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जिस पत्नी ने कभी बच्चे नहीं चाहे, उसने पति को बीमार वारिस और उसकी नर्स मां के लिए टूटते देखा, फिर जलकर बोली “अगर वह बच्चा मर जाए” और उसी ईर्ष्या ने उसका घर, सम्मान और चेहरा सब छीन लिया…

PART 1

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—अगर वह लड़का मर जाए, तो इस घर की सारी मुसीबत खत्म हो जाएगी—नीलिमा ने अस्पताल के कमरे के बाहर खड़े होकर इतनी ठंडी आवाज़ में कहा कि दरवाजे के पीछे खड़े डॉक्टर आरव मेहता की सांस वहीं अटक गई।

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के उस बच्चों वाले वार्ड में रात गहरी हो चुकी थी। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में 7 साल का ईशान मल्होत्रा बिस्तर पर पड़ा था। उसका चेहरा पीला, होंठ सूखे और आंखें ऐसी थकी हुई थीं जैसे बचपन उससे बहुत पहले छीन लिया गया हो। आरव मेहता शहर के नामी बाल रोग विशेषज्ञ थे। वसंत विहार में उनकी अपनी बड़ी क्लिनिक थी, लेकिन हर महीने वह सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज के लिए आते थे, क्योंकि उन्हें अपनी मां की वह आवाज़ कभी नहीं भूली थी जो कभी दवाई के पैसे गिनते हुए कांपती थी।

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ईशान के पेट में तेज दर्द था। रिपोर्ट देखकर आरव का माथा सिकुड़ गया। बच्चे को तुरंत इलाज चाहिए था, वरना हालत हाथ से निकल सकती थी।

—दर्द बहुत है? —आरव ने नरमी से पूछा।

ईशान ने गर्दन हिलाई।

—थोड़ा।

—झूठ मत बोलो, शेर।

बच्चे की आंखों में पानी भर आया।

—बहुत है।

जब उसने चादर पकड़ने के लिए हाथ उठाया, आरव की नज़र उसकी हथेली पर पड़ी। एक टेढ़ा-सा पुराना निशान था। आरव ने मुस्कुराकर कहा—

—मेरे हाथ पर भी ऐसा निशान है। बचपन में पतंग पकड़ते हुए छत से गिर गया था।

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ईशान ने धीमे से पूछा—

—तो हम दोनों बहादुर हैं?

—सबसे बहादुर।

कुछ देर बाद बच्चे ने वह सवाल पूछा जिसने आरव के भीतर कुछ तोड़ दिया।

—डॉक्टर अंकल, मैं मर जाऊंगा क्या?

आरव चौंक गया।

—किसने कहा?

ईशान ने डरते हुए दरवाजे की तरफ देखा।

—नीलिमा मां कहती हैं कि बीमार बच्चे ज्यादा दिन घर पर बोझ नहीं रहते।

नीलिमा मां। यानी सौतेली मां।

बाद में अस्पताल की वरिष्ठ डॉक्टर सुजाता ने आरव को फाइल दिखाई। ईशान के पिता विक्रम मल्होत्रा, जयपुर और दिल्ली में मार्बल का बड़ा कारोबार चलाते थे। 6 महीने पहले जयपुर हाईवे पर उनकी कार दुर्घटना में मौत हो गई थी। ईशान उनकी पहली पत्नी का बेटा था। पहली पत्नी की मौत उसके जन्म के कुछ समय बाद हो चुकी थी। विक्रम ने बाद में नीलिमा से शादी की थी।

कानूनी तौर पर विक्रम की संपत्ति का बड़ा हिस्सा ईशान के नाम था, मगर जब तक वह 18 साल का नहीं होता, नीलिमा उसकी अभिभावक बनकर सब संभाल रही थी।

—इतने पैसे वाले बच्चे को मुफ्त वार्ड में क्यों रखा गया है? —आरव ने पूछा।

सुजाता ने कड़वाहट से कहा—

—क्योंकि नीलिमा ने उसे गरीब श्रेणी में दाखिल कराया। कहती है, इलाज लंबा चलेगा तो पैसा बर्बाद होगा।

उसी शाम एक नर्स आरव के पीछे-पीछे कॉरिडोर तक आई। उसका नाम काव्या था। बाल कसकर बंधे थे, आंखों में नींद नहीं, डर था।

—डॉक्टर साहब, ईशान को बचा लीजिए। वह बच्चा अकेला नहीं है। बस जिसे उसकी रक्षा करनी चाहिए, वही उसे रास्ते से हटाना चाहती है।

आरव ने गंभीर होकर पूछा—

—तुम इतना क्यों डर रही हो?

काव्या ने आसपास देखा।

—क्योंकि नीलिमा उसे देहरादून के एक बोर्डिंग होम भेजना चाहती है। असल में वह बोर्डिंग नहीं, बीमार बच्चों की बंद जगह है। वहां भेजकर वह कह सकेगी कि बच्चा इलाज में मर गया।

आरव को लगा जैसे उसके भीतर आग जल उठी हो।

उस रात वह अपने घर लौटा तो पत्नी शनाया डाइनिंग टेबल पर बैठी थी। महंगी साड़ी, महंगे गहने, मगर चेहरे पर वही पुरानी ठंडक। शादी को 8 साल हो चुके थे। शनाया ने शादी से पहले ही साफ कह दिया था कि उसे बच्चे नहीं चाहिए। आरव ने मान लिया था, क्योंकि प्यार में वह समझौता समझता था, हार नहीं।

—मैं एक बच्चे की अस्थायी अभिभावकता के लिए आवेदन करना चाहता हूं—आरव ने कहा।

शनाया की आंखें सिकुड़ गईं।

—किसी और का बच्चा?

—बीमार है। खतरे में है।

—या फिर तुम मुझे सजा देना चाहते हो क्योंकि मैंने तुम्हें बच्चा नहीं दिया?

आरव चुप रहा।

शनाया ने तिरस्कार से हंसकर कहा—

—तुम डॉक्टर नहीं, भगवान बनने की बीमारी से पीड़ित हो।

अगले दिन अस्पताल में आरव ने काव्या को ईशान के सिरहाने बैठे देखा। वह उसे धीरे-धीरे दलिया खिला रही थी।

—बस 2 चम्मच और, मेरे बच्चे।

आरव ठिठक गया।

मेरे बच्चे।

यह दया की भाषा नहीं थी। यह मां की भाषा थी।

वह कुछ पूछ पाता, तभी ईशान की सांस अचानक तेज हो गई। चेहरा राख जैसा पड़ गया। मॉनिटर चीखने लगा। आरव दौड़ा। जांच में पता चला कि बच्चे को तुरंत दुर्लभ रक्त समूह की जरूरत है।

कोई मेल नहीं खा रहा था।

तभी काव्या आगे आई।

—मेरा खून मिल जाएगा।

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

—तुम इतनी यकीन से कैसे कह सकती हो?

काव्या के होंठ कांपे।

—क्योंकि ईशान सिर्फ मेरा मरीज नहीं है।

और उसके अगले शब्दों ने आरव की पूरी दुनिया पलट दी।

PART 2

—मैंने उसे अपने गर्भ में रखा था—काव्या ने फुसफुसाकर कहा—ईशान मेरे शरीर से जन्मा है।

आरव के कानों में अस्पताल का शोर जैसे डूब गया।

काव्या ने बताया, वह 20 साल की थी, नर्सिंग पढ़ रही थी। उसकी मां को दिल की सर्जरी चाहिए थी। रिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया। उसी समय विक्रम मल्होत्रा ने मदद की पेशकश की। उनकी पत्नी की जान गर्भ से खतरे में थी। काव्या ने मजबूरी में सरोगेसी का अनुबंध स्वीकार किया।

—मैंने सोचा था पैसा मां को बचा लेगा और मैं भूल जाऊंगी—काव्या रो पड़ी—लेकिन जब ईशान पैदा हुआ, उसकी हथेली का वह निशान देखा, तो लगा मेरा दिल किसी ने निकाल लिया।

काव्या ने रक्त दिया। ईशान बच गया।

आरव और काव्या ने मिलकर नीलिमा के खिलाफ सबूत जुटाने शुरू किए। उन्होंने उसे एक देखभाल केंद्र के नाम पर मिलने बुलाया। नीलिमा ने बिना झिझक कहा—

—बच्चे को कहीं भी भेज दो, बस संपत्ति मेरे हाथ में रहनी चाहिए। बीमार बच्चे को करोड़ों की जरूरत नहीं पड़ेगी।

बात रिकॉर्ड हो गई।

नीलिमा गिरफ्तार हुई। ईशान की सुरक्षा की प्रक्रिया शुरू हुई।

लेकिन उसी शाम शनाया आरव के क्लिनिक में आई।

—तलाक चाहिए। और तुम्हारी आधी क्लिनिक भी।

आरव ने सोचा यह गुस्सा है।

वह साजिश थी।

PART 3

शनाया ने तलाक के मुकदमे में आरव पर वह आरोप लगाए जिनकी कल्पना भी उसने नहीं की थी। उसने कहा कि आरव ने काव्या के साथ संबंध बनाए, क्लिनिक का पैसा एक नर्स और एक अमीर वारिस बच्चे पर खर्च किया, और ईशान को इसलिए अपनाना चाहता है ताकि उसके नाम की संपत्ति पर कब्जा कर सके। अदालत में सच से ज्यादा कागज बोलते थे, और शनाया ने कागज तैयार करवा लिए थे।

उसके साथ एक आदमी था—रचित कपूर। वह खुद को कारोबारी सलाहकार कहता था, लेकिन असल में शनाया का प्रेमी था। महीनों से दोनों आरव की कमाई, क्लिनिक की फाइलें और बैंक दस्तावेज देख रहे थे। आरव को अब समझ आया कि शनाया ने अचानक अकाउंटेंट बदलने की जिद क्यों की थी, रात-रात भर फोन पर किससे बात करती थी, और क्यों वह बार-बार कहती थी कि “भावुक आदमी अपनी मेहनत खो देता है।”

मुकदमा लंबा चला। आरव ने क्लिनिक का बड़ा हिस्सा खो दिया। शनाया ने रचित को वित्तीय सलाहकार बनाकर बैठा दिया। पुराने ईमानदार कर्मचारी निकाले गए। मरीजों से ज्यादा बिल वसूले जाने लगे। गरीब बच्चों के लिए रखी दवाइयां रोक दी गईं।

आरव दिन में ईशान के केस के लिए अदालतों के चक्कर लगाता, रात में अस्पताल में बच्चे की हालत देखता। काव्या हर पल साथ खड़ी रही, लेकिन उसके चेहरे पर अपराधबोध गहरा होता गया। उसे लगने लगा कि आरव का घर, शादी, नाम—सब उसके और ईशान के कारण टूट गया।

एक रात उसे अनजान नंबर से फोन आया।

—तूने एक घर तोड़ा है। अब तेरे सामने उस बच्चे को भी तोड़ेंगे।

आवाज बदली हुई थी, मगर जहर साफ था।

काव्या ने फोन काट दिया, लेकिन अगले दिन वह गायब थी। उसने अस्पताल से इस्तीफा दे दिया। अपने किराए के कमरे से सामान उठाया और उत्तराखंड में अपनी मौसी के गांव चली गई। जाते-जाते उसने सिर्फ एक पर्ची छोड़ी—

“मैं रहूंगी तो आप सबको नुकसान होगा।”

ईशान ने कई रात रोकर बिताईं।

—काव्या दीदी मुझे छोड़कर क्यों गईं? क्या मैं बोझ हूं?

आरव उसे सीने से लगाकर कहता—

—तू बोझ नहीं, तू वजह है। किसी के जीने की वजह।

पर आरव भी टूट रहा था। नीलिमा की गिरफ्तारी के बाद भी संपत्ति का मामला रुका हुआ था। अदालत ने अस्थायी रूप से ईशान को बाल संरक्षण गृह भेज दिया, क्योंकि आरव खुद तलाक और वित्तीय जांच में फंसा था।

फिर सबसे बड़ा वार हुआ।

एक सुबह आयकर विभाग और पुलिस आरव की क्लिनिक पहुंची। उस पर कर चोरी, फर्जी बिलिंग और दान के पैसों के दुरुपयोग का आरोप लगा। आरव ने अकाउंट रूम में जाकर पुराने रिकॉर्ड मांगे, लेकिन अलमारी खाली थी। हार्ड डिस्क बदली जा चुकी थी। चेक बुक गायब थी। हस्ताक्षर स्कैन कर कई नकली भुगतान दिखाए गए थे।

उसे उसके ही कर्मचारियों के सामने ले जाया गया।

समाचार चैनलों ने चीखा—“मसीहा डॉक्टर या करोड़ों का ठग?” सोशल मीडिया पर लोग दो हिस्सों में बंट गए। कुछ ने उसके पुराने मुफ्त ऑपरेशन याद किए, कुछ ने कहा कि हर सफेद कोट के पीछे लालच छिपा होता है।

बाल संरक्षण गृह में ईशान को यह खबर एक आया की मोबाइल स्क्रीन से पता चली। बच्चे ने खाना छोड़ दिया। वह हर दरवाजे की आवाज पर उठकर देखता, जैसे आरव अभी आएगा।

उधर पहाड़ी गांव में काव्या एक छोटे स्वास्थ्य केंद्र में काम कर रही थी। एक सुबह चाय की दुकान पर पुराने अखबार में उसने आरव की गिरफ्तारी की खबर देखी। उसके हाथ से कुल्हड़ गिर गया। गर्म चाय मिट्टी में फैल गई।

—मेरी वजह से—वह बुदबुदाई—मैंने उन्हें अकेला छोड़ दिया।

उसी शाम वह बस पकड़कर दिल्ली लौट आई।

पहला कदम उसने वकील से मिलकर उठाया। वकील का नाम था माधव अरोड़ा, उम्र 58, आवाज शांत, आंखें तेज। उसने काव्या की बात पूरी सुनी।

—तुम जैविक मां हो, लेकिन कानूनी मां नहीं—माधव ने कहा—फिर भी अगर सरोगेसी के दस्तावेज, अस्पताल की फाइल, डॉक्टर का बयान और बच्चे की सुरक्षा का खतरा साबित हो गया, तो हम अस्थायी अभिरक्षा मांग सकते हैं।

काव्या ने बिना झिझक कहा—

—जो करना है कीजिए। ईशान अब किसी फाइल में बंद नहीं रहेगा।

माधव ने पुरानी फाइलों की तलाश शुरू की। पुणे के उस नर्सिंग होम तक पहुंचा जहां ईशान का जन्म हुआ था। वहां की रिटायर्ड स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. भारती ने बयान दिया कि काव्या ने ही गर्भ धारण किया था। काव्या की मां ने भी वह पुराना अनुबंध दिखाया जिसे वह इतने सालों से लोहे के संदूक में छिपाकर रखे थी।

डीएनए जांच ने सच पर अंतिम मुहर लगा दी।

अदालत ने ईशान को बाल संरक्षण गृह से निकालकर काव्या की अस्थायी अभिरक्षा में दे दिया। जब काव्या वहां पहुंची, ईशान कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर अचानक दौड़कर उससे लिपट गया।

—मुझे पता था आप आएंगी।

काव्या घुटनों पर बैठ गई।

—मैं देर से आई, बेटा। अब कभी देर नहीं करूंगी।

ईशान ने पहली बार उसे मां कहा।

उस एक शब्द ने काव्या के 7 साल के अपराधबोध को आंखों से बहा दिया।

लेकिन आरव अब भी हिरासत में था।

माधव ने जमानत की कोशिश की, पर रकम बहुत बड़ी थी। काव्या के पास कुछ नहीं था। तभी ईशान ने धीरे से कहा—

—पापा विक्रम ने मुझे कुछ नंबर याद करवाए थे। कहते थे, अगर कभी घर में सब बदल जाएं, तो बैंक वाले अंकल को बताना।

सबने इसे बच्चे की याद समझकर टालना चाहा, पर माधव ने कोशिश करने का निर्णय लिया।

वे करोल बाग की एक पुरानी बैंक शाखा पहुंचे। ईशान ने 6 अंकों का एक कोड बोला, फिर अपनी जन्मतिथि, फिर अपनी हथेली का निशान दिखाया। बैंक मैनेजर पहले हैरान हुआ, फिर पुराने रिकॉर्ड खोलते ही उसका चेहरा गंभीर हो गया।

विक्रम मल्होत्रा ने अपनी मृत्यु से 2 महीने पहले एक सुरक्षित लॉकर बनाया था, जिसमें ईशान को लाभार्थी रखा गया था। नीलिमा को इसकी जानकारी नहीं थी।

लॉकर में नकद राशि, मूल वसीयत की प्रति, बीमा कागज, संपत्ति से जुड़ी फाइलें और एक पेन ड्राइव थी। साथ में एक पत्र था—

“ईशान, अगर यह पढ़ रहे हो तो समझना कि तुम्हारे पिता ने खतरा पहचान लिया था, मगर शायद देर हो गई। नीलिमा पर भरोसा मत करना। तुम्हारी मां जिसने तुम्हें जन्म दिया, वह भले कानूनी कागजों में न हो, पर तुम्हारी पहली धड़कन उसी के भीतर सुनी गई थी। और अगर कभी कोई डॉक्टर तुम्हें बचाने के लिए खड़ा हो, तो उसे अपना मानना।”

पेन ड्राइव में विक्रम की रिकॉर्डिंग थी। उसने बताया था कि उसकी कार दुर्घटना से पहले ब्रेक में छेड़छाड़ की आशंका है। उसने नीलिमा और एक मैनेजर के बीच पैसों की बात भी रिकॉर्ड की थी। यह सिर्फ संपत्ति का मामला नहीं था। यह हत्या की साजिश तक पहुंच सकता था।

इन दस्तावेजों ने सब बदल दिया।

आरव की जमानत हुई। जब वह बाहर आया, उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, आंखें धंसी हुई थीं, मगर जैसे ही ईशान ने उसे देखा, बच्चा दौड़कर उसकी कमर से लिपट गया।

—आप वापस आ गए।

आरव ने उसे कसकर पकड़ लिया।

—मैंने कहा था न, मैं अपने लोगों को छोड़कर नहीं जाता।

काव्या थोड़ी दूरी पर खड़ी थी। आरव ने उसकी तरफ देखा। उस नजर में शिकायत नहीं थी, सिर्फ राहत थी।

—तुम भी लौट आईं।

काव्या की आंखें भर आईं।

—इस बार हमेशा के लिए।

माधव ने धीरे-धीरे पूरा मामला पलट दिया। नकली बिलों की जांच हुई। शनाया के अकाउंटेंट ने दबाव में बयान दिया कि रचित ने फर्जी दस्तावेज बनवाए थे। क्लिनिक से चोरी हुए रिकॉर्ड रचित के फार्महाउस से मिले। शनाया ने पहले सब नकारा, फिर जब बैंक लेनदेन सामने आए तो उसका चेहरा सूख गया।

नीलिमा के खिलाफ बाल उपेक्षा, धोखाधड़ी, संपत्ति हड़पने की कोशिश और विक्रम की दुर्घटना से जुड़ी आपराधिक जांच शुरू हुई। उसका महंगा मेकअप अदालत की रोशनी में उतर गया। वह पहली बार बिना शक्ति, बिना पैसे, बिना आवाज़ के खड़ी थी।

शनाया ने भी हार नहीं मानी। उसने अंतिम वार करने की कोशिश की। उसने मीडिया को बयान दिया कि काव्या ने आरव को फंसाया, बच्चा भावनात्मक हथियार है, और पूरा मामला संपत्ति का खेल है। कुछ चैनलों ने फिर शोर मचाया, मगर इस बार जनता की आंखों के सामने दस्तावेज थे। अस्पताल के गरीब मरीज, पुराने कर्मचारी, बचाए गए बच्चों के माता-पिता—सब आरव के समर्थन में खड़े हुए।

क्लिनिक, जो कभी शनाया और रचित की लालच में बर्बाद हो चुकी थी, कर्ज में डूब गई। अदालत ने वित्तीय गड़बड़ी के कारण उसका नियंत्रण हटाया। नीलामी की नौबत आई। आरव ने उसे वापस खरीदने से मना कर दिया। उस जगह से उसे अपमान, गिरफ्तारी और टूटन की याद आती थी।

काव्या ने उसका हाथ पकड़ा।

—बुरे लोगों ने दीवारें गंदी की हैं, सपना नहीं। अगर तुम पीछे हटे, तो वे सच में जीत जाएंगे।

ईशान ने भी कहा—

—डॉक्टर अंकल, वहां मेरे जैसे बच्चों का इलाज होना चाहिए।

आरव ने क्लिनिक वापस ले ली।

लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं रही। बाहर बड़ा बोर्ड लगा—

“ईशान बाल सहायता केंद्र”

क्लिनिक का एक पूरा हिस्सा उन बच्चों के लिए रखा गया जिनके परिवार इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे। हर महीने गांवों से बसें आतीं। काव्या नर्सों की टीम संभालती। आरव ऑपरेशन करता। ईशान स्कूल के बाद बच्चों को कहानी की किताबें बांटता और कहता—

—डरना मत, यहां कोई तुम्हें बोझ नहीं कहेगा।

समय के साथ ईशान की बीमारी नियंत्रण में आई। उसका चेहरा भरने लगा। उसकी हंसी लौट आई। वह अब रात में डरकर नहीं उठता था।

एक शाम, दीपावली से 2 दिन पहले, क्लिनिक की छत पर छोटी-छोटी लाइटें लगाई जा रही थीं। नीचे सड़क पर मिठाइयों की दुकानों से खुशबू आ रही थी। आरव ने काव्या को बुलाया। उसके हाथ में कोई हीरा नहीं था, बस चांदी की एक साधारण अंगूठी थी।

—मेरे पास अब भी डर हैं—आरव ने कहा—नाम वापस मिला है, क्लिनिक वापस मिली है, मगर दिल पर जो निशान हैं, वे रहेंगे। फिर भी अगर तुम साथ चलो, तो शायद ये निशान बोझ नहीं, गवाही बन जाएंगे।

काव्या ने मुस्कुराकर पूछा—

—और ईशान?

ईशान पीछे से चिल्लाया—

—मैंने पहले ही हां कर दी है!

काव्या हंसते-हंसते रो पड़ी। उसने अंगूठी पहन ली।

उनकी शादी बड़ी नहीं थी। मंदिर के आंगन में कुछ फूल, कुछ दीये, काव्या की मां, वकील माधव, अस्पताल की डॉक्टर सुजाता और ईशान। ईशान ने आरव का हाथ पकड़कर काव्या के हाथ में रखा और फुसफुसाया—

—अब कोई कहीं नहीं जाएगा।

कुछ महीनों बाद काव्या ने आरव को एक और खबर दी। वह मां बनने वाली थी। आरव कुछ पल बोल नहीं पाया। उसके चेहरे पर वह खुशी थी जो इंसान को डराती भी है, क्योंकि उसने बहुत कुछ खोकर उसे पाया होता है।

ईशान उछल पड़ा।

—मुझे बहन चाहिए। नहीं, भाई भी चलेगा। लेकिन उसे मेरी पुरानी कारें नहीं मिलेंगी, सिर्फ किताबें मिलेंगी।

घर में पहली बार हंसी बिना डर के गूंजी।

उधर शनाया का अंत धीरे-धीरे हुआ। रचित ने जांच शुरू होते ही उसका साथ छोड़ दिया। जाते-जाते कह गया—

—तुम्हारे पास पैसा नहीं तो तुममें दिलचस्पी भी नहीं।

शनाया अकेली रह गई। अदालत ने उसे वित्तीय धोखाधड़ी में सहयोगी माना। उसे जेल नहीं हुई, मगर भारी जुर्माना, सामाजिक सेवा और लंबे समय तक निगरानी मिली। उसने पहली बार समझा कि जिस बच्चे से वह कभी डरती थी, वही बच्चा आरव को वह परिवार दे गया जो वह अपने अहंकार में कभी बना ही नहीं सकी।

एक रात उसने आरव को फोन किया।

—मैंने सब जलाना चाहा था—उसने टूटी आवाज़ में कहा—तुम्हारी क्लिनिक, तुम्हारा नाम, तुम्हारी शांति। क्योंकि तुमने मेरे बिना जीना सीख लिया था।

आरव ने लंबी चुप्पी के बाद कहा—

—नहीं, शनाया। मैं तुम्हारे बिना नहीं, नफरत के बिना जीना सीख रहा था।

नीलिमा को सजा हुई। विक्रम की दुर्घटना की जांच ने उसके साथी मैनेजर को भी कटघरे में ला दिया। ईशान की संपत्ति अदालत की निगरानी में सुरक्षित कर दी गई। काव्या को कानूनी रूप से उसकी संरक्षक मां माना गया, और आरव ने उसे विधिवत गोद लिया।

सालों बाद, जब ईशान बड़ा हुआ, उसकी हथेली का निशान अब भी वैसा ही था। वह जब भी उसे देखता, कहता—

—यह निशान बताता है कि मैं खोया नहीं था, बस मुझे ढूंढ़ने में दुनिया को समय लगा।

आरव हर बार चुप हो जाता।

क्योंकि उसने सच में उस बच्चे को नहीं बचाया था। उस बच्चे ने उसे बचाया था—एक ठंडी शादी से, झूठी प्रतिष्ठा से, अकेलेपन से, और उस जीवन से जिसमें सब कुछ था, बस धड़कता हुआ परिवार नहीं था।

और जब कोई पूछता कि क्या एक पराये बच्चे के लिए सब कुछ गंवाना सही था, आरव मुस्कुराकर ईशान और काव्या को देखता।

—पराया? वह तो मेरे घर आने से पहले ही मेरी किस्मत में लिखा हुआ था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.