
भाग 1
राजवीर राठौड़ की सगाई वाली रात, पूरे उदयपुर पैलेस के सामने एक अनजान लड़की ने उसे पकड़कर चूम लिया, और उसी पल उसकी होने वाली दुल्हन काव्या बर्वे की आंखों में प्यार नहीं, हत्या का सच चमक उठा।
हॉल में 500 मेहमान खड़े थे। संगमरमर की फर्श पर गुलाब की पंखुड़ियां बिखरी थीं, झूमरों की रोशनी में सोने की कढ़ाई वाले लहंगे चमक रहे थे, और ढोल की थाप के बीच हर कोई उस पल का इंतजार कर रहा था जब मुंबई का सबसे खतरनाक कारोबारी राजवीर राठौड़ अपनी राजनीतिक साझेदारी को रिश्ते का नाम देगा। काव्या मंत्री बर्वे की बेटी थी, खूबसूरत, शालीन और इतनी अभ्यास वाली मुस्कान लिए हुए कि कोई उसके भीतर की घबराहट नहीं पढ़ सकता था।
लेकिन नायरा शर्मा पढ़ रही थी।
सबकी नजर में नायरा सिर्फ इवेंट मैनेजर थी। हाथ में फाइल, कान में छोटा सा कम्युनिकेशन डिवाइस, चेहरे पर विनम्र मुस्कान और चाल में जानबूझकर रखी गई हल्की झिझक। पिछले 3 हफ्तों से वह इस महल में फूलों, मेहमानों और रस्मों के बहाने हर कमरे, हर कैमरे और हर आदमी की आदतें देख रही थी। किसी को शक नहीं था कि एक लड़की जो हर 2 मिनट में माफी मांगती है, वह असल में हर झूठ की धड़कन गिन रही है।
काव्या चांदी की ट्रे के पास गई। ट्रे में केसर ठंडाई के खास गिलास रखे थे, वही गिलास जो राजवीर अंगूठी पहनाने के बाद सबके सामने उठाने वाला था। काव्या ने मुस्कुराते हुए एक गिलास उठाया, फिर जैसे गलती से उसे दूसरी कतार में रख दिया। बस 1 पल। बेहद छोटा। मगर नायरा ने गिलास के किनारे पर चमकती महीन धातु जैसी परत देख ली।
उसके पास सिर्फ 3 सेकंड थे।
राजवीर ने गिलास उठाया। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह ठंडी कठोरता थी। वह किसी राजा की तरह खड़ा था, जिसे लगता था कि उसके दरबार में कोई उसे छू भी नहीं सकता। काव्या की पलकें एक बार कांपीं। नायरा के भीतर मिशन, डर और समझदारी तीनों लड़ पड़े। उसे राजवीर को मरने देना चाहिए था। उसके मरते ही राठौड़ परिवार टूट जाता, उसके अपने लोगों का काम आसान हो जाता। लेकिन उसके सामने एक आदमी जहर पीने जा रहा था, और वह खड़ी होकर तमाशा नहीं देख सकी।
वह भीड़ चीरती हुई आगे बढ़ी। किसी ने उसका नाम पुकारा। किसी ने हाथ रोकना चाहा। लेकिन वह सीधे राजवीर तक पहुंची, उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ा और सबके सामने उसके होंठों पर अपना मुंह रख दिया।
हॉल मरघट की तरह शांत हो गया।
राजवीर की पकड़ ढीली पड़ी। गिलास उसके हाथ से छूटकर संगमरमर पर टूट गया। केसरिया ठंडाई फर्श पर फैल गई। काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया, फिर लाल। उसने धीमे से कहा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”
राजवीर ने नायरा की कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ में गुस्सा था, लेकिन अजीब तरह की सावधानी भी। वह उसे पास खींचकर बोला, “या तो तुम पागल हो… या तुमने अभी मेरी जान बचाई है।”
नायरा ने टूटे गिलास की तरफ देखा। “इसे जांचिए। अभी।”
राजवीर ने अपने सुरक्षा प्रमुख अर्जुन को इशारा किया। कुछ ही मिनटों में रिपोर्ट आ गई। गिलास में जहर था।
शोर, चीखें, फुसफुसाहटें सब एक साथ उठीं। काव्या ने नाटक किया, जैसे वह भी सदमे में हो। मगर नायरा ने देखा, वह भीड़ के पीछे खड़े राजवीर के सबसे भरोसेमंद सलाहकार विक्रम सूद की तरफ देख रही थी।
राजवीर ने भारी आवाज में कहा, “आज की सगाई खत्म। कोई भी शहर से बाहर नहीं जाएगा।”
फिर उसने सबके सामने नायरा की कलाई और कसकर पकड़ ली। “और यह लड़की अब मेरी नजर से 1 पल भी दूर नहीं जाएगी।”
नायरा ने सिर उठाकर काव्या को देखा। काव्या ने होंठ हिलाए, आवाज किसी ने नहीं सुनी, मगर नायरा पढ़ चुकी थी।
“इसे जिंदा मत छोड़ना।”
भाग 2
राठौड़ हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल पर नायरा को मेहमान नहीं, कैदी की तरह रखा गया। कमरा महंगा था, खिड़की से अरब सागर दिखता था, पर दरवाजे के बाहर 2 गार्ड और हर कोने में कैमरे थे। राजवीर ने उसे खाना, कपड़े और सुरक्षा दी, पर आजादी नहीं।
“तुम इवेंट मैनेजर नहीं हो,” उसने पहली सुबह कहा।
नायरा ने चाय का कप उठाया। “और आप उतने अजेय नहीं हैं, जितना लोग मानते हैं।”
राजवीर पहली बार मुस्कुराया, मगर उसकी आंखें मुस्कुराई नहीं। उसी रात उसने कमरे में जानबूझकर एक पिस्तौल छोड़ दी। नायरा ने आदत से मजबूर होकर उसे 7 सेकंड में खोल दिया। दरवाजा खुला तो राजवीर सामने खड़ा था।
“फूल सजाने वाली लड़कियां बंदूक ऐसे नहीं खोलतीं।”
नायरा चुप रही। उस चुप्पी ने दोनों के बीच शक से ज्यादा खतरनाक चीज पैदा कर दी—भरोसा नहीं, लेकिन खिंचाव।
5 दिन बाद राजवीर उसे अपने साथ नवी मुंबई के एक गोदाम में बैठक के लिए ले गया। काफिले की 3 गाड़ियां थीं। रास्ता अचानक सुनसान हो गया। सामने वाली गाड़ी में धमाका हुआ, फिर पीछे वाली में। गोलियां शीशों पर बरसने लगीं।
राजवीर ने नायरा को नीचे दबाया। “सिर झुकाकर रहो।”
नायरा ने उसकी टखने वाली होल्स्टर से दूसरी पिस्तौल खींची। “आज आदेश मत दीजिए।”
वह बाहर निकली, कार को ढाल बनाया और 4 हमलावरों को कुछ ही पलों में गिरा दिया। अर्जुन अवाक रह गया। राजवीर ने उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार सचमुच देख रहा हो।
तभी घायल काव्या एक बंद इमारत से लड़खड़ाती हुई निकली। “गोली मत चलाइए,” वह रोई। “विक्रम ने कहा था बस डराना है… मारना नहीं।”
राजवीर का चेहरा पत्थर हो गया। उसने बंदूक काव्या पर तान दी। नायरा ने उसका हाथ नीचे कर दिया।
“असली दुश्मन वह नहीं है।”
राजवीर ने उसकी तरफ मुड़कर पूछा, “तुम आखिर हो कौन?”
नायरा ने भागने की कोशिश नहीं की। उसने पहली बार सच बोला।
“मैं नायरा शर्मा नहीं हूं। मैं देव मल्होत्रा की बेटी नायरा मल्होत्रा हूं। मुझे तुम्हारी जासूसी करने भेजा गया था।”
भाग 3
उस स्वीकारोक्ति के बाद हवा भी जैसे रुक गई। धुआं अब भी जली हुई गाड़ियों से उठ रहा था, घायल आदमी कराह रहे थे, दूर कहीं सायरन की आवाज फैल रही थी, पर राजवीर को सिर्फ 1 वाक्य सुनाई दे रहा था—देव मल्होत्रा की बेटी।
देव मल्होत्रा, दिल्ली और जयपुर के बीच फैले उस पुराने सिंडिकेट का नाम था, जिससे राठौड़ परिवार की दुश्मनी 20 साल पुरानी थी। जमीन, बंदरगाह, चुनावी पैसा, हथियार, सबमें दोनों घराने एक-दूसरे का रास्ता काटते आए थे। राजवीर ने बंदूक नायरा की तरफ उठाई, पर ट्रिगर दबा नहीं पाया।
“तुमने मुझे पहले दिन से धोखा दिया,” उसने कहा।
नायरा ने सिर नहीं झुकाया। “हां।”
“वह चुंबन भी?”
“नहीं। वह तुम्हारी जान बचाने के लिए था।”
राजवीर हंसा नहीं। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, चोट थी। वही चोट नायरा के भीतर सबसे गहरी उतर गई। वह दुश्मन के घर आई थी, जासूस बनकर, चाल चलने। मगर जिस आदमी को उसे रिपोर्ट में सिर्फ “लक्ष्य” लिखना था, वह अब उसके सामने खड़ा था—गुस्से में, टूटा हुआ, फिर भी जिंदा।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “साहब, यहां रुकना ठीक नहीं। जिसने यह करवाया है, उसे हमारे रूट, सुरक्षा और समय की पूरी जानकारी थी।”
राजवीर ने मुट्ठी भींच ली। “विक्रम।”
काव्या रो रही थी। उसके महंगे लहंगे का पल्लू फट चुका था, माथे की बिंदी धूल से धुंधली हो गई थी। “विक्रम ने कहा था कि अगर तुम मुझसे शादी नहीं करोगे तो मेरे पिता का करियर खत्म हो जाएगा। उसने कहा था कि नायरा तुम्हें मारने आई है। उसने कहा था कि अगर मैं गिलास बदल दूं तो बस तुम बीमार पड़ोगे, और फिर मैं तुम्हारी देखभाल करके सबके सामने जरूरी बन जाऊंगी। मैं मूर्ख थी… पर हत्यारी नहीं।”
राजवीर ने उसकी तरफ देखा। “तुमने जहर उठाया था।”
काव्या की आवाज टूट गई। “और उस गलती ने मुझे सारी उम्र जिंदा जलाना है।”
हवेली लौटने तक किसी ने बात नहीं की। राजवीर सीधे अपने निजी कमरे में गया। नायरा उसके पीछे गई, क्योंकि अब छिपने को कुछ बचा नहीं था। दरवाजा बंद हुआ तो राजवीर ने टेबल पर रखा गिलास दीवार पर दे मारा। कांच फर्श पर बिखर गया।
“3 महीने,” वह गरजा। “3 महीने तुमने मेरे घर, मेरे लोगों, मेरी आदतों, मेरी कमजोरी तक को पढ़ा।”
“पहले हां,” नायरा ने कहा। “फिर नहीं।”
“कब बदला सब?”
नायरा उसके सामने आकर रुक गई। “जब मैंने देखा कि तुम मर सकते हो। जब मेरे पास 3 सेकंड थे। जब मुझे समझ आया कि मैं रिपोर्ट लिख सकती हूं, लेकिन तुम्हारी लाश के ऊपर खड़े होकर जी नहीं सकती।”
राजवीर ने आंखें फेर लीं। “यह मत कहो कि तुम मुझसे प्यार करने लगी हो। उस झूठ की कीमत मैं नहीं चुका पाऊंगा।”
“तो सच सुनो,” नायरा ने कहा। “मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं। विक्रम तुम्हारी कुर्सी चाहता है। उसने काव्या को इस्तेमाल किया। उसने तुम्हारा रूट बेचा। और अगर आज वह जीत जाता, तो मेरी पहचान तुम्हारे दुश्मनों की मुहर बन जाती। वह तुम्हें मारकर युद्ध मेरे पिता पर डाल देता।”
राजवीर ने धीमे से पूछा, “और तुम्हारे पिता?”
“वह भी मुझे मोहरा समझते हैं,” नायरा बोली। “लेकिन मैं अब किसी की चाल नहीं हूं।”
उसी रात काव्या को हवेली के पुराने मेहमान कक्ष में बंद रखा गया। बंद कमरा जेल जैसा नहीं था, मगर बाहर पहरा था। सुबह राजवीर नायरा को साथ लेकर वहां गया। काव्या ने नायरा को देखते ही तिरस्कार से कहा, “अब तुम उसकी रानी बनकर आई हो?”
नायरा ने शांत आवाज में कहा, “अगर रानी होती तो तुम्हें बचाने नहीं आती।”
काव्या ने कड़वाहट से हंसना चाहा, मगर उसकी आंखों में डर था। नायरा ने कुर्सी खींची और बैठ गई। “विक्रम ने तुम्हें कब से समझाना शुरू किया?”
काव्या पहले चुप रही। फिर जैसे बांध टूट गया। उसने बताया कि विक्रम ने उसके पिता के पुराने घोटालों की फाइलें अपने पास रखी थीं। उसने धमकाया था कि अगर काव्या ने राठौड़ घराने से रिश्ता नहीं जोड़ा तो बर्वे परिवार खत्म हो जाएगा। उसने यह भी कहा था कि राजवीर कभी काव्या से शादी नहीं करेगा, क्योंकि वह किसी और गुप्त समझौते की तलाश में है। धीरे-धीरे उसने उसके भीतर भय, अपमान और अधिकार की आग भर दी।
“उसने कहा था,” काव्या सिसकी, “अगर राजवीर 1 रात के लिए कमजोर पड़ जाए, तो मैं सब संभाल लूंगी। उसने नहीं बताया कि वह सचमुच मर सकता है।”
राजवीर की आंखें ठंडी हो गईं। “विक्रम मुझे सिर्फ हटाना नहीं चाहता। वह मेरे बाद दोनों परिवारों को ब्लैकमेल करके पूरा नेटवर्क लेना चाहता है।”
नायरा ने कहा, “तो उसे बाहर खींचना होगा।”
काव्या ने पहली बार नायरा को गौर से देखा। “तुम मेरी मदद क्यों करोगी?”
“क्योंकि उसने तुम्हें भी मोहरा बनाया। और क्योंकि तुमने सच बोल दिया, जबकि तुम चाहती तो मुझ पर आरोप डाल सकती थी।”
काव्या ने कड़वी आवाज में कहा, “मैं अब भी तुमसे नफरत करती हूं।”
नायरा ने हल्का सा सिर हिलाया। “नफरत बाद में कर लेना। पहले विक्रम को गिराते हैं।”
तीनों ने योजना बनाई। काव्या विक्रम को फोन करेगी और रोती हुई कहेगी कि राजवीर ने उसे मारने का फैसला कर लिया है, वह भागना चाहती है। विक्रम उसे एक सुरक्षित जगह बुलाएगा। नायरा उसके साथ जाएगी, जैसे काव्या उसे बंधक बनाकर लाई हो। नायरा के झुमके में अर्जुन एक छोटा ट्रैकर लगाएगा। राजवीर बाहर से घेराबंदी करेगा।
राजवीर को योजना पसंद नहीं आई। “तुम खुद को उसके सामने रखोगी? फिर से?”
“तुमने कहा था न, मैं खतरनाक हूं,” नायरा ने कहा।
“खतरनाक होना और जानबूझकर मौत के मुंह में जाना अलग बात है।”
“मौत के मुंह में मैं उस रात भी गई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि तब तुम मुझे नहीं जानते थे।”
राजवीर चुप हो गया। उसकी आंखों में गुस्से से ज्यादा डर था। वह डर जो आदमी खुद से भी छिपाता है। उसने नायरा की कलाई पकड़ी। “अगर तुम वापस नहीं आईं, तो मैं यह शहर जला दूंगा।”
नायरा ने उसकी पकड़ पर हाथ रखा। “मैं लौटूंगी। तुम्हारे लिए नहीं… सच के लिए।”
राजवीर ने धीरे से कहा, “झूठ मत बोलो।”
नायरा पहली बार मुस्कुराई। “ठीक है। तुम्हारे लिए भी।”
अगली शाम काव्या ने विक्रम को फोन किया। उसकी आवाज में इतना वास्तविक डर था कि नायरा को भी पल भर के लिए उस पर दया आई। विक्रम ने जगह बताई—मुंबई पोर्ट के पास एक बंद मसाला गोदाम, जहां रात को सिर्फ ट्रकों की आवाज सुनाई देती थी।
गोदाम में हल्दी, मिर्च और समुद्री नमी की तीखी गंध थी। टूटी खिड़कियों से पीली रोशनी अंदर गिर रही थी। काव्या ने नायरा के हाथ आगे से बांध रखे थे, मगर गांठ ऐसी थी कि 1 झटके में खुल सकती थी। विक्रम अंधेरे से बाहर आया। उसका चेहरा हमेशा की तरह शांत था, जैसे वह किसी बोर्ड मीटिंग में आया हो।
“बहुत अच्छा,” उसने कहा। “काव्या, आखिर तुमने समझदारी दिखाई।”
काव्या कांपी। “मुझे बाहर भेज दो। मैं अब यह सब नहीं कर सकती।”
विक्रम हंसा। “अब पीछे लौटने का रास्ता नहीं है। राजवीर मरता तो तुम विधवा बनकर साम्राज्य संभालतीं। अब वह जिंदा है, तो हमें कहानी बदलनी होगी। नायरा मल्होत्रा ने राजवीर को फंसाया, काव्या को अगवा किया, और भागते समय मारी गई। देव मल्होत्रा बदला लेंगे, राजवीर कमजोर होगा, और मैं दोनों तरफ से सौदा करूंगा।”
नायरा ने सिर उठाया। “तुमने बहुत सोचा है।”
विक्रम उसकी तरफ बढ़ा। “तुम्हारी गलती सिर्फ 1 थी। तुमने उस आदमी को बचा लिया, जिसे मरना था।”
“और तुम्हारी गलती?” नायरा ने पूछा।
“क्या?”
नायरा ने बंधी कलाई खोली। “तुमने समझा, 2 औरतें सिर्फ डरती हैं।”
विक्रम की आंखें फैल गईं। उसी पल बाहर गोलियों की जगह लोहे के दरवाजों के टूटने की आवाज आई। राजवीर, अर्जुन और उसके भरोसेमंद आदमी अंदर घुसे। विक्रम ने काव्या को पकड़ने की कोशिश की, मगर काव्या ने पास रखी मिर्च की बोरी उसके चेहरे पर फेंक दी। विक्रम चीखा। नायरा ने उसे घुटने से गिराया, उसका हाथ मोड़ा और जमीन पर पटक दिया।
राजवीर ने बंदूक तानी। “10 साल तक मेरे साथ बैठकर तू मेरे घर की जड़ काटता रहा।”
विक्रम खून और मिर्च से भीगा हुआ हंस पड़ा। “घर? तुम्हारे जैसे लोगों का घर नहीं होता, राजवीर। सिर्फ कुर्सी होती है। और कुर्सी पर जो पहले बैठ जाए, वही मालिक।”
काव्या ने कांपते हाथ से बंदूक उठा ली। उसकी आंखों में आंसू थे। “मेरे पिता को तूने ब्लैकमेल किया। मुझे हत्यारी बनाया। मुझे लगा मैं अपनी इज्जत बचा रही हूं, और तू हमें बेच रहा था।”
राजवीर ने धीरे से कहा, “काव्या, बंदूक नीचे रखो।”
“यह मरना चाहिए।”
“हां,” राजवीर बोला। “लेकिन तुम्हारे हाथों नहीं। अगर आज तुमने गोली चलाई, तो वह मर जाएगा, और तुम पूरी उम्र उसके साथ मरती रहोगी।”
काव्या की उंगलियां कांपीं। लंबे मौन के बाद उसने बंदूक गिरा दी और फूटकर रो पड़ी। नायरा ने उसे पकड़ लिया। 2 औरतें, जो एक ही आदमी के कारण दुश्मन बनी थीं, उसी पल एक ही धोखे की राख में खड़ी थीं।
3 दिन बाद राठौड़ हवेली में फिर लोग जमा हुए। मगर इस बार संगीत नहीं था, न फूलों की खुशबू। इस बार राजवीर ने अपने सभी साझेदारों, परिवार के बुजुर्गों, राजनीतिक लोगों और सुरक्षा टीम को बुलाया था। विक्रम को सबके सामने लाया गया। उसके खिलाफ रिकॉर्डिंग, ट्रैकर, काव्या का बयान, पैसों की फाइलें और हमले का नक्शा सब टेबल पर रखे गए।
राजवीर ने कहा, “जिस आदमी को मैंने अपना दाहिना हाथ समझा, उसने मेरे घर, मेरे नाम और मेरे भरोसे को बेचने की कोशिश की। आज से विक्रम सूद का इस परिवार से कोई संबंध नहीं।”
फिर उसने सबके सामने काव्या की तरफ देखा। “काव्या बर्वे ने गलती की। बहुत बड़ी। लेकिन उसने सच बोला, और सच ने आज कई जानें बचाईं। उसके पिता के खिलाफ जो फाइलें दबाकर रखी गई थीं, वे कानून तक जाएंगी। रिश्ता यहीं खत्म होता है, लेकिन आज कोई उसे मोहरा बनाकर इस्तेमाल नहीं करेगा।”
काव्या ने सिर झुका लिया। उसके चेहरे पर अपमान था, पर साथ ही एक अजीब मुक्ति भी।
फिर राजवीर ने नायरा की तरफ हाथ बढ़ाया। हॉल में फुसफुसाहट फैल गई। देव मल्होत्रा की बेटी। दुश्मन के घर की लड़की। वही जिसने सगाई में चुंबन देकर तमाशा बनाया था। वही जिसने जहर रोका था। वही जिसने गोदाम में विक्रम को गिराया था।
नायरा धीरे-धीरे उसके पास आई।
राजवीर ने कहा, “यह लड़की मेरे घर में झूठ लेकर आई थी। यह सच है। यह मेरे दुश्मन की बेटी है। यह भी सच है। लेकिन जिस रात मेरे अपने लोग मुझे मरते देख रहे थे, इसने मुझे बचाया। जिस दिन मेरे सलाहकार ने मुझे मरवाना चाहा, इसने साथ लड़ाई लड़ी। और आज मैं सबके सामने कहता हूं—नायरा मल्होत्रा अब किसी की जासूस नहीं। वह मेरी बराबर की साझेदार है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
एक बुजुर्ग चाचा ने विरोध किया, “दुश्मन की बेटी को घर में जगह दोगे?”
राजवीर की आवाज और कठोर हो गई। “दुश्मन वह नहीं होता, जिसके खून में दूसरा नाम हो। दुश्मन वह होता है, जो तुम्हारी थाली में बैठकर तुम्हारे गिलास में जहर मिलाए।”
नायरा की आंखें भर आईं, मगर उसने आंसू गिरने नहीं दिए। उसने इतने साल मोहरा बनकर बिताए थे कि सम्मान की भाषा उसे लगभग अजनबी लग रही थी।
सभा खत्म होने के बाद महल का वही हॉल खाली था, जहां पहली बार उसने राजवीर को चूमा था। उसी फर्श पर जहां जहरीला गिलास टूटा था, अब सिर्फ साफ संगमरमर चमक रहा था। राजवीर उसके पास आया।
“उस रात तुमने मुझे बचाया था,” उसने कहा।
नायरा ने धीमे से जवाब दिया, “और उस रात मैंने खुद को भी पहली बार बचाया था।”
राजवीर ने उसके माथे को छुआ, बेहद सावधानी से। “तुम जानती हो, यह आसान नहीं होगा। तुम्हारे पिता यह स्वीकार नहीं करेंगे। मेरे लोग हमेशा शक करेंगे। काव्या कभी पूरी तरह माफ नहीं करेगी। और विक्रम जैसे लोग खत्म नहीं होते, बस नाम बदलते हैं।”
नायरा ने उसकी आंखों में देखा। “मैंने आसान रास्ता कभी चुना ही नहीं।”
राजवीर मुस्कुराया। इस बार वह मुस्कान हथियार नहीं थी, घर जैसी थी। “फिर साथ चलोगी?”
नायरा ने पलटकर उसी जगह को देखा जहां टूटा हुआ गिलास गिरा था। “मैं उस रात तुम्हारी जान बचाने आई थी। मुझे नहीं पता था कि उसी पल मेरी अपनी जिंदगी बदल जाएगी।”
राजवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। बाहर मानसून की पहली बारिश शुरू हो चुकी थी। उदयपुर की गर्म हवा में मिट्टी की गंध घुल रही थी। महल के बाहर राजनीति, बदला, परिवार और खून के पुराने हिसाब इंतजार कर रहे थे, पर उस खाली हॉल में 2 लोग खड़े थे जिन्हें झूठ ने मिलाया, जहर ने परखा, और सच ने बांध दिया।
नायरा ने धीरे से कहा, “अगली बार अगर सबके सामने तुम्हें चूमूंगी, तो किसी जहर के कारण नहीं।”
राजवीर ने मुस्कुराकर पूछा, “तो किस कारण?”
नायरा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। “क्योंकि तब मैं भाग नहीं रही होऊंगी।”
उसने पहली बार खुलकर उसे अपने पास खींचा। कोई मेहमान नहीं था, कोई दुल्हन नहीं, कोई गिलास नहीं, कोई जहर नहीं। सिर्फ 2 धड़कनें थीं, जिन्होंने दुश्मनी के बीच अपना रास्ता बना लिया था।
लेकिन हवेली के बाहर बारिश में खड़ा एक आदमी फोन पर बस 1 वाक्य कह रहा था।
“नायरा मल्होत्रा अब राठौड़ के साथ है।”
फोन के दूसरी तरफ लंबी चुप्पी रही। फिर देव मल्होत्रा की ठंडी आवाज आई।
“तो अब युद्ध सचमुच शुरू होगा।”
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.