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गर्भवती पत्नी को 7 दिन कमरे में कैद समझकर उसने रजाई उठाई, पर सूजी टांगों ने सारा सच खोल दिया; जब वह कांपकर बोली “तुमने मेरी बच्ची छीनने के कागज साइन कर दिए”, पति ने मां का चेहरा पहली बार पहचाना

PART 1

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राघव मल्होत्रा ने रजाई इस यकीन के साथ उठाई थी कि उसे अपनी गर्भवती पत्नी की कोई छिपी हुई गलती दिखेगी, मगर नीचे नंदिनी की सूजी, नीली पड़ी टांगें देखकर उसका शरीर बर्फ हो गया।

नंदिनी सफेद चादर के भीतर कांप रही थी। उसके माथे पर पसीना था, होंठ सूख चुके थे और दोनों हाथ 6 महीने के गर्भ पर ऐसे टिके थे जैसे वह पेट में पल रही जान को दुनिया से बचा रही हो।

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—तुमने कागज पर दस्तखत कर दिए हैं, राघव —उसने टूटी आवाज में कहा— अगर मैं मर गई तो मेरी बच्ची तुम्हारे घरवालों की हो जाएगी।

राघव के कानों में जैसे किसी ने घंटा बजा दिया।

दिल्ली के सिविल लाइंस में बने उस आलीशान मकान में पिछले 7 दिनों से अजीब सन्नाटा था। नंदिनी कमरे से बाहर नहीं निकली थी। उसने सुबह की पूजा नहीं की। उसने डॉक्टर की जांच टाल दी। उसने अपनी मां का फोन नहीं उठाया। उसने घर की पुरानी रसोइया शांता काकी तक को कमरे में आने नहीं दिया।

राघव मल्होत्रा बड़े बिल्डर परिवार का इकलौता बेटा था। गुरुग्राम, नोएडा और जयपुर में उसके होटल, मॉल और फार्महाउस प्रोजेक्ट चल रहे थे। वह करोड़ों के कागजों में धोखा पहचान सकता था, मगर अपनी पत्नी की आंखों में छिपे डर को नहीं पढ़ पाया।

नंदिनी किसी बड़े खानदान से नहीं आई थी। लखनऊ के चौक में उसके पिता की छोटी सी मिठाई की दुकान थी। शादी से पहले वह सुबह-सुबह दुकान में केसर दूध गरम करती, शाम को गुलाब जामुन पैक करती और हर ग्राहक से ऐसे बात करती जैसे घर का कोई अपना हो।

यही सादगी राघव को उससे प्यार करा बैठी।

और यही बात मल्होत्रा परिवार को कभी मंजूर नहीं हुई।

राघव की मां सावित्री मल्होत्रा उसे हमेशा “मिठाई वाली लड़की” कहती थीं, मुस्कान इतनी धीमी और जहरीली कि सामने वाला अपमान समझते-समझते देर कर दे। राघव का चचेरा भाई विक्रम, जो परिवार का वकील था, हर रिश्ते को फाइल, हस्ताक्षर और नियंत्रण में बदल देना चाहता था।

एक बार नंदिनी ने राघव से कहा था—

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—विक्रम भैया लोगों को इंसान की तरह नहीं देखते। जैसे कोई चीज हो, जिसका दाम लगाया जा सके।

राघव ने हंसकर बात टाल दी थी।

आज वही बात उसके सीने में कील की तरह धंस रही थी।

—मुझे मत उठाओ —नंदिनी ने हाथ जोड़ दिए— प्लीज, मैं नहीं चल सकती।

—तुम 6 महीने की गर्भवती हो। डॉक्टर शर्मा ने 2 बार पूछा है। तुम कहती रही सब ठीक है, मगर तुम बिस्तर से पैर भी नीचे नहीं रख पा रहीं।

—मुझे कहा गया था कि उठी तो बच्चा गिर जाएगा।

—किसने कहा?

नंदिनी ने चादर और कसकर पकड़ ली।

—नर्स ने।

राघव का चेहरा बदल गया।

उसे याद आया, उसकी मां ने जिद की थी कि “घर की बहू और आने वाले वारिस” के लिए निजी नर्स रखनी चाहिए। राघव उस समय जयपुर की जमीन की डील में उलझा था। उसने सोचा था, मां मदद कर रही हैं।

उसने सोचा था।

नंदिनी ने दाहिना पैर जरा सा हिलाया और दर्द से उसके मुंह से ऐसी कराह निकली कि राघव की रीढ़ कांप गई।

उस पल शक मर गया।

डर पैदा हुआ।

—मुझे माफ कर दो —राघव ने धीमे से कहा।

और उसने रजाई पूरी हटा दी।

नंदिनी की टांगें घुटनों से टखनों तक सूजी हुई थीं। त्वचा पर नीले-काले निशान थे। टखनों के पास गोल दबाव के निशान थे, जैसे किसी ने जोर से पकड़ा हो। घुटनों के नीचे पीले पड़े घाव थे, और कुछ लाल लकीरें सूजन में जलती हुई दिखाई दे रही थीं।

—हे भगवान… ये किसने किया?

नंदिनी ने चेहरा फेर लिया।

—किसी ने नहीं।

—ये किसी ने नहीं किया, ऐसा मत कहो।

—उन्होंने कहा था चुप रहो। कहा था तुमने सब मान लिया है।

राघव ने कांपते हाथों से फोन उठाया और एम्बुलेंस बुलवाई।

—मेरी पत्नी 6 महीने की गर्भवती है। वह चल नहीं पा रही। टांगों पर गंभीर सूजन और चोट के निशान हैं। तुरंत एम्बुलेंस भेजिए।

नंदिनी घबरा गई।

—नहीं, अस्पताल नहीं। वो लोग वहां भी आ जाएंगे।

राघव उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

—कौन लोग?

नंदिनी ने उसे ऐसे देखा जैसे वह तय नहीं कर पा रही हो कि यह उसका पति है या उसी साजिश का हिस्सा।

—तुम्हारी मां… और विक्रम भैया।

राघव का गला सूख गया।

—मैंने कोई कागज नहीं साइन किया।

नंदिनी की आंखों से आंसू गिर पड़े।

—उन्होंने मुझे तुम्हारे दस्तखत दिखाए थे।

बाहर गेट पर एम्बुलेंस की आवाज सुनाई देने लगी।

राघव ने उसका हाथ पकड़ा।

—मैं कसम खाता हूं, कोई हमारी बच्ची को तुमसे अलग नहीं करेगा।

लेकिन जब स्ट्रेचर नीचे पोर्च में पहुंचा, सावित्री मल्होत्रा पहले से वहां खड़ी थीं। रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, शांत चेहरा।

उनके पास विक्रम था।

और उसके हाथ में भूरे रंग की एक फाइल थी।

PART 2

अस्पताल में डॉक्टरों ने नंदिनी को तुरंत जांच कक्ष में ले लिया। खून की जांच, बच्चे की धड़कन, पैरों की सूजन, चोटों की तस्वीरें—सब कुछ तेजी से होने लगा। राघव बाहर दीवार से टिककर खड़ा था, मगर उसके भीतर जैसे पूरा घर ढह रहा था।

डॉक्टर बाहर आए।

—मिस्टर मल्होत्रा, बच्ची की धड़कन अभी ठीक है, लेकिन आपकी पत्नी को जबरन लंबे समय तक बिस्तर पर रखा गया लगता है। कुछ निशान सामान्य नहीं हैं। क्या किसी ने उन्हें रोका, बांधा, डराया या इलाज से दूर रखा?

राघव की आंखें झुक गईं।

—मैंने नहीं किया।

—तो जिसने किया है, उसे सामने लाना होगा।

तभी उसके फोन पर संदेश आया।

विक्रम: अस्पताल में कुछ मत बोलना। यह परिवार का मामला है।

राघव ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी।

परिवार का मामला।

उसकी पत्नी दर्द में थी, बच्ची खतरे में थी, और ये लोग इज्जत बचा रहे थे।

उसने अपने सुरक्षा प्रमुख अरुण को फोन किया।

—घर, लिफ्ट, सर्विस एंट्री, पार्किंग—पिछले 10 दिन की सारी रिकॉर्डिंग चाहिए। अभी।

कुछ देर बाद अरुण अस्पताल पहुंचा। उसने एक कमरे में राघव को वीडियो दिखाए।

पहले वीडियो में सावित्री, विक्रम और सफेद कपड़ों में एक औरत घर में घुस रहे थे। अरुण ने बताया कि वह असली नर्स नहीं थी; उसका पंजीकरण 3 साल पहले रद्द हो चुका था।

दूसरे वीडियो में नंदिनी सहारा लेकर कमरे से निकलने की कोशिश कर रही थी। सावित्री दरवाजे पर खड़ी होकर रास्ता रोक रही थीं। विक्रम हाथ में फाइल लिए उसे कुछ दिखा रहा था।

तीसरे वीडियो में वही नकली नर्स छोटी सी ठंडी पेटी लेकर सर्विस दरवाजे से बाहर जा रही थी।

फिर अरुण ने एक स्कैन किया हुआ कागज खोला।

विषय था: मातृत्व आपात स्थिति—अभिभावक अधिकार।

नीचे राघव के जैसे दस्तखत थे।

लेकिन राघव जानता था, वे उसके नहीं थे।

उसने धीमे से कहा—

—पुलिस बुलाओ।

अरुण रुका।

—सर, आपकी मां हैं।

राघव ने स्क्रीन बंद कर दी।

—नंदिनी भी मेरी परिवार है।

PART 3

सच एक साथ नहीं खुला। वह दीवार की दरार की तरह धीरे-धीरे फैलता गया, जब तक पूरा मकान हिलने न लगा।

सबसे पहले नंदिनी का फोन मिला। वह उसके अलमारी के पीछे लकड़ी के पैनल में छिपाया गया था, बंद, सिम निकाली हुई। फोन एक सिल्क के दुपट्टे में लिपटा था, जो सावित्री मल्होत्रा के कमरे से मेल खाता था।

फिर रसोई के कूड़ेदान में दवाइयों की फटी हुई पर्चियां मिलीं। कुछ नामों पर स्याही घिसी गई थी, पर एक शीशी पर नर्सिंग होम की मुहर बची थी। डॉक्टर ने बताया कि ऐसी दवाइयां बिना निगरानी गर्भवती महिला को देना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा झटका बेडरूम में मिला।

दीवार पर लगी देवी की तस्वीर के पीछे एक छोटा कैमरा छिपा था।

राघव ने जैसे ही उसे देखा, उसकी आंखों में खून उतर आया। उस कमरे में नंदिनी सोती थी, रोती थी, कपड़े बदलती थी, बच्ची से बात करती थी। वह उसका सबसे निजी स्थान था। और किसी ने उसे निगरानी के पिंजरे में बदल दिया था।

अरुण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—सर, मत छुएं। सबूत है।

“सबूत” शब्द ने राघव को रोक लिया। वरना वह उस दीवार को तोड़ देता।

अगली सुबह मामला और गंदा हो गया।

दिल्ली के एक ऑनलाइन गपशप पेज पर खबर छपी कि मल्होत्रा परिवार की बहू “मानसिक तनाव” से गुजर रही है और परिवार बच्चे की सुरक्षा के लिए चिंतित है।

लोगों ने बिना जाने फैसला सुना दिया।

लालची बहू।

छोटे घर की लड़की।

पैसे देखकर शादी की होगी।

बच्चे को हथियार बना रही है।

राघव अस्पताल की कैंटीन में बैठा सब पढ़ रहा था। हर पंक्ति नंदिनी के जख्मों पर नमक की तरह थी। उसे समझ आया कि चुप रहना भी कभी-कभी अत्याचारियों का साथ देना होता है।

उसी दोपहर मल्होत्रा ग्रुप की ओर से बयान जारी हुआ।

राघव मल्होत्रा ने अपनी गर्भवती पत्नी नंदिनी के विरुद्ध फर्जी दस्तखत, धमकी, निजी निगरानी, इलाज रोकने और गलत दवाइयों के उपयोग की शिकायत दर्ज कराई है। नंदिनी के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में फैलाई जा रही कोई भी बात झूठी है और उस पर कानूनी कार्रवाई होगी।

बयान में किसी का नाम नहीं था।

नाम लेने की जरूरत भी नहीं थी।

सावित्री ने 47 बार फोन किया। राघव ने एक बार भी नहीं उठाया।

विक्रम ने आखिर उसे अस्पताल के मंदिर वाले कोने में रोक लिया। वहां पीतल की घंटी शांत थी, अगरबत्ती धीरे-धीरे जल रही थी और दीवार पर रोशनी कांप रही थी।

—तू पागल हो गया है? —विक्रम ने दांत भींचकर कहा— अगर मैं डूबा तो अकेला नहीं डूबूंगा। आंटी के पास बहुत कागज हैं। पुराने परमिट, कैश पेमेंट, नेताओं की चिट्ठियां, आधे बने पुलों की रिपोर्ट। पूरा मल्होत्रा नाम जल जाएगा।

राघव ने उसे बिना पलक झपकाए देखा।

—तो जलने दे।

विक्रम के चेहरे से रंग उड़ गया।

—तू उस लड़की के लिए अपना खानदान मिटा देगा?

राघव एक कदम आगे बढ़ा।

—नहीं। मैं उस खानदान को मिटाऊंगा जिसने सोचा कि एक उपनाम मेरी पत्नी की जान से बड़ा है।

विक्रम पहली बार डर गया।

उधर नंदिनी की हालत धीरे-धीरे संभल रही थी। डॉक्टरों ने उसे पूर्ण आराम दिया, मगर इस बार उसके कमरे के बाहर राघव था, पुलिस थी, और उसकी मां सरोज भी थी, जो लखनऊ से रातोंरात ट्रेन पकड़कर पहुंची थी।

सरोज ने बेटी का चेहरा देखा तो रो भी नहीं पाई। उसने बस उसके माथे पर हाथ रखा।

—बिटिया, तूने पहले क्यों नहीं बताया?

नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

—मां, उन्होंने कहा था राघव ने दस्तखत कर दिए। मुझे लगा अब मेरा कोई नहीं।

सरोज ने राघव की ओर देखा। उस नजर में शिकायत भी थी, दुख भी, और एक मां का गुस्सा भी।

राघव ने सिर झुका दिया।

—मांजी, मेरी गलती है। मैंने उसे अकेला छोड़ा।

सरोज ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोलीं—

—गलती मानने से पहले उसे बचाओ।

राघव ने वही किया।

उसने घर की सारी चाबियां बदलवा दीं। सावित्री और विक्रम को अस्पताल परिसर में प्रवेश से रोकने के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया। नकली नर्स को पुलिस ने करोल बाग के एक किराए के कमरे से पकड़ा। पहले उसने कहा कि वह सिर्फ देखभाल कर रही थी, फिर जब बैंक खाते में सावित्री से जुड़े एक कर्मचारी के जरिए आए पैसों का रिकॉर्ड सामने आया, तो टूट गई।

उसने बयान दिया कि उसे नंदिनी को “भावुक निर्णय” लेने से रोकना था। भावुक निर्णय मतलब मां को फोन करना। डॉक्टर से मिलना। कमरे से बाहर जाना। पुलिस बुलाना।

उसने यह भी बताया कि विक्रम ने उससे कहा था—

—बहू को साबित करना है कि वह अस्थिर है। डरती रहेगी तो कागज पर अंगूठा लगवा लेंगे।

कागज असली अभिभावक अधिकार का नहीं था, मगर दिखने में वैसा बनाया गया था। योजना यह थी कि अगर प्रसव में कोई जटिलता होती, तो नंदिनी को असमर्थ घोषित कर बच्चे को मल्होत्रा परिवार के नियंत्रण में रखा जाए। अगर नंदिनी बच जाती, तो उसे मानसिक रूप से अस्थिर साबित कर दिया जाता।

राघव यह सुनकर कुर्सी पर बैठ गया। उसे लगा, जिस घर की दीवारों पर उसके पिता की तस्वीरें, दादा की विरासत और मां की पूजा की थाली थी, उसी घर में उसकी पत्नी को मिटाने की योजना बनाई गई थी।

नंदिनी ने पुलिस के सामने बयान दिया। उसने सावित्री की बातें दोहराईं। उसने बताया कैसे उसे कहा गया कि उसका शरीर कमजोर है, बच्चा मल्होत्रा है। कैसे फोन छीन लिया गया। कैसे दवाई दी गई। कैसे हर बार उठने पर कहा गया कि अगर बच्चा मर गया तो दोष उसी का होगा।

बयान के बाद वह थककर बाहर आई। राघव दरवाजे के पास खड़ा था।

—हो गया? —उसने धीमे से पूछा।

नंदिनी ने सिर हिलाया।

—हां।

—मुझे तुम पर गर्व है।

नंदिनी की आंखें भर आईं, मगर इस बार उनमें डर कम था।

—मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगी।

—हम नहीं जाएंगे।

—मेरी बच्ची भी नहीं।

राघव ठिठक गया।

—बच्ची?

नंदिनी के होंठों पर पहली बार हल्की मुस्कान आई।

—डॉक्टर ने बताया। बेटी है।

राघव की आंखें बंद हो गईं। वह आदमी जिसने शहरों में इमारतें खड़ी की थीं, जिसने अदालतों और बोर्डरूम में बड़े-बड़े फैसले लिए थे, उस पल सिर्फ एक पिता था जिसने अपनी बेटी को जन्म से पहले ही लगभग खो दिया था।

कुछ हफ्तों बाद गिरफ्तारियां हुईं।

विक्रम को अदालत परिसर के बाहर पकड़ा गया। उसके दफ्तर से नकली हस्ताक्षर के नमूने, फर्जी कागज और पुराने वित्तीय लेनदेन की फाइलें मिलीं। उसने पहले बहस की, फिर जब डिजिटल रिकॉर्ड सामने आया तो चुप हो गया।

सावित्री को उनके अपने ड्राइंग रूम से ले जाया गया। वही कमरा जहां कभी वह रिश्तेदारों के सामने नंदिनी को चाय परोसने का तरीका सिखाती थीं, जैसे बहू नहीं नौकरानी हो। उस दिन मोतियों की माला गले में थी, मगर चेहरा कठोर नहीं रह पाया।

—राघव, तू अपनी मां के साथ ऐसा करेगा? —उन्होंने कहा।

राघव ने सिर्फ इतना पूछा—

—जब नंदिनी रो रही थी, तब आपको याद था कि वह भी किसी की बेटी है?

सावित्री ने नजर फेर ली।

मुकदमा महीनों चला। मल्होत्रा परिवार की प्रतिष्ठा अदालत के बाहर जमा पत्रकारों, रिश्तेदारों और व्यापारिक साझेदारों के बीच चर्चा का विषय बन गई। कई पुराने सौदे भी जांच में आए। विक्रम ने सजा कम कराने के लिए समझौता किया और सच बोल दिया।

उसने माना कि दस्तखत नकली थे। उसने माना कि कागज डराने के लिए बनाए गए थे। उसने माना कि सावित्री नंदिनी को “मां बनने के बाद भी निर्णय लेने लायक” नहीं दिखाना चाहती थीं। उसने यह भी माना कि अगर बच्ची पैदा होते समय कोई संकट होता, तो वे नंदिनी के खिलाफ मानसिक अस्थिरता की रिपोर्ट तैयार करवाने वाले थे।

अदालत में जब नंदिनी गवाही देने खड़ी हुई, तो उसके कदम अब भी धीमे थे, मगर आवाज साफ थी।

—उन्होंने मुझे बहू नहीं समझा। उन्होंने मुझे इंसान भी नहीं समझा। उनके लिए मैं सिर्फ उनकी पोती को जन्म देने वाला शरीर थी।

पूरा कमरा शांत हो गया।

सावित्री की वकील ने पूछने की कोशिश की कि क्या नंदिनी ने गलत समझा था। नंदिनी ने सीधे जवाब दिया—

—गलतफहमी में कोई किसी का फोन नहीं छिपाता। गलतफहमी में कैमरा नहीं लगाता। गलतफहमी में मां बनने वाली औरत को दर्द में अकेला नहीं छोड़ा जाता।

राघव पीछे बैठा था। उसने पहली बार देखा कि जिसे उसके घरवालों ने कमजोर कहा था, वही अदालत में सबसे मजबूत खड़ी थी।

सावित्री दोषी ठहराई गईं। विक्रम को भी सजा मिली। नकली नर्स को सहयोगी गवाह बनने पर कम सजा मिली, लेकिन उसका नाम हमेशा के लिए उस अपराध से जुड़ गया।

सुनवाई के आखिरी दिन सावित्री ने राघव को देखा।

—तू अपनी मां को छोड़ देगा?

राघव ने मुड़कर नंदिनी को देखा। उसकी गोद में उनकी नवजात बेटी सो रही थी। बच्ची के छोटे हाथ नंदिनी की साड़ी के पल्लू को पकड़े हुए थे।

—नहीं —राघव ने कहा— आज पहली बार मैं अपना परिवार चुन रहा हूं।

सावित्री के चेहरे पर जो टूटन आई, वह नंदिनी ने देखी, मगर उसके भीतर दया नहीं जागी। कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, पर कुछ खून सुखा भी देते हैं।

1 साल बाद, लखनऊ के चौक में नंदिनी ने अपने पिता की पुरानी मिठाई की दुकान के पास एक छोटी सी बेकरी खोली—“रोशनी की रसोई”।

वह जगह बहुत बड़ी नहीं थी। वहां न इटालियन मार्बल था, न महंगा झूमर। लकड़ी की मेजें थीं, पीतल की छोटी घंटी थी, इलायची और घी की खुशबू थी, और सुबह की धूप थी जो कांच से होकर फर्श पर गिरती थी।

राघव काउंटर पर बैठता था, बेटी अनाया को सीने से बांधे हुए। वह जलेबी के डिब्बे टेढ़े पैक करता, रसीद भूल जाता, और हर बार नंदिनी उसे देखकर हंस पड़ती।

एक बुजुर्ग ग्राहक ने धीरे से पूछा—

—ये वही राघव मल्होत्रा हैं?

नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—

—हां, अब मेरे यहां काम करते हैं।

दुकान में हंसी फैल गई।

उस शाम जब दुकान बंद हुई, नंदिनी आंगन में बैठी थी। उसके कंधों पर हल्की शॉल थी। लंबे समय तक उसे कपड़े का पैरों पर पड़ना भी डराता था। उसे वह बिस्तर याद आता था, वह चादर, वह बंद कमरा, वह आवाज जो कहती थी कि उसका बच्चा उससे छीन लिया जाएगा।

राघव उसके पास आकर बैठ गया।

—दर्द है?

नंदिनी ने अंदर सोती अनाया को देखा।

—थोड़ा। पर आज डर नहीं है।

राघव ने कुछ नहीं कहा। कुछ जीतें इतनी पवित्र होती हैं कि उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं होती।

नंदिनी ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

—मुझे सबसे ज्यादा डर तुम्हारी मां से नहीं था।

—फिर किससे था?

—इससे कि मेरी बेटी बड़ी होकर मेरी वही कहानी सुनेगी जो उन्होंने बनाई थी। कि उसकी मां लालची थी, कमजोर थी, पागल थी।

राघव ने अंदर सोती बच्ची को देखा।

—वह सच सुनेगी।

—कौन सा सच?

राघव ने नंदिनी की हथेली पकड़ी। उस हथेली में अब भी आटे की महक थी, और उन उंगलियों में वे निशान थे जो छिपाने की नहीं, याद रखने की चीज बन चुके थे।

—वह सुनेगी कि उसकी मां बहादुर थी। कि उसने डर के बिस्तर से उठकर अपनी बेटी को बचाया। कि कोई खानदान, पैसा, उपनाम या झूठ किसी औरत की जिंदगी से बड़ा नहीं होता।

नंदिनी की आंखें बंद हो गईं।

कई महीनों बाद उस रात घर में जो सन्नाटा था, वह डर का नहीं था।

वह शांति का था।