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क्रिसमस के दिन, मेरे पति चिल्लाए, “आख़िर वह कहाँ है…?”

भाग 2

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मेसन की आवाज़ मुझे घर की गर्म हवा से पहले सुनाई दी।

—तुम कहाँ थीं? सच में… आखिर तुम गई कहाँ थीं?

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वह डाइनिंग रूम के किनारे खड़ा था, जैसे घर की सारी हवा उसी की हो। उसका जबड़ा कसा हुआ था और उसकी नज़र मुझसे ज़्यादा दीवार पर लगी घड़ी पर थी।

—मेरा पूरा परिवार एक घंटे से यहाँ बैठा है। भूखा। और मेज़ अभी तक नहीं लगी।

मैं नहीं सिहराई।

इसलिए नहीं कि मैं बहादुर थी।

बल्कि इसलिए कि मेरे भीतर अब ऐसी कोई जगह बची ही नहीं थी जो प्रतिक्रिया देती।

मेरे कोट से बर्फ पिघलकर धीरे-धीरे टपक रही थी और प्रवेश-द्वार के लकड़ी के फ़र्श पर गिर रही थी। सीढ़ियों की रेलिंग पर लगी चीड़ की सजावट से राल और दालचीनी की खुशबू आ रही थी। पूरे घर में मोमबत्तियों की वह हल्की जली हुई मीठी गंध फैली हुई थी जिन्हें उसकी माँ हर साल ज़िद करके जलाती थी—शायद वनीला की खुशबू। इतनी तेज़ कि लगता था जैसे किसी और गंध को छिपाने की कोशिश की जा रही हो।

मेज़ पर उसका परिवार अपने सबसे अच्छे क्रिसमस के कपड़ों में बैठा था।

उसके पिता की गोद में नैपकिन बिल्कुल त्रिकोण की तरह तह किया हुआ था।

उसकी बहन पैज अपने फ़ोन को ऐसे देख रही थी जैसे दुनिया की सबसे दिलचस्प चीज़ वही हो।

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उसकी माँ सीधे मुझे देख रही थीं, लेकिन वास्तव में नहीं—वैसे जैसे लोग अपनी कार की डेंट को देखते हैं जिसके बारे में बात नहीं करना चाहते।

कोई हिला नहीं।

किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

मेरे दाएँ हाथ में अब भी चाबियाँ थीं।

वे इतनी ठंडी थीं कि जल रही थीं।

मेरा बायाँ हाथ कोट की जेब में था और उँगलियाँ किसी सपाट, सख़्त चीज़ को पकड़े थीं, जिसकी नुकीली धारें मुझे बार-बार याद दिला रही थीं कि वह सचमुच मौजूद है।

मेसन एक कदम आगे बढ़ा और आवाज़ धीमी कर ली, जैसे वह हमेशा करता था जब वह खुद को समझदार दिखाना चाहता था।

—आज क्रिसमस है। तुम बस… यहाँ नहीं रह सकती थीं? जैसे वादा किया था?

—मैं यहाँ हूँ।

वह एक बार हँसा।

बिना किसी खुशी के।

फिर उसने अपने परिवार की ओर देखा जैसे मैं कोई मज़ाक हूँ।

—इसे तुम यहाँ होना कहती हो?

उसके पीछे झूमर की रोशनी बहुत तेज़ चमक रही थी, पॉलिश की हुई मेज़ पर पड़कर पूछताछ वाले लैम्प जैसी लग रही थी। बीच में उसकी माँ का बड़ा सिरेमिक सांता रखा था, जो मुस्कुरा रहा था जैसे कोई झूठा आदमी मुस्कुराता है।

उसके बगल में एक ढका हुआ सर्विंग डिश रखा था, जिसके ढक्कन पर भाप जमा थी।

मक्खन और मांस की गंध हवा में फैल रही थी।

शायद हैम।

या टर्की।

मेसन हमेशा कहता था कि उसे फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि वह “नखरेबाज़ नहीं है।”

लेकिन उसे हमेशा ठीक-ठीक पता होता था कि उसे क्या चाहिए।

और उसे हमेशा चाहिए होता था कि वह काम मैं करूँ।

मैं बहुत कुछ कह सकती थी।

मैं कह सकती थी: कल रात मैं आधी रात तक काम करती रही क्योंकि क्लिनिक में स्टाफ़ कम था और इमरजेंसी उन लोगों से भरी हुई थी जिनके पास परिवार नहीं था जो उन्हें प्लेटें लगाने के लिए डाँट सके।

मैं कह सकती थी: तुमने उन्हें तीन बजे बुलाया, जबकि मैंने पाँच बजे कहा था।

मैं कह सकती थी: तुम्हारे पास हाथ हैं, दिमाग है, और मैंने तुम्हें बारबेक्यू ऐसे लगाते देखा है जैसे नासा का इंजीनियर कोई मिशन तैयार कर रहा हो। इसलिए बेबस बनने का नाटक मत करो।

लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।

मैंने धीरे-धीरे अपने जूते उतारे।

एक।

फिर दूसरा।

मैंने उन्हें चटाई पर उसी तरह करीने से रख दिया जैसे हमेशा रखती थी।

क्योंकि मेसन को “साफ़-सुथरी चीज़ें” पसंद थीं।

मेरे गीले मोज़े फ़र्श पर हल्की आवाज़ कर रहे थे।

उसकी माँ ने धीरे से गला साफ़ किया।

नरम।

नाटकीय।

—हार्पर, बेटा… हमें बस यह नहीं पता था कि तुम कहाँ चली गई थीं।

“बेटा” शब्द किसी जाल जैसा लगा।

—मुझे एक काम था।

मैंने शांत स्वर में कहा।

मेरे मुँह में ठंडी हवा और बासी कॉफ़ी का स्वाद था।

मेसन की आँखें सिकुड़ गईं।

—एक काम था?

उसने दोहराया।

जैसे उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि मेरी ज़िंदगी उसके कार्यक्रम के बाहर भी हो सकती है।

—क्रिसमस वाले दिन?

मैंने कोट के बटन खोलने शुरू किए।

मेरी उँगलियाँ ठंड और उस अजीब शांत धड़कन के कारण सुस्त थीं जो मेरे सीने में बस चुकी थी।

शांति हमेशा सुकून नहीं होती।

कभी-कभी उसका मतलब होता है कि तुम पहले ही तय कर चुके हो कि क्या जलाना है।

आख़िरी बटन खुल गया।

घर की हवा बहुत गर्म, बहुत सूखी लगी।

भट्ठी की आवाज़ वेंट्स में धातु जैसी साँस छोड़ रही थी।

रसोई में कहीं टाइमर लगातार बीप कर रहा था।

लेकिन उसे बंद करने कोई नहीं गया।

मेसन ने उँगलियाँ चटकाईं।

तेज़।

—तो? मेज़ लगाने वाली हो या हमें और इंतज़ार करवाओगी?

पैज ने पहली बार फ़ोन से सिर उठाया।

बस इतना कि मुझे उसके ऊपर से देख सके।

उसकी नज़र मेरी कोट की जेब पर गई।

बहुत छोटा-सा इशारा।

जैसे उसने भी उसे देख लिया हो।

मैं मेसन को छुए बिना उसके पास से निकल गई।

हमारे बीच की हवा बिजली जैसी लग रही थी।

रोमांस वाली नहीं।

खतरे वाली।

उसकी कोलोन—देवदार और काली मिर्च की खुशबू—मुझे महसूस हुई।

और उसके नीचे कुछ और।

कोई मीठी फूलों वाली गंध।

जो हमारे घर की नहीं थी।

कपड़े धोने का डिटर्जेंट?

हैंड लोशन?

परफ़्यूम?

एक याद चमकी।

कुछ हफ्ते पहले बेडरूम में मेसन अपनी शर्ट उतार रहा था।

कॉलर पर हल्का गुलाबी निशान था।

जैसे किसी ने लिपस्टिक पोंछी हो।

मैंने पूछा था।

उसने कहा था:

—शायद तुम्हारा मेकअप होगा।

और फिर मेरे माथे को चूम लिया था जैसे मैं यह देखकर प्यारी लग रही हूँ।

अब मैं प्यारी नहीं रही थी।

रसोई में काउंटर बर्तनों, फ़ॉयल और उसकी माँ के कैसरोल कंटेनरों से भरे हुए थे।

सिंक में गंदा पानी और बर्तन पड़े थे।

जैसे किसी ने सफ़ाई शुरू की और बीच में छोड़ दी।

भुने हुए लहसुन और रोज़मेरी की खुशबू हवा में थी।

और उसके नीचे वही मीठी वनीला मोमबत्ती लड़ रही थी।

मैंने अलमारी से प्लेटों का ढेर निकाला।

मेरे हाथ अपने आप चल रहे थे।

प्लेट।

प्लेट।

प्लेट।

क्योंकि मेरा शरीर उपयोगी बने रहना जानता था, भले ही मेरा दिमाग कहीं और हो।

मैंने उन्हें काउंटर पर रखा और कटलरी की दराज़ खोली।

मेसन मेरे पीछे-पीछे आया।

जैसा वह हमेशा करता था।

जैसे मेरी पूरी ज़िंदगी कोई शो हो जिसके टिकट उसने खरीदे हों।

वह दरवाज़े से टिककर खड़ा हो गया।

—जानती हो? —उसने कहा— माँ ने इस साल डिनर खुद संभालने की पेशकश की थी। लेकिन मैंने कहा कि तुम करना चाहोगी। तुम्हें ये सब बहुत पसंद है।

मैं हँसी रोक नहीं पाई।

वह चौंक गया।

—क्या?

—कुछ नहीं।

मैंने काँटे निकालते हुए कहा।

धातु की ठंडक उँगलियों से टकराई और उनकी नोकें रोशनी में छोटे दाँतों जैसी चमकीं।

मेसन पास आया।

—हार्पर। ऐसा मत करो। उनके सामने रवैया मत दिखाओ।

—उनके सामने?

मैंने धीरे से दोहराया।

और मेरे भीतर कुछ बदल गया।

जैसे कोई ताला खुल गया हो।

उसने नहीं सुना।

मेसन कभी ज़रूरी आवाज़ें नहीं सुनता था।

जब तक बहुत देर न हो जाए।

डाइनिंग रूम से उसकी माँ ने पुकारा:

—मेसन, सब ठीक है ना?

—हाँ, सब ठीक है।

उसने आवाज़ में मुस्कान लाकर जवाब दिया।

फिर मेरी ओर मुड़ा।

मुस्कान गायब हो चुकी थी।

—बस जल्दी करो।

मैं काँटे लेकर डाइनिंग रूम में गई और प्लेटों के बगल में रखने लगी।

लेकिन मेज़ के बीच में पहुँचकर मैं रुक गई।

क्योंकि वहाँ एक अतिरिक्त जगह लगी हुई थी।

ऐसी नहीं कि किसी ने गलती से एक प्लेट ज़्यादा रख दी हो।

ऐसी जैसे उसे पहले से योजना बनाकर लगाया गया हो।

एक प्लेट।

एक तह किया हुआ नैपकिन।

एक वाइन ग्लास जो इतना चमकाया गया था कि झूमर की रोशनी उससे टकराकर चमक रही थी।

और उसके सामने एक नाम-पट्टिका।

सफेद कार्ड।

काले मार्कर से लिखा हुआ नाम।

बड़े अक्षरों में।

SAVANNAH

दुनिया जैसे एक पल को झुक गई।

मेरे कानों में सबकी साँसें अचानक बहुत तेज़ सुनाई देने लगीं।

मेरी त्वचा में सिहरन दौड़ गई।

मेसन ने मेरी रुकावट देख ली।

—अब क्या हुआ?

मैंने जवाब नहीं दिया।

मैं उस नाम को देखती रही।

क्योंकि मैंने वह नहीं लिखा था।

और उसके परिवार में किसी का नाम सवाना नहीं था।

धीरे-धीरे मेरे पेट में एक भारी यक़ीन उतर गया।

मैंने सिर उठाकर मेसन की ओर देखा।

और उसके चेहरे पर वह घबराहट देखी जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रहा था।

तो फिर क्रिसमस डिनर पर आने वाला यह सवाना कौन था?

मैंने अपने हाथों को चलते रहने पर मजबूर किया।

काँटा रखा।

छुरी रखी।

चेहरे पर मुस्कान रखी।

नाक से साँस ली जैसे हवा में कोई चेतावनी न घुली हो।

—हार्पर?

उसकी माँ आगे झुकीं।

—बेटा, क्या हम किसी का इंतज़ार कर रहे हैं?

मेसन ने बहुत जल्दी जवाब दिया।

—कोई नहीं।

यह मज़ेदार था।

“कोई नहीं” के लिए नाम-पट्टियाँ नहीं बनाई जातीं।

मैंने नैपकिन सीधा करते हुए पूछा:

—सवाना कौन है?

उसकी आँखें परिवार की ओर गईं।

फिर मेरी ओर लौटीं।

—एक क्लाइंट।

मैं लगभग फिर हँस पड़ी।

मेसन के “क्लाइंट” आमतौर पर उसके पिता के निर्माण-व्यवसाय वाले दोस्त होते थे जो छूट, एहसान और बीयर चाहते थे।

—एक क्लाइंट?

—हाँ।

उसने झुँझलाकर कहा।

—पैज ने उसे बुलाया है। बिज़नेस का मामला है। वह बस थोड़ी देर के लिए आएगी। और हार्पर, अभी अपना अजीब शक वाला ड्रामा मत शुरू करो।

पैज का सिर झटके से उठा।

—रुको… क्या?

वह सचमुच हैरान लग रही थी।

—मैंने तो—

मेसन ने उसे ऐसी नज़र से देखा कि वह तुरंत चुप हो गई।

उसके गाल लाल हो गए।

तो पैज ने उसे नहीं बुलाया था।

मैंने यह बात भी अपने मन की फ़ाइल में रख ली।

उन सारी चीज़ों के साथ जो महीनों से जमा हो रही थीं:

रात के “काम वाले फ़ोन कॉल”।

हमारे साझा लैपटॉप का नया पासवर्ड।

डाक को मुझसे पहले उठा लेना।

और मेरा उसके बटुए को छूना उसे पसंद न होना।

जैसे मैं उससे कुछ चुरा लूँगी।

जबकि वह धीरे-धीरे मेरी पूरी ज़िंदगी के टुकड़े चुरा रहा था।

उसकी माँ ने हाथ जोड़ लिए।

—मुझे परवाह नहीं कि पोप आ रहे हैं या नहीं। मुझे बहुत भूख लगी है।

उन्होंने बनावटी हँसी के साथ कहा।

—चलो खाना खाते हैं।

कुर्सियाँ खिसकीं।

प्लेटें खनकीं।

सब लोग फिर अपने अभिनय में लौट गए।

त्योहार वाली आवाज़ें।

शिष्ट हँसी।

वह नकली सामान्यता जो तुम्हें पागल महसूस कराती है।

मेसन मेज़ के सिरहाने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

जैसे कोई राजा अपने सिंहासन पर लौटता है।

सबके बैठने के बाद ही वह बैठा।

जैसे उस क्षण को महत्व देना चाहता हो।

मैं खड़ी रही।

—हार्पर। बैठो।

—मैं ग्रेवी भूल गई।

मैंने झूठ बोला।

—और रोल्स भी।

उसकी माँ की आँखें फैल गईं।

—अरे भगवान, रोल्स नहीं!

—मैं ले आती हूँ।

मैं मुड़ी।

दिल एक बार ज़ोर से धड़का।

वैसे जैसे किसी ऐसे दरवाज़े को खोलने से पहले धड़कता है जिसे बंद नहीं किया जा सकता।

रसोई में टाइमर अब भी बीप कर रहा था।

मैंने उसे बंद किया और ओवन खोला।

गर्म हवा चेहरे पर लगी।

मक्खन और खमीर की खुशबू आई।

एक पल के लिए मुझे अपना बचपन याद आ गया।

माँ की रसोई।

उनका गुनगुनाना।

आटे से सने हाथ।

अब वह याद हमेशा दर्द के साथ आती थी।

मेसन की माँ सबको बताती थीं कि मेरी माँ की मौत ने मुझे “नाज़ुक” बना दिया है।

मेसन भी यही शब्द इस्तेमाल करता था।

जब भी मैं उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं ढलती।

नाज़ुक लोग वह सब नहीं झेलते जो मैं झेल चुकी थी।

मैंने रोल्स टोकरी में रखे और फ्रिज खोला।

ग्रेवी निकालने के लिए झुकते ही मेरी नज़र पीछे रखे एक मनीला फ़ोल्डर पर पड़ी।

उसे जल्दी में छिपाया गया था।

कोना मुड़ा हुआ था।

ऊपर टेप लगा था।

और टैब पर मेरा नाम लिखा था।

HARPER LANE

मेरा पेट सिकुड़ गया।