
भाग 1:
उस सुबह रिया ने अपने लकवाग्रस्त पति को हँसते हुए यह कहते सुन लिया कि वह उसकी पत्नी नहीं, “मुफ्त की नर्स” है।
5 साल तक उसने विवेक मल्होत्रा का शरीर धोया था। 5 साल तक उसने उसे बिस्तर पर पलटा था, उसकी दवाइयाँ समय पर दी थीं, उसके घाव साफ किए थे, उसकी नलियाँ बदली थीं, उसके डायपर तक बदले थे। 5 साल तक उसने रात में 2-2 घंटे बाद उठकर देखा था कि कहीं उसे सांस लेने में दिक्कत तो नहीं, कहीं बुखार तो नहीं, कहीं पीठ पर नया जख्म तो नहीं। 5 साल तक उसके हाथों में हमेशा सैनिटाइजर, नारियल तेल, दवा की गंध और हल्दी वाले दूध की भाप लगी रहती थी। 5 साल तक उसने यही समझा था कि यही विवाह है, यही धर्म है, यही प्यार है।
रिया शर्मा जब 28 साल की थी, तब उसकी शादी दिल्ली के एक अमीर लेकिन बिगड़े हुए बिजनेसमैन विवेक मल्होत्रा से हुई थी। शादी के सिर्फ 7 महीने बाद विवेक की कार जयपुर हाईवे पर एक ट्रक से टकरा गई। डॉक्टरों ने कहा कि उसकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से चोटिल हो चुकी है। वह कमर से नीचे कभी चल नहीं पाएगा।
विवेक के परिवार ने पहले 15 दिन बहुत रोना-धोना किया। फिर धीरे-धीरे सब अपने-अपने घर, कारोबार और आराम में लौट गए। सिर्फ रिया रह गई। उसने अपने ड्रॉइंग रूम को अस्पताल का कमरा बना दिया। बड़ा बेड, एयर मैट्रेस, ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयों की अलमारी, व्हीलचेयर, ग्रैब बार, बाथ चेयर—सब उसी ने संभाला। उसकी सास कहती थी:
—बहू, तू सच में देवी है।
पड़ोसी कहते थे:
—आजकल ऐसी पत्नी कहाँ मिलती है?
रिया हर बार मुस्कुरा देती थी। उसे लगता था कि उसे मजबूत होना है। क्योंकि समाज ने उसे बचपन से यही सिखाया था कि अच्छी पत्नी वही होती है जो पति की बीमारी में खुद को भूल जाए।
विवेक पहले दर्द में चिड़चिड़ा रहता था। फिर चिड़चिड़ापन उसकी आदत बन गया। वह कभी दाल में नमक कम होने पर कटोरी फेंक देता, कभी चाय ठंडी होने पर चिल्लाता, कभी रिया को आधी रात में सिर्फ इसलिए जगाता कि टीवी का रिमोट 2 इंच दूर पड़ा है। रिया हर बार सोचती, बीमारी ने उसे ऐसा बना दिया है। वह पहले ऐसा नहीं था।
लेकिन उस दिन सब बदल गया।
सुबह 5 बजे रिया उठी थी। विवेक को दिल्ली के साउथ एक्स वाले रिहैब सेंटर में फिजियोथेरेपी के लिए जाना था। वह उसके लिए चांदनी चौक से ताजा कचौरी और जलेबी लाई थी। विवेक को जलेबी बहुत पसंद थी। रिया ने सोचा था कि आज वह उसे खुश कर देगी, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से वह और ज्यादा कड़वा हो गया था।
जब वह रिहैब सेंटर पहुँची, तो विवेक बाहर बरामदे में अपनी व्हीलचेयर पर बैठा था। उसके साथ एक आदमी खड़ा था, जिसे रिया ने पहले कभी नहीं देखा था। रिया ने अपने दुपट्टे का पल्लू ठीक किया और बरामदे के खंभे के पीछे रुक गई, ताकि पहले बाल ठीक कर ले। तभी उसने विवेक की हँसी सुनी।
वह हँसी वैसी नहीं थी जैसी किसी दर्द झेलते इंसान की होती है। वह खुली, तेज और बेरहम हँसी थी।
—अरे भाई, मैं तो सेट हूँ। रिया है ना। नर्स, नौकरानी, ड्राइवर, कुक, सब कुछ। वो भी मुफ्त में।
दूसरा आदमी हँसा।
विवेक ने और जोर से कहा:
—वो शादी के फेरे वाली लाइन में फँसी हुई है, “सुख-दुख में साथ दूँगी।” अब कहीं नहीं जाएगी। मेरे पैरों से ज्यादा उसका दिमाग बंधा हुआ है।
रिया के हाथ से जलेबी का डिब्बा लगभग छूट गया। उसका गला सूख गया। लेकिन वह वहीं खड़ी रही।
दूसरे आदमी ने पूछा:
—और प्रॉपर्टी? इतनी बड़ी कोठी, फार्महाउस, कंपनी के शेयर?
विवेक ने नाक से हँसते हुए कहा:
—सब आरव के नाम जाएगा। मेरा बेटा है। मेरा खून। रिया तो बस घर संभाल रही है, जब तक मैं जिंदा हूँ।
आरव।
विवेक की पहली शादी से हुआ बेटा। वही 24 साल का लड़का जो घर में घुसते ही जूते सोफे के पास फेंक देता था। वही जो रिया को “आंटी” कहता था, जैसे वह उस घर की मालकिन नहीं, कोई कामवाली हो। वही जो महीने में 2 बार आता था, फ्रिज खाली करता था, पैसे माँगता था और जाते-जाते कहता था:
—पापा, इस औरत को ज्यादा सिर पर मत चढ़ाइए।
विवेक कहता था:
—रिया, बच्चा है। माँ के बिना बड़ा हुआ है। थोड़ा समझो।
रिया समझती रही। 5 साल समझती रही।
बरामदे में विवेक फिर बोला:
—और सुन, नर्स रखता तो 60-70 हजार महीने का खर्चा आता। ये तो खाने और छत पर काम कर रही है। पैसा बचा, सेवा मिली, घर भी साफ रहा।
उस आदमी ने कहा:
—भाई, किस्मत वाला है तू।
विवेक ने हँसकर जवाब दिया:
—किस्मत वाला नहीं, समझदार हूँ।
उसी पल रिया के भीतर कुछ मर गया। वह रोई नहीं। वह अंदर जाकर चिल्लाई नहीं। उसने जलेबी उसके चेहरे पर नहीं फेंकी। उसने सिर्फ डिब्बा कूड़ेदान में रखा, मुड़ी और पार्किंग की ओर चली गई।
गाड़ी में बैठकर उसने दोनों हाथों से स्टीयरिंग पकड़ा। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। आँखों से आँसू नहीं निकले, शायद इसलिए कि अपमान इतना गहरा था कि आँसू भी रास्ता भूल गए। उसने शीशे में खुद को देखा। माथे पर छोटी सी बिंदी थी, बाल ढीले बंधे थे, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। उसे अचानक लगा कि पिछले 5 साल में वह पत्नी से परछाईं बन चुकी थी।
उसने धीरे से कहा:
—अब बस।
उस दिन वह विवेक को लेने नहीं गई। उसने सेंटर से घर के लिए मेडिकल एम्बुलेंस बुक कर दी। शाम को जब विवेक स्ट्रेचर पर घर लाया गया, तो उसके चेहरे पर गुस्सा था।
—तुम कहाँ मर गई थीं?
रिया ने शांत आवाज में कहा:
—काम था।
—मेरी जलेबी लाई?
रिया ने उसकी आँखों में देखा। पहली बार उसे उसमें बीमारी नहीं दिखी। उसे उसमें आराम से बैठा हुआ एक निर्दयी आदमी दिखा।
—नहीं।
विवेक भड़क गया।
—क्या मतलब नहीं? तुम जानती हो मुझे जलेबी चाहिए थी।
—भूल गई।
विवेक ने पहली बार थोड़ा अजीब होकर उसे देखा। रिया ने बिना कुछ कहे उसकी दवा दी, पानी पिलाया, तकिया ठीक किया, पैरों पर कंबल डाला। सब कुछ वैसे ही किया जैसे रोज करती थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उस रात उसके हाथ सेवा कर रहे थे, दिल नहीं।
अगले दिन से रिया ने घर के कागज देखने शुरू किए। पहले उसे लगता था कि पैसे और प्रॉपर्टी की बातें विवेक संभालता है, क्योंकि वह बिजनेसमैन है। लेकिन अब उसे हर फाइल पर शक होने लगा। उसने अलमारी, लॉकर, पुराने ब्रीफकेस, कंपनी के ईमेल, बैंक स्टेटमेंट सब देखने शुरू किए।
उसे बहुत कुछ मिला।
एक बीमा पॉलिसी, जिसमें उसका नाम नहीं था। एक नई वसीयत, जिसमें पूरी दिल्ली वाली कोठी, गुरुग्राम का फ्लैट और जयपुर रोड का फार्महाउस आरव के नाम था। एक अलग बैंक खाता, जिसमें लाखों रुपये पड़े थे। और एक मोटी फाइल, जिस पर लिखा था: “आरव।”
उस फाइल में हर महीने के बड़े-बड़े ट्रांसफर थे। कभी 1 लाख, कभी 3 लाख, कभी 5 लाख। उसी दौरान रिया गैस सिलेंडर, दवाइयाँ और फिजियोथेरेपी की फीस अपने गहने बेचकर चुकाती रही थी। आरव उन पैसों से बाइक, क्लब मेंबरशिप, गोवा ट्रिप और महंगे स्नीकर्स खरीद रहा था।
रिया ने फाइल बंद की और सूखी हँसी हँसी। उसे दर्द से ज्यादा घिन आई।
रात को जब वह विवेक को खिचड़ी खिला रही थी, विवेक ने पूछा:
—आजकल बहुत चुप रहती हो।
रिया ने चम्मच आगे बढ़ाया।
—थक गई हूँ।
विवेक ने बिना शर्म कहा:
—तो मेरे सोने के बाद सो जाना।
रिया ने बस सिर हिला दिया।
—हाँ, विवेक।
वह नहीं समझ पाया। ऐसे पुरुष कभी नहीं समझते कि औरत का प्यार कब खत्म हुआ। उन्हें सिर्फ तब पता चलता है जब उसकी आज्ञाकारिता खत्म होती है।
अगले 14 दिन रिया ने सब पहले जैसा किया। उसने विवेक को नहलाया, दवाइयाँ दीं, डॉक्टर के पास ले गई, उसके रिश्तेदारों के सामने मुस्कुराई। लेकिन रात में जब वह सो जाता, वह सबूत इकट्ठा करती। उसने उसके फोन की बातें रिकॉर्ड कीं। उसने आरव के मैसेज सेव किए। उसने बैंक स्टेटमेंट डाउनलोड किए। उसने वह ऑडियो रिकॉर्ड किया जिसमें आरव कह रहा था:
—पापा, आपके बाद इस औरत को घर से निकालना मत भूलना।
और विवेक हँसकर कह रहा था:
—चिंता मत कर। जब तक काम आ रही है, रहने दे।
रिया ने एक वकील से मुलाकात की। वकील का नाम नंदिता मेहरा था। वह नरम आवाज वाली लेकिन तेज नजरों वाली महिला थी। रिया ने उसके सामने सारी फाइलें, रिकॉर्डिंग, बिल और मैसेज रख दिए। नंदिता ने सब देखकर सिर्फ एक बात कही:
—रिया जी, आपके पति को सिर्फ देखभाल की जरूरत नहीं है। उसे कानूनी जवाब की जरूरत है।
शुक्रवार की शाम रिया घर जल्दी लौटी। विवेक ड्रॉइंग रूम में व्हीलचेयर पर बैठा आरव से फोन पर बात कर रहा था। उसे पता नहीं चला कि रिया दरवाजे पर खड़ी है।
—तू टेंशन मत ले, आरव। जैसे ही मौका मिला, उससे एक कागज पर साइन करवा लूँगा। घर की पावर मेरे हाथ में आ जाएगी। फिर ये कहीं की नहीं रहेगी।
रिया का खून ठंडा पड़ गया।
विवेक ने आगे कहा:
—वो बेवकूफ है। उसे लगता है सेवा करने से घर मिल जाता है।
आरव हँसा।
—पापा, जल्दी करो। मेरी शादी से पहले ये घर क्लियर होना चाहिए।
रिया ने अपने फोन की रिकॉर्डिंग चालू की। फिर वह धीरे से आगे बढ़ी और विवेक के सामने खड़ी हो गई। विवेक की हँसी गले में अटक गई।
—तुम कब आईं?
रिया ने पहली बार बिना काँपे कहा:
—इतनी देर पहले कि सच सुन सकूँ।
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भाग 2:
विवेक की आँखों में पहली बार आदेश नहीं, डर था। रिया ने अपना फोन मेज पर रखा, रिकॉर्डिंग चल रही थी। आरव की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। विवेक ने गुस्से में फोन पकड़ना चाहा, लेकिन रिया ने उसे पीछे खींच लिया। —रिया, तुम गलत समझ रही हो। —नहीं, इस बार मैं बहुत सही समझ रही हूँ। फोन पर आरव चिल्लाया: —क्या हुआ पापा? रिया ने फोन उठाया। —हैलो आरव, मैं वही मुफ्त की नर्स बोल रही हूँ। उधर कुछ सेकंड चुप्पी रही, फिर वह बोला: —आंटी, ड्रामा मत कीजिए। —अब ड्रामा नहीं होगा। अब केस होगा। उसने फोन काट दिया। उसी रात रिया ने विवेक के कमरे से अपना सामान उठाकर गेस्ट रूम में रख दिया। सुबह 7 बजे एक प्रोफेशनल नर्स आई, सरोजिनी। सफेद यूनिफॉर्म, सख्त चेहरा, साफ शब्द। विवेक ने उस पर चिल्लाने की कोशिश की। —धीरे, दर्द हो रहा है। सरोजिनी ने शांत स्वर में कहा: —मैं मेडिकल प्रोटोकॉल से काम कर रही हूँ। दर्द है तो डॉक्टर को रिपोर्ट होगा, गाली नहीं चलेगी। रिया किचन में खड़ी सुन रही थी। उसे पहली बार समझ आया कि देखभाल का मतलब अपमान सहना नहीं होता। दोपहर को आरव घर आया। महंगी जैकेट, काला चश्मा और वही मालिकाना चाल। —ये सब क्या चल रहा है? सरोजिनी दरवाजे पर खड़ी हो गई। —मरीज की सफाई चल रही है। बाहर रुकिए। —तुम हो कौन? —वो नर्स जो मुफ्त में काम नहीं करती। रिया ने फाइल लेकर आरव के सामने रखी। —तुम्हारे सारे ट्रांसफर, सारे मैसेज, सारी बातें मेरी वकील के पास हैं। अब इस घर में बिना बताए कदम मत रखना। आरव ने दाँत भींचे। —ये घर मेरा है। —अभी नहीं। शायद कभी नहीं। तभी विवेक कमरे से चिल्लाया, लेकिन इस बार कोई दौड़कर नहीं गया। रिया ने धीरे से कहा: —सरोजिनी जी, रिपोर्ट में लिख दीजिए कि मरीज भावनात्मक दबाव बना रहा है। विवेक चुप हो गया। अगले 10 दिन घर युद्धक्षेत्र बन गया, लेकिन बिना चीखों के। रिया ने डॉक्टर के निर्देश पर खाना देना शुरू किया, उसके छिपे खाते से नर्स और केयरटेकर की फीस कटवाई, और नंदिता ने संपत्ति, धोखाधड़ी और बिना वेतन 5 साल की देखभाल का मामला दर्ज कर दिया। फिर एक रात रिया को पुरानी फाइलों के पीछे एक अधूरा पावर ऑफ अटॉर्नी मिला। उस पर उसकी स्कैन की हुई नकली साइन लगी थी। नीचे लिखा था कि रिया अपनी इच्छा से घर और बैंक मामलों का अधिकार विवेक को देती है। रिया के हाथ ठंडे पड़ गए। अगली सुबह नंदिता ने कागज देखते ही कहा: —अब यह सिर्फ तलाक नहीं रहा। यह आपराधिक साजिश है।
भाग 3:
नंदिता मेहरा ने उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। मामला आसान नहीं था, क्योंकि विवेक व्हीलचेयर पर था और समाज की नजर में बीमार आदमी हमेशा दया का पात्र होता है। लेकिन नंदिता ने रिया से साफ कहा:
—उसकी बीमारी उसके अपराध को पवित्र नहीं बना देती।
रिया ने सिर हिलाया। अब वह डरती थी, पर डर के बावजूद पीछे नहीं हटती थी।
जब पुलिस पहली बार घर आई, विवेक ने खुद को बेहद कमजोर दिखाया। उसने आवाज धीमी कर ली, आँखों में पानी भर लिया और इंस्पेक्टर से कहा:
—साहब, मेरी पत्नी मुझे छोड़कर मेरी संपत्ति चाहती है। मैं तो चल भी नहीं सकता।
आरव तुरंत बीच में बोला:
—सर, ये औरत पैसे के लिए कुछ भी कर सकती है।
रिया चुप रही। उसने सिर्फ नंदिता की ओर देखा। नंदिता ने अपना टैबलेट खोला और एक-एक करके रिकॉर्डिंग चलानी शुरू की। पहले विवेक की हँसी सुनाई दी। फिर वह वाक्य जिसने रिया की दुनिया तोड़ी थी।
—रिया नर्स, नौकरानी, ड्राइवर, कुक, सब कुछ है। वो भी मुफ्त में।
कमरे में खामोशी फैल गई। फिर दूसरी रिकॉर्डिंग चली।
—जब तक काम आ रही है, रहने दे।
फिर तीसरी।
—उससे साइन करवा लूँगा। घर की पावर मेरे हाथ में आ जाएगी।
विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया। आरव ने नजरें झुका लीं। इंस्पेक्टर ने नकली पावर ऑफ अटॉर्नी उठाकर देखा।
—ये साइन किसने तैयार करवाया?
विवेक ने तुरंत कहा:
—मुझे नहीं पता।
लेकिन उसी समय सरोजिनी नर्स ने आगे आकर कहा:
—सर, 3 दिन पहले मैंने आरव साहब को इसी फाइल के साथ मरीज के कमरे में देखा था। ये लोग कह रहे थे कि “रिया को भावुक करके साइन करवा लेंगे।”
आरव भड़क गया।
—तुम झूठ बोल रही हो।
सरोजिनी ने सीधा जवाब दिया:
—मैं नर्स हूँ, नौकरानी नहीं। और मैं झूठ के पैसे नहीं लेती।
यह बात आरव को इतनी चुभी कि उसने मेज से फाइल उठाकर फाड़ने की कोशिश की। इंस्पेक्टर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। कागज नीचे बिखर गए। कमरे में अफरा-तफरी मच गई। विवेक चिल्लाने लगा:
—आरव, कुछ मत बोल!
पर देर हो चुकी थी। आरव डर में चीख पड़ा:
—सब आपने ही कहा था पापा! आपने ही कहा था कि अगर रिया साइन कर देगी तो हम उसे खाली हाथ निकाल देंगे!
यह सुनते ही विवेक ऐसे चुप हुआ जैसे किसी ने उसकी आवाज बंद कर दी हो।
रिया वहीं खड़ी रही। उसे कोई जीत महसूस नहीं हुई। बस एक भारी सच्चाई सामने थी: जिस आदमी को उसने 5 साल अपने हाथों से उठाया, उसने उसी हाथ की नकली साइन बनाकर उसे मिटाने की कोशिश की थी।
मामला अदालत तक गया। विवेक के रिश्तेदार पहले रिया को दोष देते रहे। उसकी सास ने फोन पर रोते हुए कहा:
—बहू, घर की बात अदालत तक ले गई? लोग क्या कहेंगे?
रिया ने पहली बार जवाब दिया:
—माँजी, जब घर के लोग ही घर खा जाएँ, तब अदालत ही बचती है।
कुछ रिश्तेदारों ने उसे लालची कहा। कुछ ने कहा कि वह पति को बीमारी में छोड़ रही है। लेकिन जब ऑडियो परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में फैल गए, तो वही लोग धीरे-धीरे चुप होने लगे। किसी ने माफी नहीं माँगी, लेकिन चुप्पी भी कई बार हार मानने जैसी होती है।
अदालत में रिया ने अपने 5 साल के बिल दिखाए। दवाइयों की पर्चियाँ, फिजियोथेरेपी की फीस, अस्पताल के खर्च, घर में लगाए गए मेडिकल उपकरणों के भुगतान, बेच दिए गए गहनों की रसीदें, रातों की डायरी जिसमें उसने विवेक के बुखार, दवा और गुस्से तक नोट किए थे। नंदिता ने अदालत में कहा:
—यह मामला सिर्फ संपत्ति का नहीं है। यह उस अदृश्य श्रम का मामला है, जिसे पत्नी का कर्तव्य कहकर मुफ्त में निगल लिया जाता है।
विवेक की तरफ से वकील ने कहा:
—मरीज की मानसिक हालत ठीक नहीं थी।
नंदिता ने तुरंत जवाब दिया:
—मानसिक हालत इतनी ठीक थी कि उसने गुप्त खाता चलाया, पॉलिसी बदली, बेटे को लाखों रुपये भेजे और नकली दस्तावेज तैयार करवाए।
जज ने लंबे समय तक फाइलें देखीं। रिया को लगा जैसे उसकी पूरी जिंदगी उन कागजों में रखी है। उसके फटे हाथ, सूजी आँखें, अधूरी नींद, टूटे सपने—सबकी कीमत कोई अदालत कैसे समझेगी? लेकिन उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद सच हमेशा तुरंत नहीं जीतता, मगर जब वह दस्तावेज बनकर खड़ा हो जाए, तो उसे अनसुना करना आसान नहीं रहता।
महीनों तक सुनवाई चली। इस बीच विवेक को अपने पैसे से नर्स और केयरटेकर रखने पड़े। सरोजिनी की जगह 2 शिफ्ट की टीम लगाई गई। विवेक हर बार खर्च सुनकर चिढ़ जाता।
—इतना पैसा सिर्फ देखभाल का?
नंदिता ने एक दिन शांत होकर कहा:
—5 साल तक यही पैसा रिया जी ने अपने शरीर और जिंदगी से भरा था।
आरव धीरे-धीरे घर आना कम कर गया। पहले वह हर हफ्ते आता था, क्योंकि उसे लगता था घर उसका होने वाला है। अब जब खाते फ्रीज हो गए, केस चल रहा था और पुलिस पूछताछ कर रही थी, तो उसे पिता की बीमारी से ज्यादा अपनी बाइक और दोस्तों की चिंता थी। विवेक ने एक शाम रिया से कहा:
—आरव बहुत बदल गया है।
रिया ने जवाब नहीं दिया। वह सोच रही थी कि आरव बदला नहीं था, बस अब दिख रहा था।
एक दिन विवेक ने रिया से मिलने की इच्छा जताई। नंदिता ने कहा:
—आप चाहें तो मना कर सकती हैं।
रिया ने मिलने का फैसला किया, लेकिन अकेले नहीं। मुलाकात वकील के ऑफिस में हुई। विवेक व्हीलचेयर पर था, पहले से दुबला, चेहरा ढीला, आँखों में वह पुराना आदेश नहीं था। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला:
—तुमने सच में सब खत्म कर दिया।
रिया ने शांत स्वर में कहा:
—नहीं। जो खत्म हो चुका था, मैंने बस उसका नाम रख दिया।
विवेक की उंगलियाँ आर्मरेस्ट पर काँप रही थीं।
—मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया।
रिया ने उसकी ओर देखा। यह वाक्य वह 5 साल से सुनना चाहती थी। लेकिन जब वह आया, तो उसके भीतर कोई फूल नहीं खिला। बस एक थकी हुई खाली जगह ने उसे स्वीकार कर लिया।
—हाँ, किया।
—क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?
रिया ने बहुत देर बाद जवाब दिया:
—माफ करना और वापस लौटना अलग बातें हैं। शायद किसी दिन तुम्हारे लिए गुस्सा कम हो जाए। लेकिन मैं फिर तुम्हारी सेवा में खुद को खत्म नहीं करूँगी।
विवेक की आँखें भर आईं। शायद पहली बार वह रो रहा था क्योंकि उसे दर्द था, या शायद इसलिए क्योंकि उसके पास अब कोई नियंत्रण नहीं बचा था। रिया को दया आई, लेकिन वह दया अब बेड़ियाँ नहीं बनी।
अदालत का फैसला पूरी तरह फिल्मी नहीं था। न विवेक जेल में तुरंत सड़ गया, न रिया रातोंरात करोड़पति बन गई। पर फैसला मजबूत था। नकली दस्तावेजों पर आपराधिक जांच जारी रही। घर और संपत्ति का हिस्सा कानूनी रूप से रोका गया। रिया को वैवाहिक संपत्ति में उसका अधिकार, पिछले खर्चों की भरपाई और 5 साल की देखभाल को ध्यान में रखकर आर्थिक मुआवजा मिला। विवेक को आदेश दिया गया कि वह रिया के नाम या साइन का कोई उपयोग नहीं करेगा। आरव पर भी जांच बैठी।
सबसे बड़ा फैसला कागज पर नहीं था। सबसे बड़ा फैसला वह था कि रिया अब उस घर में नहीं रहेगी।
वह दक्षिण दिल्ली की एक छोटी लेकिन साफ-सुथरी सोसायटी में किराए के फ्लैट में चली गई। पहली रात उसने दरवाजा बंद किया और बहुत देर तक चुप खड़ी रही। कोई आवाज नहीं थी। कोई घंटी नहीं। कोई पुकार नहीं। कोई आदेश नहीं।
वह बिस्तर पर लेटी। आदत से उसका शरीर 3 बजे उठ गया। उसने घबराकर हाथ बढ़ाया, जैसे किसी को करवट दिलानी हो। फिर उसे याद आया कि कमरे में कोई नहीं है। उसने धीरे से अपनी हथेली सीने पर रखी और पहली बार खुद से कहा:
—सो जाओ, रिया।
उस रात वह रोई। खुशी से नहीं। आजादी से भी नहीं। वह रोई क्योंकि थकान भी शरीर छोड़ते समय दर्द देती है।
कुछ महीनों बाद उसने थेरेपी शुरू की। पहले-पहल उसे अजीब लगता था कि वह अपने बारे में बात करे। उसे तो 5 साल तक सिर्फ विवेक की दवा, विवेक का दर्द, विवेक का खाना, विवेक का मूड याद रखने की आदत थी। जब थेरेपिस्ट ने पूछा:
—आपको क्या पसंद है?
रिया चुप हो गई। उसे सच में याद नहीं था।
धीरे-धीरे उसने छोटी चीजें चुनीं। सुबह की चाय बिना जल्दी के। हल्के गुलाबी रंग की साड़ी। पुराने गानों की प्लेलिस्ट। इंडिया गेट के पास शाम की सैर। और एक दिन, चांदनी चौक की वही जलेबी, लेकिन इस बार उसने किसी और के लिए नहीं खरीदी। उसने खुद खाई। पहली बाइट पर उसे रोना आ गया। दुकानदार ने सोचा शायद मिर्च लग गई होगी। रिया ने बस मुस्कुराकर पानी माँग लिया।
समय के साथ उसने अपने मुआवजे के पैसे से एक छोटा सा काम शुरू किया। उसने साकेत के पास “सहारा रसोई” नाम की किचन खोली। वहाँ मरीजों के लिए हल्का खाना बनता था—दलिया, मूंग दाल की खिचड़ी, सूप, उबली सब्जियाँ, सत्तू ड्रिंक। लेकिन रिया ने एक खास चीज रखी: देखभाल करने वालों के लिए अलग थाली। उसमें गरम रोटी, सब्जी, दाल, चावल और कभी-कभी मीठा भी होता था।
काउंटर के पीछे उसने एक बोर्ड लगाया:
“जो देखभाल करता है, उसे भी देखभाल चाहिए।”
एक दिन एक महिला आई। उसकी उम्र लगभग 35 थी। आँखों के नीचे काले घेरे, बाल बिखरे, हाथ में दवा की पर्ची। वह अपने पिता के लिए खिचड़ी लेने आई थी। बोर्ड पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।
—दीदी, अगर मैं थक जाऊँ तो क्या मैं बुरी बेटी हूँ?
रिया ने उसे बैठाया, पानी दिया और धीरे से कहा:
—थकना बुरा होना नहीं है। खुद को मिटा देना सेवा नहीं है।
महिला फूट-फूटकर रो पड़ी। रिया उसके पास बैठी रही। उसने कोई बड़ा भाषण नहीं दिया। उसे पता था कि कुछ आँसुओं को सिर्फ जगह चाहिए, सलाह नहीं।
विवेक की खबर उसे सरोजिनी से मिलती रही। वह अब प्रोफेशनल केयर में था। कभी शांत रहता, कभी गुस्सा करता। आरव उससे पैसे को लेकर लड़ चुका था। एक दिन सरोजिनी ने बताया कि विवेक ने दीवार पर लगी रिया की पुरानी फोटो हटाने से मना कर दिया।
रिया ने कुछ नहीं कहा। उसे समझ नहीं आया कि यह पछतावा था या सिर्फ उस सुविधा की याद, जो उसने खो दी थी। लेकिन अब उससे फर्क नहीं पड़ता था।
साल के अंत में रिया को अदालत से अंतिम कागज मिला। तलाक पूरा हो चुका था। उसने फाइल बंद की, उसे अलमारी में रखा और लंबी साँस ली। फिर वह अपनी रसोई गई। उस दिन उसने स्टाफ के लिए जलेबी मँगवाई। सबने हँसते हुए खाई। रिया ने भी एक टुकड़ा उठाया। इस बार जलेबी का स्वाद मीठा था, अपमान जैसा नहीं।
रात को दुकान बंद करते समय उसने बोर्ड की लाइट बुझाई, कैश काउंटर लॉक किया और बाहर निकली। सड़क पर हल्की ठंडी हवा थी। दूर किसी मंदिर से आरती की आवाज आ रही थी। उसने ऑटो नहीं लिया। वह पैदल चलने लगी।
कभी वह ऐसे घर लौटती थी जहाँ कोई उसे आदेश देने के लिए इंतजार करता था। अब वह ऐसे घर लौट रही थी जहाँ चुप्पी उसका स्वागत करती थी।
5 साल तक उसने सोचा था कि प्यार का मतलब किसी के लिए टूट जाना है। अब उसे समझ आया कि प्यार में सेवा हो सकती है, पर अपमान नहीं। बीमारी दया माँग सकती है, गुलामी नहीं। विवाह साथ माँग सकता है, मिट जाना नहीं।
उस रात अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी होकर रिया ने शहर की रोशनी देखी। दिल्ली शोर से भरी थी, लेकिन उसके भीतर एक शांत जगह बन चुकी थी। उसने अपनी हथेलियाँ देखीं। वही हाथ जो कभी घाव साफ करते थे, वही हाथ अब अपने लिए दरवाजा खोलते थे।
उसने धीरे से मुस्कुराया।
क्योंकि अब कोई उसे मुफ्त की नर्स नहीं कह सकता था।
अब वह अपनी जिंदगी की मालकिन थी।
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