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घायल जवानों के बीच खड़ी शांत नर्स को सब कमजोर समझते रहे, लेकिन जब उसने 800 मीटर दूर छिपे निशानेबाज को गिराया, कमांडर कांप उठा—“तुम सच में कौन हो?

भाग 1

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गोलियों की बरसात के बीच जब चौकी रक्षक के सारे जवान मौत का इंतज़ार कर रहे थे, उसी समय सफेद दुपट्टे वाली शांत नर्स ने घायल स्नाइपर की बंदूक उठाई और सबकी सांसें थम गईं।

कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों के बीच बनी वह चौकी किसी पोस्ट से ज़्यादा एक सज़ा जैसी लगती थी। चारों तरफ कंटीली तारें, पत्थर, धूल, बर्फ की ठंडी हवा और नीचे फैली घाटी, जहां दिन में भी सन्नाटा डराता था। वहां 21 राजपूताना राइफल्स की टुकड़ी पिछले 5 महीनों से तैनात थी। जवान थके हुए थे, नींद से टूटे हुए थे, लेकिन उनकी आंखों में अभी भी वही जिद थी जो सीमा पर खड़े आदमी को जिंदा रखती है।

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उस चौकी के छोटे से चिकित्सा तंबू की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट अनन्या राव के पास थी। 30 साल की अनन्या शांत स्वभाव की थी। गोरा चेहरा, सख्त बंधे बाल, सफेद दुपट्टा और आंखों में ऐसी नरमी कि घायल जवान उसे देखकर आधा दर्द भूल जाते थे। वह कम बोलती थी, लेकिन जब बोलती थी तो जैसे टूटते मन पर पट्टी रख देती थी।

सूबेदार मेजर अर्जुन राणा उसे लेकर बेहद सतर्क रहते थे। हर गश्त से पहले जवानों से कहते, “डॉक्टर मैडम पर एक खरोंच भी आई तो याद रखना, पहाड़ तुम्हें छोड़ देगा, मैं नहीं।”

जवान उसे सचमुच अपने बीच की फरिश्ता मानते थे। सिपाही फैज़ान, जो सिर्फ 21 साल का था, एक बार मोर्टार के टुकड़े से बुरी तरह घायल हुआ था। सब घबरा गए थे, मगर अनन्या ने बिना कांपे उसकी पट्टी की थी।

“मेरी तरफ देखो फैज़ान,” उसने धीरे से कहा था, “डरना नहीं। सांस लेते रहो। तुम घर जाओगे।”

लेकिन उसके बारे में कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें कोई समझ नहीं पाया। हवलदार करण ठाकुर, टुकड़ी का सबसे तेज निशानेबाज, एक बार अपनी लंबी दूरी की राइफल साफ कर रहा था। उसका निशाना बार-बार दाईं तरफ खिसक रहा था। अनन्या पास से गुजरी और बिना रुके बोली, “ऊपरी छल्ला ज़्यादा कस दिया है। आधा घुमा कर ढीला करो, वरना निशाना सांस के साथ भागेगा।”

करण हैरान रह गया। उसने वैसा ही किया और बंदूक तुरंत संतुलित हो गई।

जब उसने यह बात अर्जुन राणा को बताई तो राणा हंस पड़े। “वो नर्स है, बेटा। पढ़ी-लिखी है। तुम अपनी शान बचाओ।”

लेकिन करण ने देखा था कि मोर्टार अलार्म बजते ही अनन्या झुकती नहीं थी, वह दिशा गिनती थी। धमाके से पहले उसका चेहरा डरता नहीं था, गणना करता था। वह चलती भी ऐसी थी कि पत्थर तक आवाज न करें।

किसी को नहीं पता था कि अनन्या राव सिर्फ नर्स नहीं थी। उसकी चिकित्सा डिग्री असली थी, उसकी वर्दी असली थी, लेकिन उसका असली काम किसी फाइल में खुला नहीं था। वह एक गुप्त संयुक्त कमान की प्रशिक्षित अधिकारी थी, जिसे घाटी में छिपे कुख्यात बारूदी जाल विशेषज्ञ “उस्ताद” के नेटवर्क का पता लगाने भेजा गया था। उसका आदेश साफ था, किसी लड़ाई में शामिल नहीं होना, सिर्फ पहचानना, सूचना देना और गायब हो जाना।

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फिर 14 अगस्त की सुबह गश्ती दल दर्रा 17 की ओर निकला। सूबेदार मेजर अर्जुन, हवलदार करण और सिपाही फैज़ान आगे की गाड़ी में थे। जाते समय अर्जुन ने हंसकर कहा, “चाय गरम रखना, डॉक्टर मैडम। दोपहर तक लौट आएंगे।”

2 घंटे बाद संचार यंत्र चीख उठा।

“हम घिर गए हैं… ऊपर से भारी फायर… करण साहब घायल… कोई बाहर निकला तो खत्म…”

अनन्या ने बिना किसी से अनुमति मांगे अपना भारी चिकित्सा बैग उठाया, बुलेटरोधी जैकेट पहनी और राहत दल की गाड़ी में चढ़ गई।

एक जवान चिल्लाया, “मैडम, वहां मौत है!”

अनन्या की आवाज पहली बार बर्फ जैसी ठंडी थी।

“मेरे जवान वहां हैं। गाड़ी चलाओ।”

भाग 2

दर्रा 17 पहुंचते ही राहत दल को समझ आ गया कि यह कोई सामान्य हमला नहीं था। रास्ते की पहली गाड़ी धुएं में डूबी थी। बाकी जवान पत्थरों के पीछे फंसे थे। दोनों तरफ ऊंची चट्टानों से गोलियां बरस रही थीं। सबसे खतरनाक था पहाड़ी की पूर्वी धार पर छिपा दुश्मन निशानेबाज। जो भी सिर उठाता, गोली उसके पास पत्थर तोड़ती हुई निकलती। अर्जुन राणा के कंधे पर चोट थी, मगर वह अभी भी आदेश दे रहे थे। उन्होंने अनन्या को देखते ही गरजकर कहा, “नीचे रहिए! करण उधर गिरा है, पर कोई पहुंच नहीं पा रहा।” अनन्या ने देखा, करण एक टूटी दीवार के पास पड़ा था। उसकी राइफल हाथ से दूर गिरी थी। वह सांस लेने की कोशिश कर रहा था। अनन्या ने बस इतना कहा, “कवर दो।” अर्जुन ने रोकना चाहा, पर वह दौड़ चुकी थी। गोली उसके जूते के पीछे मिट्टी उछालती हुई निकली। दूसरी गोली ने उस पत्थर को तोड़ा जहां उसका सिर 1 पल पहले था। वह घुटनों के बल फिसलती हुई करण तक पहुंची, उसका घाव बंद किया, सांस की जांच की और उसे दीवार के नीचे खींच लिया। करण की आंखें आधी खुलीं। “मैडम… भाग जाइए…” अनन्या ने सख्ती से कहा, “चुप रहो। अभी तुम मरने की इजाजत नहीं रखते।” फिर उसने ऊपर देखा। दुश्मन स्नाइपर की वजह से राहत दल भी फंस चुका था। भारी मशीनगन पश्चिमी धार से गाड़ियों को काट रही थी। हवा तेज थी, दूरी लंबी थी, और कोई भी जवाबी निशाना नहीं लगा पा रहा था। तभी एक गोली पास खड़े जवान के हाथ को छूती निकल गई। अनन्या की आंखें एक पल के लिए बंद हुईं। उसके गुप्त आदेश, उसका मिशन, उसकी पहचान, सब दिमाग में कौंधे। अगर उसने बंदूक उठाई तो 5 महीनों का भेद खत्म हो जाता। मगर अगले ही पल उसने करण की राइफल उठाई। अर्जुन राणा ने दूर से देखा और उनका चेहरा पीला पड़ गया। नर्स अब नर्स जैसी नहीं बैठी थी। वह मिट्टी में पेट टिकाकर ऐसे स्थिर हुई जैसे यही उसका असली घर हो। उसने सांस रोकी, हवा पढ़ी, ढलान नापी और बिना दूरबीन की कुंडी घुमाए ट्रिगर दबा दिया। 800 मीटर दूर पहाड़ी पर छिपा दुश्मन निशानेबाज पीछे की तरफ गिर पड़ा। संचार यंत्र में अनन्या की आवाज गूंजी, “पहला खतरा समाप्त।” अर्जुन राणा ने फुसफुसाकर कहा, “हे भगवान… ये कौन है?”

भाग 3

पहला निशाना गिरते ही दर्रा 17 की हवा बदल गई। कुछ पल पहले तक जो घाटी भारतीय जवानों की कब्र बनने वाली थी, वही घाटी अब दुश्मन के लिए जाल बन गई। पूर्वी धार पर छिपा निशानेबाज चुप हो चुका था, लेकिन पश्चिमी पहाड़ी पर लगी भारी मशीनगन अभी भी गाड़ियों की लोहे की देह पर आग बरसा रही थी। गोलियों की आवाज पत्थरों से टकराकर ऐसी लौट रही थी जैसे पूरा पहाड़ चिल्ला रहा हो।

अनन्या ने करण की नब्ज फिर से देखी। उसकी सांस कमजोर थी, मगर चल रही थी। उसने पट्टी कसते हुए धीमे स्वर में कहा, “बस थोड़ी देर और, करण। तुम्हारा काम आज मैं करूंगी।”

करण ने धुंधली आंखों से उसे देखा। वह समझ नहीं पा रहा था कि सामने बैठी वही शांत नर्स है, जो रातों को घायल जवानों को दवा देकर कहानियां सुनाती थी, या कोई ऐसी योद्धा जिसे वह कभी पहचान ही नहीं पाया।

संचार यंत्र पर अर्जुन राणा की आवाज आई, “डॉक्टर मैडम, भारी मशीनगन अभी भी सक्रिय है। हमारे 4 जवान दूसरी गाड़ी के पीछे फंसे हैं। हम आगे नहीं बढ़ पा रहे।”

अनन्या ने जवाब दिया, “पश्चिमी धार पर 2 आदमी हैं। एक गनर, एक लोडर। तीसरा पीछे गोला-बारूद दे रहा है। 10 सेकंड तक उनका ध्यान भटकाइए।”

अर्जुन राणा के मुंह से बिना सोचे निकला, “जी।”

उन्हें खुद समझ नहीं आया कि उन्होंने एक नर्स को “जी” क्यों कहा। मगर उस आवाज में आदेश था, अनुभव था, और ऐसी ठंडक थी जो सिर्फ लंबे प्रशिक्षण से आती है।

अर्जुन ने अपने जवानों को इशारा किया। 3 दिशाओं से जवाबी फायर शुरू हुआ। दुश्मन मशीनगन का मुंह क्षणभर के लिए दाईं ओर मुड़ा। उसी पल अनन्या ने राइफल का रुख बदला। हवा अब सामने से आ रही थी। धूल की पतली लकीरें पत्थरों के ऊपर घूम रही थीं। दूरी लगभग 420 मीटर थी। उसने सांस छोड़ी, आधी रोकी और ट्रिगर दबाया।

मशीनगन चलाने वाला आदमी वहीं ढह गया।

दूसरा आदमी उसकी जगह पकड़ने के लिए झुका। अनन्या ने फिर ट्रिगर दबाया। वह भी गिर पड़ा।

तीसरा आदमी भागने लगा। अनन्या ने उसे नहीं मारा। उसने उसके पैर के पास पत्थर तोड़ा। आदमी डरकर पीछे गिरा और हथियार छोड़कर चट्टानों की आड़ में रेंगता हुआ गायब हो गया। उसके पास लड़ने का साहस नहीं बचा था।

“भारी मशीनगन चुप है,” अनन्या ने कहा, “बाईं तरफ सूखी नाली से 4 लोग नीचे उतर रहे हैं। फैज़ान, अगर तुम सुन रहे हो तो गाड़ी की ऊपरी बंदूक संभालो। अर्जुन साहब, अपने 2 जवान दाईं चट्टान तक बढ़ाइए। उन्हें रास्ता मिल जाएगा।”

फैज़ान, जो दर्द के बावजूद दूसरी गाड़ी की छत पर चढ़ा हुआ था, चीखा, “जी मैडम!”

उसके बाद जो हुआ, उसे बाद में किसी रिपोर्ट में ठीक से लिखा नहीं जा सका। क्योंकि कागज पर यह लिखना आसान नहीं था कि एक नर्स ने पूरे घात को तोड़ दिया था। अनन्या ने हर गोली सोचकर चलाई। वह अंधाधुंध नहीं मार रही थी, वह रास्ता खोल रही थी। जहां दुश्मन सिर उठाता, वहां पत्थर टूटता। जहां कोई जवान भागकर सुरक्षित जगह पहुंच सकता था, वहां वह 2 सेकंड की खिड़की बना देती।

जवानों ने पहली बार देखा कि साहस हमेशा गरजता नहीं। कभी-कभी वह चुपचाप सांस रोकता है, निशाना साधता है और किसी की जान बचा लेता है।

20 मिनट बाद घाटी लगभग शांत थी। दुश्मन की टुकड़ी पहाड़ियों में पीछे हट चुकी थी। भारतीय राहत दल ने घायलों को निकाला। करण को स्ट्रेचर पर रखा गया। उसकी आंखें बंद थीं, पर उंगलियां हल्की हिल रही थीं। अनन्या ने उसका हाथ पकड़ा।

“तुमने मुझे बंदूक दी थी,” उसने धीरे से कहा, “अब तुम मुझे जवाब दोगे। आंखें खोलोगे।”

करण के होंठ कांपे। “मैडम… आप… कौन…”

अनन्या ने वही पुरानी नरम मुस्कान लौटा दी।

“अभी के लिए वही, जो तुम्हारी सांस गिन रही है।”

चौकी पर लौटते समय किसी ने गाड़ी में बात नहीं की। सारे जवान उसे देख रहे थे। वही चेहरा, वही सफेद दुपट्टा, वही चिकित्सा बैग। लेकिन अब उनके बीच बैठी स्त्री किसी पहेली जैसी लग रही थी। वह थकी हुई थी, उसकी हथेलियां कांप रही थीं, पर आंखें अब भी खाली घाटी को देख रही थीं जैसे वह अभी भी खतरा ढूंढ रही हो।

चौकी रक्षक पर पहुंचते ही घायलों को चिकित्सा तंबू में ले जाया गया। अनन्या फिर वही बन गई जिसे वे जानते थे। उसने पट्टियां बदलीं, दवाएं दीं, घाव साफ किए, कराहते जवानों के माथे पर हाथ रखा। उसकी आवाज फिर से धीमी हो गई।

“सांस लो। हां, ऐसे। मां को फोन करोगे, लेकिन पहले टांके लगने दो।”

सिपाही फैज़ान की आंखों में आंसू थे। वह बार-बार कह रहा था, “मैडम, अगर आप नहीं आतीं तो…”

अनन्या ने उसे रोक दिया। “अगर तुम लोग हिम्मत नहीं रखते तो मैं कुछ नहीं कर पाती।”

3 घंटे बाद जब आखिरी घायल स्थिर हुआ, तंबू में सिर्फ दवा की गंध और ठंडी हवा बची थी। अनन्या हाथ धो रही थी। पानी उसकी हथेलियों से धूल और खून की लालिमा हटाता जा रहा था, मगर उसकी आंखों से वह दृश्य नहीं हट रहा था जिसमें करण दीवार के पास पड़ा था।

तभी तंबू का पर्दा तेज़ी से हटा। कप्तान विराट मल्होत्रा अंदर आए। उनके पीछे सूबेदार मेजर अर्जुन राणा थे। विराट के हाथ में करण की राइफल थी। उनके चेहरे पर गुस्सा भी था, डर भी और अपमान भी कि उनकी चौकी में कोई ऐसा रहस्य छिपा रहा था जिसे वह पहचान नहीं पाए।

“लेफ्टिनेंट अनन्या राव,” विराट ने कठोर स्वर में कहा, “क्या आप बताना चाहेंगी कि आज दर्रा 17 में हुआ क्या?”

अनन्या ने पानी बंद किया। तौलिये से हाथ पोंछे। “घायल जवानों की रक्षा के लिए उपलब्ध हथियार का उपयोग किया, सर।”

विराट हंसे नहीं। उनकी आंखें और सख्त हो गईं।

“उपलब्ध हथियार? आपने 800 मीटर की ढलान पर तेज हवा में छिपे निशानेबाज को गिराया। फिर आपने मशीनगन दल को निष्क्रिय किया। फिर आपने मेरी टुकड़ी को वैसा मार्गदर्शन दिया जैसा कोई युद्ध प्रशिक्षक देता है। रिपोर्ट में लिखा है कि आपने 12 गोलियां चलाईं और 11 निशाने सही लगे।”

तंबू में चुप्पी जम गई।

विराट ने राइफल लकड़ी की मेज पर रख दी। “नर्सें ऐसा नहीं करतीं, लेफ्टिनेंट। सामान्य सैन्य डॉक्टर भी ऐसा नहीं करते। सच बताइए। आप कौन हैं और मेरी चौकी में क्या कर रही थीं?”

अनन्या ने उनकी आंखों में देखा। वह झूठ बोल सकती थी। उसने 5 महीने झूठ ही जिया था। मगर आज जिन जवानों ने उसे देखा था, उनके सामने अब वही पुराना चेहरा पहनना संभव नहीं था।

फिर भी उसने सिर्फ इतना कहा, “मेरे चिकित्सा दस्तावेज़ असली हैं। मैं भारतीय सेना से संबद्ध चिकित्सा अधिकारी हूं।”

विराट आगे बढ़े। “आधा सच सबसे खतरनाक झूठ होता है। मैं उत्तरी कमान को संदेश भेज रहा हूं। जब तक आपकी पूरी फाइल नहीं आती, आप इस चौकी से बाहर नहीं जाएंगी।”

अर्जुन राणा चुप खड़े थे। उनका चेहरा वैसा था जैसा किसी पिता का होता है जब उसे पता चलता है कि जिस बेटी को वह बचा रहा था, वह खुद पूरे घर की ढाल निकली।

“मैडम,” उन्होंने धीमे स्वर में पूछा, “क्या हम इतने महीनों से आपको गलत समझते रहे?”

अनन्या ने पहली बार नजर झुका ली। “गलत नहीं, सूबेदार साहब। बस अधूरा।”

उसी क्षण पहाड़ों के ऊपर से एक गहरी आवाज गूंजी। चौकी पर मौजूद हर जवान ने सिर उठाया। यह सामान्य सेना हेलीकॉप्टर की आवाज नहीं थी। यह भारी, दबा हुआ, तेज और अजीब तरह से नियंत्रित था। कुछ ही मिनटों में एक काला हेलीकॉप्टर चौकी के उतरने वाले क्षेत्र पर उतरा। उस पर कोई स्पष्ट चिन्ह नहीं था। न कोई इकाई संख्या, न कोई खुला नाम।

धूल का बवंडर उठा। हेलीकॉप्टर का दरवाजा खुला। एक आदमी बाहर उतरा। उसने साधारण गहरे रंग की जैकेट पहनी थी, मगर उसके चलने का तरीका बता रहा था कि चौकी का कोई भी नियम उसे रोक नहीं सकता। उसके साथ 2 सशस्त्र अधिकारी थे जिनके चेहरों पर कोई भाव नहीं था।

वह सीधे कप्तान विराट के सामने आया। उसने छोटा पहचान पत्र दिखाया। विराट ने उसे देखते ही चेहरा कस लिया।

“कप्तान मल्होत्रा,” उस आदमी ने कहा, “मैं कमांडर कबीर सूद हूं। मैं अपनी अधिकारी को लेने आया हूं।”

“आपकी अधिकारी?” विराट ने अनन्या की तरफ देखा।

कमांडर कबीर ने शांत स्वर में कहा, “लेफ्टिनेंट अनन्या राव यहां चिकित्सा अधिकारी के रूप में नहीं, एक गुप्त अभियान पर थीं। आज उनका आवरण टूट चुका है।”

अर्जुन राणा ने गहरी सांस ली। फैज़ान, जो दरवाजे के पास पट्टी बंधे हाथ के साथ खड़ा था, स्तब्ध रह गया।

विराट ने कठोरता से कहा, “उन्होंने मेरे आदेश क्षेत्र में बिना अनुमति युद्ध किया।”

कबीर सूद की आंखें ठंडी हो गईं। “और आपके 14 जवान जिंदा हैं।”

विराट चुप हो गए।

कबीर ने आगे कहा, “दर्रा 17 का निशानेबाज कोई साधारण आतंकी नहीं था। वह ‘उस्ताद’ का छोटा भाई था। उसके पास से सुरक्षित संचार उपकरण मिला है। हमारे विशेषज्ञों ने 18 मिनट पहले उसकी जानकारी तोड़ी है। उसमें पूरी घाटी के 3 बारूदी कारखानों और 2 छिपे मार्गों की जगह दर्ज है।”

अनन्या की आंखों में पहली बार दर्द चमका। “तो मिशन…”

कबीर ने उसकी तरफ देखा। “मिशन नियमों के हिसाब से असफल माना जाएगा, क्योंकि आपका भेद खुल गया। ऊपर वाले गुस्से में हैं।”

तंबू के बाहर खड़े जवानों के चेहरे उतर गए।

कबीर रुके। फिर उनका स्वर थोड़ा नरम हुआ। “लेकिन सच यह है कि आपने वह कर दिखाया जो 5 महीने की निगरानी नहीं कर पाई। आपने अपने आदेश तोड़े, पर 14 जानें बचाईं और उस्ताद की पूरी जड़ हमारे हाथ में दे दी।”

फैज़ान की आंखों से आंसू गिर पड़े। “तो मैडम जा रही हैं?”

कबीर ने अनन्या को देखा। “तुरंत।”

अनन्या ने कुछ नहीं कहा। वह अपने छोटे से बिस्तर तक गई, जहां 5 महीनों से उसका एक बैग रखा था। उसमें कुछ कपड़े, चिकित्सा नोट्स, एक पुरानी तस्वीर और मां के हाथ का बंधा लाल धागा था। उसने बैग उठाया। उस कमरे में उसकी कोई चीज़ ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके जाने से पूरा तंबू खाली लगने वाला था।

बाहर निकलते समय वह करण के स्ट्रेचर के पास रुकी। उसे हेलीकॉप्टर से बड़े अस्पताल भेजने की तैयारी हो रही थी। करण ने कमजोर आंखें खोलीं। उसने मुश्किल से हाथ उठाया।

“मैडम… अब समझ आया… आप मेरी राइफल को ऐसे क्यों देखती थीं।”

अनन्या ने उसका हाथ थाम लिया। “तुम ठीक होकर वापस आना। अपनी राइफल खुद संभालना। मैं हमेशा तुम्हारी बंदूक नहीं उठा सकती।”

करण की आंखों में गर्व और दर्द साथ चमके। “आज से वो राइफल मेरी नहीं रही। उसका नाम हम सब रखेंगे… अनन्या।”

पास खड़े जवानों ने सिर झुका लिया। कोई हंसा नहीं। उस पल मजाक की जगह नहीं थी।

अनन्या आगे बढ़ी। अर्जुन राणा रास्ते में खड़े थे। वही आदमी जिसने 5 महीने तक उसे बचाने की कसम खाई थी। अब उनकी आंखों में न शर्म थी, न गुस्सा। सिर्फ सम्मान था।

“डॉक्टर मैडम,” उन्होंने भारी आवाज में कहा, “या जो भी आपका असली पद हो… हमने आपको कमजोर समझकर बचाना चाहा। माफ कर दीजिए।”

अनन्या ने तुरंत सिर हिलाया। “नहीं सूबेदार साहब। आपने मुझे कमजोर नहीं समझा। आपने मुझे अपना समझा। फर्क बड़ा है।”

अर्जुन राणा की आंखें भर आईं। उन्होंने पहली बार उसे सैन्य सलामी नहीं, पिता जैसी नजर से देखा। “आपने मेरे लड़कों को वापस भेजा। यह कर्ज कभी नहीं उतरेगा।”

अनन्या ने सीधी होकर सलामी दी। “उनका ख्याल रखिएगा।”

“हमेशा,” अर्जुन ने कहा।

कप्तान विराट मल्होत्रा कुछ दूरी पर खड़े थे। उनके चेहरे से कठोरता उतर चुकी थी। उन्होंने धीरे से सलामी दी। अनन्या ने लौटाई। वह कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिले। कभी-कभी सच आदमी को इतना छोटा कर देता है कि सम्मान ही उसकी भाषा बन जाता है।

हेलीकॉप्टर की हवा तेज हो गई। अनन्या धूल के बीच चलती हुई आगे बढ़ी। उसके सफेद दुपट्टे का किनारा उड़ रहा था। जवानों की कतार अपने आप बन गई। कोई आदेश नहीं दिया गया था, फिर भी हर आदमी खड़ा हो गया। घायल फैज़ान ने बंधे हाथ से सलामी दी। रसोई वाला बूढ़ा नायक, जिसने उसे हर सुबह चाय दी थी, चुपचाप रो रहा था। रेडियो ऑपरेटर, जो हमेशा उससे मजाक करता था, आज आंख नहीं मिला पा रहा था।

अनन्या हेलीकॉप्टर के दरवाजे तक पहुंची। चढ़ने से पहले उसने मुड़कर चौकी रक्षक को देखा। वही पत्थर, वही कंटीली तारें, वही ठंडा आसमान। 5 महीने तक उसने यहां झूठा नाम, झूठी भूमिका और आधा जीवन जिया था। लेकिन इन जवानों के लिए उसकी चिंता कभी झूठी नहीं थी।

कबीर सूद ने अंदर से हाथ बढ़ाया। “चलना होगा।”

अनन्या ने आखिरी बार अर्जुन राणा की तरफ देखा। “चाय गरम रखिएगा, सूबेदार साहब। शायद किसी दिन लौट आऊं।”

अर्जुन के होंठ कांपे। “इस बार चौकी आपको बचाएगी नहीं, सलाम करेगी।”

हेलीकॉप्टर का दरवाजा बंद हो गया। मशीन ऊपर उठी। धूल ने सबको ढक लिया। जवानों ने आंखें ढक लीं, लेकिन सलामी नहीं तोड़ी। काला हेलीकॉप्टर पहाड़ियों के पीछे गायब हो गया, जैसे कोई रहस्य फिर से अंधेरे में लौट गया हो।

उसके बाद अनन्या राव को चौकी रक्षक ने कभी नहीं देखा। सरकारी कागजों में उस दिन की घटना अलग भाषा में लिखी गई। “अचानक राहत कार्रवाई”, “दुश्मन की स्थिति निष्क्रिय”, “घायल सुरक्षित निकाले गए।” किसी रिपोर्ट में यह नहीं लिखा गया कि एक शांत नर्स ने 800 मीटर दूर मौत को रोक दिया था।

मगर जवानों की अपनी रिपोर्ट होती है, जो कागज पर नहीं, सीने में लिखी जाती है।

कई महीनों बाद जब करण ठाकुर ठीक होकर लौटा, उसने अपनी राइफल के बक्से के अंदर एक छोटा सा कागज चिपका रखा था। उस पर सिर्फ 3 शब्द लिखे थे।

“वो नर्स नहीं थी।”

हर रात जब पहाड़ों पर हवा तेज चलती, नए जवान पुराने जवानों से पूछते, “क्या सच में यहां कोई ऐसी डॉक्टर थी जिसने पूरी टुकड़ी बचा ली थी?”

अर्जुन राणा दूर अंधेरी घाटी को देखते और धीरे से कहते, “कुछ लोग वर्दी से पहचाने जाते हैं। कुछ लोग अपनी गोली से। और कुछ लोग अपने स्पर्श से। वह तीसरी थी… लेकिन जरूरत पड़ने पर पहली 2 भी बन जाती थी।”

चौकी रक्षक में फिर कई सर्दियां आईं। बर्फ गिरी, गश्तें निकलीं, खतरे आए और गए। लेकिन चिकित्सा तंबू के बाहर रखी खाली लकड़ी की कुर्सी कोई नहीं हटाता था। जवान कहते थे, वह कुर्सी उस स्त्री की है जिसने उन्हें सिखाया था कि सबसे शांत चेहरा भी सबसे बड़ी ढाल हो सकता है।

और जब कभी रात बहुत गहरी हो जाती, घाटी से कोई अनजानी आवाज आती, तो जवान डरते नहीं थे। वे बस अपनी बंदूक कसकर पकड़ते, आसमान की तरफ देखते और मन ही मन कहते—

कहीं न कहीं, कोई अनन्या राव अब भी अंधेरे में जाग रही होगी।