Posted in

गर्भवती पत्नी अदालत में सब छोड़ने को तैयार थी, बंगला, खाते और 2 गाड़ियाँ भी, पर जब 6 साल की बच्ची ने रोते हुए कलाई दिखाई और कहा “पापा ने झूठ बोलने को मजबूर किया”, पूरा कमरा सन्न रह गया

PART 1

Advertisements

भरी अदालत में 8 महीने की गर्भवती निशा ने अपने पति से कहा कि वह गुरुग्राम वाला बंगला, सारे बैंक खाते, 2 गाड़ियाँ और कंपनी के हिस्से सब रख ले, उसे बस अपना बच्चा उस आदमी की परछाई से दूर जन्म देना है।

दिल्ली के पारिवारिक न्यायालय की वह सुबह अचानक इतनी ठंडी लगने लगी थी जैसे जून की गर्मी भी दीवारों के बाहर ही रुक गई हो। लकड़ी की लंबी बेंचों पर बैठे लोग एक-दूसरे को देखने लगे। सामने न्यायाधीश संध्या त्रिपाठी अपनी फाइल पर झुकी थीं, पर उनकी नजरें बार-बार निशा के चेहरे पर लौट आती थीं।

Advertisements

निशा मल्होत्रा की उंगलियाँ अपने दुपट्टे के कोने को इतनी जोर से मरोड़ रही थीं कि कपड़ा मुट्ठी में भीग गया था। उसका पेट भारी था, कमर दर्द से टूटी जा रही थी, पर उसकी आंखों में नींद से ज्यादा थकान अपमान की थी। वह उस घर को छोड़ने आई थी जहां उसने 6 साल की बच्ची को रातों में बुखार में सीने से लगाया था, जहां उसने अपने आने वाले बच्चे के लिए छोटे-छोटे कपड़े तह किए थे, और जहां उसी के पति ने किसी दूसरी औरत को उसकी जगह बैठा दिया था।

उसके सामने विक्रम मल्होत्रा बैठा था। सफेद कुर्ते पर महंगी जैकेट, कलाई में सोने की घड़ी, चेहरे पर वही अकड़ जैसे वह अदालत में नहीं, किसी जमीन के सौदे पर दस्तखत करने आया हो। उसके पास रिया कपूर बैठी थी, लाल साड़ी में, बालों में चमेली का गजरा, होंठों पर हल्की मुस्कान। वह इस मामले की पक्षकार नहीं थी, पर विक्रम उसे अपने साथ ऐसे लाया था जैसे निशा की हार पर रखी गई मुहर हो।

रिया मुस्कुरा रही थी।

निशा ने वही मुस्कान पहले भी देखी थी। कभी विक्रम के फोन में छिपी तस्वीरों में, कभी जयपुर के होटल की रसीद पर, कभी घर के मंदिर के पास रखी सीसीटीवी फुटेज में, जिसमें रिया आधी रात को उस घर में दाखिल हो रही थी, जबकि निशा अस्पताल में अकेली जांच करवा रही थी।

न्यायाधीश ने शांत स्वर में पूछा, “श्रीमती निशा मल्होत्रा, आप यह पुष्टि करती हैं कि आप गुरुग्राम स्थित मकान, संयुक्त खातों, 2 वाहनों और मल्होत्रा बिल्डर्स में अपने हिस्से पर दावा छोड़ना चाहती हैं?”

निशा की वकील, अधिवक्ता फराह खान, तुरंत उठीं। “माननीय न्यायालय, मेरी मुवक्किल पर अत्यधिक दबाव है। वह गर्भवती हैं, अकेली हैं, और—”

“मैं उत्तर श्रीमती मल्होत्रा से चाहती हूं,” न्यायाधीश ने कहा।

निशा ने अपने पेट पर हाथ रखा। भीतर बच्चा हल्का-सा हिला, जैसे कह रहा हो कि बस थोड़ी देर और टिक जाओ।

“जी,” निशा की आवाज धीमी थी, मगर साफ थी। “मैं पुष्टि करती हूं।”

Advertisements

पीछे बैठे कुछ लोग फुसफुसा उठे। रिया ने नाक से हंसी छोड़ी। विक्रम ने उसे देखा, मगर डांटा नहीं। वह उस हंसी का आनंद ले रहा था।

निशा ने पहली बार सिर उठाया।

“मुझे वह घर नहीं चाहिए जहां मेरी गोद में बच्चा पल रहा था और उसी कमरे में वह इस औरत को लाता था। मुझे वह पैसा नहीं चाहिए जिससे इसके लिए गहने खरीदे गए। मुझे वह गाड़ी नहीं चाहिए जिसकी सीट पर मुझे इसकी खुशबू मिली थी। उसे सब रखने दीजिए। मेरे बच्चे को सिर्फ शांति चाहिए।”

विक्रम की गर्दन तन गई। “यह नाटक है। निशा हमेशा सही समय पर रोना जानती है। वह अपने पेट का इस्तेमाल सहानुभूति के लिए कर रही है।”

“बैठ जाइए, श्री मल्होत्रा,” न्यायाधीश ने कठोर स्वर में कहा।

विक्रम बैठ तो गया, पर उसकी उंगलियां मेज के किनारे पर कस गईं।

निशा अब उसे नफरत से भी नहीं देख रही थी। यही विक्रम को सबसे ज्यादा चुभ रहा था। वह उसे ऐसे देख रही थी जैसे वह उसके जीवन से पहले ही मिट चुका हो।

“तुमने मुझसे वह छीन लिया जो मेरे लिए सबसे जरूरी था,” निशा ने फुसफुसाकर कहा।

रिया की मुस्कान और चौड़ी हो गई, जैसे वह वाक्य उसके लिए कोई जीत का फूल हो।

न्यायाधीश त्रिपाठी ने फाइल बंद की।

“आगे बढ़ने से पहले अदालत एक गंभीर बात सुनना चाहेगी।”

विक्रम ने भौंहें सिकोड़ लीं। “कौन-सी बात?”

न्यायाधीश ने दरवाजे की ओर देखा। “कुछ देर पहले गलियारे में एक छोटी बच्ची मेरे पास आई। वह रो रही थी। उसने कहा कि उसके पिता कोई बहुत गलत काम करने वाले हैं। उसने यह भी कहा कि गर्भवती आंटी को पूरी सच्चाई नहीं पता।”

विक्रम के चेहरे से रंग उतर गया।

रिया की मुस्कान रुक गई।

निशा के भीतर जैसे किसी ने बर्फ रख दी।

“मैं समझी नहीं,” निशा ने कांपते स्वर में कहा।

न्यायाधीश बोलीं, “उस बच्ची ने कहा कि उसके पिता और ‘बुरी तरह हंसने वाली आंटी’ ने उसे झूठ बोलने को कहा था।”

विक्रम अचानक खड़ा हो गया। “माननीय न्यायालय, मेरी बेटी छोटी है। उसे जो सिखाया जाता है, वही बोलती है।”

न्यायाधीश ने उसकी आंखों में देखा।

“मैंने अभी यह नहीं कहा कि वह आपकी बेटी है, श्री मल्होत्रा।”

अदालत में सन्नाटा गिर पड़ा।

विक्रम 2 पल तक खड़ा रहा, फिर धीमे से बैठ गया।

न्यायाधीश ने कर्मचारी को संकेत किया।

दरवाजा खुला।

एक 6 साल की बच्ची अंदर आई। उसने सीने से एक पुराना पीला कपड़े का हाथी चिपकाया हुआ था, जिसका कान घिस चुका था और सूंड पर सफेद टांका लगा था। उसने नीली फ्रॉक पहनी थी, बालों की 2 चोटी बिखर चुकी थीं, और उसकी आंखें इतनी लाल थीं जैसे वह बहुत देर से रोना रोक रही हो।

निशा के मुंह से टूटी हुई आवाज निकली।

“अनाया…”

बच्ची ने 2 कदम निशा की ओर बढ़ाए, फिर अचानक रुक गई, जैसे किसी अदृश्य डर ने उसे पकड़ लिया हो।

“मम्मा निशा…”

ये 2 शब्द अदालत में किसी थप्पड़ की तरह गूंजे।

रिया बुदबुदाई, “कितना नाटक।”

न्यायाधीश ने मेज पर हथेली मारी। “एक शब्द और, तो आपको बाहर कर दिया जाएगा।”

अनाया को वहां होना ही नहीं चाहिए था। उसी सुबह विक्रम ने कहा था कि वह दाई के घर है, “बड़ों की गंदी बातों” से दूर। पर अब वह अदालत के बीच खड़ी थी, अपने कपड़े के हाथी को इतना कसकर पकड़े कि उसकी छोटी उंगलियां सफेद पड़ गई थीं।

न्यायाधीश का स्वर नरम हो गया। “अनाया, कोई तुम्हें बोलने के लिए मजबूर नहीं करेगा। लेकिन तुम जो कहना चाहती हो, यहां सब सुनेंगे।”

अनाया ने विक्रम की तरफ देखा।

विक्रम ने उसे मुस्कुराकर देखा।

वह पिता की मुस्कान नहीं थी। वह चेतावनी थी।

अनाया ने सिर झुका लिया।

निशा उठना चाहती थी, दौड़कर उसे सीने से लगाना चाहती थी, पर उसका भारी पेट और डर उसे वहीं रोक रहे थे।

फिर अनाया बोली, उसकी आवाज टूट रही थी।

“पापा ने कहा था कि अगर मैं यह नहीं बोलूंगी कि मम्मा निशा मुझे मारती हैं… तो वह उनका बच्चा पैदा होते ही उनसे छीन लेंगे।”

अदालत में एक साथ कई सांसें अटक गईं।

विक्रम उछलकर खड़ा हुआ। “झूठ!”

अनाया रो पड़ी।

न्यायाधीश गरजीं, “शांति!”

पर बच्ची ने अपनी आस्तीन ऊपर कर दी।

उसकी कलाई पर बैंगनी निशान था। साफ, गहरा, जैसे किसी बड़े हाथ की उंगलियां वहां धंस गई हों।

निशा ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया। पेट अचानक दर्द से कस गया।

विक्रम जल्दी-जल्दी बोला, “स्कूल में गिर गई होगी। बच्चे खेलते हैं, चोट लगती रहती है।”

अनाया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“अनाया, सोचकर बोलो,” विक्रम ने दांत भींचे।

न्यायाधीश सीधी बैठ गईं। “अगर आपने बिना अनुमति इस बच्ची से एक शब्द और कहा, तो आपको तुरंत बाहर करवाया जाएगा।”

रिया विक्रम के पास झुककर फुसफुसाई, “कुछ करो।”

मेज पर रखा ध्वनि यंत्र उसकी आवाज पकड़ चुका था। न्यायाधीश ने धीरे से उसकी ओर देखा।

“आप सचमुच भूल रही हैं कि आप कहां बैठी हैं।”

अनाया बिना आवाज के रो रही थी। निशा उन आंसुओं को पहचानती थी। वही आंसू जो अनाया की जैविक मां मीरा की मौत के बाद रातों में बहते थे। मीरा कैंसर से गई थी, जब अनाया सिर्फ 3 साल की थी। निशा ने अनाया को जन्म नहीं दिया था, मगर उसे जीना सिखाया था। स्कूल के लिए चोटी बनाना, परांठे के किनारे काटना, तूफान में खिड़की बंद करके कहानी सुनाना, जन्मदिन पर उसकी पसंद की गुलाबी चूड़ियां लाना—सब निशा ने सीखा था।

विक्रम इसे “जिम्मेदारी निभाना” कहता था।

अनाया इसे मां कहती थी।

न्यायाधीश ने बच्ची के लिए कुर्सी मंगवाई। फिर हाथी की ओर इशारा किया।

“अनाया, तुमने मुझसे कहा था कि गज्जू सच जानता है। इसका क्या मतलब है?”

विक्रम का चेहरा राख जैसा हो गया।

पहली बार निशा ने उसके चेहरे पर असली डर देखा।

अनाया ने हाथी का घिसा कान सहलाया।

“मेरी असली मम्मी मीरा ने जाने से पहले कहा था कि जब बहुत डर लगे, तो गज्जू की सूंड दबाना। वह मेरी आवाज संभाल लेगा।”

विक्रम के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला।

“नहीं।”

और वही शब्द उसे बेनकाब करने के लिए काफी था।

PART 2

न्यायाधीश ने धीरे से पूछा, “क्या अदालत गज्जू को ध्यान से देख सकती है?”

अनाया ने पहले निशा को देखा। निशा ने आंसुओं के बीच सिर हिलाया।

“कोई उसे छीनेगा नहीं, बेटा। बस सच को बोलने दिया जाएगा।”

बच्ची ने हाथी आगे बढ़ा दिया। कर्मचारी ने सूंड की सिलाई खोली। भीतर एक छोटा-सा ध्वनि यंत्र था।

रिया का चेहरा पीला पड़ गया।

ध्वनि चलाई गई।

पहले दरवाजा बंद होने की आवाज आई, फिर रिया की आवाज—

“निशा अनाया से ज्यादा प्यार करती है। बच्ची को हथियार बनाओ, वह सब छोड़ देगी।”

फिर विक्रम बोला—

“अगर अनाया कहेगी कि निशा उसे मारती है, तो अदालत उसे मुझसे दूर कर देगी। निशा डरकर मकान, खाते, कंपनी सब छोड़ देगी।”

रिया हंसी।

“और बच्चा पैदा होने के बाद उसे भी ले लेंगे। बिना पैसे की औरत ज्यादा दिन नहीं लड़ती।”

निशा चीखी नहीं। वह बस स्थिर खड़ी रही, जैसे भीतर से टूटती दीवार बाहर से अभी भी खड़ी हो।

ध्वनि आगे बढ़ी।

विक्रम की आवाज आई—

“निशान हल्का रखना। बस इतना कि अदालत भरोसा कर ले।”

रिया बोली—

“मैं पकड़ती हूं। तुम उसे समझा देना कि सच बोली तो निशा को कभी नहीं देख पाएगी।”

अनाया ने अपने कान ढक लिए।

न्यायाधीश ने विक्रम को देखा।

“अब आप क्या कहना चाहेंगे?”

विक्रम गरजा, “यह गैरकानूनी है! बच्ची को सिखाया गया है!”

अनाया अचानक चीखी, “मैं झूठी नहीं हूं!”

और उसी क्षण रिया ने कांपते हुए कहा—

“मैं अकेली दोषी नहीं हूं।”

PART 3

अदालत फिर से सांस लेने लगी, मगर हर सांस भारी थी। निशा ने अपने दोनों हाथ पेट पर रखे और कुर्सी पकड़ ली। फराह खान ने तुरंत उसे सहारा दिया, पर निशा की आंखें सिर्फ अनाया पर थीं। वह बच्ची कुर्सी पर बैठी थी, गज्जू से खाली हाथ, जैसे उसके सीने से ढाल छीन ली गई हो।

न्यायाधीश त्रिपाठी ने आदेश दिया, “कार्यवाही 15 मिनट के लिए स्थगित की जाती है। कोई भी व्यक्ति न्यायालय परिसर से बाहर नहीं जाएगा। बाल संरक्षण अधिकारी, महिला प्रकोष्ठ और पुलिस को तुरंत बुलाया जाए।”

विक्रम ने मेज पर मुक्का मारा। “आप सब एक बच्ची की कहानी पर यकीन कर रहे हैं?”

न्यायाधीश की आवाज पत्थर जैसी हो गई। “हम एक बच्ची के डर, चोट और आपके अपने शब्दों को सुन रहे हैं।”

रिया अब विक्रम से दूर सरक चुकी थी। वह अभी कुछ देर पहले तक विजेता की तरह बैठी थी। अब उसकी आंखों में वह डर था जो साथी अपराधी को तब महसूस होता है जब ताकतवर आदमी उसे बचाने के बजाय बेचने लगता है।

विक्रम ने उसे घूरा। “चुप रहना।”

रिया कांप गई। वही स्वर, वही आदेश, वही चेहरा। उसे पहली बार समझ आया कि वह उस घर में रानी नहीं बनने जा रही थी। वह भी किसी दिन निशा की तरह गिरा दी जाने वाली मोहरा थी।

कार्यवाही दोबारा शुरू हुई तो कमरे में 2 पुलिसकर्मी, एक बाल संरक्षण अधिकारी और एक महिला अधिकारी मौजूद थीं। गज्जू अब पारदर्शी थैली में रखा था। अनाया उसे देखती रही। वह हाथी उसके लिए खिलौना नहीं था। वह उसकी मर चुकी मां मीरा की आखिरी छुअन था, उसकी रातों का सहारा था, उसका रहस्य था। अब वही अदालत में सबूत बन गया था।

न्यायाधीश ने कहा, “इस अदालत के सामने गंभीर संकेत हैं कि एक गर्भवती महिला पर संपत्ति छोड़ने का दबाव डाला गया, एक नाबालिग बच्ची को झूठ बोलने के लिए धमकाया गया, और उसे शारीरिक चोट पहुंचाई गई। ऐसी स्थिति में किसी समझौते को मान्यता नहीं दी जाएगी।”

विक्रम का वकील उठा, मगर उसकी आवाज में आत्मविश्वास नहीं था। “माननीय न्यायालय, ध्वनि की जांच आवश्यक है। बच्ची प्रभावित हो सकती है—”

अनाया ने सिर उठाया।

“मैं झूठी नहीं हूं।”

वकील चुप हो गया।

न्यायाधीश ने ठंडे स्वर में कहा, “आगे बोलिए, अगर आपको यह कहना जरूरी लगता है कि 6 साल की बच्ची ने अपनी कलाई पर निशान भी खुद बना लिया।”

वकील बैठ गया।

विक्रम का चेहरा गुस्से से लाल था। “निशा हमेशा मेरी बेटी को मुझसे दूर करना चाहती थी। मीरा के मरते ही इसने घर में मां बनने का नाटक शुरू कर दिया।”

निशा ने यह वार सह लिया। उसने जवाब नहीं दिया।

लेकिन अनाया ने दिया।

“वह मां बनने का नाटक नहीं करती थीं। पापा, आप पिता होने का नाटक करते थे।”

इतना गहरा सन्नाटा छाया कि बाहर गलियारे में चाय वाले के गिलास टकराने की आवाज भी सुनाई दे गई।

विक्रम का मुंह खुला, पर शब्द नहीं निकले।

न्यायाधीश ने आदेश पढ़ा। “अस्थायी व्यवस्था के तहत अनाया मल्होत्रा को श्रीमती निशा मल्होत्रा की देखरेख में रखा जाएगा। विक्रम मल्होत्रा को बिना निगरानी बच्ची से मिलने की अनुमति नहीं होगी। संपत्ति, बैंक खाते, कंपनी के हिस्से और वाहनों पर कोई भी हस्तांतरण या विक्रय अगली जांच तक रोका जाता है।”

विक्रम भड़क उठा। “वह उसकी मां नहीं है! उसका खून नहीं है!”

अनाया ने निशा की उंगलियां पकड़ लीं।

“उनके पास मेरा खून नहीं है, पर उनके पास मेरी रातें हैं। मेरे बुखार हैं। मेरे स्कूल के डर हैं। मेरी टूटी गुड़िया है। यह खून से ज्यादा होता है।”

निशा फूट पड़ी। उसने कठिनाई से झुककर अनाया को बांहों में ले लिया। बच्ची उसके गले से ऐसी चिपकी जैसे कई महीनों से सांस रोके बैठी थी।

रिया अचानक खड़ी हो गई। “मुझे सच बोलना है।”

विक्रम गरजा, “बैठ जाओ।”

रिया रोते हुए बोली, “उसने कहा था कि निशा मानसिक रूप से कमजोर है। उसने कहा था कि बच्ची पहले से डरती है, हमें बस अदालत को दिखाना है। उसने कहा था कि तलाक के बाद वह मकान बेच देगा, पैसे अलग कर देगा और हम मुंबई चले जाएंगे। उसने मुझसे कहा था कि बस 1 छोटा निशान काफी है।”

विक्रम उसकी ओर झपटा।

पुलिसकर्मियों ने उसे 2 कदम में रोक लिया।

अनाया चीख पड़ी।

निशा ने उसे अपने सीने में छिपा लिया। उसका अपना पेट बीच में था, बच्चा भीतर हिल रहा था, फिर भी वह अपने दोनों बच्चों के सामने दीवार बन गई।

विक्रम चिल्लाया, “तुम सबने मुझे बर्बाद कर दिया! निशा, तुम और यह एहसानफरामोश लड़की!”

अनाया कांप गई।

निशा ने पहली बार उसे सीधे देखा। महीनों से डर उसके पीछे-पीछे चलता था—फोन की घंटी में, दरवाजे की आवाज में, अस्पताल की पर्ची में, बैंक संदेश में। पर उस पल डर थम गया। उसकी जगह एक ठंडी, साफ ताकत आई।

“नहीं, विक्रम,” उसने कहा। “तुम खुद बर्बाद हुए हो।”

विक्रम ने दांत पीसे। “तुम्हारे पास कुछ नहीं है।”

निशा ने एक हाथ पेट पर रखा, दूसरा अनाया के सिर पर।

“मेरे पास मेरे बच्चे हैं।”

उस दिन अदालत से निशा बाहर निकली तो उसके पास कोई सोने का हार नहीं था, न घर की चाबियों का गर्व, न जीत का शोर। लेकिन उसके हाथ में संरक्षण आदेश था, अनाया की अस्थायी अभिरक्षा थी, प्रसव खर्च के लिए सुरक्षित खाते की अनुमति थी, और यह लिखित रोक थी कि विक्रम कोई संपत्ति हिला नहीं सकेगा।

बाहर दिल्ली की सड़क पर ट्रैफिक चिल्ला रहा था। लोग ऑटो पकड़ रहे थे, वकील फाइलें लेकर भाग रहे थे, गोलगप्पे वाला ठेला लगा रहा था। दुनिया वैसे ही चल रही थी जैसे किसी का घर टूटना कोई बड़ी बात न हो।

अनाया ने पूछा, “हम आज रात कहां सोएंगे?”

यह सवाल निशा के दिल में सबसे गहरे चुभा।

वह धीरे से बैठी, पेट संभाला, और बच्ची का चेहरा थामा।

“पहले फराह दीदी के घर। उन्होंने कमरा दिया है। फिर हम छोटा-सा घर ढूंढेंगे।”

“हम गरीब हो जाएंगे?”

निशा की आंखें भर आईं।

“शायद हमारे पास चीजें कम होंगी। लेकिन डर भी कम होगा।”

अनाया ने गंभीरता से सोचा। “कम चीजों वाले लोग आलू परांठा खा सकते हैं?”

निशा पहली बार हंसी। टूटी हुई, भीगी हुई, मगर सच्ची हंसी।

“हां। आलू परांठा सबके लिए होता है।”

अनाया उसके पेट से गाल लगाकर बोली, “तो हम ठीक रहेंगे।”

3 महीने बाद निशा ने दिल्ली के एक अस्पताल में बेटे को जन्म दिया। यह वह प्रसव नहीं था जिसका सपना उसने शादी के समय देखा था। विक्रम हाथ पकड़कर रो नहीं रहा था। ससुराल वाले मिठाई लेकर नहीं आए थे। कमरे में कोई बड़ा परिवार नहीं था जो नामकरण पर बहस करे। फिर भी वह कमरा अजीब तरह से भरा हुआ था।

फराह खान एक थैला लेकर आईं जिसमें तेल, कंघी और बच्चे के कपड़े थे। पड़ोस की बुजुर्ग कमला आंटी घर का बना दलिया लाई थीं। अनाया अगले दिन गज्जू को छाती से चिपकाए आई। उसकी सूंड पर नई सिलाई थी, सफेद धागा साफ दिख रहा था।

वह पालने के पास गई।

“इतना छोटा है?”

निशा मुस्कुराई। “सब ऐसे ही शुरू करते हैं।”

“नाम क्या है?”

निशा ने अपने सोते हुए बेटे को देखा। कई हफ्तों तक उसने ऐसा नाम खोजा था जिसमें डर की गंध न हो, धोखे की छाया न हो। उसे ऐसा नाम चाहिए था जो नई शुरुआत जैसा लगे।

“आरव मीरा।”

अनाया की आंखें फैल गईं। “मीरा जैसे मेरी आसमान वाली मम्मी?”

निशा ने सिर हिलाया।

“हां। उस मां के नाम पर जिसने तुम्हें गज्जू दिया। जिसने जाते-जाते भी तुम्हें बचाया।”

अनाया ने बच्चे की छोटी उंगली छुई।

“तो इसके पास भी 2 मां हैं। एक आसमान में, एक यहां।”

निशा बोल नहीं पाई। उसने अनाया को अपने पास खींच लिया। उस पल अस्पताल का छोटा कमरा उस बड़े बंगले से ज्यादा घर लग रहा था जिसे विक्रम ने अहंकार और झूठ से भर दिया था।

मुकदमा कई महीनों तक चला। विक्रम हर सुनवाई में नया झूठ लाता। कभी कहता ध्वनि नकली है, कभी कहता रिया बदला ले रही है, कभी कहता अनाया को निशा ने सिखाया है, कभी कहता संपत्ति का मामला अलग है। पर हर झूठ पिछले झूठ से टकराता रहा।

जांच में ध्वनि सही निकली। बैंक खातों में रिया को भेजी गई बड़ी रकम सामने आई। कंपनी के हिस्से चोरी-छिपे बदलने की कोशिश पकड़ी गई। पुराने संदेशों में विक्रम ने लिखा था कि “निशा के पास लड़ने के साधन नहीं रहने चाहिए।” रिया के संदेशों में लिखा था कि “बच्ची ने अपना हिस्सा ठीक से याद कर लिया है या नहीं।”

लेकिन सबसे बड़ा मोड़ एक ऐसी औरत की ओर से आया जिसे निशा ने कभी जिंदा नहीं देखा था, पर जिसकी छाया हमेशा अनाया के माथे पर रही थी।

मीरा की एक सीलबंद चिट्ठी सामने आई, जो उसने अपनी बीमारी के आखिरी दिनों में एक वकील के पास रखवाई थी। उसमें लिखा था कि यदि कभी विक्रम अनाया को भावनात्मक या शारीरिक खतरे में डाले, तो उस व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाए जिसने वास्तव में उसके जीवन में मां की रोजमर्रा की भूमिका निभाई हो।

नीचे नाम लिखा था—निशा।

निशा ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी। उसके हाथ इतने कांपे कि फराह को कागज पकड़ना पड़ा।

मीरा ने वह देख लिया था जिसे दुनिया ने देर से समझा। उसने देखा था कि निशा अनाया की रजाई ठीक करती थी, उसे स्कूल की कविता याद करवाती थी, उसके डर को बिना हंसे सुनती थी। उसने समझ लिया था कि मां होना हमेशा जन्म से शुरू नहीं होता।

कभी-कभी मां होना एक शांत वादा होता है—मैं नहीं जाऊंगी।

अंतिम निर्णय में विक्रम को कड़ी शर्तों के साथ सीमित निगरानी मुलाकात की अनुमति दी गई, वह भी तब जब विशेषज्ञ अनुमति दें। संपत्ति का बंटवारा कानून के अनुसार हुआ। निशा को उसके हिस्से वापस मिले, जिन पर विक्रम कब्जा करना चाहता था। रिया को भी पूछताछ और मुकदमे का सामना करना पड़ा। जिस स्त्री ने कभी सोशल मीडिया पर महंगे कैफे, नए गहने और “सच्चा प्यार जीतता है” जैसी बातें दिखाईं थीं, वह अचानक गायब हो गई। लोगों ने कहा वह अपनी बहन के पास पुणे चली गई।

निशा ने कभी पूछा नहीं।

जिसने उसका घर जलाने की कोशिश की थी, उसके धुएं की दिशा जानना अब जरूरी नहीं था।

1 साल बाद निशा फिर उसी न्यायालय की सीढ़ियां चढ़ रही थी। इस बार वह कुछ छोड़ने नहीं आई थी। न मकान, न खाते, न 2 गाड़ियां, न अपनी गरिमा।

वह उस अधिकार के लिए आई थी जो अनाया ने उसे बहुत पहले दे दिया था—मां कहलाने का अधिकार।

अनाया ने सफेद सलवार-कुर्ता पहना था और बालों में छोटी-सी गुलाबी क्लिप लगाई थी। आरव निशा की गोद में खिलखिला रहा था, हर बार जब अनाया गज्जू की सूंड हिलाती। गज्जू अब भी पुराना था, थका हुआ था, पर सच्चा गवाह था।

जब न्यायाधीश ने फैसला पढ़ा, अनाया ने सांस रोक ली।

“न्यायालय अनाया मल्होत्रा के सरल दत्तक ग्रहण को श्रीमती निशा मल्होत्रा के पक्ष में स्वीकृति देता है।”

अनाया ने निशा को देखा।

“मतलब अब सच में?”

निशा की आंखों से आंसू बह रहे थे।

“हां, मेरी जान। अब सच में।”

अनाया उससे लिपट गई।

“अब कोई नहीं कह सकेगा कि आप मेरी मम्मा नहीं हो।”

निशा ने उसे सीने से लगाया।

“कोई नहीं।”

बाहर निकलते समय स्वागत कक्ष पर निशा के नाम एक लिफाफा रखा था। वह न्यायाधीश त्रिपाठी की ओर से था। निशा ने सीढ़ियों पर खड़े-खड़े उसे खोला। आरव उसके कंधे पर था, अनाया उसकी उंगली पकड़े थी।

चिट्ठी में लिखा था—

“कुछ औरतें अदालत में यह सोचकर आती हैं कि वे सब हार जाएंगी। फिर वही औरतें न्याय को याद दिलाती हैं कि सबसे कीमती चीज कभी मकान, बैंक खाते या 2 गाड़ियों में नहीं होती। वह उन बांहों में होती है जो डर के सामने भी बच्चे को छिपा लेती हैं।”

निशा ने चिट्ठी सावधानी से मोड़ दी।

अनाया ने सड़क की ओर देखा। धूप थी, ऑटो के हॉर्न थे, लोग भाग रहे थे, जीवन अपनी सामान्य अव्यवस्था में लौट रहा था।

“मम्मा, अब हम आजाद हैं?”

निशा ने अपनी बेटी को देखा। फिर अपने बेटे को। फिर उस आसमान को जो उस दिन किसी भी बंगले की छत से बड़ा लग रहा था।

“हां,” उसने कहा। “हम आजाद हैं।”

अनाया मुस्कुराई।

“और आजाद लोग आलू परांठा खा सकते हैं?”

निशा इस बार खुलकर हंसी।

“सबसे पहले आजाद लोग ही खाते हैं।”

वे सीढ़ियां उतर गईं। निशा की गोद में आरव था, हाथ में अनाया की उंगलियां थीं, और बैग में गज्जू आराम कर रहा था। उसके पास दिखाने के लिए महंगे गहने नहीं थे, न वह चाबी थी जिससे कभी उसे अपमानित किया गया था, न वह झूठी तस्वीर थी जिसे दुनिया परफेक्ट परिवार कहती।

लेकिन वह खाली नहीं थी।

वह अपने बेटे के साथ चल रही थी।

वह अपनी बेटी के साथ चल रही थी।

वह उस सच्चाई के साथ चल रही थी जिसे अब कोई छीन नहीं सकता था—कभी-कभी एक औरत अदालत में यह समझकर आती है कि उसकी पूरी जिंदगी हार जाएगी, और वहीं से वह उस परिवार को लेकर लौटती है जिसे सच में बचाया जाना चाहिए था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.