
“क्या श्री रुद्रवीर कुलकर्णी यहाँ मौजूद हैं?”
मेरे बेटे ने उस आदमी की ओर ऐसे देखा, मानो किसी ने उसके अपने ही बगीचे में उसका पूरा नाम लेकर उसका अपमान कर दिया हो।
“मैं ही रुद्रवीर हूँ,” उसने कहा। “और यह निजी संपत्ति है।”
उस आदमी ने एक बार नौकरों के कमरे की ओर देखा।
मैं दरवाज़े पर खड़ी थी। मेरा सूटकेस मेरे पैरों के पास रखा था।
न छिप रही थी।
न रो रही थी।
अब खुद को परछाइयों में समेट नहीं रही थी।
उसने अपनी फ़ाइल खोली।
“मेरा नाम एडवोकेट ध्रुव पाटणकर है। मैं श्री आरव देशपांडे और श्रीमती केतकी देशपांडे का प्रतिनिधित्व करता हूँ, जो इस संपत्ति के वैध खरीदार हैं।”
एक पल के लिए बारबेक्यू का धुआँ पूरे बगीचे में धुंध की तरह फैल गया।
फिर मेहालिका हँस पड़ी।
इसलिए नहीं कि बात मज़ेदार थी।
बल्कि इसलिए कि उसका मन उस जगह खड़ा होने से इनकार कर रहा था, जहाँ सच उसे ले आया था।
“खरीदार?” उसने कहा। “क्या बकवास है। यह हमारा पुश्तैनी घर है।”
वकील ने शांत स्वर में उसकी ओर देखा।
“नहीं, मैडम। पिछले सप्ताह तक यह श्रीमती शांतिमोयी कुलकर्णी की स्वयं अर्जित संपत्ति थी। अब इसे कानूनी रूप से बेच दिया गया है और इसका पंजीकरण भी हो चुका है।”
रुद्रवीर के हाथ से गिलास छूट गया।
वह घास पर गिरा, लेकिन टूटा नहीं।
उसके दोस्तों ने खाना चबाना बंद कर दिया।
किसी के बच्चे ने संगीत बंद कर दिया।
मेरा पोता मेरे पुराने नीले कमरे से वीडियो गेम का कंट्रोलर हाथ में लिए बाहर आया और पुलिसवालों को घूरने लगा।
“दादी?” उसने धीरे से कहा।
उस एक शब्द ने मुझे लगभग तोड़ दिया।
लगभग।
लेकिन तभी मुझे अपने कमरे में रखे बीन बैग याद आ गए।
मेरे पति की तस्वीर के ऊपर लगा रेसिंग कार का पोस्टर याद आ गया।
मेरी खाट के पास की सीलन भरी दीवार याद आ गई।
और मैं वहीं अडिग खड़ी रही।
रुद्रवीर धीरे-धीरे मेरी ओर मुड़ा।
“माँ,” उसने कहा, जैसे यह शब्द अचानक फिर से उसके काम का हो गया हो। “ये क्या कह रहे हैं?”
मैं बगीचे में आगे बढ़ी।
झिलमिलाती लाइटों में हर चेहरा अपराधी जैसा लग रहा था।
“मैंने यह घर बेच दिया है,” मैंने कहा।
उसके बाद जो ख़ामोशी छाई, वह उस घर से भी बड़ी थी।
मेहालिका का मुँह खुला रह गया।
“क्या?”
“मैंने यह घर बेच दिया है।”
रुद्रवीर मेरी ओर बढ़ा।
न बहुत तेज़।
न बहुत धीरे।
जैसे कोई आदमी सपने को धमकाकर उससे जाग जाना चाहता हो।
“आप यह घर बेच ही नहीं सकतीं।”
मैंने उसकी आँखों में देखा।
“मैं पहले ही बेच चुकी हूँ।”
उसका चेहरा लाल पड़ गया।
“मुझसे पूछे बिना?”
“तुमने भी मुझे नौकरों के कमरे में भेजने से पहले मुझसे नहीं पूछा था।”
मेरे शब्द सीधे जाकर लगे।
उसके दोस्तों ने नज़रें फेर लीं।
मेहालिका चिल्लाई,
“वह बात अलग थी! बच्चों को जगह चाहिए थी!”
“और मुझे सम्मान चाहिए था।”
मेरी आवाज़ ज़रा भी नहीं काँपी।
यह बात मुझे खुद भी हैरान कर गई।
इकसठ रातों तक मैं यही शब्द वॉशिंग मशीन से, उस फटी हुई बाल्टी से और अपने दिवंगत पति की तह करके रखी तस्वीरों से फुसफुसाकर कहती रही थी।
अब वही शब्द मेरे मुँह से पूरे आत्मविश्वास के साथ निकल रहे थे।
रुद्रवीर ने अपनी आवाज़ धीमी कर ली।
“माँ, यह नाटक बंद करो। इन्हें बताइए कि कोई ग़लतफ़हमी हुई है।”
“कोई ग़लतफ़हमी नहीं हुई है,” एडवोकेट पाटणकर ने कहा। “बिक्री विलेख विधिवत पंजीकृत हो चुका है। नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। आपकी माता ने खाली कब्ज़ा सौंपने की शर्तों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, केवल अपना निजी सामान आज रात ले जाने की अनुमति उनके पास है।”
मेहालिका मेरी ओर घूमी।
“आपने हमारे सिर से छत छीन ली?”
मैंने उसकी ओर देखा।
“नहीं। मैंने अपनी छत बेची है। तुम लोग तो मुझे पहले ही उसकी छाया से बाहर कर चुके थे।”
उसका चेहरा विकृत हो गया।
“आप कितनी निर्दयी औरत हैं! हमने आपकी देखभाल की!”
मैं उस समय हँस पड़ी।
धीरे से।
मेरी वह हँसी उसके लिए मेरे ग़ुस्से से भी ज़्यादा डरावनी थी।
“देखभाल? तुमने मेरी दवाइयाँ वॉशिंग मशीन के ऊपर रख दी थीं। मेरा खाना सबके खाने के बाद परोसती थीं। अपने दोस्तों से कहती थीं कि मुझे ‘पीछे एडजस्ट कर दिया गया है’, जैसे मैं कोई अतिरिक्त सामान हूँ। तुमने मेरे पति की तस्वीरें टपकती पाइपों के नीचे रखे एक डिब्बे में फेंक दी थीं।”
मेरे पोते ने सिर झुका लिया।
मेरी आठ साल की पोती चुपचाप रोने लगी।
उस पूरे बगीचे में वही एक दर्द था, जो अब भी मेरे दिल तक पहुँच रहा था।
बच्चों को कभी बड़ों को इतना कुरूप बनते नहीं देखना चाहिए।
लेकिन कभी-कभी सच बहुत देर से आता है, और तब उसे बच्चों के खिलौनों के ऊपर से होकर ही गुज़रना पड़ता है।
रुद्रवीर पुलिसवालों की ओर मुड़ा।
“यह हमारे परिवार का मामला है। आप लोग जाइए।”
बुज़ुर्ग पुलिस अधिकारी अपनी जगह से नहीं हिले।
“सर, हम यहाँ कानूनी नोटिस की तामील के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा रोकने के लिए मौजूद हैं।”
“बाधा? मैं यहाँ रहता हूँ!”
एडवोकेट ने फ़ाइल से एक दस्तावेज़ निकाला।
“आपको बहत्तर घंटे के भीतर यह संपत्ति खाली करने का नोटिस दिया जा चुका है। चूँकि आप इस संपत्ति के न तो पंजीकृत मालिक हैं, न किरायेदार और न ही किसी वैध अनुबंध के तहत अधिकृत निवासी, इसलिए इस अवधि के बाद आपका यहाँ रहना अवैध कब्ज़ा माना जा सकता है।”
“अवैध?” मेहालिका चीख़ पड़ी। “हम पाँच साल से यहाँ रह रहे हैं!”
“और मैं यहाँ चौंतीस साल रही हूँ,” मैंने कहा। “फिर भी तुमने मेरा बिस्तर ऐसे बाहर फेंक दिया था जैसे वह कोई कूड़ा हो।”
रुद्रवीर मुझे ऐसे देखने लगा जैसे पहली बार किसी अजनबी को देख रहा हो।
अच्छा ही था।
मैंने भी खुद को तब तक नहीं पहचाना था, जब तक उन कागज़ों पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
“माँ,” उसने अचानक अपना लहजा बदलते हुए कहा, “अंदर आइए। हम बात करेंगे।”
“नहीं।”
उसकी आँखें एक पल को काँपीं।
“आप नाराज़ हैं। मैं समझता हूँ। लेकिन घर बेच देना? यह बहुत ज़्यादा हो गया।”
मैंने अपनी हथेली में रखी चाबियों के गुच्छे को छुआ।
वे अब भी वहीं थीं।
मुख्य दरवाज़े की चाबी।
छत की।
स्टोर रूम की।
मेरे पुराने कमरे की।
घर बिक जाने के बाद चाबियाँ अजीब लगने लगती हैं।
वे अब भी ताले खोल सकती हैं, लेकिन अब वे आपके भविष्य की नहीं रहतीं।
मैंने कहा,
“तुम्हें लगा था कि मेरे लिए पिछला कमरा काफ़ी है। तुम्हारे लिए बहत्तर घंटे काफ़ी होंगे।”
उसके चेहरे पर अपमान साफ़ दिखाई देने लगा।
उसके कुछ दोस्त असहज होकर खड़े हो गए।
उनमें से एक ने धीरे से कहा,
“रुद्र… हमें चलना चाहिए।”
अब किसी का कबाब खाने का मन नहीं था।
किसी को ठंडा पेय नहीं चाहिए था।
कोई भी उन रंग-बिरंगी लाइटों के नीचे नहीं बैठना चाहता था, जहाँ एक माँ का दर्द जड़ें जमाने लगा था।
अचानक मेहालिका घर की ओर दौड़ी।
“नहीं!” वह चिल्लाई। “कोई कहीं नहीं जाएगा। यह धोखाधड़ी है। असली कागज़ कहाँ हैं? रजिस्ट्री कहाँ है?”
एडवोकेट पाटणकर ने प्रमाणित प्रतियाँ ऊपर उठाईं।
“सब कुछ पूरी तरह वैध है।”
उसने उनकी बात अनसुनी कर दी और घर के भीतर भाग गई।
रुद्रवीर भी उसके पीछे चला गया।
मुझे पता था कि वह कहाँ जा रही है।
मेरे पुराने कमरे की लोहे की अलमारी।
वही लॉकर, जिसमें उसे लगता था कि मैं संपत्ति के कागज़ रखती हूँ।
कई महीनों तक मैं उसे खोजने का नाटक करते हुए देखती रही थी।
सफ़ाई करते समय दराज़ें खोलना।
बिलकुल सहज ढंग से पूछना कि “ज़रूरी कागज़” कहाँ रखे हैं।
अपने दोस्तों से कहना,
“माँ अब बूढ़ी हो गई हैं। हमें उनके सारे दस्तावेज़ व्यवस्थित कर देने चाहिए।”
व्यवस्थित।
बुज़ुर्गों से चोरी करने से पहले लोग अक्सर यही शब्द इस्तेमाल करते हैं।
एक मिनट बाद घर के भीतर से उसकी चीख़ सुनाई दी।
सारे मेहमान जड़ हो गए।
रुद्रवीर हाथ में एक खाली नीली फ़ाइल लेकर बाहर आया।
उसका चेहरा बिल्कुल फीका पड़ चुका था।
“माँ,” उसने फुसफुसाकर कहा, “कागज़ कहाँ हैं?”
मैंने उस फ़ाइल की ओर देखा।
उसी पुरानी नीली फ़ाइल में कभी मेरी पूरी ज़िंदगी रखी रहती थी।
अब उसमें सिर्फ़ हवा थी।
“सुरक्षित हैं,” मैंने कहा। “पिछले पाँच वर्षों में पहली बार।”
मेहालिका ग़ुस्से से बगीचे में वापस आई।
“आपने पहले से सब योजना बना रखी थी! आप बेचारी बनने का नाटक करती रहीं और पीछे से हमारे ख़िलाफ़ साज़िश रचती रहीं!”
“हाँ,” मैंने कहा।
मेरा यह जवाब उसे स्तब्ध कर गया।
मैंने आगे कहा,
“मैंने बेबस होने का अभिनय इसलिए किया, क्योंकि हर बार जब मैंने अपनी बात कही, तुमने मुझे नाटकबाज़ कहा। इसलिए मैंने बोलना बंद कर दिया… और हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया।”
रुद्रवीर की आवाज़ फिर कठोर हो गई।
“आपको इसका पछतावा होगा। आपने अपने ही बेटे को बेघर कर दिया।”
मैंने उसकी ओर देखा।
“नहीं, रुद्रवीर। मैंने अपने बेटे को एक घर दिया था। उसी बेटे ने अपनी माँ को उसी घर के भीतर बेघर कर दिया।”
युवा पुलिस अधिकारी ने नज़रें झुका लीं।
शायद उसकी भी एक माँ होगी।
शायद उसके घर में भी एक कमरा होगा, जिसे वह आज भी अपनी माँ का कमरा कहता होगा।
रुद्रवीर थोड़ा और पास आया।
अब उसके हाथ काँप रहे थे।
दुःख से नहीं।
डर से।
“हम कहाँ जाएँगे?”
मुझे याद आया, जब पहली बार मैंने वॉशिंग मशीन के पास रखी अपनी संकरी खाट देखी थी, तब मैंने भी मन ही मन यही पूछा था।
मैं कहाँ साँस लूँगी?
मैं अपने पति की तस्वीरें कहाँ रखूँगी?
जब मेरे घुटनों में दर्द होगा, तब मैं कहाँ बैठूँगी?
जब एक बेटा अपनी माँ की प्रार्थना की लौ के लिए जगह न बचाए, लेकिन प्लेस्टेशन के लिए पूरी जगह बना दे, तब वह बूढ़ी माँ कहाँ जाती है?
“मुझे नहीं पता,” मैंने कहा। “जाकर उस प्राइम लोकेशन से पूछो।”
उसके बाद उसके दोस्त एक-एक करके चले गए।
धीरे-धीरे।
बगीचे की पगडंडी पर उनके जूतों की हल्की आवाज़ गूँजती रही।
किसी ने खाने को हाथ नहीं लगाया।
किसी ने ठीक से अलविदा भी नहीं कहा।
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