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जिस नौकरानी को 3 बच्चों वाली कहकर शादी में अपमानित किया गया, उसी ने सुहागरात में अपने जख्म दिखाकर अमीर घराने की नींव हिला दी— “ये मेरे बच्चे नहीं, मेरे भाई-बहन हैं”, और फिर एक काली गाड़ी ने सबकी सांस रोक दी

PART 1

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“यह लड़की बहू बनकर नहीं, मल्होत्रा खानदान की इज्जत मिट्टी में मिलाने आई है।”

नैना देवी मल्होत्रा की चीख पूरे फार्महाउस में गूंज गई, जब उनके बेटे अर्जुन मल्होत्रा ने जयपुर रोड वाले आलीशान बंगले के दरवाजे पर लाल साड़ी पहने काव्या को हाथ पकड़कर अंदर लाया। वही काव्या, जो सिर्फ 1 महीने पहले तक उनके दिल्ली वाले घर में फर्श पोंछती थी, बर्तन धोती थी और मेहमानों के जाने के बाद चुपचाप फूलों की पंखुड़ियां समेटती थी।

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अर्जुन मल्होत्रा देश की बड़ी निर्माण कंपनी का मालिक था। उसके नाम पर होटल, टाउनशिप और बड़े सरकारी ठेके थे। घर में नौकरों की कतार थी, रिश्तेदारों की भीड़ थी, लेकिन उसके पिता की बीमारी के दिनों में रात-रात भर आईसीयू के बाहर बैठने वाली सिर्फ काव्या थी।

काव्या 25 साल की थी। कम बोलती थी, हमेशा सिर झुकाकर चलती थी और अपनी तनख्वाह का लगभग सारा पैसा बिहार के एक छोटे कस्बे में भेज देती थी। जब रसोई की औरतों ने पूछा, “किसके लिए इतना पैसा भेजती हो?” तो उसने बस धीरे से कहा था, “राजू, मोहित और गुड़िया के लिए।”

बस, फिर क्या था।

घर में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कोई कहता, काव्या के 3 बच्चे हैं, वह भी 3 अलग-अलग मर्दों से। कोई कहता, गांव से भागकर आई है। कोई कहता, ऐसी औरत घर में नौकरानी रहे तो ठीक, बहू बन जाए तो कुल का नाश कर दे।

अर्जुन ने सब सुना। लेकिन उसने काव्या में वह गंदगी कभी नहीं देखी जो लोग उसकी झोली में जबरदस्ती डाल रहे थे। उसने उसे अपने बीमार पिता के पैरों की मालिश करते देखा था। उसने उसे ड्राइवर की बेटी की फीस चुपचाप भरते देखा था। उसने उसे ठंडी रात में अपना शॉल बूढ़े चौकीदार को देते देखा था।

इसलिए जब उसने शादी का फैसला किया, तो किसी से अनुमति नहीं मांगी।

“अगर वे 3 बच्चे हैं, तो वे भी मेरे होंगे,” अर्जुन ने साफ कहा।

काव्या ने बहुत रोका।

“साहब, आप नहीं जानते मैं अपने साथ क्या लेकर चल रही हूं।”

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अर्जुन ने जवाब दिया, “तो मुझे भी वह बोझ उठाने दो।”

शादी छोटी थी, लेकिन अपमान बड़ा। रिश्तेदारों ने मिठाई खाते हुए ताने मारे। अर्जुन के चचेरे भाई हंसे, “भैया ने तो पूरा परिवार पैकेज में खरीद लिया।” नैना देवी ने कन्यादान के समय भी काव्या की तरफ नहीं देखा।

फेरे लेते वक्त काव्या रो रही थी। खुशी से नहीं। डर से।

उस रात, जब सारे मेहमान चले गए और काव्या दुल्हन के कमरे में बैठी थी, अर्जुन धीरे से उसके पास आया। कमरे में मोगरे की खुशबू थी, चांदी की थाली में दूध रखा था और बाहर ढोलक की आखिरी आवाज भी थम चुकी थी।

काव्या के हाथ कांप रहे थे।

अर्जुन ने सोचा, शायद वह उसके शरीर पर गरीबी, मजदूरी और मातृत्व के निशान देखेगा। वह तैयार था उसे वैसे ही अपनाने के लिए, जैसे वह थी।

लेकिन जब काव्या ने धीरे से भारी दुपट्टा हटाया और पीठ से ब्लाउज की डोरी ढीली की, अर्जुन पत्थर बन गया।

वहां गर्भ के निशान नहीं थे।

वहां जख्म थे।

लंबी, टेढ़ी, गहरी लकीरें। कंधे पर जलने का पुराना निशान। पसलियों के पास काले पड़े धब्बे। पीठ पर ऐसे दाग, जैसे किसी ने सालों तक एक बच्ची पर अपना गुस्सा उतारा हो।

काव्या ने तुरंत खुद को ढक लिया।

“माफ कर दीजिए,” उसने फुसफुसाकर कहा।

अर्जुन की सांस अटक गई।

“माफ किस बात की?”

“मैं वैसी नहीं हूं जैसी आपने सोची थी।”

अर्जुन की आंखें भर आईं।

“काव्या… राजू, मोहित और गुड़िया कौन हैं?”

काव्या ने नजरें झुका लीं।

“वे मेरे बच्चे नहीं हैं। मेरे छोटे भाई-बहन हैं।”

कमरे की हवा भारी हो गई।

“मां की मौत तब हुई जब मैं 16 साल की थी। सौतेला बाप, भैरव सिंह, शराब पीता था, जुआ खेलता था। फिर कर्ज चढ़ गया। उसने मेरे भाई-बहनों को बेचने की बात की। मैंने रास्ता रोक लिया।”

अर्जुन की मुट्ठियां कस गईं।

“ये सारे निशान उसी ने दिए?”

काव्या ने सिर हिला दिया।

“उसने गांव में फैला दिया कि वे मेरे बच्चे हैं। बोला, बदनाम लड़की की मदद कोई नहीं करता। मैं भागकर दिल्ली आई। पैसा दुर्गा मौसी को भेजती थी। वही उन्हें छिपाकर रखती थीं।”

उसने छोटी सी पोटली से 3 मुड़ी हुई तस्वीरें निकालीं। एक गंभीर लड़का, एक दुबला सा बच्चा और चोटी बांधे एक छोटी लड़की।

अर्जुन ने तस्वीरें हाथ में लीं।

“कल सुबह हम उन्हें लेने जाएंगे।”

काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

“नहीं। आप समझ नहीं रहे। भैरव अकेला नहीं है। उसे पता चला कि मैं आपसे शादी कर चुकी हूं, तो वह बच्चों को ढाल बना देगा।”

तभी दरवाजे पर 3 तेज दस्तकें हुईं।

बाहर से एक नौकरानी की घबराई आवाज आई, “सर… मैडम आपको नीचे बुला रही हैं। गेट पर एक आदमी आया है।”

काव्या की सांस रुक गई।

अर्जुन ने दरवाजा खोला।

“नाम क्या है उसका?”

नौकरानी ने कांपते हुए कहा, “भैरव सिंह।”

काव्या को लगा, उसकी बरसों की भागती हुई जिंदगी उसी रात उसे पकड़ने आ गई।

PART 2

काव्या अर्जुन का कोट ओढ़े सीढ़ियां उतरी। हर सीढ़ी उसे उस मिट्टी के घर में वापस ले जा रही थी, जहां उसने रोना भी दबाकर सीखा था, ताकि छोटे बच्चे डरकर जाग न जाएं।

हॉल में नैना देवी गुस्से से लाल थीं। गेट पर 2 गार्ड एक दुबले, खुरदरे चेहरे वाले आदमी को रोके खड़े थे। भैरव ने काव्या को देखा और हंसा।

“अरे वाह, काव्या रानी। नौकरानी से मालकिन।”

अर्जुन उसके आगे खड़ा हो गया।

“यह घर आपका नहीं है।”

भैरव ने फाइल निकाली।

“मैं तो जिम्मेदारी याद दिलाने आया हूं। यह लड़की 3 बच्चे छोड़कर भागी है। गांव में सब जानते हैं।”

नैना देवी ने अर्जुन की तरफ देखा।

“देखा? मैंने कहा था।”

अर्जुन गरजा, “मां, चुप रहिए।”

भैरव की हंसी थम गई।

“ठीक है, सीधी बात। 2 करोड़ रुपये। कल तक। नहीं तो मीडिया को बताऊंगा कि मल्होत्रा समूह का मालिक 3 बच्चों वाली नौकरानी से शादी कर बैठा।”

अर्जुन ने छत के कोने की तरफ देखा।

“आपने जबरन वसूली कैमरे और गवाहों के सामने की है।”

भैरव ने थूक निगला, पर मुस्कुराया।

“कानून से बचा लोगे? दुर्गा मौसी को नहीं बचा पाए।”

काव्या जड़ हो गई।

“दुर्गा मौसी को क्या हुआ?”

भैरव ने धीरे से कहा, “6 हफ्ते पहले मर गई। डर से दिल कमजोर पड़ गया होगा।”

काव्या अर्जुन से लिपटकर गिर पड़ी।

“मेरे बच्चे… मेरे भाई-बहन…”

सुबह पुलिस भैरव को ले गई, पर खबर उससे भी बुरी थी। दुर्गा मौसी का घर खाली था। कोई नहीं जानता था राजू, मोहित और गुड़िया कहां हैं।

तभी नैना देवी कांपती हुई आईं।

“मुझे कुछ बताना है।”

उन्होंने एक काला रजिस्टर खोला। उसमें नाम, रकम और ट्रांसफर की मुहरें थीं। एक पन्ने पर लिखा था:

राजू शर्मा।
मोहित शर्मा।
गुड़िया शर्मा।

नीचे मल्होत्रा फाउंडेशन की मुहर थी।

और हस्ताक्षर थे।

नैना देवी मल्होत्रा।

उसी पल अर्जुन का फोन बजा। निजी नंबर।

दूसरी तरफ से बच्ची की टूटी आवाज आई।

“दीदी…”

काव्या चीखी, “गुड़िया! कहां हो?”

बच्ची रोई, “एक आंटी कह रही हैं आज हमें नए घर ले जाएंगी…”

फिर किसी महिला की शांत आवाज आई।

“अपनी शादी मुबारक हो, श्रीमती मल्होत्रा। अब आकर अपने परिवार के बचे हुए टुकड़े ले जाइए।”

कॉल कट गई।

बाहर गेट के पार एक काली गाड़ी धीमे से गुजरी। पीछे की खिड़की पर एक छोटी हथेली चिपकी हुई थी।

PART 3

काव्या नंगे पांव दरवाजे की तरफ भागी। उसके पैरों में पायल थी, माथे पर सिंदूर था, लेकिन उस पल वह दुल्हन नहीं थी। वह वही 16 साल की लड़की थी, जिसने एक शराबी आदमी के सामने हाथ फैलाकर कहा था, “पहले मुझे मार, फिर इन्हें छूना।”

अर्जुन ने उसे बगीचे के बीच रोक लिया।

“वह गुड़िया थी! मैंने उसकी आवाज पहचानी!” काव्या चीख रही थी।

“हम उसे ढूंढेंगे,” अर्जुन ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में पहली बार मालिकों वाली ठसक नहीं थी। उसमें डर था। सच्चा, बेचैन, कांपता हुआ डर।

काली गाड़ी जा चुकी थी। गेट के बाहर बस टायरों के गीले निशान रह गए थे।

अर्जुन ने अपने सुरक्षा प्रमुख, वकीलों और दिल्ली पुलिस में एक वरिष्ठ अधिकारी को फोन किया। घर में शादी की फूलमालाएं अभी भी लगी थीं। गुलाब की पंखुड़ियां फर्श पर बिखरी थीं, जैसे किसी ने खुशी का गला घोंट दिया हो।

काव्या फोन को दोनों हाथों से पकड़े बैठी रही। उसे उम्मीद थी फिर कॉल आएगा। बस एक बार गुड़िया की आवाज सुनाई दे जाए। बस वह कह दे, “दीदी, जल्दी आओ।”

नैना देवी हॉल के बीच खड़ी थीं। रात भर जिस औरत ने काव्या को अपमानित किया था, वही अब काले रजिस्टर को छाती से लगाए थरथरा रही थी।

“मैंने सच में नहीं जाना,” उन्होंने टूटी आवाज में कहा। “तुम्हारे पिता के मरने के बाद बहुत कागज आए थे। फाउंडेशन, अनाथ बच्चों की मदद, गरीब परिवारों का पुनर्वास… हमारे पुराने वकील रघुवीर मेहरा सब समझाते थे। मैं बस हस्ताक्षर करती गई।”

अर्जुन ने उन्हें ऐसे देखा जैसे पहली बार उनकी मां से बड़ा कोई अपराध सामने खड़ा हो।

“मां, आपने पढ़े बिना बच्चों की जिंदगी पर साइन कर दिए?”

नैना देवी ने सिर झुका लिया।

“मुझे लगा हम दान कर रहे हैं।”

काव्या की आंखें सूखी थीं। आंसू खत्म नहीं हुए थे, पर उस पल गुस्सा उनसे बड़ा था।

“दान? जिन बच्चों की दीदी जिंदा थी, उन्हें अनाथ लिख दिया गया?”

नैना देवी के पास जवाब नहीं था।

रजिस्टर में पन्ने पलटे गए। कुछ नामों के आगे ‘प्रशिक्षण केंद्र’ लिखा था, कुछ के आगे ‘दत्तक परिवार’, कुछ के आगे ‘स्थानांतरण लंबित’। राजू, मोहित और गुड़िया के नाम के पास एक कोड था—“आशा निवास, रोहतक रोड।”

अर्जुन का चेहरा कठोर हो गया।

“यह जगह किसकी है?”

वकील ने जल्दी-जल्दी रिकॉर्ड निकाले। आशा निवास एक निजी बालगृह था, जो मल्होत्रा फाउंडेशन से सालों से अनुदान लेता था। कागजों में वह अनाथ और बेसहारा बच्चों के पुनर्वास का केंद्र था। असलियत कोई नहीं जानता था, या जानना नहीं चाहता था।

काव्या ने मेज पर हाथ मारा।

“चलते हैं। अभी।”

सुबह की रोशनी फैल रही थी, जब 3 गाड़ियां बंगले से निकलीं। अर्जुन आगे बैठा था, काव्या उसके साथ। पीछे पुलिस की गाड़ी और सुरक्षा टीम। नैना देवी ने भी जाने की जिद की।

“मैंने गलती की है,” उन्होंने कहा। “अब कम से कम भागूंगी नहीं।”

काव्या ने उनकी तरफ देखा भी नहीं।

रास्ते भर उसे दुर्गा मौसी याद आती रहीं। वही दुर्गा मौसी जो गांव के मंदिर में प्रसाद बांटती थीं, जिनकी झोपड़ी में उसके भाई-बहन छिपते थे। वह बूढ़ी औरत हर बार कहती थी, “बिटिया, तू पैसा भेजती रह। मैं उन्हें अपनी सांस तक बचाकर रखूंगी।”

और सचमुच, उन्होंने सांस तक बचाया। फिर किसी ने वह सांस भी छीन ली।

आशा निवास शहर से बाहर था। सफेद दीवारें, नीला गेट, अंदर तुलसी का चौरा, बाहर बोर्ड पर बड़े अक्षरों में सेवा और संस्कार की बातें। जगह इतनी शांत थी कि डर और गहरा लगने लगा।

एक औरत ने क्रीम रंग की साड़ी में उनका स्वागत किया। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो अपराधी लोग दानवीर बनते समय पहनते हैं।

“अर्जुन जी, अचानक?”

अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा, “राजू शर्मा, मोहित शर्मा और गुड़िया शर्मा कहां हैं?”

उसकी मुस्कान हल्की सी कांपी।

“हमारे पास ऐसे नाम के बच्चे नहीं हैं।”

काव्या आगे बढ़ी।

“कल रात मेरी बहन ने मुझे फोन किया था।”

“शायद आप भावुक हैं। शादी के बाद थकान भी—”

अर्जुन ने उसे बीच में काट दिया।

“एक शब्द और कहा तो आपकी हर फाइल अभी यहीं खुलवाऊंगा।”

नैना देवी ने काला रजिस्टर मेज पर पटक दिया।

“इनके ट्रांसफर पर मेरे हस्ताक्षर हैं। मैंने गलत किया, लेकिन अब मैं देखने आई हूं कि मेरे नाम से कौन सा पाप चल रहा है।”

औरत का चेहरा उतर गया।

उसी पल अंदर वाले गलियारे से एक चीख आई।

“दीदी!”

काव्या घूमी।

गुड़िया भागती हुई आ रही थी। उसके बाल उलझे थे, फ्रॉक मैली थी, और गाल पर उंगलियों के लाल नहीं, काले पड़े पुराने निशान थे। एक कर्मचारी ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन बच्ची छूटकर काव्या से आ लिपटी।

काव्या घुटनों के बल गिर गई।

“मेरी गुड़िया… मेरी बच्ची…”

गुड़िया ने उसके गले में चेहरा छिपा लिया।

“मुझे पता था आप आएंगी।”

फिर मोहित आया। वह पहले से बहुत दुबला था। उसकी आंख के पास सूजन थी। उसके पीछे राजू खड़ा था, 14 साल का लड़का, जो अचानक बड़ा बना दिया गया था। वह रोना नहीं चाहता था, पर होंठ कांप रहे थे।

काव्या ने तीनों को बांहों में भर लिया। इतने सालों तक उसने जिन तस्वीरों को छाती से लगाया था, वे अब सांस ले रहे थे, कांप रहे थे, उसे पकड़ रहे थे।

अर्जुन उस दृश्य को देखता रहा। उसकी आंखें नम थीं। उसने धीरे से सुरक्षा प्रमुख से कहा, “गेट बंद कर दो। कोई रिकॉर्ड बाहर नहीं जाएगा, कोई आदमी अंदर से नहीं भागेगा।”

पुलिस ने दफ्तर, स्टोररूम और पीछे के कमरों की तलाशी ली। फाइलों में सच्चाई सड़ी हुई मिली। गरीब बच्चों को कागजों में ‘अनाथ’ लिखा जाता था। जिन परिवारों के पास पैसा था, उन्हें ‘विशेष दान’ के बदले बच्चे दे दिए जाते थे। कुछ बच्चों को सिलाई, पैकिंग और पूजा सामग्री बनाने वाले कारखानों में भेजा जाता था, जिसे फाइलों में ‘कौशल प्रशिक्षण’ कहा जाता था।

भैरव सिंह बच्चों की जानकारी बेचता था। गांवों में बदनामी फैलाता था, परिवार तोड़ता था, और फिर कहता था कि बच्चे बेसहारा हैं। रघुवीर मेहरा, मल्होत्रा परिवार का पुराना वकील, इस पूरे जाल का दिमाग था। फाउंडेशन का पैसा ढाल था। बड़े नामों की छाया में छोटे बच्चों की आवाज दबा दी गई थी।

दुर्गा मौसी की मौत भी अब साधारण नहीं लग रही थी। पड़ोसियों ने बयान दिया कि उनकी मौत से पहले 2 आदमी आए थे। उन्होंने धमकाया था। उसी रात बच्चे गायब हुए। अगले दिन गांव में खबर फैली, “बूढ़ी का दिल बैठ गया।”

काव्या ने वह सुना तो उसकी आंखों में आंसू आए, लेकिन वह टूटी नहीं।

“उन्होंने मेरी सांस बचाई थी,” उसने कहा। “अब मैं उनकी सच्चाई बचाऊंगी।”

भैरव पहले ही हिरासत में था। रघुवीर मेहरा को उसी दोपहर एयरपोर्ट से पकड़ा गया। आशा निवास की संचालिका, 4 कर्मचारी और फर्जी दत्तक प्रक्रिया में शामिल दलाल गिरफ्तार हुए। कई फाइलें मीडिया तक पहुंचीं। अगले 48 घंटों में मल्होत्रा समूह की चमकदार इमारतों के पीछे छिपी दरारें देश ने देखीं।

मीडिया ने पहले वही सनसनी खोजी थी—एक अमीर मालिक, एक नौकरानी पत्नी और 3 बच्चों की कहानी। लेकिन उन्हें उससे बड़ा सच मिला। यह किसी औरत के चरित्र का मामला नहीं था। यह उन बच्चों का मामला था, जिन्हें गरीबी के कारण कागजों से मिटा दिया गया था।

नैना देवी ने कैमरों के सामने आकर बयान दिया।

“मैंने अफवाहों पर भरोसा किया। मैंने एक निर्दोष लड़की को अपमानित किया। मैंने कागज पढ़े बिना हस्ताक्षर किए, क्योंकि मुझे लगा हमारा नाम कभी गलत नहीं हो सकता। यह घमंड था। इस घमंड ने बच्चों को नुकसान पहुंचाया। मैं कानून के सामने भी जवाब दूंगी और समाज के सामने भी।”

काव्या ने प्रेस से बात नहीं की। उस दिन नहीं। उसके पास बोलने से ज्यादा जरूरी काम था—गुड़िया को खाना खिलाना, मोहित के घाव पर दवा लगाना, राजू को यह यकीन दिलाना कि अब उसे रात में पहरा देने की जरूरत नहीं।

उस रात जब वे मल्होत्रा बंगले लौटे, तो वही दरवाजा खुला जहां पिछली शाम काव्या को तानों के बीच लाया गया था। फर्क सिर्फ इतना था कि अब उसकी गोद में सोती हुई गुड़िया थी, मोहित उसकी साड़ी पकड़े चल रहा था और राजू अर्जुन के साथ कदम मिलाकर अंदर आया।

नौकर चुप थे। कुछ की आंखें झुकी थीं। कुछ रो रहे थे, क्योंकि उन्होंने भी कभी न कभी रसोई में वे बातें सुनी थीं और चुप रहे थे।

नैना देवी ने काव्या के सामने हाथ जोड़े।

“मैं आज माफी मांगने लायक भी नहीं हूं।”

काव्या ने बहुत देर तक उन्हें देखा।

“माफी मुझसे नहीं। उनसे मांगिए, जिन्हें आपने देखे बिना कागजों में अनाथ बना दिया।”

नैना देवी ने गुड़िया के पैरों के पास बैठकर सिर झुका दिया। गुड़िया डरकर काव्या से चिपक गई।

काव्या ने उसे सहलाया।

“डर मत। अब कोई तुझे कहीं नहीं ले जाएगा।”

अर्जुन ने उसी हफ्ते फाउंडेशन बंद कर दिया। उसकी जगह एक स्वतंत्र जांच समिति बनी, जिसमें बाल अधिकार कार्यकर्ता, वकील और पूर्व न्यायाधीश शामिल हुए। मल्होत्रा परिवार की कई संपत्तियां बेची गईं। जिन बच्चों का पता चल सकता था, उन्हें ढूंढने की प्रक्रिया शुरू हुई। कई परिवार रोते हुए अदालत पहुंचे। कई सच इतने पुराने थे कि पूरी तरह भरना संभव नहीं था, पर पहली बार किसी ने उन्हें झूठ कहकर बंद नहीं किया।

अर्जुन को भारी नुकसान हुआ। कुछ साझेदार चले गए। अखबारों ने लिखा कि मल्होत्रा समूह की साख टूट गई। लेकिन एक रात जब उसने देखा कि मोहित बिना चौंके सो रहा है, राजू ने पहली बार स्कूल जाने की बात की और गुड़िया ने काव्या की गोद में सिर रखकर कहा, “अब घर अच्छा है,” तब उसे लगा, जो टूटा था वह साख नहीं, अहंकार था।

कुछ महीने बाद काव्या अपने पुराने कस्बे लौटी। इस बार वह अकेली नहीं थी। उसके साथ अर्जुन था, 3 बच्चे थे, पुलिस थी और दुर्गा मौसी के लिए फूल थे। मिट्टी का वह घर आधा ढह चुका था। आंगन में टूटी चौकी थी, दीवार पर धुएं के निशान थे और कोने में एक छोटा सा तुलसी का गमला सूख चुका था।

काव्या वहीं बैठ गई।

“मौसी, मैं लौट आई,” उसने फुसफुसाया। “देर हो गई।”

राजू ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“दीदी, देर नहीं हुई। आप आईं।”

काव्या तब रोई। खुलकर। उस 16 साल की लड़की के लिए, जिसे गांव ने बदनाम कहा। उस बहन के लिए, जिसे मां बनना पड़ा। उस दुल्हन के लिए, जिसने शादी की रात अपने शरीर के जख्म दिखाते हुए माफी मांगी थी, जबकि गुनाह उसका था ही नहीं।

अर्जुन ने उसे रोने दिया। उसने कोई बड़ी बात नहीं कही, कोई वादा नहीं दोहराया। बस उसके पास बैठा रहा, जैसे कभी-कभी प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण यही होता है कि कोई टूटते समय भागे नहीं।

समय के साथ बच्चे स्कूल जाने लगे। गुड़िया ने चित्र बनाना शुरू किया। उसके हर चित्र में 4 लोग होते—दीदी, राजू, मोहित और एक लंबा आदमी, जिसका हाथ सबके ऊपर छत जैसा फैला होता। बाद में उसने नैना देवी को भी बनाना शुरू किया, लेकिन बहुत दूर खड़ी हुई। काव्या ने वह चित्र देखा तो मुस्कुराई नहीं, रोई भी नहीं। उसने बस गुड़िया से कहा, “दूरी भी कभी-कभी ठीक होने की शुरुआत होती है।”

जब समाज में फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा, “अर्जुन मल्होत्रा ने 3 बच्चों वाली नौकरानी से शादी की थी,” तो अर्जुन ने सबके सामने जवाब दिया,

“वे उसके बच्चे नहीं थे। वे उसके साहस की गवाही थे। और अगर मां होना जन्म देने से नहीं, बचाने से तय होता है, तो काव्या उनसे पहले ही मां थी।”

काव्या ने धीरे से अपनी पीठ के पुराने निशानों को छुआ। वे अब भी थे। मिटे नहीं थे। लेकिन पहली बार उन्हें देखते हुए उसे शर्म नहीं आई।

क्योंकि उसे समझ आ गया था—

बदनामी उसके हिस्से की नहीं थी।

बदनामी उन लोगों की थी, जिन्होंने एक जख्मी लड़की को चरित्रहीन कहा, ताकि अपने अपराध साफ दिखने से बचा सकें।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.