
PART 1
17 साल की काव्या मेहरा नंगे पाँव बर्फ जैसी ठंडी संगमरमर की सीढ़ियों पर काँप रही थी, जबकि उसके अपने घर के भीतर उसका परिवार क्रिसमस के तोहफ़े खोलते हुए हँस रहा था।
दिल्ली के वसंत विहार की उस रोशन कोठी में संगीत बज रहा था, मोमबत्तियाँ जल रही थीं, मेहमानों के हाथों में गिलास चमक रहे थे, और बाहर धुंध से भरी रात में काव्या लाल मखमली लहंगे में अकेली खड़ी थी। उसके कंधे खुले थे, पैरों के नीचे पत्थर काट रहा था, और शीशे के पार उसका पिता राजीव मेहरा ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे उसने अभी-अभी अपनी बेटी को घर से नहीं निकाला हो।
दरवाज़ा 23:18 पर बंद हुआ था।
राजीव ने उसे धक्का देते हुए बस इतना कहा था, “जब बड़ों की तरह ज़ुबान चलानी है, तो रात बाहर काटकर सीखो कि इज़्ज़त की कीमत क्या होती है।”
काव्या ने काँपते हाथ से काँच पर दस्तक दी।
अंदर उसकी सौतेली माँ नंदिता ने सिर घुमाया। सफेद रेशमी साड़ी, मोतियों का हार, चेहरे पर मीठी क्रूरता। उसने काव्या को ऊपर से नीचे तक देखा, होंठों पर हल्की मुस्कान आई, फिर उसने भारी परदा खींच दिया।
वह परदा ठंड से ज़्यादा गहरा लगा।
सब कुछ 20 मिनट पहले खाने की मेज़ पर शुरू हुआ था, जब काव्या ने पूछा था कि मुंबई के प्रतिष्ठित नाट्य विद्यालय से आई सफेद लिफ़ाफ़ा उसके बिना क्यों खोला गया। उसने महीनों तक बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर पैसे जोड़े थे, छिपकर ऑडिशन दिया था, और हर रात माँ की पुरानी डायरी में लिखे संवाद पढ़कर सपना देखा था कि एक दिन मंच पर खड़ी होगी।
वह लिफ़ाफ़ा उसके लिए कागज़ नहीं था। वह दरवाज़ा था।
लेकिन वह कागज़ अर्जुन की प्लेट के पास पड़ा था, सॉस से दागदार, मुड़ा हुआ, जैसे वह कभी काव्या का था ही नहीं।
राजीव ने बिना आँख उठाए कहा था, “तुम कहीं नहीं जा रही। ये नाटक-वाटक गरीब लोगों के सपने हैं।”
काव्या ने धीमी मगर साफ़ आवाज़ में कहा था, “वह मेरा पत्र था।”
नंदिता हँसी थी। “बेचारी। तुझे सच में लगता है कि रंगमंच तुझे ज़िंदगी से बचा लेगा?”
अर्जुन ने कागज़ लहराया था। “पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ प्रवेश। बहुत भावुक है। लेकिन पापा ने फोन करके मना कर दिया। वैसे भी अगले साल माँ को जयपुर और दुबई जाना है, जुड़वाँ बच्चों को कौन संभालेगा?”
काव्या का गला सूख गया था। “आपने मेरी जगह मना कर दिया?”
राजीव ने काँटा मेज़ पर रखा। “मैंने वही किया जो एक जिम्मेदार पिता करता है। तेरी माँ अनन्या मरने से पहले तेरे दिमाग में बेकार के सपने भर गई थी। इस घर में खर्च मैं उठाता हूँ।”
इस घर में मैं।
वह यही कहता था जब नानी के नाम से आने वाले पैसे वह “भविष्य के लिए” रख लेता था। यही कहता था जब नंदिता काव्या को अपनी बहनों के पुराने कपड़े देती थी। यही कहता था जब अर्जुन उसे दोस्तों के सामने “ड्रामा वाली अनाथ” कहकर हँसता था।
काव्या पत्र लेने उठी तो राजीव ने उसकी कलाई इतनी जोर से पकड़ी कि कुर्सी गिर गई।
“मेहमानों के सामने मेरी नाक मत कटवा।”
काव्या के मुँह से निकल गया, “आपने अपनी नाक खुद काटी है।”
मेज़ पर सन्नाटा जम गया।
अगले पल राजीव उसे घसीटता हुआ शीशे वाले दरवाज़े तक ले गया।
अब बाहर उसके होंठ नीले पड़ रहे थे। उसके हाथ सुन्न हो रहे थे। अंदर से हँसी आ रही थी, जैसे हर आवाज़ उसके खिलाफ़ गवाही दे रही हो।
उसे माँ याद आई। अस्पताल का कमरा, पीली रोशनी, माँ की कमजोर हथेली। अनन्या ने उसे एक छोटी चाँदी की चाबी दी थी।
“18 साल की रात अपनी नानी सावित्री देवी को ढूँढ़ना,” माँ ने फुसफुसाया था। “उससे पहले नहीं। तेरे पिता उससे डरते हैं।”
काव्या ने कभी नहीं समझा। राजीव कहता था कि सावित्री देवी सिंघानिया निर्दयी, घमंडी और पैसे से रिश्ते खरीदने वाली औरत है। काव्या ने वही सच मान लिया, क्योंकि बच्चे अक्सर वही सच मानते हैं जो घर का सबसे ताकतवर आदमी रोज़ बोलता है।
उसका फोन अंदर था। जूते अंदर थे। कोट अंदर था। प्रवेश पत्र अंदर था।
पर चाबी अब भी उसके गले में थी।
आधी रात को वह 18 की होने वाली थी।
23:46 पर उसे उँगलियाँ महसूस होनी बंद हो गईं। वह फिर दरवाज़ा पीट सकती थी। रो सकती थी। माफ़ी माँग सकती थी।
पर उसके भीतर कुछ टूट चुका था, या शायद कुछ जन्म ले चुका था।
तभी गेट के पास 2 काली गाड़ियों की रोशनी धुंध चीरती हुई अंदर आई।
एक चालक उतरा। फिर सफेद बालों वाली बुजुर्ग महिला ने लंबा हाथीदाँती कोट संभालते हुए कदम रखा। हाथ में चाँदी के मूठ वाली छड़ी थी, चेहरा कठोर, आँखें तूफ़ान जैसी शांत।
सावित्री देवी सिंघानिया ने काव्या को देखा।
फिर रोशन कोठी की तरफ़ देखा।
उन्होंने अपने वकील से बस पूछा, “वह 14 मिनट में बालिग हो रही है?”
“जी, मैडम।”
सावित्री देवी की आवाज़ धीमी थी, मगर उसमें हथौड़े जैसा वजन था।
“तो आज रात यह घर गिरेगा।”
PART 2
चालक ने काव्या के कंधों पर गर्म ऊनी कोट डाला तो उसके शरीर से दबा हुआ कराह निकल गया। सावित्री देवी ने खुद उसका हाथ थामा और मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ीं।
दरवाज़ा राजीव ने खोला। उसका चेहरा तुरंत पीला पड़ गया।
“आप?”
सावित्री देवी ने भीतर कदम नहीं रखा। “मेरी नातिन बाहर नंगे पाँव क्यों काँप रही है?”
नंदिता मीठी आवाज़ में आगे आई। “छोटी-सी पारिवारिक बात है। काव्या बचपन से बहुत नाज़ुक है।”
“नहीं,” सावित्री देवी ने कहा।
केवल 1 शब्द, और पूरा हॉल खाली-सा लगने लगा।
राजीव ने दरवाज़ा आधा बंद करना चाहा। “यह मेरा घर है।”
सावित्री देवी पहली बार मुस्कुराईं। “नहीं, राजीव। यह कभी तुम्हारा था ही नहीं।”
वकील ने काले फोल्डर से कागज़ निकाले। “यह संपत्ति अनन्या सिंघानिया ट्रस्ट के नाम है। 16 साल से पूर्ण स्वामित्व काव्या अनन्या मेहरा के नाम सुरक्षित है। श्री राजीव मेहरा को केवल उसकी 18 वर्ष की आयु तक देखभाल और निवास का अधिकार था, वह भी शर्तों के साथ।”
काव्या ने दीवार पकड़ ली।
जिस घर में उसे एहसान की रोटी दी गई थी, वह घर उसका था।
तभी अर्जुन की उँगली उसके मोबाइल पर फिसली। वकील गरजा, “कुछ मत हटाइए।”
वीडियो चल पड़ा।
काव्या बाहर काँप रही थी। अंदर अर्जुन हँस रहा था, “देखो, हमारी सिंड्रेला दिल्ली की ठंड में।”
फिर राजीव की आवाज़ आई, “उसे बाहर रहने दो, जब तक चुप रहना न सीख जाए।”
नंदिता बोली, “कल से इसके नखरे कम हो जाएँगे।”
23:59 पर पुलिस की गाड़ी गेट पर आकर रुकी।
घड़ी ने 12 बजाए।
काव्या 18 की हुई, उसी घर में जहाँ किसी ने उसे जन्मदिन नहीं कहा।
राजीव उसकी चाँदी की चाबी झपटने दौड़ा।
सावित्री देवी बीच में आ खड़ी हुईं।
“वह तुम्हारी बेटी है,” उन्होंने कहा, “तुम्हारी चीज़ नहीं।”
PART 3
उस एक वाक्य ने राजीव मेहरा की सत्ता की रीढ़ तोड़ दी।
हॉल में क्रिसमस ट्री की रोशनी अब भी चमक रही थी, लेकिन उसमें कोई गर्मी नहीं बची थी। मेहमानों के चेहरे उतर चुके थे। जुड़वाँ बच्चे सीढ़ियों पर चुप बैठे थे। अर्जुन का मोबाइल वकील के हाथ में था। नंदिता की उँगलियाँ अपने मोतियों के हार को ऐसे पकड़ रही थीं जैसे वह भी किसी भी क्षण छिन जाएगा।
डॉक्टर ने काव्या के पैर देखे। उँगलियाँ लाल और सूजी हुई थीं। उसने कहा कि उसे तुरंत गरमाहट, दवा और आराम चाहिए। पुलिस अधिकारी ने राजीव की ओर देखा, फिर काव्या की हालत देखी।
“यह पारिवारिक अनुशासन नहीं है,” उसने ठंडे स्वर में कहा।
वकील ने दस्तावेज़ फैलाए। “आज रात से निवास अधिकार निलंबित। ट्रस्ट से जुड़े सभी खाते रोके जाते हैं। कल सुबह धोखाधड़ी, निधि के दुरुपयोग, मानसिक प्रताड़ना और नाबालिग को खतरे में डालने की शिकायत दर्ज होगी।”
नंदिता के चेहरे से रंग उड़ गया। “कौन से खाते, राजीव?”
राजीव ने दाँत भींचे। “चुप रहो।”
यही 2 शब्द नंदिता के लिए सच से भी ज़्यादा डरावने थे। उसे पहली बार समझ आया कि जिस आराम को वह पति की कमाई समझती रही, वह शायद उस लड़की की कीमत पर बना था जिसे वह नौकरानी की तरह इस्तेमाल करती थी।
सावित्री देवी ने उसकी तरफ़ देखा। “वे खाते जिनसे तुम्हारी जयपुर की प्रदर्शनियाँ, तुम्हारे हीरे, अर्जुन की गाड़ी और इस घर की पार्टियाँ चलती रहीं। वही पैसे जो काव्या की पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य के लिए थे।”
काव्या ने सिर उठा कर पिता को देखा।
सालों तक उसे बताया गया था कि वह बोझ है। कि उसे जितना दिया जा रहा है, उससे ज़्यादा वह हक़दार नहीं। कि अच्छे स्कूल की फीस, कपड़े, किताबें, सब राजीव की दया पर हैं।
अब पता चला, उसकी अपनी माँ की संपत्ति से सबका जीवन रोशन था, बस वह अँधेरे में रखी गई थी।
नंदिता टूटने लगी। पहले उसने खुद को बचाने के लिए बोलना शुरू किया, फिर डर ने उसकी जीभ खोल दी। उसने बताया कि राजीव ने कई बार काव्या के नाम आए पत्र छिपवाए। उसने कहा कि दिल्ली के एक रंगमंच शिविर का निमंत्रण भी दबा दिया गया था। एक बार चेन्नई की अभिनय कार्यशाला से छात्रवृत्ति मिली थी, वह भी राजीव ने अस्वीकार कर दी। काव्या की माँ के गहने “घर के खर्च” के नाम पर बेचे गए। अनन्या का पुराना बचत खाता बंद कराकर पैसे दूसरी कंपनियों में घुमाए गए।
हर बात काव्या के सीने में एक नई कील की तरह धँसती गई।
अर्जुन से पूछा गया तो वह पहले हँसा, फिर काँपने लगा। उसने माना कि उसने काव्या की डायरी चुराकर अपने दोस्तों को पढ़कर सुनाई थी। वही डायरी जिसमें काव्या अपनी माँ से बातें करती थी। वही डायरी जिसमें उसने लिखा था कि एक दिन वह मंच पर इतनी जोर से बोलेगी कि उसके भीतर दबे सारे शब्द आज़ाद हो जाएँगे।
राजीव अब भी खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था।
“मैंने उसे बचाया,” वह बोला। “कला की दुनिया गंदी है। लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं। मैंने पिता होकर फैसला लिया।”
काव्या पहली बार हँसी। वह हँसी नहीं थी, टूटे हुए काँच की आवाज़ थी।
“आपने मुझे दुनिया से नहीं बचाया,” उसने कहा। “आपने मुझे मुझसे बचाया, ताकि मेरा पैसा आपके पास रहे।”
सन्नाटा।
सावित्री देवी ने मेज़ से वह मुड़ा हुआ प्रवेश पत्र उठाया। उन्होंने उसे धीरे-धीरे सीधा किया, जैसे किसी घायल बच्चे की पट्टी बाँध रही हों।
“विद्यालय को सुबह पहला फोन मेरा होगा,” उन्होंने कहा। “और अगर किसी नकली अस्वीकृति को पलटना पड़ा, तो 1 नहीं, 3 वकील जाएँगे।”
नंदिता ने रोने का अभिनय शुरू किया। “काव्या, बेटी, सबके सामने घर की इज़्ज़त मत मिटा। तेरे पिता गुस्से में कभी-कभी ज़्यादा बोल देते हैं। लेकिन हम परिवार हैं।”
काव्या ने कमरे को देखा।
आग जल रही थी। मेज़ पर मिठाइयाँ थीं। सोने के कागज़ में लिपटे उपहार रखे थे। उस रात सब कुछ सुंदर था, बस इंसान कुरूप थे।
“परिवार दरवाज़ा खोलता है,” उसने कहा।
नंदिता की आँखों में नकली आँसू रुक गए।
अर्जुन बुदबुदाया, “तेरी वजह से पूरा त्योहार खराब हो गया।”
काव्या ने उसकी ओर देखा। “मेरी वजह से नहीं। तुम्हारी वजह से सबने देख लिया कि इस घर की रोशनी किस अँधेरे से चलती थी।”
पुलिस ने वीडियो सुरक्षित किया। वकील ने घर की सूची बनवानी शुरू की। आधी रात के बाद एक अधिकारी आया और संपत्ति की वस्तुओं पर मुहर लगने लगी। जो लोग कुछ देर पहले राजीव के साथ हँस रहे थे, वे अब सिर झुकाकर निकल रहे थे। किसी ने काव्या से माफ़ी नहीं माँगी। शायद इसलिए कि सच के सामने सबसे पहले शब्द मरते हैं।
नंदिता ने अपने कमरे से गहने लेने की कोशिश की। अधिकारी ने बिल देख कर रोक दिया। भुगतान ट्रस्ट के खाते से हुआ था।
अर्जुन ने अपनी कार की चाबी उठानी चाही। वकील ने बताया कि वह काव्या की शिक्षा निधि से खरीदी गई थी।
राजीव ने ऊँची आवाज़ में कहा, “आप लोग बच्चों को सड़क पर छोड़ देंगे?”
काव्या ने सीढ़ियों पर बैठे जुड़वाँ बच्चों को देखा। वे डरे हुए थे। वे क्रूर नहीं थे, बस उस घर में पले थे जहाँ क्रूरता को नियम कहा जाता था।
“उन्हें अपने कपड़े, दवाइयाँ, स्कूल की किताबें और जरूरी चीज़ें लेने दीजिए,” काव्या ने कहा। “वे बच्चे हैं।”
नंदिता उसे घूरती रही। “अब दया दिखा रही है?”
“नहीं,” काव्या ने शांत आवाज़ में कहा। “मैं बस तुम्हारी तरह नहीं बनना चाहती।”
45 मिनट दिए गए। केवल आवश्यक सामान। बाकी सब सूची में गया।
जब राजीव आखिरी बार दरवाज़े से निकला, उसके हाथ में 1 सूटकेस था। चेहरे पर पछतावा नहीं था, सिर्फ़ अधिकार खोने का अपमान था।
वह काव्या के सामने रुक गया। “तू पछताएगी। तूने अपना घर तोड़ दिया।”
काव्या कुर्सी पर बैठी रही। उसके कंधों पर अभी भी गर्म कोट था। गले में चाँदी की चाबी चमक रही थी।
“मैंने घर नहीं तोड़ा,” उसने कहा। “मैंने बस बाहर खड़े रहना बंद कर दिया, ताकि आप लोग अंदर गर्म रह सकें।”
राजीव ने कुछ कहना चाहा, पर पुलिस अधिकारी ने उसे आगे बढ़ा दिया।
उस रात के बाद बदला फिल्मों जैसा नहीं आया। कोई थप्पड़ नहीं, कोई नाटकीय प्रेस बयान नहीं, कोई सार्वजनिक चीख नहीं। असली पतन कागज़ों में उतरता है, धीरे-धीरे, ठंडे और अपमानजनक ढंग से।
जनवरी में राजीव की निर्माण कंपनी ने उसे निलंबित कर दिया। जाँच में कई संदिग्ध लेन-देन सामने आए। फरवरी में नंदिता की महँगी सजावट की दुकान बंद हो गई, क्योंकि किराए और माल का बड़ा हिस्सा उसी ट्रस्ट से गया था जो काव्या की पढ़ाई के लिए था। अर्जुन ने अपने सामाजिक खातों से वीडियो हटाए, लेकिन देर हो चुकी थी। वह वीडियो हर जगह घूम चुका था। लोग अब केवल काव्या की बात नहीं कर रहे थे। वे उन सभी घरों की बात कर रहे थे जहाँ बाहर से रोशनी दिखती है और भीतर कोई बच्चा चुपचाप काँपता है।
काव्या पहले कुछ दिन बहुत सोई।
सावित्री देवी के पुराने बंगले में किसी ने उससे बार-बार वही रात सुनाने को नहीं कहा। उसे गरम चाय मिली, मुलायम शॉल मिला, और सबसे बड़ी बात, चुप रहने की इजाज़त मिली। वहाँ चुप्पी सज़ा नहीं थी। वहाँ चुप्पी मरहम थी।
सबसे कठिन काम उस घर से निकलना नहीं था। सबसे कठिन यह समझना था कि वह पागल नहीं थी।
उसे धीरे-धीरे पुरानी बातें याद आने लगीं। वह पियानो जिसे छूने पर राजीव कहता था कि शोर मत करो। वे जन्मदिन जिन पर कहा जाता था कि इस बार खर्च ज़्यादा हो गया। वे रिपोर्ट कार्ड जिन पर अच्छे अंक देखकर भी पिता सिर्फ़ sigh भरता था। वे रातें जब नंदिता मेहमानों की सारी प्लेटें काव्या के लिए छोड़ देती थी और कहती थी, “बड़ी लड़की घर संभालना सीखती है।”
एक शाम काव्या ने सावित्री देवी से पूछा, “आप पहले क्यों नहीं आईं?”
सावित्री देवी बहुत देर तक खिड़की के पास चुप रहीं। फिर बोलीं, “तेरी माँ डरती थी कि खुली लड़ाई तुझे और चोट पहुँचाएगी। उसने सब कानूनी रूप से बाँध दिया था, पर चाहती थी कि बाहर आने का समय तू खुद चुने। मैंने उसकी बात मानी। शायद गलती की।”
काव्या के भीतर एक पुराना गुस्सा उठा। पर सावित्री देवी की आँखों में घमंड नहीं, पछतावे की धूल थी।
“माँ आपसे प्यार करती थीं?” काव्या ने पूछा।
सावित्री देवी ने बहुत हल्की मुस्कान दी। “जितना मुझसे नाराज़ थीं, उससे भी ज़्यादा।”
कुछ दिनों बाद सावित्री देवी ने उसे एक चमड़े का छोटा बक्सा दिया। उसमें अनन्या की तस्वीरें थीं, बालों की एक छोटी लट, कुछ पत्र और नीली डायरी।
काव्या ने पहला पत्र खोला।
लिखावट माँ की थी, पतली, झुकी हुई, जिंदा।
पहली पंक्ति थी, “मेरी काव्या, अगर तू यह पत्र पढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि तू उस घर से गुज़र आई जहाँ तुझे यकीन दिलाया गया कि प्यार कमाना पड़ता है।”
काव्या रोई।
तेज़ नहीं। नाटकीय नहीं। बस चुपचाप। जैसे बचपन से भीतर जमा पानी रास्ता पा गया हो।
सावित्री देवी ने उसका सिर छुआ। “तुझे किसी से प्यार कमाने की जरूरत नहीं है। तू जन्म से ही उसकी हक़दार थी।”
मार्च में कोठी खाली करवाई गई। सूची बनी, दस्तावेज़ जमा हुए, और अंत में काव्या ने निर्णय लिया कि उस घर को बेचा नहीं जाएगा।
उसे गिराया जाएगा।
सावित्री देवी ने पूछा, “पक्का?”
काव्या ने कहा, “हाँ। मैं उस जेल को किसी और के लिए महल बनते नहीं देखना चाहती।”
जिस दिन मशीनें आईं, दिल्ली की हवा साफ़ और ठंडी थी। काव्या ने क्रीम रंग का कोट पहना था, पैरों में नए जूते थे, और गले में वही चाँदी की चाबी थी। सावित्री देवी उसके बगल में छड़ी टेककर खड़ी थीं।
पहला प्रहार उस छत पर पड़ा जिसके नीचे कभी क्रिसमस ट्री चमका था। दीवार काँपी। संगमरमर टूटा। काँच बिखरा।
आवाज़ बहुत बड़ी थी।
पर काव्या को वह आवाज़ साँस जैसी लगी।
सावित्री देवी ने पूछा, “दर्द हो रहा है?”
काव्या ने धूल में गायब होते उस कमरे को देखा जहाँ वह बाहर खड़ी होकर भीतर की हँसी सुनती रही थी।
“दर्द इस बात का है,” उसने कहा, “कि मैंने इतने साल सोचा, मैं उस घर में मेहमान की तरह रहने लायक ही हूँ।”
सावित्री देवी ने उसका हाथ पकड़ा। “अब तू कहीं मेहमान बनकर नहीं रहेगी।”
6 महीने बाद काव्या ने मुंबई के नाट्य विद्यालय में प्रवेश लिया। उसकी सीट बहाल हुई। शुल्क छात्रवृत्ति से भरा गया। अनन्या सिंघानिया कला निधि बनाई गई, जिससे हर साल 1 ऐसी लड़की की मदद होनी थी जिसे उसके अपने घर ने छोटा बना दिया हो।
काव्या वहाँ दया माँगने नहीं पहुँची। वह वहाँ उस लड़की की तरह पहुँची जिसने बहुत जल्दी सीख लिया था कि सबसे सुंदर घर भी सबसे ठंडे हो सकते हैं।
अगला क्रिसमस किसी बड़ी कोठी में नहीं था।
वह मुंबई के एक छोटे से फ्लैट में था। छोटी मेज़, साधारण केक, गरम कॉफी, दीवार पर टेढ़ी लगी झालर, और सावित्री देवी जो बार-बार शिकायत कर रही थीं कि पेड़ सीधा नहीं रखा गया। काव्या हँसी। उसे अपनी हँसी अजीब लगी, क्योंकि वह पहली बार किसी की अनुमति लेकर नहीं निकली थी।
रात 22 बजे उसे राजीव का पत्र मिला।
उसमें माफ़ी नहीं थी। एक भी शब्द नहीं।
सिर्फ़ 1 पंक्ति थी।
“तूने हमसे सब छीन लिया।”
काव्या ने पंक्ति पढ़ी। फिर उसने मोमबत्ती जलाई, पत्र को सफेद प्लेट में रखा और कागज़ को राख बनते देखा।
सावित्री देवी चुप रहीं।
काव्या ने गले की चाबी छुई और धीरे से कहा, “नहीं माँ। मैंने बस दरवाज़ा वापस ले लिया।”
खिड़की के बाहर मुंबई की रात चमक रही थी। लोग घर लौट रहे थे। बच्चे केक के डिब्बे लिए भाग रहे थे। कहीं किसी घर में झगड़ा था, कहीं हँसी, कहीं थकान, कहीं प्यार।
काव्या देर तक शीशे के पास खड़ी रही।
इस बार वह सही तरफ़ थी।
और अब वह कभी किसी रोशन मकान को घर समझने की भूल नहीं करेगी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.