
PART 1
जब नैना मल्होत्रा ने आँखें खोलीं, तब उसका आधा शरीर गीली मिट्टी में दबा था, मुँह में रेत भरी थी और 5 भेड़िए उसके चारों ओर ऐसे खड़े थे जैसे मौत ने खुद पहरा लगा दिया हो।
जयपुर से दूर अरावली की पहाड़ियों के पास एक पुराना ईसाई कब्रिस्तान था, जहाँ अब सिर्फ टूटे हुए पत्थर, जंग लगी लोहे की बाड़ और सूखे नीम के पेड़ बचे थे। रात में हल्की बारिश हुई थी। मिट्टी से काई, गीले पत्तों और डर की गंध उठ रही थी। नैना चीखना चाहती थी, पर गले से सिर्फ टूटी हुई साँस निकली। उसके हाथ मिट्टी नोच रहे थे, पैरों तक ताजा गड्ढा भरा हुआ था, और सफेद कुर्ता जगह-जगह फटा था।
सबसे बड़ा भेड़िया, धूसर रंग का, चौड़े सीने वाला, उसके चेहरे के पास झुका। नैना ने आँखें बंद कर लीं। उसे लगा अब दाँत उसके गले में धँसेंगे।
लेकिन भेड़िए ने उसकी हथेली धीरे से चाटी।
नैना की आँखों से आँसू बह निकले।
— मत मारना… मैं ज़िंदा हूँ…
बाकी 4 भेड़िए गड्ढे के चारों तरफ खड़े थे। एक अपने पंजों से मिट्टी हटाता जा रहा था। वे उसे खा नहीं रहे थे। वे उसे निकाल रहे थे।
तभी यादें टूटे शीशे की तरह लौटने लगीं। रणथंभौर रोड पर वह फार्महाउस, जिसे उसके पति राघव ने “नई शुरुआत” कहकर बुक किया था। मोमबत्ती की रोशनी। चाँदी के गिलास में केसर वाला दूध। राघव की बहुत मीठी आवाज़।
— हमें अब समझदारी से बात करनी होगी, नैना।
फिर चक्कर। गिलास हाथ से छूटना। राघव का चेहरा ऊपर झुकना। उसकी आँखों में डर नहीं, हिसाब था।
फिर अँधेरा।
झाड़ियों के पीछे से किसी बूढ़े आदमी की आवाज़ आई।
— बादल! राखी! इधर आओ! क्या ढूँढ़ लिया तुम लोगों ने?
टॉर्च की रोशनी कब्रों पर घूमी। एक दुबला-पतला बुज़ुर्ग आदमी दिखाई दिया। सफेद दाढ़ी, पुरानी खाकी जैकेट, मिट्टी से सने जूते और आँखों में ऐसा सन्नाटा जैसे उसने ज़िंदगी में बहुत मौतें देखी हों। नैना को देखते ही वह ठिठक गया।
— हे भगवान…
— मुझे निकालिए… किसी ने मुझे यहाँ दबा दिया…
वह बिना देर किए गड्ढे में उतर गया। भेड़िए चुपचाप पीछे हट गए। उसने नैना के कंधों के नीचे हाथ लगाया।
— हिलना मत बेटी, शरीर बर्फ हो रहा है।
— मेरा पति… राघव… कहाँ है?
उस नाम पर बूढ़े का चेहरा एक पल को कठोर हुआ, लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा। उसने हाथों से मिट्टी खोदी, उसके पैर निकाले और उसे बाहर खींच लिया। नैना खड़ी भी नहीं हो पाई। बड़ा धूसर भेड़िया उसके साथ-साथ रास्ते तक चला।
बूढ़े का नाम महेन्द्र सिंह राठौड़ था। वह कभी पुलिस में था, अब जंगल के किनारे एक छोटा बचाव केंद्र चलाता था। ये 5 भेड़िए जंगली थे, मगर उसके हाथों पले थे। उनकी माँ को सालों पहले शिकारी मार गए थे।
— ये इंसानों से कम झूठ बोलते हैं, महेन्द्र ने उसे अपनी झोंपड़ी जैसे घर में लिटाते हुए कहा। इन्हें साँस और डर की गंध पहचाननी आती है।
गरम कंबल, अदरक की चाय और साफ कपड़े देने के बाद उसने उसकी नब्ज़ देखी। फिर उसकी आँखों में टॉर्च डाली।
— तुम्हें कोई तेज़ दवा दी गई है। और एक बात… मैं डॉक्टर नहीं हूँ, पर तुम्हें तुरंत जाँच करानी होगी। शायद तुम गर्भवती हो।
नैना का हाथ काँप गया। वह 38 की थी। 9 साल से वह और राघव बच्चे के लिए अस्पताल, मंदिर, इलाज और दुआओं के बीच भटक रहे थे। हर महीने उम्मीद टूटती थी। हर रिपोर्ट के बाद घर में चुप्पी फैल जाती थी।
अगर महेन्द्र सच कह रहा था, तो किसी ने सिर्फ नैना को ज़िंदा नहीं दफनाया था। किसी ने उसके बच्चे को भी मिट्टी के नीचे छोड़ दिया था।
PART 2
नैना 7 दिन महेन्द्र के घर रही। सुबह उसे उल्टियाँ होतीं, रात को पत्तों की आवाज़ पर भी वह काँप जाती। बाहर बादल, राखी, चंदन, नूर और शेरू बरामदे के पास पहरा देते। महेन्द्र उसे बेटी कहता, और हर बार यह शब्द उसके भीतर किसी पुराने घाव को छू जाता।
उसके माता-पिता की मौत 20 साल पहले दिल्ली-जयपुर हाईवे पर हुई थी। उसी के बाद उसने अकेले “मल्होत्रा लॉजिस्टिक्स” खड़ी की थी। राघव बाद में आया था, सुंदर, पढ़ा-लिखा, महंगे सूटों वाला। उसने कहा था कि वह नैना का साथ देगा। धीरे-धीरे उसने कंपनी के कागज़, बैंक पासवर्ड और बोर्ड मीटिंग्स में जगह ले ली।
8वें दिन नैना जयपुर लौटी।
जब वह अपनी कंपनी के काँच वाले दफ्तर में दाखिल हुई, गार्ड के हाथ से रजिस्टर गिर गया।
— मैडम… आप तो…
— ज़िंदा हूँ। किसे परेशानी है?
रिसेप्शन पर उसकी सहायक सीमा रो पड़ी।
— सर ने कहा था आप जंगल में खो गईं। फिर बोले पुलिस को आपकी चप्पलें झील किनारे मिलीं। उन्होंने एक औरत को आपके केबिन में बैठाना शुरू कर दिया था।
नैना ने अपना दरवाज़ा खोला। दराज़ टूटे थे। लॉकर पर खरोंचें थीं।
तभी राघव अंदर आया और पत्थर बन गया।
नैना ने पेट पर हाथ रखकर पूछा।
— मेरे दफन होने के बाद नींद अच्छी आई, राघव?
उसके होंठ काँपे।
— मैं… मैं समझा तुम मर चुकी हो।
नैना खड़ी हुई।
— और असली धोखा अभी बाकी था।
PART 3
राघव की आँखों का रंग उड़ गया। वह पीछे हटते हुए दीवार से टकरा गया। उसके महंगे परफ्यूम की खुशबू कमरे में थी, पर डर उससे भी तेज़ फैल रहा था।
— नैना, मेरी बात सुनो। उस रात तुम बेहोश हो गई थीं। मैंने नब्ज़ देखी थी। मुझे लगा सब खत्म हो गया। मैं घबरा गया था।
— इसलिए तुमने एम्बुलेंस नहीं बुलवाई?
— मैं डर गया था।
— इसलिए तुमने अपनी पत्नी को कार की डिक्की में रखा?
वह रोने लगा। मगर वह पश्चाताप का रोना नहीं था। वह पकड़े गए आदमी का रोना था।
— हम झगड़ रहे थे। तुमने दूध पिया, फिर गिर गईं। मैं समझा तुम मर गई हो। अगर पुलिस आती तो सब मुझे दोष देते।
— तो तुमने कब्र खोदी। मेरे ऊपर मिट्टी डाली। और लौटकर मेरे दफ्तर की तिजोरी तोड़ने लगे।
राघव जमीन पर बैठ गया।
— मैं हत्यारा नहीं हूँ।
— नहीं, तुम उससे भी बदतर हो। तुम ऐसे आदमी हो जिसने अपनी पत्नी को मरने के लिए छोड़ दिया, और भगवान से यही उम्मीद की कि वह सच में मर जाए।
पुलिस उसी शाम उसे ले गई। आरोप लगे—जान बचाने में जानबूझकर लापरवाही, सबूत छिपाना, शरीर को दफनाने की कोशिश और संपत्ति हड़पने की साजिश। खबर फैलते देर नहीं लगी। जयपुर की एक महिला उद्योगपति, जिसे पति ने मृत समझकर दफना दिया, 5 भेड़ियों ने बचा लिया—सोशल मीडिया पर लोग गुस्से, दया और हैरानी से भर गए।
मगर नैना के लिए असली लड़ाई अभी शुरू हुई थी।
क्लिनिक में 3 दिन बाद अल्ट्रासाउंड हुआ। स्क्रीन पर एक छोटी-सी धड़कन चमकी। डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा।
— बच्चा सुरक्षित है।
नैना ने मुँह पर हाथ रख लिया। वह रोई नहीं, टूट गई। महेन्द्र बाहर इंतज़ार कर रहा था। जब वह निकली, उसने कुछ पूछने से पहले ही उसके चेहरे को पढ़ लिया।
— है न?
— हाँ, बाबा। वह ज़िंदा है।
फिर नैना का चेहरा अचानक बदल गया।
— पर उस रात सिर्फ राघव नहीं था। किसी और ने मुझे दवा दी थी।
उसे याद आया। फार्महाउस जाने से एक दिन पहले उसने अपने डिप्टी डायरेक्टर विवेक खन्ना के साथ लंच किया था। विवेक 6 साल से उसके साथ था। शांत, मेहनती, वफादार दिखने वाला आदमी। उसने ही उसके लिए कॉफी मँगवाई थी। उसी दोपहर उसके हाथ भारी हुए थे, आँखें जलने लगी थीं।
पुलिस ने रेस्टोरेंट की फुटेज निकाली। स्क्रीन पर साफ दिखा—विवेक नैना की कॉफी के ऊपर झुकता है, कुर्ते की आस्तीन से छोटी पुड़िया निकालता है, और पाउडर कप में गिरा देता है।
थाने में जब विवेक हथकड़ी में बैठा था, नैना ने चिल्लाया नहीं। उसकी आवाज़ ठंडी थी।
— क्यों?
विवेक ने सिर उठाया। आँखों में जलन थी।
— आपको मेरे पिता याद भी नहीं होंगे।
नैना ने नाम सुना—खन्ना। फिर याद आया। प्रदीप खन्ना, पुराना ड्राइवर। उसे 10 साल पहले डीज़ल चोरी, नकली बिल और दूसरे ड्राइवरों को धमकाने पर नौकरी से निकाला गया था।
— मैंने उसे 3 मौके दिए थे।
— आपने उसे सबके सामने चोर कहा। वह शराब में डूब गया। घर टूटा। फिर एक ढाबे के पीछे झगड़े में मर गया। और आप अखबारों में छपती रहीं—“अपने दम पर बनी महिला।”
— तुम्हारे पिता उन मजदूरों से चोरी कर रहे थे जिनकी तनख्वाह 16000 थी।
— आपने उसे बचाया नहीं।
— और तुमने मेरे बच्चे को मारने की कोशिश की।
विवेक के होंठ सूख गए।
— मुझे नहीं पता था कि आप गर्भवती हैं।
— लेकिन यह पता था कि मैं ज़िंदा हूँ, जब तुमने मुझे ज़हर दिया।
वह चुप रहा। वही उसकी सबसे सच्ची गवाही थी।
राघव और विवेक के केस अलग चले, लेकिन दोनों का अंत जेल में हुआ। एक ने डर को बहाना बनाया। दूसरे ने बदले को न्याय समझा। दोनों ने एक औरत की साँस को अपने हिसाब की चीज़ मान लिया था।
कोर्ट से बाहर निकलते हुए महेन्द्र ने नैना से कहा।
— बेटी, शहर में जंगल से ज्यादा खतरनाक जानवर हैं। फर्क इतना है कि वे कोट पहनते हैं।
नैना ने उसका हाथ थाम लिया।
— फिर मेरे पास रहिए। मुझे किसी ऐसे की ज़रूरत है जो काटने से पहले जानवर को पहचान ले।
महेन्द्र उसकी कंपनी में सुरक्षा सलाहकार बन गया। कागज़ों पर वह दफ्तर और घर की सुरक्षा देखता था। असल में वह नैना की नींद की रखवाली करता था। नैना अब जयपुर के सिविल लाइन्स वाले घर में रहती थी। घर बड़ा था, पर उसके हर कमरे में धोखे की गूँज बची हुई थी।
इसी घर में कुछ हफ्ते बाद “सिया शर्मा” आई।
वह घरेलू सहायिका बनकर आई थी। एजेंसी ने कहा था कि वह गर्भवती महिलाओं की देखभाल में अनुभवी है। सिया सुंदर थी, शांत थी, कम बोलती थी। वह हल्दी वाला दूध बनाती, दवाइयों की डिब्बियाँ सजाती, अलमारी सँभालती और नैना के लिए खिचड़ी पकाती। उसके हाथ बहुत साफ थे, उसकी मुस्कान बहुत अभ्यास वाली।
महेन्द्र ने पहले दिन ही पूछा।
— पहले कहाँ काम किया?
— मालवीय नगर में।
— किसके यहाँ?
— एजेंसी से पूछ लीजिए।
— भरोसा एजेंसी से नहीं आता, बेटी। आदमी के चेहरे से भी नहीं आता।
नैना थक चुकी थी।
— बाबा, मैं हर किसी पर शक करते-करते जी नहीं पाऊँगी।
महेन्द्र ने कुछ नहीं कहा, पर भेड़ियों की तरह उसकी आँखें चौकन्नी हो गईं।
सिया घर में ऐसे घुलने लगी जैसे चीनी चाय में घुलती है, पर नीचे कड़वाहट छोड़ती है। वह नैना के मेडिकल पेपर अलग रखती। कभी फोन पर धीमे बोलती। कभी महेन्द्र को आते देख अचानक चुप हो जाती।
एक बारिश भरी दोपहर नैना अस्पताल से लौट रही थी, तभी उसने मंदिर के बाहर एक 10 साल के लड़के को देखा। वह फटे स्वेटर में सीढ़ियों के पास बैठा था। उसके पास एक दुबली-सी भूरी कुतिया थी, जिसके कान बहुत बड़े थे और आँखें डरी हुई थीं। लड़के के हाथ में स्टील का कटोरा था। सड़क किनारे 2 बड़े लड़के उसे देख रहे थे। जैसे ही किसी महिला ने कटोरे में 100 का नोट डाला, वे दौड़कर आए, पैसे छीन लिए और छोटे लड़के को धक्का दे दिया।
कुतिया ने दाँत दिखाए। उनमें से एक ने उसे लात मारी।
नैना कार से उतर पड़ी।
— हाथ मत लगाना उसे!
दोनों भाग गए। छोटा लड़का दीवार से लगा काँप रहा था। उसकी नाक से खून नहीं, सिर्फ पानी और मिट्टी बह रही थी। कुतिया लंगड़ाते हुए उसके आगे खड़ी थी।
— नाम क्या है तुम्हारा?
— आरव।
— और इसका?
— चमकी। काटती नहीं है… बस बुरे लोगों को पहचानती है।
नैना का दिल काँप गया।
वह दोनों को अस्पताल ले गई। आरव कुपोषित था, शरीर पर पुराने नीले निशान थे। उसने बताया कि उसकी माँ मर गई थी। पिता जंगल में लकड़ी कटाई के काम पर गए थे और फिर कभी लौटे नहीं। रिश्तेदारों ने उसे बाल गृह भेज दिया। वहाँ से वह भाग आया।
— मेरे घर चलोगे कुछ दिन? नैना ने पूछा।
आरव ने शक से देखा।
— क्यों?
— क्योंकि मेरे बगीचे में तोतों की गिनती करने वाला कोई नहीं है। मुझे विशेषज्ञ चाहिए।
— पैसे मिलेंगे?
— बिस्तर, खाना, स्कूल, साफ कपड़े और रविवार को जलेबी।
वह थोड़ा सोचता रहा।
— चमकी भी आएगी।
— सबसे पहले वही आएगी।
आरव और चमकी ने घर की हवा बदल दी। लड़का पहले रोटी जेब में छिपाता था। रात को दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पर जाग जाता था। चमकी उसके पैरों से चिपककर सोती, जैसे छोटी-सी चौकीदार हो। महेन्द्र से वह जल्दी घुल गया। 4वें दिन उसने उन्हें “दादू” कहा, और फिर खुद ही चुप हो गया जैसे बहुत बड़ी गलती कर दी हो। महेन्द्र की आँखें भर आईं।
एक शाम आरव भागता हुआ महेन्द्र के कमरे में आया।
— दादू… सिया दीदी नैना आंटी के कमरे में कागज़ों की फोटो ले रही हैं। और वह लॉकर के नंबर दबा रही थीं।
महेन्द्र ने तुरंत कुछ नहीं पूछा। उसने अगले दिन गलियारे में एक छोटा कैमरा लगाया और लॉकर में साइलेंट अलार्म। शाम तक जाल बंद हो गया।
वीडियो में सिया दराज़ खोल रही थी, मेडिकल रिपोर्ट की फोटो ले रही थी, कंपनी के शेयर दस्तावेज़ ढूँढ़ रही थी। फिर उसने फोन लगाया।
— घबराओ मत। वह मुझ पर भरोसा करने लगी है। बूढ़े को हटाने का रास्ता भी निकाल लूँगी। बच्चा पैदा होने से पहले कुछ करना होगा।
नैना ने स्क्रीन देखी। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे। उसने बस पेट पर हाथ रख लिया। अंदर बच्चा हल्का-सा हिला, जैसे याद दिला रहा हो कि अब डरना मना है।
जब सिया बैठक में आई, महेन्द्र ने दरवाज़ा बंद कर दिया। आरव सीढ़ियों पर खड़ा था, चमकी उसके पैरों से सटी हुई।
नैना ने कहा।
— तुम्हारा नाम सिया नहीं है। तुम तन्वी हो। राघव की प्रेमिका।
उसका चेहरा उतर गया। फिर मुस्कान जहरीली हो गई।
— राघव मुझसे प्यार करता था।
— राघव को सिर्फ मुफ्त की चीज़ों से प्यार था।
— वह आपको तलाक देने वाला था। यह घर, यह कंपनी, यह सब उसका भी होना था। आपने उसे जेल भेज दिया।
— वह खुद जेल गया। मैंने सिर्फ दरवाज़ा बंद नहीं होने दिया।
तन्वी चीखी।
— आप हमेशा जीतती रहीं। पैसा, लोग, सहानुभूति… अब बच्चा भी। आप जैसी औरतें कभी खाली हाथ नहीं रहतीं।
महेन्द्र आगे बढ़ा, लेकिन नैना ने हाथ उठा दिया।
— निकल जाओ मेरे घर से।
— आप फिर पुलिस नहीं बुलाएँगी?
— बुलाऊँगी। मगर उससे पहले तुम यह जान लो कि तुम यहाँ से खाली हाथ जा रही हो। जैसे तुम्हारा प्यार खाली था, वैसे ही तुम्हारी चाल भी।
इस बार नैना ने समझौता नहीं किया। पुलिस आई। तन्वी के फोन से राघव के पुराने संदेश, बैंक लेन-देन और घर में घुसने की योजना मिली। उसने कबूला कि वह संपत्ति और बच्चे के जन्म के बाद विरासत पर दावा करने की तैयारी कर रही थी। उसे लगा था गर्भवती औरत टूट चुकी होगी। उसे पता नहीं था कि कब्र से उठी औरत डर से ज्यादा कठोर होती है।
घर में सुरक्षा बढ़ी, मगर नैना ने आरव को डर का घर नहीं बनने दिया। उसने उसे स्कूल में दाखिल कराया। चमकी के लिए पशु डॉक्टर बुलाया। रविवार को सचमुच जलेबी आई।
उधर महेन्द्र चुपचाप आरव के पिता को ढूँढ़ता रहा। पुराने कागज़, बाल गृह का रिकॉर्ड, जंगल विभाग के ठेके, सब खंगाले। आखिर उसे उदयपुर के पास एक पुनर्वास केंद्र में नाम मिला—देवेंद्र मीणा, 34 साल, लकड़ी कटाई के अवैध ठेके में दुर्घटनाग्रस्त, कमर से कमजोर, सालों तक बिस्तर पर।
जब आरव उसे देखने गया, वह कमरे के दरवाज़े पर ही रुक गया। देवेंद्र व्हीलचेयर पर बैठा था। चेहरा सूख गया था, हाथ काँप रहे थे।
— आरव…
लड़के की आँखें लाल हो गईं।
— आप कहाँ थे?
देवेंद्र रो पड़ा।
— मुझे लगा तुम दोनों मेरे बिना अच्छे रहोगे। मैं अपाहिज हो गया था। मैंने एक आदमी से कहा था कि तुम्हारी माँ को बोल दे मैं कहीं और चला गया। मैं शर्मिंदा था। मुझे पता ही नहीं चला वह मर गई… मुझे पता नहीं चला तू सड़क पर आ गया।
आरव ने दाँत भींचे।
— माँ आपका इंतज़ार करती रही।
— मुझे माफ मत करना अभी। बस मुझे सच में तुम्हारे पास रहने दे, जब तक तुम चाहो।
कमरे में सन्नाटा था। चमकी आगे बढ़ी और देवेंद्र के घुटने पर सिर रख दिया। आरव टूट गया। वह दौड़कर पिता से लिपट गया। महेन्द्र बाहर मुड़कर खड़ा हो गया, पर उसका कंधा काँप रहा था।
फिर एक और सच सामने आया। देवेंद्र की फाइल में एक पुरानी फोटो थी—एक जवान औरत, गोद में बच्चा, पीछे गाँव का मेला। पीछे नीली स्याही में लिखा था—“कमला और देवू।”
महेन्द्र फोटो देखते ही सफेद पड़ गया।
— यह औरत कौन है?
देवेंद्र ने धीरे कहा।
— मेरी माँ। मुझे बताया गया था मेरे पिता पुलिस में थे और एक दंगे में मारे गए।
महेन्द्र की साँस अटक गई।
— मैं मरा नहीं था।
देवेंद्र उसे देखने लगा।
— क्या मतलब?
— मैं राजस्थान पुलिस में था। एक ऑपरेशन में घायल होकर महीनों अस्पताल में रहा। वापस आया तो कमला का परिवार गाँव छोड़ चुका था। उन्होंने मुझे कहा था कि उसने दूसरी शादी कर ली। मैंने सालों खोजा… फिर हार गया।
नैना दरवाज़े पर खड़ी थी। कमरे की हवा भारी हो गई।
महेन्द्र ने काँपते हाथ से फोटो छुआ।
— शायद… मैं तुम्हारा पिता हूँ।
आरव ने पहले देवेंद्र को देखा, फिर महेन्द्र को।
— तो दादू सच में मेरे दादू हैं?
किसी के पास तुरंत जवाब नहीं था। महेन्द्र ने हाथ बढ़ाया। देवेंद्र ने पकड़ा। आरव उन दोनों के बीच घुस गया। नैना रो पड़ी। उसे लगा, जिस रात मिट्टी ने उसे निगलना चाहा था, उसी रात किसी अदृश्य हाथ ने इस टूटे परिवार की डोर भी खींच दी थी।
महीनों बाद देवेंद्र बैसाखी से चलने लगा। आरव स्कूल जाने लगा। चमकी मोटी हो गई और अब सोफे पर अपनी जगह खुद चुनती। महेन्द्र ने जयपुर छोड़कर कहीं नहीं जाना चुना। शनिवार को वे कभी-कभी जंगल के उस बचाव केंद्र जाते, जहाँ बादल, राखी, चंदन, नूर और शेरू पेड़ों के बीच से निकलते। वे नैना को देखते, सूँघते, फिर शांत बैठ जाते, जैसे जाँच रहे हों कि वह अब भी साँस ले रही है।
राघव ने जेल से 3 पत्र भेजे। नैना ने कोई नहीं खोला। विवेक ने वकील के जरिए माफी माँगी। नैना ने सिर्फ इतना कहलवाया कि कुछ माफियाँ पापी को हल्का करने के लिए माँगी जाती हैं, पीड़ित को ठीक करने के लिए नहीं।
फरवरी की ठंडी सुबह नैना को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। 12 घंटे बाद अस्पताल के कमरे में एक बच्ची की पहली रोने की आवाज़ गूँजी। बाहर महेन्द्र हाथ जोड़कर खड़ा था। आरव ने घबराहट में जलेबी का डिब्बा दबाकर चिपका दिया था। देवेंद्र कह रहा था कि वह ज्यादा आगे नहीं आएगा, यह नैना की कहानी है।
नर्स ने दरवाज़ा खोला।
— परिवार अंदर आ सकता है।
देवेंद्र ठिठका। नैना ने मुस्कुराकर कहा।
— अंदर आओ। परिवार दरवाज़े पर नहीं रुकता।
महेन्द्र ने बच्ची को बाँहों में लिया। उसकी आँखों से आँसू दाढ़ी में खो गए। आरव पंजों के बल खड़ा हुआ।
— नाम क्या है?
नैना ने बच्ची का चेहरा देखा। वही साँस, जो ज़हर, मिट्टी, ठंड, डर और धोखे से बचकर आई थी।
— आशा।
— मतलब उम्मीद? आरव ने पूछा।
— हाँ। क्योंकि वह रात के बाद आई है।
कमरे में कोई खून का रिश्ता पूरा नहीं था, फिर भी सब पूरा लग रहा था। महेन्द्र का खोया बेटा, देवेंद्र का खोया बच्चा, आरव की मिली हुई छत, चमकी की मिली हुई दुनिया, और नैना की वह बेटी जिसे दुनिया ने जन्म से पहले मिटाने की कोशिश की थी।
उस रात नैना ने बच्ची को सीने से लगाकर सोचा—कुछ औरतों को वही लोग दफना देते हैं जो प्रेम की कसम खाते हैं। मगर कभी-कभी ईश्वर उन्हें बचाने के लिए मंदिर की घंटियाँ नहीं, जंगल के भेड़िए भेजता है। कभी एक बूढ़ा आदमी, कभी सड़क का बच्चा, कभी दुबली कुतिया, कभी खोया हुआ पिता।
और तब समझ आता है कि परिवार हमेशा खून से नहीं बनता। कभी परिवार उस दिन जन्म लेता है, जब कोई अजनबी आपकी मिट्टी हटाकर कहता है—तुम अभी मरी नहीं हो।