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दीक्षांत समारोह में नई पत्नी ने माँ को पीछे खड़ा कर दिया, पर बेटे ने मंच से कहा “मेरी माँ पीछे है तो पीछे ही सबसे बड़ा सम्मान है”, और पूरा सभागार शर्म से काँपते हुए तालियों के साथ उठ खड़ा हुआ

PART 1

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“आगे की कुर्सी तुम्हारे जैसी औरतों के लिए नहीं है, कविता। आरव अब उस परिवार का बेटा है जिसे समाज में इज्जत से बैठना आता है।”

ऋतु मल्होत्रा ने यह बात इतने ऊँचे स्वर में कही कि लखनऊ के उस बड़े स्कूल के सभागार में बैठे कई लोग पलटकर देखने लगे। कविता शर्मा के हाथ में पकड़ा गेंदे और सफेद गुलाब का छोटा-सा गुलदस्ता काँप गया, लेकिन उसने आवाज नहीं निकाली।

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उसके बेटे आरव शर्मा का आज बारहवीं का दीक्षांत समारोह था। वह मंच के पीछे अपनी बारी का इंतजार कर रहा था, और कविता नहीं चाहती थी कि उसके जीवन का सबसे गर्व वाला दिन किसी औरत की कड़वाहट में डूब जाए।

कविता 42 साल की थी। सुबह 4 बजे उठकर उसने अपनी हल्की हरी साड़ी दो बार इस्त्री की थी। वह कोई महंगी साड़ी नहीं थी, चौक बाजार की एक छोटी दुकान से छूट पर खरीदी गई थी। फिर भी उसे पहनकर उसने आईने में खुद को देखा था और धीरे से मुस्कुराई थी। उसे लगा था, आज आरव तस्वीरों में अपनी माँ को थकी हुई नहीं, सुंदर देखेगा।

वह सरकारी अस्पताल में नर्सिंग सहायक थी। रात की ड्यूटी, बुजुर्ग मरीजों की सेवा, बच्चों के इंजेक्शन, इमरजेंसी वार्ड की चीखें—इन्हीं सबके बीच उसने आरव को बड़ा किया था। अरविंद मल्होत्रा, उसका पूर्व पति, आरव के 6 साल का होते ही दूसरी जिंदगी चुन चुका था। फिर भी कविता ने कभी बेटे के सामने पिता की बुराई नहीं की।

आरव ने 1 हफ्ते पहले उसे संदेश भेजा था—
“माँ, पहली पंक्ति बाईं तरफ 2 सीटें तुम्हारे और मौसी के लिए रखवाई हैं। जब मेरा नाम पुकारा जाए, तुम सबसे पास होनी चाहिए।”

कविता ने उस संदेश को कई बार पढ़ा था। अस्पताल के दवा कक्ष में छिपकर रोई भी थी।

लेकिन जब वह अपनी छोटी बहन निशा के साथ सभागार पहुँची, तो पहली पंक्ति की बाईं तरफ वे सीटें भरी हुई थीं। अरविंद महंगे बंदगले में बैठा था। उसके पास ऋतु थी, रेशमी साड़ी, चमकते गहने और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे किसी युद्ध में जीतकर बैठी हो। उसके साथ उसकी माँ, उसका भाई और 2 रिश्तेदार भी बैठे थे।

कुर्सी की पीठ पर आधा फटा कागज चिपका था। कविता ने पास जाकर देखा। उस पर अब भी लिखा था—कविता शर्मा।

निशा का चेहरा लाल हो गया।

“ये सीटें आरव ने रखवाई थीं,” उसने पास खड़े स्कूल के कर्मचारी से कहा।

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लड़का घबरा गया। उसने सूची देखी, फिर ऋतु की तरफ देखा और धीमे स्वर में बोला, “माफ कीजिए मैडम, हमें बताया गया कि यह पिता की तरफ के परिवार के लिए है। आप चाहें तो पीछे खड़ी हो सकती हैं।”

“पीछे खड़ी?” निशा की आवाज काँप उठी। “ये माँ है उसकी।”

ऋतु ने गर्दन घुमाई।
“माँ होने से कोई सभ्यता नहीं आ जाती। आज आरव का बड़ा दिन है। गरीबी और रोने-धोने का नाटक पीछे ही अच्छा लगता है।”

कविता के कानों में जैसे गर्म सीसा भर गया। उसने अरविंद की ओर देखा। बस एक बार। शायद वह कहेगा कि कुर्सी कविता की है। शायद वह अपने बेटे की इच्छा का सम्मान करेगा।

लेकिन अरविंद ने नजरें झुका लीं। उसने अपनी घड़ी देखी, फिर मंच की तरफ देखने लगा, जैसे कविता वहाँ थी ही नहीं।

निशा आगे बढ़ी। “एक शब्द और बोला न, तो—”

कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं, निशा। आज आरव का दिन है।”

“दीदी, वो तुम्हें सबके सामने मिटा रही है।”

कविता ने गहरी साँस ली।
“माँ मिटती नहीं। बस कभी-कभी चुप रह जाती है।”

वह मुड़ी और सभागार के सबसे पीछे चली गई। निशा उसके साथ थी। वे दोनों निकास द्वार के पास दीवार से सटकर खड़ी हो गईं। न कुर्सी, न कार्यक्रम पुस्तिका, न कोई सम्मान। बस कविता का गुलदस्ता, उसकी काँपती उंगलियाँ और सीने में दबा अपमान।

मंच पर प्रधानाचार्या ने परिवारों की भूमिका पर भाषण शुरू किया। “बच्चों की सफलता के पीछे माता-पिता का त्याग होता है,” उन्होंने कहा।

कविता ने होंठ भींच लिए। उसे याद आया कि किस तरह वह कई रातों तक अस्पताल से लौटकर आरव की किताबों पर कवर चढ़ाती थी। कैसे उसने अपनी सोने की पतली चूड़ियाँ बेचकर उसकी कोचिंग की फीस भरी थी। कैसे बारिश में भीगती हुई वह स्कूल की फीस जमा करने आई थी ताकि आरव की परीक्षा न रुके।

फिर विद्यार्थियों की पंक्ति अंदर आई।

नीले गाउन और टोपी पहने बच्चों के बीच कविता की नजर एक ही चेहरे को खोज रही थी।

आरव।

लंबा, शांत, आँखों में वही गहराई जो बचपन से थी।

उसने पहले पहली पंक्ति की ओर देखा। अरविंद ने हाथ उठाया। ऋतु ने मोबाइल ऊपर कर लिया। उसकी माँ ने बनावटी गर्व से मुस्कुराया।

पर आरव नहीं मुस्कुराया।

उसकी आँखें बेचैन होकर कतार दर कतार घूमीं। फिर अचानक वह ठहर गया।

सबसे पीछे।

निकास द्वार के नीचे खड़ी अपनी माँ पर।

कविता ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, जैसे सब ठीक हो। जैसे वह जानबूझकर पीछे खड़ी हो। जैसे उसके दिल में कोई चोट नहीं लगी।

लेकिन आरव का चेहरा बदल गया।

उसकी आँखों में एक ऐसा दर्द उतर आया, जो कविता ने बचपन में तब देखा था जब वह खिड़की पर खड़ा होकर पिता का इंतजार करता था और गाड़ी नहीं आती थी।

आरव ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।

और कविता समझ गई कि अब कुछ ऐसा होने वाला है जिसे कोई रोक नहीं पाएगा।

PART 2

आरव मंच तक पहुँचा, मगर उसने पहली पंक्ति की ओर दोबारा नहीं देखा। कविता उसे पहचानती थी। वह चिल्लाने वाला लड़का नहीं था, पर जब उसके भीतर आग लगती थी तो उसकी चुप्पी और भारी हो जाती थी।

समारोह आगे बढ़ा। पुरस्कारों की घोषणा हुई। फिर प्रधानाचार्या ने मुस्कुराकर कहा, “अब हमारे विद्यालय के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी आरव शर्मा अपने विचार साझा करेंगे।”

तालियाँ गूँज उठीं।

अरविंद खड़ा होकर ताली बजाने लगा, जैसे पुरस्कार उसके त्याग का प्रमाण हो। ऋतु ने कैमरा सीधा किया। उसके चेहरे पर वही गर्व था जो उधार की चीज पहन लेने से आता है।

आरव मंच पर पहुँचा। उसने जेब से कागज निकाला। कुछ पल उसे देखा। फिर पहली पंक्ति की ओर नजर उठाई।

अरविंद मुस्कुराया।

ऋतु ने बाल पीछे किए।

आरव ने वह कागज मोड़ा। एक बार। फिर दूसरी बार। फिर उसे माइक के पास रख दिया।

सभागार शांत हो गया।

“मैंने आज के लिए एक भाषण लिखा था,” आरव ने कहा। “उसमें भविष्य, अनुशासन और सपनों की बातें थीं। लेकिन आज सुबह मेरे सामने कुछ ऐसा हुआ, जिसके बाद वह भाषण झूठ लगेगा।”

कविता का दिल धड़कना भूल गया।

आरव की आवाज स्थिर थी।
“बचपन में मुझे लगता था कि नायक बड़े घरों में रहते हैं। बाद में समझ आया, कुछ नायक सरकारी अस्पताल की रात वाली ड्यूटी करके सुबह अपने बच्चे का टिफिन बनाते हैं।”

निशा रो पड़ी।

“कुछ नायक महंगी गाड़ी से नहीं आते। वे थके हुए पैरों से आते हैं, अपनी दवा छोड़कर बच्चे की किताब खरीदते हैं, और 2 बजे रात में फटा यूनिफॉर्म सिलते हैं ताकि बेटा शर्मिंदा न हो।”

लोग अब पूरी तरह सुन रहे थे।

आरव ने पीछे खड़ी कविता की ओर देखा।

“मेरा नायक वहाँ खड़ा है, निकास द्वार के नीचे। क्योंकि किसी ने वह कुर्सी छीन ली जो मैंने अपनी माँ के लिए रखी थी।”

पूरे सभागार में सरसराहट फैल गई।

ऋतु का चेहरा सफेद पड़ गया।

आरव ने माइक पकड़ा और कहा, “अगर मेरी माँ पीछे खड़ी है, तो आज इस सभागार की सबसे सम्मानित जगह पीछे है।”

पहले 1 शिक्षिका उठी। फिर 1 छात्र। फिर पूरी कतार। कुछ ही क्षणों में पूरा सभागार खड़ा होकर ताली बजा रहा था।

फिर आरव ने प्रधानाचार्या से कहा, “मैडम, जब तक मेरी माँ अपनी सीट पर नहीं बैठेगी, मैं अपना प्रमाणपत्र नहीं लूँगा।”

PART 3

तालियों की आवाज इतनी तेज थी कि ऋतु के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया। वह आसपास देखने लगी, जैसे अचानक वही अपमानित हो गई हो। उसकी माँ ने फुसफुसाकर कुछ कहा, पर अब उनकी आवाज उस भीड़ में खो चुकी थी जो कविता के लिए खड़ी थी।

प्रधानाचार्या मंच से उतरीं। उनके चेहरे पर शालीनता थी, पर स्वर में कड़ाई।

वे पहली पंक्ति तक पहुँचीं और कुर्सी की पीठ पर लगे फटे कागज को देखा। उस पर कविता शर्मा का नाम साफ दिखाई दे रहा था।

“श्रीमती ऋतु,” उन्होंने कहा, “यह सीट विद्यार्थी ने अपनी माँ के लिए आरक्षित करवाई थी। कृपया आप उठ जाएँ।”

ऋतु ने बनावटी आश्चर्य दिखाया।
“शायद कोई गलतफहमी हुई है। हमें तो अरविंद जी ने—”

मंच से आरव की आवाज आई।
“गलतफहमी नहीं हुई। मैंने पापा को खुद लिखा था कि ये 2 सीटें माँ और मौसी के लिए हैं।”

सारा सभागार अरविंद की ओर देखने लगा।

अरविंद ने गला साफ किया, पर शब्द नहीं निकले। वह वही आदमी था जो हर साल स्कूल की तस्वीरों में सामने खड़ा हो जाता था, पर फीस की पर्ची आते ही फोन बंद कर देता था। वह वही पिता था जो पुरस्कार के दिन बेटे को गले लगाता था, मगर बुखार की रातों में कभी नहीं आता था।

कविता पीछे खड़ी रही। उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए थे। उसे उम्मीद थी कि कोई उसे बचाए नहीं, बस यह क्षण जल्दी बीत जाए। वर्षों की आदत थी—अपमान को निगल जाना, ताकि बच्चे पर बोझ न पड़े।

लेकिन इस बार आरव ने उसे निगलने नहीं दिया।

निशा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“दीदी, चलो। यह कुर्सी नहीं, तुम्हारा हक है।”

कविता धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हर कदम के साथ उसका अतीत खुलता चला गया। वह रात जब अरविंद ने कहा था, “मैं अब इस जिंदगी में घुट रहा हूँ।” वह सुबह जब 6 साल का आरव स्कूल बैग पकड़े दरवाजे पर खड़ा पूछ रहा था, “पापा रविवार को आएँगे न?” वह महीना जब किराया भरने के लिए कविता ने अपनी माँ की दी हुई पायल बेच दी थी। वह दिन जब अरविंद ने रिश्तेदारों के सामने कहा था, “कविता बहुत भावुक है, इसलिए बच्चा मेरे पास नहीं रह पाया,” और कविता ने चुप रहकर चाय परोसी थी।

आज वह चुप्पी उसके साथ चल रही थी, मगर झुकी हुई नहीं।

पहली पंक्ति तक पहुँचकर उसने कुर्सी की पीठ पर अपना नाम देखा। किसी ने उसे आधा फाड़ा था, पर मिटा नहीं पाया था।

कविता बैठ गई।

निशा उसके पास बैठी और गुलदस्ता गोद में रख लिया, जैसे वह किसी युद्ध का झंडा हो।

सभागार में फिर तालियाँ गूँज उठीं।

आरव ने माइक के पास लौटकर हल्की मुस्कान दी।
“धन्यवाद। अब मुझे लगता है कि मैं सच बोल सकता हूँ।”

लोग शांत हो गए।

आरव ने कोई लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ा। उसने उन अनगिनत लोगों की बात की जिनके नाम समारोहों में नहीं लिए जाते। उसने उन माताओं की बात की जो सुबह सूरज से पहले उठती हैं, चाय में चीनी कम डालती हैं ताकि बच्चे का दूध पूरा रहे। उसने उन पिताओं की बात की जो ईमानदारी से मजदूरी करते हैं, उन दादियों की बात की जो बूढ़े हाथों से पोते की कॉपी पर नाम लिखती हैं, उन सफाई कर्मचारियों की बात की जो स्कूल खुलने से पहले फर्श चमका देते हैं।

फिर उसकी आवाज धीमी हुई।

“हर प्रमाणपत्र पर सिर्फ विद्यार्थी का नाम छपता है। लेकिन असली स्याही उन हाथों की होती है जिन्होंने बच्चे को गिरने नहीं दिया। मेरे प्रमाणपत्र के हर कोने में मेरी माँ का नाम है।”

कविता का चेहरा आँसुओं से भीग गया। वह आँसू छिपाने की कोशिश नहीं कर रही थी। जीवन में पहली बार उसे लगा कि उसकी थकान किसी ने देखी है। उसकी फटी एड़ियाँ, उसके सूजे हाथ, उसकी अधूरी नींद—सब किसी गवाही की तरह सभागार के सामने खड़े थे।

जब आरव का नाम पुकारा गया, वह मंच के बीच पहुँचा। प्रधानाचार्या ने उसे प्रमाणपत्र दिया। फोटोग्राफर ने कैमरा उठाया, पर आरव ने पहले कैमरे की ओर नहीं देखा।

उसने प्रमाणपत्र दोनों हाथों से उठाया और पहली पंक्ति में बैठी माँ की ओर झुकाया।

उसके होंठ हिले।
“यह तुम्हारा है, माँ।”

कविता टूट गई। वह ऐसे रोई जैसे वर्षों से रोना रोककर बैठी हो। निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

समारोह खत्म होने के बाद विद्यार्थी बाहर निकलने लगे। माता-पिता फोटो खिंचवा रहे थे। कोई मिठाई बाँट रहा था, कोई फूल दे रहा था। लेकिन सबसे अधिक लोग कविता के पास आकर हाथ जोड़ रहे थे।

एक बुजुर्ग शिक्षक ने कहा, “बहन जी, आपने बहुत अच्छा बेटा पाला है।”

कविता ने सिर झुका लिया।
“बच्चा अच्छा था, मैंने बस उसे बिगड़ने नहीं दिया।”

तभी आरव दौड़ता हुआ आया। गाउन अब उसके कंधे से थोड़ा खिसक गया था, टोपी हाथ में थी। वह कविता से लंबा हो चुका था, पर गले लगते ही फिर वही बच्चा लगने लगा जो डरकर उसकी साड़ी पकड़ लेता था।

“माँ, माफ करना,” उसने उसके कान के पास कहा।

कविता ने उसके बालों पर हाथ फेरा।
“तू क्यों माफी माँग रहा है?”

“मैंने पापा पर भरोसा किया। मैंने उन्हें सीटों की जिम्मेदारी दी थी।”

“बेटा, गलती भरोसे की नहीं होती। गलती उस हाथ की होती है जो भरोसा तोड़ता है।”

आरव ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

कुछ दूरी पर अरविंद खड़ा था। उसके चेहरे पर शर्म, गुस्सा और असहायता तीनों थे। ऋतु उसके पीछे खड़ी थी, अब भी अपनी इज्जत बचाने की कोशिश में।

अरविंद आगे आया।
“आरव, हमें बात करनी चाहिए। बाहर लोग देख रहे हैं।”

आरव ने माँ से अलग होकर पिता की ओर देखा।
“आज तक जो कुछ हुआ, वह घर के अंदर छिपता रहा। लेकिन आज माँ को सबके सामने अपमानित किया गया। अब बात भी सबके सामने होगी।”

अरविंद के चेहरे की नसें तन गईं।
“बेटा, तुम अभी भावुक हो। तुम्हें पूरी बात नहीं पता।”

“मुझे बहुत कुछ पता है,” आरव ने शांत आवाज में कहा। “मुझे पता है कि फीस माँ ने भरी। मुझे पता है कि जब मैं डेंगू में अस्पताल में था, आप गोवा में छुट्टी मना रहे थे। मुझे पता है कि आपने रिश्तेदारों से कहा था कि आप मेरी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं। मुझे यह भी पता है कि माँ ने कभी आपकी सच्चाई मुझे नहीं बताई, क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि मैं अपने पिता से नफरत करूँ।”

कविता ने चौंककर बेटे को देखा।
“आरव…”

“माँ, अब बहुत हो गया,” उसने धीरे से कहा। “आपने मुझे चुप रहना नहीं, सही वक्त पर सच बोलना सिखाया है।”

ऋतु अचानक बोली, “मैंने सिर्फ व्यवस्था संभाली थी। तुम्हारी माँ वैसे भी पीछे बैठती तो क्या फर्क पड़ जाता?”

यह सुनते ही आसपास खड़े लोग फिर शांत हो गए।

आरव की आँखों में कठोर चमक आ गई।
“फर्क इसी बात का है कि आपने एक माँ को उसकी जगह से नहीं, उसके बेटे की जिंदगी से हटाने की कोशिश की। लेकिन आप भूल गईं कि जगह कागज पर लिखी जाती है, रिश्ता खून और त्याग में।”

ऋतु ने होंठ भींच लिए।

अरविंद ने गुस्से से कहा, “आरव, बात करने का तरीका सीखो।”

आरव ने पिता की आँखों में आँखें डाल दीं।
“तरीका माँ ने सिखाया है। इसलिए अभी भी आवाज ऊँची नहीं की। लेकिन सच सुनना आपको बदतमीजी लग रहा है, तो यह आपकी आदत है।”

निशा धीरे से बोली, “आज बच्चा नहीं, आईना बोल रहा है।”

अरविंद ने कविता की ओर देखा। शायद उसे उम्मीद थी कि वह फिर बीच में आएगी, बेटे को रोक देगी, मामला ढक देगी। लेकिन कविता चुप रही। यह चुप्पी पुरानी वाली नहीं थी। यह किसी नदी की गहराई जैसी थी—शांत, पर अडिग।

आरव ने अपना प्रमाणपत्र कविता के हाथों में रखा।

“माँ, फोटो ऐसे ही खिंचेगी।”

कविता घबरा गई।
“अरे नहीं, यह तेरा है।”

“मेरा कैसे? अगर तुम रात में मरीजों की उल्टी साफ करके सुबह मेरी गणित की कॉपी न देखतीं, अगर तुमने अपनी चूड़ियाँ न बेची होतीं, अगर तुमने मुझे कभी यह महसूस न होने दिया होता कि घर में कमी है, तो आज मेरा नाम यहाँ नहीं होता।”

कविता ने प्रमाणपत्र देखा।

उस पर छपा था—आरव शर्मा।

सिर्फ शर्मा।

उसका उपनाम।

कविता की उंगलियाँ काँप गईं।
“तूने…?”

आरव मुस्कुराया।
“स्कूल ने पूछा था अंतिम प्रमाणपत्र पर कौन-सा नाम रखना है। मैंने वही रखा जो मेरे जीवन के साथ खड़ा रहा।”

अरविंद ने यह सुन लिया। उसका चेहरा बुझ गया।

“मैं तुम्हारा पिता हूँ,” उसने धीमे स्वर में कहा।

आरव ने उसकी तरफ देखा।
“आपने मुझे जन्म का नाम दिया होगा। माँ ने जीने की हिम्मत दी है। दोनों में फर्क होता है।”

कोई ताली नहीं बजा रहा था अब। पर वह मौन तालियों से बड़ा था। आसपास खड़े माता-पिता, शिक्षक और विद्यार्थी उस क्षण के साक्षी बन गए थे जिसमें एक माँ का अदृश्य संघर्ष पहली बार खुले आकाश में आया था।

उस दिन के बाद बहुत कुछ बदला।

समारोह का वह वीडियो किसी छात्र ने सामाजिक माध्यम पर डाल दिया। पहले स्कूल के समूहों में फैला, फिर पूरे शहर में, फिर देश भर में। लोग उस लड़के की तारीफ कर रहे थे जिसने अपनी माँ को पीछे खड़ा देखकर मंच से सच बोल दिया। लेकिन कविता के लिए प्रसिद्धि कोई जीत नहीं थी। जीत वह शाम थी जब वह घर लौटी और पहली बार उसने अपनी पुरानी हरी साड़ी अलमारी में बहुत संभालकर रखी, जैसे वह कोई सम्मान चिन्ह हो।

कुछ दिनों बाद स्कूल ने कविता को आमंत्रित किया। मातृ सम्मान समारोह में उसे मंच पर बुलाया गया। वही सभागार, वही मंच, वही पहली पंक्ति—लेकिन इस बार उसके नाम की पट्टी किसी ने नहीं फाड़ी। प्रधानाचार्या ने कहा, “कुछ लोग बच्चों को पढ़ाते हैं, कुछ लोग बच्चों को जीवन बनना सिखाते हैं।”

कविता ने माइक पर बस इतना कहा, “हर माँ को आगे की पंक्ति नहीं मिलती, पर हर बच्चे को कभी न कभी पीछे मुड़कर देखना चाहिए।”

लोग खड़े हो गए।

अरविंद ने बाद में कई बार आरव को फोन किया। आरव ने बात की, पर शर्त रखी कि अब संबंध सच पर चलेगा, दिखावे पर नहीं। ऋतु ने कुछ समय तक इसे अपना अपमान बताया, फिर धीरे-धीरे सामाजिक दायरों से दूर हो गई। लोग उसे उस घटना से पहचानने लगे जिसमें उसने एक माँ की कुर्सी छीनी थी और बदले में पूरे सभागार ने उस माँ को उठा दिया था।

आरव को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति मिल गई। जिस दिन वह जाने लगा, कविता ने उसके बैग में पराठे, अचार और एक छोटी-सी नोटबुक रखी।

“इतनी चीजें क्यों रख रही हो?” आरव हँसा।

कविता ने कहा, “माँ का बैग हमेशा थोड़ा ज्यादा भरा होता है।”

स्टेशन पर भीड़ थी। कुलियों की आवाजें, चाय की भाप, ट्रेन की सीटी, सबके बीच आरव ने माँ के पैर छुए। कविता घबरा गई।

“अरे, यह क्या कर रहा है?”

आरव ने कहा, “जहाँ से आदमी उठता है, उसे प्रणाम करके ही आगे जाना चाहिए।”

कविता की आँखें फिर भर आईं, लेकिन इस बार आँसू में अपमान नहीं था। उसमें गर्व था, शांति थी, और वह अदृश्य आसमान था जो सिर्फ माँओं को मिलता है जब उनका बच्चा उन्हें सचमुच देख लेता है।

ट्रेन चली। आरव खिड़की से हाथ हिलाता रहा। कविता प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही, जब तक डिब्बा आँखों से ओझल नहीं हो गया।

निशा ने धीरे से पूछा, “दीदी, अब कैसा लग रहा है?”

कविता ने खाली पटरी की ओर देखा और मुस्कुराई।
“जैसे जिंदगी ने मुझे पीछे धकेला था, ताकि मेरा बेटा मुड़कर मुझे पहचान सके।”

कभी-कभी दुनिया किसी माँ को आखिरी कतार में खड़ा कर देती है। उसे लगता है कि उसकी मेहनत, उसकी भूख, उसकी जागी रातें, उसका चुप रहना सब बेकार गया। लेकिन फिर 1 दिन वही बच्चा भीड़ के बीच उसकी तलाश करता है।

और जब वह उसे देख लेता है, तो कोई भी पहली पंक्ति उस नजर से बड़ी नहीं होती।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.