कह देना, वह लड़की कभी आई ही नहीं थी।”
काव्या की आंखें भर आईं।
दूसरा ऑडियो चला।
“एक मध्यमवर्गीय डॉक्टर हमारे घर में पेट लेकर नहीं घुसेगी। पहले मीरा ने मेरी इज्ज़त कम की, अब ये लड़की? आरव को बताओ कि काव्या खुद रिश्ता छोड़कर चली गई। उसका नंबर उसके ऑफिस फोन से ब्लॉक कर दो।”
आरव कुर्सी से उठ गया। उसके होंठ कांप रहे थे।
“मां ने कहा था तुम किसी दूसरे डॉक्टर के साथ चली गई हो। उन्होंने कहा तुमने साफ मना किया है कि मैं संपर्क न करूं।”
काव्या ने आंखें बंद कर लीं।
“मैं 3 बार तुम्हारे ऑफिस आई थी। तुम्हारे नाम चिट्ठी छोड़ी थी। हर रात फोन किया। फिर सोचा तुमने मुझे मिटा दिया।”
मीरा ने कड़वे स्वर में कहा, “आरव, सावित्री जी ने मेरे साथ भी यही किया था। मुझे लालची कहा, तुम्हें कहा कि मैं तुम्हारी बेटी के बहाने संपत्ति चाहती हूं। मुझे कहा तुम मेरे शरीर से ऊब गए हो। तुम्हें कहा मैं शादी के बाद बदल गई हूं। हम दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद किया, और तुम्हारी मां जीत गईं।”
आरव ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
कमरे में तारा नहीं थी। शुक्र था। कोई बच्चा इतनी गंदी विरासत सुनने के लिए पैदा नहीं होता।
आरव ने वहीं अपनी मां को फोन लगाया। स्पीकर ऑन था।
“मां, आपको काव्या के गर्भ के बारे में पता था?”
कुछ पल चुप्पी रही।
“आरव, तुम अभी भावुक हो।”
“जवाब दीजिए।”
“मैंने तुम्हें बचाया।”
“मेरी बेटी से?”
“उस औरत से। ऐसे लोग बड़े घरों में आकर सब मांग लेते हैं।”
आरव की आवाज़ पहली बार अपने घर की दीवारों से बड़ी हो गई।
“वह औरत 7 महीने मेरी बेटी को अकेले लेकर चली। क्योंकि आपने सच चुरा लिया।”
“मैं तुम्हारी मां हूं।”
“और मैं पिता हूं।”
फोन के उस तरफ सिसकने की कोशिश हुई, लेकिन वह भी नियंत्रण का हिस्सा लग रही थी।
“तुम मेरे खिलाफ जाओगे?”
“मैं हर उस चीज़ के खिलाफ जाऊंगा जो मेरे बच्चों को नुकसान पहुंचाएगी। आप काव्या के पास नहीं आएंगी। तारा के पास नहीं आएंगी। और इस बच्ची के पास तो बिल्कुल नहीं, जब तक आपको यह समझ न आ जाए कि परिवार इज्ज़त की तिजोरी नहीं, इंसानों की जिम्मेदारी होता है।”
उसने फोन काट दिया।
काव्या ने उसे देखा। वह वही आरव था, पर पहली बार उसके पीछे कोई मां, कोई खानदान, कोई अहंकार खड़ा नहीं था।
“मैं माफी के लायक नहीं हूं,” आरव बोला, “और मैं आज माफी मांगकर तुम्हें और छोटा नहीं करूंगा। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि मुझे इस बच्ची का पिता बनने दो। तुम्हारा पति बनना तुम्हारे निर्णय पर है। पर पिता बनने से मैं अब भागूंगा नहीं।”
काव्या की पलकों से आंसू बह निकले।
वह चाहती थी अपना हाथ खींच ले। पर उसके हाथ में इतनी ताकत नहीं थी। या शायद दिल में इतनी क्रूरता नहीं बची थी।
अगले कई हफ्ते काव्या के लिए कैद जैसे थे। वह डॉक्टर थी, पर अब मरीज थी। बेड रेस्ट, दवाइयां, ब्लड प्रेशर की रीडिंग, नमक कम, चलना कम, रोना कम। पर यादें कैसे कम होतीं?
आरव रोज आता। कभी सादी मूंग दाल लेकर, कभी बिना मिर्च का खिचड़ा, कभी प्रसव से जुड़ी किताबें। वह बेढंगा था, लेकिन ईमानदार। उसने तारा को स्कूल छोड़ा, होमवर्क कराया, और हर शाम काव्या के कमरे में लाकर कहा, “धीरे बोलना, डॉक्टर आंटी को आराम चाहिए।”
तारा काव्या के पेट पर हाथ रखती।
“हाय छोटी बहन। मैं तारा हूं। दादी बुरी बातें बोलती हैं, लेकिन मैं नहीं बोलूंगी। मैं तुम्हें अपनी कहानी की किताब दूंगी।”
काव्या हर बार मुंह फेर लेती, क्योंकि वह तारा से प्यार करने लगी थी, और यह बात उसे डराती थी।
मीरा भी आने लगी। शुरुआत में अजीब लगा। पहली पत्नी, छोड़ी हुई प्रेमिका और एक आदमी की 2 बेटियां—यह किसी दिल्ली के ड्राइंग रूम की गॉसिप बन सकता था। लेकिन अस्पताल के कमरे में वे 2 औरतें दुश्मन नहीं रहीं। वे उसी घर की 2 घायल दीवारें थीं।
“आरव बदल सकता है,” मीरा ने एक दिन कहा, “लेकिन उसे आसानी से मत छोड़ना। मल्होत्रा लोग सच बोलने से पहले शिष्टाचार निभाते हैं। यही उनकी बीमारी है।”
काव्या ने पूछा, “तुम्हें उससे अभी भी शिकायत है?”
“बहुत है,” मीरा बोली, “लेकिन मैं नहीं चाहती कि हमारी बेटियां वही दर्द विरासत में लें।”
उधर सावित्री मल्होत्रा शांत नहीं बैठीं। उन्होंने रिश्तेदारों में कहानी फैलाई कि काव्या ने आरव को फंसाया है। परिवार के वकील चाचा ने आरव को समझाया कि “ऐसी बातों को घर में सुलझाओ।” आरव ने पहली बार अपने ही परिवार के खिलाफ लिखित शिकायत दी। उसने ऑफिस की रिसेप्शनिस्ट से बयान दिलवाया, जिसने स्वीकार किया कि सावित्री के कहने पर काव्या की चिट्ठी रोकी गई थी। उसने काव्या और अजन्मी बच्ची के लिए कानूनी सुरक्षा की अर्जी लगाई।
सावित्री ने 1 रात में 23 संदेश भेजे।
“तुम्हें पछताना पड़ेगा।”
“वह लड़की तुम्हें खा जाएगी।”
“तारा मेरी पोती है, उसे मुझसे दूर नहीं कर सकते।”
आरव ने जवाब नहीं दिया। उसने सारे संदेश वकील को भेज दिए।
32वें हफ्ते में काव्या को जांच के लिए अस्पताल बुलाया गया। बारिश फिर उसी तरह गिर रही थी, जैसे उस रात गिरी थी, जब आरव उसे छोड़कर गया था। रास्ते भर आरव चुपचाप गाड़ी चलाता रहा। हर स्पीड ब्रेकर पर ऐसे धीमा करता, जैसे दुनिया टूट सकती हो।
एम्स के मुख्य लिफ्ट के सामने भीड़ थी। काव्या थक चुकी थी। उसने सर्विस लिफ्ट की तरफ इशारा किया।
“मैंने ड्यूटी में 1000 बार ली है। बदसूरत है, पर चलती है।”
“तुम्हें यकीन है?” आरव ने पूछा।
“मैं गर्भवती हूं, कांच की गुड़िया नहीं।”
दोनों लिफ्ट में चढ़े। दरवाज़े बंद हुए। लिफ्ट 1 मंजिल ऊपर गई, फिर झटके से हिली। लाइट झपकी, और अंधेरा छा गया।
आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
“घबराओ मत। मैं सिक्योरिटी को फोन करता हूं।”
काव्या कुछ कहती, उससे पहले उसके पैरों के पास गर्माहट फैल गई।
उसने नीचे देखा।
उसकी सांस रुक गई।
“आरव…”
“क्या हुआ?”
“पानी टूट गया।”
आरव का चेहरा जैसे बिखर गया।
“नहीं… अभी नहीं… बहुत जल्दी है।”
काव्या दर्द से दोहरी हो गई। उसने उसकी शर्ट पकड़ ली।
“सुनो। नंदिता को फोन लगाओ। स्पीकर ऑन करो। और जो कहूं, वही करना।”
“मुझे नहीं आता।”
काव्या ने दांत भींचकर कहा, “तो सीखो।”
सिग्नल टूट रहा था। नंदिता की आवाज़ आती-जाती रही, लेकिन उसने कुछ निर्देश दे दिए। आरव ने अपना कोट मोड़कर काव्या के सिर के नीचे रखा। बैग से सैनिटाइजर निकाला। हाथ धोए। उसके हाथ कांप रहे थे, मगर आंखें पहली बार भाग नहीं रही थीं।
“बताओ क्या करूं।”
“जब बच्ची निकले, उसे संभालना। मुंह साफ करना। अगर रोए नहीं, तो पीठ रगड़ना। जोर से नहीं। जल्दी।”
“मैं हूं।”
“सिर्फ बोलो मत।”
आरव ने उसकी आंखों में देखा।
“मैं हूं, और रहूंगा।”
दर्द की अगली लहर ने काव्या की चीख निकाल दी। लोहे की बंद लिफ्ट, मोबाइल की कांपती रोशनी, आरव के भीगे हाथ, सब किसी फिल्म का दृश्य लग रहा था, पर यह फिल्म नहीं थी। यह 1 बच्ची की जिद थी, जो किसी दादी के श्राप से पहले दुनिया में अपना नाम लिखना चाहती थी।
“अब!” काव्या चीखी।
उसने पूरी ताकत से जोर लगाया।
कुछ सेकंड के लिए दुनिया चुप हो गई।
फिर आरव के हाथों में एक बहुत छोटी, नीली-सी, नाजुक बच्ची थी।
“रो क्यों नहीं रही?” काव्या की आवाज़ डर से फट गई।
आरव ने उसके मुंह के पास अंगुली से नर्मी से सफाई की, फिर पीठ रगड़ी।
“आओ मेरी जान… आवाज़ करो… गुस्सा करो… हमें डांटो… बस सांस लो…”
1 सेकंड।
2 सेकंड।
फिर एक पतली, तेज, जिद्दी चीख लिफ्ट में गूंज गई।
काव्या फूटकर रो पड़ी।
आरव ने बच्ची को उसके सीने से लगाया।
“वह आ गई,” उसने कांपती आवाज़ में कहा, “हमारी बेटी आ गई।”
जब लिफ्ट खुली, बाहर डॉक्टर, नर्सें, वार्ड बॉय और सुरक्षा कर्मी खड़े थे। सब कुछ तेज़ी से हुआ। नाल काटी गई। बच्ची को नवजात गहन देखभाल कक्ष में ले जाया गया। उसका वजन 1 किलो से थोड़ा ज्यादा था, पर उसकी सांसों में वही जिद थी, जो अपनी जगह छीनकर नहीं, अपना अधिकार लेकर जन्मी थी।
काव्या ने उसका नाम रखा—आशा।
आरव ने पूछा नहीं कि मल्होत्रा परिवार में यह नाम चलेगा या नहीं। उसने बस कहा, “आशा ठीक है। क्योंकि वही बची रही।”
24 दिन तक आशा कांच की छोटी-सी मशीन में रही। आरव हर रात प्लास्टिक की कुर्सी पर सोया। तारा रोज चित्र बनाती—1 में 4 लोग थे, 1 में 5, और 1 में उसने मीरा को भी बनाया था। काव्या ने पूछा, “ये कौन?”
तारा बोली, “मम्मा। क्योंकि घर में जगह होनी चाहिए न?”
काव्या ने पहली बार बिना डर के मुस्कुरा दिया।
सावित्री 1 बार अस्पताल आईं। नीली साड़ी, मोतियों की माला, हाथ में महंगा मुलायम खिलौना। रिसेप्शन पर उनका नाम सुनकर आरव नीचे गया। काव्या दूर व्हीलचेयर पर बैठी सब देख रही थी।
“मैं अपनी पोती को देखने आई हूं,” सावित्री ने कहा।
“नहीं,” आरव ने जवाब दिया।
“तुम मुझे सबके सामने अपमानित करोगे?”
“आपने काव्या को चुप्पी में अपमानित किया था। यहां कम से कम लोग कारण जानेंगे।”
सावित्री की आंखों में पहली बार डर दिखा।
“उसने जीत लिया तुम्हें।”
काव्या ने धीरे से कहा, “नहीं, सावित्री जी। आपकी पोती बच गई। यह आपकी हार नहीं, उसकी जिंदगी है।”
सावित्री बिना खिलौना दिए चली गईं।
आशा के डिस्चार्ज वाले दिन तारा ने डायपर बैग उठाने की जिद की। मीरा भी आई। नंदिता ने काव्या को गले लगाया। आरव ने काव्या का हाथ पकड़ा, लेकिन कसकर नहीं। उसने शायद पहली बार समझा था कि प्यार पकड़ना नहीं, साथ चलना होता है।
अस्पताल के बाहर उसने काव्या को भूरी डायरी दी।
“कोई फिल्मी प्रस्ताव नहीं है,” वह बोला, “तुम्हें ऐसे तमाशे पसंद नहीं।”
काव्या ने डायरी खोली। उसमें किराए के छोटे घर का नक्शा था—लाजपत नगर या साउथ एक्स की कोठी नहीं, बल्कि काव्या की मां के घर के पास एक सादा-सा घर। उसमें तारा के लिए कमरा था, आशा के लिए धूप वाला कमरा, काव्या के लिए स्टडी, और एक अतिरिक्त बिस्तर, क्योंकि मीरा ने मजाक में कहा था कि वह कभी भी निरीक्षण करने आ सकती है।
आखिरी पन्ने पर लिखा था, “मैं तुम्हें परफेक्ट जिंदगी नहीं दे सकता। मैं बस ऐसी जिंदगी बनाना चाहता हूं, जहां किसी को चुने जाने के लिए भीख न मांगनी पड़े।”
फिर उसने एक पतली अंगूठी निकाली, जिसमें 2 छोटे छल्ले एक-दूसरे में जुड़े थे।
“मैं तुमसे आज हां नहीं मांग रहा। मैं बस पूछ रहा हूं, क्या किसी दिन, जब तुम्हारा दिल तैयार हो, तुम मेरे साथ चलना चाहोगी?”
काव्या ने आशा को देखा, फिर तारा को, जो सांस रोककर खड़ी थी, फिर मीरा को, जो आंखें घुमा रही थी जैसे कह रही हो कि आखिर 40 साल बाद आदमी ने ठीक वाक्य बोला।
काव्या ने आंसुओं के बीच मुस्कुराकर कहा, “किसी दिन, हां। लेकिन इसलिए नहीं कि तुमने कुर्सी पर रातें काटीं। इसलिए नहीं कि तुमने अपनी मां को रोका। इसलिए भी नहीं कि तुमने बेटी को जन्म के समय हाथों में संभाला।”
आरव ने पूछा, “फिर क्यों?”
“क्योंकि इस बार तुम मुझे अपने पीछे चलने को नहीं कह रहे। साथ चलने को कह रहे हो।”
आरव की आंखें भर आईं।
“हमेशा।”
काव्या ने सिर हिलाया।
“हमेशा मत कहो। आज कहो। फिर कल दोबारा कहना।”
आरव ने धीमे से कहा, “आज।”
तारा ने हाथ उठाया।
“और कल मैं याद दिला दूंगी।”
3 साल बाद उस छोटे घर में आवाज़ें थीं—साधारण, लेकिन चमत्कार जैसी। तारा बेसुरी पियानो बजाती थी और खुद ही ताली बजाती थी। आशा खिलौना स्टेथोस्कोप लेकर पुराने गोद लिए कुत्ते को मरीज बनाती थी। आरव रविवार को चाय बनाता और अभी भी कभी-कभी टोस्ट जला देता। मीरा महीने में 1 बार खाने पर आती, और किसी को अब अजीब नहीं लगता था कि पहली पत्नी, दूसरी प्रेमिका और 2 बेटियां एक ही मेज़ पर हंस सकती हैं।
सावित्री वापस नहीं आईं। कभी-कभी बिना पते के कार्ड भेजतीं। काव्या उन्हें पढ़ती, डिब्बे में रखती, लेकिन घर की चाबी कभी वापस नहीं देती। उसने सीख लिया था कि किसी को माफ करना और उसे अपनी जिंदगी में फिर से अधिकार देना 2 अलग बातें हैं।
काव्या की पुरानी संगीत डिब्बी अब बैठक की शेल्फ पर रखी थी। आरव ने उसे ठीक करवाया था, पर उसकी धुन में 1 सुर अब भी थोड़ा कांपता था।
काव्या को वही सुर सबसे प्यारा था।
क्योंकि कुछ टूटे हुए रिश्ते पहले जैसे कभी नहीं होते। उनमें दरारें रहती हैं, निशान रहते हैं, कुछ जगहें हमेशा नाजुक रहती हैं। लेकिन अगर कोई इंसान सच से भागना बंद कर दे, अगर एक बच्ची अंधेरी लिफ्ट में रोकर दुनिया को बता दे कि वह जीना चाहती है, अगर एक मां अपने बच्चे को खानदान से ऊपर चुन ले—तो टूटे हुए लोग भी फिर से गा सकते हैं।
और वह गीत, अधूरा होकर भी, किसी भी परफेक्ट खामोशी से ज्यादा गहरा होता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.