
भाग 1:
अनन्या शर्मा ने अपनी माँ की कलाई पर नीले निशान देखे और उसी पल उसके पिता ने काँपती आवाज़ में कहा—
—तुम्हारे पति ने हमें कुत्तों की तरह घर से निकाल दिया।
दिल्ली की वह रात जैसे किसी पुराने पाप की तरह खुल रही थी। जुलाई की बारिश सड़क पर पड़ी धूल, पेट्रोल और गंदगी को बहाते हुए हर चीज़ को बेरहम बना रही थी। लाजपत नगर की बंद दुकानों के बाहर टीन की छतों से पानी धार बनकर गिर रहा था। उसी पानी में भीगे गत्तों पर राघव शर्मा और मीरा शर्मा बैठे थे—वही 2 लोग, जिनके लिए अनन्या ने 8 साल तक बिना छुट्टी लिए काम किया था, ताकि गाजियाबाद के इंदिरापुरम में उनके नाम एक छोटा-सा मकान खरीद सके।
मीरा ने एक काली प्लास्टिक की थैली सीने से चिपका रखी थी। उसमें दवाइयाँ, 2 सूती साड़ियाँ और भगवान की छोटी-सी तस्वीर थी। राघव के चश्मे पर पानी जमा था, लेकिन वह उसे पोंछ भी नहीं पा रहे थे। उनके हाथ ऐसे काँप रहे थे जैसे किसी ने उम्र से पहले ही उनका आत्मसम्मान छीन लिया हो।
अनन्या घुटनों के बल उनके सामने बैठ गई। उसकी महँगी ऑफिस ड्रेस कीचड़ में भीग गई, पर उसे कुछ महसूस नहीं हुआ।
—माँ, यह किसने किया?
मीरा का चेहरा टूट गया। वह बेटी से लिपटकर रो पड़ीं।
—कबीर आया था… अपनी माँ सावित्री के साथ… और उस महेंद्र सेठी के साथ।
कबीर मल्होत्रा। अनन्या का पति। 6 साल का साथ। वही आदमी जो उसे रात में अदरक वाली चाय बनाकर देता था, जो उसकी माँ की डायबिटीज़ की दवा याद रखता था, जो राघव के लिए हर मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू लेकर जाता था।
अनन्या ने सिर हिलाया।
—नहीं। कबीर ऐसा नहीं कर सकता।
राघव ने पहली बार सीधे उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ डर था।
—उसने कहा कि वह घर अब हमारा नहीं रहा। सावित्री बोली कि हम तुम्हारी कमाई चूस रहे हैं। महेंद्र ने हमारे बिस्तर, बर्तन, कपड़े सब बाहर फेंक दिए। जब तुम्हारी माँ ने दरवाज़ा पकड़कर पूछा कि हमारा कसूर क्या है, कबीर ने उसकी कलाई पकड़कर खींचा।
अनन्या की नज़र मीरा की कलाई पर गई। नीला निशान साफ़ दिख रहा था।
उसके भीतर कुछ जल उठा।
—और तुमने पुलिस को क्यों नहीं बुलाया?
राघव ने होंठ भींच लिए।
—बाहर 2 काली स्कॉर्पियो खड़ी थीं। उनमें आदमी बैठे थे। वे पड़ोसी नहीं थे। जब मैंने अपनी फाइल उठानी चाही, जिसमें मकान के कागज़ थे, उनमें से 1 आदमी उतरा और मेरी तरफ़ ऐसे चला जैसे अभी उठा ले जाएगा। मैं डर गया, बेटी। मैं तुम्हारी माँ को लेकर भागा।
अनन्या ने दोनों को गले लगा लिया। बारिश में वह पहली बार सचमुच अकेली महसूस कर रही थी। उसने उन्हें कार में बैठाया, पास के एक होटल में कमरा लिया, सूखे कपड़े मँगवाए, गरम खिचड़ी ऑर्डर की और डॉक्टर को फोन करके मीरा की दवा मँगाई। पर उसके अपने अंदर की आग बुझ नहीं रही थी।
रात के 1:00 बजे वह नोएडा वाले अपने अपार्टमेंट लौटी। गेट के सामने वही काली स्कॉर्पियो खड़ी थी। शीशे काले थे, लेकिन उसे भीतर से सिगरेट की हल्की लाल चमक दिखी। चौकीदार ने नज़रें झुका लीं।
अनन्या ने दरवाज़ा खोला तो ड्रॉइंग रूम में सावित्री मल्होत्रा सोफे पर बैठी चाय पी रही थी। महेंद्र सेठी पैरों को फैलाकर ऐसे बैठा था जैसे घर उसी का हो। कबीर खिड़की के पास खड़ा था, चेहरा पत्थर जैसा।
सावित्री ने तिरछी मुस्कान दी।
—आ गई बहू? बहुत दान-पुण्य कर लिया अपने माँ-बाप पर?
अनन्या ने उसे अनदेखा किया। वह सीधे कबीर के सामने जाकर खड़ी हो गई।
—मेरे माँ-बाप को सड़क पर क्यों फेंका?
कबीर ने नज़र उठाई। उसकी आँखों में वह नरमी नहीं थी जिसे अनन्या अपना घर समझती थी।
—वे उस मकान में वापस नहीं जाएँगे।
—क्या?
—वह घर बेचा जाएगा।
—तुम पागल हो गए हो? वह घर मेरे पिता के नाम है। मैंने खरीदा है। तुम्हारा, तुम्हारी माँ का या इस आदमी का उससे कोई लेना-देना नहीं।
महेंद्र हँसा।
—शादी के बाद कमाया पैसा भी परिवार का होता है, मैडम। और परिवार में तुम्हारे बूढ़े माँ-बाप नहीं, तुम्हारा पति आता है।
सावित्री ने कप मेज़ पर पटका।
—मुझे पैसों की ज़रूरत है। महेंद्र ने एक बिज़नेस में पैसा लगाया है। घर खाली पड़ा है। तुम्हारे माँ-बाप को किराए के कमरे में रहना चाहिए। तुमने उन्हें सिर पर चढ़ा रखा है।
—वह घर खाली नहीं था। वह उनका घर था।
अनन्या ने कबीर की ओर देखा। शायद वह बोलेगा। शायद कहेगा कि यह सब मजबूरी है। शायद आँखों से कुछ समझाएगा। लेकिन कबीर ने सिर्फ़ जबड़ा कस लिया।
—अनन्या, बात बढ़ाओ मत। होटल जाओ। सुबह बात करेंगे।
—सुबह? मेरी माँ की कलाई पर तुम्हारी उँगलियों के निशान हैं।
कबीर का चेहरा 1 पल को काँपा, मगर तुरंत फिर सख्त हो गया।
—जो समझना है, समझ लो।
उस 1 वाक्य ने अनन्या की 6 साल की शादी को बीच से काट दिया।
वह बेडरूम में गई, बैग में कपड़े, बैंक फाइलें, लैपटॉप और पासपोर्ट डाले। अलमारी से अपनी शादी की फोटो गिर गई। उसमें कबीर मुस्कुरा रहा था, जैसे वह कभी किसी को चोट पहुँचा ही नहीं सकता। अनन्या ने फोटो उठाई, 1 पल देखा और उसे मेज़ पर उल्टा रख दिया।
बाहर निकलते वक्त सावित्री ने कहा—
—और हाँ, पुलिस का नाम मत लेना। आजकल दिल्ली में बहुत लोग गायब हो जाते हैं।
अनन्या ने पलटकर उसे देखा।
—अब डरने की बारी मेरी नहीं है।
कबीर खामोश खड़ा रहा। उसकी आँखें अनन्या का पीछा कर रही थीं, पर होंठ बंद थे।
लिफ्ट से नीचे उतरते ही काली स्कॉर्पियो की हेडलाइट अचानक जल उठी। तेज़ सफेद रोशनी सीधे अनन्या के चेहरे पर पड़ी। कार में बैठे 2 आदमी उसे घूर रहे थे। उसी पल उसके फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
“घर के कागज़ भूल जाओ, वरना अगली बारिश में तुम्हारे पिता नहीं मिलेंगे।”
अनन्या का हाथ काँप गया, लेकिन उसने फोन कसकर पकड़ लिया। उसे लगा था पति ने धोखा दिया है। पर अब साफ़ था कि यह सिर्फ़ पारिवारिक लालच नहीं, कुछ बहुत बड़ा और खतरनाक खेल था।
और वह नहीं जानती थी कि इस खेल में कबीर सचमुच दुश्मन था… या खुद सबसे बड़े जाल में फँसा हुआ आदमी।
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भाग 2:
अगली सुबह होटल के कमरे में राघव और मीरा जैसे 10 साल बूढ़े लग रहे थे। मीरा चुपचाप खिड़की के पास बैठी रहीं और राघव बार-बार यही कहते रहे कि घर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि जिन लोगों की आँखों में डर नहीं होता, वे कानून से भी नहीं डरते। पर अनन्या ने हार मानने से इनकार कर दिया। वह अपनी कॉलेज सीनियर और अब तेज़-तर्रार वकील बनी नंदिनी राव से मिली। कागज़ देखते ही नंदिनी ने साफ़ कहा कि मकान राघव के नाम है, इसलिए कबीर, सावित्री या महेंद्र उसे बेच ही नहीं सकते, जब तक राघव से जबरन पावर ऑफ अटॉर्नी पर साइन न कराया जाए। पुलिस स्टेशन में शिकायत लिखवाने गई तो अफसर ने महेंद्र सेठी का नाम सुनते ही मामला “घर का झगड़ा” बताकर टालना चाहा, लेकिन नंदिनी के सख्त तेवर के बाद शिकायत दर्ज हुई और 2 दिन में गायब भी कर दी गई। तभी सावित्री के घर काम करने वाली कांता ने अनन्या को पुरानी चाय की दुकान पर बुलाया। कांता ने बताया कि महेंद्र जुए और हवाला के कर्ज में डूबा है, और उसे “भाऊ काले” नाम के वसूलीबाज को 3 करोड़ लौटाने हैं। उसी रात राघव को उठाकर कागज़ों पर साइन कराने की योजना थी। कबीर ने जानबूझकर तमाशा किया, गाली दी, सामान फेंका, ताकि पड़ोसी बाहर आ जाएँ और गुंडे खुले में बुज़ुर्गों को उठा न सकें। कांता ने यह भी बताया कि कबीर उस रात अपने स्टडी रूम में बंद होकर रोया था और दीवार पर मुक्के मारता रहा था। अनन्या का गुस्सा टूटने लगा, मगर भरोसा अभी राख में दबा था। कांता ने चेतावनी दी कि महेंद्र को शक है, कबीर ने सबूत छिपाए हैं, और अगले दिन वह स्टडी रूम तोड़ने वाला है। उसी रात अनन्या पीछे के गेट से अपने फ्लैट में घुसी। स्टडी में खून के सूखे निशान, बिखरी फाइलें और टूटी फोटो फ्रेम पड़ी थी। उसे कबीर की पुरानी शीशम की मेज़ याद आई, जिसमें छिपा खाना था। उसने नीचे की लकड़ी दबाई। अंदर एक पेन ड्राइव, 3 करोड़ का बैंक ड्राफ्ट राघव के नाम और एक छोटी रिकॉर्डिंग डिवाइस रखी थी। वह सब बैग में डाल ही रही थी कि बाहर स्कॉर्पियो के ब्रेक चीखे। महेंद्र की भारी आवाज़ दरवाज़े के पास गूँजी और हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा।
भाग 3:
अनन्या ने साँस रोक ली। स्टडी रूम के अंदर अँधेरा था, सिर्फ़ खिड़की से आती बारिश की नीली रोशनी फर्श पर पड़ी थी। बाहर महेंद्र की चप्पलों की आवाज़ दरवाज़े के सामने रुक गई।
—दरवाज़ा खोल, कबीर! मुझे पता है तूने कुछ छिपाया है!
अनन्या ने मेज़ के नीचे बैठकर बैग सीने से चिपका लिया। उसके हाथ में पीतल की छोटी गणेश मूर्ति थी। अगर दरवाज़ा खुलता, तो वह लड़ती। डर इतना बड़ा हो गया था कि वह हिम्मत जैसा लगने लगा।
तभी सावित्री की आवाज़ दूर से आई।
—महेंद्र, पहले लॉकर देखो। वह चाबी वहीं रखता है।
महेंद्र गाली देते हुए बेडरूम की तरफ़ चला गया। अनन्या ने मौका देखा। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला, रसोई से सर्विस बालकनी में गई और पाइप पकड़कर नीचे वाले फ्लोर की ग्रिल तक उतरी। उसकी हथेलियाँ छिल गईं, लेकिन वह रुकी नहीं। बिल्डिंग के पीछे वाली गली में पहुँचकर वह इतनी तेज़ भागी कि चप्पल टूट गई।
होटल पहुँचते ही उसने कमरे की कुंडी लगाई। राघव और मीरा सो रहे थे। अनन्या ने लैपटॉप खोला और पेन ड्राइव लगाई। उसमें ऑडियो, बैंक ट्रांसफर, महेंद्र और भाऊ काले की तस्वीरें, पुलिस अफसरों के साथ मीटिंग की फुटेज और एक फाइल थी—“अनन्या के लिए।”
उसने पहले रिकॉर्डिंग डिवाइस चलाई।
भाऊ काले की भारी आवाज़ सुनाई दी।
—कल सुबह बूढ़े से साइन चाहिए। घर बिकेगा तो पैसा सीधा मेरे आदमी को जाएगा।
महेंद्र की आवाज़ काँप रही थी।
—हो जाएगा, भाऊ। मेरा सौतेला बेटा कबीर अब मेरे साथ है।
—अगर बूढ़े ने साइन नहीं किया, तो उसे उठा लो। बेटी बहुत बोलती है तो उसे भी समझा देना।
अनन्या की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं। फिर उसने कबीर की फाइल खोली। स्क्रीन पर कोई वीडियो नहीं था, सिर्फ़ आवाज़ थी। कबीर की आवाज़ टूटी हुई थी।
—अनन्या, अगर तुम यह सुन रही हो, तो शायद मैं तुम्हें सामने से सच नहीं बता पाया। मुझे माफ़ कर देना। उस रात मैंने तुम्हें जानबूझकर मुझसे नफरत करने दी।
अनन्या का गला भर आया।
—महेंद्र पर 3 करोड़ का कर्ज है। वह तुम्हारे पापा को उठवाने वाला था। मुझे आधे घंटे पहले पता चला। पुलिस में मेरे पास सिर्फ़ 1 भरोसेमंद आदमी था, लेकिन ऑपरेशन की तैयारी में समय चाहिए था। अगर मैं सीधा लड़ता, तो वे तुम्हारे माँ-पापा को वहीं ले जाते। इसलिए मैंने तमाशा किया। मैंने दरवाज़े पर चिल्लाया, सामान फेंका, तुम्हारी माँ को खींचा, ताकि पड़ोसी बाहर निकलें, लोग वीडियो बनाएँ और गुंडे उन्हें उठा न सकें। मुझे पता था तुम मुझे राक्षस समझोगी। यही ज़रूरी था। अगर महेंद्र को लगता कि तुम सच जानती हो, तो तुम अगला निशाना होती।
अनन्या रो पड़ी। वही कलाई, जिसे देखकर उसने कबीर को श्राप दिया था, दरअसल उसके माँ-बाप को अपहरण से बचाने की जल्दबाज़ी थी।
कबीर की आवाज़ आगे बोली—
—मैंने अपनी फिक्स्ड डिपॉज़िट तोड़ दी है। 3 करोड़ का ड्राफ्ट तुम्हारे पापा के नाम रखा है, ताकि वे सुरक्षित जगह जा सकें। पर पैसा समस्या का हल नहीं है। भाऊ काले रुकेगा नहीं। नंदिनी राव से मिलना। और अगर मैं गायब हो जाऊँ, तो ACP अर्जुन राठौर को फोन करना। वह एंटी-एक्सटॉर्शन सेल में है।
अनन्या ने तुरंत नंदिनी को फोन किया। नंदिनी 35 मिनट में होटल पहुँची। उसने सबूत सुने और उसका चेहरा कठोर होता गया।
—ये लोग सिर्फ़ प्रॉपर्टी नहीं चाहते। ये संगठित वसूली का मामला है।
अनन्या ने कहा—
—तो शिकायत करेंगे।
—शिकायत गायब हो जाएगी। हमें उन्हें रंगे हाथ पकड़ना होगा।
राघव जाग गए थे। उन्होंने सब सुन लिया था। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी रो रही थीं।
—कबीर ने हमें बचाया? —मीरा ने फुसफुसाया।
अनन्या ने सिर झुका लिया।
—हाँ, माँ। उसने खुद को हमारे सामने दोषी बना दिया।
राघव बहुत देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी काँपती कलाई सीधी की।
—अगर मेरा दामाद हमारे लिए अपना नाम जला सकता है, तो मैं 10 मिनट उन दरिंदों के सामने बैठ सकता हूँ।
नंदिनी ने ACP अर्जुन राठौर को फोन किया। उधर से जवाब आया कि कबीर 2 हफ्तों से महेंद्र और भाऊ काले पर नज़र रखवा रहा था, लेकिन पिछली रात से उसका फोन बंद है।
अनन्या का दिल धक से रह गया।
—कबीर कहाँ है?
—हमें शक है, महेंद्र ने उसे फरीदाबाद भेजने के बहाने अपने लोगों के पास रोक रखा है। लेकिन अभी प्राथमिकता आपके पिता की सुरक्षा है। भाऊ काले कल पावर ऑफ अटॉर्नी लेने आएगा। उसे बोलने दीजिए। धमकी रिकॉर्ड होनी चाहिए।
सुबह 8:00 बजे राघव की शर्ट के कॉलर में छोटा माइक्रोफोन लगाया गया। मीरा को होटल में महिला अफसरों के साथ रखा गया। अनन्या ने वही सादी कॉटन कुर्ती पहनी जो उसकी माँ ने कभी दी थी। वह राघव के साथ इंदिरापुरम वाले घर पहुँची। दरवाज़े पर तुलसी का सूखा गमला पड़ा था। जिस घर में कभी रविवार को पूरी-सब्ज़ी की खुशबू आती थी, वहाँ अब सिगरेट और डर की बू थी।
अनन्या ने महेंद्र को फोन किया।
—पापा साइन करने को तैयार हैं। बस हमें छोड़ दो।
महेंद्र की हँसी आई।
—अक्ल आ गई तुम्हें। वहीं रुकना।
8:47 पर 3 काली स्कॉर्पियो गली में घुसीं। आसपास दूधवाले, सब्ज़ीवाले और बिजली विभाग की वैन खड़ी थीं। कोई नहीं जानता था कि उनमें पुलिसवाले बैठे हैं।
महेंद्र उतरा, हाथ में फाइल थी। उसके पीछे भाऊ काले उतरा—सफेद कुर्ता, सोने की चेन, आँखों में ऐसी ठंडक जैसे इंसान नहीं, हिसाब-किताब देख रहा हो।
—चलो अंदर —भाऊ ने कहा—सड़क पर नाटक नहीं चाहिए।
घर के डाइनिंग टेबल पर राघव को बैठाया गया। महेंद्र ने कागज़ फैलाए।
—यहाँ, यहाँ और यहाँ साइन करो। मकान बेचने का पूरा अधिकार मुझे मिलेगा।
राघव ने पेन उठाया, मगर साइन नहीं किया।
—मेरी बेटी को छोड़ दोगे?
महेंद्र भड़क उठा।
—बूढ़े, बहुत सवाल करता है तू!
भाऊ ने हाथ उठाकर उसे चुप कराया। वह राघव के पास झुका।
—राघव जी, यह सौदा नहीं है। यह आपकी बची हुई इज़्ज़त की कीमत है। साइन कर दो, वरना इज़्ज़त भी जाएगी और साँस भी।
अनन्या का गला सूख गया। उसे इयरपीस में हल्की आवाज़ सुनाई दी—“सीधी धमकी चाहिए। अभी नहीं।”
राघव ने जानबूझकर पेन नीचे रख दिया।
—अगर मैं मना कर दूँ?
भाऊ काले ने अपनी जेब से चाकू निकाला और मेज़ पर रख दिया। चमकती धार देखकर अनन्या के पैर सुन्न हो गए।
—तो पहले तुम्हारी उँगलियाँ टूटेंगी। फिर तुम्हारी बेटी मेरे साथ जाएगी। और अगर पुलिस गई तो तुम्हारी पत्नी मंदिर के बाहर विधवा बनकर बैठेगी।
यही पल था।
अनन्या ने ज़ोर से चीख लगाई—
—पापा को मत मारो!
अगले ही सेकंड घर का दरवाज़ा धड़ाम से टूटा। काले जैकेट पहने अफसर अंदर घुसे।
—पुलिस! हथियार नीचे!
खिड़की से 2 अफसर कूदे। रसोई के रास्ते 3 और आए। भाऊ का आदमी चाकू उठाने ही वाला था कि उसे जमीन पर गिरा दिया गया। महेंद्र पीछे हटकर भागा, पर दरवाज़े पर किसी ने उसका रास्ता रोक लिया।
वह कबीर था।
चेहरे पर चोट के निशान थे, होंठ फटा हुआ था, कंधे पर पट्टी बंधी थी। लेकिन उसकी आँखें जिंदा थीं। अनन्या का दिल वहीं ठहर गया।
महेंद्र हकलाया—
—तू… तू तो फरीदाबाद में था।
कबीर ने धीमे कदम आगे बढ़ाए।
—था। तुम्हारे आदमियों ने बहुत कोशिश की कि वहीं रहूँ।
महेंद्र ने हँसने की कोशिश की।
—मैंने तुझे पाला है, बेटा।
कबीर की आँखों में घृणा तैर गई।
—तुमने मेरी माँ की अकेलेपन का फायदा उठाया। मुझे पिता मत कहो।
महेंद्र ने जेब में हाथ डालने की कोशिश की, मगर कबीर ने उसकी कलाई पकड़कर मोड़ दी। वह दर्द से चीखा और अफसरों ने उसे पकड़कर हथकड़ी लगा दी।
भाऊ काले ने खिड़की की तरफ़ भागने की कोशिश की। ACP अर्जुन राठौर ने उसे मेज़ से टकराकर दबोच लिया।
—भाऊ काले, वसूली, अपहरण की साजिश, बुज़ुर्ग पर दबाव, धमकी और हवाला नेटवर्क—सब रिकॉर्ड है।
पहली बार भाऊ के चेहरे पर डर दिखा।
सावित्री उसी वक्त दरवाज़े पर पहुँची। वह महँगी साड़ी, गहरे चश्मे और सोने के कंगनों में थी, जैसे सौदा तय होने पर घर देखने आई हो। महेंद्र को हथकड़ी में देख वह चीख उठी।
—कबीर! यह क्या हो रहा है? अपनी माँ के पति को ऐसे गिरफ्तार करवा रहा है?
कबीर ने उसे देखा। उसका चेहरा टूट गया, लेकिन आवाज़ नहीं काँपी।
—मैंने तुम्हें 5 बार चेतावनी दी थी, माँ। तुमने लालच चुना। तुमने मीरा आंटी और राघव अंकल को सड़क पर फेंकने में मदद की।
—मुझे नहीं पता था कि महेंद्र गुंडों से मिला है!
—लेकिन यह पता था कि वह घर तुम्हारा नहीं है।
सावित्री रोते हुए आगे बढ़ी।
—मैं तेरी माँ हूँ।
कबीर की आँखें भर आईं।
—इसलिए तुम्हारे लिए वकील करूँगा। लेकिन झूठ नहीं बोलूँगा।
सावित्री वहीं फर्श पर बैठ गई। उसका रोना अब गुस्से का नहीं, हार का था।
अनन्या ने राघव को गले लगाया। चाकू की वजह से उनके गले पर हल्की खरोंच आई थी, पर वह सुरक्षित थे। मीरा पुलिस की गाड़ी से भागती हुई आईं। उन्होंने पहले अपने पति को पकड़ा, फिर कबीर के सामने हाथ जोड़ दिए।
—बेटा, मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुझे कोसा था। मैंने कहा था तू राक्षस है।
कबीर झुक गया और उनके हाथ पकड़ लिए।
—नहीं, आंटी। उस रात मुझे सचमुच राक्षस बनना पड़ा था।
अनन्या उसके पास आई। 2 लोग, जिनके बीच 1 रात में विश्वास का पूरा शहर जल गया था, अब उसी राख में खड़े थे।
—तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? —अनन्या ने रोते हुए पूछा।
—क्योंकि तुम्हारी आँखों में मेरे लिए नफरत देखकर महेंद्र निश्चिंत हो गया था। अगर तुम मुझे बचाने की कोशिश करतीं, तो वह तुम्हें भी नहीं छोड़ता।
—तुम अकेले थे।
—तुम वापस आ गईं।
अनन्या ने उसका घायल चेहरा अपने हाथों में लिया और पहली बार उस आदमी को देखा जो उसके सामने टूटकर भी खड़ा रहा था।
1 महीने बाद महेंद्र जेल में था। भाऊ काले के नेटवर्क पर छापे पड़े। कई पुराने मामले खुले। सावित्री को जमानत मिली, लेकिन उसकी दुनिया खाली हो चुकी थी। वह रिश्तेदारों के घरों के बीच भटकती रही, क्योंकि जिस घर के लिए उसने दूसरों का घर उजाड़ना चाहा था, उसके अपने घर के दरवाज़े बंद हो चुके थे।
कांता को पुलिस सुरक्षा मिली। बाद में अनन्या और कबीर ने उसकी मदद से एक छोटी-सी टिफिन सर्विस शुरू करवाई। राघव और मीरा अपने घर लौट आए। मीरा ने तुलसी का नया पौधा लगाया। राघव ने जंग लगा गेट फिर से नीले रंग से रंगा। दीवार पर जहाँ महेंद्र ने सामान पटका था, वहाँ कबीर ने खुद प्लास्टर किया।
रविवार को फिर घर में आलू-पूरी, चाय और इलायची की खुशबू लौट आई। कई बार राघव कबीर को बुलाकर कहते—
—बेटा, यह बल्ब ज़रा ठीक कर दे।
और कबीर सीढ़ी लगाकर मुस्कुराते हुए काम कर देता, जैसे यही उसकी सबसे बड़ी जीत हो।
एक शाम फिर तेज़ बारिश हुई। वही आवाज़, वही गीली सड़कें, वही दिल्ली-एनसीआर की घुटी हुई हवा। लेकिन इस बार राघव और मीरा गत्तों पर नहीं, अपने डाइनिंग टेबल के पास बैठे थे। मीरा चाय डाल रही थीं। राघव अखबार मोड़ रहे थे। अनन्या और कबीर खिड़की के पास खड़े बारिश देख रहे थे।
कबीर ने धीरे से कहा—
—अब कोई राज़ नहीं।
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—अब कोई अकेला नहीं।
बारिश बाहर गिरती रही। घर के भीतर 4 लोग चुपचाप बैठे रहे, जैसे हर आवाज़ के पीछे एक टूटा हुआ दिन दफन हो चुका हो। उस रात उन्हें समझ आया कि घर सिर्फ़ दीवारों और कागज़ों से नहीं बचता। घर तब बचता है, जब कोई अपनों की नज़र में गिर जाने का दर्द सहकर भी उन्हें बचाने की हिम्मत रखता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.