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जिस घर की छत माँ ने अपनी हवेली बेचकर बेटे को दी, उसी घर के पर्दे के पीछे वह सूखी रोटी खाते पकड़ी गई, और बहू की आवाज गूँजी: “यहाँ कोई आपका कर्जदार नहीं है”, तभी बेटे की आँखें खुल गईं हमेशा के लिए

PART 1

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“अगर आपकी माँ को इतनी ही भूख लगती है, राजीव, तो इन्हें बालकनी में बिठाकर खिला दिया करो, यह घर कोई बूढ़ों का लंगर नहीं है।”

शांति देवी ने यह वाक्य ड्रॉइंग रूम के पर्दे के पीछे सुना, जहाँ वह हाथ काँपते हुए सूखी रोटी का छोटा-सा टुकड़ा खा रही थीं। रोटी इतनी सख्त थी कि उनके दाँतों में दर्द हो रहा था, लेकिन पेट की आग उससे भी ज्यादा बेरहम थी। उनके सामने वही घर था, जिसकी डाउन पेमेंट के लिए उन्होंने जयपुर के पुराने मोहल्ले वाली अपनी छोटी-सी हवेली बेच दी थी। और अब उसी घर में उन्हें चोरी से खाना पड़ रहा था।

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दिल्ली के द्वारका सेक्टर 10 की ऊँची सोसायटी में राजीव, उसकी पत्नी नंदिता और 2 बच्चे, आरव और विहान रहते थे। बाहर से घर चमकता था—लकड़ी का मंदिर, काँच की डाइनिंग टेबल, दीवार पर परिवार की मुस्कुराती तस्वीरें। लेकिन उस तस्वीर में शांति देवी कहीं नहीं थीं। वह रात में फोल्डिंग गद्दे पर गलियारे में सोती थीं, जूतों की अलमारी और वॉशिंग मशीन के बीच, जहाँ सर्दियों में फर्श बर्फ जैसा ठंडा हो जाता था।

राजीव ने 1 साल पहले उनसे कहा था, “माँ, आप अपनी पुरानी जगह बेच दो। यहाँ हमारे साथ रहोगी, रानी बनाकर रखूँगा।”

शांति देवी ने यकीन कर लिया था। पति के गुजरने के बाद वही उनका सहारा था। उन्होंने सोचा था, बहू के हाथ की चाय, पोतों की हँसी, शाम को मंदिर की घंटी और बेटे का साथ—बुढ़ापा शायद इतना भी अकेला नहीं होगा।

लेकिन यहाँ आने के बाद उनका कमरा पहले स्टोर बना, फिर “बच्चों की पढ़ाई का कोना”, और अंत में उन्हें गलियारे का गद्दा दे दिया गया। नंदिता कहती, “मम्मीजी को खुली हवा चाहिए। कमरे में उनकी दवाइयों की गंध बच्चों को परेशान करती है।”

आरव और विहान ही थे जो अब भी उन्हें “दादी” कहकर गले लगाते थे।

सुबह दोनों स्कूल के लिए भागते हुए उनके पास रुकते।

“दादी, रात को ठंड लगी?” आरव पूछता।

शांति देवी मुस्कुराकर सिर हिला देतीं। “नहीं बेटा, मैं तो मजबूत हूँ।”

लेकिन विहान उनके पैरों पर पड़ी नीली नसें देखता और चुप हो जाता।

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खाने का समय सबसे कठिन था। नंदिता पहले राजीव की थाली सजाती—गरम पराठे, पनीर, दही, अचार। बच्चों के लिए सैंडविच और फल। अपने लिए बादाम वाला दूध। शांति देवी के लिए कभी दलिया, कभी उबली लौकी, कभी पानी जैसी खिचड़ी।

“आपकी उम्र में मसाला नहीं चलता,” नंदिता कहती। “फिर गैस होगी, फिर डॉक्टर, फिर सबको परेशान करोगी।”

शांति देवी को 3 साल पहले हल्का लकवा पड़ा था। उनका दायाँ हाथ काँपता था। कभी चम्मच गिर जाती, तो नंदिता होंठ सिकोड़कर कहती, “थोड़ा सलीका भी होना चाहिए। बच्चे क्या सीखेंगे?”

“बहू, हाथ अपने आप काँपता है,” वह धीरे से कहतीं।

“चलना-फिरना छोड़ोगी तो काँपेगा ही। पार्क में देखो, आपकी उम्र की औरतें योगा करती हैं।”

शांति देवी चुप हो जातीं। वह राजीव को परेशान नहीं करना चाहती थीं। राजीव गुड़गाँव की एक निजी कंपनी में काम करता था, देर रात लौटता था, और उसे लगता था कि नंदिता सचमुच घर संभाल रही है।

लेकिन बच्चे सब देख रहे थे।

एक दोपहर विहान ने अपने टिफिन का आधा आलू पराठा उनकी शॉल में छिपा दिया।

“दादी, रात में खाना न मिले तो खा लेना,” उसने फुसफुसाकर कहा।

शांति देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा, लेकिन हाथ इतना काँपा कि बच्चा और उदास हो गया।

उसी रात नंदिता ने उन्हें पर्दे के पीछे सूखी रोटी खाते पकड़ लिया।

“फिर से छिप-छिपकर निगल रही हैं?” उसकी आवाज धीमी थी, पर उसमें जहर था। “कितना खाएँगी आप? फिर बीमार पड़ेंगी और हमें उठाना पड़ेगा।”

“बहू, भूख लगी थी,” शांति देवी ने कहा।

“भूख?” नंदिता हँसी। “यहाँ कोई आपका कर्जदार नहीं है। बहुत कर रहे हैं जो सिर पर छत दे रखी है।”

उस रात पहली बार शांति देवी ने सिर उठाया।

“यह छत मेरी बेची हुई हवेली के पैसों से आई है।”

नंदिता का चेहरा सफेद पड़ गया। फिर वह पास आकर बोली, “बहुत याद आ रही है हवेली? किसी दिन वृद्धाश्रम छोड़ आऊँगी, वहाँ खूब रानी बनना।”

शांति देवी ने काँपते हाथ से अपना डंडा पकड़ा।

“वहाँ भेजोगी नहीं, क्योंकि मेरी पेंशन का कार्ड तुम्हारे पास है।”

नंदिता की आँखों में डर से ज्यादा गुस्सा चमका। उसने प्लेट उठाकर सिंक में पटक दी। आवाज पूरे घर में गूँज गई।

शांति देवी उस रात गलियारे में जागती रहीं। बाहर सोसायटी की लाइटें चमक रही थीं, लेकिन भीतर उनका मन बुझ चुका था। उन्हें पहली बार समझ आया कि वह घर में नहीं, अपने ही त्याग की कैद में रह रही हैं।

और अगली सुबह जो हुआ, उसने उस कैद की दीवार में पहली दरार डाल दी।

PART 2

अगली सुबह नंदिता ने सबके लिए पोहा, चाय और बच्चों के लिए मलाई टोस्ट बनाया। शांति देवी की जगह पर उसने खाली कटोरी रख दी।

“आज आपका पेट साफ रहेगा,” उसने बिना देखे कहा। “कल बहुत चोरी-चोरी खा लिया था।”

आरव ने चम्मच मेज पर पटक दी। विहान की आँखें भर आईं। लेकिन राजीव पहले ही ऑफिस निकल चुका था।

बच्चों के स्कूल जाते ही शांति देवी ने अपने पुराने जयपुर वाले पड़ोस की सहेली कमला को फोन किया।

“कमला,” वह रो पड़ीं, “मैंने घर बेचकर गलती कर दी।”

उधर कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर कमला बोली, “तो मेरे पास आ जा। मेरा बेटा पुणे में है, घर खाली है। रोटी आधी होगी तो बाँट लेंगे, पर इज्जत पूरी होगी।”

शांति देवी की साँस अटक गई। पहली बार उन्हें लगा कि शायद कहीं एक मेज ऐसी भी है जहाँ उन्हें खाने से पहले अनुमति नहीं माँगनी पड़ेगी।

उसी सप्ताह राजीव का 42वाँ जन्मदिन था। उसने घर पर छोटा-सा सत्संग और भोजन रखने की बात कही। नंदिता भड़क उठी।

“लोग देखेंगे कि आपकी माँ गलियारे में सोती हैं। मेरी बेइज्जती करवानी है?”

“तो गलियारे में क्यों सोती हैं?” राजीव ने पहली बार पूछा।

नंदिता चुप रह गई।

जन्मदिन के दिन उसने शांति देवी को बेडरूम में बंद कर दिया। “मेहमानों के सामने मत आना। रोनी सूरत से माहौल खराब हो जाएगा।”

लेकिन आरती के बाद राजीव खुद दरवाजा खोलकर अंदर आया।

“माँ, बाहर चलो। आज सबको मेरे जीवन की सबसे बड़ी वजह से मिलना है।”

वह उन्हें हाथ पकड़कर बाहर लाया। मेहमानों के सामने राजीव ने कहा, “यह घर मेरी माँ की कुर्बानी से बना है। मैं आज जो हूँ, इनके कारण हूँ।”

तालियाँ बजीं। आरव और विहान उनसे लिपट गए।

नंदिता की आँखों में अपमान जल उठा।

अगले दिन राजीव ऑफिस से अचानक लौटा। दरवाजा आधा खुला था। अंदर से नंदिता की चीख सुनाई दी।

“बेशर्म बूढ़ी औरत! फ्रिज से ब्रेड निकालने की हिम्मत कैसे हुई?”

राजीव ने अंदर कदम रखा। शांति देवी मेज के पास खड़ी थीं, हाथ में आधी ब्रेड, चेहरा डर से काँपता हुआ।

“मेरी माँ को इस घर में खाने के लिए इजाजत चाहिए?” राजीव की आवाज पत्थर जैसी थी।

नंदिता जम गई।

“कल सुबह यह सब खत्म होगा,” उसने कहा।

और उस रात नंदिता पहली बार सचमुच डर गई।

PART 3

सुबह 8 बजे दरवाजे की घंटी बजी। नंदिता ने सोचा दूधवाला होगा, लेकिन बाहर 3 आदमी खड़े थे—एक नई लकड़ी की पलंग, छोटा फ्रिज, अलमारी और एक आरामकुर्सी लेकर। उनके पीछे राजीव था, आँखों में नींद नहीं, फैसला था।

“यह सब कहाँ रखना है, सर?” एक आदमी ने पूछा।

राजीव ने बेडरूम की ओर इशारा किया। “अंदर।”

नंदिता बाथरूम से निकली ही थी। गीले बालों से पानी टपक रहा था। उसने पलंग देखकर चिल्लाया, “यह क्या हो रहा है?”

“माँ का कमरा बन रहा है,” राजीव ने शांत स्वर में कहा।

“वह हमारा कमरा है।”

“था।”

शांति देवी गलियारे के गद्दे पर बैठी थीं। उन्होंने घबराकर कहा, “बेटा, मेरे लिए घर मत तोड़।”

राजीव उनके सामने घुटनों पर बैठ गया। पहली बार वह अपने ही घर में बच्चे जैसा लग रहा था।

“माँ, घर तब टूट चुका था जब आप जूतों के पास सो रही थीं और मैं चैन से सो रहा था। मैंने आपको नहीं देखा, यही मेरी सबसे बड़ी गलती है।”

नंदिता का चेहरा तमतमा गया। “आप मुझे सबके सामने खलनायक बना रहे हैं। मैं ही इस घर को संभालती हूँ। उनकी दवा, उनका खाना, सब मैं देखती हूँ।”

आरव कमरे के दरवाजे पर खड़ा था। उसने धीमे से कहा, “मम्मी, दादी को खाना नहीं मिलता था।”

नंदिता ने उसे घूरा, “तुम चुप रहो।”

लेकिन इस बार विहान भी बोल पड़ा, “मैंने दादी को अपना टिफिन दिया था। उन्हें रात में भूख लगती थी।”

कमरे में ऐसा सन्नाटा छाया जैसे किसी ने दीवारों से रंग खींच लिया हो। राजीव ने बच्चों की ओर देखा, फिर अपनी पत्नी की ओर। अब उसे किसी और सबूत की जरूरत नहीं थी, फिर भी उसके पास सबूत थे।

उसने मेज पर एक छोटी नोटबुक रखी। “यह विहान की ड्रॉइंग कॉपी है। उसने हर दिन लिखा है कि दादी ने क्या खाया। 6 दिन सिर्फ दलिया। 3 दिन रात का खाना नहीं। 1 दिन खाली चाय। मैंने तुम्हारी आँखों पर भरोसा किया, अपने बच्चों की आँखों को नजरअंदाज किया।”

नंदिता पीछे हट गई। “बच्चे बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं।”

राजीव ने दूसरा कागज निकाला—बैंक स्टेटमेंट। “माँ की पेंशन हर महीने तुम्हारे ऑनलाइन खर्चों में जा रही थी। ब्यूटी पार्लर, किटी पार्टी, साड़ी, फर्नीचर। माँ के डॉक्टर की दवा 2 महीने से नहीं खरीदी गई।”

शांति देवी ने सिर झुका लिया। उन्हें अपने अपमान से ज्यादा बेटे की टूटती हुई आवाज दुख दे रही थी।

“राजीव, रहने दे,” उन्होंने कहा। “झगड़ा मत बढ़ा।”

“नहीं माँ,” वह बोला, “गलत को चुप रहकर छोटा नहीं किया जाता। वह और बड़ा हो जाता है।”

उस दिन बेडरूम खाली किया गया। शांति देवी के लिए खिड़की के पास पलंग लगा। छोटा फ्रिज रखा गया, जिसमें राजीव ने खुद फल, दही, ब्रेड, मक्खन, दालिया नहीं, बल्कि उनकी पसंद की कचौरी और बेसन के लड्डू भी रखे। उसने पेंशन कार्ड वापस उनकी हथेली में रखा।

“अब यह आपका है। किसी को छूने का हक नहीं।”

शांति देवी ने कार्ड को ऐसे पकड़ा जैसे किसी ने उनकी पहचान वापस दे दी हो।

नंदिता का सामान गलियारे में नहीं फेंका गया, लेकिन राजीव ने साफ कहा, “जब तक तुम समझ नहीं पाती कि गलियारे का दर्द क्या होता है, तुम इसी छोटे कमरे में रहोगी। माँ का अपमान करने वाली कोई सुविधा तुम्हें अधिकार से नहीं मिलेगी।”

नंदिता ने इसे सजा समझा। उसने 2 दिन खाना नहीं खाया, मायके फोन किया, रोई, खुद को पीड़ित बताया। उसकी माँ ने भी पहले कहा, “सासें तो ऐसी ही नाटक करती हैं।” लेकिन जब राजीव ने बैंक स्टेटमेंट और बच्चों की बातें उन्हें भेजीं, उधर भी आवाज धीमी पड़ गई।

तीसरे दिन नंदिता रात में पानी लेने उठी। गलियारे में पुराना गद्दा अभी भी पड़ा था। उसने उस पर बैठकर देखा। फर्श से ठंड शरीर में चढ़ी। वॉशिंग मशीन की नमी, जूतों की गंध, दरवाजे से आती हवा—सबने उसे घेर लिया। सिर्फ 10 मिनट में उसकी पीठ दुखने लगी। उसे याद आया कि शांति देवी यहाँ 1 साल सोई थीं।

उसके भीतर कुछ पहली बार सच में टूटा।

पर पछतावा तुरंत प्रेम नहीं बनता। वह कई दिनों तक चुप रही। शांति देवी के कमरे के बाहर बच्चों की हँसी सुनती। आरव होमवर्क लेकर दादी के पास बैठता। विहान उन्हें मोबाइल में भजन सुनाता। दादी कभी अपनी जयपुर वाली हवेली की बातें करतीं—नीले दरवाजे वाला आँगन, तुलसी का चौरा, कच्ची कैरी का अचार, तीज पर झूला। बच्चे मंत्रमुग्ध होकर सुनते।

राजीव रात को दवा देकर उनके पैरों में तेल लगाता। हर बार उसकी आँखें भीग जातीं।

“माँ, मैं कितना अंधा था,” वह कहता।

शांति देवी उसके सिर पर हाथ रखतीं। “बेटे देर से जागे तो भी सुबह होती है।”

एक शनिवार को कमला दिल्ली आ पहुँची। वह हल्की हरी साड़ी में थीं, हाथ में घर का बना गोंद का लड्डू और चेहरे पर ऐसी दृढ़ता थी जैसे किसी अदालत का फैसला लेकर आई हों।

“शांति,” उन्होंने दरवाजे पर ही आवाज दी, “तेरी दोस्त लेने आई है। चल, जयपुर नहीं तो कम से कम मेरे खाली घर में इज्जत से साँस ले।”

शांति देवी की आँखें चमक उठीं। दोनों सहेलियाँ गले मिलीं और देर तक छूटती नहीं थीं। नंदिता रसोई के पास खड़ी सब देख रही थी। उसे पहली बार शांति देवी किसी बोझ की तरह नहीं, किसी की प्यारी दोस्त की तरह दिखीं।

रात को कमला ने राजीव से कहा, “बेटा, तू बुरा नहीं है, पर तूने देर कर दी। तेरी माँ को शांति चाहिए। मेरे घर में एक कमरा खाली है, मंदिर पास है, पुरानी सहेलियाँ हैं। दो बूढ़ी औरतें साथ रहेंगी तो अकेलापन आधा हो जाएगा।”

राजीव के चेहरे पर दर्द उतर आया। “मौसी, यह भी उनका घर है।”

शांति देवी ने बेटे की ओर देखा। “हाँ, है। लेकिन घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता। यहाँ मेरा डर अभी दीवारों में बसा है। मुझे कुछ दिन ऐसी जगह चाहिए जहाँ कोई मेरी थाली न गिने।”

राजीव ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द गले में अटक गए।

अगली सुबह शांति देवी ने अपना छोटा बैग बाँधा। उसमें 3 साड़ियाँ, दवाइयाँ, पति की पुरानी तस्वीर, पेंशन कार्ड और विहान की दी हुई ड्रॉइंग कॉपी थी। आरव रो पड़ा।

“दादी, आप हमें छोड़कर जा रही हो?”

“नहीं बेटा,” उन्होंने उसे सीने से लगाया। “मैं खुद को वापस लेने जा रही हूँ। तुम जब चाहो आना।”

विहान ने पूछा, “वहाँ आपको खाना मिलेगा ना?”

शांति देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, और मैं खुद पराठा बनाकर खाऊँगी।”

दरवाजे पर नंदिता खड़ी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। वह कुछ देर तक बोल नहीं पाई। फिर अचानक वह शांति देवी के पैरों में बैठ गई।

“मम्मीजी, माफ कर दीजिए। मुझे समझ नहीं आता मैं इतनी कठोर कैसे हो गई। मुझे लगता था घर, पैसे, जिम्मेदारियाँ सब मेरे सिर पर हैं, और मैंने आपको ही बोझ मान लिया। लेकिन बोझ आप नहीं थीं, मेरी सोच थी।”

शांति देवी ने उसे तुरंत नहीं उठाया। वह लंबा मौन नंदिता के लिए किसी थप्पड़ से कम नहीं था। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “मैं तुझे टूटता हुआ नहीं देखना चाहती। बस इतना याद रख, जिस दिन कोई बूढ़ा आदमी रोटी माँगे, उसे एहसान मत समझना। वह शायद वही हाथ हो जिसने किसी समय पूरा घर खिलाया था।”

नंदिता फूट-फूटकर रो पड़ी।

कमला शांति देवी को लेकर चली गईं। घर में पहली बार खालीपन ऐसा था जिसे किसी महंगे फर्नीचर से नहीं भरा जा सकता था। गलियारे का गद्दा हटा दिया गया, लेकिन उसकी जगह पर जो शर्म बची थी, वह कई दिनों तक सबको दिखती रही।

राजीव ने परिवार के नियम बदले। बच्चों के सामने उसने कहा, “इस घर में कोई बुजुर्ग, बच्चा या बीमार व्यक्ति उपकार पर नहीं रहेगा। खाना अधिकार है, दया नहीं।”

नंदिता ने काउंसलर से मिलना शुरू किया। उसने किटी पार्टी बंद की, पेंशन का पूरा हिसाब लिखकर शांति देवी को भेजा और बैंक में अलग खाता खुलवाने में मदद की। पहले-पहल उसके संदेशों का कोई जवाब नहीं आता था। फिर एक दिन शांति देवी ने सिर्फ 2 शब्द भेजे—“खुश रहो।”

वह 2 शब्द नंदिता को रात भर रुलाते रहे।

2 हफ्ते बाद रविवार को पूरा परिवार कमला के घर गया। नंदिता ने अपने हाथ से सूजी का हलवा बनाया था। रास्ते भर वह चुप रही। उसके भीतर डर था कि शांति देवी दरवाजा खोलकर लौटा देंगी। लेकिन दरवाजा खुला तो सामने वही शांत चेहरा था, बस अब उसमें डर नहीं था।

कमला का घर साधारण था—छोटा आँगन, गमलों में तुलसी और मोगरा, दीवार पर पुराना कैलेंडर, रसोई से आती अदरक वाली चाय की खुशबू। मेज पर गरम पूरी, आलू की सब्जी, अचार और हलवा रखा था। शांति देवी ने अपने लिए प्लेट खुद भरी। यह दृश्य देखकर राजीव की आँखें भर आईं।

नंदिता ने धीरे से हलवा आगे बढ़ाया। “यह मैंने बनाया है। अगर आप खाएँ तो मुझे अच्छा लगेगा।”

शांति देवी ने कटोरी ली, एक चम्मच खाया और बस इतना कहा, “चीनी थोड़ी कम है, लेकिन कोशिश सच्ची है।”

कमरे में हल्की हँसी फैल गई। तनाव की गाँठ पूरी तरह नहीं खुली, पर ढीली जरूर पड़ गई।

बच्चे आँगन में खेल रहे थे। राजीव बाहर सड़क पर टहलने निकला। दो गलियों बाद उसने एक छोटी-सी कोठी देखी, जिसके नीले गेट पर “बिकाऊ” लिखा था। आँगन में अमरूद का पेड़ था। बरामदे में धूप गिर रही थी। उसे अचानक अपनी माँ की जयपुर वाली हवेली याद आ गई।

वह लौटकर आया तो कमला मुस्कुरा रही थीं, जैसे सब समझ गई हों।

“घर देख आए?” उन्होंने पूछा।

राजीव ने माँ की ओर देखा। “अगर आप चाहें तो हम यहाँ पास में एक छोटा घर ले सकते हैं। आपका अपना। जहाँ आप रहें, हम आएँ, बच्चे रहें, पर कोई आपकी थाली, आपकी नींद, आपकी इज्जत पर अधिकार न जमाए।”

शांति देवी की आँखें भर आईं। “अपना घर फिर से?”

“हाँ माँ,” राजीव बोला, “इस बार आपके नाम पर।”

नंदिता ने आगे बढ़कर शांति देवी का हाथ पकड़ा। इस बार उसकी पकड़ में दिखावा नहीं था। “और इस बार कोई गलियारा नहीं होगा।”

शांति देवी ने खिड़की से बाहर देखा। धूप आँगन में फैली थी। आरव और विहान हँसते हुए मोगरे के गमले के पास भाग रहे थे। कमला चाय छान रही थीं। राजीव अपराधबोध और उम्मीद के बीच खड़ा था। नंदिता की आँखों में शर्म थी, पर उस शर्म में बदलने की गुंजाइश भी थी।

शांति देवी जानती थीं कि 1 साल की भूख, अपमान और ठंडी रातें कभी पूरी तरह मिटेंगी नहीं। कुछ घाव उम्र के साथ त्वचा नहीं, आत्मा पर जम जाते हैं। लेकिन उस दिन उन्होंने पहली बार महसूस किया कि न्याय हमेशा शोर करके नहीं आता। कभी-कभी वह बस एक चाबी बनकर लौटता है—अपने नाम की, अपने कमरे की, अपनी थाली की।

और उस दोपहर, सबके सामने, बिना डर, बिना छिपे, शांति देवी ने पूरी 2 पूरियाँ खाईं, थोड़ा हलवा लिया, फिर मुस्कुराकर बोलीं, “आज पेट ही नहीं, मन भी भर गया।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.