भाग 1:
तुम्हारा बेटा तुम्हें पुकारते-पुकारते चला गया, और तुम होटल के कमरे में किसी और औरत के साथ थे।
यह वाक्य दिल्ली के कल्याण बाल अस्पताल की तीसरी मंजिल के सफेद गलियारे में ऐसे गिरा, जैसे किसी ने आधी रात को किसी मां की छाती चीरकर सच बाहर रख दिया हो।
काव्या मल्होत्रा कपूर ने चीख नहीं मारी। वह रोई भी नहीं। वह बस अपने 5 साल के बेटे आरव की नीली चादर दोनों हाथों में पकड़े खड़ी रही। उसके बाल बिखरे हुए थे, सलवार-कुर्ते पर बारिश और दवा की गंध चिपकी थी, और उसकी आंखों में वह खालीपन था जो किसी इंसान में तब उतरता है जब उसका पूरा संसार एक ही रात में राख हो जाए।
रोहन कपूर रात 2:20 पर अस्पताल पहुंचा था। महंगी शर्ट के बटन गलत लगे हुए थे। बाल उलझे थे। और उसके कोट से किसी और औरत के इत्र की तेज खुशबू आ रही थी।
—काव्या… क्या हुआ? मेरा फोन बंद हो गया था। अभी देखा तुम्हारी कॉल्स।
काव्या ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
—मैंने तुम्हें 18 बार फोन किया था।
रोहन ने होंठ खोले, मगर आवाज नहीं निकली।
—मुझे लगा… कोई छोटी बात होगी। तुम तो अस्पताल में काम करती हो, संभाल लेती हो।
काव्या की उंगलियां चादर में कस गईं।
—आरव संभल नहीं रहा था, रोहन। वह सांस नहीं ले पा रहा था। उसके होंठ नीले पड़ रहे थे। वह मेरी उंगली पकड़कर बार-बार पूछ रहा था, “पापा आ रहे हैं ना?”
रोहन पीछे हट गया जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मार दिया हो।
—नहीं… नहीं, ऐसा मत कहो।
कमरा 312 आधा खुला था। अंदर आरव सफेद चादर के नीचे इतना छोटा लग रहा था कि अस्पताल का बिस्तर भी उसके लिए बड़ा और निर्दयी लग रहा था। उसके सीने से उसका नीला डायनासोर वाला खिलौना लगा हुआ था। वही खिलौना जिसे वह हर रात अपने साथ रखकर सोता था। मॉनिटर बंद कर दिया गया था, लेकिन काव्या के कानों में अब भी वह लंबी, सपाट आवाज गूंज रही थी, जिसने रात 11:47 पर उसके बेटे की आखिरी सांस दर्ज की थी।
आरव को शाम से ही सांस लेने में तकलीफ थी। 1 हफ्ते से उसका अस्थमा बिगड़ रहा था। इनहेलर असर नहीं कर रहा था। काव्या ने रोहन से कहा भी था कि आज जल्दी आ जाना, बच्चा ठीक नहीं लग रहा। रोहन ने जवाब दिया था कि निवेशकों के साथ जरूरी डिनर है।
रात 9 बजे तक आरव की हालत बिगड़ गई। बाहर दिल्ली की तेज बारिश थी। काव्या ने अकेले उसे कार में बिठाया, उसे सीने से लगाए साकेत की सड़कों पर पागलों की तरह गाड़ी चलाई, और अस्पताल पहुंचते ही इमरजेंसी में दौड़ पड़ी।
डॉक्टरों ने ऑक्सीजन लगाया। नेबुलाइजर दिया। इंजेक्शन दिए। काव्या खुद इमरजेंसी नर्स थी, इसलिए वह डॉक्टरों की आंखों में छिपा डर पहचान गई थी। फिर भी वह हर 5 मिनट में रोहन को फोन करती रही।
1 बार।
5 बार।
10 बार।
18 बार।
कुछ नहीं।
—मैं आ जाता, काव्या, कसम से —रोहन ने टूटती आवाज में कहा— मुझे सच में नहीं पता था।
काव्या ने उसे हाथ उठाकर रोक दिया।
—एक कदम भी आगे मत आना।
उसी समय रोहन का मोबाइल उसके कोट की जेब से फिसलकर फर्श पर गिरा। स्क्रीन जल उठी। कोई नोटिफिकेशन चमका।
“नैना: कल रात बहुत अच्छी थी। अपनी पत्नी का ड्रामा खत्म हो जाए तो कॉल करना।”
गलियारे में खड़ी 2 नर्सें एकदम चुप हो गईं।
रोहन झपटकर मोबाइल उठाने लगा, लेकिन काव्या पढ़ चुकी थी।
रात की मीटिंगें। अचानक मुंबई के दौरे। बंद कमरे में की गई कॉल्स। घर लौटते समय शर्ट पर परफ्यूम। सब कुछ एक ही सड़े हुए सच में बदल गया।
—तुम उसके साथ थे?
—काव्या, बात वैसी नहीं है जैसी तुम सोच रही हो।
—जब मेरा बच्चा मर रहा था, तुम उसके साथ थे?
अब उसकी आवाज गलियारे में गूंज गई। इस बार उसमें मां का दर्द नहीं, आग थी।
—तुम जानते थे आरव बीमार है। तुम जानते थे उसका इनहेलर खाली हो रहा है। तुम जानते थे उसे बुखार था। फिर भी तुम चले गए।
रोहन दीवार से टिक गया।
—मैंने सोचा तुम संभाल लोगी।
काव्या हंस पड़ी। वह हंसी इतनी ठंडी थी कि रोहन कांप गया।
—हां, मैंने संभाल लिया। मैंने उसे अपनी गोद में मरते हुए संभाल लिया।
तभी लिफ्ट खुली।
वीरेंद्र मल्होत्रा बाहर आए। गहरे भूरे सूट पर बारिश की बूंदें थीं। दिल्ली के बड़े बिल्डर, मल्होत्रा बिल्डकॉन के मालिक, ऐसे आदमी जिनके नाम से मंत्री तक खड़े हो जाते थे। लेकिन उस रात वह करोड़पति नहीं लग रहे थे। वह सिर्फ एक नाना थे, जिसका नाती कमरे 312 में चुप पड़ा था।
—आरव कहां है?
काव्या ने कमरे की तरफ इशारा किया।
वीरेंद्र अंदर गए।
कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई। फिर अंदर से एक टूटी हुई सांस निकली, जैसे किसी बूढ़े बरगद की जड़ कट गई हो। जब वह बाहर आए, उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
—फोन दो।
रोहन ने मोबाइल छाती से लगा लिया।
—यह निजी है।
वीरेंद्र उसके बिल्कुल सामने आकर रुके।
—आज रात मेरे नाती की सांस निजी नहीं रही। तुम्हारी निजता भी नहीं रहेगी।
रोहन ने कांपते हाथों से मोबाइल दे दिया।
वीरेंद्र ने चैट खोली। हर लाइन पिछले से ज्यादा गंदी थी।
“काव्या बच्चे को लेकर जरूरत से ज्यादा नाटक करती है।”
“वह नर्स है, संभाल लेगी।”
“आज घर नहीं जाना चाहता।”
“मुझे 1 रात चाहिए, बिना खांसी, बिना दवा, बिना अस्पताल।”
काव्या को लगा उसे उल्टी आ जाएगी।
—तुम मेरे बच्चे को बोझ कह रहे थे?
रोहन रो पड़ा।
—मैं गुस्से में था। मैंने सोचा नहीं था।
—सोचना पिता का पहला काम होता है —वीरेंद्र ने कहा— और तुमने वही छोड़ दिया।
रोहन कमरे 312 की तरफ बढ़ा।
—मुझे उसे देखना है।
काव्या दरवाजे के सामने खड़ी हो गई।
—नहीं।
—मैं उसका पिता हूं।
—जब वह तुम्हें 18 बार बुला रहा था, तब तुम पिता थे। आज रात तुमने खुद उस रिश्ते से भागना चुना।
रोहन ने हाथ जोड़ दिए।
—काव्या, बस 1 बार। मुझे माफ कर दो। मुझे उसे अलविदा कहने दो।
काव्या की आंखें सूखी थीं।
—आरव ने तुम्हें इंतजार करते-करते अलविदा कह दिया।
अस्पताल के सुरक्षा गार्ड आ गए। वीरेंद्र ने सिर्फ इतना कहा:
—इसे बाहर छोड़ आओ।
रोहन ने विरोध किया, लेकिन कोई उसे सुन नहीं रहा था। लिफ्ट के दरवाजे बंद हुए तो पहली बार काव्या की टांगें कांपीं। वह गिरने वाली थी कि वीरेंद्र ने उसे संभाल लिया।
तभी काव्या का मोबाइल बजा।
अज्ञात नंबर।
संदेश था:
“तुम्हारा पति आज रात अकेला झूठ नहीं बोल रहा था।”
नीचे 1 तस्वीर थी। दिल्ली के एक महंगे होटल, ग्रैंड अशोक रेजिडेंसी के कमरे की। सफेद चादरों में नैना सो रही थी। साइड टेबल पर शैंपेन का गिलास था। रोहन की शादी की अंगूठी वहीं पड़ी थी।
और उसके पास एक नारंगी दवा की बोतल रखी थी।
काव्या ने तस्वीर बड़ा की।
लेबल पर लिखा था:
“आरव कपूर।”
उसकी सांस अटक गई।
फिर दूसरा संदेश आया:
“अपने पति से पूछो, तुम्हारे बेटे का इनहेलर खाली क्यों था।”
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भाग 2:
काव्या ने पहले मोबाइल को नहीं, आरव की खाली खाट को देखा। उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें उस पर गिर रही हों। वीरेंद्र ने तस्वीर को बड़ा किया और होटल की साइड टेबल पर रखी नारंगी दवा की बोतल देखकर उनके चेहरे की सारी कठोरता एक पल के लिए टूट गई। वही दवा मंगलवार को फार्मेसी से ली जानी थी, पर काव्या को बताया गया था कि परिवार का कोई सदस्य उसे पहले ही ले गया है। वीरेंद्र ने अपने सुरक्षा प्रमुख को 48 घंटे की हर फुटेज, फार्मेसी की रसीद, होटल की एंट्री और रोहन के सारे लेनदेन निकालने का आदेश दिया। सुबह 6:10 पर रोहन 2 पुलिसकर्मियों के साथ वापस आया; वह हिरासत में नहीं था, मगर उसकी आंखों में डर था। उसने कसम खाई कि उसने आरव की दवा को हाथ नहीं लगाया, उसने नैना के साथ धोखा किया, झूठ बोला, पर अपने बेटे की सांसों से खिलवाड़ नहीं किया। काव्या को उसकी सफाई में सिर्फ गंदगी सुनाई दी। तभी वीरेंद्र का पुराना जांच अधिकारी, पूर्व क्राइम ब्रांच अफसर कबीर सूद, एक फाइल लेकर आया। उसने बताया कि होटल का कमरा रोहन ने नहीं, नैना ने बुक किया था, और नैना आहूजा उसका असली नाम भी नहीं था। उसका पूरा नाम नैना रस्तोगी था, चारु रस्तोगी की छोटी बहन। वीरेंद्र का चेहरा राख जैसा पड़ गया। चारु कभी मल्होत्रा बिल्डकॉन की वित्त निदेशक थी; 7 साल पहले करोड़ों की हेराफेरी में पकड़ी गई, जेल गई, और उसके पिता ने उसी सदमे में दम तोड़ दिया। चारु ने कसम खाई थी कि वह वीरेंद्र की नस-नस से उसका वारिस छीन लेगी। कबीर ने अगला वार किया: नैना पिछले 3 महीनों से इसी अस्पताल में स्वयंसेविका बनकर बच्चों के वार्ड में आती थी। काव्या को अचानक याद आया कि उसी औरत ने आरव को नीला डायनासोर देकर कहा था कि बहादुर बच्चे कभी डरते नहीं। पुलिस ने खिलौना सील किया। उसी पल अज्ञात नंबर से ऑडियो आया; उसमें नैना रो रही थी कि बच्चा सचमुच मर जाएगा, और दूसरी ठंडी आवाज कह रही थी कि वीरेंद्र को खून खोने का मतलब समझना होगा। फिर खबर आई कि नैना होटल की सर्विस सीढ़ियों में मर चुकी थी।
भाग 3:
दोपहर तक अस्पताल की तीसरी मंजिल पुलिस की पीली पट्टियों, फॉरेंसिक बैगों और धीमी फुसफुसाहटों से भर गई। जो रात एक बीमार बच्चे की मौत लग रही थी, वह अब एक बदला, एक षड्यंत्र और एक परिवार की सबसे गंदी सच्चाई में बदल चुकी थी।
काव्या आरव के कमरे के बाहर बैठी थी। उसके हाथों में वही नीली चादर थी। कभी वह उसे अपने चेहरे से लगाती, कभी मुट्ठी में दबा लेती। उसे बार-बार आरव की आवाज सुनाई देती थी।
—मम्मा, पापा को फोन किया?
—हां, बेटा। पापा आते ही होंगे।
वह झूठ उसने अपने बेटे को उम्मीद देने के लिए बोला था। अब वही झूठ उसके भीतर चाकू की तरह घूम रहा था।
रोहन गलियारे के दूसरे छोर पर बैठा था। उसके साथ 1 कॉन्स्टेबल था। वह गिरफ्तार नहीं था, लेकिन जिस आदमी ने अपने बच्चे की आखिरी पुकार नहीं सुनी, उसके लिए दुनिया की कोई आजादी सचमुच आजादी नहीं रह जाती।
उसने अपना मोबाइल, लोकेशन, कार्ड पेमेंट, चैट, सब कुछ पुलिस को दे दिया था। उसने मान लिया था कि उसने नैना से संबंध रखा। उसने यह भी मान लिया कि वह झूठ बोलकर घर से निकला। लेकिन वह बार-बार एक ही बात कहता रहा।
—मैंने आरव की दवा नहीं छुई। मैं इतना गिरा हुआ हूं, पर इतना नहीं।
काव्या ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
शाम 3 बजे फॉरेंसिक की पहली रिपोर्ट आई। इंस्पेक्टर मीरा राणा, जो पूरे केस को देख रही थीं, कमरे में आईं। उनके चेहरे पर वह सावधानी थी जो पुलिस तब रखती है जब सच सुनने वाले को बचा नहीं सकती।
—खिलौने पर दवा के अवशेष मिले हैं।
वीरेंद्र ने पूछा।
—कौन सी दवा?
—ऐसी दवा जो दिल की गति को धीमा कर सकती है। एक स्वस्थ आदमी पर कम असर करती, लेकिन अस्थमा के दौरे से जूझ रहे 5 साल के बच्चे के लिए बहुत खतरनाक थी।
काव्या ने दीवार पकड़ ली।
—उसने मेरे बच्चे के खिलौने में जहर छिपाया?
मीरा ने सिर झुका दिया।
—और सिर्फ खिलौने में नहीं। सलाइन की पाइप में भी हल्के निशान मिले हैं।
काव्या ने अचानक सिर उठाया।
—यह कोई स्वयंसेविका नहीं कर सकती। वार्ड में कैमरे हैं। नर्सें हैं। डॉक्टर हैं।
मीरा ने फाइल खोली। उस एक सेकंड की चुप्पी ने सब कुछ बता दिया।
—कैमरे में कोई दिखा है। रात 11:32 पर। आरव की हालत बिगड़ने से 15 मिनट पहले।
उन्होंने तस्वीर मेज पर रखी।
रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।
तस्वीर में डॉ. अर्जुन कपूर था।
रोहन का बड़ा भाई।
आरव का ताऊ।
अर्जुन शहर का नामी बाल रोग विशेषज्ञ था। उसी ने काव्या से कहा था कि घबराओ मत, आरव मजबूत बच्चा है। उसी ने कमरे में जाकर सलाइन की मशीन जांची थी। काव्या को अब याद आया, उसके सफेद दस्ताने, उसकी झुकी हुई गर्दन, और पाइप को छूती उंगलियां।
उसके बाद ही आरव की सांसें तेजी से टूटने लगी थीं।
—नहीं —रोहन चीखा— भैया ऐसा नहीं कर सकते।
इंस्पेक्टर मीरा ने ठंडे स्वर में कहा:
—आपके भाई पर 4.8 करोड़ के जुए के कर्ज हैं। 2 हफ्ते पहले एक शेल कंपनी से उसके खाते में पैसा आया। वही कंपनी चारु रस्तोगी से जुड़ी है।
वीरेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।
काव्या की आवाज बर्फ जैसी हो गई।
—मेरे बच्चे के चारों तरफ अपने लोग नहीं, भेड़िए खड़े थे।
रोहन रोते हुए बोला:
—मुझे नहीं पता था।
काव्या ने पहली बार उसे देखा।
—तुम्हें कभी कुछ पता नहीं होता, रोहन। यही तुम्हारी सबसे बड़ी सुविधा थी।
अर्जुन को उसी शाम गुरुग्राम के एक फार्महाउस से पकड़ा गया। वह नेपाल भागने की तैयारी में था। पहले उसने सब कुछ झूठ बताया। फिर जब बैंक ट्रांसफर, सीसीटीवी और नैना की रिकॉर्डिंग सामने रखी गई, तो उसकी गर्दन झुक गई।
उसका बयान सुनकर काव्या के भीतर आखिरी भरोसा भी मर गया।
चारु ने अर्जुन से कहा था कि बस इलाज धीमा करना है, हालत गंभीर करनी है, ताकि वीरेंद्र डर जाए, टूट जाए, और समझे कि परिवार खोना क्या होता है। अर्जुन ने कहा कि उसने सोचा नहीं था बच्चा मर जाएगा।
काव्या पूछताछ कक्ष के शीशे के पीछे खड़ी थी। वह धीरे से हंसी। उस हंसी में इंसानियत नहीं, सिर्फ राख थी।
—मरना तुम्हारे हिसाब से गलती थी? सांस रोकना योजना थी?
अर्जुन ने सिर नहीं उठाया।
रोहन अचानक दरवाजे की तरफ लपका।
—वह मेरा बेटा था!
काव्या ने उसे रोक दिया।
—बेटा था, रोहन। लेकिन जब उसे पिता चाहिए था, तुम होटल में थे।
कमरा चुप हो गया।
रात तक पुलिस ने चारु रस्तोगी की तलाश शुरू कर दी। उसके ठिकानों पर छापे पड़े। बैंक खातों को फ्रीज किया गया। एयरपोर्ट अलर्ट जारी हुआ। लेकिन चारु ने जो अगला कदम उठाया, वह किसी ने नहीं सोचा था।
वह काव्या के घर पहुंची।
काव्या अस्पताल से निकलने से पहले जिद करके अपने घर गई थी। उसे आरव का छोटा बैग चाहिए था। उसमें उसकी डायनासोर वाली पजामा, रंग भरने वाली कॉपी, और वह डिब्बा था जिसमें वह मंदिर के फूल, पुरानी मेट्रो टिकटें और छोटी-छोटी चमकीली पत्तियां रखता था।
घर दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में था। बाहर 2 पुलिसकर्मी तैनात थे। लेकिन चारु पहले से अंदर थी।
काव्या जैसे ही आरव के कमरे में दाखिल हुई, अलमारी के पास से एक औरत निकली। लंबे खुले बाल। काली साड़ी। आंखों में ऐसा गुस्सा जैसे वह अपने दर्द को धर्म समझ बैठी हो।
—तुम्हें देखकर समझ आता है कि वीरेंद्र को क्यों तोड़ना जरूरी था।
काव्या ने आरव का बैग सीने से लगा लिया।
—तुमने 5 साल के बच्चे को मारा।
चारु मुस्कराई।
—तुम्हारे पिता ने मेरा घर मारा था।
—मेरे पिता ने तुम्हारी चोरी पकड़ी थी।
चारु की आंखें जल उठीं।
—उसके बाद मेरे पिता मर गए। मेरी बहन बर्बाद हो गई। मैं सड़क पर आ गई।
—और तुमने सोचा एक बच्चे की सांसें तुम्हारा हिसाब बराबर कर देंगी?
चारु आगे बढ़ी।
—वह वीरेंद्र का खून था।
काव्या की आंखों में पहली बार उस रात आंसू आए, मगर आवाज नहीं टूटी।
—नहीं। वह आरव था। उसे आलू पराठे पर चीनी डालकर खाना पसंद था। वह बारिश से डरता था लेकिन बादलों को राक्षस कहकर हंसता था। वह सोते समय बाथरूम की लाइट जलती छोड़ता था। वह किसी की बदले की रसीद नहीं था।
चारु का चेहरा एक पल के लिए हिल गया। शायद कहीं बहुत भीतर उसे भी समझ आया कि उसने इंसान नहीं, अपने अंदर का आखिरी बचा टुकड़ा मार दिया था। मगर अगली ही सांस में उसने पर्स से छोटा चाकू निकाल लिया।
—तो आज वीरेंद्र एक बेटी भी खोएगा।
काव्या पीछे नहीं हटी।
उसने धीरे से मोबाइल की स्क्रीन चारु को दिखाई। कॉल चालू थी। इंस्पेक्टर मीरा लाइन पर थीं।
बाहर से पुलिस की जीपों की आवाज आई। लाल और नीली रोशनी खिड़कियों पर चमकने लगी।
—चाकू नीचे रखो! —मीरा की आवाज दरवाजे से गूंजी।
चारु ने काव्या को घूरा।
—यह खत्म नहीं होगा।
काव्या ने आरव का बैग और कसकर पकड़ लिया।
—होगा। क्योंकि अब हर कागज पर, हर अदालत में, हर खबर में मेरे बेटे का नाम लिखा जाएगा। तुम उसे मिटाना चाहती थी। मैं उसे सांस बनाकर छोड़ूंगी।
चारु को उसी कमरे में गिरफ्तार किया गया, जहां दीवार पर आरव ने अपने छोटे हाथों से नीला सूरज बनाया था।
अगले 6 महीनों तक मामला पूरे देश में चर्चा बन गया। खबरों में रोज वही सवाल उठता रहा कि एक बच्चे की मौत के पीछे कितने झूठ छिपे थे। चारु रस्तोगी पर हत्या, आपराधिक साजिश और सबूत मिटाने के आरोप लगे। अर्जुन कपूर का मेडिकल लाइसेंस रद्द हुआ और उसे हत्या की साजिश में गिरफ्तार किया गया। नैना को अदालत ने एक इस्तेमाल की गई कड़ी माना, वह दोषी भी थी और शिकार भी, क्योंकि जब उसने बच्चे की हालत देखकर पीछे हटना चाहा, चारु ने उसे भी रास्ते से हटा दिया।
रोहन पर सीधे हत्या का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। लेकिन काव्या के लिए वह फिर भी दोषी था। अदालत के बाहर उसने उससे आखिरी बार बात की।
—मैं हर दिन मर रहा हूं, काव्या।
—तुम्हें मरना नहीं है —काव्या ने कहा— तुम्हें जीना है, ताकि हर दिन याद रहे कि 18 कॉल्स सिर्फ मोबाइल पर नहीं आई थीं। वे तुम्हारे बेटे की सांसों से आई थीं।
रोहन ने सिर झुका लिया।
—क्या तुम कभी मुझे माफ कर पाओगी?
काव्या ने बहुत देर तक उसे देखा।
—माफ करना मेरे बेटे का अधिकार था। तुमने उसे वह मौका भी नहीं दिया।
उसके बाद उसने तलाक के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।
वीरेंद्र ने आरव के नाम से एक ट्रस्ट बनाने की घोषणा की। रोहन ने अपनी हिस्सेदारी, घर और कई संपत्तियां उसी ट्रस्ट को दे दीं। किसी ने कहा वह अपनी गलती धोना चाहता है। काव्या ने साफ कहा कि कुछ दाग पानी से नहीं जाते, लेकिन अगर उस दाग से किसी और बच्चे का इलाज हो सके, तो उसे बहने देना चाहिए।
आरव का अंतिम संस्कार बारिश में हुआ। यमुना के किनारे आसमान धूसर था। काव्या ने अपने बेटे की छोटी अस्थि कलश पर हाथ रखा और पहली बार टूटकर रोई। वीरेंद्र उसके पीछे खड़े थे, मगर वह भी अब वह शक्तिशाली आदमी नहीं थे। वह बस एक बूढ़े नाना थे, जो अपने नाती को कंधे पर बैठाकर इंडिया गेट दिखाने का वादा निभा नहीं सके।
रोहन दूर खड़ा था। बहुत दूर। वह आगे आना चाहता था, पर काव्या के एक नजर ने उसे वहीं रोक दिया। कुछ रिश्ते मरने के बाद भी अंतिम दर्शन नहीं देते।
जब सब लोग चले गए, काव्या ने आरव का नीला डिब्बा खोला। अंदर एक मुड़ा हुआ कागज था। उस पर रंगीन पेंसिल से 4 लोग बने थे। काव्या, आरव, वीरेंद्र और रोहन। रोहन चित्र में बहुत दूर खड़ा था, एक कार के पास। आरव ने अपने हाथ से मां और नाना को पकड़ा था। पीछे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था:
“मम्मा, अगर मैं स्टार बन जाऊं तो रोना मत। मैं डायनासोर लेकर आपको देखूंगा।”
काव्या वहीं जमीन पर बैठ गई। उसकी रुलाई नदी की आवाज में मिल गई। वह उस रात अस्पताल में नहीं रोई थी, क्योंकि आरव को उम्मीद देनी थी। अब वह रो रही थी क्योंकि उम्मीद का छोटा हाथ उसकी उंगलियों से छूट चुका था।
1 साल बाद उसी अस्पताल में “आरव श्वास केंद्र” खुला। गरीब बच्चों के लिए मुफ्त अस्थमा जांच, दवाएं, इनहेलर और आपातकालीन देखभाल शुरू हुई। प्रवेश द्वार पर एक छोटी सी पट्टिका लगाई गई:
“ताकि कोई बच्चा इंतजार करते हुए सांस न खोए।”
काव्या हर महीने वहां जाती थी। वह बच्चों को छोटे नीले खिलौने देती थी। कभी किसी मां का हाथ पकड़ती। कभी किसी पिता की आंखों में देखकर कहती कि फोन कभी बंद मत रखना, बच्चे दूसरी बार नहीं पुकारते।
वह रोहन के पास कभी वापस नहीं गई। वह पहले जैसी भी नहीं हुई। लेकिन वह खत्म भी नहीं हुई।
हर बाल दिवस पर वह अस्पताल में डायनासोर आकार के पराठे और शहद लेकर जाती। जब कोई बच्चा हंसते हुए खाता, उसकी नाक पर शहद लग जाता, तो काव्या कुछ पल के लिए आंखें बंद कर लेती।
उसे लगता, कहीं न कहीं आरव फिर सांस ले रहा है।
क्योंकि कुछ दुख भुलाए नहीं जाते।
उन्हें नाम देकर जिंदा रखा जाता है।
और कुछ मांएं टूटकर भी इतनी मजबूत हो जाती हैं कि अपने बच्चे की आखिरी सांस को हजारों बच्चों की पहली बची हुई सांस में बदल देती हैं।
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