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बहत्तर वर्ष की उम्र में, मेरे पति अपनी जवान प्रेमिका को हमारे दिल्ली वाले बंगले में ले आए, नौकरों के सामने मुझे निकम्मी कहा और मुस्कुराते रहे—जब तक कि न्यायाधीश ने वह सीलबंद लिफ़ाफ़ा नहीं खोला, जिसमें हमारी हर संपत्ति पर मेरा नाम दर्ज था।

देवेंद्र ने एक भूरी फ़ाइल खोली और उसे सेंटर टेबल पर फेंक दिया।

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“गुड़गांव में एक वरिष्ठ नागरिक आवास है। बहुत अच्छी जगह है। प्राइवेट कमरा, नर्स, बगीचा। वहाँ आप आराम से रहेंगी।”

कागज़ मेरी ओर सरक गया।

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मैंने उसे छुआ तक नहीं।

“तो मुझे यहाँ से भेजा जा रहा है?” मैंने पूछा।

“ऐसे शब्द मत इस्तेमाल करो,” रोहन ने जल्दी से कहा। “सुनने में बहुत बुरा लगता है।”

“बुरी चीज़ों को बुरा ही सुनाई देना चाहिए,” मैंने जवाब दिया।

आख़िरकार कियारा बोली।

“आंटी, कोई आपको घर से नहीं निकाल रहा। देवेंद्र की भी ज़िम्मेदारियाँ हैं। इतना बड़ा बंगला एक बीमार इंसान के लिए बहुत बड़ा है। हमारी शादी के बाद हमें भी जगह चाहिए होगी।”

हमारी शादी।

मेरी उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे को और कसकर पकड़ गईं।

प्रिया फ़र्श की ओर देखने लगी।

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कुणाल बोला, “माँ, कानूनी तौर पर यही सही है। पापा ने सब कुछ बनाया है। आपने कभी बिज़नेस नहीं संभाला।”

उस सुबह पहली बार मैं हँसी।

ज़ोर से नहीं।

उससे भी ज़्यादा डरावनी।

सबकी नज़रें मेरी तरफ़ उठ गईं।

देवेंद्र की आँखें सिकुड़ गईं।

“क्या मज़ेदार है?”

मैंने कहा, “तुम सबने कितना लंबा इंतज़ार किया। उनचास साल तक तुमने मेरे हाथों का खाना खाया, मेरे गहनों को गिरवी रखकर काम चलाया, अपने ग्राहकों को मेरी डाइनिंग टेबल पर लाए, बैंक मैनेजरों को शांत कराने के लिए मुझसे विनती की, और आज तुम्हें पता चला कि मैंने कभी बिज़नेस संभाला ही नहीं।”

रोहन का चेहरा लाल हो गया।

“माँ, प्लीज़।”

मैं उसकी ओर मुड़ी।

“जब सूरत में तुम्हारी पहली फैक्ट्री की खेप रिजेक्ट हो गई थी, तब आधी रात तक सप्लायर के साथ कौन बैठा था?”

उसने कुछ नहीं कहा।

मैंने कुणाल की ओर देखा।

“जब लुधियाना वाले ऑर्डर से पहले तुम्हारे पिता का चेक बाउंस हो गया था, तब किसके सोने के कंगन बैंक लॉकर तक पहुँचे थे?”

कुणाल असहज होकर हिल गया।

फिर मैंने प्रिया की ओर देखा।

“जब तुम्हारी बेटी के एडमिशन के लिए डोनेशन चाहिए था, तब किसकी फ़िक्स्ड डिपॉज़िट तुड़वाई गई थी?”

प्रिया ने अपने होंठ भींच लिए।

कियारा ने हल्की-सी साँस छोड़ी।

“देव, यही वजह है कि तुम कहते थे, ये भावुक हो जाती हैं।”

देवेंद्र फिर से तनकर खड़ा हो गया, जैसे उसे फिर से निर्दय बनने का मौका मिल गया हो।

“बस। अब तुम्हारी बहस करने की स्थिति नहीं है। मैंने वकील को ट्रांसफ़र के कागज़ तैयार करने का निर्देश पहले ही दे दिया है। आज तुम हस्ताक्षर करोगी। बंगला पूरी तरह मेरे नियंत्रण में आ जाएगा, और परिवार के खातों का पुनर्गठन होगा।”

मैंने फ़ाइल की ओर देखा।

फिर अपने पति की ओर देखा।

“तुमने पहले ही वकील को निर्देश दे दिए?”

“हाँ।”

“और किस वकील ने मुझसे बात किए बिना ऐसे कागज़ तैयार करने की हामी भर दी?”

वह मुस्कुराया।

“जिसे हक़ीक़त की समझ है।”

मैंने धीरे से सिर हिलाया।

“बहुत अच्छा।”

रोहन बेचैन दिखाई दिया। वह उस लहजे को पहचानता था। उसने वही लहजा तब सुना था जब सप्लायर झूठ बोलते थे, जब रिश्तेदार धोखा देते थे, या जब स्कूल के प्रिंसिपल मुझे डराने की कोशिश करते थे।

वह वही लहजा था, जिसे अपनाने के बाद मैं शिष्टाचार छोड़ देती थी।

देवेंद्र ने मेरी शांति को मेरी कमजोरी समझ लिया।

उसने एक पेन निकाला और फ़ाइल पर रख दिया।

“हस्ताक्षर करो, सावित्री। इसे गंदा मत बनाओ।”

वह जवान औरत थोड़ा आगे झुकी।

उसकी चूड़ियाँ खनक उठीं।

उसकी कलाई पर मैंने अपना प्राचीन कुंदन का कंगन देखा।

वही, जो मेरे पिता ने मेरी शादी के दिन मुझे दिया था।

एक पल के लिए कमरा मेरी आँखों से ओझल हो गया।

मुझे अपने पुराने जयपुर वाले आँगन में पिता के हाथ याद आए, जो वह कंगन मेरी कलाई पर बाँध रहे थे।

उन्होंने फुसफुसाकर कहा था, “अपनी इज़्ज़त को कभी दहेज मत बनाना। सोना फिर से बनाया जा सकता है। इज़्ज़त नहीं।”

मैंने कियारा की कलाई की ओर देखा।

“यह तुम्हें कहाँ से मिला?”

वह पलक झपकाकर मुस्कुराई।

“देव ने मुझे दिया।”

“सच?”

देवेंद्र झल्लाकर बोला, “वैसे भी पड़ा हुआ था, किसी काम का नहीं।”

“वह मेरे बंद मखमली डिब्बे में रखा था।”

उसने कंधे उचकाए।

“जो तुम्हारा है, वह मेरा है।”

“नहीं,” मैंने कहा। “यही तुम्हारी पहली गलती थी।”

कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।

देवेंद्र मुझे घूरने लगा।

“तुमने क्या कहा?”

मैंने पेन उठाया, उसे अपनी उँगलियों में एक बार घुमाया, और बिना हस्ताक्षर किए वापस फ़ाइल पर रख दिया।

फिर मैंने अपनी शॉल की जेब में हाथ डाला और अपना फ़ोन निकाला।

अपना रोज़ वाला फ़ोन नहीं।

वह छोटा काला फ़ोन, जो मेरे वकील ने मुझे दो साल पहले दिया था।

सबसे पहले रोहन ने उसे देखा।

“माँ, यह क्या है?”

मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और सेव किए हुए एक नंबर पर कॉल लगा दी।

दूसरी घंटी पर कॉल उठ गई।

एक महिला की आवाज़ आई।

“जी, मिसेज़ मेहरा?”

मैंने देवेंद्र की आँखों में देखते हुए कहा, “एडवोकेट कुरैशी, यह उसे घर ले आया है। इसने मेरे गहने ले लिए हैं। यह पूरे परिवार के सामने मुझसे प्रॉपर्टी ट्रांसफ़र के कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाना चाहता है।”

कुछ पल की चुप्पी रही।

फिर एडवोकेट फ़राह कुरैशी बोलीं, “बहुत बढ़िया। किसी भी कागज़ पर हस्ताक्षर मत कीजिए। फ़ोन स्पीकर पर रख दीजिए।”

देवेंद्र का चेहरा बदल गया।

“कौन कुरैशी?”

मैंने स्पीकर ऑन कर दिया।

फ़राह की आवाज़ ड्रॉइंग रूम में तलवार की धार जैसी शांत गूँज उठी।

“मिस्टर मेहरा, मैं एडवोकेट फ़राह कुरैशी, मिसेज़ सावित्री मेहरा की वकील बोल रही हूँ। मेरी मुवक्किल पर किसी भी तरह का दबाव डालने, उन्हें उनके वैवाहिक घर से निकालने, उनके स्त्रीधन का ग़ैरक़ानूनी दुरुपयोग करने, या संपत्ति के दस्तावेज़ों पर ज़बरदस्ती हस्ताक्षर करवाने की किसी भी कोशिश को आज ही अदालत के सामने पेश किया जाएगा।”

कियारा की मुस्कान गायब हो गई।

रोहन फुसफुसाया, “अदालत?”

देवेंद्र ने झटके से फ़ाइल मेज़ से उठा ली।

“यह कैसी बकवास है? सावित्री, तुमने क्या किया है?”

उस सुबह पहली बार मैं सचमुच मुस्कुराई।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.